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यादों का झरोखा-बाजीगरी

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ये उन दिनों की बात है, जब मैंने इंटर की परीक्षा पास कर बी ए में एडमिशन लिया था. शायद 1994 के शुरूआती महीनों की. अब तक का अपना सिनेमा देखने का अनुभव बड़ों के साथ उनकी निगरानी में ही रहा था. स्कूल के कई लड़के क्लास बंक करके सिनेमा देखने में माहिर थे, लेकिन अपनी न तो उन लड़कों से कोई दोस्ती थी और न ही इतनी हिम्मत कि ऐसा कुछ सोच भी पाता.
ऐसे में हम तीन दोस्तों मैं, अजय और बबलू ने अकेले फिल्म देखने जाने की योजना बनाई. बिना किसी बड़े की निगरानी के मेरे लिए यह पहला मौका था, सिनेमा हॉल की दिशा में जाने का भी. शाहरुख खान की बाज़ीगर लगी हुई थी, जिसकी चर्चा गाहे-बगाहे कॉलोनी तक पहुँच ही जाती थी. डरते-डरते घर पर अनुमति की अर्ज़ी लगाई गई. पापाजी के समक्ष सीधे जाकर बात करने की हिम्मत आज भी नहीं है. अर्ज़ी माँ के पास लगाई जाती थी, जिन्हें हम भाई-बहन अम्माजी कहते थे. अम्माजी जब हमारी फाइल लेकर पापाजी के सामने प्रस्तुत होती थीं, तब हम दरवाज़े के पीछे खड़े परिणाम की प्रतीक्षा किया करते थे.
खैर, फाइल पेश की गयी.
‘किसके साथ?’, पहला सवाल आया.
‘बबलू और अजय के साथ’, अम्माजी ने जवाब दिया.
‘हम्म.’ घर में बबलू और अजय की छवि अच्छे बच्चों वाली थी, इसलिए इस मोर्चे पर ज्यादा चिंता नहीं थी.
‘ऐसी कौन सी फ़िल्म है, जिसे देखना ज़रूरी है?’ अगला सवाल आया.
‘बाज़ीगर’
‘हम्म. ठीक है…जाएँ …लेकिन सात बजे के पहले घर पर दिखाई देने चाहिए.’
अनुमति मिली और साथ में फिल्म देखने के लिए 50 रूपये भी. उन दिनों आरा के सपना सिनेमा में सबसे महँगी टिकट 20 रूपये की आती थी. ख़ुशी से उछलता मैं बाहर आया तो बबलू और अजय को व्यग्रता से प्रतीक्षा करते पाया. ‘जल्दी करो! 3 बजे का शो है और डेढ़ यहीं बज गए हैं. अजय के पास साइकिल थी. साइकिल मेरे पास भी थी, लेकिन मुझे साइकिल से जाने की अनुमति नहीं मिली. लिहाज़ा मेरा और बबलू का रिक्शे से जाना तय हुआ. हमारी कॉलोनी से सपना सिनेमा की दूरी 5-6 किलोमीटर रही होगी, लेकिन उसे रिक्शे से तय करने में लगभग आधे घंटे का वक्त लगता था. वैसे भी उन दिनों हम इन दूरियों को किलोमीटर की बजाय घंटों और मिनटों में ही मापा करते थे.
एक तो रिक्शे की मरियल चाल, तिस पर आरा की सड़कें ऐसी कि किसी आसन्न प्रसवा के प्रसव के लिए हॉस्पिटल की बजाय इन सड़कों पर रिक्शे की सवारी ही काफी थी. अजय अपनी साइकिल से थोड़ा आगे निकल गए थे, यह कहकर कि पहले पहुँच कर टिकट की लाइन में लगते हैं.
रिक्शा अपनी रफ़्तार से चल रहा था, पर हमारी बेचैनी ऐसी थी कि हमारा वश चलता तो रिक्शेवाले को हटा कर खुद रिक्शे को उड़ा ले जाते.
रिक्शेवाले को हमारी बेचैनी से कोई लेना-देना नहीं था. वह अपनी सहज स्वाभाविक मंथर गति से पैडल पर पाँव मारे जा रहा था और ‘बाजीगर ओ बाजीगर…’ गुनगुनाए जा रहा था. मेरी इच्छा हुई कि उसके गले में लिपटा अंगोछा निकाल कर उसके मुँह में ठूँस दूँ. पर…. किसी तरह अपनी इस इच्छा को दबाया.
जैसे हर मुसीबत का अंत होता है, हमारी इस पीड़ा भरी प्रतीक्षा का भी अंत हुआ. रिक्शा अंततः सपना सिनेमा के गेट पर जा लगा. रिक्शे के गतिहीन होने के पहले हम छलाँग मार कर सिनेमा हॉल के गेट के अंदर पहुंच गए. तभी पीछे से रिक्शेवाले के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी – ‘पैसे?’
