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काजर की कोठरी : खंड 2 के लिए यहाँ क्लिक करें                                                    काजर की कोठरी: खंड सूची यहाँ देखें

रात दो घंटे से ज्यादे नहीं रह गई है। दरभंगा के बाजारों की रौनक अभी मौजूद है, मगर घटती जाती है। हाँ उस बाजार की रौनक कुछ दूसरे ही ढंग पर पलटा खा रही है, जो रंडियों की आबादी से विशेष संबंध रखती है,  अर्थात उनके निचले खंड की रौनक से ऊपरवाले खंड की रौनक ज्यादे होती जा रही है।

इस उपन्यास के इस बयान में हमको इसी बाजार से कुछ मतलब है, क्योंकि उस बाँदी रंडी का मकान भी इसी बाजार में है, जिसका जिक्र इस किस्से के पहले और दूसरे बयान में आ चुका है।  बाँदी का मकान तीन मरातब का है और उसमें जाने के लिए दो रास्ते हैं, एक तो बाजार की तरफ से और दूसरा पिछवाड़े वाली अंधेरी गली में से।

 पहली मरातब में बाजार की तरफ एक बहुत बड़ा कमरा और दोनों तरफ दो कोठरियाँ तथा उन कोठरियों में से दूसरी कोठरियों में जाने का रास्ता बना हुआ है और पिछवाड़े की तरफ केवल पाँच दर का एक दालान है।  दूसरी मरातब पर चारों कोनों में चार कोठरियाँ और बीच में चारों तरफ छोटे-छोटे चार कमरे हैं।  तीसरी मरातब पर केवल एक बँगला और बाकी का मैदान अर्थात खुली छत है।

इस समय हम बाँदी को इसी तीसरी मरातबवाले बँगले में बैठे देखते हैं। उसके पास एक आदमी और भी है, जिसकी उम्र लगभग पच्चीस वर्ष होगी। कद लंबा, रंग गोरा, चेहरा कुछ खूबसूरत, बड़ी-बड़ी आँखें, (मगर पुतलियों का स्थान स्याह होने के बदले कुछ नीलापन लिए हुए था) भवें दोनों नाक के ऊपर से मिली हुईं, पेशानी सुकड़ी, सर के बाल बड़े-बड़े मगर घुँघराले हैं। बदन के कपड़े–पायजामा, चपकन, रूमाल इत्यादि यद्यपि मामूली ढंग के हैं मगर साफ हैं, हाँ, सिर पर कलाबत्तू कोर का बनारसी दुपट्टा बाँधे हैं, जिससे उसकी ओछी तथा फैल सूफ तबीयत का पता लगता है।  यह शख्स बाँदी के पास एक बड़े तकिये के सहारे झुका हुआ मीठी-मीठी बातें कर रहा है।

                 इस बँगले की सजावट भी बिलकुल मामूली और सादे ढंग की है। जमीन पर गुदगुदा फर्श और छोटे-बड़े कई रंग के बीस-पच्चीस तकिये पड़े हुए हैं, दीवार में केवल एक जोड़ी दीवारगीर भी लगी है, जिसमें रंगीन पानी के गिलास की रोशनी हो रही है।  बाँदी इस समय बड़े प्रेम से उस नौजवान की तरफ झुकी हुई बातें कर रही है।

नौजवान : मैं तुम्हारे सर की कसम खाकर कहता हूँ, क्योंकि इस दुनिया में मैं तुमसे बढ़कर किसी को नहीं मानता।

बाँदी : (एक लंबी साँस लेकर) हम लोगों के यहाँ जितने आदमी आते हैं सभी लंबी-लंबी कसमें खाया करते हैं, मगर मुझे उन कसमों की कुछ परवाह नहीं रहती, परंतु तुम्हारी कसमें मेरे कलेजे पर लिखी जाती हैं, क्योंकि मैं तुम्हें सच्चे दिल से प्यार करती हूँ।

नौजवान : यही हाल मेरा है। मुझे इस बात का खयाल हरदम बना रहता है कि बाप-माँ, भाई-बिरादर, देवता-धर्म सबसे बिगड़ जाए तो बिगड़ जाए मगर तुमसे किसी तरह कभी बिगड़ने या झूठे बनने की नौबत न आवे। सच तो यों है कि मैं तुम्हारे हाथ बिक गया हूँ, बल्कि अपनी खुशी और जिंदगी को तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर चुका हूँ और केवल तुम्हारा ही भरोसा रखता हूँ।

देखो, अबकी दफे मेरी माँ सचमुच मेरी दुश्मन हो गई, मगर मैंने उसका कुछ भी खयाल न किया, हाथ लगी रकम के लौटाने का इरादा भी मन में न आने दिया और तुम्हारी खातिर यहाँ तक ला ही छोड़ा। अभी तो मैं कुछ कह नहीं सकता, हाँ, अगर ईश्वर मेरी सुन लेगा और तुम्हारी मेहनत ठिकाने लग जाएगी तो मैं तुम्हें माला-माल कर दूँगा।

बाँदी : मैं तुम्हारी ही कसम खाकर कहती हूँ कि मुझे धन-दौलत का कुछ भी खयाल नहीं। मैं तो केवल तुमको चाहती हूँ और तुम्हारे लिए जान तक देने को तैयार हूँ मगर क्या करूँ मेरी अम्मा बड़ी चांडालिन है। वह एक दिन भी मुझे रुलाए बिना नहीं रहती। अभी कल की बात है कि दोपहर के समय मैं इसी बँगले में बैठी हुई तुम्हें याद कर रही थी, खाना-पीना कुछ भी नहीं किया था, चार-पाँच-दफे मेरी अम्मा कह चुकी थीं मगर मैंने पेट-दर्द का बहाना करके टाल दिया था।

इत्तफाक से न मालूम कहाँ का मारा-पीटा एक सर्दार आ पहुँचा और अम्मा जान को यह जिद्द हुई कि मैं उसके पास अवश्य जाऊँ, जिसे उन्होंने बड़ी खातिर से नीचेवाले कमरे में बैठा रखा था। मगर मुझे उस समय सिवाय तुम्हारे खयाल के और कुछ अच्छा नहीं लगता था, इसलिए मैं यहाँ बैठी रह गई, नीचे न उतरी, बस अम्मा एकदम यहाँ चली आईं और मुझे हजारों गालियाँ देने लगीं और तुम्हारा नाम ले-लेकर कहने लगीं कि पारसनाथ आवेंगे तो रात-रात – भर बैठी बातें किया करेगी और जब कोई दूसरा सर्दार आकर बैठेगा तो उसे पूछेगी भी नहीं!

आखिर घर का खर्च कैसे चलेगा?  इत्यादि बहुत कुछ बक गईं मगर मैंने वह चुप्पी साधी कि सर तक न उठाया, आखिर बहुत बक-झक कर चली गईं। फिर यह भी न मालूम हुआ कि अम्मा ने उस सर्दार को क्या कहकर विदा किया या क्या हुआ। एक दिन की कौन कहे रोज ही इस तरह की खटपट हुआ करती है।

पारसनाथ:  खैर थोड़े दिन और सब्र करो, फिर तो मैं उन्हें ऐसा खुश कर दूँगा कि वह भी याद करेंगी। मेरे चाचा की आधी जायदाद भी कम नहीं है। अस्तु, जिस समय वह तुम्हें बेगमों की तरह ठाठबाट से देखेंगी और खजाने की तालियों का झब्बा अपनी करधनी से लटकता हुआ पावेंगी उस समय उन्हें बोलने का कोई मुँह न रहेगा, दिन -रात तुम्हारी बलाएँ लिया करेंगी।

बाँदी : तब भला वह क्या कहने लायक रहेंगी और आज भी वह मेरा क्या कर सकती हैं? अगर बिगड़कर खड़ी हो जाऊँ तो उनके किए कुछ भी न हो, मगर क्या करूँ लोक-निंदा से डरती हूँ।

पारसनाथ:  नहीं-नहीं, ऐसा कदापि न करना ! मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी किसी तरह की बदनामी हो और सर्दार लोग तुम्हारी ढिठाई की घर-घर में चर्चा करें, अब भी मैं तुम्हें रत्ती-भर तकलीफ होने न दूँगा और तुम्हारे घर का खर्चा किसी-न-किसी तरह जुटाता ही रहूँगा।

बाँदी : नहीं जी, मैं तुम्हें अपने खर्चे के लिए भी तकलीफ देना नहीं चाहती, मैं इस लायक हूँ कि बहुत-से सर्दारों को उल्लू बनाकर अपना खर्च निकाल लूँ। तुमसे एक पैसा लेने की नीयत नहीं रखती, मगर क्या करूँ, अम्मा से लाचार हूँ इसी से जो कुछ तुम देते हो लेना पड़ता है। अगर उनके हाथ में मैं यह कहकर कुछ रूपै न दूँ कि ‘पारस बाबू ने दिया है’ तो वे बिगड़ने लगती हैं और कहती हैं कि ‘ऐसे सर्दार का आना किस काम का जो बिना कुछ दिए चला जाए!’

मैंने तुमसे अभी तक तो साफ-साफ नहीं कहा, आज जिक्र आने पर कहती हूँ कि उन्हें खुश करने के लिए मुझे बड़ी-बड़ी तरकीबें करनी पड़ती हैं। और सर्दारों से जो कुछ मिलता है उसका पूरा-पूरा हाल तो उन्हें मालूम हो ही नहीं सकता, इससे उन रकमों से मैं बहुत कुछ बचा रखती हूँ। जिस दिन तुम बिना कुछ दिए चले जाते हो उस दिन अपने पास से उन्हें कुछ देकर तुम्हारा दिया हुआ बता देती हूँ, यही सबब है कि वह ज्यादे चीं-चपड़ नहीं कर सकतीं।

पारसनाथ: यह तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम मुझे जी-जान से चाहती हो और मुझ पर मेहरबानी रखती हो मगर क्या करूँ लाचार हूँ! तो भी इस बात की कोशिश करूँगा कि जब तुम्हारे यहाँ आऊँ, तुम्हारे वास्ते कुछ-न-कुछ जरूर लेता आऊँ।

बाँदी : अजी रहो भी, तुम तो पागल हुए जाते हो! इसी से मैं तुम्हें सब हाल नहीं कहती थी, जब मैं उन्हें किसी-न-किसी तरह खुश कर ही लेती हूँ, तो फिर तुम्हें तशद्दुद करने की क्या जरूरत है?

इसी प्रकार की बातें दोनों में हो रही थीं कि एक नौजवान लौंडी जो घर-भर को बल्कि दुनिया की हर एक चीज को एक ही निगाह (आँख) से देखती थी, मटकती हुई आ पहुँची और बाँदी से बोली, ”बीबी, नीचे छोटे नवाब साहब आए हैं!”

बाँदी : (चौंककर) अरे आज क्या है! कहाँ बैठे हैं?

लौंडी : अम्मा ने उन्हें पूरब वाली कोठरी में बैठाया है और आप भी उन्हीं के पास बैठी हैं।

बाँदी : अच्छा तू चल, मैं अभी आती हूँ! (पारसनाथ की तरफ देख के) बड़ी मुश्किल हुई अगर मैं उनके पास न जाऊँ तो भी आफत, कहें कि ‘लो साहब, रंडी का दिमाग नहीं मिलता!’ इतना ही नहीं, बेइज्जती करने के लिए तैयार हो जाएँ।

पारसनाथ: नहीं-नहीं, ऐसा न करना चाहिए, लो मैं जाता हूँ, अब तुम भी जाओ। (उठते हुए) ओफ, बड़ी देर हो गई!

बाँदी : पहिले वादा कर लो कि अब कब मिलोगे?

पारसनाथ: कल तो नहीं मगर परसों जरूर मैं आऊँगा।

बाँदी : मेरे सर पर हाथ रखो।

पारसनाथ: (बाँदी के सर पर हाथ रखके) तुम्हारे सर की कसम, परसों जरूर आऊँगा।

दोनों वहाँ से उठ खड़े हुए और निचले खंड में आए। पारसनाथ सदर दरवाजे से होता हुआ अपने घर रवाना हुआ और बाँदी उस कोठरी में चली गई, जिसमें नवाब साहब के बैठाए जाने का हाल लौंडी ने कहा था। दरवाजे पर पर्दा पड़ा हुआ था और कोठरी के अंदर बाँदी की माँ के सिवाय दूसरा कोई न था। नवाब के आने का तो बहाना-ही-बहाना था। बाँदी को देखकर उसकी माँ ने पूछा, ”गया?”

बाँदी : हाँ, गया। कमबख्त जब आता है, उठने का नाम ही नहीं लेता!

बाँदी की माँ : क्या करेगी बेटी! हम लोगों का काम ही ऐसा ठहरा। अब जाओ कुछ खा-पी लो, हरनंदन बाबू आते ही होंगे, इसीलिए मैंने नवाब साहब का बहाना करवा भेजा था।

बाँदी और उसकी माँ धीरे-धीरे बातें करती खाने के लिए चली गईं।

आधे घंटे के अंदर ही छुट्टी पाकर दोनों फिर उसी कोठरी में आईं और बैठकर यों बातें करने लगीं-

बाँदी : चाहे जो हो मगर सरला किसी दूसरे के साथ शादी न करेगी।

बाँदी की माँ : (हँसकर) दूसरे की बात जाने दो, उसे खास हरिहरसिंह के साथ शादी करनी पड़ेगी, जिसकी सूरत-शक्ल और चाल चलन को वह सपने में भी पसंद नहीं करती!

पाठक! हरिहरसिंह उसी सवार का नाम था, जिसका जिक्र उस उपन्यास के पहिले बयान में आ चुका है और जो बाँदी रंडी से उस समय मिला था जब वह नाचने-गाने के लिए हरनंदनसिंह के घर जा रही थी।

बाँदी अपनी माँ की बातें सुनकर कुछ देर तक सोचती रही और इसके बाद बोली, ‘लेकिन ऐसा न हुआ तब?

बाँदी की माँ : तब पारसनाथ को कुछ भी फायदा न होगा।

बाँदी : पारसनाथ को तो सरला की शादी किसी दूसरे के साथ हो जाने ही से फायदा हो जाएगा, चाहे वह हरिहरसिंह हो चाहे कोई और हो मगर हो पारसनाथ का कोई दोस्त ही।

बाँदी की माँ : अगर ऐसा न हुआ तो वसीयतनामे में झगड़ा हो जाएगा।

बाँदी : अगर सरला का बाप पहिला वसीयतनामा तोड़कर दूसरा वसीयतनामा लिखे, तब?

बाँदी की माँ : इसी खयाल से तो मैंने पारसनाथ से कहा था कि सरला की शादी लालसिंह के जीते-जी न होनी चाहिए और इस बात को वह अच्छी तरह समझ भी गया है।

बाँदी : मगर लालसिंह बड़ा ही काँइयाँ है।

बाँदी की माँ : ठीक है, मगर वह पारसनाथ के फेर में उस वक्त आ जाएगा जब वह उसे यहाँ लाकर तुम्हारे पास बैठे हुए हरनंदन का मुकाबला करा देगा।

बाँदी: लालसिंह जब यहाँ हरनंदन बाबू को देखेगा तो वह उन्हें बिना टोके कभी न रहेगा, और अगर टोकेगा तो हरनंदन बाबू को विश्वास हो जाएगा कि बाँदी ने मेरे साथ दगा की।

बाँदी की माँ : नहीं -नहीं, हरनंदन बाबू को ऐसा समझने का मौका कभी न देना चाहिए ! मगर यही तो हम लोगों की चालाकी है! हमें दोनों तरफ से फायदा उठाना और दोनों को अपना आसामी बनाए रखना ही उचित है।

बाँदी : तो फिर क्या तरकीब की जाए?

बाँदी की माँ : हरनंदन बाबू को सरला का पता बताना और लालसिंह को हरनंदन की सूरत दिखाना, ये दोनों काम एक ही समय में होने चाहिए। इसके बाद हम लोग लालसिंह से बिगड़ जाएँगे और उसे यहाँ से फौरन निकल जाने के लिए कहेंगे, उस समय हरनंदन बाबू को हम लोगों पर शक न होगा।

बाँदी: मगर इसके अतिरिक्त इस बात की उम्मीद कब है कि हरनंदन बाबू से बहुत दिनों तक फायदा होता रहेगा?

बाँदी की माँ : (मुस्कराकर) अरे हम लोग बड़े-बड़े जतियों को मुरुंडा कर लेती हैं, हरनंदन हैं क्या चीज? अगर मेरी तालीम का असर तुझ पर पड़ता रहेगा तो यह कोई बड़ी बात न होगी।  .

बाँदी : कोशिश तो जहाँ तक हो सकेगा करूँगी, मगर सुनने में बराबर यही आता है कि हरनंदन बाबू को गाने-बजाने का या रंडियों से मिलने का कुछ भी शौक नहीं है, बल्कि वह रंडियों के नाम से चिढ़ता है।

बाँदी की माँ : ठीक है, इस मिजाज के सैकड़ों आदमी होते हैं और हैं, मगर उनके खयालों की मजबूती तभी तक कायम रहती है जब तक वे किसी-न-किसी तरह हम लोगों के घर में पैर नहीं रखते , और जहाँ एक दफे हम लोगों के आँचल की हवा उन्हें लगी तहाँ उनके खयालों की मजबूती में फर्क पड़ा! एक-दो कौन कहे पचासों जती और ब्रह्मचारियों की खबर तो मैं ले चुकी हूँ। हाँ अगर तेरे किए कुछ हो न सके तो बात ही दूसरी है।

                  इसी किस्म की बातें हो रही थीं कि लौंडी ने हरनंदन बाबू के आने की खबर दी। सुनते ही बाँदी घबराहट के साथ उठ खड़ी हुई और बीस-पच्चीस कदम आगे बढ़कर बड़ी मुहब्बत और खातिरदारी का बर्ताव दिखाती हुई उसी कोठरी के दरवाजे तक ले आई, जिसमें बैठकर अपनी माँ से बातें कर रही थी और जहाँ उसकी माँ सलाम करने की नीयत से खड़ी थी।

