सुनीता सिंह

सुनीता सिंह

हमेशा से...शब्द स्वतःस्फूर्त कागजों पर उतरते रहे हैं।जब भी कुछ लिखती हूँ तो एक संकोच... एक अनिश्चय...मन को हमेशा घेरता है "पता नहीं... कैसा लिखा ?" पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रियायें ...कई बार...मन के मेघ उड़ा ले जाती हैं। एक स्त्री जो पत्नी, गृहिणी व माँ की भूमिकाओं में रची-बसी हो मगर किताबों से अपने प्रेम को...अपने प्रथम प्रेम की मानिंद सीने से लगाये रखा हो...हर उस इंसान से नेह कर बैठती हो जो किताबों से प्यार करता है...इतनी गैर-दुनियादार कि इंसान से जुड़ने का और कोई तरीका ही न आता हो। लिखना...कई बार सांस लेने जैसा हो जाता है।मन की इसी अवस्था में ही... अब तक की अधिकांश लेखकीय यात्रा तय की है। इस यात्रा का उद्देश्य... कभी भी बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करना नहीं रहा वरन् एक गहरे आत्मसंतोष की तलाश जरूर रही है।

आपके विचार

avatar
  सब्सक्राइब करें  
सूचित करें
कॉपी नहीं शेयर करें !
%d bloggers like this: