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डोरबेल की सुमधुर संगीत-लहरी भी उमा के चित्त को अशांत होने से रोक न सकी।अभी-अभी तो वह पूजा करने बैठी थी। फिर यह व्यवधान..? !

नौकर उसके सामने शादी का एक कार्ड धर गया। गहरे पीले रंग पर लाल बनारसी काम के बॉर्डर से सजे उस कार्ड को उमा ने उत्सुकता से देखा। एड्रेस वाली जगह पर कलकत्ता लिखा देख वह चौंक पड़ी। लिफाफा खोल कर देखा तो कागज का एक टुकड़ा, उसमें से गिरकर उसके आंचल में आ फंसा।
” दुलहिन ! आना जरूर। सालों पहले…भीड़ भरे आंगन में, एक झलक की भेंट का ही नाता था तुमसे।पर मुझ अभागन के दुख के आभास से ही कभी छटपटा उठी थी तुम। तुमसे मन-प्राण का नाता कैसे न जोड़ूँ! तुम्हें भेजा गया यह निमंत्रण, दुनियादारी का तकाजा नहीं है उमा।
मेरे दुख को देखकर…रोने वाले बहुतेरे थे, सहानुभूति दिखाने वाले थे, रोजमर्रा का कारोबार समझकर पीठ मोड़ने वाले भी थे। लेकिन मेरी आत्मा में धंसे कांटों को अपने आंसुओं से बीनते, लहुलुहान होते …तुम्हीं को देखा। मेरे रेगिस्तान से जीवन में…आकाश में छाये बादल के एक टुकड़े की याद भर हो तुम। राह देखूँगी।”
उमा के आँसू टप-टप करके गिरते रहे, गोदी में रखे कागज के उस पृष्ठ को भिगोते रहे। आँख़ों की उस वर्षा के साथ-साथ…बीते हुए बरस, तेज हवाओं की भांति उसे अतीत में उड़ा ले जाने की कोशिश करने लगे।
जेठ की वो तपती दुपहरिया थी। ससुराल के उस गोबर से पुते, चिकने आंगन में पांव धरते ही जैसे फफोले उठे आ रहे थे। सो उमा…हिचकिचाती सी, कमरे की चौखट तक आकर थम गई। ड्योढ़ी से उठने वाली तेज तेज आवाजें , गर्म लू के थपेड़ों सी उसे अस्त-व्यस्त करने लगीं।
” हमेशा आ नहीं पाते तो क्या अपना हिस्सा भी छोड़ दें?
हमारे माँ-बाऊजी तो निरे मिट्टी के माधो ठहरे। सब कुछ अरज के दूसरों के भोगने के लिए छोड़े बैठे हैं। ऊपर से इन लोगों के तेवर अलग सहो। यह तो होता नहीं कि साल दो साल में जब कोई आए तो ढंग से मांस-मछली ही खिला दें। साफ धुले बिस्तर तक तो मिलते नहीं। मुंह अलग फुला रहता है। ”
तो यह शशि थी ! बड़े चाचा की बेटी…सदा की मुंहफट, बदजुबान।
उमा सुलग उठी। शशि का निशाना कौन है…उसे समझते देर न लगी। बरसों से, उसकी ससुराल के इस संयुक्त परिवार की खेती-बारी का हिसाब-किताब, विशाल पैतृक
घर की देख-रेख, रिश्तेदारी के तमाम न्योता-ब्योहार निभाना, आए-गए की खातिर-संभाल…सभी कुछ का भार, उसकी सास निशब्द अपने कंधों पर ढोती आ रही थीं। कोई शिकायत या विद्वेष की रेखा तक नहीं।
उमा को याद आता है। पास ही शहर में रहने वाले उसके चचेरे जेठ, जब भी गांव आते…उसकी सास हुलस कर कहतीं ” आँखें अंधरा गईं इंतजार करके। यह सूरत देखे कितने दिन हो गए बबुआ! और दुलहिन, बाल-बच्चा… सब कुशल से न? ”
