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यों तो कल्याणसिंह के बहुत-से मेली-मुलाकाती थे मगर सूरजसिंह  नामी एक जिमींदार उनका सच्चा और दिली दोस्त था, जिसकी यहाँ के राजा धर्मसिंह के वहाँ भी बड़ी इज्जत और कदर थी। सूरजसिंह का एक नौजवान लड़का भी था, जिसका नाम रामसिंह था और जिसे राजा धर्मसिंह ने बारह मौजों का तहसीलदार बना दिया था। उन दिनों तहसीलदारों को बहुत बड़ा  अख्तियार रहता था, यहाँ तक सैकड़ों मुकदमे दीवानी और फौजदारी के खुद तहसीलदार ही फैसला करके उसकी रिपोर्ट राजा के पास भेज दिया करते थे। रामसिंह को राजा धर्मसिंह बहुत मानते थे। अस्तु, कुछ तो इस सबब से मगर ज्यादे अपनी बुद्धिमानी के सबब उसने अपनी इज्जत और धाक बहुत बढ़ा रक्खी थी। जिस तरह कल्याणसिंह और सूरजसिंह में दोस्ती थी, उसी तरह रामसिंह और हरनंदन में (जिसकी शादी होनेवाली थी) सच्ची मित्रता थी और आज की महफिल में वे दोनों ही बाप-बेटा मौजूद भी थे।

रामसिंह और हरनंदनसिंह दोनों मित्र बड़े ही होशियार, बुद्धिमान, पंडित और वीर पुरुष थे और उन दोनों का स्वभाव भी ऐसा अच्छा था कि जो कोई एक दफे उनसे मिलता और बातें करता वही उनका प्रेमी हो जाता। इसके अतिरिक्त वे दोनों मित्र खूबसूरत भी थे और उनका सुडौल तथा कसरती बदन देखने ही योग्य था।

जब कल्याणसिंह की घबराहट का हाल लोगों को मालूम हुआ और महफिल में खलबली पड़ गई तो सूरजसिंह और हरनंदन भी कल्याणसिंह के पास जा पहुँचे, जो दुखित हृदय से उस पिटारे के पास बैठे हुए थे, जिसमें खून से भरे हुए शादीवाले जनाना कपड़े निकले थे। थोड़ी ही देर में वहाँ बहुत-से आदमियों की भीड़ हो गई, जिन्हें सूरजसिंह ने बड़ी बुद्धिमानी से हटा दिया और एकांत हो जाने पर कल्याणसिंह से सब हाल पूछा। कल्याणसिंह ने जो देखा था या जो कुछ हो चुका था बयान किया और इसके बाद अपने कमरे में ले जाकर वह स्थान भी दिखाया जहाँ पिटारा पाया गया था और साथ ही इसके अपने दिल का शक भी बयान किया।

हरनंदन को जब हाल मालूम हो गया तो वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया और आरामकुर्सी पर बैठ कुछ सोचने लगा। उसी समय कल्याणसिंह के समधियाने से अर्थात लालसिंह के यहाँ से यह खबर आ पहुँची कि ‘सरला’ (जिसकी हरनंदन से शादी होनेवाली थी) घर में से यकायक गायब हो गई और उस कोठरी में जिसमें वह थी सिवाय खून के छींटे और निशानों के और कुछ भी देखने में नहीं आता।

यह मामला निःसंदेह बड़ा भयानक और दुखदाई था। बात-की-बात में यह खबर भी बिजली की तरह चारों तरफ फैल गई। जनानों में रोना-पीटना पड़ गया। घंटे ही भर पहिले जहाँ लोग हँसते-खेलते घूम रहे थे, अब उदास और दुखी दिखाई देने लगे। महफिल का शामियाना उतार लेने के बाद गिरा दिया गया। रंडियों को कुछ दे-दिलाकर सवेरा होने के पहिले ही विदा हो जाने का हुक्म मिला। इसके बाद जब सूरजसिंह और रामसिंह सलाह-विचार करके कल्याणसिंह से विदा हुए और मिलने के लिए हरनंदन के कमरे में आए तो हरनंदन को वहाँ न पाया, हाँ खोज-खबर करने पर मालूम हुआ कि बाँदी रंडी के पास बैठा हुआ दिल बहला रहा है, वही बाँदी रंडी जिसका जिक्र इस किस्से के पहिले ब्यान में आ चुका है और जो आज की महफिल में नाचने के लिए आई थी।

