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पहला बयान

वे दोनों साधु, जो सन्दूक के अन्दर झांक न मालूम क्या देखकर बेहोश हो गए थे, थोड़ी देर बाद होश में आए और चीख-चीखकर रोने लगे। एक ने कहा, “हाय-हाय इन्द्रजीतसिंह, तुम्हें क्या हो गया! तुमने तो किसी के साथ बुराई न की थी, फिर किस कम्बख्त ने तुम्हारे साथ बदी की प्यारे कुमार, तुमने बड़ा बुरा धोखा दिया, हम लोगों को छोड़कर चले गए, क्या दोस्ती का हक इसी तरह अदा करते हैं हाय, अब हम लोग जीकर क्या करेंगे, अपना काला मुंह लेकर कहां जाएंगे हमको अपने भाई से बढ़कर मानने वाला अब दुनिया में कौन रह गया! तुम हमें किसके सुपुर्द करके चले गये’

दूसरा बोला – “प्यारे कुमार, कुछ तो बोलो! जरा अपने दुश्मनों का नाम तो बताओ, कुछ कहो तो सही कि किस बेईमान ने तुम्हें मारकर इस सन्दूक में डाल दिया हाय, अब हम तुम्हारी मां बेचारी चंद्रकांता के पास कौन मुंह लेकर जायेंगे किस मुंह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे होनहार लड़के को किसी ने मार डाला! नहीं-नहीं, ऐसा न होगा, हम लोग जीतेजी अब लौटकर घर न जायंगे, इसी जगह जान दे देंगे। नहीं-नहीं, अभी तो हमें उससे बदला लेना है जिसने हमारा सर्वनाश कर डाला। प्यारे कुमार, जरा तो मुंह से बोलो, जरा आंखें खोलकर देखो तो सही, तुम्हारे पास कौन खड़ा रो रहा है। क्या तुम हमें भूल गए हाय, यह यकायक कहां से गजब आकर टूट पड़ा!”

अब तो पाठक समझ गए होंगे कि इस सन्दूक में कुंअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और ये दोनों साधु उनके दोस्त भैरोसिंह और तारासिंह थे। इन दोनों के रोने से कामिनी असल बात समझ गई, वह झट कोठरी के बाहर निकल आई और मोमबत्ती की रोशनी में कुमार की लाश देख जोर-जोर से रोने लगी। किशोरी इस तहखाने के बगल वाली कोठरी में थी। उसने जो कुंअर इन्द्रजीतसिंह का नाम ले-लेकर रोने की आवाज सुनी तो उसकी अजब हालत हो गई। उसका पका हुआ दिल इस लायक न था कि इतनी ठेस सम्हाल सके, बस एक दफे ‘हाय’ की आवाज तो उसके मुंह से निकली मगर फिर तन-बदन की सुध न रही। वह ऐसी जगह न थी कि कोई उसके पास जाय या उसे सम्हाले और देखे कि उसकी क्या हालत है।

भैरोसिंह और तारासिंह ने जो कामिनी को देखा, तो वह लोग फूट-फूटकर रोने लगे। तहखाने में हाहाकर मच गया। घण्टे भर यही हालत रही। जब कामिनी ने रोकर यह कहा कि ‘इसी बगल वाली कोठरी में बेचारी किशोरी भी है, हाय, हम लोगों का रोना सुनकर उस बेचारी की क्या अवस्था हुई होगी।’ तब भैरोसिंह और तारासिंह चुप हुए और कामिनी का मुंह देखने लगे।

भैरोसिह – तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि यहां किशोरी भी है?

कामिनी – मैं उससे बातें कर चुकी हूं।

तारासिंह – क्या तुम बड़ी देर से इस तहखाने में हो?

कामिनी – देर क्या, मैं तो कई दिनों से भूखी-प्यासी इस तहखाने में कैद हूं। (उस आदमी की तरफ इशारा करके) यह मेरा पहरा देता था।

भैरोसिंह – खैर, जो होना था सो हो गया। अब हम लोग अगर रोने-धोने में लगे रहेंगे, तो इनके दुश्मन का पता न लगा सकेंगे और न उससे बदला ही ले सकेंगे। यों तो जन्म भर रोना ही है परन्तु जब इनके दुश्मन से बदला ले लेंगे तो कलेजे में कुछ ठण्डक पड़ेगी। तुम यहां कैसे आईं और इन दुष्टों के हाथ क्योंकर फंसीं, खुलासा कहो तो शायद कुछ पता लगे।

कामिनी ने अपना खुलासा हाल कहा और इसके बाद पूछा, “तुम दोनों का आना कैसे हुआ’

भैरोसिंह – कमला ने इस तहखाने का पता देकर हम लोगों को यहां भेजा है। थोड़ी ही देर में राजा वीरेन्द्रसिंह और कुंअर आनन्दसिंह भी बहुत से आदमियों को साथ लिए आना ही चाहते हैं, कमला भी उनके साथ होगी, हम लोग कुंअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए किसी दूसरी जगह जाने वाले थे, मगर हाय, यह क्या खबर थी कि रास्ते में ही हम लोगों पर यह पहाड़ टूट पड़ेगा। हाय, जब महाराज यहां आयेंगे तो हम किस मुंह से कहेंगे कि तुम्हारे प्यारे लड़के की लाश इस तहखाने में पाई गई।

इसके बाद भैरोसिंह ने इस तहखाने में आने का बाकी हाल कहा तथा यह भी बताया कि “जब खंडहर के बाहर कुएं पर हम दोनों आदमी बैठे थे, तभी तीन आदमियों की बातचीत से मालूम हो गया कि तुमको उन लोगों ने कैद कर लिया है। परन्तु यह आशा न थी कि हम तुम्हें इस अवस्था में देखेंगे। उन लोगों ने मुझे देखा तो पहचानकर डरे और भाग गये, मगर मुझे यह न मालूम हुआ कि वे लोग कौन हैं और उन्होंने मुझे कैसे पहचाना’

कामिनी – (हाथ का इशारा करके) उन्हीं लोगों में से एक यह भी है जिसे तुमने बांध रखा है।

भैरोसिंह – (उस आदमी से) बता, तू कौन है?

आदमी – बताने को तो मैं सब-कुछ बता सकता हूं, परन्तु मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

भैरोसिंह – क्या तुझे अपने मालिक का डर है?

आदमी – जी हां।

भैरोसिंह – मैं वादा करता हूं कि तेरी जान बचाऊंगा, और तुझे बहुत-कुछ इनाम भी दिलाऊंगा।

आदमी – इस वादे से मेरी तबीयत नहीं भरती। क्योंकि मुझे तो आप लोगों के ही बचने की उम्मीद नहीं। हाय, क्या आफत में जान फंसी है। अगर कुछ कहें तो मालिक के हाथ से मारे जायं और न कहें तो इन लोगों के हाथ से दुःख भोगें!

भैरोसिंह – तेरी बातों से मालूम होता है कि तेरा मालिक बहुत जल्द ही यहां आना चाहता है?

आदमी – बेशक ऐसा ही है।

यह सुनते ही भैरोसिंह ने तारासिंह के कान में कुछ कहा और उनका ऐयारी का बटुआ लेकर अपना बटुआ उन्हें दे दिया जिसे ले वे तुरन्त वहां से रवाना हुए और तहखाने के बाहर निकल गए। तारासिंह ने जल्दी-जल्दी खंडहर के बाहर होकर उस कुएं में से एक लुटिया पानी खींचा और बटुए में से कोई चीज निकालकर पत्थर पर रगड़ जल में घोलकर पी ली। फिर एक लुटिया जल निकालकर वही चीज पत्थर पर घिस पानी में मिलाई और बहुत जल्द तहखाने में पहुंचे। जल की लुटिया भैरोसिंह के हाथ में दी, भैरोसिंह ने बटुए से कुछ खाने की चीज निकाली और कामिनी से कहा, “इसे खाकर तुम यह जल पी लो।”

कामिनी – भला खाने और जल पीने का यह कौन-सा मौका है यद्यपि मैं कई दिनों से भूखी हूं, परन्तु क्या कुमार की लाश के सिरहाने बैठकर मैं खा सकूंगी, क्या यह अन्न मेरे गले के नीचे उतरेगा?

भैरोसिह – हाय! इस बात का मैं कुछ भी जवाब नहीं दे सकता। खैर, इस पानी में से थोड़ा तुम्हें पीना ही पड़ेगा। अगर इससे इन्कार करोगी तो हम सब लोग मारे जायंगे। (धीरे से कुछ कहकर) बस, देर न करो।

कामिनी – अगर ऐसा है तो मैं इन्कार नहीं कर सकती।

भैरोसिंह ने उस लुटिया में से आधा जल कामिनी को पिलाया और आधा आप पीकर लुटिया तारासिंह के हवाले की। तारासिंह तुरन्त तहखाने में से बाहर निकल आए और जहां तक जल्द हो सका, इधर-उधर से सूखी हुई लकड़ियां और कण्डे बटोरकर खंडहर के बीच में एक जगह रखा, तब बटुए में से चकमक पत्थर निकाला और उसमें से आग झाड़कर गोठों और लकड़ियों को सुलगाया।

तारासिंह यह सब काम बड़ी फुर्ती से कर रहे थे और घड़ी-घड़ी में खंडहर के बाहर मैदान की तरफ देखते भी जाते थे। आग सुलगाने के बाद जब तारासिंह ने मैदान की तरफ देखा तो बहुत दूर पर गर्द उड़ती हुई दिखाई दी। वह अपने काम में फिर जल्दी करने लगे। बटुए में से एक शीशी निकाली जिसमें किसी प्रकार का तेल था, वह तेल आग में डाल दिया, आग पर दो- तीन दफे पानी का छींटा दिया, फिर मैदान की तरफ देखा। मालूम हुआ कि दस-पन्द्रह आदमी घोड़ों पर सवार बड़ी तेजी से इसी तरफ आ रहे हैं। उस समय तारासिंह के मुंह से यकायक निकल पड़ा – “ओफ, अगर जरा भी देर होती तो काम बिगड़ ही चुका था, खैर, अब ये लोग कहां जा सकते हैं!”

आग में से बहुत ज्यादे धुआं निकला और खंडहर भर में फैल गया। इसके बाद तारासिंह खंडहर के बाहर निकले और कुएं के पास जाकर नीम के पेड़ पर चढ़ गए तथा अपने को घने पत्तों की आड़ में छिपा लिया। वह पेड़ इतना ऊंचा था कि उस पर से खंडहर के भीतर का मैदान साफ नजर पड़ता था। वे सवार, जिन्हें तारासिंह ने दूर से देखा था, अब खंडहर के पास आ पहुंचे, तारासिंह ने पेड़ पर चढ़े-चढ़े गिना तो मालूम हुआ कि बारह सवार हैं। उनमें सबके आगे एक साधु था जिसकी सफेद दाढ़ी नाभि तक पहुंच रही थी।

पाठक, यह वही बाबाजी हैं जिन्होंने रोहतासगढ़ में राजा दिग्विजयसिंह के पास रात के समय पहुंचकर उन्हें भड़काया और राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद कराया था।

खंडहर के पास पहुंचकर वे लोग रुके। घोड़ों की बागडोरें पत्थरों से अटकाकर दस आदमी तो खंडहर में अन्दर घुसे और दो आदमी घोड़ों की हिफाजत के लिए बाहर रह गये।

खंडहर के अन्दर धुआं देखकर बुड्ढे साधु ने कहा, “यह धुआं कैसा है’

एक – किसी मुसाफिर ने आकर रसोई बनाई होगी।

दूसरा – मगर धुआं बहुत कड़वा है।

तीसरा – ओफ, आंखों से और नाक से पानी बहने लगा।

साधु – अगर किसी मुसाफिर ने यहां आकर रसोई पकाई होती तो हांडी, पत्तल और पानी का बर्तन इत्यादि कुछ और भी तो यहां दिखाई देता! (एक आदमी की तरफ देखकर) हमें इस धुएं का रंग बेढब मालूम होता है, इसकी कड़वाहट, इसकी रंगत और इसकी बू कहे देती है कि धुएं में बेहोशी का असर है। है, है, जरूर ऐसा ही है, कुछ अमल भी आ चला और सिर भी घूमने लगा! (जोर से) अरे बहादुरो, बेशक तुम लोग धोखे में डाले गए, यहां कोई ऐयार आ पहुंचा है, क्या ताज्जुब है, अगर तहखाने में से कामिनी को निकालकर ले गया हो।

नीम के पेड़ पर बैठे हुए तारासिंह उस साधु की सब बातें सुन रहे थे क्योंकि वह नीम का पेड़ खंडहर के फाटक के पास ही था। साधु की बातें अभी पूरी न होने पाई थीं कि खंडहर के पिछवाड़े की तरफ से एक आदमी दौड़ता हुआ आया। मालूम होता है कि साधु की आखिरी बात उसने सुन ली थी, क्योंकि पहुंचने के साथ ही उसने पुकारकर कहा, “नहीं-नहीं, कामिनी को कोई निकालकर नहीं ले गया मगर इसमें भी सन्देह नहीं कि वीरेन्द्रसिंह के दो ऐयार यहां आए हैं, एक तहखाने के अन्दर है दूसरा (हाथ से इशारा करके) इस नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है।”

साधु – बस, तब तो मार लिया। बेशक हम लोग आफत में फंस गए हैं परन्तु कामिनी और इन्द्रजीत, जिन्हें तुम लोग तहखाने में पहुंचा चुके हो, अब बाहर नहीं जा सकते। ताज्जुब नहीं कि इन ऐयारों ने इन्द्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो! देखो, मैं शाह दरवाजे को अभी ऐसा बन्द करता हूं कि फिर ऐयार का बाप भी तहखाने में नहीं जा सकेगा।

इसके जवाब में उस आदमी ने, जो अभी दौड़ता हुआ आया था, कहा कि “हमारा एक आदमी भी तहखाने में ही है।”

साधु – खैर, अब तो उसका भी उसी तहखाने में घुटकर मर जाना बेहतर है।

तारासिंह ने उस आदमी को पहचान लिया जो खंडहर के पिछवाड़े की तरफ से दौड़ता हुआ आया था। यह उन्हीं दोनों आदमियों में से एक था जो भैरोसिंह और तारासिंह को कुएं पर देख डर के मारे भाग गये थे। न मालूम कहां छिपा रहा था जो इस समय बाबाजी को देखकर बेधड़क आ पहुंचा।

साधु ने धुएं का खयाल बिल्कुल ही न किया और खंडहर के अन्दर जाकर न मालूम किस कोठरी में घुस गया।

तारासिंह को कुंअर इन्द्रजीतसिंह के मरने का जितना गम था, उसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं परन्तु उनको उस समय बड़ा ही आश्चर्य हुआ जब साधु के मुंह से यह सुना कि “ताज्जुब नहीं कि इन्द्रजीतसिंह को मुर्दा समझ लिया हो!” बल्कि यों कहना चाहिए कि इस बात ने तारासिंह को खुश कर दिया। वे अपने दिल में सोचने लगे कि बेशक हम लोगों ने धोखा खाया, मगर न मालूम उन्हें कैसी दवा खिलाई गई जिसने बिल्कुल मुर्दा ही बना दिया। यदि इस समय भैरोसिंह के पास पहुंचकर यह खुशखबरी सुनाई जाती है तो क्या ही अच्छी बात थी। मगर कम्बख्त साधु तो कहता है कि मैं शाह दरवाजे को ही बन्द कर देता हूं जिसमें फिर कोई आदमी तहखाने में न जा सके। यदि ऐसा हुआ तो बड़ी ही मुश्किल होगी। इन्द्रजीतसिंह अगर जीते भी हैं तो अब मर जायेंगे! न मालूम यह शाह दरवाजा कौन-सा है और किस तरह खुलता और बन्द होता है?

वे लोग तो सुन ही चुके थे कि वीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार नीम के पेड़ पर चढ़ा हुआ है। बाबाजी शाह दरवाजा बन्द करने चले गये, मगर तारासिंह को इसकी कुछ भी चिन्ता नहीं थी, क्योंकि वे इस बात को बखूबी जानते थे कि बेहोशी का धुआं जो इस खंडहर में फैला हुआ है, अब इन लोगों को ज्यादा देर तक ठहरने न देगा, थोड़ी ही देर में बेहोशी आ जायगी और फिर किसी योग्य न रहेंगे, और आखिर वैसा ही हुआ।

यद्यपि वे लोग ज्यादा धुएं में नहीं फंसे थे, तो भी जो कुछ उन लोगों की आंखों और नाक की राह से पेट में चला गया था, वही उन लोगों को बेदम करने के लिए काफी था। वे लोग कुएं पर आ पहुंचे और चारों तरफ से उस नीम के पेड़ को घेर लिया। इस समय उन लोगों की अवस्था शराबियों की-सी हो रही थी। उसी समया तारासिंह ने पेड़ पर से चिल्लाकर कहा, “ओ हो हो हो, क्या अच्छे वक्त पर हमारा मालिक आ पहुंचा। अब जरूर इन कम्बख्तों की जान जायगी!”