मन मारकर वापस मुड़े. रिक्शेवाले को ऐसी नजरों से घूरा, मानो वो फिल्म का खलनायक हो,लेकिन जब उसे भी खुद को ऐसी ही नज़रों से घूरते पाया तो हमने अपनी नजरें झुका लीं.
पैसे देकर सिनेमा हॉल के अंदर पहुँचे. तब तक अजय भी साइकिल स्टैंड में जमा कर आ चुके थे. अंदर का हाल देख कर हमारे रहे-सहे होश भी उड़ गये. ऐसा लग रहा था, जैसे सारा शहर ही अपने घरों से उठकर आज बाजीगर देखने आ गया हो. बालकनी की टिकट की कतार इतनी लंबी थी कि उसे गेट के बाहर निकलने से रोकने के लिए तीन जगह से मोड़ दिया गया था. जगह-जगह पुलिस वाले डंडा फटकारते हुए अपने सुभाषितों से लोगों को आदृत कर रहे थे. महिलाओं की कतार अपेक्षाकृत छोटी थी, पर उस लाइन में लग सकें, ऐसी न शक्लो सूरत थी, न वेशभूषा. बालकनी को छोड़कर बाकी सभी खिड़कियों पर लगे हाउसफुल के बोर्ड हमें मुँह चिढ़ा रहे थे. अजय टिकट की लाइन में लग गये, लेकिन टिकट मिलने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही थी.
हमारी हालत ‘काटो तो खून नहीं’ वाली हो रही थी. इधर-उधर उम्मीद भरी नज़रें दौड़ा रहे थे कि कहीं कोई जाना-पहचाना चेहरा टिकटों की लाइन में आगे दिख जाए, पर कोई न दिखा. वैसे ऐसा कोई चेहरा दिख भी जाता तो, बिना पुलिसवालों के डंडे खाए उस तक पहुँचना मुश्किल ही होता.
अचानक बबलू ने कहा, ‘चलो लेडिज लाइन में किसी से रिक्वेस्ट करते हैं’. मैंने उसे यूँ देखा, जैसे सर पर सींग उग आए हों उसके. आरंभ से ही को एड में पढ़ने के बावजूद किसी अजनबी लड़की से बात करने की कोशिश करना मेरे लिए उतना ही दुस्साहसिक था, जितना किसी टीले पर चढ़ने वाले के लिए एवरेस्ट फतह की योजना बनाना. मैं जब तक उसके प्रस्ताव पर कुछ कह पाता, वह महिलाओं वाली क्यू के बिल्कुल पास पहुँच चुका था. पुलिसवालों का सारा जोर युवकों की उद्दंडता को नियंत्रित करने में लगा था, इसलिए महिलाओं की लाइन की तरफ़ उनकी उपस्थिति नहीं थी. एक लेडी कॉन्स्टेबल जरूर खड़ी थी, जिसने या तो उसे नहीं देखा या फिर देख कर भी अनदेखा कर दिया. मैं प्रतीक्षा कर रहा था, उसके फटकारे जाने और बैरंग वापस आने की. लेकिन, जो हुआ, वह मेरी उम्मीदों के सर्वथा विपरीत था. जब उसे जेब से नोट निकालकर किसी लड़की के हाथों में पकड़ाते और लड़की का उसे निर्विरोध ले लेते देखा तो सहसा मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ. चश्में के शीशे साफ करके और आँखों को मसल कर दुबारा देखा. बबलू अब वापस मेरी और लौट रहा था. चाल ऐसी, जैसे कोई अजेय दुर्ग जीत कर लौट रहा हो.
ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. महज दस मिनटों में तीन टिकट और बाकी पैसे हमारे हाथों में थे. अब वक्त था अजय जी को धक्कामुक्की के कष्टों से छुटकारा दिलाने का. लेकिन ये भी कोई सहज हो सकने वाला काम नहीं था.
पुरुषों की टिकट खिड़की का आखिरी दस मीटर का हिस्सा गुफानुमा था. अर्थात् टिकट लेने के लिए पुरुषों को आखिरी दस मीटर की दूरी दो दीवारों से घिरे एक संकरे गलियारे से होकर पूरी करनी पड़ती थी और अजय जी अब उस गलियारे में प्रविष्ट हो चुके थे.
पास जाना संभव नहीं था. डंडे खाने की इच्छा हम दोनों में से किसी की नहीं थी. आवाज़ देना व्यर्थ था. प्रतीक्षा के सिवा और कोई विकल्प नहीं था.
‌अब हम प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह अजय के खिड़की तक पहुँचने के पहले हाउसफुल हो जाए. ऊपरवाला भी शायद हमारी प्रार्थना के ही इंतज़ार में बैठा था. हाउसफुल का बोर्ड दूर से ही चमकता दिखाई देने लगा. हम खुशी से उछल पड़े. टिकट न मिलने पर शायद ही कोई इससे पहले इतना खुश हुआ होगा. पर….. खुशियों की राह शायद इतनी सरल नहीं हुआ करती. सामने अजय हाथों में टिकट लहराते झूमते हुए आते दिखाई दिए. शर्ट के बटन टूटे हुए.. बाल बिखरे हुए.. पूरा शरीर ऐसा लग रहा था, जैसे मिट्टी में लोट लगा कर आ रहे हों. ईमानदारी से कहूँ, तो दुख हमें उनकी इस हालत को देख कर नहीं, बल्कि उनके हाथ में टिकटों को देखकर हुआ.