इधर बोलतीं जातीं, उधर खालिस दूध की चाय चूल्हे
पर औंटाती जातीं। चाय थमा, झट उपले सुलगाकर …लिट्टी का आटा गूंथतीं, सत्तू तैयार करतीं। उपलों की बिछी ढेरी पर पकते,तड़कते लिट्टियों की सोंधी सुगंध की तरह …दिल की बातें सुनने-गुनने की खुशबू हवा में तैर उठती। सास की वह दमकती मुखश्री देखकर, उमा सोच में पड़ जाती ” क्या वाकई वह अपने पति के उन्हीं भाई के बेटे को इतना लाड़ कर रही हैं जिन्होंने कभी अपने सहोदर पर ही बंदूक तान दी थी ! ” यह किस्सा उसे सास ने ही सुनाया था। कभी दोनों भाईयों की खेतों के बीच बनी एक मेंड़ को लेकर झगड़ा इतना बढ़ा कि बात खून-खराबे तक पहूँच गई थी। बड़ी मुश्किल से बीच-बचाव किया गया था।
सास, जाऊत के निहोरे किए जा रही थीं ” बबुआ! थोड़ा सा और ले लीजिए न। शहर में यह चीज कहाँ पाएंगे! ”
चचेरे जेठ की आवाज भी तरल हो उठी थी ” ना चाची! नहीं पा सकता। इसी लिए तो मौका पाते दौड़ा चला आता हूँ इस स्वाद के लिए।”
तो क्या अपने शहर के वह प्रतिष्ठित वकील, उमा के अधबूढ़े जेठ…महज उस चिर-परिचित स्वाद की खातिर दौड़े चले आते थे गांव ? स्वाद…हाँ सच ही तो ! मगर जिह्वा का नहीं ,स्मृतियों का। गांव के उस घर में ही तो गड़ा था वह स्मृति कलश जो आज भी…उनके बाबा, आजी, माई,बाबूजी,चाचा, बहनों, भाईयों, भाभियों की यादों से छलकता रहता है। क्रमशः यह विशाल आंगन अब सूना हो चला है। कुछ लोग तो उस अनंत पथ के गामी हुए और कुछ लोग …शहरों और महानगरों में जा बसे हैं। बस, यह वृद्धा चाची बैठी हैं…यादों की अशर्फियों से भरे इस खजाने की रक्षा करती हुईं। अफसर बेटे ने बार-बार साथ
ले जाना चाहा।पर वह न जा सकीं। विह्वल हो उठीं। कहा ” अभी शरीर चलते कहीं नहीं जाऊँगी। यह घर-आंगन छोड़कर कहीं मेरा जी न लगेगा।”
बेटे ने भी माँ का मन समझा। सो उमा की सास , गांव के उस घर में ही बनी रहीं।
इस बार भी, पूरा परिवार… गांव के ही एक पट्टीदार के
बेटे की शादी में शरीक होने एकत्रित हुआ है। विवाह का निमंत्रण, अत्यंत आग्रहपूर्वक भेजा गया था। साथ ही… विदेश में बसे , डॉक्टर वर द्वारा वहीं से अंग्रेज वधू ले आने के समाचार ने, कई अलसाई जिह्वाओं को फन काढ़े कोबरा की तरह सतर्क कर दिया था। अपनी चौकन्नी दृष्टि, शिकार पर टिकाए…आक्रमण की मुद्रा में तैयार कि कोई हरकत हुई कि उसका घातक डंक, शिकार को निष्प्राण कर दे।
शायद इसी से …उन औपचारिक निमंत्रण-पत्रों की अभ्यर्थना में, उमा की ससुराल का वह विशाल आंगन भर उठा था।
