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ऐन आधी रात के वक्त कादिर मियाँ को मालूम हुआ कि खुदावन्द करीम ख्वाब में कह रहे हैं—अमाँ कादिर, तुम दुनिया के भोले-भाले बाशिन्दों को मेरा यह इलहाम सुना दो कि कल जुमेरात के दिन शाम की नमाज के बाद मैं आऊँगा, और उसी वक्त तमाम लोगों से मिल कर कयामत का दिन मुकर्रर करूँगा।” देखते-ही-देखते मालूम कि अल्लाह मियाँ की बड़ी लम्बी सफेद दाढ़ी ख्वाब को बटोर कर लो गई और मियाँ कादिर की आँख जो पट से खुली तो देखते क्या हैं कि असमान में एक बड़ा चमकदार तारा टूट रहा था। मियाँ कादिर ने चारपाई पर पड़े ही पड़े कलमा पढ़ा।

पिछली शाम घर में दुपट्टा रंगने  के लिये पीला रंग मँगाया गया था।  ख्याल आते ही मियाँ कादिर ने झट से उठकर उसे खोला और अपना कुर्ता और लुंगी रंग डाला।  बाकी रात खुदा की इबादत में बिताई और सबेरे तड़के ही मियाँ कादिर पीला कुर्ता और लुंगी पहन कर घर से निकल पड़े।

पाटे नाले के मोड़ पर मियाँ हादी एक हाथ सें चिलम लिए बड़बड़ाते हुए आते दिखाई पड़े। वह नानबाई को बात-बात में कमीना साला कहते हुए चले आ रहे थे।  वजह सिर्फ इतनी ही थी कि मियाँ नानबाई की दुकान पर जब आप तशरीफ ले गये तो उस वक्त, वह भट्ठी में दियासलाई दिखा रहा था। उन्होंने चिलम बढ़ाकर आग माँगी।  उसने उनकी ‘लिक्विडेशन’ में आई हुई आँख की शान में चन्द चुने हुये अलफ़ाज़ कह दिये। इस वक्त जो मियाँ नानबाई के प्रति अपने प्रेम की उमड़ती हुई दरिया में नालायक, कमीना, उल्लू का पट्ठा इत्यादि नामों के बड़े-बड़े जहाज तैरा रहे थे, यह सब मियाँ नानबाई की ही बातों के तुफैल से था।  मगर जो सामने से मियाँ कादिर को इस भेस में आते हुए देखा तो बस एक दम बुत बने खड़े रह गए।

अमाँ कादिर? अमाँ हैं ! अमाँ किधर चले? हादी मियाँ कादिर को सिर से पैर तक तीन बार देख गए।

”लाहौलबिलाकूवत!” मियाँ कादिर ने निहायत नफरत के साथ जमीन पर थूक कर कहा— “अबे तुझे इसी वक्त, टोकना था कमबख्त?”

“वल्लाह ये मजा देखिये।  अमाँ तुम तो बिना बात के बिगड़ जाते हो।  भाई, बात क्या है! अमाँ इस नाराजी .. .।”

कहाँ तो मियाँ कादिर अल्लाह मियाँ का फरमान सुनाने जा रहे थे, और कहाँ कमबख्त काना मिल गया और वह भी अलस्सुबह, घर से निकलते ही। झुँझलाकर कहा-“ले बस, अब रास्ता छोड़, मनहूस कहीं का।  सूबू ही सुबू टोक दिया लेके।”

बस अब हद हो चुकी थी। मियाँ हादी की शान में ऐसे-ऐसे बेहूदा अलफ़ाज़ कह दिए जाएँ और मियाँ हादी जहर के कड़ुवे घूँट की तरह उसे चुपचाप पी जाएँ, यह नामुमकिन सी बात है। मगर उस वक्त, अगर यह नामुमकिन भी मियाँ कादिर के फ्रकीराना भेष को देखकर ‘मुमकिन’ हो गया तो कोई ताज्जुब की बात न थी। आप बराबर यह जानने के लिये इसरार  करते ही रहे कि आखिर हजरत घरबार छोड़कर इस तरह जा कहाँ रहे हैं।

