छायावाद स्व के अस्तित्व को समझने के लिए अन्तर्मन के गहरे पैठने का युग है। इस दौर के चारों स्तम्भों – प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी वर्मा ने स्व-अन्वेषण के निष्कर्षों की अभिव्यक्ति गद्य एवं पद्य दोनों रूपों में की है। इन चारों रचनाकारों के रचना-कर्म में सर्वाधिक विषय-वैविध्य जिसकी रचनाओं में मिलता है, वह महादेवी वर्मा हैं। आलोचक नामवर सिंह के अनुसार छायावाद संबंधी सभी आलोचनाओं का जवाब महादेवी वर्मा ने दिया है, अतः इनकी रचनाओं में विषय की व्यापकता अधिक दिखती है। इनकी काव्य रचनाएँ जहाँ विरह, वेदना और वियोग के रहस्यवादी आहों से पाठक का मन पीड़ा से परिपूर्ण कर देती हैं, वहीँ गद्य साहित्य वायवीय रहस्य की जगह यथार्थ के खुरदुरे जमीन पर जीवन जीते मानव की सांसारिक पीड़ा और उससे जूझ का बखान करता है। महादेवी वर्मा का अपने जीवन-संघर्षों के दौरान बहुतेरे लोगों से साबका पड़ा। तत्कालीन राजनीति के अनेक लोगों के बारे में […]
No Posts Found
लाहौर पहुँच कर सीधा मसऊद के घर पहुँचा तो वह हजरत गायब थे। मालूम हुआ कि कहीं घूमने गये हैं। खैर, वो घूमने जाएँ अथवा जहन्नुम में, घर तो उनका मौजूद ही था। सामान रख कर अत्यन्त संतोष से नहाया-धोया। कपड़े बदले और उनके नौकर से कहा…”चाय लाओ!” यह नौकर भी कोई नया जानवर ही फंसा था शायद। एक तो वह ऊपर से ले कर नीचे तक ऐसी नजरों से मुझे देख रहा था, जैसे मैं उसके स्वामी का अतिथि नहीं; बल्कि कोई उचक्का हूँ और इस घर से कुछ-न-कुछ उठाने वाला ही हूँ। दूसरे, ऐसा मालूम होता था, जैसे यह व्यक्ति अब तक किसी सभ्य आदमी के यहाँ नहीं रहा और मसऊद को भी इसे इनसान बनाने का अवसर नहीं मिला। जब उस नौकर ने बनी-बनायी चाय ला कर तिपाई पर मेरे सामने रख दी तो मैंने पहले तो आश्चर्यचकित हो उस बेहूदा चाय को देखा और फिर चाय […]
काजर की कोठरी-खंड 3 के लिए यहाँ क्लिक करें काजर की कोठरी: खंड सूची यहाँ देखें दिन आधे घंटे से ज्यादे बाकी है। आसमान पर कहीं-कहीं बादल के गहरे टुकड़े दिखाई दे रहे हैं और साथ ही इसके बरसाती हवा भी इस बात की खबर दे रही है कि यही टुकड़े थोड़ी देर में इकट्ठे होकर जमीन को तराबोर कर देंगे। इस समय हम अपने पाठकों को जिस बाग में ले चलते हैं, वह एक तो मालियों की कारीगरी और शौकीन मालिक की निगरानी तथा मुस्तैदी के सबब खुद ही रौनक पर रहा करता है, दूसरे, आजकल के मौसिम ने उसके जीवन को और भी उभार रखा है। यह बाग जिसके बीच में एक सुंदर कोठी भी बनी हुई है, हमारे हरनंदन बाबू के सच्चे और दिली दोस्त रामसिंह का है और इस समय वे स्वयं हरनंदन बाबू के हाथ में हाथ दिए और धीरे-धीरे टहलते हुए इस बाग के […]
एक दिन मिर्ज़ा साहब और मैं बरामदे में साथ साथ कुर्सियाँ डाले चुप-चाप बैठे थे। जब दोस्ती बहुत पुरानी हो जाए तो बातचीत की कुछ वैसी ज़रूरत बाक़ी नहीं रहती और दोस्त एक दूसरे की ख़ामोशी से लुत्फ़ उठा सकते हैं। यही हालत हमारी थी। हम दोनों अपने-अपने विचारों में डूबे थे। मिर्ज़ा साहब तो ख़ुदा जाने क्या सोच रहे थे। लेकिन मैं ज़माने के जुल्मो सितम पर ग़ौर कर रहा था। दूर सड़क पर थोड़े-थोड़े समय के बाद एक मोटर कार गुज़र जाती थी। मेरी तबीयत कुछ ऐसी है कि मैं जब कभी किसी मोटर कार को देखूं मुझे ज़माने के जुल्म का ख़्याल ज़रूर सताने लगता है और मैं कोई ऐसी तरकीब सोचने लगता हूँ जिससे दुनिया की तमाम दौलत सब इंसानों में बराबर-बराबर बाँटी जा सके। अगर मैं सड़क पर पैदल जा रहा हूँ और कोई मोटर इस अदा से गुज़र जाए कि गर्द-ग़ुबार मेरे फेफड़ों, मेरे […]
एक मित्र मिले, बोले, “लाला, तुम किस चक्की का खाते हो? इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो। क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो। संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।” हम बोले, “रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो। इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो। आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है। आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है। आराम शब्द में ‘राम’ छिपा जो भव-बंधन को खोता है। आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है। इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो। ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो। यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो। अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो। करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में। जो ओठ हिलाने […]
झीनी-झीनी बीनी चदरिया जैसी लोकप्रियता भले ही अब्दुल बिस्मिल्लाह के अन्य उपन्यासों को हासिल नहीं हुई हो, लेकिन पठनीयता और सामाजिक यथार्थ के प्रामाणिक अंकन की दृष्टि से उनके सभी उपन्यास अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ‘जहरबाद’ प्रकाशन की दृष्टि से अब्दुल बिस्मिल्लाह का तीसरा उपन्यास है, परंतु वस्तुतः: यह प्रथम प्रकाशित उपन्यास ‘समर शेष है’ से पूर्व की कथा है। जहरबाद एक तरह के जहरीले फोड़े को कहते हैं, जिसका जहर प्राणघातक होता है। यह कहानी भी उन्हीं लोगों की है, जिनकी ज़िंदगी एक जहरबाद की तरह टीस और जहर से भरी हुई है। ‘जहरबाद’ की कथा–भूमि मध्यप्रदेश के मंडला जिले का एक ग्रामीण अंचल ‘हिनौता’ है। जहरबाद : कथ्य हिनौता कथावाचक ‘मैं’ का ननिहाल है, जहाँ वह अपने माँ-बाप के साथ रहता है। ‘मैं’ का परिवार ही नहीं, बल्कि गाँव के अधिकांश परिवार आर्थिक अभाव की चक्की में पिस रहे हैं। त्रिलोचन के अनुसार, –‘इस उपन्यास में ऐसे चरित्रों का निरूपण […]
काजर की कोठरी : खंड 2 के लिए यहाँ क्लिक करें काजर की कोठरी: खंड सूची यहाँ देखें रात दो घंटे से ज्यादे नहीं रह गई है। दरभंगा के बाजारों की रौनक अभी मौजूद है, मगर घटती जाती है। हाँ उस बाजार की रौनक कुछ दूसरे ही ढंग पर पलटा खा रही है, जो रंडियों की आबादी से विशेष संबंध रखती है, अर्थात उनके निचले खंड की रौनक से ऊपरवाले खंड की रौनक ज्यादे होती जा रही है। इस उपन्यास के इस बयान में हमको इसी बाजार से कुछ मतलब है, क्योंकि उस बाँदी रंडी का मकान भी इसी बाजार में है, जिसका जिक्र इस किस्से के पहले और दूसरे बयान में आ चुका है। बाँदी का मकान तीन मरातब का है और उसमें जाने […]