अस्तु, बाँदी की माँ ने हरनंदन बाबू को झुककर सलाम करने के बाद बाँदी से कहा, ‘बाँदी! आपको यहाँ मत बैठाओ जहाँ अक्सर लोग आते -जाते रहते हैं बल्कि ऊपर बँगले ही में ले जाओ क्योंकि वह आप ही के लायक है और आपको पसंद भी है।‘

                 इतना कहकर बाँदी की माँ हट गई और बाँदी ‘हाँ ऐसा ही करती हूँ’, कहकर हरनंदन बाबू को लिए ऊपरवाले उसी बँगले में चली गई जिसमें थोड़ी देर पहिले पारसनाथ बैठकर बाँदी के साथ ‘चारा-बदलोअल’ कर चुका था।

हरनंदन बाबू बड़ी इज्जत और जाहिरी मुहब्बत के साथ बैठाए गए और इसके बाद उन दोनों में यों बातचीत होने लगी-

बाँदी : कल तो आपने खूब छकाया! दो बजे तक मैं बराबर बैठी इंतजार करती रही, आखिर बड़ी मुश्किल से नींद आई, सो नींद में भी बराबर चौंकती रही।

हरनंदन : हाँ, एक ऐसा टेढ़ा काम आ पड़ा था कि मुझे कल बारह बजे रात तक बाबू जी ने अपने पास से उठने न दिया, उस समय और भी कई आदमी बैठे हुए थे।

बाँदी : तभी ऐसा हुआ! मैं भी यही सोच रही थी कि आप बिना किसी भारी सबब के वादाखिलाफी करनेवाले नहीं हैं।

हरनंदन : मैं अपने वादे का बहुत बड़ा खयाल रखता हूँ और किसी को यह कहने का मौका नहीं दिया चाहता कि हरनंदन वादे के सच्चे नहीं हैं।

बाँदी : इस बारे में तो तमाम जमाना आपकी तारीफ करता है। मुझे आप ऐसे सच्चे सर्दार की सोहबत का फख्र है। अभी कल मेरे यहाँ बी इमामीजान आई थीं। बात-ही-बात में उन्होंने मुझे कह ही तो दिया कि ‘हाँ बाँदी, अब तुम्हारा दिमाग आसमान के नीचे क्यों उतरने लगा! हरनंदन बाबू ऐसे सच्चे सर्दार को पाकर तुम जितना घमंड करो थोडा है!’ मैं समझ गई कि यह डाह से ऐसा कह रही है।

हरनंदन : (ताज्जुब की सूरत बनाकर) इमामीजान को मेरा हाल कैसे मालूम हुआ? क्या तुमने कह दिया था?

बाँदी : (जोर देकर) अजी नहीं, मैं भला क्यों कहने लगी थी? यह काम उसी दुष्ट पारसनाथ का है। उसी ने तुम्हें कई जगह बदनाम किया है। मैं तो जब भी उसकी सूरत देखती हूँ मारे गुस्से के आँखों में खून उतर आता है, यही जी चाहता है कि उसे कच्चा ही खा जाऊँ, मगर क्या करूँ, लाचार हूँ, तुम्हारे काम का खयाल करके रुक जाती हूँ। कल वह फिर मेरे यहाँ आया था, मैंने अपने क्रोध को बहुत रोका, मगर फिर भी जुबान चल ही पड़ी, बात ही बात में कई जली-कटी कह गई।

हरनंदन : लेकिन अगर उससे ऐसा ही सूखा बर्ताव रखोगी तो मेरा काम कैसे चलेगा?

बाँदी : आप ही के काम का खयाल तो मुझे उससे मिलने पर मजबूर करता है, अगर ऐसा न होता तो मैं उसकी वह दुर्गति करती कि वह भी जन्म-भर याद करता। मगर उसे आप पूरा बेहया समझिए, तुरंत ही मेरी दी हुई गालियों को बिलकुल भूल जाता है और खुशामदें करने लगता है। कल मैंने उसे विश्वास दिला दिया कि मुझसे और आप (हरनंदन) से लड़ाई हो गई और अब सुलह नहीं हो सकती, अब यकीन है कि दो-तीन दिन में आपका काम हो जाएगा।

हरनंदन : अरे हाँ, परसों उसी कमबख़्त की बदौलत एक बड़ी मजेदार बात हुई।

बाँदी : (और आगे खिसककर और ताज्जुब के साथ) क्या, क्या?