इधर मियाँ कादिर का यह हाल था कि वह उन्हें एक चाँटा रसीद करने जा ही रहे थे कि भाई बकरीदी आते हुए दिखाई पड़े। उन्होंने मियाँ कादिर को जो इस भेस में देखा, तो बस देखते ही रह गए, और इसके बाद मियाँ हादी को इस तरह रास्ता रोककर खड़े देखा तो मामला कुछ-कुछ समझ में आया। चट से कह उठे—“अमाँ होगा भी। अब ये तो हुआ ही करता है। भाई, जिस घर में दो बर्तन होते हैं, बजते ही हैं। मगर इसमें इतना नाराज होने की क्या बात है? अमाँ, ये तो घर-घर में लगा ही रहता है। खैर, होगा भी। चलो हम चल के समझाये देते हैं। आइन्दा भौजी तुम्हें इस तरह … ..”

बकरीदी मियाँ कादिर को घर की तरफ ढकेलने लगे। मियाँ कादिर को और भी ताव अ गया। बोले—“कह दिया कि रास्ता छोड़ दो। मगर तुम लोग मानते ही नहीं। खामख्वाह की ताव दिलाये चले जा रहे हो। फिजूल की बकवास लगा रक्खी है। यहाँ हमें पार-वाले साईं जी के तकिए तक जाना है।”

“न भाईजान!  अमे हटाओ इस झगड़े को। घर-घर में यही होता है। अब कल ही था, मुझसे और तुम्हारी भौजी … …”

“देखा! फिर वही! अमाँ वह बात नहीं,  हजार बार कह दिया, लाख बार समझा दिया कि अल्लाह-ताला ……”

बुद्धन, अच्छन, जुम्मन–इतनी देर में सभी जमा हो गए। अब भाई बकरीदी समझा रहे थे—“अमाँ, तो अल्लाह की इबादत करने से तुम्हें कौन रोकता हैं, भाईजान? घर पर बैठकर क्या ये सब नहीं कर सकते! अब आप ही इन्हें समझाइए, मियाँ अच्छन साहब। देखिए भला, कोई बात भी हो तो। घर में कोई बात हो गई होगी..”

“देखिए-देखिए,  जरा संभल कर जुबान से बात निकालिएगा, मियाँ बकरीदी। कह दिया कि कुछ भी…!”

“तो आखिर बात क्या है? अब ये जो तुम घर-बार छोड़कर फकीरी ले रहे हो,  इसका कोई सबब भी होना चाहिये, भाई मेरे….” मियाँ अच्छन साहब ने कादिर की पीठ पर बड़ी गर्म-जोशी के साथ हाथ फेरते हुए कहा।

मियाँ कादिर सचमुच निहायत परीशान हो चुके थे। अच्छन साहब से बड़ी नम्रता के साथ कहा–”वही तो मैं भी अरज करने जा रहा हूँ,  बड़े मियाँ। मैंने कहा कि..”

मियाँ कादिर की बात शुरू भी न होने पाई थी कि मियाँ बुद्धन बोल उठे- “अब तुम बताओगे क्या? वह तो सुनी-सुनाई बात है। आखिर इतने आदमी खड़े हैं, कसम खा के भला कोई यह तो कह दे कि हमारे घर में कोई आज तक कभी भी लड़ाई हुई। अरे भाई, यह तो हुआ ही करता है, आप समझिए कि …”

आँखों में आँसू छलछला आए। मारे ताव के चेहरा सुर्ख हो गया। एक बार पूरे जोश के साथ अपने को छुड़ाकर मियाँ कादिर ने बुद्धन की ओर बढ़ते हुए कहा–”अपनी औकात समझ के मुँह से बात निकालना चाहिये, समझे बुद्धन, मारे जूतों के खोपड़ी गंजी कर दी होगी। बेईमान कहीं का, बड़ा सुकरात की दुम बना है। चला वहाँ से बतानेवाला।”

