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पायल की नींद अचानक टूट गई। घड़ी देखी तो सुबह के सात बजे थे। तभी, नौकर चाय लेकर आया और सामने टेबल पर रखकर चला गया। पायल का मन अभी और सोने का कर रहा था, तभी उसकी नजर चाय के पास रखे अखबार पर गई। मुखपृष्ठ पर ही छपा था ‘कुमार हिमांशु देववर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार’।

      पायल को एक झटका सा लगा। उसे कुछ संदेह हुआ और वह अखबार उठाकर पढ़ने लगी, लेकिन जैसे-जैसे वह अखबार पढ़ती गयी, उसकी आँखें आश्चर्य से फटती गयीं। जिस लेखक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल रहा था, उसे कभी उसने यह कहकर ठुकरा दिया था कि वह गरीब है, इस कारण वह उससे शादी नहीं कर सकती है।  अखबार हाथों में लिए हुए पायल अतीत की यादों में डूब गई।

       तब पायल कॉलेज में पढ़ती थी। अमीर बाप की लड़की होने के कारण वह बहुत ही घमंडी थी। उसके घर के पास हिमांशु रहता था। वह एक कपड़े की दुकान में काम कर अपना और अपने अपनी माता-पिता की जीविका चलाता था।  हालांकि वह गरीब था, फिर भी आत्मनिर्भर और मेहनती और नेक दिल का था। वह उम्र में पायल से बड़ा था और पायल को दिल से चाहता था, लेकिन पायल इससे बेखबर रहती थी। एक दिन मौका देखकर हिमांशु उसके पास गया। सुबह का समय था। ठंढी हवा चल रही थी। पायल अपने लॉन में एक आरामदेह कुर्सी पर बैठी हुई थी। जैसे ही हिमांशु उसके पास गया, उसे देखते ही पायल बोली “अरे आप,इधर क्या कर रहे है?”

       पायल की बात सुनकर हिमांशु बोला “पायल, मुझे तुमसे कुछ कहना है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि  कैसे शुरुआत करूँ?”

       हिमांशु की बात सुनकर पायल बड़े ही सहज भाव से बोली, “अरे, इसमें घबराने की क्या बात है? आप निःसंकोच बोलें”। हिमांशु को लगा, अब शायद उसे भी अपने मन की बात कह देनी चाहिए। वह बोला, “पायल, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुम्हारे साथ ही घर बसाना चाहता हूँ।  क्या तुम्हें यह रिश्ता मंजूर है?”

       जैसे ही पायल ने हिमांशु की यह बात सुनी, उसका चेहरा आग बबूला हो गया। वह कुर्सी छोड़कर खड़ी हो गई और क्रोधित होकर बोली, “तुम अपने आप को समझते क्या हो? मुझसे शादी करने का सपना देख रहे हो? औकात देखी है? अपनी भागो यहाँ से।” पायल काफी तेज चिल्ला रही थी।

       तभी पायल का ध्यान टूटा। वह अतीत से वर्तमान में वापस आ गयी। उसकी माँ ना जाने कब से उसे पुकार रही थी और अब उसके सामने कमरे में खड़ी थी।

      “कहाँ खो गई थी तुम पायल? कब से तुमको आवाज दे रही थी।” पायल की माँ उसके पास बिछावन पर बैठती हुई बोली।

      “कहीं नहीं माँ, आज वर्षों बाद हिमांशु के बारे में अखबार में पढ़ा तो अचानक बीते कल में चली गई थी।” पायल अखबार अपनी माँ को देते हुए बोली।