सूरजसिंह और रामसिंह को यह सुनकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि हरनंदन बाँदी रंडी के पास बैठा दिल बहला रहा है! क्योंकि वे हरनंदन के स्वभाव से अनजान न थे और इस बात को भी खूब जानते थे कि वह रंडियों के फेर में पड़ने या उनकी सोहबत को पसंद करनेवाला लड़का नहीं है और फिर ऐसे समय में जबकि चारों तरफ उदासी फैली हुई हो उसका बाँदी के पास बैठकर गप्पें उड़ाना तो हद दर्जे का ताज्जुब पैदा करता था। आखिर सूरजसिंह ने अपने लड़के रामसिंह को निश्चय करने के लिए उस तरफ रवाना किया, जिधर बाँदी रंडी का डेरा था और आप लौटकर पुन: अपने मित्र कल्याणसिंह के पास पहुँचे, जो अपने कमरे में अकेले बैठे कुछ सोच रहे थे।

कल्याणसिंह: (ताज्जुब से) आप लौटे क्यों? क्या कोई दूसरी बात पैदा हुई?

सूरजसिंह: हम लोग हरनंदन से मिलने के लिए उसके कमरे में गए तो मालूम हुआ कि वह बाँदी रंडी के डेरे में बैठा हुआ दिल बहला रहा है।

कल्याणसिंह: (चौंककर) बाँदी रंडी के यहाँ! नहीं, कभी नहीं, वह ऐसा लड़का नहीं है, और फिर ऐसे समय में जबकि चारों तरफ उदासी फैली हुई हो और हम लोग एक भयानक घटना के शिकार हो रहे हों! यह बात दिल में नहीं बैठती।

सूरजसिंह: मेरा भी यही ख्याल है और इसी से निश्चय करने के लिए मैं रामसिंह को उस तरफ भेजकर आपके पास आया हूँ।

कल्याणसिंह: अगर यह बात सच निकली तो बड़े ही शर्म की बात होगी। हँसी-खुशी के दिनों में ऐसी बातों पर लोगों का ध्यान विशेष नहीं जाता और न लोग इस बात को इतना बुरा ही समझते हैं, मगर आज ऐसी आफत के समय में मेरे लड़के हरनंदन का ऐसा करना बड़े शर्म की बात होगी, हर एक छोटा-बड़ा बदनाम करेगा और समधियाने में तो यह बात न मालूम किस रूप से फैलकर कैसा रूपक खड़ा करेगी सो कह नहीं सकते।

सूरजसिंह: बात तो ऐसी ही है मगर फिर भी मैं यही कहता हूँ कि हरनंदन ऐसा लड़का नहीं है। उसे अपनी बदनामी का ध्यान उतना ही रहता है, जितना जुआरी को अपना दाँव पड़ने का उस समय जबकि कौड़ी किसी खिलाड़ी के हाथ से गिरा ही चाहती हो।

इतने ही में हरनंदन को साथ लिए हुए रामसिंह भी आ पहुँचा, जिसे देखते ही कल्याणसिंह ने पूछा, “क्यों जी रामसिंह! हरनंदन से कहाँ मुलाकात हुई?”

रामसिंह: बाँदी रंडी के डेरे में।

कल्याणसिंह: (चौंककर) हैं! (हरनंदन से) क्यों जी तुम कहाँ थे?

हरनंदन: बाँदी रंडी के डेरे में!

इतना सुनते ही कल्याणसिंह की आँखें मारे क्रोध से लाल हो गईं और मुँह से एक शब्द भी निकलना कठिन हो गया। उधर यही हाल सूरजसिंह का भी था। एक तो दुख और क्रोध ने उन्हें पहिले से ही दबा रखा था, मगर इस समय हरनंदन की ढिठाई ने उन्हें आपे से बाहर कर दिया। वे कुछ कहना ही चाहते थे कि रामसिंह ने कहा-

रामसिंह: (कल्याणसिंह से) मगर हमारे मित्र इस योग्य नहीं हैं कि आपको कभी अपने ऊपर क्रोधित होने का समय दें। यद्यपि अभी तक मुझे कुछ मालूम नहीं हुआ है तथापि मैं इतना कह सकता हूँ कि इनके ऐसा करने का कोई-न-कोई भारी सबब जरूर होगा।

हरनंदन: बेशक ऐसा ही है।

कल्याणसिंह: (आश्चर्य से) बेशक ऐसा ही है!

