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चंद्रकांता संतति भाग 5 बयान 1 से 5 के लिए यहाँ क्लिक करें 

बयान 6  

आज बहुत दिनों के बाद हम कमला को आधी रात के समय रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर पूरब तरफ वाले जंगल में घूमते देख रहे हैं। यहां से किले की दीवार बहुत दूर और ऊंचे पर है। कमला न मालूम किस फिक्र में है या क्या ढूंढ़ रही है। यद्यपि रात चांदनी थी परन्तु ऊंचे-ऊंचे और घने पेड़ों के कारण जंगल में एक प्रकार से अन्धकार ही था। घूमते-घूमते कमला के कानों में किसी के पैर की आहट मालूम हुई। वह रुकी और एक पेड़ की आड़ में खड़ी होकर दाहिनी तरफ देखने लगी, जिधर से आहट मिली थी। दस-पन्द्रह कदम की दूरी से दो आदमी जाते हुए दिखाई पड़े। बात और चाल से दोनों औरतें मालूम पड़ीं। कमला भी पैर दबाए और अपने को हर तरफ से छिपाये उन्हीं दोनों के पीछे-पीछे धीरे-धीरे रवाना हुई। लगभग आध कोस जाने के बाद ऐसी जगह पहुंची जहां पेड़ बहुत कम थे बल्कि उसे एक प्रकार से मैदान ही कहना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी दूर पर पत्थर के बड़े-बड़े अनगढ़ ढोंके पड़े हुए थे जिनकी आड़ में कई आदमी छिप सकते थे। सघन पेड़ों की आड़ में से निकलकर मैदान में कई कदम जाने के बाद वे दोनों अपने ऊपर से स्याह चादर उतारकर एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गईं। कमला ने भी अपने को बड़ी चालाकी से उन दोनों के करीब पहुंचाया और एक पत्थर की आड़ में छिपकर उन दोनों की बातचीत सुनना चाहा। चन्द्रमा अपनी पूर्ण किरणों से उदय हो रहे थे और निर्मल चांदनी इस समय अपना पूरा जोबन दिखा रही थी। हर एक चीज अच्छी तरह और साफ नजर आती थी। जब वे दोनों औरतें चादर उतारकर पत्थर की चट्टान पर बैठ गईं, तब कमला ने उनकी सूरत देखी। बेशक वे दोनों नौजवान औरतें थीं जिनमें से एक तो बहुत ही हसीन थी और दूसरी के विषय में कह सकते हैं कि शायद उसकी लौंडी या ऐयारा हो।

कमला बड़े गौर से उन दोनों औरतों की तरफ देख रही थी कि इतने ही में सामने से एक लम्बे कद का आदमी आता हुआ दिखाई पड़ा जिसे देख कमला चौंकी और उस समय तो कमला का कलेजा बेहिसाब धड़कने लगा जब वह आदमी उन दोनों औरतों के पास आकर खड़ा हो गया और उनसे डपटकर बोला, “तुम दोनों कौन हो’ उस आदमी का चेहरा चन्द्रमा के सामने था, विमल चांदनी उसके नक्शे को अच्छी तरह दिखा रही थी, इसीलिए कमला ने उसे तुरन्त पहचान लिया और उसे विश्वास हो गया कि वह लम्बे कद का आदमी वही है जो खंडहर वाले तहखाने के अन्दर शेरसिंह से मिलने गया था और जिसे देख उनकी अजब हालत हो गई थी तथा जिद करने पर भी उन्होंने न बताया कि यह आदमी कौन है।

कमला ने अपने धड़कते हुए कलेजे को बाएं हाथ से दबाया और गौर से देखने लगी कि अब क्या होता है। यद्यपि कमला उन दोनों औरतों से बहुत दूर न थी और इस रात के सन्नाटे में उनकी बातचीत बखूबी सुन सकती थी, तथापि उसने अपने को बड़ी सावधानी से उस तरफ लगाया और सुनना चाहा कि दोनों औरतों और लम्बे व्यक्ति में क्या बातचीत होती है।

उस आदमी के डपटते ही ये दोनों औरतें चैतन्य होकर खड़ी हो गईं और उनमें से एक ने, जो सरदार मालूम होती थी, जवाब दिया –

औरत – (अपनी कमर से खंजर निकालकर) हम लोग अपना परिचय नहीं दे सकतीं और न हमें यही पूछने से मतलब है कि तुम कौन हो।

आदमी – (हंसकर) क्या तू समझती है कि मैं तुझे नहीं पहचानता मुझे खूब मालूम है कि तेरा नाम गौहर है। मैं तेरी सात पुश्त को जानता हूं, मगर आजमाने के लिए पूछता था कि देखूं, तू अपना सच्चा हाल मुझे कहती है या नहीं! क्या कोई अपने को भूतनाथ से छिपा सकता है?

‘भूतनाथ’ नाम सुनते ही वह और घबरा गई, डर से बदन कांपने लगा और खंजर उसके हाथ से गिर पड़ा। उसने मुश्किल से अपने को सम्हाला और हाथ जोड़कर बोली, “बेशक मेरा नाम गौहर है, मगर…”

भूत – तू यहां क्यों घूम रही है शायद इस फिक्र में है कि इस किले में पहुंचकर आनन्दसिंह से अपना बदला ले!

गौहर – (डरी हुई आवाज से) जी हां।

भूत – पहले भी तो तू उन्हें फंसा चुकी थी, मगर उनका ऐयार देवीसिंह उन्हें छुड़ा ले गया। हां, तेरी छोटी बहिन कहां है?

गौहर – वह तो गया की रानी माधवी के हाथ से मारी गई।

भूत – कब?

गौहर – जब वह इन्द्रजीतसिंह को फंसाने के लिए चुनारगढ़ के जंगल में गई थी तो मैं भी अपनी छोटी बहिन को साथ लेकर आनन्दसिंह की धुन में उसी जंगल में गई हुई थी। दुष्टा माधवी ने व्यर्थ ही मेरी बहिन को मार डाला। जब वह जंगल काटा गया तो वीरेन्द्रसिंह के आदमी उसकी लाश उठाकर चुनार ले गए थे, मगर (अपनी साथिन की तरफ इशारा करके) बड़ी चालाकी से यह ऐयारा उस लाश को वहां से उठा लाई थी।1

भूत – हां ठीक है, अच्छा तो तू इस किले में घुसना चाहती है और आनन्दसिंह की जान लिया चाहती है

गौहर – यदि आप अप्रसन्न न हों तो।

भूत – मैं क्यों अप्रसन्न होने लगा मुझे क्या गरज पड़ी है कि मना करूं। जो तेरा जी चाहे वह कर। अच्छा मैं जाता हूं लेकिन एक दफे फिर तुझसे मिलूंगा।

वह आदमी तुरन्त चला गया और देखते-देखते नजरों से गायब हो गया। इसके बाद उन दोनों औरतों में बातचीत होने लगी।

