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बयान 11

इस जगह मुख्तसर ही में यह भी लिख देना मुनासिब मालूम होता है कि रोहतासगढ़ तहखाने में से राजा वीरेन्द्रसिंह, कुंअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग क्योंकर छूटे और कहां गए।

हम ऊपर लिख आए हैं कि जिस समय गौहर ‘जोगिया’ का संकेत देकर रोहतासगढ़ किले में दाखिल हुई उसके थोड़ी ही देर बाद एक लम्बे कद का आदमी भी, जो असल में भूतनाथ था, ‘जोगिया’ का संकेत देकर किले के अन्दर चला गया। न मालूम उसने वहां क्या-क्या कार्रवाई की, मगर जिस समय मैगजीन उड़ाई गई थी, उस समय वह एक चोबदार की सूरत बना राजमहल के आसपास घूम रहा था। जब राजा दिग्विजयसिंह घबराकर महल के बाहर निकला था और चारों तरफ कोलाहल मचा हुआ था, वह इस तरह महल के अन्दर घुस गया कि किसी को गुमान भी न हुआ। इसके पास ठीक वैसी ही ताली मौजूद थी जैसी तहखाने की ताली राजा दिग्विजयसिंह के पास थी। भूतनाथ जल्दी-जल्दी उस घर में पहुंचा जिसमें तहखाने के अन्दर जाने का रास्ता था। उसने तुरन्त दरवाजा खोला और अन्दर जाकर उसी ताली से फिर बन्द कर दिया। उस दरवाजे में एक ही ताली बाहर-भीतर दोनों तरफ से लगती थी। कई दरवाजों को खोलता हुआ वह उस दालान में पहुंचा जिसमें वीरेन्द्रसिंह वगैरह कैद थे और राजा वीरेन्द्रसिंह के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। राजा वीरेन्द्रसिंह उस समय बड़ी चिन्ता में थे। मैगजीन उड़ने की आवाज उनके कान तक भी पहुंची थी, बल्कि मालूम रहे कि उस आवाज के सदमे से समूचा तहखाना हिल गया। वे भी यही सोच रहे थे कि शायद हमारे ऐयार लोग किले के अन्दर पहुंच गए। जिस समय भूतनाथ हाथ जोड़कर उनके सामने जा खड़ा हुआ, वे चौंके और भूतनाथ की तरफ देखकर बोले, “तू कौन है और यहां क्यों आया’

भूतनाथ – यद्यपि मैं इस समय एक चोबदार की सूरत में हूं, मगर मैं हूं कोई दूसरा ही, मेरा नाम भूतनाथ है। मैं आप लोगों को इस कैद से छुड़ाने आया हूं और इसका इनाम पहले ही ले लिया चाहता हूं।

वीरेन्द्रसिंह – (ताज्जुब में आकर) इस समय मेरे पास क्या है जो मैं इनाम में दूं?

भूतनाथ – जो मैं चाहता हूं वह इस समय भी आपके पास मौजूद है।

वीरेन्द्रसिंह – यदि मेरे पास मौजूद है तो मैं उसे देने को तैयार हूं। मांग, क्या मांगता है।

भूतनाथ – बस, मैं यही मांगता हूं कि आप मेरा कसूर माफ कर दें! और कुछ नहीं चाहता।

वीरेन्द्रसिंह – मगर मैं कुछ नहीं जानता कि तू कौन है और तूने क्या अपराध किया है जिसे मैं माफ कर दूं।

भूतनाथ – इसका जवाब मैं इस समय नहीं दे सकता। बस, आप देर न करें, मेरा कसूर माफ कर दें जिससे आप लोगों को यहां से जल्द छुड़ाऊं। समय बहुत कम है, विलम्ब करने से पछताना पड़ेगा।

तेजसिंह – पहले तुम्हें कसूर साफ-साफ कह देना चाहिए।

भूतनाथ – ऐसा नहीं हो सकता!

