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लाहौर पहुँच कर सीधा मसऊद के घर पहुँचा तो वह हजरत गायब थे। मालूम हुआ कि कहीं घूमने गये हैं। खैर, वो घूमने जाएँ अथवा जहन्नुम में, घर तो उनका मौजूद ही था। सामान रख कर अत्यन्त संतोष से नहाया-धोया। कपड़े बदले और उनके नौकर से कहा…”चाय लाओ!”

यह नौकर भी कोई नया जानवर ही फंसा था शायद। एक तो वह ऊपर से ले कर नीचे तक ऐसी नजरों से मुझे देख रहा था, जैसे मैं उसके स्वामी का अतिथि नहीं; बल्कि कोई उचक्का हूँ और इस घर से कुछ-न-कुछ उठाने वाला ही हूँ। दूसरे, ऐसा मालूम होता था, जैसे यह व्यक्ति अब तक किसी सभ्य आदमी के यहाँ नहीं रहा और मसऊद को भी इसे इनसान बनाने का अवसर नहीं मिला।

जब उस नौकर ने बनी-बनायी चाय ला कर तिपाई पर मेरे सामने रख दी तो मैंने पहले तो आश्चर्यचकित हो उस बेहूदा चाय को देखा और फिर चाय लाने वाले उस नामाकूल को। किन्तु वह तो स्वयं खा जाने वाली नजरों से मुझे देख रहा था–घूर रहा था। मैंने उससे बहुत-कुछ कहना चाहा। लेकिन बड़ी मुश्किल से केवल यही कह सका–”यह क्या है?

उसने जले-भुने अंदाज से कहा, “चाय है, और हो ही क्या सकती है?”

मैंने अब जरा और स्पष्ट कहा, “चाय तो है लेकिन गिलास में!”

उसने तुरन्त उत्तर दिया, “और नहीं तो क्या घड़े में लाता?”

अब मैंने अपने विषय में कुछ कहना उचित न समझ कर कहा, “क्या मसऊद गिलास में चाय पीने लगे हैं?”

उसने बड़ी रुखाई से कहा, “वह नहीं पीते चाय-वाय। वह लस्सी पीते हैं।”

अब मैं उस नौकर के मुँह क्या लगता। उससे कह दिया कि यह चाय ले जाए। फिर खुद मसऊद के ही बिस्तर पर लेट कर मैं उसकी प्रतीक्षा करने लगा। पास ही पिछले मास के किसी तारीख का कोई फटा-सा समाचार-पत्र पड़ा था। देर तक उसी को देखता रहा। उसमें प्रकाशित पहेली हल कर डाली। उसके विज्ञापन तक पढ़ डाले। लेकिन मसऊद को न आना था, वह न आया।

आखिर में उठा और सोचा कि शायद और कोई पढ़ने की चीज मिल जाये। अलमारी की तलाशी लेना ही चाहता था कि नुमाइश का ‘पास’ सामने ही रखा नजर आया। बस, फौरन यह प्रोग्राम बना लिया कि यहाँ पड़े-पड़े प्रतीक्षा करने की बजाय जा कर नुमाइश ही देख आऊँ। इतनी देर में मसऊद भी घर आ जायेगा। वह पास उठा कर जेब में रखा और जंगली नौकर से नुमाइश का पता पूछ कर नुमाइश जा पहुँचा।

गेट पर वह पास दिखा कर अन्दर जाना ही चाहता था कि गेट-कीपर ने पास पर लिखा हुआ नाम पढ़ कर जैसे कुछ चौंकते हुए कहा, “तो आप ही हैं प्रो॰ मसऊद!”

स्पष्ट है कि ऐसे मौके पर केवल झूठ ही बोला जा सकता है। अन्यथा यह प्रश्न उठता है कि आप प्रो॰ मसऊद नहीं हैं तो उनके नाम का पास क्यों लाये?

इसलिए ढीठ बन कर मैंने कहा, “अब मैं अपने मुँह से क्या अर्ज करूँ?”

गेट-कीपर मुझे उत्तर देने की बजाय चीखने लगा–”चौधरी साहब! ये आ गये हैं प्रो॰ मसऊद!’