तारासिंह की बात सुनते ही वे लोग ताज्जुब में आ गये और मैदान की तरफ देखने लगे। वास्तव में पूरब की तरफ गर्द उठ रही थी और मालूम होता था कि किसी राजा की सवारी इस तरफ आ रही है। उन लोगों के दिमाग पर अब बेहोशी का असर अच्छी तरह हो चुका था। वे लोग बैठ गए और फिर जमीन पर लेटकर दीन-दुनिया से बेखबर हो गये।

तारासिंह की निगाह उसी गर्द की तरफ थी। धीरे-धीरे आदमी और घोड़े दिखाई देने लगे और जब थोड़ी दूर रह गये तो साफ मालूम हो गया कि कई सवारों को साथ लिये राजा वीरेन्द्रसिंह आ पहुंचे। ऐयारों में तेजसिंह और पंडित बद्रीनाथ उनके साथ थे और मुश्की घोड़े पर सवार कमला आगे-आगे आ रही थी। जब तक वे लोग खंडहर के पास आवें, तब तक तारासिंह पेड़ के नीचे उतरे, कुएं में से एक लुटिया जल निकालकर मुंह-हाथ धोया और कुछ आगे बढ़कर उन लोगों से मिले। वीरेन्द्रसिंह ने तारासिंह से पूछा, “कहो, क्या हाल है’?

तारासिंह – विचित्र हाल है।

वीरेन्द्रसिंह – सो क्यों, भैरो कहां है?

तारासिंह – भैरोसिंह इसी खंडहर के तहखाने में हैं, और किशोरी, कामिनी तथा कुंअर इन्द्रजीतसिंह भी उसी तहखाने में कैद हैं।

तारासिंह ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह का जो कुछ हाल तहखाने में देखा था, वह किसी से कहना मुनासिब न समझा, क्योंकि सुनते ही वे लोग अधमरे हो जाते और किसी काम लायक न रहते और वीरेन्द्रसिंह की तो न मालूम क्या हालत होती, सिवाय इसके यह भी मालूम हो ही चुका था कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं हैं। ऐसी अवस्था में उन लोगों को बुरी खबर सुनाना बुद्धिमानी के बाहर था, इसलिए तारासिंह ने इन्द्रजीतसिंह के बारे में बहुत-सी बातें बनाकर कहीं, जैसा कि आगे चलकर मालूम होगा।

कुंअर आनन्दसिंह ने जब तारासिंह की जुबानी यह सुना कि कामिनी भी इसी तहखाने में कैद है तो बहुत ही खुश हुए और सोचने लगे कि अब थोड़ी देर में माशूका से मुलाकात हुआ ही चाहती है। ईश्वर ने बड़ी कृपा की कि ढूंढ़ने और पता लगाने की नौबत न पहुंची। उन्होंने सोचा कि बस, अब हमारा दुःखान्त नाटक सुखान्त हुआ ही चाहता है।

वीरेन्द्रसिंह ने फिर तारासिंह से पूछा, “क्या तुमने अपनी आंखों से उन लोगों को इस तहखाने में कैद देखा है’?

तारासिंह – जी हां, कुंअर इन्द्रजीतसिंह और कामिनी से तो हम दोनों आदमी मिल चुके हैं और भैरोसिंह उन दोनों के पास ही हैं, मगर किशोरी को हम लोग न देख सके, कामिनी की जुबानी मालूम हुआ कि जिस तहखाने में वह है उसी के बगल वाली कोठरी में किशोरी भी कैद है। पर कोई तरकीब ऐसी न निकली जिससे हम लोग किशोरी तक पहुंच सकते।

वीरेन्द्रसिंह – क्या यहां की कोठरियों और दरवाजों में किसी तरह का भेद है?

तारासिंह – भेद क्या, मुझे तो यह एक छोटा तिलिस्म ही मालूम होता है!

वीरेन्द्रसिंह – भला तुम और भैरोसिंह इन्द्रजीतसिंह के पास तक पहुंच गए तो उसे तहखाने के बाहर क्यों न ले आए?

तारासिंह – (कुछ अटककर) मुलाकात होने पर हम लोग उसी तहखाने में बैठकर बातें करने लगे। दुश्मन का एक आदमी उस तहखाने में कैदियों की निगहबानी कर रहा था। कैदी हथकड़ी और बेड़ी के सबब बेबस थे। जब हम दोनों ने उस आदमी को गिरफ्तार किया और हाल जानने के लिए बहुत-कुछ मारा-पीटा, तब वह राह पर आया। उसकी जुबानी मालूम हुआ कि हम लोगों का दुश्मन अर्थात् उसका मालिक बहुत से आदमियों को साथ ले यहां आया ही चाहता है। तब भैरोसिंह ने मुझे कहा कि इस समय हम लोगों को इस तहखाने से बाहर निकलना मुनासिब नहीं है, कौन ठिकाना बाहर निकलकर दुश्मनों से मुलाकात हो जाय। वे लोग बहुत होंगे और हम लोग केवल तीन आदमी हैं ताज्जुब नहीं कि तकलीफ उठानी पड़े, इससे यही बेहतर है कि तुम बाहर जाओ और जब दुश्मन लोग इस खंडहर में आ जायें, तो उन्हें किसी तरह गिरफ्तार करो। उन्हीं की आज्ञा पाकर मैं अकेला तहखाने के बाहर निकल आया और मैंने दुश्मनों को गिरफ्तार भी कर लिया।

तेजसिंह – (खुश होकर और हाथ का इशारा करके) मालूम होता है कि वे लोग जो उस पेड़ के नीचे पड़े हैं और कुछ खंडहर के दरवाजे पर दिखाई देते हैं, सब तुम्हारी ही कारीगरी से बेहोश हुए हैं। उन्हें किस तरह बेहोश किया?

तारासिंह – खंडहर के अन्दर आग सुलगाई और उसमें बेहोशी की दवा डाली, जब तक वे लोग आवें तब तक धुआं अच्छी तरह फैल गया। ऐसी कड़ी दवा से वे लोग क्योंकर बच सकते थे, जरा-सा धुआं आंख में लगना बहुत था। दुश्मन के केवल दो आदमी बच गये हैं, (घोड़ों की तरफ देखकर) मालूम होता है, आपको आते देख वे लोग भाग गए, यह क्या हुआ!

तेजसिंह – (चारों तरफ देखकर) जाने दो, क्या हर्ज है। हां तो अब हम लोगों को तहखाने में चलना चाहिए।

तारासिंह – शायद अब हम लोग तहखाने में न जा सकें।

कमला – सो क्यों?

तारासिंह – उन लोगों में एक साधु भी था, वह बड़ा ही चालाक और होशियार था। आंख में धुआं लगते ही समझ गया कि इसमें बेहोशी का असर है, अब दम के दम में हम लोग बेहोश हो जायेंगे। उसी समय एक आदमी ने जो पहले हम लोगों को देखकर भाग गया था और छिपकर मेरी कार्रवाई देख रहा था, पहुंचकर उसे हम लोगों के आने की खबर दे दी और यह भी कह दिया कि अभी तक कामिनी, किशोरी और इन्द्रजीतसिंह तहखाने में हैं बल्कि राजा वीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार भी तहखाने में है। यह सुनते ही वह कुछ खुश हुआ और बोला, “अब हम लोग तो बेहोश हुआ ही चाहते हैं, धोखे में पड़ ही चुके हैं, मगर अब हम यहां के शाह दरवाजे को बन्द कर देते हैं, फिर किसी की मजाल नहीं कि तहखाने में जा सके और उन लोगों को निकाल सके जो तहखाने के अन्दर अभी तक बैठे हुए हैं।” इस बात को सुनकर उस जासूस ने कहा कि “हम लोगों का एक आदमी भी उसी तहखाने में है।” साधु ने जवाब दिया कि “अब उसका भी उसी में घुटकर मर जाना बेहतर होगा।” फिर न मालूम क्या हुआ और उस साधु ने क्या किया अथवा शाह दरवाजा कौन है और किस तरह खुलता या बन्द होता है!

तारासिंह की इस बात ने सभी को तरद्दुद में डाल दिया और थोड़ी देर तक वे लोग सोच-विचार में पड़े रहे इसके बाद कमला ने कहा, “पहले खंडहर में चलकर तहखाने का दरवाजा खोलना चाहिए, देखें खुलता है या नहीं, अगर खुल गया तो सोच-विचार की कुछ जरूरत नहीं, यदि न खुल सका तो देखा जायगा।”

इस बात को सभी ने पसन्द किया और राजा वीरेन्द्रसिंह ने कमला को आगे चलने और तहखाने का दरवाजा खोलने के लिए कहा। खंडहर में इस समय धुआं कुछ भी न था, सब साफ हो चुका था। कमला सभी को साथ लिए हुए उस दालान में पहुंची जहां से तहखाने में जाने का रास्ता था। मोमबत्ती जलाकर हाथ में ली और बगल वाली कोठरी में जाकर मोमबत्ती तारासिंह के हाथ में दे दी। इस कोठरी में एक आलमारी थी जिसके पल्लों में दो मुट्ठे लगे हुए थे। इन्हीं मुट्ठों के घुमाने से दरवाजा खुल जाता था और फिर एक कोठरी में पहुंच जाने से तहखाने में उतरने के लिए सीढ़ियां मिलती थीं। इस समय कमला ने इन्हीं दोनों मुट्ठों को कई बार घुमाया, वे घूम तो गए मगर दरवाजा न खुला। इसके बाद तारासिंह ने और फिर तेजसिंह ने भी उद्योग किया मगर कोई काम न चला। तब तो सभी का जी बेचैन हो गया और विश्वास हो गया कि उस बेईमान साधु ने जो कुछ कहा, सो किया। इस खंडहर में कोई शाह दरवाजा जरूर है जिसे साधु ने बन्द कर दिया और जिसके सबब से यह दरवाजा अब नहीं खुलता।

सब लोग उस कोठरी से बाहर निकले और उस साधु को ढूंढ़ने लगे। खंडहर में और नीम के पेड़ के नीचे आठ आदमी बेहोश पड़े हुए थे जो सब इकट्ठे किए गए। दो आदमी जो घोड़ों की हिफाजत करने के लिए रह गये थे और बेहोश नहीं हुए थे वे तो न मालूम कहां भाग ही गए थे, अब साधु रह गए सो उनके शरीर का कहीं पता न लगा। चारों तरफ खोज होने लगी।

राजा वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और तारासिंह को साथ लिए हुए कमला उस कोठरी में पहुंची जिसमें दीवार के साथ लगी हुई पत्थर की मूरत थी, जिसमें एक दफे रात के समय कामिनी जा चुकी थी, और जिसका हाल ऊपर के किसी बयान में लिखा जा चुका है। इसी कोठरी में पत्थर की मूरत के पास ही साधु महाशय बेहोश पड़े हुए थे।

तेजसिंह – (मूरत को अच्छी तरह देखकर) मालूम होता है कि शाह दरवाजे से इस मूरत का कोई सम्बन्ध है।

वीरेन्द्रसिंह – शायद ऐसा ही हो, क्योंकि मुझे यह खंडहर तिलिस्मी मालूम होता है। हाय, बेचारा लड़का इस समय कैसी मुसीबत में पड़ा है। अब दरवाजा खुलने की तरकीब किससे पूछी जाय और उसका कैसे पता लगे मेरी राय तो यह है कि इस खंडहर में जो कुछ मिट्टी-चूना पड़ा है, सब बाहर फिंकवाकर जगह साफ करा दी जाय और दीवार तथा जमीन भी खोदी जाय।

तेजसिंह – मेरी भी यही राय है।

तारासिंह – जमीन और दीवार खुदने से जरूर काम चल जायगा। तहखाने की दीवार खोदकर हम लोग अपना रास्ता निकाल लेंगे, बल्कि और भी बहुत – सी बातों का पता लग जायगा।

वीरेन्द्रसिंह – (तेजसिंह की तरफ देखकर) बहुत जल्द बन्दोबस्त करो और दो आदमी रोहतासगढ़ भेजकर एक हजार आदमी की फौज बहुत जल्द मंगवाओ। वह फौज ऐसी हो कि सब काम कर सके, अर्थात् जमीन खोदने, सेंध लगाने, सड़क बनाने इत्यादि का काम बखूबी जानती हो।

तेजसिंह – बहुत खूब।

राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ-साथ सौ आदमी आये हुए थे। वे सब-के-सब काम में लग गये। बेहोश दुश्मनों के हाथ-पैर बांध दिये गये और उन्हें उठाकर एक दालान में रख देने के बाद सब लोग खंडहर की मिट्टी उठा-उठाकर बाहर फेंकने लगे। जल्दी के मारे मालिकों ने भी काम में हाथ लगाया।

रात हो गई। कई मशाल भी जलाये गये, मिट्टी की सफाई बराबर जारी रही, मगर तारासिंह का विचित्र हाल था, उन्हें घड़ी-घड़ी रुलाई आती थी, और उसे वे बड़ी मुश्किल से रोकते थे। यद्यपि तारासिंह ने कुंअर इन्द्रजीतसिंह का हाल बहुत-कुछ झूठ-सच मिलाकर राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा था, मगर वे बखूबी जानते थे कि इन्द्रजीतसिंह की अवस्था अच्छी नहीं है, उनकी लाश तो अपनी आंखों से देख ही चुके थे, परन्तु साधु की बातों ने उनकी कुछ तसल्ली कर दी थी। वे समझ गये थे कि इन्द्रजीतसिंह मरे नहीं, बल्कि बेहोश हैं, मगर अफसोस तो यह है कि यह बात केवल तारासिंह को ही मालूम है, भैरोसिंह को भी यदि इस बात की खबर होती, तो तहखाने में बैठे-बैठे कुमार को होश में लाने का कुछ उद्योग करते। कहीं ऐसा न हो कि बेहोशी में ही कुमार की जान निकल जाय, ऐसी कड़ी बेहोशी का नतीजा अच्छा नहीं होता है, इसके अतिरिक्त कई दिनों से कुमार बेहोशी की अवस्था में पड़े हैं, बेहोशी भी ऐसी कि जिसने बिल्कुल ही मुर्दा बना दिया, क्या जाने, जीते भी हैं या वास्तव में मर ही गये।

ऐसी – ऐसी बातों के विचार से तारासिंह बहुत ही बेचैन थे, मगर अपने दिल का हाल किसी से कहते नहीं थे।

यहां से थोड़ी दूर पर एक गांव था। कई आदमी दौड़ गये और कुदाल-फावड़ा इत्यादि जमीन खोदने का सामान वहां से ले आये और बहुत से मजदूरों को साथ लिवाते आये। रात-भर काम लगा रहा, और सवेरा होते-होते तक खंडहर साफ हो गया।

अब उस दालान की खुदाई शुरू हुई, जिसके बगल वाली कोठरी के अन्दर से तहखाने में जाने का रास्ता था। हाथ-भर तक जमीन खुदने के बाद लोहे की सतह निकल आई, जिसमें छेद होना भी मुश्किल था। यह देखकर वीरेन्द्रसिंह को भी बहुत रंज हुआ और उन्होंने खंडहर के बीच की जमीन अर्थात् चौक को खोदने का हुक्म दिया।

दूसरे दिन चौक की खुदाई से छुट्टी मिली। खुद जाने पर वहां एक छोटी-सी खूबसूरत बावली निकली, जिसके चारों तरफ छोटी-छोटी संगमरमर की सीढ़ियां थीं। यह बावली दस गज से ज्यादा गहरी न थी, और इसके नीचे की सतह तीन गज चौड़ी और इतनी ही लम्बी होगी। दो पहर दिन चढ़ते-चढ़ते उस बावली की मिट्टी निकल गई और नीचे की सतह में पीतल की एक मूरत दिखाई पड़ी। मूरत बहुत बड़ी न थी, एक हिरन का शेर ने शिकार किया था, हिरन की गर्दन का आधा हिस्सा शेर के मुंह में था। मूरत बहुत ही खूबसूरत और कीमती थी, मगर मिट्टी के अन्दर बहुत दिनों तक दबे रहने से मैली और खराब हो रही थी। वीरेन्द्रसिंह ने उसे अच्छी तरह झाड़ पोंछकर साफ करने का हुक्म दिया।

वीरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह से कहा, “इस खुदाई में समय भी नष्ट हुआ, और कुछ काम भी न निकला।”

तेजसिंह – मैं इस मूरत पर अच्छी तरह गौर कर रहा हूं, मुझे आशा है कि कोई अनूठी बात जरूर दिखाई पड़ेगी।

वीरेन्द्रसिंह – (ताज्जुब में आकर) देखो – देखो, शेर की आंखें इस तरह घूम रही हैं जैसे वह इधर-उधर देख रहा हो!

आनन्दसिंह – (अच्छी तरह देखकर) हां, ठीक तो है!

इसी समय एक आदमी दौड़ता हुआ आया, और हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, चारों तरफ से दुश्मन की फौज ने आकर हम लोगों को घेर लिया है। दो हजार सवारों के साथ शिवदत्त आ पहुंचा, जरा मैदान की तरफ देखिए।”

न मालूम शिवदत्त इतने दिनों तक कहां छिपा हुआ था, और वह क्या कर रहा था। इस समय दो हजार फौज के साथ उसका यकायक आ पहुंचना और चारों तरफ से खंडहर को घेर लेना बड़ा ही दुखदायी हुआ, क्योंकि वीरेन्द्रसिंह के पास इस समय केवल सौ सिपाही थे।

सूर्य अस्त हो चुका था, चारों तरफ से अंधेरी घिरी चली आती थी। फौज सहित राजा शिवदत्त जब तक खंडहर के पास पहुंचे, तब तक रात हो गई। राजा शिवदत्त को तो यह मालूम ही हो चुका था कि केवल सौ सिपाहियों के साथ राजा वीरेन्द्रसिंह, कुंअर आनन्दसिंह और उनके ऐयार लोग इसी खंडहर में हैं, परन्तु राजा वीरेन्द्रसिंह, कुमार और उनके ऐयारों की वीरता और साहस को भी वह अच्छी तरह जानता था, इसलिए रात के समय खंडहर के अन्दर डेढ़ दो सौ सिपाहियों से ज्यादा नहीं जा सकते थे, क्योंकि उसके अन्दर ज्यादा जमीन न थी, और वीरेन्द्रसिंह तथा उनके साथी इतने आदमियों को कुछ भी न समझते, इसलिए शिवदत्त ने सोचा कि रात भर इस खंडहर को घेरकर चुपचाप पड़े रहना ही उत्तम होगा। वास्तव में शिवदत्त का विचार बहुत ठीक था और उसने ऐसा ही किया भी। राजा वीरेन्द्रसिंह को भी रात भर सोचने-विचारने की मोहलत मिली। उन्होंने कई सिपाहियों को फाटक पर मुस्तैद कर दिया और उसके बाद अपने बचाव का ढंग सोचने लगे।

बयान 2

इस समय शिवदत्त की खुशी का अन्दाज करना मुश्किल है और यह कोई ताज्जुब की बात भी नहीं है, क्योंकि लड़ाकों और दोस्त ऐयारों के सहित राजा वीरेन्द्रसिंह को उसने ऐसा बेबस कर दिया कि उन लोगों को जान बचाना कठिन हो गया है। शिवदत्त के आदमियों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और उसे निश्चय हो गया कि अब हम पुनः चुनार की गद्दी पावेंगे, और इसके साथ ही नौगढ़, विजयगढ़, गयाजी और रोहतासगढ़ की हुकूमत भी बिना परिश्रम हाथ लगेगी।

एक घने वटवृक्ष के नीचे अपने दोस्तों और ऐयारों को साथ लिये शिवदत्त गप्पें उड़ा रहा है। ऊपर एक सफेद चंदोवा तना हुआ है। बिछावन और गद्दी उसी प्रकार की है जैसी मामूली सरदार अथवा डाकुओं के भारी गिरोह के अफसर की होनी चाहिए। दो मशालची हाथ में मशालें लिए सामने खड़े हैं, और इधर-उधर कई जगह आग सुलग रही है। बाकरअली, खुदाबक्श, यारअली और अजायबसिंह ऐयार शिवदत्त के दोनों तरफ बैठे हैं, और सभी की निगाह उन शराब की बोतलों और प्यालों पर बराबर पड़ रही है जो शिवदत्त के सामने काठ की चौकी पर रखे हुए हैं। धीरे-धीरे शराब पीने के साथ-साथ सब कोई शेखी बघार रहे हैं। कोई अपनी बहादुरी की तारीफ कर रहा है, तो कोई वीरेन्द्रसिंह को सहज ही गिरफ्तार करने की तरकीब बता रहा है। शिवदत्त ने सिर उठाया और बाकरअली ऐयार की तरफ देखकर कुछ कहना चाहा, परन्तु उसी समय उसकी निगाह सामने मैदान की तरफ जा पड़ी, और वह चौंक उठा। ऐयारों ने भी पीछे फिरकर देखा और देर तक उसी तरफ देखते रहे।

दो मशालों की रोशनी, जो कुछ दूर पर थी, इसी तरफ आती दिखाई पड़ी। वे दोनों मशाल मामूली न थे, बल्कि मालूम होता था कि लम्बे नेजे या छोटे-से बांस के सिरे पर बहुत-सा कपड़ा लपेटकर मशाल का काम लिया गया है और उसे हाथ में लिए बल्कि ऊंचा किए हुए दो सवार घोड़ा दौड़ाते इसी तरफ आ रहे हैं। उन्हीं मशालों को देखकर शिवदत्त चौंका था।

बाकरअली ऐयार पेड़ के ऊपर चढ़ गया और थोड़ी देर में नीचे उतरकर बोला, “मशाल लेकर केवल दो सवार ही नहीं हैं, बल्कि और भी कई सवार उनके साथ मालूम होते हैं।”

थोड़ी देर में शिवदत्त के कई आदमी उन सवारों को अपने साथ लिये हुए वहीं आ पहुंचे, जहां शिवदत्त बैठा हुआ था। उन सवारों में से एक ने घोड़े पर से उतरने में शीघ्रता की। शिवदत्त ने पहचान लिया कि उसका लड़का भीमसेन है। भीमसेन दौड़कर शिवदत्त के कदमों पर गिर पड़ा। शिवदत्त ने प्रेम के साथ उठाकर गले लगा लिया। दोनों की आंखों में आंसू भर आये और देर तक मुहब्बत-भरी निगाहों से एक-दूसरे को देखता रह गया। इसके बाद लड़के का हाथ थामे हुए शिवदत्त अपनी गद्दी पर जा बैठा, और भीमसेन से बातचीत करने लगा। उन सवारों ने भी कमर खोली जो भीमसेन के साथ आये थे।

भीमसेन – (गद्गद स्वर से) इन चरणों के दर्शन की कदापि आशा न थी।

शिवदत्त – ठीक है, केवल मेरी ही भूल ने यह सब किया, परन्तु आज मुझ पर ईश्वर की दया हुई है, जिसका सबूत इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि वीरेन्द्रसिंह को मैंने फांस लिया और मेरा प्यारा लड़का भी मुझसे आ मिला। हां, यह कहो, तुम्हें छुट्टी क्योंकर मिली?

भीमसेन – (अपने साथियों में से एक की तरफ इशारा करके) केवल इनकी बदौलत मेरी जान बची।

भीमसेन ने उस आदमी को जिसकी तरफ इशारा किया था अपने पास बुलाया और बैठने का इशारा किया, वह अदब के साथ सलाम करने के बाद बैठ गया। उसकी उम्र लगभग चालीस वर्ष के होगी, शरीर दुबला और कमजोर था। रंग यद्यपि गोरा और आंखें बड़ी थीं परन्तु चेहरे से उदासी और लाचारी पाई जाती थी और यह भी मालूम होता था कि कमजोर होने पर भी क्रोध ने उसे अपना सेवक बना रखा है।

भीमसेन – इसी ने मेरी जान बचाई है। यद्यपि यह बहुत दुबला और कमजोर मालूम होता है परन्तु परले सिरे का दिलावर और बात का धनी है और मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूं कि इसके ऐसा चतुर और बुद्धिमान होना आजकल के जमाने में कठिन है। यह ऐयार नहीं है मगर ऐयारों को कोई चीज नहीं समझता! यह रोहतासगढ़ का रहने वाला है, वीरेन्द्रसिंह के कारिन्दों के हाथ से दुःखी होकर भागा और इसने कसम खा ली है कि जब तक वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान का नाम-निशान न मिटा लूंगा अन्न न खाऊंगा, केवल कन्दमूल खाकर जान बचाऊंगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह जो कुछ चाहे कर सकता है। रोहतासगढ़ के तहखाने और (हाथ का इशारा करके) इस खंडहर का भेद भी यह बखूबी जानता है जिसमें वीरेन्द्रसिंह वगैरह लाचार और आपके सिपाहियों से घिरे पड़े हैं। इसने मुझे जिस चालाकी से निकाला उसका हाल इस समय कहकर समय नष्ट करना उचित नहीं जान पड़ता क्योंकि आज ही इस थोड़ी-सी बची हुई रात में इसकी मदद से एक भारी काम निकलने की उम्मीद है। अब आप स्वयं इससे बातचीत कर लें।

भीमसेन की बात, जो उस आदमी की तारीफ से भरी हुई थी, सुनकर शिवदत्त खुशी के मारे फूल उठा और उससे स्वयं बातचीत करने लगा।

शिवदत्त – सबके पहले मैं आपका नाम सुनना चाहता हूं।

रूहा – (धीरे से कान की तरफ झुककर) मुझे लोग बांकेसिंह कहकर पुकारते थे, परन्तु अब कुछ दिनों के लिए मैंने अपना नाम बदल दिया है। आप मुझे ‘रूहा’ कहकर पुकारा कीजिए जिससे किसी को मेरा असल नाम मालूम न हो।

शिवदत्त – जैसा आपने कहा वैसा ही होगा। इस समय तो हमने वीरेन्द्रसिंह को अच्छी तरह घेर लिया है, उनके साथ सिपाही भी बहुत कम हैं जिन्हें हम लोग सहज ही गिरफ्तार कर लेंगे। आपका प्रण भी अब पूरा हुआ ही चाहता है।

रूहा – (मुस्कुराकर) इस बन्दोबस्त से आप वीरेन्द्रसिंह का कुछ भी नहीं कर सकते।

शिवदत्त – सो क्यों?

रूहा – क्या आप इस बात को नहीं जानते कि इस खंडहर की दीवार बड़ी मजबूत है?

शिवदत्त – बेशक मजबूत है मगर इससे क्या हो सकता है?

रूहा – क्या इस खंडहर के भीतर घुसकर आप उनका मुकाबला कर सकेंगे?

शिवदत्त – क्यों नहीं!

रूहा – कभी नहीं। इसके अन्दर सौ आदमियों से ज्यादे के जाने की जगह नहीं है और इतने आदमियों को वीरेन्द्रसिंह के साथी सहज ही में काट गिरावेंगे।

शिव – हमारे आदमी दीवारों पर चढ़कर हमला करेंगे और सबसे भारी बात यह है कि वे लोग दो ही तीन दिन में भूख-प्यास से तंग होकर लाचार बाहर निकलेंगे, उस समय उनको मार लेना कोई बड़ी बात नहीं है।

रूहा – सो भी नहीं हो सकता, क्योंकि यह खंडहर एक छोटा-सा तिलिस्म है जिसका रोहतासगढ़ के तहखाने वाले तिलिस्म से सम्बन्ध है। इसके अन्दर घुसना और दीवारों पर चढ़ना खेल नहीं है। वीरेन्द्रसिंह और उनके लड़कों को इस खंडहर का बहुत कुछ भेद मालूम है और आप कुछ भी नहीं जानते इसी से समझ लीजिए कि आपमें और उनमें क्या फर्क है, इसके अतिरिक्त इस खंडहर में बहुत से तहखाने और सुरंगें भी हैं, जिनसे वे लोग बहुत फायदा उठा सकते हैं।

शिवदत्त – (कुछ सोचकर) आप बड़े बुद्धिमान हैं और इस खंडहर का हाल अच्छी तरह जानते हैं। अब मैं अपना बिल्कुल काम आप ही की राय पर छोड़ता हूं, जो आप कहेंगे मैं वही करूंगा, अब आप ही कहिये क्या किया जाय?

रूहा – अच्छा मैं आपकी मदद करूंगा और राय दूंगा। पहले आप बतावें कि क्या वीरेन्द्रसिंह के यहां आने का सबब आप जानते हैं?

शिवदत्त – नहीं।

रूहा – इसका असल हाल मुझे मालूम हो चुका है। (भीमसेन की तरफ देखकर) उस आदमी का कहना बहुत ठीक है।

भीमसेन – बेशक ऐसा ही है, वह आपका शागिर्द होकर आपसे झूठ कभी नहीं बोलेगा।

शिवदत्त – क्या बात है?

रूहा – हम लोग यहां आ रहे थे तो रास्ते में मेरा एक चेला मिला था जिसकी जुबानी वीरेन्द्रसिंह के यहां आने का सबब हम लोगों को मालूम हो गया।

शिवदत्त – क्या मालूम हुआ?

रूहा – इस खंडहर के तहखाने में कुंअर इन्द्रजीतसिंह न मालूम क्योंकर जा फंसे हैं जो किसी तरह निकल नहीं सकते, उन्हीं को छुड़ाने के लिए ये लोग आये हैं। मैं खंडहर के हर एक तहखाने और उसके रास्ते को जानता हूं, अगर चाहूं तो कुंअर इन्द्रजीतसिंह को सहज ही निकाल लाऊं।

शिवदत्त – ओ हो, यदि ऐसा हो तो क्या बात है। परन्तु आपको इस खंडहर में कोई जाने क्यों देगा और बिना खंडहर में गये आप तहखाने के अन्दर पहुंच नहीं सकते।

रूहा – नहीं-नहीं, खंडहर में जाने की कोई जरूरत नहीं है, मैं बाहर ही बाहर अपना काम कर सकता हूं।

शिवदत्त – तो फिर ऐसे काम में क्यों न जल्दी की जाय?

रूहा – मेरी राय है कि आप या आपके लड़के भीमसेन पांच सौ बहादुरों को साथ लेकर मेरे साथ चलें, यहां से लगभग दो कोस जाने के बाद एक छोटा-सा टूटा-फूटा मकान मिलेगा, पहले उसे घेर लेना चाहिए।

शिवदत्त – उसके घेरने से क्या फायदा होगा?

रूहा – इस खंडहर में से एक सुरंग गई है जो उसी मकान में निकली है, ताज्जुब नहीं है कि वीरेन्द्रसिंह वगैरह उस राह से भाग जायं इसलिए उस पर कब्जा कर लेना चाहिए। सिवाय इसके एक बात और है!

शिवदत्त – वह क्या?

रूहा – उसी मकान में से एक दूसरी सुरंग उस तहखाने में गई है जिसमें कुंअर इन्द्रजीतसिंह हैं। यद्यपि उस सुरंग की राह से इस तहखाने तक पहुंचते-पहुंचते पांच दरवाजे लोहे के मिलते हैं जिनको खोलना अति कठिन है परन्तु खोलने की तरकीब मुझे मालूम है। वहां पहुंचकर मैं और भी कई काम करूंगा।

शिवदत्त – (खुश होकर) तब तो सबके पहले हमें वहां ही पहुंचना चाहिए।

रूहा – बेशक ऐसा ही होना चाहिए, पांच सौ सिपाही लेकर आप मेरे साथ चलिये या भीमसेन चलें, फिर देखिये मैं क्या करता हूं।

शिवदत्त – अब भीमसेन को तकलीफ देना तो मैं पसन्द नहीं करता।

रूहा – यह बहुत थक गये हैं और कैद की मुसीबत उठाकर कमजोर भी हो गये हैं, यहां का इन्तजाम इन्हें सुपुर्द कीजिए और आप मेरे साथ चलिये।

इसके कुछ ही देर बाद शिवदत्त पांच सौ फौज को लेकर रूहा के साथ उत्तर की तरफ रवाना हुआ। इस समय पहर भर रात बाकी थी, चांद ने भी अपना चेहरा छिपा लिया था मगर नरमदिल तारे डबडबाई हुई आंखों से दुष्ट शिवदत्त और उसके साथियों की तरफ देख-देख अफसोस कर रहे थे।

ये पांच सौ लड़ाके घोड़ों पर सवार थे, रूहा और शिवदत्त अरबी घोड़ों पर सवार सबके आगे-आगे जा रहे थे। रूहा केवल एक तलवार कमर से लगाये हुए था मगर शिवदत्त पूरे ठाठ से था। कमर में कटार और तलवार तथा हाथ में नेजा लिये हुए बड़ी खुशी से घुल-घुलकर बातें करता जाता था। सड़क पथरीली और ऊंची-नीची थी इसलिए ये लोग पूरी तेजी के साथ नहीं जा सकते थे तिस पर भी घंटे भर चलने के बाद एक छोटे से टूटे-फूटे मकान की दीवार पर रूहा की नजर पड़ी और उसने हाथ का इशारा करके शिवदत्त से कहा, “बस अब हम लोग ठिकाने पर आ पहुंचे, यही मकान है।”

शिवदत्त के साथी सवारों ने उस मकान को चारों तरफ से घेर लिया।

रूहा – इस मकान में कुछ खजाना भी है जिसका हाल मुझे अच्छी तरह मालूम है।

शिवदत्त – (खुश होकर) आजकल मुझे रुपये की जरूरत भी है।

रूहा – मैं चाहता हूं कि पहले केवल आपको इस मकान में ले चलकर दो-एक जगह निशान और वहां का कुछ भेद बता दूं फिर आगे जैसा मुनासिब होगा वैसा किया जायगा। आप मेरे साथ अकेले चलने के लिए तैयार हैं, डरते तो नहीं?

शिवदत्त – (घमंड के साथ) क्या तुमने मुझे डरपोक समझ लिया है और फिर ऐसी अवस्था में जबकि हमारे पांच सौ सवारों से यह मकान घिरा हुआ है?

रूहा – (हंसकर) नहीं-नहीं, मैंने इसलिए टोका कि शायद इस पुराने मकान में आपको भूत-प्रेत का गुमान पैदा हो।

शिवदत्त – छिः, मैं ऐसे खयाल का आदमी नहीं हूं, बस देर न कीजिये, चलिये।

रूहा ने पथरी से आग झाड़कर मोमबत्ती जलाई जो उसके पास थी और शिवदत्त को साथ लेकर मकान में अन्दर घुसा। इस समय उस मकान की अवस्था बिल्कुल खराब थी, केवल तीन कोठरियां बची हुई थीं जिनकी तरफ इशारा करके रूहा ने शिवदत्त से कहा, “यद्यपि यह मकान बिल्कुल टूट-फूट गया है मगर इन तीनों कोठरियों को अभी तक किसी तरह का सदमा नहीं पहुंचा है, मुझे केवल इन्हीं कोठरियों से मतलब है। इस मकान की मजबूत दीवारें अभी दो-तीन और बरसातें सम्हालने की हिम्मत रखती हैं।

शिवदत्त – मैं देखता हूं कि वे तीनों कोठरियां एक के साथ एक सटी हुई हैं और इसका भी कोई सबब जरूर होगा।

रूहा – जी हां, मगर इन तीन कोठरियों से इस समय तीन काम निकलेंगे।

इसके बाद रूहा एक कोठरी के अन्दर घुसा। इसमें एक तहखाना था और नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां नजर आती थीं। शिवदत्त ने पूछा, “मालूम होता है इसी सुरंग की राह आप मुझे ले चलेंगे’ इसके जवाब में रूहा ने कहा, “हां इन्द्रजीतसिंह को गिरफ्तार करने के लिए इसी सुरंग में चलना होगा, मगर अभी नहीं, मैं पहले आपको दूसरी कोठरी में ले चलता हूं जिसमें खजाना है, मेरी तो यही राय है कि पहले खजाना निकाल लेना चाहिए, आपकी क्या राय है’

शिवदत्त – (खुश होकर) हां – हां, पहले खजाना अपने कब्जे में लेना चाहिए। कहिये, तो कुछ आदमियों को अन्दर बुलाऊं?

रूहा – अभी नहीं, पहले आप स्वयं चलकर उस खजाने को देख तो लीजिए।

शिवदत्त – अच्छा चलिये।

अब ये दोनों दूसरी कोठरी में पहुंचे। इसमें भी एक वैसा ही तहखाना नजर आया जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियां मौजूद थीं। शिवदत्त को साथ लिए हुए रूहा उस तहखाने में उतर गया। यह ऐसी जगह थी कि यदि सौ आदमी एक साथ मिलकर चिल्लाएं तो भी मकान के बाहर आवाज न जाय। शिवदत्त को उम्मीद थी कि अब रुपये और अशर्फियों से भरे हुए देग दिखाई देंगे मगर उसके बदले यहां दस सिपाही ढाल-तलवार लिए मुंह पर नकाब डाले दिखाई पड़े और साथ ही इसके एक सुरंग पर भी नजर पड़ी जो मालूम होता था कि अभी खोदकर तैयार की गई है। शिवदत्त एकदम कांप उठा, उसे निश्चय हो गया कि रूहा ने मेरे साथ दगा की, और ये लोग मुझे मारकर इसी गड़हे में दबा देंगे। उसने एक लाचारी की निगाह रूहा पर डाली और कुछ कहना चाहा मगर खौफ ने उसका गला ऐसा दबा दिया कि एक शब्द भी मुंह से न निकल सका।

उन दसों ने शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया और मुश्कें बांध लीं। रूहा ने कहा, “बस अब आप चुपचाप इन लोगों के साथ इस सुरंग में चले चलिए नहीं तो इसी जगह आपका सिर काट लिया जायगा।”

इस समय शिवदत्त रूहा और उसके साथियों का हुक्म मानने के सिवाय और कुछ भी न कर सकता था। सुरंग में उतरने के बाद लगभग आधा कोस के चलना पड़ा, इसके बाद सब लोग बाहर निकले और शिवदत्त ने अपने को एक सुनसान मैदान में पाया। यहां पर कई साईसों की हिफाजत में बारह घोड़े कसे-कसाये तैयार थे। एक पर शिवदत्त को सवार कराया गया और नीचे से उसके दोनों पैर बांध दिए गए, बाकी पर रूहा और वे दसों नकाबपोश सवार हुए और शिवदत्त को लेकर एक तरफ को चलते हुए।

कुंअर इन्द्रजीतसिंह पर आफत आने से वीरेन्द्रसिंह दुखी होकर उनको छुड़ाने का उद्योग कर ही रहे थे परन्तु बीच में शिवदत्त का आ जाना बड़ा ही दुखदाई हुआ। ऐसे समय में जबकि यह अपनी फौज से बहुत ही दूर पड़े हैं सौ-दो सौ आदमियों को लेकर शिवदत्त की दो हजार फौज से मुकाबला करना बहुत ही कठिन मालूम पड़ता था, साथ ही इसके यह सोचकर कि जब तक शिवदत्त यहां है कुंअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने की कार्रवाई किसी तरह नहीं हो सकती, वे और भी उदास हो रहे थे। यदि उन्हें कुंअर इन्द्रजीतसिंह का खयाल न होता तो शिवदत्त का आना उन्हें न गड़ता और वे लड़ने से बाज न आते मगर इस समय राजा वीरेन्द्रसिंह बड़ी फिक्र में पड़ गए और सोचने लगे कि क्या करना चाहिए। सबसे ज्यादा फिक्र तारासिंह को थी क्योंकि वह कुंअर इन्द्रजीतसिंह का मृत शरीर अपनी आंखों से देख चुका था। राजा वीरेन्द्रसिंह और उनके साथी लोग तो अपनी फिक्र में लगे हुए थे और खंडहर के दरवाजे पर तथा दीवारों पर से लड़ने का इन्तजाम कर रहे थे, परन्तु तारासिंह उस छोटी-सी बावली के किनारे, जो अभी जमीन खोदने से निकली थी, बैठा अपने खयाल में ऐसा डूबा था कि उसे दीन-दुनिया की खबर न थी। वह नहीं जानता था कि हमारे संगी-साथी इस समय क्या कर रहे हैं। आधी रात से ज्यादे जा चुकी थी मगर वह अपने ध्यान में डूबा हुआ बावली के किनारे बैठा है। राजा वीरेन्द्रसिंह ने भी यह सोचकर कि शायद वह इसी बावली के विषय में कुछ सोच रहा है तारासिंह को कुछ न टोका और न कोई काम उसके सुपुर्द किया।

हम ऊपर लिख आये हैं कि इस बावली में से कुछ मिट्टी निकल जाने पर बावली के बीचोंबीच में पीतल की मूरत दिखाई पड़ी। उस मूरत का भाव यह था कि एक हिरन का शेर ने शिकार किया है और हिरन की गर्दन का आधा भाग शेर के मुंह में है। मूरत बहुत ही खूबसूरत बनी हुई थी।

जिस समय का हाल हम लिख रहे हैं अर्थात् आधी रात गुजर जाने के बाद यकायक उस मूरत में एक प्रकार की चमक पैदा हुई और धीरे-धीरे वह चमक यहां तक बढ़ी कि तमाम बावली बल्कि तमाम खंडहर में उजियाला हो गया, जिसे देख सब-के-सब घबड़ा गए। वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और कमला ये तीनों आदमी फुर्ती के साथ उस जगह पहुंचे जहां तारासिंह बैठा हुआ ताज्जुब में आकर उस मूरत को देख रहा था।

घण्टा भर बीतते-बीतते मालूम हुआ कि वह मूरत हिल रही है। उस समय शेर की दोनों आंखें ऐसी चमक रही थीं कि निगाह नहीं ठहरती। मूरत को हिलते देख सभी को बड़ा ताज्जुब हुआ और निश्चय हो गया कि अब तिलिस्म की कोई-न-कोई कार्रवाई हम लोग जरूर देखेंगे।

यकायक मूरत बड़े जोर से हिली और तब एक भारी आवाज के साथ जमीन के अन्दर धंस गई। खंडहर में चारों तरफ अंधेरा हो गया। कायदे की बात है कि आंखों के सामने जब थोड़ी देर तक कोई तेज रोशनी रहे और वह यकायक गायब हो जाय या बुझा दी जाय तो आंखों में मामूली से ज्यादे अंधेरा छा जाता है, वही हालत इस समय खंडहर वालों की हुई। थोड़ी देर तक उन लोगों को कुछ भी नहीं सूझता था। आधी घड़ी गुजर जाने के बाद वह गड़हा दिखाई देने लगा जिसके अन्दर मूरत धंस गई थी। अब उस गड़हे के अन्दर भी एक प्रकार की चमक मालूम होने लगी और देखते-देखते हाथ में चमकता हुआ नेजा लिए वही राक्षसी उस गड़हे में से बाहर निकली जिसका जिक्र ऊपर कई दफे किया जा चुका है।

हमारे वीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयार लोग उस औरत को कई दफे देख चुके थे और वह औरत इनके साथ अहसान भी कर चुकी थी, इसलिए उसे यकायक देखकर वे लोग कुछ प्रसन्न हुए और उन्हें विश्वास हो गया कि इस समय यह औरत जरूर हमारी कुछ-न-कुछ मदद करेगी और थोड़ा-बहुत यहां का हाल भी हम लोगों को जरूर मालूम होगा।

उस औरत ने नेजे को हिलाया। हिलने के साथ ही बिजली-सी चमक उसमें पैदा हुई और तमाम खंडहर में उजाला हो गया। वह वीरेन्द्रसिंह के पास आई और बोली, “आपको पहर भर की मोहलत दी जाती है। इसके अन्दर इस खंडहर के हर एक तहखाने में यदि रास्ता मालूम है तो आप घूम सकते हैं। शाह दरवाजा जो बन्द हो गया था, उसे आपके खातिर से पहर भर के लिए मैंने खोल दिया है। इससे विशेष समय लगाना अनर्थ करना है।”

इतना कह वह राक्षसी उसी गड़हे में घुस गई और वह पीतल वाली मूरत जो जमीन के अन्दर धंस गई थी फिर अपने स्थान पर आकर बैठ गई। इस समय उसमें किसी तरह की चमक न थी।

अब वीरेन्द्रसिंह और आनन्दसिंह वगैरह को कुंअर इन्द्रजीतसिंह से मिलने की उम्मीद हुई।

वीरेन्द्रसिंह – कुछ मालूम नहीं होता कि यह औरत कौन है और समय-समय पर हम लोगों की सहायता क्यों करती है।

तारासिंह – जब तक वह स्वयं अपना हाल न कहे हम लोग उसे किसी तरह नहीं जान सकते। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह औरत तिलिस्मी है और कोई भारी सामर्थ्य रखती है।

कमला – परन्तु सूरत इसकी भयानक है।

तेजसिंह – यदि यह सूरत बनावटी हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं।

वीरेन्द्रसिंह – हो सकता है, खैर, अब हमको तहखाने के अन्दर चलना और इन्द्रजीत को छुड़ाना चाहिए, पहर भर का समय हम लोगों के लिए कम नहीं है, मगर शिवदत्त के लिए क्या किया जाय यदि वह इस खंडहर में घुस आने और लड़ने का उद्योग करेगा तो यह अमूल्य पहर भर समय यों ही नष्ट हो जायगा।

तेजसिंह – इसमें क्या सन्देह है ऐसे समय में इस कम्बख्त का चढ़ आना बड़ा ही दुःखदायी हुआ।

इतना कहकर तेजसिंह गौर में पड़ गये और सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। इसी बीच में खंडहर के फाटक की तरफ से सिपाहियों के चिल्लाने की आवाज आई और यह भी मालूम हुआ कि वहां लड़ाई हो रही है।

जिस समय शिवदत्त के चढ़ आने की खबर मिली थी उसी समय राजा वीरेन्द्रसिंह के हुक्म से पचास सिपाही खंडहर के फाटक पर मुस्तैद कर दिये गये थे और उन सिपाहियों ने आपस में निश्चय कर लिया था कि जब तक पचास में से एक भी जीता रहेगा, फाटक के अन्दर कोई घुसने न पावेगा।

फाटक पर कोलाहल सुनकर तेजसिंह और तारासिंह दौड़े गये और थोड़ी देर में वापस आकर खुशी-भरी आवाज में तेजसिंह ने वीरेन्द्रसिंह से कहा, “बेशक फाटक पर लड़ाई हो रही है। न मालूम हमारे किस दोस्त ने किस ऐयारी से शिवदत्त को गिरफ्तार कर लिया जिससे उसकी फौज हताश हो गई। थोड़े आदमी तो फाटक पर आकर लड़ रहे हैं और बहुत लोग भागे जा रहे हैं। मैंने एक सिपाही से पूछा तो उसने कहा कि मैं अपने साथियों के साथ फाटक पर पहरा दे रहा था कि यकायक कुछ सवार इसी तरफ से मैदान की ओर भागे जाते देखे। वे लोग चिल्ला-चिल्लाकर यह कहते जाते थे कि ‘तुम लोग भागो और अपनी जान बचाओ। शिवदत्त गिरफ्तार हो गया, अब तुम उसे किसी तरह से नहीं छुड़ा सकते!’ इसके बाद बहुत-से तो भाग गये और भाग रहे हैं, मगर थोड़े आदमी यहां आ गये जो लड़ रहे हैं।

तेजसिंह की बात सुनकर वीरेन्द्रसिंह वीर भाव से यह कहते हुए फाटक की तरफ लपके कि “तब तो पहले उन्हीं लोगों को भगाना चाहिए जो भागने से बच रहे हैं, जब तक दुश्मन का कोई आदमी गिरफ्तार न होगा, खुलासा हाल मालूम न होगा।”

खंडहर के फाटक पर से लौटकर तेजसिंह ने जो कुछ हाल राजा वीरेन्द्रसिंह से कहा वह बहुत ठीक था। जब रूहा अपनी बातों में फंसाकर शिवदत्त को ले गया, उसके दो घण्टे बाद भीमसेन ने अपने साथियों को तैयार होने और घोड़े कसने की आज्ञा दी। शिवदत्त के ऐयारों को ताज्जुत हुआ, उन्होंने भीमसेन से इसका सबब पूछा जिसके जवाब में भीमसेन ने केवल इतना ही कहा कि “हम क्या करते हैं सो अभी मालूम हो जायगा।” जब घोड़े तैयार हो गये तो साथियों को कुछ इशारा करके भीमसेन घोड़े पर सवार हो गया और म्यान से तलवार निकाल शिवदत्त के आदमियों को जख्मी करता और यह कहता हुआ कि “तुम लोग भागो और अपनी जान बचाओ, तुम्हारा शिवदत्त गिरफ्तार हो गया और तुम उसे किसी तरह नहीं छुड़ा सकते” मैदान की तरफ भागा। उस समय शिवदत्त के ऐयारों की आंखें खुलीं और वे समझ गये कि हम लोगों के साथ ऐयारी की गई तथा यह भीमसेन नहीं है, बल्कि कोई ऐयार है! उस समय शिवदत्त की फौज हर तरह से गाफिल और बेफिक्र थी। शिवदत्त के ऐयारों के हुक्म से यद्यपि कई आदमियों ने घोड़ों की नंगी पीठ पर सवार होकर नकली भीमसेन का पीछा किया मगर अब क्या हो सकता था, बल्कि उसका नतीजा यह हुआ कि फौजी आदमी अपने साथियों को भागता हुआ समझ खुद भी भागने लगे। ऐयारों ने रोकने के लिए बहुत उद्योग किया, परन्तु बिना मालिक की फौज कब तक रुक सकती थी, बड़ी मुश्किल से थोड़े आदमी रुके और खंडहर के फाटक पर आकर हुल्लड़ मचाने लगे, परन्तु उस समय उन लोगों की हिम्मत भी जाती रही जब बहादुर वीरेन्द्रसिंह, आनन्दसिंह, उनके ऐयार तथा शेरदिल साथी और सिपाही हाथों में नंगी तलवारें लिए उन लोगों पर आ टूटे। राजा वीरेन्द्रसिंह और कुंअर आनन्दसिंह शेर की तरह जिस तरफ झपटते थे, सफाई हो जाती थी। जिसे देख शिवदत्त के आदमियों में से बहुतों की तो यह अवस्था हो गई कि खड़े होकर उन दोनों की बहादुरी देखने के सिवाय कुछ भी न कर सकते थे। आखिर यहां तक नौबत पहुंची कि सभी ने पीठ दिखा दी और मैदान का रास्ता लिया।

इस लड़ाई में जो घण्टे भर से ज्यादा तक होती रही, राजा वीरेन्द्रसिंह के दस आदमी मारे गए और बीस जख्मी हुए। शिवदत्त के चालीस मारे गए और साठ जख्मी हुए जिनसे दरियाफ्त करने पर राजा वीरेन्द्रसिंह को भीमसेन और शिवदत्त का खुलासा हाल जैसा कि हम ऊपर लिख आए हैं मालूम हो गया, मगर इसका पता न लगा कि शिवदत्त को किसने किस रीति से गिरफ्तार कर लिया।

वीरेन्द्रसिंह ने अपने कई आदमी लाशों को हटाने और जख्मियों की हिफाजत के लिए तैनात किये और इसके बाद कुंअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए खंडहर के तहखाने में जाने का इरादा किया।

जिस तहखाने में कुंअर इन्द्रजीतसिंह थे, उसके रास्ते का हाल कई दफे लिखा जा चुका है, पुनः लिखने की कोई आवश्यकता नहीं, इसलिए केवल इतना ही लिखा जाता है कि वे दरवाजे जिनका खुलना शाहदरवाजा बन्द हो जाने के कारण कठिन हो गया था अब सुगमता से खुल गए जिससे सभी को खुशी हुई और केवल वीरेन्द्र, तेजसिंह, कमला और तारासिंह मशाल लेकर उस तहखाने के अन्दर उतर आये।

इस समय तारासिंह की अजब हालत थी। उसका कलेजा कांपता और उछलता था। वह सोचता था कि देखें कुंअर इन्द्रजीतसिंह, भैरोसिंह और कामिनी को किस अवस्था में पाते हैं। ताज्जुब नहीं कि हमारे पाठकों की भी इस समय वही अवस्था हो और वे इसी सोच-विचार में हों, मगर वहां तहखाने में तो मामला ही दूसरे ढंग का था।

तहखाने में उतर जाने के बाद राजा वीरेन्द्रसिंह, आनन्दसिंह और ऐयारों ने चारों तरफ देखना शुरू किया मगर कोई आदमी दिखाई न पड़ा और न कोई ऐसी चीज नजर पड़ी जिससे उन लोगों का पता लगता, जिनकी खोज में वे लोग तहखाने के अन्दर गए थे। न तो वह सन्दूक था जिसमें इन्द्रजीतसिंह की लाश थी और न भैरोसिंह, कामिनी या उस सिपाही की सूरत नजर आई, जो उस संदूक के साथ तहखाने में आया था, जिसमें कुंअर इन्द्रजीतसिंह की लाश थी।

वीरेन्द्रसिंह – (तारासिंह की तरफ देखकर) यहां तो कोई भी नहीं है! क्या तुमने उन लोगों को किसी दूसरे तहखाने में छोड़ा था?

तारासिंह – जी नहीं, मैंने उन सभी को इसी जगह छोड़ा। (हाथ से इशारा करके) इसी कोठरी में कामिनी ने अपने को बन्द कर रखा था!

वीरेन्द्रसिंह – कोठरी का दरवाजा खुला हुआ है, उसके अन्दर जाकर देखो तो शायद कोई हो।

कमला ने कोठरी का दरवाजा खोला और झांककर देखा इसके बाद कोठरी के अन्दर घुसकर उसने आनन्दसिंह और तारासिंह को पुकारा और उन दोनों ने भी कोठरी के अन्दर पैर रखा।

कमला, तारासिंह और आनन्दसिंह को कोठरी के अन्दर घुसे आधी घड़ी से ज्यादा गुजर गई, मगर उन तीनों में से एक भी बाहर न निकला। आखिर तेजसिंह ने पुकारा परन्तु जवाब न मिलने पर लाचार हो हाथ में मशाल लेकर तेजसिंह खुद कोठरी के अन्दर गए और इधर-उधर ढूंढ़ने लगे।

वह कोठरी बहुत छोटी और संगीन थी। चारों तरफ पत्थर की दीवारों पर खूब ध्यान देने से कोई खिड़की या दरवाजे का निशान नहीं पाया जाता था, हां ऊपर की तरफ एक छोटा-सा छेद दीवार में था मगर वह भी इतना छोटा था कि आदमी का सिर किसी तरह उसके अन्दर नहीं जा सकता था और दीवार में कोई ऐसी रुकावट भी न थी जिस पर चढ़कर या पैर रखकर कोई आदमी अपना हाथ उस मोखे (छेद) तक पहुंचा सके। ऐसी कोठरी में से यकायक कमला, तारासिंह और आनन्दसिंह का गायब हो जाना बड़े ही आश्चर्य की बात थी। तेजसिंह ने इसका सबब बहुत कुछ सोचा मगर अक्ल ने कुछ मदद न थी। वीरेन्द्रसिंह भी कोठरी के अन्दर गये और तलवार के कब्जे से हर एक दीवार को ठोंक-ठोंक देखने लगे जिससे मालूम हो जाय कि किसी जगह से दीवार पोली तो नहीं है मगर इससे भी कोई काम न चला। थोड़ी देर तक दोनों आदमी हैरान हो चारों तरफ देखते रहे। आखिर किसी आवाज ने उन्हें चौकन्ना कर दिया और वे दोनों ध्यान देकर उस छेद की तरफ देखने लगे जो उस कोठरी के अन्दर ऊंची दीवार में था और जिसमें से आवाज आ रही थी। वह आवाज यह थी –

“बस, जहां तक जल्द हो सके तुम दोनों आदमी इस तहखाने से बाहर निकल जाओ, नहीं तो व्यर्थ तुम दोनों की जान चली जायेगी। अगर बचे रहोगे तो दोनों कुमारों को छुड़ाने का उद्योग करोगे और पता लगा ही लोगे। मैं वही बिजली की तरह चमकने वाला नेजा हाथ में रखने वाली औरत हूं, पर लाचार, इस समय मैं किसी तरह तुम्हारी मदद नहीं कर सकती। अब तुम लोग बहुत जल्द रोहतासगढ़ चले जाओ, उसी जगह आकर मैं तुमसे मिलूंगी और सब हाल खुलासा कहूंगी। अब मैं जाती हूं क्योंकि इस समय मुझे भी अपनी जान की पड़ी है।”

इस बात को सुनकर दोनों आदमी ताज्जुब में आ गए और कुछ देर तक सोचने के बाद तहखाने के बाहर निकल आए।

डबडबाई आंखों के साथ उसांसें लेते हुए राजा वीरेन्द्रसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए। कैदियों और अपने कुल आदमियों को साथ लेते गए, मगर तेजसिंह ने न मालूम क्या कह-सुनकर और क्यों छुट्टी ले ली और राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ रोहतासगढ़ न गये।

राजा वीरेन्द्रसिंह रोहतासगढ़ की तरफ रवाना हुए और तेजसिंह ने दक्खिन का रास्ता लिया। इस वारदात को कई महीने गुजर गये और इस बीच में कोई बात ऐसी नहीं हुई जो लिखने योग्य हो।

बयान 3

अब हम अपने पाठकों को फिर उस मैदान के बीच वाले अद्भुत मकान के पास ले चलते हैं जिसके अन्दर इन्द्रजीतसिंह, देवीसिंह, शेरसिंह और कमलिनी के सिपाही लोग जा फंसे थे अर्थात् कमन्द के सहारे दीवार पर चढ़कर अन्दर की तरफ झांकने के बाद हंसते-हंसते उस मकान में कूद पड़े थे। हम लिख आये हैं कि जब वे लोग मकान के अन्दर कूद गए तो न मालूम क्या समझकर कमलिनी हंसी और अपनी ऐयारा तारा को साथ ले वहां से रवाना हो गई।

तारा को साथ लिए और बातें करती हुई कमलिनी दक्खिन की तरफ रवाना हुई जिधर का जंगल घना और सुहावना था। लगभग दो कोस चले जाने के बाद जंगल बहुत ही रमणीक मिला, बल्कि यों कहना चाहिए कि जैसे-जैसे वे दोनों बढ़ती जाती थीं, जंगल सुहावना और खुशबूदार जंगली फूलों की महक से बसा हुआ मिलता था। यहां तक कि दोनों एक ऐसे सुन्दर चश्मे के किनारे पहुंचीं जिसका जल बिल्लौर की तरह साफ था और जिसके दोनों किनारों पर दूर-दूर तक मौलसिरी के पेड़ लगे हुए थे। इस चश्मे का पाट दस हाथ का होगा और गहराई दो हाथ से ज्यादा न होगी। यहां की जमीन पथरीली और पहाड़ी थी।

अब ये दोनों उस चश्मे के किनारे-किनारे चलने लगीं। ज्यों-ज्यों आगे जाती थीं, जमीन ऊंची मिलती जाती थी, जिससे समझ लेना चाहिए कि यह मुकाम किसी पहाड़ी की तराई में है। लगभग आधा कोस जाने के बाद वे दोनों ऐसी जगह पहुंचीं जहां चश्मे के दोनों किनारे वाले मौलसिरी1 के पेड़ झुककर आपस में मिल गये थे और जिसके सबब से चश्मा अच्छी तरह से ढंककर मुसाफिरों का दिल लुभा लेने वाली छटा दिखा रहा था। इस जगह चश्मे के किनारे एक छोटा-सा चबूतरा था जिसकी ऊंचाई पुर्सा भर से कम न होगी। चबूतरे पर एक छोटी-सी पिण्डी इस ढब से बनी हुई थी जिसे देखते ही लोगों को विश्वास हो जाय कि किसी साधु की समाधि है।

इस ठिकाने पर पहुंचकर वे दोनों रुकीं और घोड़े से नीचे उतर पड़ीं। तारा ने अपने घोड़े का असबाब नहीं उतारा अर्थात् उसे कसा-कसाया छोड़ दिया परन्तु कमलिनी ने अपने घोड़े का चारजामा उतार लिया और लगाम उतारकर घोड़े को यों ही छोड़ दिया। घोड़ा पहले तो चश्मे के किनारे आया और पानी पीने के बाद कुछ दूर जाकर सब्ज जमीन पर चरने और खुशी-खुशी घूमने लगा। तारा ने भी अपने घोड़े को पानी पिलाया और बागडोर के सहारे एक पेड़ से बांध दिया। इसके बाद कमलिनी और तारा चश्मे के किनारे पत्थर की एक बड़ी-सी चट्टान पर बैठ गयीं और यों बातचीत करने लगीं –

कमलिनी – अब इसी जगह से मैं तुमसे अलग होऊंगी।

तारा – अफसोस, यह दुश्मनी अब हद्द से ज्यादा बढ़ चली!

कमलिनी – फिर क्या किया जाय, तू ही बता, इसमें मेरा क्या कसूर है।

तारा – तुम्हें कोई भी दोषी नहीं ठहरा सकता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महारानी अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार रही है।

कमलिनी – हर एक लक्षण पर ध्यान देने से अब महारानी को भी निश्चय हुआ है कि ये ही दोनों भाई तिलिस्म के मालिक होंगे, फिर उसके लिए जिद करना और उन दोनों की जान लेने का उद्योग करना भूल नहीं तो क्या है?

तारा – बेशक भूल है और इसकी वह सजा पावेंगी। तुमने बहुत अच्छा किया कि उनका साथ छोड़ दिया। (मुस्कराकर) इसके बदले में जरूर तुम्हारी मुराद पूरी होगी।

कमलिनी – (ऊंची सांस लेकर) देखें, क्या होता है।

तारा – होना क्या है क्या उनकी आंखों ने उनके दिल का हाल तुमसे नहीं कह दिया?

कमलिनी – हां, ठीक है। खैर, इस समय तो उन पर भारी मुसीबत आ पड़ी है। जहां तक हो सके उन्हें जल्द बचाना चाहिए।

तारा – मगर मुझे ताज्जुब मालूम होता है कि उनके छुड़ाने का कोई उद्योग किए बिना ही तुम यहां चली आयीं।

कमलिनी – क्या तुझे मालूम नहीं कि नानक ने इसी ठिकाने मुझसे मिलने का वादा लिया है उसने कहा था कि जब मिलना हो, इसी ठिकाने आना।

  1. इसका नाम ‘मौलिश्री’ भी है।

तारा – (कुछ सोचकर) हां – हां, ठीक है, अब याद आया। तो क्या वह यही जगह है?

कमलिनी – हां, यही जगह है।

तारा – मगर तुम तो इस तरह घोड़ा फेंके चली आयीं, जैसे कई दफे जाने-आने के कारण यहां का रास्ता तुम्हें बखूबी याद हो।

कमलिनी – बेशक मैं यहां कई दफे आ चुकी हूं। बल्कि नानक को इस ठिकाने का पता पहले मैंने ही बताया था, और यहां का कुछ भेद भी कहा था।

तारा – अफसोस, इस जगह का भेद तुमने आज तक मुझसे कुछ नहीं कहा।

कमलिनी – यद्यपि तू ऐयारा है और मैं तुझे चाहती हूं, परन्तु तिलिस्मी कायदे के मुताबिक मेरे भेदों को तू नहीं जान सकती।

तारा – सो तो मैं जानती हूं मगर अफसोस इस बात का है कि मुझसे तो तुमने छिपाया और नानक को यहां का भेद बता दिया। न मालूम, नानक की कौन-सी बात पर तुम रीझ गई हो?

कमलिनी – (कुछ हंसकर और तारा के गाल पर धीरे से चपत मारकर) बदमाश कहीं की, मैं नानक पर क्यों रीझने लगी?

तारा – (झुंझलाकर) तो फिर ऐसा क्यों किया?

कमलिनी – अरे, उससे उस कोठरी की ताली जो लेनी है, जिसमें खून से लिखी हुई किताब रखी है।

तारा – तो फिर ताली लेने के पहले ही यहां का भेद उसे क्यों बता दिया अगर वह ताली न दे तब?

कमलिनी – ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि भूतनाथ ने मेरी दिलजमई कर दी है और वह भूतनाथ के कब्जे में है।

“हां-हां, वह मेरे कब्जे में है – “ उसी समय यह आवाज पेड़ों के झुरमुट में से, जो कमलिनी के पीछे की तरफ था, आई और कमलिनी ने फिरकर देखा तो भूतनाथ की सूरत दिखाई पड़ी।

कमलिनी – अजी आओ भूतनाथ, तुम कहां थे मैं बड़ी देर से यहां बैठी हूं, नानक कहां है?

बात की बात में नानक भी वहां आ पहुंचा और कमलिनी को सलाम करके खड़ा हो गया।

कमलिनी – कहो जी नानकप्रसाद, अब वादा पूरा करने में क्या देर है?