भूतनाथ की बातें सुनकर सभी हैरान थे और सोचते थे कि यह विचित्र आदमी है जो जबर्दस्ती अपना कसूर माफ करा रहा है और यह भी नहीं कहता कि उसने क्या किया है। इसमें शक नहीं कि यदि हम लोगों को यहां से छुड़ा देगा तो भारी अहसान करेगा, मगर इसके बदले में यह केवल इतना ही मांगता है कि इसका कसूर माफ कर दिया जाय। तो यह मामला क्या है! आखिर बहुत-कुछ सोच-समझकर राजा वीरेन्द्रसिंह ने भूतनाथ से कहा, “खैर जो हो, मैंने तेरा कसूर माफ किया।”

इतना सुनते ही भूतनाथ हंसा और बारह नम्बर की कोठरी के पास जाकर उसी ताली से, जो उसके पास थी, कोठरी का दरवाजा खोला। पाठक महाशय भूले न होंगे, उन्हें याद होगा कि इसी कोठरी में किशोरी को दिग्विजयसिंह ने डाल दिया था और इसी कोठरी में से उसे कुन्दन ले भागी थी।

कोठरी का दरवाजा खुलते ही हाथ में नेजा लिए वह राक्षसी दिखाई पड़ी जिसका हाल ऊपर लिख चुके हैं और जिसके सबब से कमला, भैरोसिंह, रामनारायण और चुन्नीलाल किले के अन्दर पहुंचे थे। इस समय तहखाने में केवल एक चिराग जल रहा था जिसकी कुछ रोशनी चारों तरफ फैली हुई थी। मगर जब वह राक्षसी कोठरी के बाहर निकली तो उसके नेजे की चमक से तहखाने में दिन की तरह उजाला हो गया। भयानक सूरत के साथ उसके नेजे ने सभी को ताज्जुब में डाल दिया। उस औरत ने भूतनाथ से पूछा, “तुम्हारा काम हो गया’ इसके जवाब में भूतनाथ ने कहा – “हां!”

उस राक्षसी ने राजा वीरेन्द्रसिंह की तरफ देखकर कहा, “सभी को लेकर आप इस कोठरी में आवें और तहखाने के बाहर निकल चलें, मैं इसी राह से आप लोगों को तहखाने के बाहर कर देती हूं।” यह बात सभी को मालूम ही थी इसी बारह नम्बर की कोठरी में से किशोरी गायब हो गई थी, इसलिए सभी को विश्वास था कि इस कोठरी में से कोई रास्ता बाहर निकल जाने के लिए जरूर है।

सभी की हथकड़ी-बेड़ी खोल दी गईं। इसके बाद सब कोई उस कोठरी में घुसे और उस राक्षसी की मदद से तहखाने के बाहर हो गये। जाते समय राक्षसी ने उस कोठरी को बन्द कर दिया। बाहर होते ही राक्षसी और भूतनाथ राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह से बिना कुछ कहे चले गए और जंगल में घुसकर देखते-ही-देखते नजरों से गायब हो गए। उन दोनों के बारे में सभी को शक बना ही रहा।

बयान 12

दो पहर दिन चढ़ने के पहले ही फौज लेकर नाहरसिंह रोहतासगढ़ पहाड़ी के ऊपर चढ़ गया। उस समय दुश्मनों ने लाचार होकर फाटक खोल दिया और लड़-भिड़कर जान देने पर तैयार हो गये। किले की कुल फौज फाटक पर उमड़ आई और फाटक के बाहर मैदान में घोर युद्ध होने लगा। नाहरसिंह की बहादुरी देखने योग्य थी। वह हाथ में तलवार लिए जिस तरफ को निकल जाता था, पूरा सफाया कर देता था। उसकी बहादुरी देखकर उसकी मातहत फौज की भी हिम्मत दूनी हो गई और वह ककड़ी की तरह दुश्मनों को काटने लगी। उसी समय पांच सौ बहादुरों को साथ लिए राजा वीरेन्द्रसिंह, कुंअर आनन्दसिंह और तेजसिंह वगैरह भी आ पहुंचे और उस फौज में मिल गये जो नाहरसिंह की मातहती में लड़ रही थी। ये पांच सौ आदमी उन्हीं की फौज के थे जो दो-दो, चार-चार करके पहाड़ के ऊपर चढ़ाये गए थे। तहखाने से बाहर निकलने पर राजा वीरेन्द्रसिंह से मुलाकात हुई थी और सब एक जगह हो गये थे।

जिस समय किले वालों को यह मालूम हुआ कि राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह भी उस फौज में आ मिले, उस समय उनकी हिम्मत बिल्कुल जाती रही। बिना दिल का हौसला निकाले ही उन लोगों ने हथियार रख दिए और सुलह का डंका बजा दिया। पहाड़ी के नीचे से और फौज भी पहुंच गई और रोहतासगढ़ में राजा वीरेन्द्रसिंह की अमलदारी हो गई। जिस समय राजा वीरेन्द्रसिंह दीवानखाने में पहुंचे वहां राजा दिग्विजयसिंह की लाश पाई गई। मालूम हुआ कि उसने आत्मघात कर लिया। उसकी हालत पर राजा वीरेन्द्रसिंह देर तक अफसोस करते रहे।

राजा वीरेन्द्रसिंह ने कुंअर आनन्दसिंह को गद्दी पर बैठाया। सभी ने नजरें दीं। उसी समय कमला भी आ पहुंची। उसने किले में पहुंचकर कोई ऐसा काम नहीं किया था जो लिखने लायक हो। हां, गिल्लन के सहित गौहर को जरूर गिरफ्तार कर लिया था। दिग्विजयसिंह की रानी अपने पति के साथ सती हुई। रामानन्द की स्त्री भी अपने पति के साथ जल मरी। शहर में कुमार के नाम की मुनादी करा दी गई और यह कहला दिया गया कि जो रोहतासगढ़ से निकल जाना चाहे वह खुशी से चला जाय! दिग्विजयसिंह के मरने से जिसे कष्ट हुआ हो वह यदि हमारे भरोसे पर यहां रहेगा तो उसे किसी तरह का दुःख न होगा। हर एक की मदद की जायगी और जो जिस लायक है उसकी खातिर की जायगी। इन सब कामों के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह ने कुल हाल की चीठी लिखकर अपने पिता के पास रवाना की।

दूसरे दिन राजा वीरेन्द्रसिंह ने एकान्त में कमला को बुलाया। उस समय उनके पास कुंअर आनन्दसिंह, तेजसिंह, भैरोसिंह, तारासिंह वगैरह ऐयार लोग ही बैठे थे, अर्थात् सिवाय आपस वालों के कोई भी बाहरी आदमी नहीं था। राजा वीरेन्द्रसिंह ने कमला से पूछा, “कमला, तू इतने दिनों तक कहां रही तेरे ऊपर क्या-क्या मुसीबतें आईं, और तू किशोरी का क्या-क्या हाल जानती है, सो मैं सुना चाहता हूं।”

कमला – (हाथ जोड़कर) जो कुछ मुसीबतें मुझ पर आईं और जो कुछ किशोरी का हाल मैं जानती हूं सब अर्ज करती हूं। अपनी प्यारी किशोरी से छूटने के बाद मैं बहुत ही परेशान हुई। अग्निदत्त की लड़की कामिनी ने जब किशोरी को अपने बाप के पंजे से छुड़ाया और खुद भी निकल खड़ी हुई तो पुनः मैं उन लोगों से जा मिली और बहुत दिनों तक गयाजी में रही और वहीं बहुत-सी विचित्र बातें हुईं।

वीरेन्द्रसिंह – हां, गयाजी का बहुत-कुछ हाल तुम लोगों के बारे में देवीसिंह की जुबानी मुझे मालूम हुआ था और यह भी जाना गया कि जिन दिनों इन्द्रजीतसिंह बीमार था, उसके कमरे में जो-जो अद्भुत बातें देखने-सुनने में आईं, सब कामिनी ही की कार्रवाइयां थीं, मगर उनमें से कई बातों का भेद अभी तक मालूम नहीं हुआ।

कमला – वह क्या?

वीरेन्द्रसिंह – एक तो यह कि तुम लोग उस कोठरी में किस रास्ते से आती-जाती थीं दूसरे, लड़ाई किससे हुई थी वह कटा हाथ जो कोठरी में पाया गया, किसका था, और बिना सिर की लाश किसकी थी?

कमला – वह भेद भी मैं आपसे कहती हूं। गयाजी में फलगू नदी के किनारे एक मन्दिर श्री राधाकृष्णजी का है। उसी मन्दिर में से एक रास्ता महल में जाने का है जो उस कोठरी में निकला है जिसका हाल माधवी, अग्निदत्त और कामिनी के सिवाय किसी को मालूम नहीं। कामिनी की बदौलत मुझे और किशोरी को मालूम हुआ। उसी रास्ते से हम लोग आते-जाते थे। वह रास्ता बड़ा ही विचित्र है, उसका हाल मैं जुबानी नहीं समझा सकती। गयाजी चलने के बाद जब मौका मिलेगा तो ले चलकर उसे दिखाऊंगी, हम लोगों का उस मकान में आना-जाना नेकनीयती के साथ होता था। मगर जब माधवी गयाजी में पहुंची तो बदला लेने की नीयत से एक आदमी और अपनी ऐयारा को साथ ले उसी राह से महल की तरफ रवाना हुई। उसे उस समय तक शायद हम लोगों का हाल मालूम न था। इत्तिफाक से हम तीनों आदमी भी उसी समय सुरंग में घुसे, आखिर नतीजा यह हुआ कि उस कोठरी में पहुंचकर लड़ाई हो गई। माधवी के साथ का आदमी मारा गया। वह कलाई माधवी की थी और मेरे हाथ से कटी थी। अन्त में उसकी ऐयारा उस आदमी का सिर और माधवी को लेकर चली गई। हम लोगों ने उस समय रोकना मुनासिब न समझा।

वीरेन्द्रसिंह – हां ठीक है, ऐसा ही हुआ है। यह हाल मुझे मालूम था, मगर शक मिटाने के लिए तुमसे पूछा था।

कमला – (ताज्जुब में आकर) आपको कैसे मालूम हुआ?

वीरेन्द्रसिंह – मुझसे देवीसिंह ने कहा था और देवीसिंह को उस साधु ने कहा था जो रामशिला पहाड़ी के सामने फलगू नदी के बीच वाले भयानक टीले पर रहता था। देवीसिंह की जुबानी बाबाजी ने मुझे एक सन्देशा भी कहला भेजा था, मौका मिलने पर मैं जरूर उनके हुक्म की तामील करूंगा।

कमला – वह सन्देशा क्या था?

वीरेन्द्रसिंह – सो इस समय न कहूंगा। हां, यह तो बता कि कामिनी का और उन डाकुओं का साथ क्योंकर हुआ जो गयाजी की रिआया को दुःख देते थे?

कमला – कामिनी का उन डाकुओं से मिलना केवल उन लोगों को धोखा देने के लिए था। वे डाकू सब अग्निदत्त की तरफ से तनख्वाह और लूट के माल में कुछ हिस्सा भी पाते थे। वे लोग कामिनी को पहचानते थे और उसकी इज्जत करते थे। उस समय उन लोगों को यह नहीं मालूम था कि कामिनी अपने बाप से रंज होकर घर से निकली है इसलिए उससे डरते थे और जो वह कहती थी करते थे। आखिर कामिनी ने धोखा देकर उन लोगों को मरवा डाला और मेरे ही हाथ से उन डाकुओं की जानें गईं। वे डाकू लोग जहां रहते थे, आपको मालूम हुआ ही होगा।

वीरेन्द्रसिंह – हां, मालूम हुआ है। जो कुछ मेरा शक था, मिट गया, अब उस विषय में विशेष कुछ मालूम करने की कोई जरूरत नहीं है। अब मैं यह पूछता हूं कि इस रोहतासगढ़ वाले आदमी जब किशोरी को ले भागे, तब तेरा और कामिनी का क्या हाल हुआ?

कमला – कामिनी को साथ लेकर मैं उस खंडहर से, जिसमें नाहरसिंह और कुंअर इन्द्रजीसिंह की लड़ाई हुई थी, बाहर निकली और किशोरी को छुड़ाने की धुन में रवाना हुई, मगर कुछ कर न सकी, बल्कि यों कहना चाहिए कि अभी तक मारी फिरती हूं। यद्यपि इस रोहतासगढ़ के महल तक पहुंच चुकी थी, मगर मेरे हाथ से कोई काम न निकला।

वीरेन्द्रसिंह – खैर, कोई हर्ज नहीं। अच्छा यह बता कि अब कामिनी कहां है?

कमला – कामिनी को मेरे चाचा शेरसिंह ने अपने एक दोस्त के घर में रखा है मगर मुझे यह नहीं मालूम कि वह कौन है और कहां रहता है।

वीरेन्द्रसिंह – शेरसिंह से कामिनी क्योंकर मिली?

कमला – यहां से थोड़ी ही दूर पर एक खंडहर है। शेरसिंह से मिलने के लिए कामिनी को साथ लेकर मैं उसी खंडहर में गई थी मगर अब सुनने में आया है कि शेरसिंह ने आपकी ताबेदारी कबूल कर ली और आपने उन्हें कहीं भेजा है।

वीरेन्द्रसिंह – हां, वह देवीसिंह को साथ लेकर इन्द्रजीत को छुड़ाने के लिए गये हैं मगर न मालूम, क्या हुआ कि अभी तक नहीं लौटे।

कमला – कुंअर इन्द्रजीतसिंह तो यहां से दूर न थे और चाचा को वह जगह मालूम थी, अब तक उन्हें लौट आना चाहिए था।

वीरेन्द्रसिंह – क्या तुझे भी वह जगह मालूम है?