      “हाँ पायल, अब हिमांशु की तकदीर बदल गई है। वह दौलत, नाम और सम्मान सब कुछ पा रहा है…” वह अभी और कुछ कहती, इससे पहले पायल बिछावन से उतरते हुए बोली “माँ, मैं हिमांशु से मिलने जा रही हूँ। अखबार में उनका पता दिया है।” इतना कहकर पायल जल्दी से कमरे से बाहर निकल गई। पता नहीं, आज उसके दिल में वर्षों बाद हिमांशु के प्रति इतना सम्मान और प्रेम कहाँ से आ गया था? वह तैयार होकर अपनी कार में बैठ गई तथा फूलों की दुकान से बड़ा सा गुलदस्ता खरीदने चल पड़ी। समय और तकदीर बदलते देर नहीं लगती है। आज पायल खुद हिमांशु देव वर्मा से विवाह करना चाहती थी और उसे उम्मीद थी कि हिमांशु सब कुछ भूल कर उसे माफ करके उससे विवाह कर लेगा। लेकिन, शायद पायल की तकदीर में कुछ और ही लिखा था।

        जैसे ही पायल गुलदस्ता खरीदकर अपनी कार की ओर मुड़ी, उसकी नजर सामने आते हुए हिमांशु पर गई।  कितना बदल गया था हिमांशु! काफी खूबसूरत लग रहा था। चेहरे पर कामयाबी की चमक दिखाई दे रही थी। लेकिन उसके साथ एक लड़की भी थी, जो दिखने में काफी खूबसूरत थी।

        हिमांशु को देखते ही पायल दौड़ते हुए उसके पास गई और बोली, “हैलो हिमांशु, पहचान रहे है ना आप?”

        हिमांशु भला कैसे ना पहचानता, “अरे पायल तुम! इधर कैसे आना हुआ? सब कुछ ठीक है ना?”

        पायल मुसकुराते हुए बोली, “सुना है, आपको साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने वाला है। अब तो आप बहुत बड़े लेखक बन गए हैं, लेकिन एक बात बताइए, शादी के बारे में आपके क्या विचार हैं?”

        पायल की बात सुनकर हिमांशु बोला, “अरे मैं तो भूल ही गया था, इनसे मिलो। यह हैं मेरी प्रेमिका और होने वाली जीवन संगिनी, प्रिया वर्मा!” हिमांशु ने साथ खड़ी लड़की की तरफ इशारा किया।

        पायल को एक धक्का सा लगा। उसके सपने मानो चूर-चूर हो गए। वह निराश होकर बोली, “हिमांशु, यह आपने क्या किया? उस दिन की सजा आज तक दे रहो हो मुझे?”

        “पायल, मैं जानता हूँ, आज तुम मेरी शोहरत, दौलत और काबिलीयत देखकर आई हो, लेकिन इसकी क्या गारंटी कि आज अगर यह सब मिट जाए तो भी तुम मेरे साथ रहोगी? पता है पायल, जब तुमने मुझे ठुकरा दिया था, तब मैं बिल्कुल निराश हो गया था। उस समय प्रिया से मेरी मुलाकात हो गई और आज मैं जो कुछ हूँ, वह प्रिया के कारण हूँ।” हिमांशु बोला

        तभी प्रिया बोली, “पायल जी, आपको शायद मालूम है भी या नहीं, मैं बहुत पहले से ही हिमांशु को जानती थी। मैं इनकी रचनाओं को इंटरनेट और किताबों में पढ़ती थी, लेकिन एक लेखक होने के साथ हिमांशु एक अच्छे इंसान भी हैं। हमेशा लोगों की सहायता करते रहते हैं और इसी कारण मैंने इनको पसंद किया। लेकिन, आपसे इतना जरूर कहना चाहूँगी कि हिमांशु अगर विकलांग भी रहते, तो मैं इनसे ही विवाह करती। हमें किसी भी व्यक्ति के  खराब हालात को देखकर उसे ठुकराना नहीं चाहिए।” इतना कहकर प्रिया मुसकुराई।

       पायल चुपचाप सुन रही थी। वह जवाब देती भी तो क्या? हिमांशु पायल को देखकर बोला, “पायल, जो बीत गया, उसे भूल जाओ। हमें जल्दी घर पहुँचना है। अपना ख्याल रखना।”

      इतना कहकर हिमांशु देव वर्मा अपनी भावी जीवन संगिनी प्रिया के साथ अपनी कार की तरफ बढ़ गए और पायल उन्हें देखती ही रह गई।

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