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संवत् 1375 से लेकर संवत् 1700 तक के काल को भक्ति काल कहा जाता है। भारतीय इतिहास में पहली बार समस्त देश की चेतना इस काल में भक्ति भाव धारा से अनुप्राणित हो उठी।

ग्रियर्सन ने कहा है —

‘हम अपने को ऐसे धार्मिक आंदोलन के सामने पाते हैं, जो उन सब आंदोलनों से कही अधिक विशाल है, जिन्हें भारतवर्ष ने कभी देखा है, यहां तक कि बौद्ध धर्म के आंदोलन से भी अधिक विशाल है, क्योंकि इसका प्रभाव आज भी वर्तमान हैं।’

भक्ति काव्य का आरंभ

 

भक्ति आंदोलन इतने जोर शोर से कैसे आरंभ हुआ और इसके पीछे कौन से कारण थे इस संबंध में कोई एक राय नहीं है। अपने अनिश्चय को व्यक्त करते हुए स्वयं ग्रियर्सन ने लिखा है–

‘बिजली की चमक के समान अचानक इन समस्त पुराने धार्मिक मतों के अंधकार के ऊपर एक नयी बात दिखाई दी। कोई हिन्दू नहीं जानता कि यह बात कहां से आई और कोई भी इसके प्रादुर्भाव का कारण निश्चय नहीं कर सकता।’

ग्रियर्सन अनुमान से उसे ईसाइयत की देन मानते हैं। दूसरी-तीसरी शताब्दी में कुछ ईसाई मद्रास में आकर बस गए थे। कालान्तर में उनके या उनके वंशजों के प्रभाव से दक्षिण में एक ऐसा भक्ति आंदोलन उठा जो देखते-ही-देखते देश भर में फैल गया। यह मानना हास्यास्पद लगता है।

इतिहासकार ताराचंद के मतानुसार, ‘भक्ति काव्य इस्लाम के प्रारंभिक काल में ही पश्चिमी समुद्र तट पर आ बसे अरबों की देन है।’  यह मत भी ग्रियर्सन के मत की तरह ही अप्रामाणिक है। तीसरा मत रामचन्द्र शुक्ल का है।

रामचन्द्र शुक्ल के विचार

उनके अनुसार —

‘देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए बहुत अवकाश नहीं रह गया। उनके सामने ही देव मंदिर गिराये जाते थे, देव मूर्तियां तोड़ी जाती थी और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे।

ऐसा दशा में अपनी वीरता के गीत न वे गा ही सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन ही सकते थे। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?’

शुक्ल जी हिन्दुओं के पराभव को भक्ति के अभ्युदय का एक कारण मानते हैं। उनके लिहाज से हिन्दुओं की सम्मानपूर्वक जीने की लालसा ने ही उन्हें भक्ति से जोड़ा। शुक्ल जी फिर कहते हैं —

‘भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला।’

शुक्लजी एक ओर भक्ति आंदोलन को मुसलमानी आक्रमण से जोड़ते हैं, तो दूसरी ओर भक्ति की दीर्घकालीन परंपरा से।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी शुक्ल जी से असहमत हैं। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मत की प्रतिक्रिया में ही अपने मत का निर्धारण किया है —

‘जब मुसलमान हिंदुओं पर अत्याचार करने लगे तो निराश होकर हिन्दू लोग भगवान का भजन करने लगे। यह अत्यंत उपहासास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मंदिर तोड़ रहे थे, तो उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की।

मुसलमानों के अत्याचार के कारण यदि भक्ति की धारा को उमड़ना ही था तो पहले उसे सिंध में और फिर उत्तर भारत में प्रकट होना चाहिए था, पर हुई वह दक्षिण में।’

द्विवेदी जी ने यह भी लिखा है कि भक्ति अचानक बिजली की चमक के समान नहीं फैली बल्कि उसके लिए पहले से मेघ खण्ड एकत्र हो रहे थे तथा यदि मुसलमान न भी आये होते तो भक्ति का स्वरूप सोलह आने में बारह आना वैसा ही रहता।

शुक्लजी और द्विवेदी जी के विचारों की समीक्षा

वामपंथी आलोचक द्विवेदी जी के उपर्युक्त उद्धरण के आधार पर उन्हें प्रगतिशील और शुक्लजी को हिन्दूवादी सिद्ध करते रहे हैं। किंतु, किसी ने यह गौर नहीं किया कि जिस बात को द्विवेदी  जी ने उपहासास्पद कहा है, वह बात शुक्ल जी ने लिखी भी है या नहीं। शुक्ल जी ने एक ही समय में उत्तर भारत में मंदिर तोड़े जाने और दक्षिण भारत में भक्तों द्वारा शरणागति की प्रार्थना करने का उल्लेख कहीं नहीं किया है।

दूसरी बात, शुक्लजी के कथन से कहीं सिद्ध नहीं होता कि भक्ति काव्य मुसलमानी आक्रमण की प्रतिक्रिया मात्रा है। अपने विवेचन में उन्होंने प्रतिक्रिया शब्द का तो कहीं प्रयोग भी नहीं किया है। वे सिर्फ इतना मानते हैं कि मुसलमानों के आक्रमण के कारण राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में जो बदलाव आया, उसने पहले से हो रहे भक्ति के प्रसार को व्यापक और द्रुत बना दिया।

दरअसल, भक्ति आंदोलन के उद्भव के कारणों की छानबीन के संबंध में आचार्य शुक्ल के विचार आचार्य द्विवेदी के विचार से बहुत भिन्न नहीं हैं। यदि थोड़ी भिन्नता है भी तो इस अर्थ में कि जहां आचार्य द्विवेदी भक्ति और भक्ति काव्य के मूल में लोक धर्म को देखते हैं, जिसे वे तंत्रों, आगमों, बौद्ध मत के परवर्ती रूपों, नाथों-सिद्धों की अंतर्धारा से उपजा मानते हैं, आचार्य शुक्ल उसे मूलतः वैष्णव भक्ति की विकसित अभिव्यक्ति मानते हैं।