कमला – जी हां, आप जब चाहें चलें, मुझे रास्ता बखूबी मालूम है।

इस समय कुंअर आनन्दसिंह ने, जो सिर झुकाए सब बातें सुन रहे थे, अपने पिता की तरफ देखा और कहा, “यदि आज्ञा हो तो मैं कमला के साथ भाई की खोज में जाऊं’ इसके जवाब में राजा वीरेन्द्रसिंह ने सिर हिलाया अर्थात् उनकी अर्जी मंजूर नहीं की।

राजा वीरेन्द्रसिंह और कमला में जो कुछ बातें हो रही थीं, सब कोई गौर से सुन रहे थे। यह कहना जरा मुश्किल है कि उस समय कुंअर आनन्दसिंह की क्या दशा थी। कामिनी के वे सच्चे आशिक थे, मगर वाह रे दिल, इस इश्क को उन्होंने जैसा छिपाया उन्हीं का काम था। इस समय वे कमला की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे। उन्हें निश्चय था कि जिस जगह शेरसिंह ने कामिनी को रखा है, वह जगह कमला को मालूम है मगर किसी कारण से बताती नहीं, इसलिए कमला के साथ भाई की खोज में जाने के लिए पिता से आज्ञा मांगी। इसके सिवाय कामिनी के विषय में और भी बहुत-सी बातें कमला से पूछना चाहते थे। मगर क्या करें, लाचार कि उनकी अर्जी नामंजूर की गई और वे कलेजा मसोसकर रह गए।

इसके बाद आनन्दसिंह फिर अपने पिता के सामने गए और हाथ जोड़कर बोले, “मैं एक बात और अर्ज किया चाहता हूं।”

वीरेन्द्रसिंह – वह क्या?

आनन्दसिंह – इस रोहतासगढ़ की गद्दी पर मैं बैठाया गया हूं परन्तु मेरी इच्छा है कि बतौर सूबेदार के यहां का राज्य किसी के सुपुर्द कर दिया जाय।

आनन्दसिंह की बात सुन राजा वीरेन्द्रसिंह गौर में पड़ गए और कुछ देर तक सोचने के बाद बोले, “हां, मैं तुम्हारी इस राय को पसन्द करता हूं और इसका बन्दोबस्त तुम्हारे ही ऊपर छोड़ता हूं। तुम जिसे चाहो, इस काम के लिए चुन लो।”

आनन्दसिंह ने झुककर सलाम किया और उन लोगों की तरफ देखा जो वहां मौजूद थे। इस समय सभी के दिल में खुटका पैदा हुआ और सभी इस बात से डरने लगे कि कहीं ऐसा न हो कि यहां का बन्दोबस्त मेरे सुपुर्द किया जाय, क्योंकि उन लोगों में से कोई भी ऐसा न था जो अपने मालिक का साथ छोड़ना पसन्द करता। आखिर आनन्दसिंह ने सोच-समझकर अर्ज किया –

आनन्दसिंह – मैं इस काम के लिए पण्डित जगन्नाथ ज्योतिषी को पसन्द करता हूं।

वीरेन्द्रसिंह – अच्छी बात है, कोई हर्ज नहीं।

ज्योतिषीजी ने बहुत-कुछ उज्र किया, बावेला मचाया, मगर कुछ सुना नहीं गया। उसी दिन से मुद्दत तक रोहतासगढ़ ब्राह्मणों की हुकूमत में रहा और यह हुकूमत हुमायूं के जमाने में 944 हिजरी तक कायम रही। इसके बाद 945 में दगाबाज शेर खां ने (यह दूसरा शेरखां था) रोहतासगढ़ के राजा चिन्तामन ब्राह्मण को धोखा देकर किले पर अपना कब्जा कर लिया।

बयान 13

तहखाने में बैठी हुई कामिनी को जब किसी के आने की आहट मालूम हुई तब वह सीढ़ी की तरफ देखने लगी मगर जब उसे कई आदमियों के पैरों की धमधमाहट मालूम हुई तब वह घबड़ाई। उसका खयाल दुश्मनों की तरफ गया और वह अपने बचाव का ढंग करने लगी।