हरनंदन : उसी के सिखाने—पढ़ाने से परसों लालसिंह ने एक आदमी मेरे बाप के पास भेजा। उस समय जबकि-उस आदमी से और मेरे बाप से बातें हो रही थीं, इत्तिफाक से मैं भी वहाँ जा पहुँचा। यद्यपि मेरा इरादा तुरंत लौट पड़ने का था मगर मेरे बाप ने मुझे अपने पास बैठा लिया, लाचार उन दोनों की बातें सुनने लगा।  उस आदमी ने लालसिंह की तरफ से मेरी बहुत-सी शिकायतें कीं और बात-बात में यही कहता रहा कि ‘हरनंदन बाबू तो बाँदी रंडी को रखे हुए हैं और दिन-रात उसी के यहाँ बैठे रहते हैं, ऐसे आदमी को हमारी लड़की के गायब हो जाने का भला क्या रंज होगा?’

मेरे पिता पहिले तो चुपचाप बैठे देर तक ऐसी बातें सुनते रहे, मगर जब उनको हद से ज्यादे गुस्सा चढ़ आया तब उस आदमी से डपटकर बोले, ”तुम जाकर लालसिंह को मेरी तरफ से कह दो कि अगर मेरा लड़का हरनंदन ऐयाश है तो तुम्हारे, बाप का क्या लेता है? तुम्हारी लड़की जाए जहन्नुम में और अब अगर वह मिल भी जाए तो मैं अपने लड़के की शादी उससे नहीं कर सकता।

जो नौजवान औरत इस तरह बहुत दिनों तक घर से निकलकर गायब रहे वह किसी भले आदमी के घर में ब्याहता बनकर रहने लायक नहीं रहती! अब सुन लो कि मेरे लड़के ने खुल्लमखुला बाँदी रंडी को रख लिया है और उसे ‘बहुत जल्दी यहाँ ले आवेगा ! बस तुम तुरंत यहाँ से चले जाओ, मैं तुम्हारा मुँह देखना नहीं चाहता !!”

           इतना सुनते ही वह आदमी उठकर चला गया और तब मेरे बाप ने मुझसे कहा, ”बेटा ! अगर तुम अभी तक बाँदी से कुछ वास्ता न भी रखते थे। तो अब खुल्लमखुल्ला उसके पास आना-जाना शुरू कर दो और अगर तुम्हारी ख्वाहिश हो तो तुम उसे नौकर भी रख लो या यहाँ ले आओ।  मैं उसके लिए पाँच सौ रुपए महीने का इलाका अलग कर दूँगा बल्कि थोड़े दिन बाद वह इलाका उसे लिख भी दूँगा, जिसमें वह हमेशा आराम और चैन से रहे।  इसके अलावा और जो कुछ तुम्हारी इच्छा हो उसे दो, मैं तुम्हारा हाथ कभी न रोकूँगा–देखें तो सही लालसिंह हमारा क्या कर लेता है!!”

बाँदी : (बड प्यार से हरनंदन का पंजा पकड़कर) सच कहना ! क्या हकीकत में ऐसा हुआ?

हरनंदन : (बाँदी के सर पर हाथ रख के) तुम्हारे सर की कमस, भला मैं तुमसे झूठ बोलूँगा ! तुमसे क्या मैंने कभी और किसी से भी आज तक कोई बात भला झूठ कही है?

बाँदी : (खुशी से) नहीं -नहीं, इस बात को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूँ कि आप कभी किसी से झूठ नहीं बोलते!

 हरनंदन : और फिर इस बात का विश्वास तो और लोगों को भी थोड़ी ही देर में हो जाएगा क्योंकि आज मैं किसी से लुक-छिप के यहाँ नहीं आया हूँ बल्कि खुल्लमखुल्ला आया हूँ।  मेरे साथ एक सिपाही और एक नौकर भी आया है जिन्हें मैं नीचे दरवाजे पर इसलिए छोड़ आया हूँ कि बिना मेरी मर्जी के किसी को ऊपर न आने दें।

बाँदी : (ताज्जुब से) हाँ !!