परिवार के बुजुर्ग चाचा, ताऊ, ताई, चाचियाँ, बड़े भाई, भाभियाँ, बुआ, बहनें, भतीजे, भतीजियाँ…सभी आन जुटे थे। एक समारोह सा ही हो गया था। बुजुर्ग, दालान पर बैठे संजीदगी से गपशप कर रहे हैं। प्रौढ़ भाई लोग , गांव के अपने हमजोलियों के साथ ताश खेल रहे हैं और ठहाके लगा रहे हैं। औरतें कमरों में फैल कर बैठी हैं और अंतहीन कहानियां बुन रही हैं। बच्चे और नौजवान, उमंग से भरे…शादी वाले घर से लेकर, पूरे गांव का चक्कर लगा रहे हैं, नित नवीन खबरें पहूँचा रहे हैं।
उमा बहुत प्रफुल्लित है। यूँ रिश्ते-नातों की बंदनवार
से सजा …अपना ससुराल का घर , उसकी निगाहों में बड़ा सजीला हो उठा है। बहनों से चुटकियां लेते, भाभियों के रस से भरे बोलों से शरमाते…पति की वह बलैयां लेती नहीं थकती। खुद उसका गृहस्वामिनी वाला भाव, अनजाने ही बहुत मुखर हो उठा है। यूँ तो यह संयुक्त परिवार है पर बरसों से अधिकांश सदस्य प्रवासियों की भूमिका में हैं। सो सभी के आतिथ्य का भार…उमा की सास के कंधों पर आ पड़ा है। वह वृद्धा, इस विशाल भांय-भांय करते निकुंज की चिर निवासिनी जो हैं।
उमा को चक्षुलज्जा है। सास की वय हो आई है।सो अनाड़ी होते हुए भी…उसने इन घरैये अतिथियों के आतिथ्य का सारा सरंजाम अपने हाथों में ले रखा है। कब किसे चाय नहीं मिली, नाश्ते में क्या बनेगा, मटकों का पीने का पानी चुक न जाए, शाम की शरबत के लिए बर्फ आई कि नहीं, सोने के लिए गद्दे कम न पड़ जाएं…ऐसी अनेक चिंताओं में उमा सारे दिन व्यस्त रहती। पर इस नये कर्तव्य-बोध ने उसके चेहरे पर एक अभूतपूर्व सुषमा बिखेर दी है। पति अनुराग से इस सुषमा को एकटक निहारते तो वह लज्जा से लाल हो उठती है।
आज भी…थक कर दोपहरी में वह लेटी ही थी कि एक शोर सा सुनाई दिया। आहट लेने दरवाजे तक आई कि शशि की आवाज …कानों में विष घोलती चली गई। सभी कहते हैं ” उमा तेज मिजाज की है, उसमें सहनशक्ति नहीं है, जरूरत पड़ने पर वह सभी को सुना देती है…”
सच है सब कुछ। पर क्या यही लोग यह नहीं मानते कि उसके मन में कपट नहीं है ! वह इसलिए नहीं सहन करती कि वह गलत भी नहीं करती। वह मुंह पर साफ-साफ सुना देती है क्योंकि पीठ पीछे बातें करने का उसका स्वभाव नहीं है।
उमा का यही स्वभाव…उस दिन शशि के लिए संकट बन बैठा। उमा माथे का पल्लू संभालती, कमरे के द्वार पर जाकर खड़ी हो गई। औरतों के बीच बैठी सास का विवर्ण उदास चेहरा…उसके हृदय में शूल की भांति बिंध गया।
उसने शशि को जलती हुई दृष्टि से देखा। शशि थोड़ा सहमी फिर अवज्ञा से मुंह फेर लिया। आखिर साधारण लड़की नहीं थी वह भी। माँ-बाप की इकलौती बिगड़ैल पुत्री जिसने पति को भृत्य बनाकर , ससुराल का एकछत्र साम्राज्य हासिल किया था…वह भला इस घरनी सी स्त्री से क्यों डरती !
तभी एक कठोर स्वर ने उसे दृष्टि उठाने को मजबूर कर दिया ” शशि ! अभी तुम क्या कह रही थी ?”
उसने बेपरवाही दिखाते हुए अशिष्टता से कहा ” आप नहीं समझेंगी। आप बाहर से आईं हैं न। इस घर के लोग जानते हैं कि मेरे बाऊजी ने इस घर के लिए क्या-क्या किया है ! ”
उमा ने स्थिर गले से कहा ” बाहरी हूँ फिर भी जानती हूँ कि बड़के बाऊजी ने इस घर के लिए बहुत किया है। अब बताओ कि यह एहसान उतारा कैसे जाए ! हम भी इस एहसान का बोझ उठा-उठा कर थक गए हैं। पहले तो चाची सुनाती रहीं। अब तुम लोग शुरू हो गए हो। जिसे सुना रहे हो…उसी के दम से आज पूरा परिवार, इस घर में आराम से बैठा है। यह घर है…होटल नहीं। जब जी चाहा आ गए, स्वादिष्ट खाना खाया, साफ-सुथरे बिस्तर पर सोये और अपने हिस्से की फसल की बिक्री की रकम समेट चलते बने। अब से यह नहीं होगा। सभी लोग अपनी-अपनी खेती करवायें, घर का बंटवारा करके अपने-अपने हिस्से की देखभाल खुद करें। माँ मोह में डूबी यहाँ पड़ी हैं।
विगत की थाती सहेज रही हैं और तुम लोगों को जरा भी लिहाज नहीं ?”
बड़की माँ क्रुद्ध सर्पिणी सी फुंफकार उठीं ” मेरी ब्याही बेटी का ऐसा अपमान ! तुम कल की बहू…”
उमा ने आवेश से कांपते स्वर में कहा ” मान-सम्मान तो सभी का होता है बड़ी माँ। आप भी शायद यह भूल गईं तभी तो अपनी विवाहिता बेटी को भी न सिखा सकीं। ”
बड़की माँ का चेहरा सफेद पड़ गया था। और कई चेहरे थे जो तमतमा उठे थे। उमा ने उनकी परवाह न की और अपनी सास के कंधे थामे… उनके पीछे खड़ी हो गई।
इस घटना के दूसरे दिन, सांझ को… एक रिश्तेदार स्त्री ने एकांत में स्नेह से उसकी हथेलियां थामकर कहा ” उमा ! तुमने बिल्कुल सही बात कही। उस बदतमीज को अच्छा सबक सिखाया। हम तो सारी जिन्दगी सास-ननदों का लिहाज किए रहे। तुम्हें निडर होकर बोलते देख जी जुड़ा गया। ”
उमा संकोच से भर उठी। बोली ” अन्याय बर्दाश्त नहीं होता। बचपन से ही। फिर यहाँ तो मेरी सास के मान-सम्मान का प्रश्न था।”
वह स्त्री गदगद कंठ से बोल उठी ” तुम्हारी सास बहुत भली हैं। पर इसी कारण, लोग उन्हें जीवन भर दबाते रहे हैं। आज तुम उनके लिए जिस तरह से खड़ी हो गई, देखकर मैं निहाल हो गई।”
इस बार उमा ने उसे गौर से देखा। चेहरा कुछ चीन्हा-चीन्हा सा लग रहा है। गुलाबी फूलों वाली सफेद साड़ी, वैधव्य ने यद्यपि चेहरे की आभा मलिन कर दी थी परन्तु निश्चित ही…यह मुखड़ा कभी लाखों में एक रहा होगा। कसी हुई देहयष्टि, लंबा कद।
तभी वह मुस्कुराईं ” क्या देख रही हो दुलहिन ? ”
उमा सम्मोहित सी देखती रह गई। वह मुस्कान कुछ याद दिला गई। उसके विवाह के कुछ दिन बीत चुके हैं। मेहमान अपने-अपने घर लौट रहे हैं। उसके कमरे में कुछ औरतें बैठीं, अपना सूटकेस सहेज रही हैं। उनमें से एक स्त्री, उसकी ओर देखकर मुस्कुरा पड़ी है। स्नेह से कह
रही है ” हमें ठीक से पहचान लो। हम बड़ी जेठानियाँ हैं। फिर पता नहीं कब मुलाकात हो ! ”
उमा ध्यानपूर्वक देख रही है। यह स्त्री अतीव सुंदरी है। इसके मुखड़े से मानों नजर ही नहीं हटती। स्वभाव भी कैसा मीठा सा !
अगले दिन वे लोग चले गए। पर उमा को उस सुंदर चेहरे की याद , कई दिनों तक रही। पति से जिक्र किया तो हँसने लगे ” तुम अभी देख रही हो। सुनंदा भाभी ब्याहकर आई थीं तो पूरे गांव में हंगामा हो गया था। मैं सात-आठ वर्ष का रहा होऊँगा। इनके आस-पास डोलता रहता था कि इन्हें देखता रहूँ। भाई लोग इन्हें “नीतू सिंह” कहकर छेड़ते थे।” उमा तुरंत बोल उठी ” तो और क्या ! हैं ही उसी के जैसी।”
उस मुस्कान का सिरा पकड़ कर वह पहचान गई अपनी उस भूली-बिसरी जेठानी को। पर उस मुस्कान में कौंधती बिजलियाँ… कहीं खो गईं थीं। आँखों के गिर्द स्याह घेरे।
चेहरे के सलोनेपन में …उदासी की स्याही जैसे घुल गई थी।
याद आया। अपने विवाह के सात-आठ वर्षों के पश्चात… एक दिन मंझली ननद का फोन आया था। कुछ उदास सी लगी। पूछने पर बताया कि कलकत्ता वाले शेखर भैया नहीं रहे। सुनकर , शेखर भैया के चेहरे की जगह …इन्हीं सुनंदा भाभी का चेहरा आँखों में तैर उठा।
रात को बड़ी देर तक नींद नहीं आई। करवटें बदलते हुए पति से कहा ” अब भाभी और बच्चों का क्या होगा ? कुछ सहारा तो होना चाहिए न ! कैसे जिएंगी बेचारी !”
पति दिन भर के थके मांदे थे। एक अच्छी नींद की जुगत भिड़ाने में लगे थे। सो बात खत्म करने की गरज से बोले
” अरे भाई ! उनका मायका बड़ा संपन्न और रसूखदार था। वे लोग ऐसे थोड़े ही छोड़ देंगे। संभालेंगे।”
सुनकर थोड़ा संतोष तो जरूर हुआ पर उस रात…आँखों से नींद दूर ही रही थी।
आज वही भाभी सामने खड़ी थीं तो उमा बेसब्र हुई जा रही थी कि कैसे टटोले वह उन गुजरे हुए सालों को ! कैसे तहें उघाड़ी जायें उन रक्त संबंधों की जो उनके आड़े वक्त में सहारा बने होंगे या नजरें फेर ली होंगी !