हरनंदन: जी हाँ!

इतना कह हरनंदन ने कागज का एक पुर्जा जो बहुत मुड़ा और बिगड़ा हुआ था, उनके सामने रख दिया।  कल्याणसिंह ने बड़ी बेचैनी से उसे उठाकर पढ़ा और तब यह कहकर अपने मित्र सूरजसिंह के हाथ में दे दिया कि ‘बेशक ऐसा ही है।’ सूरजसिंह ने भी उसे बड़े गौर से पढ़ा और ‘बेशक ऐसा ही है’ कहते हुए अपने लड़के रामसिंह के हाथ में दे दिया और उसे पढ़ने के साथ ही रामसिंह के मुँह से भी यही निकला कि ‘बेशक ऐसा ही है!!’

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जमींदार लालसिंह के घर में बड़ा ही कोहराम मचा हुआ था।  उसकी प्यारी लड़की सरला घर में से यकायक गायब हो गई थी और वह भी इस ढंग से कि याद करके कलेजा फटता और विश्वास होता था कि उस बेचारी के खून से किसी निर्दयी ने अपना हाथ रंगा है। बाहर-भीतर हाहाकार मचा हुआ था और इस खयाल से तो और भी ज्यादे रुलाई आती थी कि आज ही उसे ब्याहने के लिए बाजे-गाजे के साथ बरात आवेगी।

लालसिंह मिजाज का बड़ा ही कड़ुआ आदमी था। गुस्सा तो मानो ईश्वर के घर ही से उसके हिस्से में पड़ा था। रंज हो जाना उसके लिए कोई बड़ी बात न थी,  जरा-जरा से कसूर पर बिगड़ जाता और बरसों की जान-पहचान तथा मुरौवत का कुछ भी खयाल न करता। यदि विशेष प्राप्ति की आशा न होती तो उसके यहाँ नौकर, मजदूरनी या सिपाही एक भी दिखाई न देता। इसी से प्रगट है कि वह लोगों को देता भी था, मगर उनका दान इज्जत के साथ न होता और लोगों की बेइज्जती का फजीहता करने में ही वह अपनी शान समझता था। यह सबकुछ था मगर रुपए ने उसके सब ऐबों पर जालीलेट का पर्दा डाल रखा था। उसके पास दौलत बेशुमार थी, मगर लड़का कोई भी न था, सिर्फ एक लड़की वही सरला थी जिसके संबंध से आज दो घरों में रोना-पीटना मचा हुआ था। वह अपनी इस लड़की को प्यार भी बहुत करता था और भाई-भतीजे मौजूद रहने पर भी अपनी कुल जायदाद जिसे उसने अपने उद्योग से पैदा किया था, इसी लड़की के नाम लिखकर तथा वह वसीयतनामा राजा के पास रखकर अपने भाई-भतीजों को जो रुपए-पैसे की तरफ से दुखी रहा करते थे, सूखा ही टरका दिया था, हाँ खाने-पीने की तकलीफ वह किसी को भी नहीं देता था। उसके चौके में चाहे कितने ही आदमी बैठकर खाते इसका वह कुछ खयाल न करता बल्कि खुशी से लोगों को अपने साथ खाने में शरीक करता था।

अपनी लड़की सरला के नाम जो वसीयतनामा उसने लिखा था वह भी कुछ अजब ढंग का था। उसके पढ़ने ही से उसके दिल का हाल जाना जाता था। पाठकों की जानकारी के लिए उस वसीयतनामे की नकल हम यहाँ पर देते हैं–

‘मैं लालसिंह

‘अपनी कुल जायदाद जिसे मैंने अपनी मेहनत से पैदा किया है और जो किसी तरह बीस लाख रूपै से कम नहीं है और जिसकी तकमील नीचे लिखी जाती है, अपनी लड़की सरला के नाम से जिसकी उम्र इस वक्त चौदह (14) वर्ष की है वसीयत करता हूँ। इस जायदाद पर सिवाय सरला के और किसी का हक न होगा बशर्ते कि नीचे लिखी शर्तों का पूरा बर्ताव किया जाए-

(1) सरला को अपनी कल जायदाद का मैनेजर अपने पति को बनाना होगा।

(2) सरला अपनी जायदाद (जो मैं उसे देता हूँ) या उसका कोई हिस्सा अपने पति की इच्छा के विरूद्ध खर्च न कर सकेगी और न किसी को दे सकेगी।