और इस आवाज पर एक बुजुर्ग ने लपक कर मेरी बाँह थाम ली और मुझे अपनी ओर घसीटते हुए कहा–‘अरे साहब, कमाल कर दिया आपने भी। आज नुमाइश का पहला दिन है और आपने आज ही सारा कार्यक्रम गड़बड़ कर डाला। अगर कुछ और देर हो जाती तो क्या होता? लोग आपकी प्रतीक्षा में हैं और आप गायब!’ वह कहते जा रहे थे और घसीटे चले जाते थे। अपनी कहते थे और दूसरे की सुनने को तैयार न थे।

आखिर एक खेमे में ले जा कर सर्कस के मसखरों वाला लिबास उन्होंने मेरी ओर बढ़ा कर कहा–‘बस, अब चुटकी बजाते तैयार हो जाइए। मैं तब तक लाउडस्पीकर पर एलान कराता हूँ कि आप पहुँच गये हैं। आपको लेने तो नुमाइश के मैनेजर खुद दौड़े गये हैं आपके घर।

मैंने वह मसखरों वाला लिबास गौर से देख कर कहा, “मगर मुझे बताइए तो सही कि बात क्या है?”

वो घबराहट के साथ बोले, “अब बात-वात बाद में बतलायी जायेगी। पहले आप ये कपड़े पहनिए–जल्दी से! कमाल कर दिया आपने भी। जरा तो वक्त की पाबंदी रखनी चाहिए इनसान को और अब भी आप खड़े हमारा मुँह देख रहे हैं! खुदा के लिए अब देर न कीजिए। लाइए, मैं उतारता हूँ आपके कपड़े।”

और इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ, उन महाशय ने मेरी शेरवानी उतार कर एक ओर उछाल दी और झपटे कमीज की तरफ। मैंने जरा बचाव का प्रयास किया और अर्ज किया, “जनाब, आप सिर्फ एक बात सुन लीजिए।”

वो घबरा कर बोले, कमाल करते हैं आप!  यानी आपको बातों की पड़ी है और वहाँ दर्शकों के समूह में नुमाइश के प्रबंधकों की हँसी उड़ायी जा रही है। पहले ही दिन अगर हमारी हवा बिगड़ गयी तो किसी को मुँह दिखाने लायक न रहेंगे।

अब मैंने उनसे कहा, “सुनिए जनाब। मैं यह मसखरों का लिबास हरगिज न पहनूँगा।”

वो आस्तीन चढ़ा कर बोले, “पहनेंगे तो आपके फरिश्ते भी! हम आप से यह शर्त तो पहले से तय कर चुके हैं कि आपको यह लिबास भी पहनना पड़ेगा। और चेहरे पर भी खड़िया का लेप कर काली लकीर खींचनी पड़ेगी।”

मैंने कहा, मैं आप से एक बात अर्ज कर दूँ कि मैं वास्तव में…”

वो एकदम कड़क कर बोले, “मालूम होता है, सीधी उँगली घी न निकलेगा! अजीब आदमी मालूम होते हैं। आपको जरा भी खयाल नहीं कि हमारी किस तरह हँसी उड़ रही है। हमें धोखेबाज समझा जा रहा है कि हम विज्ञापन कुछ देते हैं और दिखाते कुछ हैं।”

मैंने फिर सच बात कहने की कोशिश की, भई, मेरी बात तो सुनिए।

लेकिन चौधरी साहब ने खेमे के बाहर मुँह निकाल कर कुछ लोगों को आवाज दी, “कल्लू! अमामदीन!  भूरे लाल!”

और फौरन तीन गुण्डे खेमे में आ पधारे। तब चौधरी साहब ने नादिरशाही हुक्म दिया, “ये हमें अपमानित कराने पर तुले हुए हैं। इन्हें जबरदस्ती ये कपड़े पहना कर और मुँह पर खड़िया-वड़िया मल कर लाओ वहाँ। तब तक मैं एलान कराता हूँ।”

वो तो यह कह कर चलते बने और उन कसाइयों ने बलपूर्वक मेरे बाकी कपड़े उतार कर मुझे ‘जोकरों’ वाला लिबास पहना दिया और जिस समय वो मेरे चेहरे पर चूना मल कर काली लकीरें खींच रहे थे, मैंने बेहद खुशामद के भाव से कहा…“भई, मुझसे चाहे जैसी कसम ले लो, मैं प्रोफेसर मसऊद नहीं हूँ।”

उनमें से एक ने मेरे सर पर लाल फुँदने वाली लम्बी-सी टोपी पहनाते हुए कहा—“चकमा तो खैर किसी और को देना। नहीं हो प्रोफेसर तो पेशगी रुपया क्यों लिया था?”

दूसरे ने कहा, “कोई पूछे तो इससे कि जान इतनी ही प्यारी थी, तो किसने कहा था इससे सूली पर लटकने को!”