इसी उधेड़बुन में खड़ी वह अचानक चौंक पड़ी ” भाभी ! चलिए…खाने का समय हो गया।”
उस रात उनके जीवन की बंद किताब के जो पन्ने…वह पलट नहीं पाई थी, अगली दोपहर को वही पन्ने… अपने पल्लू की गांठ से बांधे , सुनंदा भाभी, उमा के कमरे में आ पहूँचीं। वह धधकती दुपहरिया, उनके दुखों, संघर्षों की गाथा की साक्षी बनी…उमा कीआँखो में उतर आई थी। तभी तो….गर्म आँसुओं की धारा उसके सीने को भिगोती रही और सुनंदा भाभी के विगत जीवन का, बरसों का संचित लावा…बहता रहा उनके शब्दों मे।
” पंदरह वर्ष की थी जब ब्याह कर आई थी। पति,जेठ… सभी कलकत्ते में नौकरी करते थे। संपन्न मायका था। पाँच भाईयों की इकलौती दुलारी बहन। कभी घर-गृहस्थी के काम नहीं किए थे। लाड़-दुलार में ही बचपन बीता। अभी कैशोर्य ने दस्तक ही दी थी कि लग्न की हल्दी मली काया पर विवाह की चुनरी डाल दी गई। जब एक कच्चे, नासमझ शरीर को कुछ रस्मों में बांध कर…उसे एक सर्वथा नए जीवन में ढकेल दिया जाता है तो उसकी उंगली थामे भला मन कैसे पीछे-पीछे आ सकता है! वह तो वहीं पीछे उलझा रह जाता है…माँ की देहगंध में, पिता की पुकार में, भाईयों की स्नेहपगी चुटकियों में…और तो और आंगन के अमरूद की शाखों में, दीवारों पर सजी तस्वीरों में। नतीजा …। सास की फटकार, ननद के ताने। आँखें रोते रहने से हमेशा लाल रहतीं। हर समय यही खयाल आता कि किसी तरह से इस कैद से छूट कर भाग जाऊँ।
वह तो बहुत बाद में जाना कि इस कैद से रिहाई संभव नहीं… इस जनम में तो नहीं।
पति साल-छः महीने पर घर आते। मैं रो-रो कर उनका कुरता भिगो देती। समझ में ही नहीं आता था कि उन्हें प्यार करूँ या रोऊँ। भले आदमी थे पर विवश थे। घरवालों का विरोध नहीं कर सकते थे। वो दिन ही कुछ और थे। हाँ…जब तक रहते, मेरे घावों पर मरहम लगाते। इतना प्यार देते कि उनके जाने के बाद मेरी हिचकियाँ बंध जातीं। सास-ननदें, जिठानियाँ …मेरी बेशर्मी पर छाती कूटतीं, नये-नये वार करतीं।
मेरी जिंदगी नर्क से भी बदतर थी। पर मैं यह दुख किसी से बाँट नहीं सकती थी। मायके से साफ संदेश था ” अगर कभी ससुराल से शिकायत आई तो कभी भी मायके का मुंह नहीं देख सकोगी। ”
उमा सिहर उठी। उसकी आँखों के सामने, अपनी किशोरी पुत्री का भोला मुखड़ा कौंध उठा। क्या कोई एक दिन ऐसा आएगा जब वह भी…अपने कलेजे के टुकड़े के हर सुख-दुख से मुंह मोड़ लेगी ? ईश्वर न करे…किसी दिन उसका जीवन आकाश, दुखोंसे मेघाच्छन्न हो उठे तो वह निष्ठुर की नाईं…देखती रहेगी ?
हे ईश्वर ! यह कौन से देश काल की घटना है ! इस भयंकर घटना की परिधि में कौन-कौन सी औरतें आती हैं ! सुनंदा भाभी, उमा,उसकी बेटी…। नहीं, ये चेहरे तो जाने-पहचाने हैं। कई अनजाने चेहरे भी हैं जो कतार में खड़े प्रतीक्षा कर रहे हैं ” हमारी कहानी कब कही जाएगी ? ”
उमा की अंतड़ियों में मरोड़ सी उठ रही है। भाभी की व्यथा-कथा जारी है।
” सतरह साल की थी जब बच्चा पेट में आया। इतनी नासमझ थी कि अपने शरीर में आए बदलावों को समझ ही नहीं पाई। घर-गृहस्थी के मोटे, भारी काम करती रही। शरीर की अवस्था के हिसाब से पोषण तो दूर, साधारण ताजा खाना भी नसीब नहीं होता था। अच्छा भला खाता-पीता घर था।लेकिन यह अभाव…घर की स्त्रियों के द्वेष का परिणाम था ।
नतीजा यह हुआ कि मेरे पेट में भीषण दर्द रहने लगा। सास ने मुंह बिचका कर कहा ” राजरानी के नखरे हैं। हमने तो बच्चे जने ही नहीं ! ”
