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गोदान में प्रेमचन्द के नारी सम्बन्धी विचार अक्सर चर्चा और विवाद के विषय बनते रहे हैं। गोदान में प्रेमचन्द के विचारों के मुख्य स्रोत मेहता के वक्तव्य रहे हैं। अधिकांश आलोचक मेहता को ही उपन्यास में लेखक का प्रोटागोनिस्ट (विचारवाहक) मानते हैं। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार, अगर होरी और मेहता को मिला दिया जाय तो हमारे सामने प्रेमचन्द की आकृति उभर आती है। लेकिन, अपूर्वानन्द जैसे कुछ आलोचक इस धारणा से सहमत प्रतीत नहीं होते। अपूर्वानन्दजी ने कसौटी पत्रिका में एक लेख लिखकर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि मेहता के विचारों को प्रेमचन्द के विचार मानना उचित नहीं है। उनके अनुसार लेखक उपन्यास में कई विचारों को सामने लाकर एक सार्थक निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयत्न करता है। इनमें से किसी एक विचार को लेखक का विचार मान लेना तब तक उचित नहीं है, जब तक लेखक स्वयं ऐसे संकेत न दे। अपूर्वानन्दजी को गोदान में मेहता के विचारों से प्रेमचन्द की सहमति के संकेत नहीं मिलते हैं। यहाँ ऐसा लगता है कि अपूर्वानन्द जी प्रेमचन्द के संकेतों को पढ़ने में थोड़ी चूक कर गये हैं। वीमन्स लीगमें मेहता के भाषण के सन्दर्भ में प्रेमचन्द की टिप्पणी है ‘‘डॉ मेहता अकेले थे, फिर भी देवियों के दिल काँप रहे थे। सत्य की एक चिनगारी असत्य के पहाड़ को भस्म कर सकती है।’’ स्पष्टतया प्रेमचन्द डॉ मेहता के विचारों को सत्य की चिनगारीकी उपमा दे रहे थे। इस उद्धरण के बाद इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता कि डॉ मेहता ही गोदान में प्रेमचन्द के स्त्री सम्बन्धी विचारों के वाहक हैं।
                आमतौर पर प्रेमचन्द के स्त्री सम्बन्धी विचारों को गाँधीवाद से जोड़कर देखा जाता है। गांधी एकनिष्ठ समर्पण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते थे। गोदान की झुनिया जैसे चरित्रों के गठन में भी यह एकनिष्ठता देखी जा सकती है, जब वह सोना से कहती है कि जब तक तुम्हारे भैया किसी और स्त्री की ओर नहीं जायेंगे, तब तक मै पूरी तरह से उनकी हूं। वस्तुतः यौनशुचिता का सवाल तत्कालीन नारीवादी आन्दोलनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था भी नहीं। नारी स्वतन्त्रता के नाम पर यौन स्वच्छन्दता की बातें भारत में साठ के दशक के बाद ही दिखाई देती हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि गोदान के प्रेमचन्द के नारी सम्बन्धी विचारों की आलोचना का कारण उनका यौन शुचिता पर जोर देना कतई नहीं है। वस्तुतः गोदान में प्रेमचन्द के नारी सम्बन्धी विचारों की आलोचना का प्रमुख कारण उनका स्त्री-पुरूष समानता की आवधारणा को स्वीकार न करना है। 
                प्रेमचन्द यहाँ उसी सामन्ती पुरूषवादी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं, जो सिद्धान्त रूप में तो स्त्री को देवी का दर्जा देती है, परन्तु व्यवहार में एक भोग्या से ज्यादा नहीं समझती। प्रेमचन्द के मेहता की निगाह में स्त्री के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूल्य हैं त्याग, सेवा और समर्पण। इन मूल्यों से विचलित होकर यदि उसने पुरूष की बराबरी की आकांक्षा में घर की चौखट लांघने का प्रत्यन किया तो वह कुलटा हो जायेगी। मेहता के लिए आदर्श नारी का रोल मॉडल गोविन्दी है, जो पति के तमाम अत्याचारों और उसकी रंगीन तबियत को सहन करते हुए भी उसकी होकर रहती है। यही कारण है कि प्रेमचन्द के हाथों एक स्वतन्त्रचेता आधुनिक सोच वाली युवती मालती का रूपान्तरण घटनाओं की तार्किक परिणति के कारण न होकर लेखक के पूर्वग्रही विचारों के कारण होता है। मेहता की नजर में स्त्री का काम घर गृहस्थी और बच्चे सम्भालना है, तभी वह देवी कहलाने की पात्र है। देवी के इस आसन से उतरकर स्त्री ने जैसे ही पुरूष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की कोशिश की, तो वह देवी के सिंहासन से च्युत होकर कुलटा बन जाती है। इसी मानसिकता के कारण मेहता सरोज के प्रेम के उपरान्त विवाह करने के विचार को गलत ठहराता है। प्रेम स्त्री को स्वतन्त्र निर्णय और चयन का अधिकार देता है। प्रेमचन्द की परम्परावादी नारीदृष्टि स्त्री को प्रेम का अधिकार कैसे दे सकती थी?