(3) सरला के पति को सरला की कुल जायदाद पर बतौर मैनेजरी के हक होगा, न कि बतौर मालिकाना।

(4) सरला का पति अपनी मैनेजरी की तनखाह (अगर चाहे तो) पाँच सौ रूपै महीने के हिसाब से इस जायदाद की आमदनी में से ले सकेगा।

(5) सरला की शादी का बंदोबस्त मैं कल्याणसिंह के लड़के हरनंदनसिंह के साथ कर चुका हूँ और जहाँ तक संभव है अपनी जिंदगी में उसी के साथ कर जाऊँगा। कदाचित इसके पहिले ही मेरा अंतकाल हो जाए तो सरला को लाजिम होगा कि उसी हरनंदनसिंह के साथ शादी करे। अगर इसके विपरीत किसी दूसरे के साथ शादी करेगी तो मेरी कुल जायदाद के (जिसे में इस वसीयतनामे में दर्ज करता हूँ) आधे हिस्से पर हमारे चारों सगे भतीजों–राजाजी, पारसनाथ, धरनीधर और दौलतसिंह का या उनमें से उस वक्त जो हों, का हक हो जाएगा और बाकी के आधे हिस्से पर सरला के उस पति का अधिकार होगा, जिसके साथ कि वह मेरी इच्छा के विरुद्ध शादी करेगी। हाँ, अगर शादी होने के पहिले सरला को हरनंदन की बदचलनी का कोई सबूत मिल जाए तो उसे अख्तियार होगा कि जिसके साथ जी-चाहे शादी करे। उस अवस्था में सरला को मेरी कुल जायदाद पर उसी तरह अधिकार होगा, जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है। अगर शादी के बाद हरनंदनसिंह की बदचलनी का कोई सबूत पाया जाए तो सरला को आवश्यक होगा कि उसे अपनी मैनेजरी से खारिज कर दे और अपनी कुल जायदाद राजा के सुपुर्द करके काशी चली जाए और वहाँ केवल एक हजार रुपै महीना राजा से लेकर तीर्थवास करे और यदि ऐसा न करे तो राजा को (जो उस वक्त में यहाँ का मालिक हो) जबरदस्ती ऐसा करने का अधिकार होगा।

(6) सरला के बाद सरला की संपत्ति का मालिक धर्मशास्त्रानुसार होगा।

जायदाद की फिहरिस्त और तारीख इत्यादि

इस वसीयतनामे के पढ़ने ही से पाठक समझ गए होंगे कि लालसिंह कैसी तबीयत का आदमी और अपनी जिद्द का कैसा पूरा था। इस समय उसने जब यकायक सरला के गायब होने का हाल लौंडी की जुबानी सुना तो उसके कलेजे पर एक चोट-सी लगी और वह घबड़ाया हुआ मकान के अंदर चला गया जहाँ औरतों में विचित्र ढंग की घबड़ाहट फैली हुई थी। सरला की माँ उस कोठरी में बेहोश पड़ी हुई थी, जिसमें से सरला यकायक गायब हो गई थी और जहाँ उसके बदले में चारों तरफ खून के और निशान दिखाई दे रहे थे। कई औरतें उस बेचारी के पास बैठी हुईं रो रही थीं, कई उसे होश में लाने की फिक्र कर रही थीं, और कई इस आशा में कि कदाचित सरला कहीं मिल जाए, ऊपर-नीचे और मकान के कोनों में घूम-घूमकर देखभाल कर रही थीं।

जिस समय लालसिंह सरला की कोठरी में पहुँचा और उसने वहाँ की अवस्था देखी, घबड़ा गया और खून के छींटों पर निगाह पड़ते ही उसकी आँखों से आँसू की नदी बह चली। उसे थोड़ी देर तक तो तनोबदन की सुध न रही फिर बड़ी कोशिश से उसने अपने को सँभाला और तहकीकात करने लगा। कई औरतों और लौंडियों के उसने इजहार लिए मगर इससे ज्यादे पता कुछ भी न लगा कि सरला यकायक अपनी कोठरी में से ही कहीं गायब हो गई। उसे किसी ने भी कोठरी के बाहर पैर रखते या कहीं जाते नहीं देखा। जब लालसिंह ने खून के निशान और छींटों पर ध्यान दिया तो उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ क्योंकि खून के जो कुछ छीटे या निशान थे सब कोठरी के अंदर ही थे, चौकठ के बाहर इस किस्म की कोई बात न थी। वह अपनी स्त्री को होश में लाने और दिलासा देने का बंदोबस्त करके बाहर अपने कमरे में चला आया, जहाँ से उसी समय अपने समधी कल्याणसिंह के पास एक आदमी रवाना करके उसकी जुबानी अपने यहाँ का सब हाल उसने कहला भेजा।  .

रात-भर रंज और गम में बीत गया। सरला को खोज निकालने के लिए किसी ने कोई बात उठा न रक्खी, नतीजा कुछ भी न निकला। दूसरे दिन दो पहर बीते वह आदमी भी लौट आया जो कल्याणसिंह के पास भेजा गया था और उसने वहाँ का सब हाल लालसिंह से कहा, जिसे सुनते ही लालसिंह पागल की तरह हो गया और उसके दिल में कोई नई बात पैदा हो गई,  मगर जिस समय उस आदमी ने यह कहा कि ‘खून-खराबे का सब हाल मालूम हो जाने पर भी हरनंदनसिंह को किसी तरह का रंज न हुआ और वह एक रंडी के पास, जिसका नाम बाँदी है और जो नाचने के लिए उसके यहाँ गई हुई थी, जा बैठा और हँसी-दिल्लगी में अपना समय बिताने लगा, यहाँ तक कि उसके बाप ने बुलाने के लिए कई आदमी भेजे मगर वह बाँदी के पास से न उठा, आखिर जब स्वयं रामसिंह गए तो उसे जबरदस्ती उठा लाए और लानत-मलामत करने लगें——’ तो लालसिंह की हालत बदल गई। उसके लिए यह खबर बड़ी ही दुखदाई थी। यद्यपि वह सरला के गम में अधमुआ हो रहा था तथापि इस खबर ने उसके बदन में बिजली पैदा कर दी। कहाँ तो वह दीवार के सहारे सुस्त बैठा हुआ सब बातें सुन रहा और आँखों से आँसू की बूँदें गिरा रहा था, कहाँ यकायक सँभलकर बैठ गया, क्रोध से बदन काँपने लगा, आँसू की तरी एकदम गायब होकर आँखों ने अंगारों की सूरत पैदा की और साथ ही इसके वह लंबी-लंबी साँसें लेने लगा।

उस समय लालसिंह के पास उसके चारों भतीजे–राजाजी, पारसनाथ, धरनीधर और दौलतसिंह तथा और भी कई आदमी जिन्हें वह अपना हिती समझता था बैठे हुए थे और सभों की सूरत से उदासी और हमदर्दी झलक रही थी।  हरनंदन और बाँदीवाली खबर सुनकर जिस समय लालसिंह क्रोध में आकर चुटीले साँप की तरह फुँकारने लगा उस समय उन लोगों ने भी नमक-मिर्च लगाना आरंभ कर दिया।

एक: देखने-सुनने और बातचीत से तो हरनंदन बड़ा नेक और बुद्धिमान मालूम पड़ता था।

दूसरा: मनुष्य का चित्त अंदर-बाहर से एक नहीं हो सकता।

तीसरा: मुझे तो पहिले ही से उसके चाल-चलन पर शक था, मगर लोगों में उसकी तारीफ इतनी ज्यादे फैली हुई थी कि मैं अपने मुँह से उसके खिलाफ कुछ कहने का साहस नहीं कर सकता था।

चौथा: बुद्धिमान ऐयाशों का यही ढंग रहता है।

पाँचवाँ: असल तो यों है कि हरनंदन को अपनी बुद्धिमानी पर घमंड भी हद्द से ज्यादे है। .

छठा: निःसंदेह ऐसा ही है। उसने तो केवल हमारे लालसिंह जी को  धोखा देने के लिए यह रूपक बाँधा हुआ था, नहीं तो वह पक्का बदमाश और—

पारसनाथ:  (लालसिंह का भतीजा) अजी मैं एक दफे (लालसिंह की तरफ इशारा करके) चाचा साहब से कह भी चुका था कि हरनंदन को जैसा आप समझे हुए हैं वैसा नहीं है, मगर आपने मेरी बातों पर कुछ ध्यान ही नहीं दिया उल्टे मुझी को उल्लू बनाने लगे।

लालसिंह: वास्तव में मैं उसे बहुत नेक आदमी समझता था।

पारसनाथ: मैं तो आज भी डंके की चोट कह सकता हूँ कि बेचारी सरला का खून (अगर वास्तव में वह मारी गई है तो) हरनंदन ही की बदौलत हुआ है। अगर मेरी मदद की जाए तो मैं इसको साबित करके दिखा भी सकता हूँ।

लालसिंह: क्या तुम इस बात को साबित कर सकते हो?