दूर के रिश्ते की एक ननद आई हुईं थीं। संपन्न घर में ब्याही थीं, सो ठसके वाली थीं। उन्होंने मेरे स्याह चेहरे और पीड़ा से भींचे होंठों की मूक भाषा पढ़ी। करूणा से आर्द्र हो …मुझे पास के शहर में डॉक्टर के पास ले जाने का साहस किया। डॉक्टर हतप्रभ हो उठी। कहा ” इस बच्ची का जान बड़ी सस्ती है शायद आप लोगों के लिए। बच्चा तो पेट में मर ही चुका है।आपलोग इसके मरने की प्रतीक्षा कर लीजिए।”
पर आखिर में उसी डॉक्टर ने जीवनदान दिया। मैं जी गई। खुश थी। जिस जीवन का कोई मोल नहीं था, उसे ही वापस पा कर खुश थी। कारण ? वही सतरह बरस की उमर… जो हठ किए बैठी थी कि कभी तो , मेरी अभिलाषाओं का…वह चित्रखचित जीवन होगा।नादान उम्र… आशाओं की डोर, छूटने देना ही न चाहती थी।
इस बार पति आए तो मैंने हठ ठान ली ” मुझे अपने साथ कलकत्ता ले चलो।”
पति भय से मूर्छित से हो गए। बहुत समझाया पर मैंने अन्न-जल छोड़ दिया। सास-ननदें लानतें बरसाती रहीं पर मैं टस से मस न हुई। अंततः तय हुआ कि मुझे मायके छोड़ आया जाए…मेरा दिमाग सही होने तक। मुझे तो शाप के रूप में वरदान मिला।
मायके की देहरी पर पांव धरते समय एकबारगी दिल जरूर कांपा था कि न जाने ससुराल से इस निर्वासन का
कौन सा दंड…अपने मायके में भुगतना पड़े !
इलाके के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार की कन्या… यूँ मायके वापस भेज दी जाए, कोई साधारण घटना तो न थी।
पर अपनी दुहिता के मातृत्व का पहला अंकुर नष्ट होने का दुख हृदयंगम कर चुकी मेरी माँ…मुझे सामने देखकर बुक्का फाड़कर रो पड़ीं। बचपन में कभी मेरी गुड़िया टूट जाती थी तो रो-रो कर आँखें सुजा लेती थी। यहाँ तो
अपने ही रक्त-मांस से पली, कच्ची मूरत थी जो पल भर में बिखर गई थी।
माता के रूदन ने मेरे अपराध को भुला दिया। कई दिनों तक पिता, भाईयों की करूण दृष्टि… मेरे दग्ध चित्त को शीतल जल की फुहार सी भिगोती रही।
दो बरस बीत गए। ससुराल वालों की जिद , अब मेरे मायके की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी। पिता, भाई गर्जना करते ” जाएगी तो कलकत्ते, नहीं तो हम खिला सकते हैं जिन्दगी भर उसे।”
इस शंखनाद से इतर…एक सहृदय छवि की याद, पके फोड़े सी टीस उठती। उंह…उसने भी तो मेरी बात न पूछी।
पर एक दिन मेरा यही अभिमान, छलछल करती प्रेम की रागिनी में बदल गया जब पति मुझे कलकत्ते ले जाने आ पहूँचे। विरह के वे तमाम दिन-रात…हमारे प्रेमपूर्ण आलिंगन में कसमसा उठे। वो सारी अनकही शिकायतें… हमारे आँसुओं की धार में धुल गईं। हम बीती को बिसार कर, एक नये सफर में आगे बढ़ चले।
कई साल निकल गए। हमारा साथ , एक सुखद सपने की तरह था और हम मानों नींद से जागना ही न चाहते थे। पर होनी ने बहुत ही क्रूर तरीके से जगाया। पति को लीवर कैंसर डिटेक्ट हुआ।
फिर तो बाद के कई साल जिन्दगी जैसे…घुप्प अंधेरे गलियारों में चक्कर काटती रही, रौशनी की तलाश में।
बैंक का फिक्स्ड डिपॉजिट टूटा, जेवर बिके, बच्चे कॉन्वेंट से सरकारी स्कूलों में आ गए पर ससुराल वाले , बेखबर रहे। अकेली घर, बच्चे संभालती…हॉस्पिटल के चक्कर काटती, पैसों के इंतजाम की जुगत में दर-दर भटकती।
एक दिन पति रो पड़े। कहा ” मैं तो बचूँगा नहीं। तुम मेरे इलाज पर इतने पैसे खर्च किए दे रही हो। आखिर को तुम्हारा और बच्चों का सहारा क्या बचेगा ?”