गौहर – गिल्लन, इसकी सूरत देखते ही मेरी जान निकल गई थी। न मालूम, यह कम्बख्त इस वक्त कहां से आ गया।

गिल्लन – तुम्हारी तो बात ही दूसरी है, मैं ऐयारा होकर अपने को सम्हाल न सकी। देखो, अभी तक कलेजा धड़-धड़ करता है।

गौहर – मुझको तो यही डर लगा हुआ था कि कहीं यह मुझे आनन्दसिंह से बदला लेने के बारे में मना न करे।

गिल्लन – सो तो उसने न किया, मगर एक दफे मिलने के लिए कह गया था। अच्छा, अब यहां ठहरना मुनासिब नहीं।

वे दोनों औरतें, अर्थात् गौहर तथा गिल्लन, वहां से चली गईं और कमला ने भी एक तरफ का रास्ता लिया। दो घण्टे के बाद कमला उस कब्रिस्तान में पहुंची जो रोहतासगढ़ के तहखाने में आने – जाने का रास्ता था। इस समय चन्द्रमा अस्त हो चुका था और कब्रिस्तान में भी सन्नाटा था। कमला बीच वाली कब्र के पास गई और तहखाने में जाने के लिए दरवाजा खोलने लगी, मगर खुल न सका। आधे घंटे तक वह इसी फिक्र में लगी रही, पर कोई काम न चला, लाचार उठ खड़ी हुई और कब्रिस्तान के बाहर की तरफ चली। फाटक के पास पहुंचते ही वह अटकी क्योंकि सामने की तरफ थोड़ी ही दूर पर कोई चमकती हुई चीज उसे दिखाई पड़ी जो इसी तरफ बढ़ी आ रही थी। आगे जाने पर मालूम हुआ कि यह बिजली की तरह चमकने वाली चीज एक नेजा है जो किसी औरत के हाथ में है। वह नेजा कभी-कभी तेजी के साथ चमकता है और इस सबब से दूर-दूर तक चीजें दिखाई देती हैं और कभी उसकी चमक बिल्कुल ही जाती रहती है और यह भी नहीं मालूम होता है कि नेजा या नेजे को हाथ में रखने वाली औरत कहां है। थोड़ी देर में वह औरत इस कब्रिस्तान के बहुत पास आ गई और नेजे की चमक ने कमला को उस औरत की सूरत-शक्ल अच्छी तरह दिखा दी। उस औरत का रंग स्याह था, सूरत डरावनी और बड़े-बड़े दो-तीन दांत मुंह के बाहर निकले हुए थे। काली साड़ी पहने हुए वह औरत पूरी राक्षसी मालूम होती थी। यद्यपि कमला ऐयारा और बहुत दिलेर थी मगर इसकी सूरत देखते ही थर-थर कांपने लगी। उसने चाहा कि कब्रिस्तान के बाहर निकलकर भाग जाय मगर वह इतना डर गई थी कि पैर न उठा सकी। देखते-ही-देखते वह भयकर मूर्ति कमला के सामने आकर खड़ी हो गयी और कमला को डर के मारे कांपते देखकर बोली, “डर मत, होश ठिकाने कर और जो कुछ मैं कहती हूं, उसे ध्यान देकर सुन!”

बयान 7

रोहतासगढ़ फतह होने की खबर लेकर भैरोसिंह चुनार पहुंचे और उसके दो ही तीन दिन बाद राजा दिग्विजयसिंह की बेईमानी की खबर लेकर कई सवार भी जा पहुंचे। इस समाचार के पहुंचते ही चुनारगढ़ में खलबली पड़ गई। फौज के साथ ही साथ रिआया भी राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान को दिल से चाहती थी, क्योंकि उनके जमाने में अमीर-गरीब सभी खुश रहते थे! आलिमों और कारीगरों की कदर की जाती थी, अदना से अदना भी अपनी फरियाद राजा के कान तक पहुंचा सकता था, उद्योगियों और व्यापारियों को दरबार से मदद मिलती थी, ऐयार और जासूस लोग छिपे-छिपे रिआया के दुःख-सुख का हाल मालूम करते और राजा को हर तरह की खबर पहुंचाते थे। शादी-ब्याह में इज्जत के माफिक हर एक को मदद मिलती थी और इसी से रिआया भी तन-मन-धन से राजा की मदद के लिए तैयार रहती थी। राजा वीरेन्द्रसिंह कैद हो गये, इस खबर को सुनते ही रिआया जोश में आ गई और इस फिक्र में हुई कि जिस तरह हो, राजा के छुड़ाना चाहिए।

रोहतासगढ़ के बारे में क्या करना चाहिए और दुश्मनों पर कैसे फतह पानी चाहिए, यह सब सोचने-विचारने के पहले महाराज सुरेन्द्रसिंह और जीतसिंह ने भैरोसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल को हुक्म दिया कि तुम लोग तुरन्त रोहतासगढ़ जाओ और जिस तरह हो सके अपने को किले के अंदर पहुंचाकर राजा वीरेन्द्रसिंह को रिहा करो, हम दोनों में से भी कोई आदमी मदद लेकर शीघ्र पहुंचेगा।

हुक्म पाते ही तीनों ऐयार तेज और मजबूत घोड़ों पर सवार होकर रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए और दूसरे दिन शाम को अपनी फौज में पहुंचे। राजा वीरेन्द्रसिंह की आधी, अर्थात् पच्चीस हजार फौज तो पहाड़ी के नीचे किले के दरवाजे की तरफ खड़ी हुई थी और बाकी आधी फौज पहाड़ी के चारों तरफ इसलिए फैला दी गयी थी कि राजा दिग्विजयसिंह को बाहर से किसी तरह की मदद न पहुंचने पाये। पांच-पांच, सात-सात सौ बहादुरों को लेकर नाहरसिंह कई दफे उस पहाड़ी पर चढ़ा और किले के दरवाजे तक पहुंचना चाहा, मगर किले के बुर्जों पर से आए हुए तोप के गोलों ने उसे वहां तक न पहुंचने दिया और हर दफे लौटना पड़ा। जाहिर में तो वे लोग सामने की तरफ अड़े हुए थे और घड़ी-घड़ी हमला करते थे, मगर नाहरसिंह के हुक्म से पांच-पांच, सात-सात करके बहुत से सिपाही, जासूस और सुरंग खोदने वाले जंगल-ही-जंगल रात के समय छिपे हुए रास्तों से पहाड़ पर चढ़ गये थे तथा बराबर चढ़े चले जाते थे और उम्मीद पाई जाती थी कि दो ही तीन दिन में हजार आदमी पहाड़ के ऊपर हो जायेंगे। तब नाहरसिंह छिपकर अकेला पहाड़ पर चढ़ जायगा और अपने आदमियों को बटोरकर किले के दरवाजे पर हमला करेगा। पहाड़ के ऊपर पहुंचकर सुरंग खोदने वाले सुरंग खोदकर बारूद के जोर से किले का फाटक तोड़ने की धुन में लगे हुए थे और इन बातों की खबर राजा दिग्विजयसिंह को बिल्कुल न थी।

