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दिन आधे घंटे से ज्यादे बाकी है।  आसमान पर कहीं-कहीं बादल के गहरे टुकड़े दिखाई दे रहे हैं और साथ ही इसके बरसाती हवा भी इस बात की खबर दे रही है कि यही टुकड़े थोड़ी देर में इकट्ठे होकर जमीन को तराबोर कर देंगे।  इस समय हम अपने पाठकों को जिस बाग में ले चलते हैं, वह एक तो मालियों की कारीगरी और शौकीन मालिक की निगरानी तथा मुस्तैदी के सबब खुद ही रौनक पर रहा करता है, दूसरे, आजकल के मौसिम ने उसके जीवन को और भी उभार रखा है।

यह बाग जिसके बीच में एक सुंदर कोठी भी बनी हुई है, हमारे हरनंदन बाबू के सच्चे और दिली दोस्त रामसिंह का है और इस समय वे स्वयं हरनंदन बाबू के हाथ में हाथ दिए और धीरे-धीरे टहलते हुए इस बाग के सुंदर गुलबूटे और क्यारियों का आनंद ले रहे हैं।  देखनेवाला तो यही कहेगा कि ‘ये दोनों मित्र इस दुनिया का सच्चा सुख लूट रहे हैं’ मगर नहीं, इस समय ये दोनों एक भारी चिंता में डूबे हुए हैं और किसी कठिन मामले की कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं जो कि आगे चलकर उनकी बातचीत से आपको मालूम होगा।

हरनंदन : तुम कहते तो हो मगर ज्यादे खुल चलना भी मुझे पसंद नहीं है।

रामसिंह : ज्यादे खुल चलना जमाने की निगाह में नहीं सिर्फ बाँदी और पारसनाथ की निगाह में।

हरनंदन : हाँ, सो तो होगा ही और होता भी है मगर इस बात की खबर पहिले ही बाबू लालसिंह को ऐसी खूबी के साथ हो जानी चाहिए कि उनके दिल में रंज और शक को जगह न मिलने पावे और वे अपनी जान की हिफाजत का पूरा-पूरा बंदोबस्त भी कर रक्खें, बल्कि मुनासिब तो यह है कि वे कुछ दिन के लिए मुर्दों में अपनी गिनती करा लें।

रामसिंह : (आवाज में जोर देकर) बेशक ऐसा ही होना चाहिए! यह बात परसों ही मेरे दिल में पैदा हुई थी और इस मामले पर दो दिन तक मैंने अच्छी तरह गौर करके कई बातें अपने पिता से आज ही सवेरे कही भी हैं। उन्होंने भी मेरी बात बहुत पसंद की और वादा किया कि ‘कल लालसिंह से मिलने के लिए जाएँगे और वहाँ पहुँचने के पहिले चाचा जी (कल्याणसिंह) से मिलकर अपना विचार भी प्रगट कर देंगे।’

हरनंदन : हाँ, तब कोई चिंता नहीं है, यद्यपि लालसिंह बड़ा उजड्डी और जिद्दी आदमी है, परंतु आशा है कि चाचा जी (रामसिंह के पिता) की बातें उसके दिल में बैठ जाएँगी।

रामसिंह : आशा तो ऐसी ही है।  हाँ, मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आज मैं महाराज से भी मिल चुका हूँ। ईश्वर की कृपा से जो कुछ मैं चाहता था, महाराज ने उसे स्वीकार कर लिया और तुम्हें बुलाया भी है। सच तो यों है कि महाराज मुझ पर बड़ी ही कृपा रखते हैं।

हरनंदन : निःसंदेह ऐसा ही है और जब महाराज से इतनी बातें हो चुकी हैं तो हम अपना काम बड़ी खूबी के साथ निकाल लेंगे। अच्छा मैं एक बात तुमसे और कहूँगा।

रामसिंह : वह क्या?

हरनंदन : एक आदमी ऐसा होना चाहिए, जिस पर अपना विश्वास हो और जो अपने तौर पर जाकर बाँदी के यहाँ नौकरी कर ले और उसका एतबारी बन जाए।

रामसिंह : ठीक है, मैं तुम्हारा मतलब समझ गया। मैं अपने असामियों ही में से बहुत जल्द किसी ऐसे आदमी का बंदोबस्त करूँगा। भरसक किसी औरत ही का बंदोबस्त किया जाएगा। (कुछ सोचकर) मगर मेरे यार ! इस बात का खटका मुझे हरदम लगा रहता है कि कहीं बाँदी तुम्हें अपने काबू में न कर ले! देखा चाहिए, इस कालिख से तुम अपने पल्ले को कहाँ तक बचाए रहते हो!

हरनंदन : मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता, मगर नित्य सवेरे उठते ही पहिले ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इस बुरी हवा से बचाए रहियो।

 रामसिंह : ईश्वर ऐसा ही करे! (आसमान की तरफ देखकर) बादल तो बेहतर घिरे आ रहे हैं।

हरनंदन: हाँ चलो, कोठी की छत पर बैठकर प्रकृति की शोभा देखें।

रामसिंह: अच्छी बात है, चलो।

दोनों मित्र धीरे-धीरे बातें करते हुए कोठी की तरफ रवाना हुए।

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देवकीनंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी
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