                मनुस्मृति में कहा गया है कि स्त्री अपने जीवन के किसी भी पड़ाव पर स्वतन्त्र नहीं होती। बचपन में उसकी रक्षा पिता करता है, युवावस्था में पति उसका रक्षक होता है और वृद्धावस्था में स्त्री के रक्षा का उत्तरदायित्व उसके पुत्र पर होता है। स्मृतियां तो स्त्रियों  को शूद्रों के समकक्ष रखते हुए यह घोषणा करती हैं कि यदि स्त्री और शूद्र के कानों में गलती से भी वेदमन्त्र चला जाय तो उनके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देना चाहिए। स्त्रियों की शिक्षा का विरोध मध्यकालीन सामन्ती परिवेश में देखा जा सकता है, लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि नवजागृति की सांस लेते और आधुनिकता की पहली सीढ़ी पर पैर रखते भारतीय समाज में प्रेमचन्द ऐसे विचारों को प्रतिष्ठित कर रहे थे। प्रेमचन्द के मेहता भी स्त्रियों को पुरूषों के समान शिक्षा देना उचित नहीं समझते और उनके लिए घरदारी और शिशु पालन को ही महत्वूपर्ण शिक्षा मानते है। इनके साथ-साथ सेवा, ध्यान और समर्पण जैसे स्त्रियोचितमूल्य तो हैं ही। ग्रामकथा में जहां प्रेमचन्द कथा का स्वाभाविक प्रवाह होने देते है, वहाँ धनिया जैसी स्त्रियों में चुटकी भर स्वातन्त्र्य चेतना दिख भी जाती है, लेकिन नगर कथा में, जहां कथा प्रवाह का पूरा नियंत्रण लेखक के हाथों में है, मालती जैसी स्वतन्त्रचेता स्त्री को प्रेमचन्द गोविन्दी जैसी सेवा, त्याग और समर्पण जैसे मूल्यों से परिपूर्ण स्त्री बनाकर ही दम लेते है।
                तत्कालीन भारतीय समाज में स्त्री स्वतन्त्रता की लहर चल रही थी। स्त्रियाँ पुरूषों के कन्धों से कन्धा मिलाकर स्वाधीनता आन्दोलन में भाग ले रही थीं। स्वयं प्रेमचन्द की पत्नी शिवरानी देवी भी इनमें शामिल थी। स्त्रियों में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार बढ़ रहा था। कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता जैसा सम्मान भी उन्हें मिल चुका था। तत्कालीन रचनाओं में इस परिवर्तन का रेखांकन बार-बार हुआ है। अज्ञेय, उग्र, जैनेन्द्र जैसे रचनाकार अपनी कहानियों और उपन्यासों में लगातार स्वतन्त्रचेता स्त्रियों की नई पौध का चित्रण कर रहे थे। स्वयं प्रेमचन्द के जालपा का चरित्र इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। ऐसे समय में गोदान में प्रेमचन्द  का यह विचार कि स्त्रियों की वास्तविक जगह घर में ही है, अपने समय से काफी पीछे हैं,परम्परागत पुरूषवादी मानसिकता के परिचायक हैं और निश्चय ही प्रतिगामी हैं।
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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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