भैरोसिंह ने फौज में पहुंचकर यह सब हाल सुना और खुश होकर सेनापतियों की तारीफ की तथा कहा कि “यद्यपि पहाड़ के ऊपर का घना जंगल ऐसा बेढब है कि मुसाफिरों को जल्दी रास्ता नहीं मिल सकता, तथापि हमारे आदमी यदि ऊंचाई की तरफ ध्यान न देकर चढ़ना शुरू करेंगे तो लुढ़कते-पुढ़कते किले के पास पहुंच ही जायेंगे। खैर, आप लोग जिस काम में लगे हैं, उसी में लगे रहिए। हम तीनों ऐयार अब पहाड़ पर जाते हैं और किसी तरह किले के अन्दर पहुंचने का बन्दोबस्त करते हैं।

पहर रात बीत गई थी जब भैरोसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगे। भैरोसिंह कई दफे उस पहाड़ी पर जा चुके थे और उस जंगल में अच्छी तरह घूम चुके थे, इसलिए इन्हें भूलने और धोखा खाने का डर न था। ये लोग बेधड़क पहाड़ पर चले गए और रोहतासगढ़ के रास्ते वाले कब्रिस्तान में ठीक उस समय पहुंचे, जिस समय कमला धड़कते हुए कलेजे के साथ उस राक्षसी के सामने खड़ी थी जिसके हाथ में बिजली की तरह चमकता हुआ नेजा था। जिस समय वह नेजा चमकता था, देखने वाले की आंखें चौंधिया जाती थी। भैरोसिंह ने भी दूर से इस चमकते हुए नेजे को देखा जिसे देखकर दोनों साथी ऐयार भी डर कर खड़े हो गए। भैरोसिंह चाहते थे कि जब वह औरत वहां से चली जाय, तो कब्रिस्तान में जायं, मगर वे ऐसा न कर सके, क्योंकि नेजे की चमक में उन्होंने कमला की सूरत देखी जो इस समय जान से हाथ धोकर उस राक्षसी के सामने खड़ी थी।

हम ऊपर कई जगह इशारा कर आए हैं कि भैरोसिंह कमला को चाहते थे और वह भी इनसे मुहब्बत रखती थी। इस समय कमला को एक राक्षसी के सामने देख उसकी मदद न करना भैरोसिंह से कब हो सकता था वे लपककर कमला के पास पहुंचे। दो ऐयारों को साथ लिये भैरोसिंह को अपने पास मौजूद देखकर कमला का जी ठिकाने हुआ और उसने जल्दी से भैरोसिंह का हाथ पकड़के कहा – “खूब पहुंचे!”

भैरोसिंह – तुम यहां क्यों खड़ी हो और तुम्हारे सामने यह औरत कौन है?

कमला – मैं इसे नहीं पहचानती।

राक्षसी – मेरा हाल कमला से क्यों पूछते हो मुझसे पूछो। इस समय तुम्हें देखकर मैं बहुत खुश हुई, मैं भी इसी फिक्र में थी कि किसी तरह भैरोसिंह से मुलाकात हो।

भैरोसिंह – तुमने मुझे कैसे पहचाना क्योंकि आज तक मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा!

इतना सुनकर वह औरत बड़ी जोर से हंसी और उसने नेजे को हिलाया। हिलाने के साथ ही नेजे में चमक पैदा हुई और उसकी डरावनी हंसी से कब्रिस्तान गूंज उठा, इसके बाद उस औरत ने कहा –

राक्षसी – ऐसा कौन है जिसे मैं नहीं पहचानती होऊं खैर, इन बातों से कोई मतलब नहीं। यह कहो कि अपने मालिकों के छुड़ाने की तुम क्या फिक्र कर रहे हो दिग्विजयसिंह दो ही तीन दिन में तुम्हारे मालिक को मारकर निश्चिन्त होना चाहता है।

भैरोसिंह उस राक्षसी से बातें करने को तैयार थे, परन्तु यह नहीं जानते थे कि वह इनकी दोस्त है या दुश्मन, और उससे अपने भेदों को छिपाना चाहिए कि नहीं। यह सोच ही रहे थे कि इसकी बातों का क्या जवाब दिया जाय कि इतने में कई आदमियों के आने की आहट मालूम हुई। उस औरत ने घूमकर देखा तो चार आदमियों को इसी तरफ आते पाया। उन पर निगाह पड़ते ही वह क्रोध में आकर गरजी और नेजे को हिलाती हुई उसी तरफ लपकी। नेजे की चमक ने उन चारों की आंखें बन्द कर दीं। औरत ने बड़ी फर्ती से उन चारों को नेजे से घायल कर दिया। हिलाने के साथ-ही-साथ उस नेजे में गजब की चमक पैदा होती थी, मालूम होता था कि आंखों के आगे बिजली दौड़ गई। वे बेचारे देख भी न सके कि उनको मारने वाला कौन है या कहां पर है। मालूम होता है कि वह नेजा जहर में बुझाया हुआ था क्योंकि वे चारों जख्मी होकर तुरंत जमीन पर ऐसे गिरे कि फिर उठने की नौबत न आई।

इस तमाशे को देखकर भैरोसिंह डरे और सोचने लगे कि इस औरत के हाथ में तो बड़ा विचित्र नेजा है। इससे तो यह बात-की-बात में सैकड़ों आदमियों का नाश कर सकती है। कहीं ऐसा न हो कि हम लोगों को भी सतावे।

उन चारों को जख्मी करने के बाद वह औरत फिर भैरोसिंह की तरफ लौटी। अब उसने अपने नेजे को आड़ा किया अर्थात् उसे इस तरह थामा कि उसका एक सिरा बाईं तरफ और दूसरा दाहिनी तरफ रहे, तब तीनों ऐयारों और कमला को नेजे का धक्का देकर एक साथ पीछे की तरफ हटाना चाहा। यह नेजा एक साथ चारों के बदन में लगा। उसके छूते ही बदन में एक तरह की झनझनाहट पैदा हुई और सब आदमी बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़े।

जब उन चारों – अर्थात् भैरोसिंह, रामनारायण, चुन्नीलाल और कमला-की आंखें खुलीं, तो उन्होंने अपने को किले के अन्दर राजमहल के पिछवाड़े की तरफ एक दीवार की आड़ में पड़े पाया। उस समय सुबह की सफेदी आसमान पर धीरे-धीरे अपना दखल जमा रही थी।

बयान 8

बहुत दिनों से कामिनी का हाल कुछ भी मालूम न हुआ। आज उसकी सुध लेना भी मुनासिब है। आपको याद होगा कि जब कामिनी को साथ लेकर कमला अपने चाचा शेरसिंह से मिलने के लिए उजाड़ खंडहर और तहखाने में गई थी तो वहां से बिदा होते समय शेरसिंह ने कमला से कहा था कि “कामिनी को मैं ले जाता हूं। अपने एक दोस्त के यहां रख दूंगा, जब सब तरह का फसाद मिट जायगा तब यह भी अपनी मुराद को पहुंच जायगी।” अब हम उसी जगह से कामिनी का हाल लिखना शुरू करते हैं।