ऊपर के कमरे से तहखाने में उतरने के लिए जो सीढ़ियां थीं, उनके नीचे एक छोटी कोठरी बनी हुई थी। इसी कोठरी में शेरसिंह का असबाब रहा करता था और इस समय भी उनका असबाब इसी के अन्दर था। इसके अन्दर जाने के लिए एक छोटा-सा दरवाजा था और लोहे का मजबूत मगर हलका पल्ला लगा हुआ था। दरवाजा बन्द करने के लिए बाहर की तरफ कोई जंजीर या कुण्डी न थी, मगर भीतर की तरफ एक अड़ानी लगी हुई थी जो दरवाजा बन्द करने के लिए काफी थी। दरवाजे के पल्ले में एक सूराख था जिस पर गौर करने से मालूम होता था कि वह ताली लगाने की जगह है।

कामिनी ने तुरन्त चिराग बुझा दिया और अपने बिछावन को बगल में दबाकर उसी कोठरी के अन्दर चले जाने के बाद भीतर से दरवाजा बन्द कर लिया। यह काम कामिनी ने बड़ी जल्दी और दबे-पैर किया। थोड़ी ही देर में कामिनी को मालूम हुआ कि आने वाले अब सीढ़ी उतर रहे हैं और साथ ही इसके ताली लगाने वाले छेद में से मशाल की रोशनी भी उस कोठरी के अन्दर पहुंची जिसमें कामिनी छिपी हुई थी। वह छेद में आंख लगाकर देखने लगी कि कौन आया है और क्या करता है।

सिपाहियाना ठाठ के पांच आदमी ढाल-तलवार लगाये हुए दिखाई पड़े। एक के हाथ में मशाल थी और चार आदमी एक सन्दूक को उठाकर लाये थे। जमीन पर सन्दूक रख देने के बाद पांचों आदमी बैठकर दम लेने और आपस में यों बातचीत करने लगे –

मशालची – जहन्नुम में जाय ऐसी नौकरी, दौड़ते-दौड़ते हैरान हो गये, ओफ!

दूसरा – खैर, दौड़ना और हैरान होना भी सुफल होता अगर कोई नेक काम हम लोगों के सुपुर्द होता।

तीसरा – भाई, चाहे जो हो, मगर बेगुनाहों का खून नाहक मुझसे तो नहीं किया जाता!

चौथा – मुश्किल तो यह है कि हम लोग इनकार भी नहीं कर सकते और भाग भी नहीं सकते।

पांचवां – परसों जो हुक्म हुआ है सो तुमने सुना या नहीं!

मशालची – हां, मुझे मालूम है।

तीसरा – मैंने नहीं सुना, क्योंकि मैं नानक का पता लगाने गया था।

पांचवां – परसों यह हुक्म दिया गया है कि जो कोई कामिनी को पकड़ लायेगा या पता लगा देगा उसे मुंहमांगी चीज इनाम में दी जायगी।

तीसरा – हम लोगों की ऐसी किस्मत कहां कि कामिनी हाथ लगे!

दूसरा – (चौंककर) चुप रहो, देखो, किसी की आवाज आ रही है!

किशोरी से बात करते-करते जब किसी के आने की आहट मालूम हुई तो कामिनी चुप हो गई थी। किशोरी को ताज्जुब मालूम हुआ कि यकायक कामिनी चुप क्यों हो गई थोड़ी देर तक राह देखती रही कि शायद अब बोले, मगर जब देर हो गई तो उसने खुद पुकारा और कहा, “क्यों बहिन, चुप क्यों हो गई’ यही आवाज उन पांचों आदमियों ने सुनी थी। उन लोगों ने बातें करना छोड़ दिया और आवाज की तरफ ध्यान लगाया। फिर आवाज आई – “बहिन कामिनी, कुछ कहो तो सही, तुम चुप क्यों हो गईं क्या ऐसे समय में तुमने भी मुझे छोड़ दिया! बात करना भी बुरा मालूम होता है!”

किशोरी की बातें सुनकर पांचों आदमी ताज्जुब में आ गये और उन लोगों को एक प्रकार की खुशी हुई।

एक – उसी किशोरी की आवाज है, मगर वह कामिनी को क्यों पुकार रही है क्या कामिनी उसके पास पहुंच गई?

दूसरा – क्या पागलपन की बातें कर रहे हो कामिनी अगर किशोरी के पास पहुंच जाती तो वह पुकारती क्यों धीरे-धीरे आपस में बात करती या इस तरह उसे लानत देती।

तीसरा – अजी, यह तो वही है, मैं समझता हूं कि कामिनी इस कोठरी में जरूर आई थी।

दूसरा – आई थी तो गई कहां?

