ऐन आधी रात के वक्त कादिर मियाँ को मालूम हुआ कि खुदावन्द करीम ख्वाब में कह रहे हैं—अमाँ कादिर, तुम दुनिया के भोले-भाले बाशिन्दों को मेरा यह इलहाम सुना दो कि कल जुमेरात के दिन शाम की नमाज के बाद मैं आऊँगा, और उसी वक्त तमाम लोगों से मिल कर कयामत का दिन मुकर्रर करूँगा।” देखते-ही-देखते मालूम कि अल्लाह मियाँ की बड़ी लम्बी सफेद दाढ़ी ख्वाब को बटोर कर लो गई और मियाँ कादिर की आँख जो पट से खुली तो देखते क्या हैं कि असमान में एक बड़ा चमकदार तारा टूट रहा था। मियाँ कादिर ने चारपाई पर पड़े ही पड़े कलमा पढ़ा। पिछली शाम घर में दुपट्टा रंगने के लिये पीला रंग मँगाया गया था। ख्याल आते ही मियाँ कादिर ने झट से उठकर उसे खोला और अपना कुर्ता और लुंगी रंग डाला। बाकी रात खुदा की इबादत में बिताई और सबेरे तड़के ही मियाँ कादिर पीला कुर्ता […]
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संयोग की बात थी, मैं जिस दिन अपने वकील मित्र शिवराम के घर पहुँचा, उसी दिन मेरे मित्र के पुत्र की वर्षगाँठ धूमधाम से मनाई जा रही थी। भोज में निमंत्रित व्यक्तियों में वेंकटेश्वर राव को देखकर मेरी बाँछे खिल गईं। उसी समय देखता क्या हूँ, एकदम उछलकर वह मुझसे गले मिले। कुशल-प्रश्नों की बौछार कर दी। दूसरे दिन प्रातः मित्र का न्योता पाकर नाश्ता करने उसके घर पहुँचा। सर्वप्रथम विलायती व कीमती अलसेशियन सोनी ने हमारा स्वागत इस तरह किया, मानो वह यह जानती हो कि मैं उसके मालिक का अभिन्न मित्र हूँ। बाथरूम से सर पोंछते हुए वेंकटेश्वर राव सीधे बैठक में आ पहुँचा, पंखा लगाया। अखबार हाथ में थमाकर कपड़े पहनने के लिए शयनकक्ष में चला गया। बैठक इस तरह सजाई गई थी, मानो फिल्मी शूटिंग करने के लिए अभी-अभी तैयार किया गया सेट हो। मैं मन-ही-मन अपने मित्र […]
रस-बूँद अमीरी और गरीबी के भेद के कारण टूटते पारिवारिक संबंधों की कहानी है। अमीरी प्राय: मनुष्य को अमानवीय एवं स्वार्थी बना देती है। इस बात को लेखक ने रामचरन के प्रति उसके चाचा और भाई लल्ला के हृदयहीन और निष्ठुर व्यवहार के माध्यम से व्यक्त किया है। एक ओर लल्ला खेल में रामचरन के साथ धोखाधडी करता है तो दूसरी ओर लल्ला का पिता रामचरन की बालकोचित इच्छा के साथ क्रूर मजाक करते हुए उसका हाथ जला देता है। जो व्यक्ति रामचरन के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने में नहीं हिचका वही अपने बेटे लल्ला के तलवों पर मेहँदी लगा रही अपनी पत्नी से कहता है “सँभालकर लगाना कहीं उसकी नींद न टूट जाए।” पछाहीं गाँव था। आबादी काफी थी और शहर से सीधा संबंध था। मोटर, लारी, इक्का, ताँगा बीच से होकर गुजरते थे, पक्की सड़क लगी थी। सब चीजें मिलती थीं। आटा-दालें, मसाले, मेवे, कपड़े, बिसात वाले सभी […]
(1) बूढ़ा मनोहरसिंह विनीत भाव से बोला — “सरकार, अभी तो मेरे पास रुपए हैं नहीं, होते, तो दे देता। ऋण का पाप तो देने ही से कटेगा। फिर, आपके रुपए को कोई जोखिम नहीं। मेरा नीम का पेड़ गिरवी धरा हुआ है। वह पेड़ कुछ न होगा, तो पचीस-तीस रुपए का होगा। इतना पुराना पेड़ गाँव भर में दूसरा नहीं।” ठाकुर शिवपालसिंह बोले – “डेढ़ साल का ब्याज मिलाकर कुल पच्चीस रुपए होते हैं। यह रुपया अदा कर दो, नहीं तो हम तुम्हारा पेड़ कटवा लेंगे |” मनोहरसिंह कुछ घबराकर बोला – ‘अरे सरकार, ऐसा अंधेर न कीजिएगा, पेड़ न कटवाइएगा। रुपए मैं दे ही दूँगा, यदि न भी दे तो पेड़ आपका हो जाएगा। पर मेरे ऊपर इतनी दया कीजिएगा कि उसे कटवाइएगा नहीं।’ ‘हूँ’, ठाकुर शिवपालसिंह मुस्कराकर बोले – “मनोहर, तुम सठिया गए हो, तभी तो ऐसी ऊल-जलूल बातें करते हो। भला, जो पेड़ कटवाया न जाएगा […]