और दूसरे ही क्षण मैंने लाउडस्पीकर पर घोषणा सुनी- “दर्शकगण, आप के इन्तजार की वाकई हद हो चुकी है, लेकिन हम बड़ी खुशी से एलान करते हैं कि प्रोफेसर मसऊद, गोल्ड मैडलिस्ट, पहुँच चुके हैं और मीनार के पास तशरीफ ला रहे हैं। आप जिन्दगी और मौत का यह खेल देखने के लिए इकट्ठे हो जायें। एक-सौ-चालीस फुट ऊँची मीनार से प्रो॰ मसऊद अपने जिस्म में आग लगा कर हौज में छलाँग लगायेंगे। आइए! आइए!! आइए !!! प्रोफेसर मसऊद आ गये! आ गये!  आ गये !!”

मेरे सारे शरीर में पहले तो कँपकँपी पैदा हुई, फिर ऐसा लगा जैसे रगों में खून जम गया है। और बड़ी मुश्किल से मैं केवल यह कह सका–”छलाँग!”

फिर वो तीनों कसाई एकदम हँस पड़े और मुझे खेमे के बाहर ले आये। यह सुनहरा मौका था। मैं सिर पर पैर रख कर भागा ही था कि उनमें से एक ने लपक कर मेरी गरदन पकड़ ली और मुझे झँझोड़ कर कहा—“आखिर तुम चाहते क्या हो? बेईमानी की हद है, अब ऐन वक्त पर अपना रेट बढ़ाने के लिए ये हरकतें कर रहे हो!”

और उसी समय उन खौफनाक चौधरी साहब ने आ कर कहा—“कान पकड़े बाबा, कल से यह खेल बन्द। लेकिन आज तो छलाँग लगानी ही पड़ेगी।”

मैंने फिर लगभग रो देने के अंदाज से कहा–”चौधरी साहब! खुदा जानता है कि मैं प्रोफेसर मसऊद नहीं हूँ। न मैंने कभी छलाँग लगायी है, न मैं छलाँग लगा सकता हूँ। मैं बेमौत मर जाऊँगा। मेरा खून आपकी गरदन पर होगा। मैं खुदा की कसम खा कर कहता हूँ कि मैं प्रोफेसर मसऊद नहीं हूँ।”

चौधरी साहब ने ताज्जुब से कहा- “क्या मतलब? यानी अब तुम प्रोफेसर मसऊद ही नहीं हो?”

मैंने उसी तरह गिड़गिड़ाते हुए कहा–”खुदा जानता है कि मैं प्रोफेसर मसऊद नहीं हूँ! मैं तो उनका मेहमान हूँ। आज ही लाहौर आया हूँ। मैं उनका यह पास उठा लाया था, नुमाइश देखने के लिए और यहाँ आ कर इस चक्कर में फँस गया। मैं अपने बच्चों की कसम खा कर कहता हूँ कि मैं प्रोफेसर मसऊद नहीं हूँ—मुझे बख्श दीजिए!”

बिलकुल उसी समय लाउडस्पीकर पर फिर घोषणा हुई-एक सौ चालीस फुट ऊँची मीनार से छलाँग! प्रोफेसर मसऊद का जिन्दगी और मौत से मजाक !!

चौधरी साहब ने यह घोषणा सुन कर मेरी अपील खारिज कर दी। बोले—“अब कुछ नहीं हो सकता। छलाँग तो लगानी ही पड़ेगी—!”

और मेरे सामने बिजली के रंग-बिरंगे लटटुओं से जगमगाती हुई एक-सौ-चालीस फुट ऊँची मीनार थी, जिस पर चढ़ना ही मेरे लिए मुश्किल था, चढ़ कर फाँदने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। मैंने उसे देख कर भय से अपनी आँखें बन्द कर लीं। लेकिन चौधरी साहब ने मुझे उस मीनार की तरफ धक्का दिया, बल्कि लगभग घसीटते हुए मीनार तक ले गये। दर्शकों ने मुझे देख कर तालियाँ बजायीं–जैसे मेरे प्राण-पखेरू उड़ाने के लिए ये तालियाँ बजायी जा रही थीं!

चौधरी साहब ने मेरे हाथ में पेट्रोल की एक बोतल और दियासलाई की डिबिया दे कर कहा–”चढ़ जाओ इस मीनार पर और यह पेट्रोल अपने ऊपर छिड़क कर दियासलाई दिखा देना, फिर झट छलाँग लगा देना इस तालाब में-बस छुट्टी हुई!’