नानक – कुछ देर नहीं। मैं तैयार हूं, परन्तु आप भी अपना वादा पूरा कीजिये और समाधि पर हाथ रखकर कसम खाइये।

कमलिनी – हां-हां, लो, मैं अपना वादा पूरा करती हूं।

भूतनाथ – मेरा भी ध्यान रखना।

कमलिनी – अवश्य।

कमलिनी उठी और समाधि के पास जाकर खड़ी हो गयी। पहले तो उसने समाधि के सामने अदब से सिर झुकाया और तब उस पर हाथ रखकर यों बोली –

“मैं उस महात्मा की समाधि पर हाथ रखकर कसम खाती हूं जो अपना सानी नहीं रखता था, हर एक शास्त्र का पूरा पण्डित, पूरा योगी, भूत-भविष्य और वर्तमान का हाल जानने वाला और ईश्वर का सच्चा भक्त था। यद्यपि यह उसकी समाधि है परन्तु मुझे विश्वास है कि योगिराज सजीव हैं और मेरी रक्षा का ध्यान उन्हें सदैव रहता है। (हाथ जोड़कर) योगिराज से मैं प्रार्थना करती हूं कि मेरी प्रतिज्ञा को निबाहें। (समाधि पर हाथ रखकर) यदि नानक मुझे वह ताली दे देगा तो मैं उसके साथ कभी दगा न करूंगी, उसे अपने भाई के समान मानूंगी और उसी काम में उद्योग करूंगी जिसमें उसकी खुशी हो। मैं उस आदमी के लिए भी कसम खाती हूं जिसने अपना नाम भूतनाथ रखा हुआ है। उसे मैं अपने सहोदर भाई के समान मानूंगी और जब तक वह मेरे साथ बुराई न करेगा, मैं उसकी भलाई करती रहूंगी।”

इतना कहकर कमलिनी समाधि से अलग हो गयी। नानक ने एक छोटी-सी डिबिया कमलिनी के हाथ में दी। और उसके पैरों पर गिर पड़ा। कमलिनी ने पीठ ठोंककर उसे उठाया। और उस डिबिया को इज्जत के साथ सिर से लगाया। इसके बाद चारों आदमी फिर उस पत्थर की चट्टान पर आकर बैठ गये और बातचीत होने लगी।

भूतनाथ – (कमलिनी से) जब आपने मुझे और नानक को अपने भाई के समान मान लिया तो मुझे जो कुछ आपसे कहना हो, दिल खोलकर कह सकता हूं और जो कुछ मांगना हो मांग सकता हूं चाहे आप दें अथवा न दें।

कमलिनी – (मुस्कुराकर) हां – हां, जो कुछ कहना हो कहो और जो मांगना हो, मांगो।

भूतनाथ – इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके पास एक से एक बढ़कर अनमोल चीजें होंगी, अस्तु मुझे और नानक को कोई ऐसी चीज दीजिए जो समय पर काम आये और दुश्मनों को धमकाने और उन पर फतह पाने के लिए बेनजीर हो।

कमलिनी – इसके कहने की तो कोई जरूरत न थी, मैं स्वयं चाहती थी कि तुम दोनों को कोई अनमोल वस्तु दूं, खैर ठहरो, मैं अभी ला देती हूं।

इतना कहकर कमलिनी उठी और चश्मे के जल में कूद पड़ी। उस जगह जल बहुत गहरा था, इसलिए मालूम न हुआ कि वह कहां चली गयी। कमलिनी के इस काम ने सभी को ताज्जुब में डाल दिया और तीनों आदमी टकटकी बांधकर उसी तरफ देखने लगे।

आधे घण्टे बाद कमलिनी जल के बाहर निकली। उसके एक हाथ में छोटी-सी कपड़े की गठरी और दूसरे हाथ में लोहे की जंजीर थी। यद्यपि कमलिनी जल में से निकली थी और उसके कपड़े गीले हो रहे थे, तथापि उस कपड़े की गठरी पर जल ने कुछ भी असर न किया था, जिसे कमलिनी लाई थी।

कमलिनी ने कपड़े की गठरी पत्थर की चट्टान पर रख दी और लोहे की जंजीर भूतनाथ के हाथ में देकर बोली, “इसे तुम दोनों आदमी मिलकर खींचो।” उस जंजीर के साथ लोहे का एक छोटा-सा मगर हलका सन्दूक बंधा हुआ था, जिसे भूतनाथ और नानक ने खींचकर बाहर निकाला।

कमलिनी ने एक खटका दबाकर सन्दूक खोला। इसके अन्दर चार खंजर, एक नेजा और पांच अंगूठियां थीं। कमलिनी ने पहले एक अंगूठी निकाली और अपनी अंगुली में उसे पहिन लिया, इसके बाद एक खंजर निकाला और उसे म्यान से बाहर कर तारा, भूतनाथ और नानक को दिखाकर बोली, “देखो इस खंजर का लोहा कितना उम्दा है।”

भूतनाथ – बेशक बहुत उम्दा लोहा है।

कमलिनी – अब इसके गुण सुनो। यह खंजर जिस चीज पर पड़ेगा उसे दो टुकड़े कर देगा चाहे वह चीज लोहा, पत्थर, अष्टधातु या फौलादी हर्बा क्यों न हो। इसके अतिरिक्त जब इसका कब्जा दबाओगे तो इसमें बिजली की तरह चमक पैदा होगी, उस समय यदि सौ आदमी भी तुम्हें घेरे हुए खड़े होंगे तो चमक से सभी की आंखें बन्द हो जायंगी। यद्यपि इस समय दिन है और किसी तरह की चमक सूर्य का मुकाबला नहीं कर सकती, तथापि इसका मजा मैं तुम्हें दिखाती हूं।

इतना कहकर कमलिनी ने खंजर का कब्जा दबाया। यकायक इतनी ज्यादा चमक उसमें से पैदा हुई कि दिन का समय होने पर भी उन तीनों की आंखें बन्द हो गईं। मालूम हुआ कि एक बिजली-सी आंख के सामने चमक गई।

कमलिनी – सिवाय इसके इस खंजर को जो कोई छूएगा या जिसके बदन से यह खंजर छुआ दोगे उसके खून में एक प्रकार की बिजली दौड़ जायगी और वह तुरत बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ेगा। लो, इसे तुम लोग छूकर देखो, यही अद्भुत खंजर मैं तुम लोगों को दूंगी।

कमलिनी ने खंजर भूतनाथ के आगे रख दिया। भूतनाथ ने उसे उठाना चाहा मगर हाथ लगाने के साथ ही वह कांपा और बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ा। कमलिनी ने अपना दूसरा हाथ, जिसमें अंगूठी थी, उसके बदन पर फेरा तब उसे होश आया।

भूतनाथ – चीज तो बहुत अच्छी है मगर इसका छूना गजब है।

कमलिनी – (सन्दूक में से कई अंगूठियां निकालकर) पहले इन अंगूठियों को तुम लोग पहिनो तब इस खंजर को हाथ में ले सकोगे और तभी इसकी तेज चमक भी तुम्हारी आंखों पर अपना पूरा असर न कर सकेगी अर्थात् जो कोई मुकाबले में या तुम्हारे चारों तरफ होगा उसकी आंखें तो बन्द हो जायेंगी, मगर तुम्हारी आंखें खुली रहेंगी और तुम दुश्मनों को बखूबी मार सकोगे।

इतना कहकर कमलिनी ने एक-एक अंगूठी तीनों को पहिना दी और इसके बाद एक-एक खंजर तीनों के हवाले किया। तारा, भूतनाथ और नानक ऐसा अद्भुत खंजर पाकर हद से ज्यादा खुश हुए और घड़ी-घड़ी उसका कब्जा दबाकर उसकी चमक का मजा लेते रहे।

कमलिनी – अब एक खंजर और एक अंगूठी बच गई सो कुंअर इन्द्रजीतसिंह के लिए अपने पास रखूंगी। जिस समय उनसे मुलाकात होगी उनके हवाले करूंगी, और यह अंगूठी जो मेरी उंगली में है और यह नेजा, जो अपने वास्ते लाई हूं, इसमें भी वही गुण हैं जो खंजर में हैं मगर फर्क इतना है कि बनिस्बत खंजर के इस नेजे में बिजली का असर बहुत ज्यादे है।

उस नेजे के चार टुकड़े थे जो पेंच पर चढ़ाकर एक कर दिये जाते थे। कमलिनी ने इन चारों टुकड़ों को एक कर दिया और अब वह पूरा नेजा हो गया।

भूतनाथ – इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपने हम लोगों को अद्भुत और अनमोल चीज दी, इसकी बदौलत हम लोगों के हाथ से बड़े-बड़े काम निकलेंगे।

इसके बाद कमलिनी ने वह कपड़े की गठरी खोली। इसमें स्याह रंग की एक साड़ी, एक चोली और एक बोतल थी। कमलिनी उठकर समाधि के पीछे गई और गीले कपड़े उतारकर वही काली साड़ी और चोली पहिरकर अपने ठिकाने आ बैठी। वह साड़ी और चोली रेशमी थी और उसमें एक प्रकार का रोगन चढ़ा हुआ था जिसके सबब उस कपड़े पर पानी का असर नहीं होता था। कमलिनी ने वह गीली साड़ी और चोली तारा के सामने रख दी और बोली, “इसे तू पेड़ पर डाल दे जिससे झटपट सूख जाय, इसके बाद तू कमलिनी बन जा अर्थात् मेरी तरह अपनी सूरत बना ले और इसी साड़ी और चोली को पहिरकर मेरे घर अर्थात् उस तालाब वाले मकान में जाकर बैठ जिससे नौकरों को मेरे गायब होने का हाल मालूम न हो, वे यही समझें कि तारा कहीं गई हुई है!

तारा – बहुत अच्छा, मगर आप कहां जायंगी?

कमलिनी – मेरा कोई ठिकाना नहीं, मुझे बहुत काम करना है। (भूतनाथ और नानक की तरफ देखकर) आप लोग भी जाइये और जहां तक हो सके, राजा वीरेन्द्रसिंह की भलाई का उद्योग कीजिये।

नानकप्रसाद – बहुत अच्छा। (हाथ जोड़कर) मेरी बात का जवाब दीजिए तो बड़ी कृपा होगी।

कमलिनी – वह क्या?

नानकप्रसाद – इस प्रकार का खंजर उन लोगों के पास भी है या नहीं?

कमलिनी – (हंसकर) क्या उन लोगों के पास पुनः जाने की इच्छा है अपनी रामभोली को देखा चाहता है?

नानकप्रसाद – हां, यदि मौका मिलेगा तो।

कमलिनी – अच्छा जा, कोई हर्ज नहीं, इस प्रकार की कोई वस्तु उन लोगों के पास नहीं है और न इसका पता ही उन्हें मिल सकता है। मगर जो कुछ करना, होशियारी के साथ।

इसके बाद कमलिनी ने वह बोतल खोली जो कपड़े की गठरी में थी। उसमें किसी प्रकार का अर्क था। समाधि के पीछे जाकर कमलिनी ने वह अर्क अपने तमाम बदन में लगाया जिससे बात की बात में उसका रंग बहुत ही काला हो गया, तब वह फिर तारा के पास आई और उससे दो लम्बे बनावटी दांत लेकर अपने मुंह में लगाने के बाद नेजा हाथ में लेकर खड़ी हो गई।

तारा ने भी अपनी सूरत बदली और कमलिनी बनकर तैयार हो गई । इस काम में भूतनाथ ने उसकी मदद की। कमलिनी के हुक्म से वह सन्दूक और जंजीर पानी में डाल दी गई।

कमलिनी ने अपने घोड़े को आवाज दी। यद्यपि वह कुछ दूर पर चर रहा था, परन्तु मालिक की आवाज के साथ ही दौड़ता हुआ पास आ गया। तारा ने उसे पकड़ लिया और चारजामा कसकर उस पर सवार हो गई तथा कमलिनी तारा के घोड़े पर सवार हुई। अन्त में चारों आदमी कुछ सलाह करके अलग हुए और चारों ने अपना-अपना रास्ता लिया अर्थात् उसी जगह से चारों आदमी जुदा हो गए।

इस वारदात के कई दिन बाद कमलिनी इसी राक्षसी वेश में नेजा लिए रोहतासगढ़ की पहाड़ी पर कब्रिस्तान में कमला से मिली थी, इसी ने राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को कैद से छुड़ाया, और फिर भी कई दफे उनके काम आई थी, जिसका हाल पिछले बयानों में लिखा जा चुका है।

बयान 4

अब तो मौसम में फर्क पड़ गया। ठंडी-ठंडी हवा जो कलेजे को दहला देती थी और बदन में कंपकंपी पैदा करती थी अब भली मालूम पड़ती है। वह धूप भी, जिसे देख चित्त प्रसन्न होता था और जो बदन में लगकर रग-रग से सर्दी निकाल देती थी, अब बुरी मालूम होती है। यद्यपि अभी आसमान पर बादल के टुकड़े दिखाई नहीं देते तथापि संध्या के समय मैदान, बाग और तराई की ठंडी-ठंडी और शीतल तथा मन्द-मन्द वायु सेवन करने को जी चाहता है। वहां से हिलते हुए पेड़ों की कोमल-कोमल पत्तियों की बहार आंखों की राह घुसकर अन्दर से दिल को अपनी तरफ खींच लेती है तथा टकटकी बंधी हुई आंखों को दूसरी तरफ देखने का यकायक मौका नहीं मिलता। यद्यपि सूर्य अस्त हुआ ही चाहता है और आसमान पर उड़ने वाले परिन्दों के उतार और जमीन की तरफ झुके हुए एक ही तरफ उड़े जाने से मालूम होता है कि बात की बात में चारों तरफ अंधेरा छा जायगा तथापि हम अपने पाठकों को किसी पहाड़ की तराई में ले चलकर एक अनूठा रहस्य दिखाया चाहते हैं।

तीन तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और बीच में कोसों तक का मैदान रमणीक तो है परन्तु रात की अवाई और सन्नाटे ने उसे भयानक बना दिया है। सूर्य अस्त होने में अभी विलम्ब है परन्तु ऊंचे-ऊंचे पहाड़ सूर्य की आखिरी लालिमा को इस मैदान में पहुंचने नहीं देते। चारों तरफ सन्नाटा है, जहां तक निगाह काम करती है इस मैदान में आदमी की सूरत दिखाई नहीं पड़ती, हां पश्चिम तरफ वाले पहाड़ के नीचे एक छोटा चमड़े का खेमा दिखाई पड़ता है। इस समय हमें इसी खेमे से मतलब है और इसी के दरवाजे पर पहुंचकर अपना काम निकाला चाहते हैं।

इस खेमे के दरवाजे पर केवल एक आदमी कमर में खंजर लगाए टहल रहा है। यद्यपि इसकी जवानी ने इसका साथ छोड़ दिया है और फिक्र ने इसे दुर्बल कर दिया है मगर फुर्ती, मजबूती और दिलेरी ने अभी तक इसके साथ दुश्मनी नहीं की और वे इस गई-गुजरी हालत में भी इसका साथ दिए जाती हैं। इस आदमी की सूरत-शक्ल के बारे में हमें कुछ विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारे पाठक इसे पहचानते हैं और जानते हैं कि इसका नाम ‘भूतनाथ’ है।

भूतनाथ को खेमे के दरवाजे पर टहलते हुए देर हो गई। वह न मालूम किस सोच में डूबा हुआ था कि सिर नीचा किये हुए सिवाय टहलने के इधर-उधर देखने की उसे बिल्कुल फुरसत न थी, हां कभी-कभी वह सिर उठाता और एक लम्बी सांस लेकर केवल उत्तर की तरफ देखता और सिर नीचा कर फिर उसी तरह टहलने लगता। अब सूर्य ने अपना मुंह अच्छी तरह जमीन के पर्दे में छिपा लिया और भूतनाथ ने कुछ बेचैन होकर उत्तर की तरफ देख धीरे से कहा, “अब तो बहुत ही विलम्ब हो गया, क्या बेमौके जान आफत में फंसी है।”

यकायक तेजी के साथ घोड़ा दौड़ाता हुआ एक सवार उत्तर की तरफ से आता हुआ दिखाई पड़ा। कुछ और पास आने से मालूम हो गया कि वह औरत है मगर सिपाहियाना ठाठ में, ढाल-तलवार के सिवाय उसके पास कोई हरबा न था। इस औरत की उम्र लगभग चालीस वर्ष की होगी। सूरत-शक्ल से मालूम होता था कि किसी समय में यह बहुत ही हसीन और दिल लुभाने वाली रही होगी। बात की बात में यह औरत खेमे के पास आ पहुंची और घोड़े से उतरकर उसकी लगाम खेमे की एक डोरी से अटका देने के बाद भूतनाथ के पास आकर बोली, “शाबाश भूतनाथ, बेशक तुम वादे के सच्चे हो।”

भूतनाथ – मगर अभी तक मेरी समझ में यह न आया कि तुम मुझसे दुश्मनी रखती हो या दोस्ती।

औरत – (हंसकर) अगर तुम ऐसे ही समझदार होते तो जीते-जागते और निरोग रहने पर भी मुर्दों में क्यों गिने जाते?

भूतनाथ – (कुछ सोचकर) खैर जो हुआ सो हुआ, अब मुझसे क्या चाहती हो?

औरत – तुमसे एक काम कराया चाहती हूं।

भूतनाथ – वह कौन काम है जिसे तुम स्वयं नहीं कर सकतीं?

औरत – केवल यही एक काम!

भूतनाथ – (आश्चर्य की रीति से गर्दन हिलाकर) खैर कहो तो सही, करने लायक होगा तो करूंगा।

औरत – मैं खूब जानती हूं कि तुम उस काम को सहज ही में कर सकते हो।

भूतनाथ – तब कहने में देर क्यों करती हो?

औरत – अच्छा सुनो, यह तो जानते ही हो कि कमलिनी को ईश्वर ने अद्भुत बल दे रखा है।

भूतनाथ – हां बेशक! उसमें कोई दैवी शक्ति है, वह जो कुछ चाहे, सो कर सकती है। जो कोई उसे जानता है वही कहेगा कि कमलिनी को कोई जीत नहीं सकता।

औरत – हां ठीक है परन्तु मैं खूब जानती हूं कि तुम कमलिनी से ज्यादा ताकत रखते हो।

भूतनाथ – (चौंक और कांपकर) इसका क्या मतलब?

