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समाप्ति की कगार पर है जनजातियों का सरना धर्म

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           मानवीय समाज में ऐसा कहीं नहीं मिला है जिसमें धर्म का अस्तित्व किसी न किसी रूप में न रहा हो या कोई भी मानव समाज धर्म से अलग रहा हो। धर्म सर्वत्र पाया जाता है। परंतु जनजातीय समाज में धर्म उतने ही सरल अथवा कहीं-कहीं उतने ही जटिल रूप में पाया जाता है-जितना कि विकसित तथा कहीं सभ्य कही जाने वाली जातियों में। मानव शास्त्रियों के अनुसार जनजातियों में धर्म की उत्पत्ति का मूल कारण भूत प्रेतों में विश्वास है। साधारणतः प्रत्येक जनजाति का एक अलग-अलग धर्म रहा है परंतु इसमें भी समय के साथ काफी परिवर्तन हुए हैं। अन्य धर्मों के निकट संपर्क में आने तथा जनजातियों के संस्कृतिकरण तथा आत्मसात करने की प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप धर्म के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, जिससे इनका झुकाव परंपरागत धार्मिक रिवाजों से लगभग हट गया है। छोटा नागपुर की उरांव, मुण्डा, हो, खड़िया, संथाल आदि जनजाति का विकसित सरना धर्म ईसाईयत तथा हिन्दू धर्म के प्रवेश के फलस्वरूप बुझने की स्थिति में है। उत्थान के बाद पतन निश्चित है ऐसा इतिहास का नियम है। कोई भी चीज सदा स्थायी नहीं रह सकती, सरना धर्म के साथ भी यही होना तय है। संसार के पुराने पंथ, मत व विश्वास समाप्त हो चुके हैं तथा इनके स्थान पर नये मतों और विश्वासों ने जन्म लिया है। निश्चय ही यह धर्म कुछ अंतराल बाद बुझ जायेगा और अपने पीछे मात्र अवशेष छोड़ जायेगा। ये जनजातियॉं विशेषकर उरांव तथा मुण्डा जनजाति अब परंपरागत रीति-रिवाजों तथा अपनी जनजातीय प्रणालियों का बहिष्कार करते जा रही है।

            जनजातीय लोगों का अपना देवकुल होता है फिर भी वे गैर जनजातीय पड़ोसियों तथा ब्रिटिश शासकों के विश्वासों से मिले हुए हैं। आदिवासी मूलरूप से प्रकृति पूजक रहे हैं तथा इनकी पूजा पद्धति, वैदिक या सनातन धर्म से कुछ भी मिलती-जुलती नहीं है। सरना धर्म को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से भी जाना जाता है। कुछ आदिवासी, पूर्व में प्रचलित व विद्यमान पूजा पद्धति व परंपरा को आज भी कायम रखे हुए हैं, परन्तु इनकी संख्या नगण्य ही है। वर्तमान में दक्षिण भारत के लिंगायत सम्प्रदाय को अलग धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त होने पर सरना धर्म के अनुयायी अपनी अलग पहचान बनाये रखने के लिए सरना धर्म को एक अलग धर्म घोषित करने के लिए जंग छेड़े हुए हैं तथा इस संबंध में उनके द्वारा याचिका भी दायर की गई है। संसार के विभिन्न भागों में भी कई समुदाय अपने मूल स्वरूप को छोड़ना नहीं चाहती, ईराक तथा सीरिया के यजीदी समुदाय का उदाहरण सामने है। छोटानागपुर, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल और उत्तर पूर्वी क्षेत्र तक फैले हुए झारखंड क्षेत्र की जनजातियां हिन्दू धर्म तथा ईसाई धर्म से संपर्क के परिणाम का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। हिंदू धर्म जनजातीय जीवन तथा संस्कृति पर बिना अग्रसर हुए प्रभाव डालता रहा है परंतु ईसाई धर्म के विषय में ऐसा नहीं था। इसका अर्थ अतीत से पूर्ण विच्छेद था। ईसाई मिशनरियों तथा पादरियों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उनके देवता अश्लील तथा धर्मनिंदात्मक थे तथा भुतही संगति की शक्तियों तथा तत्वों से घिरे हुए थे। ईसाई धर्म का प्रभाव मेघालय के खासियों में 1813 ई. में, छोटा नागपुर के उरांव में 1850 ई.में और म.प्र. के भीलों में 1880 ई. में देखा गया है। प्रसिद्ध लेखक एस.सी. राय ने अपनी पुस्तक ’दी उरांव ऑफ छोटा नागपुर’’ में धर्म परिवर्तन के कारणों का रोचक विश्लेषण किया है। ज्यों ही धर्म परिवर्तन हुआ, जनजातीय लोगों को पुराने विश्वासों तथा प्रथाओं को छोड़ देने के लिए कहा गया।