चौथा – हम लोगों के आने के पहले ही कहीं चली गई होगी।

दूसरा – (हंसकर) क्या खूब! अजी किशोरी का यह कहना – “क्यों बहिन, चुप क्यों हो गईं!” इस बात को साबित करता है कि वह अभी – अभी इस कोठरी में मौजूद थी।

पांचवां – तुम्हारा कहना ठीक है मगर यहां तो कामिनी की बू तक नहीं आती।

दूसरा – (चारों तरफ देख और उस कोठरी की तरफ इशारा करके) इसी में होगी।

पांचों ही यह कहने लगे कि ‘कामिनी जरूर इसी कोठरी में होगी, हम लोगों के आने की आहट पाकर छिप गई है।’ आखिर सब उस कोठरी के पास गए, एक ने दरवाजे में धक्का मारा और किवाड़ बन्द पाकर कहा, “है – है, जरूर इसी में है!”

कोठरी के अन्दर छिपकर बैठी बेचारी कामिनी सब बातें सुन रही थी और ताली के छेद में से सभी को देख भी रही थी। ऊपर लिखी बातों ने उसका कलेजा दहला दिया, यहां तक कि वह अपनी जिन्दगी से नाउम्मीद हो गई और उसे निश्चय हो गया कि अब ये लोग मुझे गिरफ्तार कर लेंगे।

पांचों आदमी इस फिक्र में लगे कि किस तरह दरवाजा खुले और कामिनी को गिरफ्तार कर लें। एक ने कहा, “दरवाजा तोड़ दो!” दूसरे ने हंसकर जवाब दिया, “शायद यह तुम्हारे किए हो सकेगा।”

उन पांचों ने बहुत कुछ जोर मारा, कामिनी को पुकारा, दिलासा दिया, धमकी दी, जान बचा देने का वादा किया और समझाया मगर कुछ काम न चला। कामिनी बोली तक नहीं। आखिर उनमें से एक ने जो सबसे चालाक और होशियार था कहा, “अगर इस दरवाजे को हम पहले कभी बन्द देखते तो जरूर समझते कि किसी जानकार ने बाहर ताला लगाकर बन्द किया है, मगर अभी थोड़े ही दिन हुए इस कोठरी को मैंने खुला देखा था, इसमें किसी का असबाब पड़ा हुआ था। जो हो यह तो निश्चय हो गया कि कामिनी इस कोठरी के अन्दर घुसकर बैठी है, अब बाबाजी आवें तो इस कोठरी का दरवाला खुले। (कुछ सोचकर) अब तो यही मुनासिब है कि हम लोगों में से एक आदमी जाय और बाकी चार आदमी बारी-बारी से यहां पहरा दें, जिससे कामिनी निकलकर भाग न जाय। आखिर इस कोठरी में कब तक छिपकर बैठी रहेगी या अपनी भूख-प्यास का क्या बन्दोबस्त करेगी’

सभी ने इस राय को पसन्द किया। एक आदमी अपने मालिक को खबर करने चला गया, एक तहखाने में उसी जगह बैठा रहा और तीन आदमी बाहर खंडहर में निकल आए और इधर-उधर टहलने लगे। सबेरा हो गया और पूरब तरफ सूर्य की लालिमा दिखाई देने लगी।

बेचारी कामिनी की जान आफत में फंस गई, देखना चाहिए क्या होता है, मगर उसने निश्चय कर लिया कि भूख और प्यास से चाहे जान निकल जाय, मगर कोठरी के बाहर न निकलूंगी।

उस बेचारी को कोठरी के अन्दर घुसकर बैठे तीन दिन हो गए। भूख और प्यास से उस बेचारी की क्या अवस्था हो गई होगी, यह पाठक स्वयं समझ सकते हैं। लिखने की कोई आवश्यकता नहीं।

हम ऊपर लिख आए हैं कि उन पांचों में से एक आदमी अपने मालिक को खबर करने चला गया और बाकी चार इसलिए रह गए कि बारी-बारी से पहरा दें, जिससे कामिनी निकलकर भाग न जाय।

तीसरे दिन इनमें से तीन आदमी आपस में बातें करते और घूमते-फिरते खंडहर के बाहर निकले और फाटक पर खड़े होकर बातें करने लगे।

एक – इसमें कोई शक नहीं कि हम लोगों का नसीब जाग गया।

दूसरा – नसीब जागा तो हम नहीं कह सकते, हां इतनी बात है कि रकम गहरी हाथ लगेगी।

तीसरा – मुंहमांगा इनाम क्या हम नहीं पा सकते?