भले डांट घर में तू बीबी की खानाभले जैसे -तैसे गिरस्ती चलानाभले जा के जंगल में धूनी रमानामगर मेरे बेटे कचहरी न जानाकचहरी न जानाकचहरी न जाना कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं हैकहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं हैअहलमद से भी कोरी यारी नहीं हैतिवारी था पहले तिवारी नहीं है कचहरी की महिमा निराली है बेटेकचहरी वकीलों की थाली है बेटेपुलिस के लिए छोटी साली है बेटेयहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटेयही जिन्दगी उनको देती है बेटेखुले आम कातिल यहाँ घूमते हैंसिपाही दरोगा चरण चूमते हैं कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा हैभला आदमी किस तरह से फंसा हैयहाँ झूठ की ही कमाई है बेटेयहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे कचहरी का मारा कचहरी में भागेकचहरी में सोये कचहरी में जागेमर जी रहा है गवाही में ऐसेहै तांबे का हंडा सुराही में जैसे लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगेहथेली पे सरसों उगाते मिलेंगेकचहरी तो बेवा का तन […]
कभी अंबाला आना तो माल रोड आइयेगा । यहाँ खड़ा है एक बहुत पुराना, हवेलीनुमा, अभिशप्त सा मकान। राह पर जाते वक्त की झोली से जैसे गिरा हो और पड़ा रह गया हो सड़क किनारे। इस मकान में एक किराएदार होता था, जो यहाँ इस शान और ठसक से रहता था साहब कि क्या कोई मकान मालिक रहेगा। ये आदमी हिन्दी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक था । लेकिन समय के मसखरेपन की क्या कहिये ! पहले यह शख्स साहित्य के परिदृश्य से गायब हुआ और फिर एक मनहूस दिन सुबह जो टहलने निकला तो लौट कर नहीं आया।। कहाँ गये स्वदेश ? जमीन खा गयी या आसमान निगल गया । ऐसे कैसे कोई एक सुबह उठकर अपने आज की ओर पीठ कर एक अनिश्चित कल के कोहरे में गुम होने के लिये जा सकता है । क्या उसके घर गृहस्थी ने उसको आवाज न दी होगी […]
हिमालय पहाड़ पर अल्मोड़ा नाम की एक बस्ती है। उसमें एक बड़े मियाँ रहते थे। उनका नाम था अब्बू खाँ। उन्हें बकरियाँ पालने का बड़ा शौक था। बस एक दो बकरियाँ रखते, दिन भर उन्हें चराते फिरते और शाम को घर में लाकर बाँध देते। अब्बू गरीब थे और भाग्य भी उनका साथ नहीं देता था। उनकी बकरियाँ कभी-न-कभी रस्सी तुड़ाकर भाग जाती थीं। पहाड़ पर एक भेड़िया रहता था। वह उन्हें खा जाता था। मगर अजीब बात है कि न अब्बू खाँ का प्यार, न शाम के दाने का लालच और न भेड़िये का डर उन्हें भागने से रोकता। हो सकता है, ये पहाड़ी जानवर अपनी आजादी से इतना अधिक प्यार करते हों कि उसे किसी कीमत पर बेचने के लिए तैयार न हों। जब भी कोई बकरी भाग जाती, अब्बू खाँ बेचारे सिर पकड़कर बैठ जाते। हर बार यही सोचते कि अब से बकरी नहीं पालूँगा। मगर […]
बयान – 6 इश्क भी क्या बुरी बला है! हाय, इस दुष्ट ने जिसका पीछा किया उसे खराब करके छोड़ दिया और उसके लिए दुनिया भर के अच्छे पदार्थ बेकाम और बुरे बना दिये। छिटकी हुई चांदनी उसके बदन में चिनगारियां पैदा करती है, शाम की ठंडी हवा उसे लू-सी लगती है, खुशनुमा फूलों को देखने से उसके कलेजे में कांटे चुभते हैं, बाग की रविशों पर टहलने से पैरों में छाले पड़ते हैं, नरम बिछावन पर पड़े रहने से हड्डियां टूटती हैं, और वह करवटें बदलकर भी किसी तरह आराम नहीं ले सकता! खाना-पीना हराम हो जाता है, मिसरी की डली जहर मालूम होती है, गम खाते-खाते पेट भर जाता है, प्यास बुझाने के लिए आंसू की बूंदें बहुत हो जाती हैं, हजार दुख भोगने पर भी किसी की जुल्फ में उलझी हुई जान को निकल भागने का मौका हाथ नहीं लगता! दोस्तों की नसीहतें जिगर के टुकड़े-टुकड़े करती […]