औरत – मतलब यही कि तुम अगर चाहो तो उसे मार सकते हो।

भूतनाथ – मगर मैं ऐसा क्यों करने लगा?

औरत – केवल मेरी आज्ञा से।

इतना सुनते ही भूतनाथ के चेहरे पर मुर्दनी छा गई, उसका कलेजा कांपने लगा और सिर कमजोर होकर चक्कर खाने लगा, यहां तक कि वह अपने को संभाल न सका और जमीन पर बैठ गया। मालूम होता था कि उस औरत की आखिरी बात ने उसका खून निचोड़ लिया है। न मालूम क्या सबब था कि निडर होकर भी एक साधारण और अकेली औरत की बातों का जवाब नहीं दे सकता और उसकी सूरत से मजबूरी और लाचारी झलक रही है।

भूतनाथ की ऐसी अवस्था देखकर उस औरत को किसी तरह का रंज नहीं हुआ बल्कि वह मुस्कुराई और उसी जगह घास पर बैठकर न मालूम क्या सोचने लगी। थोड़ी देर बाद जब भूतनाथ का जी ठिकाने हुआ तो उसने उस औरत की तरफ देखा और हाथ जोड़कर कहा, “क्या सचमुच मुझे ऐसा हुक्म लगाया जाता है’?

औरत – हां, कमलिनी का सिर लेकर मेरे पास हाजिर होना पड़ेगा और यह काम सिवाय तेरे और कोई भी नहीं कर सकता, क्योंकि वह तुझ पर विश्वास रखती है।

भूतनाथ – (कुछ सोचकर) नहीं-नहीं, मेरे किए यह काम न होगा। जो कुछ कर चुका हूं उसी के प्रायश्चित से आज तक छुट्टी नहीं मिलती।

औरत – क्या तू मेरा हुक्म टाल सकता है क्या तुझमें इतनी ताकत है?

यह सुन भूतनाथ बहुत बेचैन हुआ। वह उठ खड़ा हुआ और सिर नीचा किए इधर-उधर टहलने और नीचे लिखी बातें धीरे-धीरे बोलने लगा –

“आह मुझ-सा बदनसीब भी दुनिया में कोई न होगा। मुद्दत तक मुर्दों में अपनी गिनती कराई, अब ऐसा संयोग हो गया कि अपने को जीता-जागता साबित करूं, मगर अफसोस, करी-कराई मेहनत मिट्टी हुआ चाहती है। हाय, उस आदमी के साथ जिसमें नेकी कूट-कूटकर भरी है, मैं बदी करने के लिए मजबूर किया जा रहा हूं। क्या उसके साथ बदी करने वाला कभी सुख भोग सकता है नहीं-नहीं, कभी नहीं, फिर मैं ऐसा क्यों करूं मगर मेरी जान क्योंकर बच सकती है, इसका हुक्म न मानना मेरी कुदरत के बाहर है। हाय, एक दफे की भूल जन्म-भर के लिए दुःखदायी हो जाती है। शेरसिंह सच कहता था, इन्हीं बातों को सोचकर उसने मेरा नाम ‘काल’ रख दिया था और उसे मेरी सूरत से घृणा हो गई थी। (कुछ देर तक चुप रहकर) ओफ, मैं भी व्यर्थ के विचार में पड़ा हूं, आखिर जान तो जायेगी ही, इसका हुक्म मानूंगा तो भी मारा जाऊंगा और यदि न मानूंगा तो भी मौत की तकलीफ उठाऊंगा और तमाम दुनिया में मेरी बुराई फैलेगी। (चौंककर) राम – राम, मुझे क्या हो गया जो…

भूतनाथ – (उस औरत की तरफ देखके) अच्छा मैं कमलिनी को मारने के लिए तैयार हूं, मगर इसके बदले में मुझे इनाम क्या मिलेगा?

औरत – (हंसकर) तू इस लायक नहीं है कि तुझे इनाम दिया जाये।

भूत – क्या मैं इस दर्जे को पहुंच गया?

औरत – बेशक।

भूत – नहीं, कभी नहीं! जा, मैं तेरा हुक्म नहीं मानता। देखूं तू मेरा क्या कर लेती है!

औरत – भूतनाथ, देख खूब सोचकर कोई बात मुंह से निकाल, ऐसा न हो कि अन्त में पछताना पड़े।

भूत – जा-जा, जो करते बने कर ले।

भूतनाथ की आखिरी बात सुनकर वह औरत क्रोध में आकर कांपने लगी। उसके होंठ कांप रहे थे मगर कुछ कहना मुश्किल हो रहा था।

इस समय चारों तरफ अंधेरा छा चुका था अर्थात् रात बखूबी हो चुकी थी। थोड़ी देर के लिए दोनों आदमी चुप हो गये, यकायक घोड़ों की टापों की आवाज (जो बहुत दूर से आ रही थी) भूतनाथ के कान में पड़ी और साथ ही इसके वह औरत भी बोल उठी, “अच्छा देख, मैं तेरी ढिठाई का कैसा मजा चखाती हूं।”

भूतनाथ पहले तो कुछ घबड़ाया मगर उसने तुरन्त ही अपने को संभाला और कमर से खंजर निकालकर उस औरत के सामने खड़ा हो गया। वह खंजर वही था जो कमलिनी ने उसे दिया था। कब्जा दबाते ही खंजर में से बिजली की चमक पैदा हुई जिसके सबब से उस औरत की आंखें बन्द हो गईं और वह बावली-सी हो गई तथा उस समय तो उसे तन-बदन की सुध भी न रही जब भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से छुआ दिया।

भूतनाथ ने बड़ी होशियारी से उस बेहोश औरत को उसके घोड़े पर लादा और आप भी उसी पर सवार हो तेजी के साथ मैदान का रास्ता लिया। थोड़ी दूर जाकर भूतनाथ ने बेहोशी की तेज दवा उसे सुंघाई, जिससे वह औरत बहुत देर के लिए मुर्दे जैसी हो गई। हमको इससे कोई मतलब नहीं कि वे सवार जिनके घोड़ों के टापों की आवाज भूतनाथ के कान में पड़ी थी कौन थे और उन्होंने वहां पहुंचकर क्या किया जहां से भूतनाथ उस औरत को ले भागा था, हम केवल भूतनाथ के साथ चलते हैं, जिससे उस औरत का और भूतनाथ का हाल मालूम हो।

यद्यपि रात अंधेरी और रास्ता पथरीला था तथापि भूतनाथ ने चलने में कसर न की। थोड़ी-थोड़ी दूर पर घोड़ा ठोकर खाता था जिससे भूतनाथ को तकलीफ होती थी और वह बड़ी मुश्किल से उस बेहोश औरत को संभाले लिए जाता था मगर यह तकलीफ ज्यादा देर के लिए न थी क्योंकि पहर भर के बाद ही आसमान पर कुदरती माहताबी जलने लगी और उसकी (चन्द्रमा की) रोशनी ने चारों तरफ ठंडक और खूबसूरती के साथ उजाला कर दिया। ऐसी अवस्था में भूतनाथ ने रुकना उचित न समझा और सबेरा होने तक तेजी के साथ बराबर चलता गया। जिस समय आसमान पर सुबह की सफेदी फैल रही थी, घोड़े ने यहां तक हिम्मत हार दी कि दस कदम भी चलना उसके लिए कठिन हो गया। लाचार भूतनाथ घोड़े के नीचे उतरा और उस औरत को भी उतार लिया। घोडा उसी समय जमीन पर गिर पड़ा, मगर भूतनाथ ने उसकी कुछ परवाह न की।

कमर से चादर खोल उसने औरत की गठरी बांधी और पीठ पर लाद आगे का रास्ता लिया।

पहर भर चलते जाने बाद भूतनाथ एक ऐसी पहाड़ी के नीचे पहुंचा जिसकी ऊंचाई बहुत ज्यादा न थी मगर खुशनुमा और सायेदार दरख्त पहाड़ी के ऊपर तथा उसकी तराई में बहुत थे। पहाड़ी की चोटी पर सलई का एक ऊंचा पेड़ था और उसके ऊपर लम्बी कांड़ी में लगा हुआ एक लाल फरहरा (ध्वजा) दूर से दिखाई दे रहा था। यह निशान कमलिनी का लगाया हुआ था। भूतनाथ, तारा और नानक से मिलने के लिए कमलिनी ने एक यह जगह भी मुकर्रर की थी और निश्चय कर रखा था कि जब इन चारों में किसी को किसी से मिलने की आवश्यकता पड़े तो वह इसी जगह आवे और यदि किसी से मुलाकात न हो, इस झंडे को झुका हुआ देखे तो तुरन्त इस पहाड़ी के नीचे आवे और नियत स्थान पर अपने साथी को ढूंढे। यह फरहरा बहुत दूर से दिखाई देता था और यह पहाड़ी रोहतासगढ़ और गयाजी के बीच में पड़ती थी।

उस औरत को पीठ पर लादे हुए भूतनाथ पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगा। लगभग दो सौ कदम जाने के बाद रास्ता छोड़कर दाहिनी तरफ घूमा जिधर छोटे-छोटे जंगली पेड़ों की गुंजान झाड़ी दूर तक चली गई थी। उस झाड़ी में आदमी बखूबी छिप सकता था अर्थात् उस झाड़ी के पेड़ यद्यपि छोटे थे परन्तु आदमी की ऊंचाई से उन पेड़ों की ऊंचाई कुछ ज्यादा थी। भूतनाथ दोनों हाथ से पेड़ों को हटाता कुछ दूर तक चला गया। आखिर उसे एक गुफा मिली जिसका मुंह जंगली लताओं ने अच्छी तरह ढांक रखा था। भूतनाथ उस गुफा के अन्दर चला गया और अपना बोझ अर्थात् उस औरत को गुफा के अन्दर छोड़ बाहर निकल आया। इसके बाद पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गया और सलई के पेड़ पर चढ़कर लाल फरहरे (झण्डे) को झुकाने का इरादा किया परन्तु उसी समय सलई के पेड़ पर चढ़ी हुई कमलिनी उसे दिखाई पड़ी जो फरहरा झुकाने का उद्योग कर रही थी। इस समय भी कमलिनी उसी राक्षसी के भेष में थी जैसा कि ऊपर के बयानों में लिख आए हैं। भूतनाथ ने कमलिनी को पहचाना और उसने भी भूतनाथ को देखा। कमलिनी पेड़ से नीचे उतर आई और बोली –

कमलिनी – खूब पहुंचे, मैं तुमसे मिला चाहती थी, इसीलिए झण्डा झुकाने का उद्योग कर रही थी।

भूतनाथ – मैं खुद तुमसे मिलना चाहता था, इसीलिए यहां तक आया हूं। यदि इस समय तुम न मिलतीं तो मैं इस पेड़ पर चढ़कर फरहरा झुकाता।

कमलिनी – कहो, क्या बात है और कौन-सी जरूरत आ पड़ी?

भूतनाथ – पहले तुम कहो कि मुझसे मिलने की क्या आवश्यकता थी?

कमलिनी – नहीं-नहीं, पहले तुम्हारा हाल सुन लूंगी तब कुछ कहूंगी, क्योंकि तुम्हारे चेहरे पर घबराहट और उदासी हद्द से ज्यादा पाई जाती है।

भूतनाथ – बेशक ऐसा ही है और मैं तुमसे आखिरी मुलाकात करने आया हूं, क्योंकि अब जीने की उम्मीद नहीं रही और खुली बदनामी बल्कि कलंक मंजूर नहीं।

कमलिनी – क्यों-क्यों, ऐसी क्या आफत आ गई, कुछ कहो तो सही!

भूतनाथ – मेरे साथ पहाड़ी के नीचे चलो। मैं एक औरत को बेहोश करके लाद लाया हूं, जो उसी खोह के अन्दर है, पहले उसे देख लो तब मेरी सुनो।

कमलिनी – खैर ऐसा ही सही, चलो।

भूतनाथ के साथ-ही-साथ कमलिनी पहाड़ी के नीचे उतरी और उस खोह के मुहाने पर आकर बैठ गई जिसके अन्दर भूतनाथ ने उस औरत को रखा था। भूतनाथ उस बेहोश औरत को खोह के बाहर निकाल लाया। कमलिनी उस औरत को देखते ही चौंकी और उठ खड़ी हुई।

भूतनाथ – इसी के मारे मेरी जिन्दगी जवाल हो रही है, मगर तुम इसे देखकर चौंकी क्यों क्या इस औरत को पहचानती हो?

कमलिनी – हां, मैं इसे पहचानती हूं। यह वह काली नागिन है कि जिसके डंसने का मन्त्र ही नहीं! जिसे इसने काटा वह पानी तक नहीं मांगता, तुमने इसके साथ दुश्मनी की सो अच्छा नहीं किया।

भूतनाथ – मैंने जान-बूझकर इसके साथ दूश्मनी नहीं की। तुम खुद जानती हो कि मैं इसके काबू में हूं किसी तरह इसका हुक्म टाल नहीं सकता, मगर कल इसने जो कुछ काम करने के लिए मुझे कहा वह मैं किसी तरह नहीं कर सकता था और इनकार की भी हिम्मत न थी, लाचार इसी खंजर की मदद से गिरफ्तार कर लाया हूं। अब कोई ऐसी तरकीब निकालो जिसमें जान बचे और मैं वीरेन्द्रसिंह को मुंह दिखाने लायक हो जाऊं।

कमलिनी – मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रहे हो! मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि तुम इसके कब्जे में क्योंकर फंसे हो, न तुमने इसके बारे में कभी मुझसे कुछ कहा ही।

भूतनाथ – बेशक मैं इसका हाल तुमसे कह चुका हूं और यह भी कह चुका हूं कि इसी की बदौलत मुझे मरना पड़ा, बल्कि तुमने वादा किया था कि इसके हाथ से तुम्हें छुट्टी दिला दूंगी।

कमलिनी – हां, वह बात मुझे याद है, मगर तुमने तो श्यामा का नाम लिया था!

भूतनाथ – ठीक है, वह यही श्यामा है।

कमलिनी – (हंसकर) इसका नाम श्यामा नहीं है मनोरमा है। मैं इसकी सात पुश्तों को जानती हूं। बेशक इसने अपने नाम में भी तुमको धोखा दिया। खैर, अब मालूम हुआ कि तुम्हें इसी ने सता रखा है, तुम्हारे हाथ की लिखी हुई दस्तावेज इसी के कब्जे में है और इस सबब से तुम इसे जान से मार भी नहीं सकते। इसने मुझे भी कई दफे धोखा देना चाहा था मगर मैं कब इसके पंजे में आने वाली हूं। हां, यह तो कहो कि इसने क्या काम करने के लिए कहा था?

भूतनाथ – इसने कहा था कि तू कमलिनी का सिर काटकर मेरे पास ले आ, यह काम तुझसे बखूबी हो सकेगा क्योंकि वह तुझ पर विश्वास करती है।

कमलिनी – (कुछ देर तक सोचकर) खैर, कोई हर्ज नहीं। पहले तो मुझे इसकी कोई विशेष फिक्र न थी, परन्तु अब इसके साथ चाल चले बिना काम नहीं निकलता। देखो तो, मैं इसे कैसा दुरुस्त करती हूं और तुम्हारे कागजात भी इसके कब्जे से कैसे निकालती हूं।

भूतनाथ – मगर इस काम में देर न करनी चाहिए।

कमलिनी – नहीं-नहीं, देर न होगी, क्योंकि कुंअर इन्द्रजीतसिंह को छुड़ाने के लिए भी मुझे इसी के मकान पर जाना पड़ेगा। बस, दोनों काम एक साथ ही निकल जायेंगे।

भूतनाथ – अच्छा, तो अब क्या करना चाहिए?

कमलिनी – (हाथ का इशारा करके) तुम इस झाड़ी में छिप रहो, मैं इसे होश में लाकर कुछ बातचीत करूंगी। आज यह मुझे किसी तरह नहीं पहचान सकती।

भूतनाथ झाड़ी के अन्दर छिप रहा। कमलिनी ने अपने बटुए में से लखलखे की डिबिया निकाली और सुंघाकर उस औरत को होश में लाई। मनोरमा जब होश में आई, उसने अपने सामने एक भयानक रूप वाली औरत को देखा। वह घबड़ाकर उठ बैठी और बोली –

मनोरमा – तुम कौन हो और मैं यहां क्योंकर आई

कमलिनी – मैं जंगल की रहने वाली भिल्लिनी हूं। तुम्हें एक लम्बे कद का आदमी पीठ पर लादे लिये जाता था। मैं इस पहाड़ी के नीचे सूअर का शिकार कर रही थी। जब वह मेरे पास पहुंचा मैंने उसे ललकारा और पूछा कि पीठ पर क्या लादे लिये जाता है जब उसने कुछ न बताया तो लाचार (नेजा दिखाकर) इसी जहरीले नेजे से उसे जख्मी किया। जब वह बेहोश होकर गिर पड़ा तब मैंने गठरी खोली, जब तुम्हारी सूरत नजर आई तो हाल जानने की इच्छा हुई। लाचार इस जगह उठा लाई और होश में लाने का उद्योग करने लगी। अब तुम्हीं बताओ कि वह आदमी कौन था और तुम्हें इस तरह क्यों लिये जाता था?