गयाजी से थोड़ी दूर पर लालगंज नाम से मशहूर एक गांव फलगू नदी के किनारे पर ही है। उसी जगह के एक नामी जमींदार के यहां, जो शेरसिंह का दोस्त था, कामिनी रखी गई थी। वह जमींदार बहुत ही नेक और रहमदिल था तथा उसने कामिनी को बड़ी हिफाजत से अपनी लड़की के समान खातिर करके रखा, मगर उस जमींदार का एक नौजवान और खूबसूरत लड़का भी था जो कामिनी पर आशिक हो गया। उसके हाव-भाव और कटाक्ष को देखकर कामिनी को उसकी नीयत का हाल मालूम हो गया। वह कुंअर आनन्दसिंह के प्रेम में अच्छी तरह रंगी हुई थी इसलिए उसे इस लड़के की चाल-ढाल बहुत ही बुरी मालूम हुई। ऐसी अवस्था में उसने अपने दिल का हाल किसी से कहना मुनासिब न समझा बल्कि इरादा कर लिया कि जहां तक हो सके, जल्द इस मकान को छोड़ ही देना मुनासिब है और अन्त में लाचार होकर उसने ऐसा ही किया।

एक दिन मौका पाकर आधी रात के समय कामिनी उस घर से बाहर निकली और सीधे रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुई। इस समय वह तरह-तरह की बातें सोच रही थी। एक दफे उसके दिल में आया कि बिना कुछ सोचे-विचारे वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में चले चलना ठीक होगा, मगर साथ ही यह भी सोचा कि यदि कोई सुनेगा तो मुझे अवश्य ही निर्लज्ज कहेगा और आनन्दसिंह की आंखों में मेरी कुछ इज्जत न रहेगी।

इसके बाद उसने सोचा कि जिस तरह हो, कमला से मुलाकात करनी चाहिए। मगर कमला से मुलाकात क्योंकर हो सकती है न मालूम अपने काम की धुन में वह कहां-कहां घूम रही होगी हां, अब याद आया, जब मैं कमला के साथ शेरसिंह से मिलने के लिए उस तहखाने में गई थी, तो शेरसिंह ने उससे कहा था कि मुझसे मिलने की जब जरूरत हो तो इसी तहखाने में आना। अब मुझे भी उसी तहखाने में चलना चाहिए, वहां कमला या शेरसिंह से जरूर मुलाकात होगी और वहां दुश्मनों के हाथ से भी निश्चिन्त रहूंगी। जब तक कमला से मुलाकात न हो वहां टिके रहने में भी कोई हर्ज नहीं है, वहां खाने के लिए जंगली फल और पीने के लिए पानी की भी कोई कमी नहीं।

इन सब बातों को सोचती हुई बेचारी कामिनी उसी तहखाने की तरफ रवाना हुई और अपने को छिपाती हुई, जंगल-ही-जंगल चलकर, तीसरे दिन पहर रात जाते-जाते वहां पहुंची। रास्ते में जंगली फल और चश्मे के पानी के सिवाय और कुछ उसे न मिला और न उसे किसी चीज की इच्छा ही थी।

वह खंहडर कैसा था और उसके अन्दर तहखाने में जाने के लिए छिपा हुआ रास्ता किस ढंग का बना हुआ था, यह पहले लिखा जा चुका है, पुनः यहां लिखने की कोई आवश्यकता नहीं। कमला या शेरसिंह से मिलने की उम्मीद में उसी खंडहर और तहखाने को कामिनी ने अपना घर बनाया और तपस्विनियों की तरह कुंअर आनन्दसिंह के नाम की माला जपती हुई दिन बिताने लगी। बहुत-सी जरूरी चीजों के अतिरिक्त ऐयारी के सामान से भरा हुआ एक बांस का पिटारा शेरसिंह का रखा हुआ उस तहखाने में मौजूद था जो कामिनी के हाथ लगा। यद्यपि कामिनी कुछ ऐयारी भी जानती थी परन्तु इस समय उसे ऐयारी के सामान की विशेष जरूरत न थी, हां, शेरसिंह की जायदाद में से एक कुप्पी तेल कामिनी ने बेशक खर्च किया, क्योंकि चिराग जलाने की नित्य ही आवश्यकता पड़ती थी।

कमला और शेरसिंह से मिलने की उम्मीद में कामिनी ने उस तहखाने में रहना स्वीकार किया, परन्तु कई दिन बीत जाने पर भी किसी से मुलाकात न हुई। एक दिन सूरत बदलकर कामिनी तहखाने से निकली और खंडहर के बाहर हो सोचने लगी कि किधर जाय और क्या करे। एकाएक कई आदमियों की बातचीत की आवाज उसके कानों में पड़ी और मालूम हुआ कि वे लोग आपस में बातचीत करते हुए इसी खंडहर की तरफ आ रहे हैं। थोड़ी ही देर में चार आदमी भी दिखाई पड़े। उस समय कामिनी अपने को बचाने के लिए खंडहर के अन्दर घुस गई और राह देखने लगी कि वे लोग आगे बढ़ जायं तो फिर निकलूं, मगर ऐसा न हुआ, क्योंकि बात-की-बात में वे चारों आदमी एक लाश उठाए हुए इसी खंडहर के अन्दर आ पहुंचे।

इस खंडहर में अभी तक कई कोठरियां मौजूद थीं। यद्यपि उनकी अवस्था बहुत ही खराब थी, किवाड़ के पल्ले तक उनमें न थे, जगह-जगह पर कंकड़-पत्थर-कतवार के ढेर लगे हुए थे, परन्तु मसाले की मजबूती पर ध्यान दे आंधी-पानी अथवा तूफान में भी बहुत आदमी उन कोठरियों में रहकर अपनी जान की हिफाजत कर सकते थे। खंडहर के चारों तरफ की दीवार यद्यपि कहीं-कहीं से टूटी थी, तथापि बहुत ही मजबूत और चौड़ी थी। कामिनी एक कोठरी में घुस गई और छिपकर देखने लगी कि वे चारों आदमी उस खंडहर में आकर क्या करते और उस लाश को कहां रखते हैं।

लाश उठाये हुए चारों आदमी इस खंडहर में जाकर इस तरह घूमने लगे, जैसे हर एक कोठरी, दालान बल्कि यहां की बित्ता-बित्ता भर जमीन उन लोगों की देखी हुई हो। चूने पत्थर के ढेरों में घूमते और रास्ता निकालते हुए वे लोग एक कोठरी के अन्दर घुस गए जो उस खंडहर भर में सब कोठरियों से छोटी थी और दो घण्टे तक बाहर न निकले। इसके बाद वे लोग बाहर आये तो खाली हाथ थे अर्थात् लाश न थी, शायद उस कोठरी में गाड़ या रख आये हों।