            उरांव जनजाति का भी मूल धर्म ’सरना धर्म’ है, जिसमें धर्मेस को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। कुल आठ देवी देवता हैं जिसमें कोंहा पच्चो, छोटे पच्चो, जता पच्चो, आदि प्रमुख हैं। गांव के बाहर, छोटे जंगल को पूजा स्थल बनाया जाता था जिसे ’सरना’ कहा जाता था। इस स्थान के पेड़ पौधों को काटने की सख्त मनाही थी। सरना हमेशा गांव के बाहर ही होता था। परंतु यह देखने में आया है कि साधारणतः सरना किसी छोटी नदी या झरिया के आसपास ही होता था। सरना के बीचोंबीच एक पत्थर गाड़ दिया जाता था जिसकी पूजा गांव के बैगा याने पुजारी द्वारा किया जाता था। सरना में पशुओं की बलि दी जाती थी परंतु बलि दी जाने वाली पशुओं का रंग ’काला’ होना ज्यादा शुभ माना जाता था। सरना स्थल में गाड़े हुए पत्थर को बलि दी गई पशु का खून तथा सिर भेंट किया जाता था, शेष भाग को पकाकर उपस्थित लोग खाते थे। गांव के किसी परिवार के सदस्य के अनुपस्थित रहने पर उसके हिस्से का मांस उसके यहां पहुंचा दिया जाता था परंतु इसे घर से बाहर ही खाने की अनुमति थी। किसी भी स्त्री को सरना में बलि दी गई पशु के मांस खाने की अनुमति नहीं थी। सरना स्थल के पेड़ को नष्ट या क्षतिग्रस्त किये जाने पर दंड का प्रावधान था, परिणामस्वरूप व्यक्ति को पशु भेंट करना पड़ता था तथा सरना स्थल का शुद्धिकरण किये जाने के बाद सामूहिक भोज का आयोजन होता था। परंतु वर्तमान में सरना धर्म मृतप्राय हो चुका है। सरना स्थल पर पेड़ पौधे सदियों से यथावत हैं। आज भी किसी में सरना स्थल के वृक्ष काटने की हिम्मत धर्मेस के भय से नहीं है। भारत की अनेक जनजातियां एक ईश्वर पर विश्वास न करके अनेक देवी देवताओं पर विश्वास करती हैं। यद्यपि देवी देवताओं में बड़े छोटे का क्रम विभिन्न जनजातियों में अलग-अलग रूप से बना हुआ है। इसी तरह सरना धर्म भी अनेकेश्वरवाद पर आधारित है। उरांव जनजाति के सरना धर्म में जिस तरह धर्मेस को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था उसी तरह छोटानागपुर की हो, मुण्डा तथा संथाल जनजाति में बोंगा सबसे बड़े आराध्य देव हैं।

            उरांव जनजाति का धर्म प्रकृतिवाद तथा पितृवाद से अत्यंत प्रभावित रहा है। बच्चे के छठी के दिन एक बर्तन में हंडिया (चावल से बनाया गया एक प्रकार का मादक द्रव्य) रखकर बच्चे तथा धर्मेस के नाम से अलग अलग चावल डाला जाता है जो तैरता रहता है। इसके पश्चात् बच्चे के पूर्वजों के नाम से चावल डाला जाता है या फिर बड़े बुजुर्गों के नाम से। जो चावल बच्चे के नाम से डाले गये चावल से चिपक जाता है तो यह मान लिया जाता है बच्चा उसी का प्रतिरूप है। इस जनजाति की गोत्र प्रणाली भी प्रकृति के विभिन्न नामों पर आधारित है, परंतु उसकी पूजा या आराधना इनके द्वारा नहीं की जाती। प्रकृति के विभिन्न नामों को अपनाने के पीछे प्रकृति के बीच ही रहकर उनसे लगाव हो सकता है। सरना स्थल तथा कब्रगाह पर भूत प्रेतों तथा पूर्वजों की आत्माएं निवास करती हैं ऐसा अधिकांश जनजातियों का विश्वास है। अब भी सरना स्थल पर जाने से एक रहस्य और रोमांच का अनुभव होता है। गांव के बाहर इस जंगलनुमा सुनसान जगह पर एक अज्ञात भय और रहस्यमयी चुप्पी सचमुच एक आदमी के लिए अजीबोगरीब तथा रोमांचकारी अनुभव है। परंतु यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि जनजातियों के द्वारा ईसाईयत तथा  हिन्दु धर्म अपना लेने के बाद सरना धर्म का अस्तित्व मिट जाने की कगार पर है बस सरना स्थल के पेड़ ही इस बात का साक्ष्य देते हैं।

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