समानता की दृष्टि से देखें तो आचार्य शुक्ल भक्ति के विकास में इस्लाम को त्वरित करने वाला कारक मानते हैं। द्विवेदी जी भी बारह आने की बात करते हुए चार आना श्रेय तो प्रकारान्तर से इस्लाम को दे ही डालते हैं।

भक्ति काव्य : परंपरा और प्रभाव

भक्ति काव्य गहरे आत्मविश्वास की उपज है। ‘संतन को कहा सीकरी सो काम’ या ‘अब का तुलसी होहिंगे नर के मनसबदार’ जैसी पंक्तियाँ इसे सत्यापित करती हैं। इसलिए भक्ति काव्य को हताशा की उपज कहना कहीं से भी उचित नहीं है। खोजने पर भी भक्ति काव्य में हताशा के संकेत नहीं मिलते। कृष्णोपासना का प्रचार मुसलमानों के आगमन के बहुत पहले आलवार भक्त कर चुके थे। 12वीं शताब्दी के ही जयदेव बंगाल में कृष्णलीला के गीत गा रहे थे। हिन्दी कृष्ण-काव्य भी सांस्कृतिक सौहार्द का ही संदेश देता है, पराभव की प्रतिक्रिया में हताशा या घृणा का नहीं।

संत काव्य धारा की प्रवृत्तियाँ तो पहले से ही नाथपंथियों एवं सिद्धों की रचनाओं में मिल रही थी। लिहाजा आचार्य शुक्ल की इस मान्यता से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि भक्ति काव्य एक हताश जाति की रचना है, पर जब वे हिन्दू-मुसलमान दोनों के लिए सामान्य मति मार्ग के विकास की बात करते हैं तो मानना चाहिए कि उनका यह प्रयत्न भक्ति काव्य की सांस्कृतिक चेतना को ठीक-ठीक पहचानने का ही परिणाम है।

अधिकांश विद्वानों के अनुसार जिस भक्ति आंदोलन की शुरूआत दक्षिण में हुई, उसके पुरस्कर्ता आलवार भक्त कहे जाते हैं। चौथी शताब्दी से 9वीं शताब्दी तक मुख्य बारह आलवारों की परंपरा चली। आलवारों में एक स्त्री संत ‘अंदाल’ भी थी। यह आश्चर्य है कि जिस समय शंकराचार्य अद्वैत का प्रचार कर रहे थे, लगभग उसी समय आलवार आचार्य भक्ति का प्रचार कर रहे थे।

आलवार संतों की भावनामय भक्ति में शास्त्रों की उपेक्षा हुई। शास्त्रानुमोदित भक्ति वैयक्तिक उपासना पर जोर देती है। आलवारों ने अपनी भक्ति को जनसमुदाय से जोड़ा था और कर्मकांड की अनिवार्यता को शिथिल किया था। वैष्णव भावना के विकास में आलवार संतों का प्रमुख प्रदेय यह है कि उन्होंने अपने आराध्य को सीधे संबोधित किया, कोई माध्यम स्वीकार नहीं किया।

दूसरी बात,अपनी प्रार्थनाएं उन्होंने देशभाषा में ही प्रस्तुत की, संस्कृत को नहीं अपनाया। इससे उनके सबल आत्मविश्वास का पता चलता है। आगे चलकर आलवारों की भक्ति को शास्त्र की व्यवस्था में रामानुजाचार्य बांधते हैं। भावना के साथ विचार का, लोक के साथ शास्त्र का यह मेल-जोल था।

शंकराचार्य और अद्वैतवाद की भूमिका

भक्ति आंदोलन के सूत्रपात में शंकराचार्य की देन की विस्मृत नहीं किया जा सकता क्योंकि वैदिक ग्रंथों के मूल्यांकन के सिलसिले में उन्होंने अद्वैतवाद की जो प्रतिष्ठा की और ‘माया’ के प्रति जो निषेधात्मक दृष्टिकोण अपनाया, उसका विरोध करने के लिए जैसे समस्त भक्ति आंदोलन उठ खड़ा हुआ।

शंकराचार्य के ‘दर्शन’ ने ही भक्ति आंदोलन के सभी आचार्यों रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, निम्बार्क, बल्लभाचार्य को उत्तेजित किया था। उनकी वेदांती व्याख्याओं की प्रतिक्रिया में ही इन आचार्यों के दार्शनिक संप्रदाय अस्तित्व में आये तथा भक्ति आंदोलन को एक राष्ट्रव्यापी वैचारिक भूमि मिली।

राष्ट्रव्यापी स्वरूप

भक्ति काव्य भी इसी वैचारिक भूमि पर भावना का उद्रेक है। यह समस्त देश की चेतना को झकझोर कर रख देता है। दक्षिण में आलवार, उत्कल में पंचसखा (बलरामदास, अनंतदास, यशोवंत दास, जगन्नाथ दास, अच्युतांनद दास), असम में शंकरदेव, महाराष्ट्र का बारकरी संप्रदाय (ज्ञानेश्वर, नानदेव, एकनाथ, तुकाराम आदि) बंगाल में चैतन्य एवं मध्य भारत में रामानंद, बल्लभाचार्य आदि प्रमाणित करते हैं कि भक्ति आंदोलन का स्वरूप देशव्यापी रहा है। यह सही में एक सांस्कृतिक आंदोलन था।

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