दूसरा – नहीं।

तीसरा – सो क्यों?

दूसरा – हम लोग कामिनी को अगर पकड़ ले जाते तो मुंहमांगा इनाम पाते, सो तो हुआ नहीं, कामिनी कोठरी के अन्दर घुस बैठी और हम लोग दरवाजा खोलकर उसे निकाल न सके, लाचार हो बाबाजी को बुलाना पड़ा, ऐसी अवस्था में जो कुछ इनाम मिल जाय वही बहुत है।

पहला – इतना तो कहला भेजा कि हम लोगों ने कामिनी को इस तहखाने में फंसा रखा है।

दूसरा – खैर जो होगा, देखा जायगा, इस समय तो हम लोगों की जीत-ही-जीत मालूम होती है। कामिनी और किशोरी दोनों को ही हमारे मालिक की किस्मत ने इस तहखाने में कैद कर रखा है।

तीसरा – (चौंककर) जरा इधर तो देखो ये लोग कौन हैं, मालूम होता है कि इन लोगों ने हमारी बातें सुन लीं।

खंडहर के बाहर बाएं तरफ कुछ हटकर एक नीम का पेड़ था और उस पेड़ के नीचे एक कुआं था। इस समय दो साधु उस कुएं पर बैठे इन तीनों की बातें सुन रहे थे। जब उन तीनों को यह बात मालूम हुई तो डरे और उन साधुओं के पास जाकर बातचीत करने लगे –

एक आदमी – तुम दोनों यहां क्यों बैठे हो

एक साधु – हमारी खुशी!

एक आदमी – अच्छा, अब हम कहते हैं कि उठो और यहां से चले जाओ।

एक साधु – तू है कौन, जो तेरी बात मानें

एक आदमी – (तलवार खींचकर) यह न जानना कि साधु समझ के छोड़ दूंगा, नाहक गुस्सा मत दिलाओ।

साधु – (हंसकर) वाह रे बन्दर-घुड़की! अबे, क्या तू हम लोगों को साधु समझ रहा है?

इतना सुनते ही तीनों आदमियों ने गौर करके साधुओं को देखा और यकायक यह कहते हुए कि ‘हाय, गजब हो गया, यहां से भागो, यहां से भागो’ वहां से भागे। जहां तक हो सका, उन लोगों ने भागने में कसर न की। दोनों साधुओं ने उन लोगों को रोकना मुनासिब न समझा, और भागने दिया।

अब वे दोनों साधु वहां से उठे, और बातें करते हुए खंडहर के अन्दर घुसे। घूमते-फिरते दालान में पहुंचे और दरवाजा खोलते हुए उस तहखाने में उतर गए जिसमें कामिनी थी। इस तहखाने और दरवाजे का हाल हम ऊपर लिख आए हैं, पुनः लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। हां, इतना जरूर कहेंगे कि रंग-ढंग से मालूम होता था कि ये दोनों साधु तहखाने और उसके रास्ते को बखूबी जानते हैं, नहीं तो ऐसा आदमी, जो दरवाजे का भेद न जानता हो, उस तहखाने में किसी तरह नहीं पहुंच सकता था।

जब दोनों साधु तहखाने में पहुंचे तो वहां एक सिपाही को पाया और सन्दूक पर भी नजर पड़ी। एक मोमबत्ती आले पर जल रही थी। वह सिपाही इन दोनों को देख चौंका, और तलवार खींचकर सामना करने पर मुस्तैद हुआ। एक साधु ने झपटकर उसकी कलाई पकड़ ली, और दूसरे ने उसकी गर्दन में एक ऐसा घूंसा जमाया कि वह चक्कर खाकर गिर पड़ा। उसकी तलवार छीन ली गई और बेहोश कर चादर से जो कमर में लपेटी हुई थी, उसकी मुश्कें बांध दी गईं। इसके बाद दोनों साधु उस सन्दूक की तरफ बढ़े। सन्दूक में ताला लगा हुआ न था, बल्कि एक रस्सी उसके चारों तरफ लपेटी हुई थी। रस्सी खोली गई और उस सन्दूक का पल्ला उठाया गया, एक साधु ने मोमबत्ती हाथ में ली और झांककर सन्दूक के अन्दर देखा, देखते ही “हाय!” कहकर जमीन पर गिर पड़ा। इसके बाद दूसरे ने देखा, और उसकी भी यही अवस्था हुई।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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