मियाँ बुद्धन को ताव आ गया। मारे तेहे के आगे बढ़कर बोले—”ऐसी मुरव्वत की ऐसी-तैसी। अमाँ तुम्हीं देख लो भाई बकरीदी, एक तो मैं समझा रहा हूँ और यह है कि. …..। इस हेकड़ी में न रहिएगा मियाँ, समझे! वाह अच्छा-खासा स्वाँग बना रखा है। जरी सा घर में झगड़ा क्या हो गया कि चले साहब फकीराना भेस घर तमाशा दिखाने! अमाँ ऐसी-ऐसी लन्तरानियां …”

ताव में आकर मियाँ कादिर ने लपककर बुद्धन की गर्दन में हाथ डाल और खोपड़ी पर एक कड़ाकेदार चपत मार उसे ढकेलते हुए कहा—“बड़ा आया है, वहाँ से जज साहब का बच्चा बनकर, मियाँ-बीवी का फैसला चुकाने। कह दिया फजूल की बातें मत करो। मगर नहीं, ख्वामखाह अपनी हेकड़ी दिखाते जाएँगे। बेईमान कहीं का।”

जब तक लोग आगे बढ़कर इन दोनों का बीच-बचाव करें, तब तक मियाँ बुद्धन के दो तीन हाथ करारे-करारे पड़ ही गए। वल्लाह, उस वक्त मियाँ बुद्धन का वह जोश वह वलबले और वह तेहेबाजी देखते ही बनती थी। जी में तो बहुत आया कि लपककर मियाँ कादिर से बदला लें, कई बार गालियाँ देते हुए तेज़ी में आ लाल-पीली आँखों के साथ आगे बढ़े भी, मगर मियाँ कादिर के कैंड़े को देखकर ज़रा सहम जाते थे, दूसरे बीच-बचाव करने वाले भी बहुत से थे। अब लोगों में चेमें-गोइयाँ यह होने लगीं कि इस वक्त कादिर मियाँ जोश में हैं, अगर फकीर होकर चल दिए, तो चार बाहर वाले आकर यही थूकेंगे कि मुहल्लेवालों ने रोका तक नहीं।

भाई बकरीदी ने मियाँ साहब से कहा– “देखिए बड़े मियाँ, बड़ा गजब हो जाएगा जो कादिर चल दिया। कसम खुदा की, वल्लाह मैं सच कहता हूँ बड़े मियाँ, कि पूरे मुहल्ले भर के मुँह पर अपने हिसाब जैसे कालिख पुत जाएगी और भाई, सच तो यह है कि आज इसके ऊपर, तो कल खुदा न करे, हमारे ही ऊपर बीते। और यह तो सब के घर में लगा ही रहता है। मर्द आदमी किसी बात पर ताव आ गया, घर छोड़कर चले जा रहे हैं, साहब।”

बहरहाल बड़े मियाँ, जुम्मन और बकरीदी ने मिल कर यह तय किया कि कादिर को, चाहे कुछ भी हो, घर लौटाकर ले जाया जाएगा। बस फिर क्या था, एक हाथ जुम्मन ने पकड़ा, एक हाथ बकरीदी ने, कोई पीछे से घेर रहा है, कोई बगल से रोक-थाम कर रहा है,  और कादिर मियाँ हैं कि तमाम उछल-कूद मचा रहे हैं। इस ले-दे के बीच में इनकी सुनता ही कौन है। किसी तरह उन्हें लोग घर की तरफ्र ले ही चले।

इधर यह हाल कि पास-पड़ोस की तो क्या कहिए, आस-पास के तीन चार मुहल्लों तक की औरतें मियाँ कादिर के घर पर जमा हो गई थीं।

सबसे पहले फातिमा को ही इस बात की खबर मिली थी,  जब कि मियाँ कादिर हादी से उलझ रहे थे। बीबी फातिमा ने झप से अपना दुपट्टा सँभालते हुए ऊपर छत से अपनी पड़ोसिन खैरातिन को पुकार कर कहा-“ऐ बहन, तुम्हें एक बात बतावें।”

खैरातिन ने रकाबी धोते हुए तुनककर जवाब दिया—“ऐ चल हटो, तुम्हें न तो कुछ काम न धन्धा। बस ले के सुबू-सुबू बातें बनाने बैठ गई। ऐसा भी क्या मुआ निठल्लापन!”