पारसनाथ: बेशक!

लालसिंह: तो क्या सरला के मारे जाने में भी तुम्हें कोई शक है?

पारसनाथ: जी हाँ, पूरा-पूरा शक है! मेरा दिल गवाही देता है कि यदि उद्योग के साथ पता लगाया जाएगा तो सरला मिल जाएगी।

लालसिंह: क्या यह काम तुम्हारे किए हो सकता है?

पारसनाथ: बेशक, मगर खर्च बहुत ज्यादे करना होगा !

लालसिंह: यद्यपि मैं तुम पर विश्वास और भरोसा नहीं रखता पर इस बारे में अंधा और बेवकूफ बनकर भी तुम्हारी मार्फत खर्च करने को तैयार हूँ। मगर तुम यह बताओ कि हरनंदन सरला के साथ दुश्मनी करके अपना नुकसान कैसे कर सकता है!

पारसनाथ: इसका बहुत बड़ा सबब है जिसके लिए हरनंदन ने ऐसा किया, वह बड़े आन-बान का आदमी है।

लालसिंह: आखिर वह सबब क्या है सो साफ-साफ क्यों नहीं कहते?

पारसनाथ: (इधर-उधर देखकर) मैं किसी समय एकांत में आपसे कहूँगा।

लालसिंह: अभी इसी जगह एकांत हो जाता है, जो कुछ कहना है तुरंत कहो, क्या तुम नहीं जानते कि इस समय मेरे दिल पर क्या बीत रही है?

इतना कहकर लालसिंह ने औरों की तरफ देखा और उसी समय वे लोग उठकर थोड़ी देर के लिए दूसरे कमरे में चले गए। उस समय पुन: पूछे जाने पर पारसनाथ ने कहा, ”हरनंदन अपनी बुद्धि और विद्या के आगे रुपए की कुछ भी कदर नहीं समझता। वह आपके रुपए का लालची नहीं है बल्कि अपनी तबीयत का बादशाह है। उसका बाप बेशक आपकी दौलत अपनी किया चाहता है मगर हरनंदन को सरला के साथ ब्याह करना मंजूर न था क्योंकि वह अपना दिल किसी और ही को दे चुका है जो एक गरीब की लड़की है और जिसके साथ शादी करना उसका बाप पसंद नहीं करता। इसीलिए उसने इस ढंग से सरला को बदनाम करके पीछा छुड़ाना चाहा है। इस संबंध में और भी बहुत-सी बातें हैं, जिन्हें मैं आपके सामने मुँह से नहीं निकाल सकता क्योंकि आप बड़े हैं और बातें छोटी हैं।”

लालसिंह: (ताज्जुब के साथ) क्या तुम ये सब बातें सच कह रहे हो?

पारसनाथ: मेरी बातों में रत्ती बराबर भी झूठ नहीं है। मैं छाती ठोक के दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि आप खर्च की पूरी -पूरी मदद देंगे तो मैं थोड़े ही दिनों में ये सब बातें सिद्ध करके दिखा दूँगा।

लालसिंह: इस बारे में क्या खर्च पड़ेगा?

पारसनाथ: दस हजार रुपए। अगर जीती-जागती सरला का भी पता लग गया और उसे मैं छुड़ाकर अपने घर ला सका तो पच्चीस हजार रुपए से कम खर्च नहीं पड़ेगा।

लालसिंह: (अपनी छाती पर हाथ रखके) मुझे मंजूर है।

पारसनाथ: तो मैं भी फिर अपनी जान हथेली पर रखकर उद्योग करने के लिए तैयार हूँ।

लालसिंह: अच्छा अब उन लोगों को बुला लेना चाहिए जो दूसरे कमरे में चले गए हैं।

पारसनाथ:  जो आज्ञा मगर ये बातें सिवाय मेरे और आपके किसी तीसरे को मालूम न हों।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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