‘एल्प्स’ के सामने कारीडोर में अंग्रेजी-अमरीकी पत्रिकाओं की दुकान है। सीढ़ियों के नीचे जो बित्ते-भर की जगह खाली रहती है, वहीं पर आमने-सामने दो बेंचें बिछी हैं। इन बेंचों पर सेकंड हैंड किताबें, पॉकेट-बुक, उपन्यास और क्रिसमस कार्ड पड़े हैं। दिसंबर… पुराने साल के चंद आखिरी दिन। नीला आकाश… कँपकँपाती, करारी हवा। कत्थई रंग का सूट पहने एक अधेड़ किंतु भारी डील-डौल के व्यक्ति आते हैं। दुकान के सामने खड़े होकर ऊबी निगाहों से इधर-उधर देखते हैं। उन्होंने पत्रिकाओं के ढेर के नीचे से एक जर्द, पुरानी-फटी मैगजीन उठाई है। मैगजीन के कवर पर लेटी एक अर्द्ध-नग्न गौर युवती का चित्र है। वह यह चित्र दुकान पर बैठे लड़के को दिखाते हैं और आँख मारकर हँसते हैं। लड़के को उस नंगी स्त्री में कोई दिलचस्पी नहीं है, किंतु गाहक गाहक है, और उसे खुश करने के लिए वह भी मुस्कराता है। कत्थई सूटवाले सज्जन मेरी ओर देखते हैं। सोचते हैं, […]
कोहरे की वजह से खिड़कियों के शीशे धुँधले पड़ गये थे। गाड़ी चालीस की रफ्तार से सुनसान अँधेरे को चीरती चली जा रही थी। खिड़की से सिर सटाकर भी बाहर कुछ दिखाई नहीं देता था। फिर भी मैं देखने की कोशिश कर रहा था। कभी किसी पेड़ की हल्की-गहरी रेखा ही गुज़रती नज़र आ जाती तो कुछ देख लेने का सन्तोष होता। मन को उलझाए रखने के लिए इतना ही काफ़ी था। आँखों में ज़रा नींद नहीं थी। गाड़ी को जाने कितनी देर बाद कहीं जाकर रुकना था। जब और कुछ दिखाई न देता, तो अपना प्रतिबिम्ब तो कम से कम देखा ही जा सकता था। अपने प्रतिबिम्ब के अलावा और भी कई प्रतिबिम्ब थे। ऊपर की बर्थ पर सोये व्यक्ति का प्रतिबिम्ब अजब बेबसी के साथ हिल रहा था। सामने की बर्थ पर बैठी स्त्री का प्रतिबिम्ब बहुत उदास था। उसकी भारी पलकें पल-भर के लिए ऊपर उठतीं, फिर […]
कैमरे का बटन दबाते हुए अनन्त ने अपनी साथिन से कहा, “खींचने में कोई दस मिनट लग जाएँगे-टाइम देना पड़ेगा।” और बटन दबाकर वह कैमरे से कुछ अलग हटकर पत्थर के छोटे-से बेंच पर अपनी साथिन के पास आ बैठा। वह सारा दिन दोनों ने इस प्रतीक्षा में काटा था कि कब शाम हो और कब वे चाँदनी में ताजमहल को देखें। दिन में उन्हें कोई काम नहीं था; लेकिन दिन में आकर वे पाँच-सात मिनट में ही एक बार ताज की परिक्रमा करके चले गये थे, यह निश्चय करके कि शाम को ही पूर्णप्राय चन्द्रमा की शुभ्र देन से अभिभूत-व्याकुल, वे उसे देखेंगे और उसी समय फ़ोटो भी लेंगे। अनन्त ने घड़ी देखी, और फिर धीरे-धीरे बोला, “देखो, ज्योति, आखिर वह क्षण भी आया कि हम ताज को देख सकें – तुम्हें याद है, तुम कहती थीं, कभी मैं तीर्थ करने निकलूँगी तो पहले यह तीर्थ करूँगी देखो…” ज्योति […]