जब वे आदमी खंडहर से बाहर हो मैदान की तरफ चले गये, बल्कि बहुत दूर निकल गये तब कामिनी भी कोठरी से बाहर निकली और चारों तरफ देखने लगी। उसे आज तक यही विश्वास था कि इस खंडहर का हाल शेरसिंह, कमला, मेरे और उस लम्बे आदमी के सिवाय, जो शेरसिंह से मिलने के लिए यहां आया था, किसी पांचवें को मालूम नहीं है। मगर आज की कैफियत देखकर उसका खयाल बदल गया और वह तरह-तरह के सोच-विचार में पड़ गई। थोड़ी देर बाद वह उसी कोठरी की तरफ बढ़ी जिसमें वे लोग लाश छोड़ गये थे मगर उस कोठरी में ऐसा अंधकार था कि अन्दर जाने का साहस न पड़ा। आखिर अपने तहखाने में गई और शेरसिंह के पिटारे में से एक मोमबत्ती निकालकर और बालकर बाहर निकली। पहले उसने रोशनी के आगे हाथ की आड़ देकर चारों तरफ देखा और फिर उस कोठरी की तरफ रवाना हुई। जब कोठरी के दरवाजे पर पहुंची तो उसकी निगाह एक आदमी पर पड़ी जिसे देखते ही चौंकी और डरकर दो कदम पीछे हट गई, मगर उसकी होशियार आंखों ने तुरन्त पहचान लिया कि वह आदमी असल में मुर्दे से भी बढ़कर है अर्थात् पत्थर की एक खड़ी मूरत है जो सामने की दीवार के साथ चिपकी हुई है। आज के पहले इस कोठरी के अन्दर कामिनी नहीं आई थी, इसलिए वह हर एक तरफ अच्छी तरह गौर से देखने लगी परन्तु उसे इस बात का खटका बराबर लगा रहा कि कहीं वे चारों आदमी फिर न आ जायं।

कामिनी को उम्मीद थी कि इस कोठरी के अन्दर वह लाश दिखाई देगी जिसे चारों आदमी उठाकर लाये थे, मगर कोई लाश दिखाई न पड़ी। आखिर उसने खयाल किया कि शायद वे लोग लाश की जगह मूरत को लाये हों जो सामने दीवार के साथ खड़ी है। कामिनी उस कोठरी के अन्दर घुसकर मूरत के पास जा खड़ी हुई और उसे अच्छी तरह देखने लगी। उसे बड़ा ताज्जुब हुआ जब उसने अच्छी तरह जांच करने पर निश्चय कर लिया कि वह मूरत दीवार के साथ है, अर्थात् इस तरह से जड़ी हुई है कि बिना टुकड़े-टुकड़े हुए किसी तरह दीवार से अलग नहीं हो सकती। कामिनी की चिन्ता और बढ़ गई। अब उसे इसमें किसी तरह का शक न रहा कि वे चारों आदमी जरूर किसी की लाश को उठा लाये थे, इस मूरत को नहीं, मगर वह लाश गई कहां क्या जमीन खा गई या किसी चूने के ढेर के नीचे दबा दी गई! नहीं, मिट्टी या चूने के नीचे वह लाश दाबी नहीं गई, अगर ऐसा होता तो जरूर देखने में आता। उन लोगों ने जो कुछ किया, इसी कोठरी के अन्दर किया।

कामिनी उस मूरत के पास खड़ी देर तक सोचती रही, आखिर वहां से लौटी और धीरे-धीरे अपने तहखाने में आकर बैठ गई, वहां एक ताक (आले) पर चिराग जल रहा था इसलिए मोमबत्ती बुझाकर बिछौने पर जा लेटी और फिर सोचने लगी।

इसमें कोई शक नहीं कि वे लोग कोई लाश उठाकर लाए थे, मगर वह लाश कहां गई। खैर, इससे कोई मतलब नहीं, मगर अब यहां रहना भी कठिन हो गया, क्योंकि यहां कई आदमियों की आमद-रफ्त शुरू हो गई। शायद कोई मुझे देख ले, तो मुश्किल होगी। अब होशियार हो जाना चाहिए क्योंकि मुझे बहुत-कुछ काम करना है। कमला या शेरसिंह भी अभी तक न आए, अब उनसे भी मुलाकात होने की कोई उम्मीद न रही। अच्छा, दो-तीन दिन और यहां रहकर देखा चाहिए कि वे लोग फिर आते हैं या नहीं।

कामिनी इन सब बातों को सोच ही रही थी कि एक आवाज उसके कान में आई। उसे मालूम हुआ कि किसी औरत ने दर्दनाक आवाज में यह कहा, “क्या दुःख ही भोगने के लिए मेरा जन्म हुआ था!” यह आवाज ऐसी दर्दनाक थी कि कामिनी का कलेजा कांप गया। इस छोटी ही उम्र में वह भी बहुत तरह के दुःख भोग चुकी थी और उसका कलेजा जख्मी हो चुका था, इसलिए बर्दाश्त न कर सकी, आंखें भर आईं और आंसू की बूंदें टपाटप गिरने लगीं। फिर आवाज आई, “हाय, मौत को भी मौत आ गई!” अबकी दफे कामिनी बेतरह चौंकी और यकायक बोल उठी, “इस आवाज को तो मैं पहचानती हूं, जरूर उसी की आवाज है!”

कामिनी उठ खड़ी हुई और सोचने लगी कि यह आवाज किधर से आई बन्द कोठरी में आवाज आना असम्भव है, किसी खिड़की, सूराख या दीवार में दरार हुए बिना आवाज किसी तरह नहीं आ सकती। वह कोठरी में हर तरफ घूमने और देखने लगी। यकायक उसकी निगाह एक तरफ की दीवार के ऊपरी हिस्से पर जा पड़ी और वहां एक सूराख, जिसमें आदमी का हाथ बखूबी जा सकता था, दिखाई पड़ा। कामिनी ने सोचा कि बेशक इसी सूराख में से आवाज आई है। वह सूराख की तरफ गौर से देखने लगी, फिर आवाज आई – “हाय, न मालूम मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है!”

अब कामिनी को विश्वास हो गया कि यह आवाज उसी सूराख में से आई है। वह बहुत ही बेचैन हुई और धीरे-धीरे कहने लगी, “बेशक यह उसी की आवाज है। हाय मेरी प्यारी बहिन किशोरी, मैं तुझे क्योंकर देखूं और किस तरह मदद करूं इस कोठरी के बगल में जरूर कोई दूसरी कोठरी है जिसमें तू कैद है, मगर न मालूम उसका रास्ता किधर से है मैं कैसे तुझ तक पहुंचूं और इस आफत से तुझे छुड़ाऊं इस कोठरी की कमबख़्त संगीन दीवारें भी ऐसी मजबूत हैं कि मेरे उद्योग से सेंध भी नहीं लग सकती। हाय, अब मैं क्या करूं भला पुकार के देखूं तो सही कि आवाज भी उसके कानों तक पहुंचती है या नहीं’।

कामिनी ने मोखे (सूराख) की तरफ मुंह करके कहा, “क्या मेरी प्यारी बहिन किशोरी की आवाज आ रही है’?