छुट्टी सच पूछिए तो सदा के लिए होने वाली थी, लेकिन मैं अब भी भागने के फिराक में था। लेकिन दर्शक बराबर तालियाँ बजा रहे थे। आखिर मैंने निर्णय किया कि इन दर्शकों से स्पष्ट कह दूँ कि मुझे जबरदस्ती प्रोफेसर मसऊद बनाया जा रहा है और मैं निश्चय ही मर जाऊँगा। लेकिन उस नौबतखाने में तूती की आवाज सुनता ही कौन! मजबूरन मैं मीनार को ओर बढ़ने लगा। मेरा दिल बैठ रहा था।

बिलकुल उसी समय लोगों में कुछ हलचल-सी पैदा हो गयी और किसी ने ऊँची आवाज में कहा—”यह आ गये प्रोफेसर मसऊद!”

और चौधरी साहब ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे फिर घसीटा और दौड़ाते हुए खेमे में ला कर जल्दी-जल्दी वह मसखरों वाला लिबास मेरे शरीर से उतार कर एक अन्य व्यक्ति को पहनाना शुरू कर दिया। मैंने उस व्यक्ति को देख कर मन-ही-मन कहा—“लो, अब किसी और की शामत आयी। अब किसी और को प्रोफेसर मसऊद बनाया जा रहा है।” इसलिए कि दरअसल यह भी प्रोफेसर मसऊद न था। बहरहाल कोई भी हो, मेरी बला से। मैं तो मौत के मुँह से बच निकला।

उस व्यक्ति ने जल्दी-जल्दी वह लिबास पहना। अजीबोगरीब भाव- भंगिमा बनायी और दौड़ा उस मीनार की तरफ।

जब में अपने निजी कपड़े पहन कर और मुँह साफ करके उस हुजूम में पहुँचा तो वह व्यक्ति एक सौ चालीस फुट की बुलंदी पर पहुँच कर अपने शरीर पर पेट्रोल छिड़क रहा था। उसने अपने कपड़ों को पेट्रोल से तर करने के बाद दियासलाई दिखा कर आग लगायी। अब उसने जो छलाँग लगायी है उस मीनार से तो तालाब में एक ‘छपाका’ हुआ और वातावरण तालियों के शोर से गूँज उठा। तालाब से निकल कर वह खेमे की ओर दौड़ा।

अब मेरे दिमाग का बोझ भी हल्का हो चुका था और दिमाग में सोचने को शक्ति फिर से आ गयी थी। इसलिए सब से पहला प्रश्न मस्तिष्क में यह आया कि यह प्रोफेसर मसऊद न सही, लेकिन मसऊद ने यह करतब कब से दिखाने शुरू कर दिये? मसऊद के जीवन के इस रूख की तो मुझे खबर ही न थी।

मैं अभी इसी बात पर गौर कर रहा था कि चौधरी साहब ने आ कर मुझे फिर घेरा। वे बोले—”चलिए आप को प्रोफेसर मसऊद बुला रहे हैं, जिनका पास आप चुरा लाये थे।”

मैं स्वयं इस पहेली को हल करने के लिए आकुल था, इसलिए बहुत मुस्तैदी से खेमे में पहुँच गया। मुझे देखते ही उन मसऊद साहब ने कहा, “क्यों जनाब! मेरा यह पास आपने कहाँ से उड़ाया?”

मैंने कहा, “यह आपका नहीं, प्रोफेसर मसऊद का पास है जो मेरे मित्र हैं। और जिनके घर मैं आज ही आ कर ठहरा हूँ।”

उस व्यक्ति ने चौंक कर कहा, “अच्छा तो आपका ही वह बिस्तर वगैरह रखा हुआ है मेरे घर पर?”

मैंने कहा, “आप के घर पर या मसऊद के घर पर?”

उस व्यक्ति ने ताली बजा कर बिलकुल बेतकल्लुफी से कहा, “अरे यार, तुम कहीं उस मसऊद के मेहमान तो नहीं हो जो कॉलेज में पढ़ाता है?”

मैंने कहा, “जी हाँ, वही मसऊद!”

उस व्यक्ति ने कहा, “तो यों कहो न। वो तो मेरे मकान के सामने वाली कोठी में रहते हैं। मैं भी कहूँ कि प्रोफेसर मसऊद और कौन हो सकता है?”

और उसी समय चौधरी साहब ने चाय का एक गिलास उन प्रोफेसर मसऊद को और दूसरा मुझे थमा दिया। और मैं उनसे यह न कह सका कि ‘यह चाय तो है, मगर गिलास में?’

अलबत्ता प्रोफेसर साहब कह रहे थे, “लस्सी नहीं मिल सकती?”

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