यशपाल की दिव्या को ऐतिहासिक उपन्यास माना जाता है। दिव्या और दिव्या जैसे अन्य उपन्यासों को लेकर आलोचकों में काफी चर्चा इस बात की हुई है कि उपन्यास में इतिहास का अंश कितना होना चाहिए। वस्तुतः ‘ऐतिहासिक उपन्यास’ शब्द ही अपने आप में व्याघाती है। इतिहास हमेशा तथ्यों पर आधारित होता है। इतिहासकार को यद्यपि कल्पना की जरूरत होती है, तथापि इतिहास में कल्पना की मात्रा जितनी कम रहे, इतिहास की वस्तुनिष्ठता उतनी अधिक होती है। दूसरी ओर हालांकि उपन्यास का उदय ही यथार्थवाद के दबावों में हुआ है, वह मूलतः एक साहित्यिक रचना है और साहित्यिक रचना में कल्पना का समावेश स्वाभाविक है। उपन्यासकार उपन्यास लिखता है, इतिहास नहीं। उसका मूल उद्देश्य ऐतिहासिक परम्परा में जीवन सत्य को पकड़ना होता है न कि तथ्यों एवं घटनाओं की इतिहास से संगति बिठाना। इसलिए ऐतिहासिक उपन्यास का विश्लेषण करते हुए जो तथ्यों और घटनाओं पर रखने की बजाय विशिष्ट ऐतिहासिक परिवेश […]
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मलिक मुहम्मद जायसी को सूफी कवि मानते हुए उन्हें सूफी प्रेमाश्रयी काव्य धारा के अन्तर्गत रखा है। आचार्य शुक्ल के अनुसार जायसी महदियां सूफी सम्प्रदाय में दीक्षित भी थे। यद्यपि शुक्ल जी से पूर्व ग्रियर्सन जायसी को मुस्लिम सन्त बता चुके थे, तथापि शुक्ल जी के बाद लगभग सभी आलोचकों ने जायसी को सूफीवाद के चश्मे से देखना शुरू किया और जायसी सूफी सन्त तथा पद्मावत सूफी काव्य के रूप में रूढ़ होकर रह गये। इसका परिणाम यह हुआ कि जायसी की कवि प्रतिभा और उनकी मौलिकता इस सूफीवाद के नीचे दबकर रह गयी। आलोचकों ने अपना सम्पूर्ण ध्यान पद्मावत के मार्मिक स्थलों की खोज करने के बजाय उसमें सूफी तत्व खोजने पर लगा दिया। इससे न सिर्फ पद्मावत, बल्कि हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई। प्रेम की पीड़ा की मार्मिक गाथा महज एक सूफी काव्य बन कर रह गयी। जायसी को सूफी या पद्मावत […]
आचार्य शुक्ल ने शृंगार को रसराज कहा है। कारण यह है कि शृंगार रस के सहारे मनुष्य के सभी भावों को व्यंजित किया जा सकता है। यद्यपि सूरदास के यहाँ शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का चित्रण मिलता है, तथापि सूरदास का मन ज्यादातर वियोग वर्णन में ही रमा है। सूरदास का भ्रमरगीत गोपियों के विरह की मार्मिक व्यंजना का काव्य है। आचार्य शुक्ल के अनुसार ‘वियोग की जितनी दशायें हो सकती हैं, जितने ढंगों से उन दशाओं का साहित्य में वर्णन हुआ है और सामान्यतः हो सकता है, वे सब सूरदास के यहाँ मौजूद हैं। सूरदास का कवि हृदय मन के भीतरी तहों तक जाकर वियोग की गहराई नापकर आता है।’ भ्रमरगीत में घटनाओं की विविधता नहीं है। कथा बस इतनी सी है कि कृष्ण के विरह में आकुल गोपियों और राधा को उद्धव निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश देने आते हैं और गोपियाँ भ्रमर के […]
हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘कबीर ने ऐसी बहुत सी बातें कहीं है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है, इसलिए उन्हें समाज सुधारक समझना उचित है। वस्तुतः उनकी व्यक्तिगत साधना की परिधि इतनी व्यापक थी कि वह अनजाने ही समाज की समस्त विकृतियों को झकझोरती हुई ब्रह्म में लीन हो गयी।’ द्विवेदी जी के उपरोक्त कथन पर विचार करें तो स्पष्ट है कि वे उनके समाज सुधार का कारण उनकी भक्ति को मानते हैं। कबीर भक्त हैं, समाज सुधारक हैं या कवि हैं- यह सवाल अक्सर ही विद्वानों और आलोचकों में चर्चा और विवाद का विषय बनता रहा है। आचार्य द्विवेदी कबीर की कविता को उनकी भक्ति का उपोत्पाद (बाई-प्रोडक्ट) मानते हैं, जबकि कई आधुनिक विचारक कबीर को मूलतः कवि मानने पर जोर देते हैं। वस्तुतः यह विवाद कबीर के व्यक्तित्व को खण्डित करके देखने का परिणाम है। कवि कबीर, भक्त कबीर या समाज सुधारक कबीर में कोई आत्यन्तिक […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…