मनोरमा – मैं अपना हाल तुमसे जरूर कहूंगी, मगर पहले यह बताओ कि वह आदमी तुम्हारे इस जहरीले नेजे के असर से मर गया या जीता है?

मनोरमा – वह मर गया और मेरे साथी लोग उसे जला देने के लिए ले गए।

मनोरमा – (ऊंची सांस लेकर) अफसोस, यद्यपि उसने मेरे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया तथापि उसकी मुहब्बत मेरे दिल से किसी तरह नहीं जा सकती, क्योंकि वह मेरा प्यारा पति था। अफसोस, अफसोस, तुमने उसके हाथ से मुझे व्यर्थ छुड़ाया।

पाठक, झाड़ी के अन्दर छिपा हुआ भूतनाथ भी मनोरमा की बातें सुन रहा था। मनोरमा ने जो कुछ कमलिनी से कहा, न मालूम उसमें क्या तासीर थी कि सुनने के साथ ही भूतनाथ का कलेजा कांपने लगा और उसे चक्कर-सा आ गया। बहुत मुश्किल से उसने अपने को सम्हाला और कान लगाकर फिर दोनों की बातें सुनने लगा।

कमलिनी – (कुछ सोचकर) मैं कैसे विश्वास करूं कि तुमने जो कुछ कहा वह सच है?

मनोरमा – पहले यह सोचो कि मैं तुमसे झूठ क्यों बोलूंगी?

कमलिनी – इसके कई सबब हो सकते हैं। सबसे भारी सबब यह है कि तुम्हारा भेद एक गैर के सामने खुल जायेगा जिससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। मगर मुझे विश्वास नहीं होता कि जो आदमी तुम्हें इतना कष्ट दे और बेहोश करके गठरी में बांधकर कहीं ले जाने का इरादा रखे, उसे तुम प्यार करो और अपना पति कहकर सम्बोधित करो।

मनोरमा – नहीं-नहीं, यों तो शक की कोई दवा नहीं। परन्तु मैं इतना अवश्य कहूंगी कि उस आदमी के बारे में मैंने जो कुछ कहा, वह सच है।

कमलिनी – खैर, ऐसा ही होगा, मुझे इससे कोई मतलब नहीं चाहे वह आदमी तुम्हारा पति हो अथवा नहीं, अब तो वह मर चुका, किसी तरह जी नहीं सकता। लेकिन यह बताओ कि अब तुम क्या करना चाहती हो और कहां जाने की इच्छा रखती हो

मनोरमा – मुझे गयाजी का रास्ता बता दो। मेरे मां-बाप उसी शहर में रहते हैं। अब मैं उन्हीं के पास जाऊंगी।

कमलिनी – अच्छा, पहाड़ी के नीचे चलो, मैं तुम्हें गयाजी का रास्ता बता देती हूं। हां, मैं तुम्हारा नाम पूछना तो भूल ही गई।

मनोरमा – मेरा नाम इमामन है।

कमलिनी – (जोर से हंसकर) क्या ठगने के लिए मैं ही थी?

मनोरमा – (चौंककर और कमलिनी को सिर से पैर तक खूब अच्छी तरह

देखकर) मुझे तुम पर शक होता है।

कमलिनी – यह कोई ताज्जुब की बात नहीं, मगर शक होने ही से क्या हो सकता है आज तक तुमने मुझे कभी नहीं देखा और न फिर देखोगी।

मनोरमा – तब मैं अवश्य ही कह सकती हूं कि तुम कमलिनी हो!

कमलिनी – नहीं-नहीं, मैं कमलिनी नहीं हो सकती, हां कमलिनी को पहचानती जरूर हूं, क्योंकि वह वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान की दोस्त है, इसलिए मेरी दुश्मन!

मनोरमा – अब मैं तुम्हारी बातों का विश्वास नहीं कर सकती।

कमलिनी – तो इसमें मेरा कोई भी हर्ज नहीं। (आहट पाकर और दाहिनी तरफ देखकर) लो देखो, अब तो मैं सच्ची हुई वह कमलिनी आ रही है!

संयोग से उसी समय तारा भी आ पहुंची जो कमलिनी की सूरत में उसके कहे मुताबिक सब काम किया करती थी। कमलिनी ने गुप्त रीति से तारा को कुछ इशारा किया जिससे वह कमलिनी का मतलब समझ गई। कमलिनी रूपी तारा लपककर उन दोनों के पास पहुंची और कमर से खंजर निकालकर और उसे चमकाकर बोली, “इस समय तुम दोनों भले मौके पर मुझे मिल गई हो, आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ। अब मैं तुम दोनों से बिना बदला लिये टलने वाली नहीं।”

तारा की यह बात सुन कमलिनी जान-बूझकर कांपने लगी। मालूम होता था कि वह डर से कांप रही है। मनोरमा भी यकायक कमलिनी को मौजूद देखकर घबड़ा गई, इसके अतिरिक्त उस चमकते हुए खंजर को देखकर उसे विश्वास हो गया कि अब किसी तरह जान नहीं बचती, क्योंकि इसी तरह का खंजर भूतनाथ के हाथ में वह देख चुकी थी और उसके प्रबल प्रताप का नमूना उसे मालूम हो चुका था, साथ ही उसे इस बात का भी विश्वास हो गया कि राक्षसी (कमलिनी), जिसने उसे भूतनाथ के हाथ से छुड़ाया, सच्ची और उसकी खैरख्वाह है।

कमलिनी ने तारा को फिर इशारा किया जिसे मनोरमा ने नहीं जाना। पर तारा ने वह खंजर मनोरमा के बदन से लगा दिया और वह बात-की-बात में बेहोश होकर जमीन पर गिर गई। झाड़ी में छिपा हुआ भूतनाथ भी निकल आया और कमलिनी से बोला –

भूतनाथ – जो हो, मगर मेरा काम कुछ भी न हुआ।

कमलिनी – इसमें कोई शक नहीं कि तुम बड़े बुद्धिमान हो, परन्तु कभी-कभी तुम्हारी अक्ल भी हवा खाने चली जाती है। तुम इस बात को नहीं जानते कि तुम्हारा काम पूरा-पूरा हो गया। यकायक तारा के पहुंच जाने से मालूम हुआ कि तुम्हारी किस्मत तेज है, नहीं तो मुझे बहुत-कुछ बखेड़ा करना पड़ता।

भूतनाथ – सो क्या, मुझे साफ समझा दो तो जी ठिकाने हो।

कमलिनी – मेरे पास बैठ जाओ, मैं अच्छी तरह समझा देती हूं। (तारा की तरफ देखकर) कहो, तुम्हारा आना क्योंकर हुआ?

तारा – मुझे एक ऐसा काम आ पड़ा कि बिना तुमसे मिले कठिनता दूर होने की आशा न रही, लाचार झण्डी टेढ़ी करके तुमसे मिलने की उम्मीद में यहां आयी थी।

कमलिनी – अच्छा हुआ कि तुम आईं, इस समय तुम्हारे आने से बड़ा ही काम चला। अच्छा, बैठ जाओ और जो कुछ मैं कहती हूं, उसे सुनो।

इसके बाद कमलिनी, तारा और भूतनाथ में देरतक बातचीत होती रही जिसे यहां पर लिखना हम मुनासिब नहीं समझते, क्योंकि इन लोगों ने जो कुछ करना विचारा है, वह आगे के बयान में स्वयं खुल जायेगा। जब बातचीत से छुट्टी मिली तो मनोरमा को उठा तीनों आदमी पहाड़ी के नीचे उतरे। मनोरमा एक पेड़ के साथ बांध दी गई। इस काम से छुट्टी पाकर तारा और भूतनाथ वहां से अलग हो गए और किसी झाड़ी में छिपकर दूर से इन दोनों को देखते रहे। थोड़ी ही देर बाद मनोरमा होश में आई और अपने को बेबस पाकर चारों तरफ देखने लगी। पास ही में पेड़ से बंधी हुई कमलिनी पर भी उसकी निगाह पड़ी और वह अफसोस के साथ कमलिनी की तरफ देखकर बोली –

मनोरमा – बेशक तुम सच्ची हो। मेरी भूल थी जो तुम पर शक करती थी।

कमलिनी – खैर, इस समय तो तुम्हारे ही सबब से मुझे भी कष्ट भोगना पड़ा।

मनोरमा – इसमें कोई सन्देह नहीं।

कमलिनी – तुम्हारा छूटना तो मुश्किल है मगर मैं किसी-न-किसी तरह धोखा देकर छूट ही जाऊंगी और तब कमलिनी से समझूंगी। अब बिना उसकी जान लिए मुझे चैन कहां।

मनोरमा – तुम्हारी भी तो वह दुश्मन है, फिर तुम्हें क्योंकर छोड़ देगी?

कमलिनी – मेरी-उसकी दुश्मनी भीतर-ही-भीतर की है, इसके अतिरिक्त एक और सबब ऐसा है कि जिससे मैं अवश्य छूट जाऊंगी। तब तुम्हारे छुड़ाने का भी उद्योग करूंगी।

मनोरमा – वह कौन-सा सबब है?

कमलिनी – सो मैं अभी नहीं कह सकती। तुम्हें वह स्वयं मालूम हो जायगा। (चारों तरफ देखकर) न मालूम वह कम्बख्त कहां गई!

मनोरमा – क्या तुम्हें भी नहीं मालूम?

कमलिनी – नहीं, मुझे जब होश आया मैंने अपने को इसी तरह बेबस पाया।

मनोरमा – खैर, कहीं भी हो, आवेगी ही। हां तुम्हें यदि अपने छूटने की उम्मीद है तो कब तक?

कमलिनी – उसके आने पर दो-चार बातें करने से ही मुझे छुट्टी मिल जायगी और मैं तुम्हें भी अवश्य छुड़ाऊंगी। हां, अकेली होने के कारण विलम्ब जो कुछ हो। यदि तुम्हारा कोई मददगार हो तो बताओ, ताकि छुट्टी मिलने पर मैं तुम्हारे हाल की उसे खबर दूं।

मनोरमा – (कुछ सोचकर) यदि कष्ट उठाकर तुम मेरे घर तक जाओ और मेरी सखी को मेरा हाल कह सको, तो वह सहज ही में मुझे छुड़ा लेगी।

कमलिनी – इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि मैं अवश्य छूट जाऊंगी। तुम अपने घर का पता और अपनी सखी का नाम बताओ। मैं जरूर उससे मिलकर तुम्हारा हाल कहूंगी और स्वयं भी जहां तक हो सकेगा, तुम्हें छुड़ाने के लिए उसका साथ दूंगी।

मनोरमा – यदि ऐसा करो तो मैं जन्म-भर तुम्हारा अहसान मानूंगी। जब उसके कान तक मेरा हाल पहुंच जायगा तो तुम्हारी मदद की आवश्यकता न रहेगी।

कमलिनी – खैर, अब पता और नाम बताने में विलम्ब न करो। कहीं ऐसा न हो कि कमलिनी आ जाय, तब कुछ न हो सकेगा।

मनोरमा – हां ठीक है – काशीजी में त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास लाल रंग का मकान एक छोटे से बाग के अन्दर है। मछली के निशान की स्याह रंग की झण्डी दूर से ही दिखाई पड़ेगी। मेरी सखी का नाम ‘नागर’ है, समझ गईं।

कमलिनी – मैं खूब समझ गई, मगर उसे मेरी बात का विश्वास कैसे होगा?

मनोरमा – इसमें विश्वास की कोई जरूरत नहीं है। वह मुझ पर आफत आने का हाल सुनते ही बेचैन हो जायगी और किसी तरह न रुकेगी।

कमलिनी – तथापि मुझे हर तरह से दुरुस्त रहना चाहिए। शायद वह समझे कि यह मुझे धोखा देने आई है और चाहती है कि मैं घर के बाहर जाऊं तो कोई मतलब निकाले।

मनोरमा – (कुछ सोचकर) हां, ऐसा हो सकता है। अच्छा मैं तुम्हें एक परिचय बताती हूं। जब वह बात उसके कान में कहोगी, तब वह तुम्हारा पूरा विश्वास कर लेगी। परन्तु उस परिचय को बड़ी होशियारी से अपने दिल में रखना, खबरदार! दूसरा न जानने पावे, नहीं तो मुश्किल होगी और मेरी जान किसी तरह न बचेगी।

कमलिनी – तुम विश्वास रखो कि वह शब्द सिवाय एक दफे के जब मैं तुम्हारी सखी के कान में कहूंगी, दूसरी दफे मेरे मुंह से न निकलेगा। (इधर-उधर देखकर) जल्दी कहो, अब देर न करो।

मनोरमा – (कमलिनी की तरफ झुककर धीरे से) ‘विकट’ शब्द कहना। बस, सन्देह न करेगी और तुम्हें मेरा विश्वासपात्र समझेगी।

कमलिनी – ठीक है, अब जहां तक जल्द हो सकेगा, मैं तुम्हारी सखी के पास पहुंचूंगी और अपना मतलब निकालूंगी।

मनोरमा – पहले तो मुझे यह देखना है कि कमलिनी तुम्हें क्योंकर छोड़ती है! जब तुम छूट जाओगी तब कहीं जाकर मुझे अपने छूटने की कुछ उम्मीद होगी।

कमलिनी – (हंसकर) मैं उतनी ही देर में छूट जाऊंगी जितनी देर में तुम एक से लेकर निन्यानवे तक गिन सको।

इतना कहकर कमलिनी ने सीटी बजाई। सीटी की आवाज सुनते ही तारा और भूतनाथ जो वहां से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी के अन्दर छिपे हुए थे, कमलिनी के पास आ पहुंचे। कमलिनी ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा और कहा, “मुझे छोड़ दो।”

भूतनाथ ने कमलिनी को, जो पेड़ से बंधी हुई थी, खोल दिया। कमलिनी उठकर मनोरमा के पास आई और बोली, “क्यों, मैं अपने कहे मुताबिक छूट गयी या नहीं!”

कमलिनी की चालाकी के साथ ही भूतनाथ की सूरत देखकर मनोरमा सन्न हो गई और ताज्जुब के साथ उन तीनों की तरफ देखने लगी। इस समय भूतनाथ के चेहरे पर उदासी के बदले खुशी की निशानी पाई जाती थी। भूतनाथ ने हंसकर मनोरमा की तरफ देखा और कहा, “क्या अब भी भूतनाथ तेरे कब्जे में है अगर हो तो कह, इसी समय कमलिनी का सिर काटकर तेरे आगे रख दूं, क्योंकि वह यहां मौजूद है।”

मनोरमा ने क्रोध के मारे दांत पीसे और सिर नीचा कर लिया। थोड़ी देर बाद बोली, “अफसोस, मैं धोखा खा गई!”

कमलिनी – (तारा से) अब समय नष्ट करना ठीक नहीं। इस हरामजादी को तुम ले जाओ और लोहे वाले तहखाने में बन्द करो, फिर देखा जायगा। (अपने हाथ का नेजा देकर) इस नेजे को अपने पास रखो और वह खंजर मुझे दे दो। अब नेजे के बदले खंजर रखना ही मैं उत्तम समझती हूं। यद्यपि एक खंजर मेरे पास है परन्तु वह कुंअर इन्द्रजीतसिंह के लिए है।

तारा – मैं भी यही कहना चाहती थी, क्योंकि खंजर और नेजे में गुण तो एक ही है फिर बोझ लेकर घूमने से क्या फायदा। यह लो खंजर, अपने पास रखो।

कमलिनी – (भूतनाथ से) तुम भी तारा के साथ जाओ और इस हरामजादी को हमारे घर पहुंचाकर बहुत जल्द लौट आओ, तब तक मैं इसी जगह रहूंगी और तुम्हारे आते ही तुम्हें साथ लेकर काशीजी जाऊंगी। पहले तुम्हारा काम करके कुंअर इन्द्रजीतसिंह से मिलूंगी और मायारानी की मण्डली को, जिसने दुनिया में अंधेर मचा रखा है, जहन्नुम में भेजूंगी।

भूतनाथ – (सिर झुकाकर) जो हुक्म!

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देवकीनंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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