जवाब – हां, क्या तू कामिनी है बहिन कामिनी, क्या तू भी मेरी ही तरह इस मकान में कैद है?

कामिनी – नहीं बहिन, मैं कैद नहीं हूं, मगर…

कामिनी और कुछ कहा ही चाहती थी कि धमधमाहट की आवाज सुनकर रुक गई और डरकर सीढ़ी की तरफ देखने लगी। उसे मालूम हुआ कि कोई यहां आ रहा है।

बयान 9

गिल्लन को साथ लिये हुए बीबी गौहर रोहतासगढ़ किले के अन्दर जा पहुंची। किले के अन्दर जाने में किसी तरह का जाल न फैलाना पड़ा और न किसी तरह की कठिनाई हुई। वह बेधड़के किले के उस फाटक पर चली आई जो शिवालय के पीछे की तरफ था और छोटी खिड़की के पास खड़ी होकर खिड़की (छोटा दरवाजा) खोलने के लिए दरबान को पुकारा, जब दरबान ने पूछा, “तू कौन है’ तो उसने जवाब दिया कि “मैं शेरअली खां की लड़की गौहर हूं।”

उन दिनों शेरअली खां पटने का नामी सूबेदार था। वह शख्स बड़ा ही दिलेर, जवांमर्द और बुद्धिमान था, साथ ही इसके कुछ-कुछ दगाबाज भी था, मगर इसे वह राजनीति का एक अंग मानता था। उसके इलाके भर में जो कुछ उसका रुआब था उसे कहां तक कहा जाये, दूर-दूर तक के आदमी उसका नाम सुनकर कांप जाते थे। उसके पास फौज तो केवल पांच ही हजार थी मगर वह उससे पच्चीस हजार फौज का काम लेता था क्योंकि उसने अपने ढंग के आदमी चुन-चुनकर अपनी फौज में भरती किए थे। गौहर इसी शेरअली खां की लड़की थी और वह गौहर की मौसेरी बहिन थी जो चुनारगढ़ के पास वाले जंगल में माधवी के हाथ से मारी गई थी।

शेरअली खां जोरू को बहुत चाहता था और उसी तरह अपनी लड़की गौहर को भी हद्द से ज्यादा प्यार करता था। गौहर को दस वर्ष की छोड़कर उसकी मां मर गई थी। मां के गम में गौहर दीवानी-सी हो गई। लाचार दिल बहलाने के लिए शेरअली खां ने गौहर को आजाद कर दिया और वह थोड़े से आदमियों को साथ लेकर दूर-दूर तक सैर करती फिरती थी। पांच वर्ष तक वह इसी अवस्था में रही, इसी बीच में आजादी मिलने के कारण उसकी चाल-चलन में भी फर्क पड़ गया था। इस समय गौहर की उम्र पन्द्रह वर्ष की है। शेरअली खां दिग्विजयसिंह का दिली दोस्त था और दिग्विजयसिंह भी उसका बहुत भरोसा रखता था।

गौहर का नाम सुनते ही दरबान चौंका और उसने उस अफसर को इत्तिला दी जो कई सिपाहियों को साथ लेकर फाटक की हिफाजत पर मुस्तैद था। अफसर तुरन्त फाटक पर आया और उसने पुकारकर पूछा, “आप कौन हैं’

गौहर – मैं शेरअली खां की लड़की गौहर हूं।

अफसर – इस समय आपको संकेत बताना चाहिए।

गौहर – हां बताती हूं – “जोगिया।”

‘जोगिया’ सुनते ही अफसर ने दरवाजा खोलने का हुक्म दे दिया और गिल्लन को साथ लिये हुए गौहर किले के अन्दर पहुंच गई। मगर गौहर बिल्कुल नहीं जानती थी कि थोड़ी ही दूर पर एक लम्बे कद का आदमी दीवार के साथ चिपका खड़ा है और उसकी बातें, जो दरबान के साथ हो रही थीं, सुन रहा है।

जब गौहर किले के अन्दर चली गई, उसके आधे घण्टे बाद एक लम्बे कद का आदमी, जिसे अब भूतनाथ कहना उचित है, उसी फाटक पर पहुंचा और दरवाजा खोलने के लिए उसने दरबान को पुकारा।

दरबान – तुम कौन हो?

भूत – मैं शेरअली खां का जासूस हूं।

दरबान – संकेत बताओ।

भूत – “जोगिया।”

दरवाजा तुरन्त खोल दिया गया और भूतनाथ भी किले के अन्दर जा पहुंचा। गौहर वही परिचय देती हुई राजमहल तक चली गई। जब उसके आने की खबर राजा दिग्विजयसिंह को दी गई, उस समय रात बहुत कम बाकी थी और दिग्विजयसिंह मसहरी पर बैठा हुआ राजकीय मामलों की तरह-तरह की बातें सोच रहा था। गौहर के आने की खबर सुनते ही दिग्विजयसिंह ताज्जुब में आकर उठ खड़ा हुआ, उसे अन्दर आने की आज्ञा दी, बल्कि खुद भी दरवाजे तक इस्तकबाल के लिए आया और बड़ी खातिरदारी से उसे अपने कमरे में ले गया। आज पांच वर्ष बाद दिग्विजयसिंह ने गौहर को देखा, इस समय इसकी खूबसूरती और उठती हुई जवानी गजब करती थी। उसे देखते ही दिग्विजयसिंह की तबीयत डोल गई, मगर शेरअली खां के डर से रंग न बदल सका।

दिग्विजयसिंह – इस समय आपका आना क्योंकर हुआ और यह दूसरी औरत आपके साथ कौन है?

गौहर – यह मेरी ऐयारा है। कई दिन हुए, केवल अपसे मिलने के लिए सौ सिपाहियों को साथ लेकर मैं यहां आ रही थी। इत्तिफाक से वीरेन्द्रसिंह के जालिम आदमियों ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। मेरे साथियों में से कई मारे गए और कई कैद हो गये। मैं भी चार दिन तक कैद रही। आखिर इस चालाक ऐयारा ने, जो कैद होने से बच गई थी, मुझे छुड़ाया। इस समय सिवाय इसके कि मैं इस किले में आ घुसूं और कोई तदबीर जान बचाने की न सूझी। सुना है कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह आजकल आपके यहां कैद हैं?