‌ दर्शक तीन, टिकटें छह. अब क्या हो? घड़ी 2.50 दिखा रही थी. मुश्किल से 10 मिनट रह गये थे, शो शुरु होने में.
‌अजय अब तक पास आ चुका था. जोश में बोला – ‘अरे मिल तो गया टिकट. रो क्यों रहे हो?’
हमारी ओर से पूरी शांति. सिर्फ़ हाथ में पकड़े टिकट उसकी आँखों के सामने लहरा दिये.
‘अरे! ये कहाँ से मिले?’
हमने मुहर्रमी सूरत बरकरार रखते हुए सारी दास्तां सुना दी.
‘जब मैं गया था टिकट लेने, तो क्या जरूरत थी ज्यादा होशियार बनने की?’ निगाहों में भस्म करने की शक्ति होती, तो अब तक मैं और बबलू राख हो चुके होते.
‘ हमें तो लगा, तुम्हें टिकट नहीं मिलेंगे. ‘ मैंने सफाई पेश की.
‘ऐसे कैसे नहीं मिलते?’ भेड़िया गुर्राया.
‘अब क्या करें?’ निगाहें फिर से परिचित चेहरे की खोज में भटकने लगीं. इस बार गेट के बाहर खड़ी भीड़ की ओर… टिकट लेने के लिए नहीं, उन्हें ठिकाने लगाने के लिए. परिचित चेहरे न तब दिखे थे, न अब दिख रहे थे.
‘बाहर बहुत से लोग बगैर टिकट खड़े हैं. चलो किसी से बात करते हैं.’
गेट के पास दो तीन छोकरे पहले से खड़े चिल्ला रहे थे – ‘बीस के पचास, बीस के पचास… जल्दी करो. शो शुरु होने वाला है.’ अब तक तलवारबाजी कर रहे पुलिसवाले उन्हें यूँ निर्विकार दृष्टि से देख रहे थे, जैसे वे टिकटें ब्लैक न कर रहे हों, प्रवचन दे रहे हों.
हमारे गेट के पास जाकर खड़े होते ही जाने कैसे उन्होंने हमारा उद्देश्य भाँप लिया.
‘ चल भाग यहाँ से. ‘ उनमें से एक फुंफकारा.
हम भय से सिमट कर गेट से थोड़ी दूर खड़े हो गए. अपने सामने से टिकटाकांक्षियों को उन छोकरों के पास जाते देखते रहे. घड़ी दो बजाने वाली थी. हम निराश मन हॉल की ओर घूमे. अचानक… जैसे बादलों को चीरकर सूर्य देव उदित हो गये हों, एक रिक्शा ठीक हमारे कदमों के पास आकर रुका. गेट से दूर खड़े थे.. ये भी पक्का नहीं था कि वो फिल्म देखने आए हैं. फिर भी, मैंने अपनी सारी हिम्मत संजोकर पूछा – ‘टिकट चाहिये?’
‘हाँ! तीन चाहिये. कितने में दोगे?’
‘सौ रुपए’, बिना सोचे समझे मेरे मुँह से निकला.
उसने बेहिचक सौ का नोट निकाल कर मेरे हाथ में पकड़ा दिया. हमने टिकट उसे पकड़ाए और हॉल की ओर दौड़ पड़े.

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विकास नैनवाल

वाह!! रोमांचक संस्मरण। आखिर हार के जीतने वाले को ही बाजीगर कहते हैं। आपने भी बाज़ीगरी दिखा ही दी। उम्मीद है ऐसे ही लेख आगे भी आते रहेंगे।

Alok verma

बेहद खूबसूरत संस्मरण। वाह वाह

NUTAN SINGH

Pyari yaaden.jab tv itna ghar-ghar paaon nahi pasara tha , itne channel upladh nahi the tab cinema ka utsaah charam pe hota tha. Tay karyakram k anusaar koi vyakti samaypurv ja k ticket kataa lata uske baad sablog saath me nikalte .
Wo samay hi alag tha.

Girish Kumar

Nicely written the Ladkapan bazigari. JO HAAR KAR JITATA HAI वही बाजीगर कहलाता है।
वैसे फिल्म का मुझे एक गाना बहुत पसंद है आज भी।

छुपाना भी नही आता जताना भी नही आता हमे तुमसे मोहब्बत है बताना भी नही आता।

Jitesh Talwani

आपने तो मुझे मेरे बचपन में फिल्म की टिकटों की जद्दोजहद याद दिला दी… कई बार पुलिसिया डंडे काफी करीब से निकले हैं अपने भी