हरनंदन : (जोर देकर) हाँ ! और आज मैं यहाँ बहुत देर तक बैठूँगा, बल्कि तुम्हारा मुजरा भी सुनूँगा। डेरे पर मैं सभों से कह आया हूँ कि ‘मैं बाँदी के यहाँ जाता हूँ, अगर कोई जरूरत आ पड़े तो वहीं मुझे खबर देना।’ मैं तो बाप का हुक्म पाते ही इस तरफ को रवाना हुआ और यहाँ पहुँचकर बड़ी आजादी के साथ घूम रहा हूँ। आज से तुम मुझे अपना ही समझो और विश्वास रखो कि तुम बहुत जल्द अपने को किसी और ही रंग-ढंग में देखोगी।

बाँदी : (खुशी से हरनंदन के गले में हाथ डाल के) यह तो तुमने बड़ी खुशी की बात सुनाई! मगर रुपए-पैसे की मुझे कुछ भी चाह नहीं है, मैं तो सिर्फ तुम्हारे साथ रहने में खुश हूँ, चाहे तुम जिस तरह रखो।

हरनंदन : मुझे भी तुमसे ऐसी ही उम्मीद है।  अब जहाँ तक जल्द हो सके तुम उस काम को ठीक करके पारसनाथ को जवाब दे दो और इस मकान को छोड़कर किसी दूसरे आलीशान मकान में रहने का बंदोबस्त करो। अब मुझे सरला का पता लगाने की कोई जरूरत तो नहीं रही, मगर फिर भी मैं अपने बाप को सच्चा किए बिना नहीं रह सकता जिसने मेहरबानी करके मुझे तुम्हारे साथ वास्ता रखने के लिए इतनी आजादी दे रखी है और तुम्हें भी इस बात का खयाल जरूर होना चाहिए। वे चाहते हैं कि सरला लालसिंह के घर पर पहुँच जाए और तब लालसिंह देखें कि हरनंदन सरला के साथ शादी न करके बाँदी के साथ कैसे मजे में जिंदगी बिता रहा है।

बाँदी : जरूर ऐसा होना चाहिए ! मैं आपसे वादा करती हूँ कि चार दिन के अंदर ही सरला का पता लगाके पारसनाथ का मुँह काला करूँगी!

हरनंदन : (बाँदी की पीठ पर हाथ फेरके) शाबाश !!

बाँदी : यद्यपि आपको अब किसी का डर नहीं रहा और बिलकुल आजाद हो गए हैं, मगर मैं आपको राय देती हूँ कि दो-तीन दिन अपनी आजादी को छिपाए रखिए, जिसमें पारसनाथ से मैं अपना काम बखूबी निकाल लूँ।

हरनंदन : खैर जैसा तुम कहोगी वैसा ही करूँगा, मगर इस बात को खूब समझ रखना कि आज से तुम हमारी हो चुकीं, तुम्हारा बिलकुल खर्च मैं अदा करूँगा और तुम्हें किसी के आगे हाथ फैलाने का मौका न दूँगा। आज से मैं तुम्हारा मुशाहरा मुकर्रर कर देता हूँ और तुम भी गैरों के लिए अपने घर का दरवाजा बंद कर दो।

बाँदी : जो कुछ आपका हुक्म होगा मैं वही करूँगी और जिस तरह रखोगे रहूँगी। मेरा तो कुछ ज्यादे खर्च नहीं है और न मुझे रुपए-पैसे की लालच ही है मगर क्या करूँ अम्मा के मिजाज से लाचार हूँ और उनका हाथ भी जरा शाह-खर्च है।

हरनंदन : तो हर्ज ही क्या है, जब रुपए-पैसे की कुछ कमी हो तो ऐसी बातों पर ध्यान देना चाहिए। जब तक मैं मौजूद हूँ तब तक किसी तरह की फिक्र तुम्हारे दिल में पैदा नहीं हो सकती और न तुम्हारा कोई शौक पूरा हुए बिना रह सकता है, अच्छा जरा अपनी अम्मा को तो बुला लाओ।

बाँदी : बहुत अच्छा, मैं खुद जाकर उन्हें अपने साथ ले आती हूँ।

इतना कहकर बाँदी हरनंदन के मोढ़े पर दबाव डालती हुई उठ खड़ी हुई और कमर को बल देती हुई कोठरी के बाहर निकल गई। थोड़ी देर तक हमारे हरनंदन बाबू को अपने विचार में डूबे रहने का मौका मिला और इसके बाद अपनी अम्माजान को लिए हुए बाँदी आ पहुँची। बाँदी हरनंदन से कुछ दूर हटकर बैठ गई और बुढ़िया आफत की पुड़िया ने इस तरह बातें करना शुरू किया-

बुढ़िया: खुदा सलामत रखे, आले-आले मरातिब हों, मैं तो दिन-रात दुआ करती हूँ, कहिए क्या हुक्म है?

हरनंदन : बड़ी बी ! मैं तुमसे एक बात कहा चाहता हूँ।

बुढ़िया : कहिए, कहिए, क्या बाँदी से कुछ बेअदबी हो गई है?