दिग्विजयसिंह – हां, वे लोग आज-कल यहां कैद हैं। मैंने यह खबर आपके पिता को भी लिखी है।

गौहर – हां, मुझे मालूम है। वे भी आपकी मदद को आने वाले हैं। उनका इरादा है कि वीरेन्द्रसिंह के लश्कर पर, जो इस पहाड़ी के नीचे है, छापा मारें।

दिग्विजयसिंह – हां, मुझे तो एक उन्हीं का भरोसा है।

यद्यपि शेरअली खां के डर से दिग्विजयसिंह गौहर के साथ अदब का बर्ताव करता रहा, मगर कमबख़्त गौहर को यह मंजूर न था। उसने यहां तक हाव-भाव और चुलबुलापन दिखाया कि दिग्विजयसिंह की नीयत आखिर बदल गई और वह एकान्त खोजने लगा।

गौहर तीन दिन से ज्यादा अपने को न बचा सकी। इस बीच में उसने अपना मुंह काला करके दिग्विजयसिंह को काबू में कर लिया और दिग्विजयसिंह से इस बात की प्रतिज्ञा करा ली कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह जितने आदमी यहां कैद हैं, सभी का सिर काटकर किले के कंगूरों पर लटका दिया जाएगा और इसका बन्दोबस्त भी होने लगा। मगर इसी बीच में भैरोसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल ने, जो किले के अन्दर पहुंच गए थे, वह धूम मचाई कि लोगों की नाक में दम कर दिया और मजा तो यह कि किसी को कुछ पता न लगता था कि यह कार्रवाई कौन कर रहा है।

बयान 10

वीरेन्द्रसिंह के तीनों ऐयारों ने रोहतासगढ़ के किले के अन्दर पहुंचकर अंधेर मचाना शुरू किया। उन लोगों ने निश्चय कर लिया कि अगर दिग्विजयसिंह हमारे मालिकों को नहीं छोड़ेगा तो ऐयारी के कायदे के बाहर काम करेंगे और रोहतासगढ़ का सत्यानाश करके छोड़ेंगे।

जिस दिन दिग्विजयसिंह की मुलाकात गौहर से हुई थी, उसके दूसरे ही दिन दरबार के समय दिग्विजयसिंह को खबर पहुंची कि शहर में कई जगह हाथ के लिखे हुए कागज दीवारों पर चिपके हुए दिखाई देते हैं जिनमें लिखा है – “वीरेन्द्रसिंह के ऐयार लोग इस किले में आ पहुंचे। यदि दिग्विजयसिंह अपनी भलाई चाहें तो चौबीस घण्टे के अन्दर राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को छोड़ दें, नहीं तो देखते-देखते रोहतासगढ़ का सत्यानाश हो जायगा और यहां का एक आदमी जीता न बचेगा।”

राजा वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का हाल दिग्विजयसिंह अच्छी तरह जानता था। उसे विश्वास था कि उन लोगों का मुकाबला करने वाला दुनिया भर में कोई नहीं है। विज्ञापन का हाल सुनते ही वह कांप उठा और सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। इन विज्ञापन की बात शहर भर में तुरत फैल गई। मारे डर के वहां की रिआया का दम निकला जाता था। सब कोई अपने राजा दिग्विजयसिंह की शिकायत करते थे और कहते थे कि कमबख़्त ने बेफायदा राजा वीरेन्द्रसिंह से वैर बांधकर हम लोगों की जान ली।

तीनों ऐयारों ने तीन काम बांट लिए। रामनारायण ने इस बात का जिम्मा लिया कि किसी लोहार के यहां चोरी करके बहुत-सी कीलें इकट्ठी करेंगे और रोहतासगढ़ में जितनी तोपें हैं सभी में कीलें ठोंक देंगे2, चुन्नीलाल ने वादा किया कि तीन दिन के अन्दर रामानन्द ऐयार का सिर काट शहर के चौमुहाने पर रखेंगे, और भैरोसिंह ने तो रोहतासगढ़ ही को चौपट करने का प्रण किया था।

हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय कुन्दन (धनपत) ने तहखाने में से किशोरी को निकाल ले जाने का इरादा किया था तो बारह नम्बर की कोठरी में पहुंचने के पहले तहखाने के दरवाजे में ताला लगा दिया था। मगर रोहतासगढ़ दखल होने के बाद तहखाने वाली किताब की मदद से, जो दारोगा के पास रहा करती थी, वे दरवाजे पुनः खोल दिए गए थे और इसलिए दीवानखाने की राह से तहखाने में फिर आमद-रफ्त शुरू हो गई थी।

एक दिन आधी रात के बाद राजा दिग्विजयसिंह के पलंग पर बैठी हुई गौहर ने इच्छा प्रकट की कि मैं तहखाने में चलकर राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को देखना चाहती हूं। राजा दिग्विजयसिंह उसकी मुहब्बत में चूर हो रहे थे, दीन-दुनिया की खबर भूले हुए थे, तहखाने के कायदे पर ध्यान न देकर गौहर को तहखाने में ले चले।

अभी पहला दरवाजा भी न खोला था कि यकायक एक भयानक आवाज आई। मालूम हुआ कि मानो हजारों तोपें एक साथ छूटी हैं। तमाम किला हिल उठा। गौहर बहदवास होकर जमीन पर गिर पड़ी, दिग्विजयसिंह भी खड़ा न रह सका।

जब दिग्विजयसिंह को होश आया, छत पर चढ़ गया और शहर की तरफ देखने लगा। शहर में बेहिसाब आग लगी हुई थी, सैकड़ों घर जल रहे थे, अग्निदेव ने अपना पूरा दखल जमा लिया था, आग के बड़े-बड़े शोले आसमान की तरफ उठ रहे थे। यह हाल देखते ही दिग्विजयसिंह ने सिर पीटा और कहा, “यह सब फसाद वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का है! बेशक उन लोगों ने मैगजीन में आग लगा दी और वह भयंकर आवाज मैगजीन के उड़ने की ही थी। हाय, आज सैकड़ों घर तबाह हो गये होंगे! इस समय वह कम्बख्त साधु अगर मेरे सामने होता तो मैं उसकी दाढ़ी नोंच लेता, जिसके बहकाने से वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद किया!”