मैं उनपर झपट पड़ी ” क्या समझ रखा है मुझे ? पत्नी हूँ तुम्हारी। जान रहते तुम्हारा इलाज न रूकने दूँगी। यह शरीर भी बेच देना पड़े तो न हिचकूँगी।”
उत्तर में कई धार आँसू…उनके गालों से आ आकर बुश्शर्ट को भिगोते रहे।
जिस दिन वे गए…हॉस्पिटल के कक्ष में फर्श पर पड़ी मैं विलाप कर रही थी। एक मारवाड़ी महिला से नहीं देखा गया। पास आकर ढांढ़स बंधाया और पूछा ” किसी को फोन करना है? ”
उस दुख की घड़ी में जो नाम, बिना किसी दुविधा के, होंठों पर आया था…आज तक उसने मायूस नहीं किया। तब मेरा भतीजा अखिल, उच्च पदस्थ अधिकारी था। कलकत्ते में ही था। फोन सुनकर दौड़ा आया था। पनियाली आँखों से देखते हुए, इतना ही कहा ” बुआ ! कुछ वर्षों की बात है। दोनों लड़के अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे। तब तक इस परिवार की जिम्मेदारी , मैं लेता हूँ। रही बात आपकी बेटी की तो वह आज से मेरी बेटी हुई। बस जो कहा, उसका भरोसा रखना।”
सुनंदा भाभी का चेहरा, संतोष से उज्जवल हो रहा था ” दोनों बेटे सरकारी नौकरियों में अफसर हैं। बेटी बी. एच. यू. में, मेडिकल के आखिरी वर्ष में है। अखिल ने उसके लिए एक मेधावी डॉक्टर लड़के को देख रखा है। पढ़ाई खत्म होते ही, ब्याह होना तय है।”
उमा के हलक में कांटे से उग आए हैं ” भाभी ! यह अखिल, अपना पिछले जन्म का कोई कर्ज उतार रहा होगा न !”
भाभी उदास सी हँसीं ” उतार रहा है या अगले जन्म के लिए चढ़ा रहा है…कैसे कहूँ ? पर इतना जरूर जिन्दगी ने सिखाया है कि तकलीफ़ की घड़ी में इंसान के साथ खड़े हो जाओ न तो कई जिन्दगियां संभल जाती हैं। पर जिन्दगी जीने का यह सलीका…कितनों को आता है ! ”
सामने जलती अगरबत्ती की गर्म राख जब बेखयाली में…उमा की कोहनी पर गिरी तो वह वर्तमान में लौटी।
” वसुधा वेड्स सारंग ” छपा वह कार्ड निहारती उमा स्वगत कह उठी ” आऊँगी भाभी। अखिल की बेटी के विवाह में आना ही पड़ेगा। जिन्दगी जीने का जो सलीका, अखिल के पास है…उसकी कदर अपनी नम आँखों में समेटे…अखिल को दूर से निहार लूँगी, बस। उसके करीब खड़े होने की सामर्थ्य नहीं मुझमें। कैसा बौना सा तो लगेगा न ?!”

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सुनीता सिंह

सुनीता सिंह

समकालीन कथा लेखन में सुनीता सिंह एक अलग तेवर लेकर आती हैं। हमारे आसपास बिखरी कहानियों को उनका अनूठा शिल्प एक अनदेखे उजास से दमका देता है। पहला संग्रह 'बंधन तोड़ो ना' के नाम से प्रकाशित।  
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