हरनंदन : नहीं-नहीं, बाँदी बेचारी ऐसी बेअदब नहीं है कि उससे किसी तरह का रंज पहुँचे। मैं उससे बहुत खुश हूँ और इसीलिए मैं उसे हमेशा अपने पास रखना चाहता हूँ।

बुढिया : ठीक है, अगर आप ऐसा अमीर इसे नौकर न रखेगा तो रखेगा कौन? और अमीर लोग तो ऐसा करते ही हैं! मैं तो पहिले ही सोचे हुए थी कि आप ऐसे अमीर उठाईगीरों की तरह चूल्हा रखना पसंद न करेंगे।

हरनंदन : मैं नहीं चाहता कि जिसे मैं अपना बनाऊँ उसे दूसरे के आगे हाथ फैलाना पड़े या कोई दूसरा उसे उँगली भी लगावे।

बुढ़िया : ठीक है, ठीक है, भला ऐसा कब हो सकता है? जब आपकी बदौलत मेरा पेट भरेगा तो दूसरे कमबख़्त को आने ही क्यों दूँगी। आप ही ऐसे सर्दार की खिदमत में रहने के लिए. तो हजारों रूपै खर्च करके मैंने इसे आदमी बनाया है, तालीम दिलवाई हैं, और सच तो यों है कि यह आपके लायक है भी। मैं बड़े तरद्दुद में पड़ी रहती थी और सोचती थी कि यह तो दिन -रात आपके ध्यान में डूबी रहती है और मैं कर्ज के बोझ से दबी जा रही हूँ, आखिर काम कैसे चलेगा? चलो अब मैं हलकी हुई, आप जानें और बाँदी जाने, इसकी इज्जत-हुरमत सब आपके हाथ में है।  |

हरनंदन : भला बताओ तो सही कितने रूपै महीने में तुम्हारा अच्छी तरह गुजर हो सकता है? :

बुढिया : ऐ हजूर ! भला मैं क्या बताऊँ? आपसे कौन-सी बात छिपी हुई है? घर में दस आदमी खानेवाले ठहरे, तिस पर महँगी के मारे नाकों में दम हो रहा है। हाथ का फुटकर खर्च अलग ही दिन-रात परेशान किए रहता है। अभी कल की बात है कि छोटे नवाब साहब इसे दो सौ रूपै महीना देने को राजी थे, मगर नाच -मुजरा सब बंद करने को कहते थे, मैंने मंजूर न किया क्योंकि नाच -मुजरे से सैकड़ों रुपए आ जाते हैं तब कहीं घर का काम मुश्किल से चलता है, खाली दो सौ रुपए से क्या हो सकता है।

हरनंदन : खैर नाच-मुजरा तो मेरे वक्त में भी बंद करना ही पड़ेगा मगर आदत बनी रहने के खयाल से खुद सुना करूँगा और उसका इनाम अलग दिया करूँगा। अभी तो मैं इसके लिए चार सौ रुपए महीने का इंतजाम कर देता हूँ, फिर पीछे देखा जाएगा.।  मैंने अपना इरादा और अपने बाप का हाल भी बाँदी से कह दिया है, तुम सुनोगी तो खुश होवोगी। (बीस अशरफियाँ बुढ़िया के आगे फेंककर) लो इस महीने की तनखाह पेशगी दे जाता हूँ।  अब तुम्हें कोई दूसरा आलीशान मकान भी किराए ले लेना चाहिए जिसका किराया मैं अलग से दूँगा।

बुढ़िया : (अशर्फियों को खुशी-खुशी उठाकर) बस-बस-बस, इतने में मेरे घर का खर्च बखूबी चल जाएगा, नाच-मुजरे की भी जरूरत न रहेगी। बाकी रहा गहना-कपड़ा, सो आप जानिए और बाँदी जाने, जिस तरह रखिएगा रहेगी। अब मैं एक ही दो दिन में अपना और बाँदी का गहना बेचकर कर्जा भी चुका देती हूँ, क्योंकि ऐसे सर्दार की खिदमत में रहनेवाली बाँदी के घर किसी तगादगीर का आना अच्छा नहीं है और मैं यह बात पसंद नहीं करती।

इतना कहकर बुढ़िया उठ गई और हरनंदन बाबू ने उसकी आखिरी बात का कुछ जवाब न दिया।

    बुढिया के चले जाने के बाद घंटे-भर तक हरनंदन बाँदी के बनावटी प्यार और नखरे का आनंद लेते रहे और इसके बाद उठकर अपने डेरे की तरफ रवाना हुए।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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