दिग्विजयसिंह घबड़ाकर राजमहल के बाहर निकला और तब उसे निश्चय हो गया कि जो कुछ उसने सोचा था, ठीक निकला। नौकरों ने खबर दी कि न मालूम किसने मैगजीन में आग लगा दी, जिसके सबब से सैकड़ों घर तबाह हो गए। उसी समय शहर में ऐसी आग लग गई जो अभी तक बुझाए नहीं बुझती। खबर के सुनते ही दिग्विजयसिंह अपने कमरे में लौट गया और बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

बेशक यह सब काम वीरेन्द्रसिंह के ऐयारों का ही था। इस आग-लगी में रामनारायण को भी तोपों में कीलें ठोंकने का खूब मौका हाथ लगा। रामानन्द दीवान घबराकर घर से बाहर निकला और तहकीकात करने के लिए अकेला ही शहर की तरफ चला। रास्ते में चुन्नीलाल ने हाथ पकड़ लिया और उसने चुन्नीलाल पर तलवार चलाई। चुन्नीलाल उछलकर दूर जा खड़ा हुआ

और उस वार को बचा गया, मगर चुन्नीलाल के वार ने रामानन्द का काम तमाम कर दिया। उसकी भुजाली रामानन्द की गर्दन पर ऐसी बैठी कि सिर कटकर दूर जा गिरा।

अब हमको यह भी लिखना चाहिए कि भैरोसिंह ने किस तरह मैगजीन में आग लगाई। भैरोसिंह ने एक मोमबत्ती ऐसी तैयार की जो केवल दो घण्टे तक जल सकती थी अर्थात् उसमें दो घण्टे से ज्यादे देर तक जलने लायक मोम न था, और उस मोमबत्ती के बीचों-बीच में आतिशबाजी का एक अनार बनाया जिससे आधी मोमबत्ती जब जल जाय तो आप से आप अनार में आग लगे। जब इस तरह की मोमबत्ती तैयार हो गई तो उसने अपने दोनों साथियों से कहा कि “मैं मैगजीन में आग लगाने जाता हूं, अपनी फिक्र आप कर लूंगा। तुम लोग किसी ऐसी जगह जाकर छिपो जहां मैदान या किले की मजबूत दीवार हो, मगर इसके पहले शहर में आग लगा दो।” इसके बाद भैरोसिंह मैगजीन के पास पहुंचे और इस फिक्र में लगे कि मौका मिले तो कमन्द लगाकर उसके अन्दर जायं।

यह इमारत बहुत बड़ी तो न थी, मगर मजबूत थी। दीवार बहुत चौड़ी और ऊंची थीं। फाटक बहुत बड़ा और लोहे का था। पहरे पर पचास आदमी नंगी तलवारें लिये हर वक्त मुस्तैद रहते थे। इस मैगजीन के चारों तरफ से कोई आदमी आग लेकर नहीं जाने पाता था।

चन्द्रमा अस्त हो गया और पिछली रात की अंधेरी चारों तरफ फैल गई। निद्रादेवी की हुकूमत में सभी पड़े हुए थे, यहां तक कि पहरे वालों की आंखें भी झिपी पड़ती थीं। उसी समय मौका पाकर भैरोसिंह ने मैगजीन के पिछली तरफ कमन्द लगाई। दीवार के ऊपर चढ़ जाने के बाद कमन्द खींच ली और फिर उसी के सहारे उतर गए। मैगजीन के अन्दर हजारों थैले बारूद के गंजे हुए पड़े थे, तोप के गोलों का ढेर लगा हुआ था, बहुत-सी तोपें भी पड़ी हुई थीं। भैरोसिंह ने यह मोमबत्ती जलाई और बारूद के थैलों के पास जमीन पर लगाकर खड़ी कर दी, इसके बाद फुर्ती से मैगजीन के बाहर हो गए और जहां तक दूर निकल जाते बना, निकल गए। उसी के घण्टे भर बाद (जब मोमबत्ती का अनार छूटा होगा) बारूद में आग लगी और मैगजीन की इमारत जड़बुनियाद से नष्ट हो गई। हजारों आदमी मरे और सैकड़ों मकान गिर पड़े, बल्कि यों कहना चाहिए कि उसकी आवाज से रोहतासगढ़ का किला दहल उठा, जरूर कई कोस तक इसकी भयानक आवाज गई होगी। पहाड़ी के नीचे वीरेन्द्रसिंह के लश्कर में जब यह आवाज पहुंची तो दोनों सेनापति समझ गए कि मैगजीन में आग लगी, क्योंकि ऐसी भयानक आवाज सिवाय मैगजीन उड़ने के और किसी तरह से नहीं हो सकती। बेशक यह काम भैरोसिंह का है।

मैगजीन उड़ने का विश्वास होते ही दोनों सेनापति बहुत प्रसन्न हुए और समझ गए कि अब रोहतासगढ़ का किला फतह कर लिया, क्योंकि जब बारूद का खजाना ही उड़ गया तो किले वाले तोपों के जरिये से हमें कैसे रोक सकते हैं। दोनों सेनापतियों ने यह सोचकर, कि अब विलम्ब करना मुनासिब नहीं है, किले पर चढ़ाई कर दी और दो हजार आदमियों को साथ ले नाहरसिंह पहाड़ पर चढ़ने लगा। यद्यपि दोनों सेनापति इस बात को समझते थे कि मैगजीन उड़ गई है, तो भी कुछ बारूद तोपखाने में जरूर होगी, मगर यह खयाल उनके बढ़े हुए हौसले को किसी तरह रोक न सका।

इधर दिग्विजयसिंह अपनी जिन्दगी से बिल्कुल नाउम्मीद हो बैठा। जब उसे यह खबर पहुंची कि रामानन्द दीवान (या ऐयार) भी मारा गया और बहुत-सी तोपें भी कील ठुक जाने के कारण बर्बाद हो गईं, तब वह और बेचैन हो गया और मालूम होने लगा कि मौत नंगी तलवार लिए सामने खड़ी है। वह पहर दिन चढ़े तक पागलों की तरह चारों तरफ दौड़ता रहा और तब एकान्त में बैठकर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए। जब उसे जान बचाने की कोई तरकीब न सूझी और यह निश्चय हो गया कि अब रोहतासगढ़ का किला किसी तरह नहीं रह सकता और दुश्मन लोग भी मुझे किसी तरह जीता नहीं छोड़ सकते, तब वह हाथ में नंगी तलवार लेकर उठा और तहखाने की ताली निकालकर यह कहता हुआ तहखाने की तरफ चला कि “जब मेरी जान बच ही नहीं सकती तो वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों वगैरह को क्यों जीता छोडूं आज मैं अपने हाथ से उन लोगों के सिर काटूंगा!”

दिग्विजयसिंह हाथ में नंगी तलवार लिए हुए अकेला ही तहखाने में गया, मगर जब उस दालान में पहुंचा जिसमें हथकड़ियों और बेड़ियों से कसे हुए वीरेन्द्रसिंह वगैरह रखे गए थे, तो उसको खाली पाया। वह ताज्जुब में आकर चारों तरफ देखने और सोचने लगा कि कैदी लोग कहां गायब हो गए। मालूम होता है कि यहां भी ऐयार लोग आ पहुंचे, मगर देखना चाहिए कि किस राह से पहुंचे।

दिग्विजयसिंह उस सुरंग में गया जो कब्रिस्तान की तरफ निकल गई थी। वहां का दरवाजा उसी तरह बन्द पाया जैसा कि उसने अपने हाथ से बन्द किया था। आखिर लाचार सिर पीटता हुआ लौट आया और दीवानखाने में बदहवास होकर गद्दी पर गिर पड़ा।

  1. देखिए चन्द्रकांता संतति, पहला भाग, चौथा बयान।
  2. तोप में रंजक देने की जो प्याली होती है, उसके छेद में कील ठोंक देने से तोप बेकाम हो जाती है।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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