हिंदुस्तान में जब भी जातिवाद व जाति व्यवस्था पर चर्चा होती है तो हिन्दू वर्ण व्यवस्था की ही बात सामने आती है और अमूमन हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी कौम, मजहब व सम्प्रदाय का हो, उच्च जाति के लोगों पर निम्न जाति के लोगों के विरूद्ध अत्याचार, अन्याय व अपमान के आरोप लगते रहते हैं। इसमें काफी हद तक सत्यता भी है। इस कुरीति व अन्यायपूर्ण व्यवस्था को लेकर अनेक समाज सुधारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा हिन्दू समाज से जातिवादी संकीर्णता को दूर करने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं संकीर्णताओं के कारण ही एक विद्रोह स्वरूप बौद्ध धर्म का उदय हुआ और अब भी इस व्यवस्था से प्रताड़ित होने पर निम्न वर्ग के हिन्दू समुदाय यदा-कदा इस्लाम धर्म अथवा ईसाई धर्म में शामिल होने के लिए हिन्दू संगठनों को धमकाते रहते हैं, यह एक तरह का ब्लैकमेलिंग या यों कहें भयादोहन ही है। किन्तु बहुत कम […]
पिछले भाग के लिए क्लिक करें पहला बयान वे दोनों साधु, जो सन्दूक के अन्दर झांक न मालूम क्या देखकर बेहोश हो गए थे, थोड़ी देर बाद होश में आए और चीख-चीखकर रोने लगे। एक ने कहा, “हाय-हाय इन्द्रजीतसिंह, तुम्हें क्या हो गया! तुमने तो किसी के साथ बुराई न की थी, फिर किस कम्बख्त ने तुम्हारे साथ बदी की प्यारे कुमार, तुमने बड़ा बुरा धोखा दिया, हम लोगों को छोड़कर चले गए, क्या दोस्ती का हक इसी तरह अदा करते हैं हाय, अब हम लोग जीकर क्या करेंगे, अपना काला मुंह लेकर कहां जाएंगे हमको अपने भाई से बढ़कर मानने वाला अब दुनिया में कौन रह गया! तुम हमें किसके सुपुर्द करके चले गये’ दूसरा बोला – “प्यारे कुमार, कुछ तो बोलो! जरा अपने दुश्मनों का नाम तो बताओ, कुछ कहो तो सही कि किस बेईमान ने तुम्हें मारकर इस सन्दूक में डाल दिया हाय, अब हम तुम्हारी मां […]
संवत् 1375 से लेकर संवत् 1700 तक के काल को भक्ति काल कहा जाता है। भारतीय इतिहास में पहली बार समस्त देश की चेतना इस काल में भक्ति भाव धारा से अनुप्राणित हो उठी। ग्रियर्सन ने कहा है — भक्ति काव्य का आरंभ भक्ति आंदोलन इतने जोर शोर से कैसे आरंभ हुआ और इसके पीछे कौन से कारण थे इस संबंध में कोई एक राय नहीं है। अपने अनिश्चय को व्यक्त करते हुए स्वयं ग्रियर्सन ने लिखा है– ग्रियर्सन अनुमान से उसे ईसाइयत की देन मानते हैं। दूसरी-तीसरी शताब्दी में कुछ ईसाई मद्रास में आकर बस गए थे। कालान्तर में उनके या उनके वंशजों के प्रभाव से दक्षिण में एक ऐसा भक्ति आंदोलन उठा जो देखते-ही-देखते देश भर में फैल गया। यह मानना हास्यास्पद लगता है। इतिहासकार ताराचंद के मतानुसार, ‘भक्ति काव्य इस्लाम के प्रारंभिक काल में ही पश्चिमी समुद्र तट पर आ बसे अरबों की देन है।’ यह […]
जनवरी की एक सर्द सुबह थी। बर्फ़ीली हवा हड्डियों से गुजर खून जमा देने पर उतारू थी। स्टॉप पर खड़े सभी यात्री अपने-अपने तरीक़े से ठंड से बचाव किए हुए थे। वो दोनों भी गर्म कपड़ों से ख़ुद को इस ढंग से समेटे हुए थे कि केवल आँखें ही बाहर झाँक रही थी। दोनों कई दिनों से उसी बस स्टॉप से बस पकड़ते थे। आस-पास के अलग-अलग गांव से आते थे और वहाँ भीड़ का हिस्सा बन बस का इंतज़ार करते और एक ही बस से अपने-अपने गंतव्य तक जाते थे। इस सिलसिले के बावजूद अभी तक एक-दूसरे से सर्वथा अनजान थे, लेकिन अब ना जाने कैसे उन्हें एक-दूसरे में रुचि पैदा हो गयी थी, आभास भी ना […]
पायल की नींद अचानक टूट गई। घड़ी देखी तो सुबह के सात बजे थे। तभी, नौकर चाय लेकर आया और सामने टेबल पर रखकर चला गया। पायल का मन अभी और सोने का कर रहा था, तभी उसकी नजर चाय के पास रखे अखबार पर गई। मुखपृष्ठ पर ही छपा था ‘कुमार हिमांशु देववर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार’। पायल को एक झटका सा लगा। उसे कुछ संदेह हुआ और वह अखबार उठाकर पढ़ने लगी, लेकिन जैसे-जैसे वह अखबार पढ़ती गयी, उसकी आँखें आश्चर्य से फटती गयीं। जिस लेखक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल रहा था, उसे कभी उसने यह कहकर ठुकरा दिया था कि वह गरीब है, इस कारण वह उससे शादी नहीं कर सकती है। अखबार हाथों में लिए हुए पायल अतीत की यादों में डूब गई। तब पायल कॉलेज में पढ़ती थी। अमीर बाप की लड़की होने के कारण वह बहुत ही घमंडी थी। उसके […]
बयान 11 इस जगह मुख्तसर ही में यह भी लिख देना मुनासिब मालूम होता है कि रोहतासगढ़ तहखाने में से राजा वीरेन्द्रसिंह, कुंअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग क्योंकर छूटे और कहां गए। हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय गौहर ‘जोगिया’ का संकेत देकर रोहतासगढ़ किले में दाखिल हुई उसके थोड़ी ही देर बाद एक लम्बे कद का आदमी भी, जो असल में भूतनाथ था, ‘जोगिया’ का संकेत देकर किले के अन्दर चला गया। न मालूम उसने वहां क्या-क्या कार्रवाई की, मगर जिस समय मैगजीन उड़ाई गई थी, उस समय वह एक चोबदार की सूरत बना राजमहल के आसपास घूम रहा था। जब राजा दिग्विजयसिंह घबराकर महल के बाहर निकला था और चारों तरफ कोलाहल मचा हुआ था, वह इस तरह महल के अन्दर घुस गया कि किसी को गुमान भी न हुआ। इसके पास ठीक वैसी ही ताली मौजूद थी जैसी तहखाने की ताली राजा दिग्विजयसिंह के […]
चंद्रकांता संतति भाग 5 बयान 1 से 5 के लिए यहाँ क्लिक करें बयान 6 आज बहुत दिनों के बाद हम कमला को आधी रात के समय रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर पूरब तरफ वाले जंगल में घूमते देख रहे हैं। यहां से किले की दीवार बहुत दूर और ऊंचे पर है। कमला न मालूम किस फिक्र में है या क्या ढूंढ़ रही है। यद्यपि रात चांदनी थी परन्तु ऊंचे-ऊंचे और घने पेड़ों के कारण जंगल में एक प्रकार से अन्धकार ही था। घूमते-घूमते कमला के कानों में किसी के पैर की आहट मालूम हुई। वह रुकी और एक पेड़ की आड़ में खड़ी होकर दाहिनी तरफ देखने लगी, जिधर से आहट मिली थी। दस-पन्द्रह कदम की दूरी से दो आदमी जाते हुए दिखाई पड़े। बात और चाल से दोनों औरतें मालूम पड़ीं। कमला भी पैर दबाए और अपने को हर तरफ से छिपाये उन्हीं दोनों के पीछे-पीछे धीरे-धीरे रवाना […]
काजर की कोठरी खंड-1 संध्या होने में अभी दो घंटे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे , क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है। जिधर निगाह दौड़ाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है। ऐसे समय में हम अपने पाठकों को उस सड़क पर ले चलते हैं जो दरभंगे से सीधी बाजितपुर की तरफ गई है। काजर की कोठरी खंड-2 यों तो कल्याणसिंह के बहुत-से मेली-मुलाकाती थे मगर सूरजसिंह नामी एक जिमींदार उनका सच्चा और दिली दोस्त था, जिसकी यहाँ के राजा धर्मसिंह के वहाँ भी बड़ी इज्जत और कदर थी। सूरजसिंह का एक नौजवान लड़का भी था, जिसका नाम रामसिंह था और जिसे राजा धर्मसिंह ने बारह मौजों का तहसीलदार बना दिया था। उन दिनों तहसीलदारों को बहुत बड़ा अख्तियार रहता था, यहाँ तक सैकड़ों […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…