“ऐ नौज़ बीबी, तुम तो हवा से लड़ती हो। मुझे क्या गरज पड़ी थी, जो तुम्हें कोई बात सुनाने आती। वाह रे दिमाग! जमीन पर पैर ही नहीं पड़ते बीबी के। मर्दुआ जरी लाटसाहब की अर्दली में क्या हो गया कि अपने को लाटसाहब की बच्ची समझने लगी।”

“देख खबरदार, जो अब की मरद-पीर तक पहुँची तो तेरा मुँह ही झुलस दूंगी, हाँ ! चुड़ैल की नानी कहीं की!”

वाकया है कि अगर अख्तरी उस वक्त वहाँ न पहुँच जाती तो मुहल्ले में एक अच्छा खासा हंगामा मच जाता। एक तरफ तो लोग मियां कादिर को मनाने जाते और दूसरी तरफ औरतें आपस में तू-तू मैं-मैं कर आसमान को सर पर उठा लेतीं। मगर खैर—मौके पर अख्तरी के पहुँच जाने की वजह से तमाशे की सूरत कुछ और हो गई। किस्सा यूं हुआ कि अख्तरी जब खैरातिन के यहाँ आग लेने आई तो उसने हाँफते हुए, मियाँ कादिर के फकीर हो जाने का हाल बतलाया। खैरातिन फातिमा से लड़ना बन्द कर, एकाएक, अख्तरी से मियाँ कादिर की बाबत बातें करने लगीं।

बीबी फातिमा ने झमककर कहा- “ऐ बहन, वही तो मैं भी इन्हें सुनाने आई थी। लेकिन यह है कि सुबू-सुबू कोसा-काटी करने लगीं। ऐ हाँ, जरी इनके मिजाज तो देखो। ओफ्फोह, हवा से लड़ाई लड़ती हैं ये तो।”

खैरातिन ने झपाके के साथ दुपट्टा सिर से उतारते हुए, जोश में आ, फातिमा की तरफ्र हाथ बढ़ा-बढ़ा कर कहना शुरू किया—“ऐ तुम हो बड़ी नन्ही वाली।  जरी ईमान से बताओ तो कि मैं किस दिन किसके साथ लड़ी? मैं तुम्हें बताए देती हूँ, बहन, किसी पर झूठी तोहमत लगाना अच्छा नहीं होता।”

अख्तरी ने बात बदलते हुए कहा—“ये क्या तुम लोग सुबू-सुबू कसीदा काढ़ने बैठ गई? फातिमा बहन, अब तुम कोई नन्ही सी नहीं रहीं जो ये सब अच्छा लगे। इस बुढ़ापे में तो जरा अपनी लल्लो को काबू में रक्खो।”

बीबी फातिमा रो-रोकर कुछ कहने ही जा रही थीं कि बाहर के हंगामे ने तीनों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। मियाँ कादिर उस वक्त मियाँ बुद्धन को सबक दे रहे थे। किस्सा-कोत: यह है इसी तरह धीरे-धीरे चन्द ही मिनट में मुहल्ले की तमाम औरतें इकट्ठा होकर मियाँ कादिर के मकान पर मिसकौट करने पहुँच गयी थीं। कादिर की बीबी उस वक्त इत्मीनान से चारपाई पर बैठी हुई जमुहाइयाँ और अँगड़ाइयाँ ले रही थीं। एकदम से जो मुहल्ले की तमाम औरतों ने मिलकर धावा बोला तो ये घबरा उठी। उधर औरतों ने जो देखा कि बीबी न रोती हैं, न बेहोश हुई और मजे से चारपाई पर पड़ी हुई अँगड़ाइयाँ ले रही हैं, तो आपस में फस-फस करने लगीं।

एक ने कहा—“ऐ बहन, देखा? जो ये ऐसी न होती तो मर्दुआ घर-बार छोड़ कर क्यों जाता?”

दूसरी ने मुँह बिचकाकर उत्तर दिया–“उँह, ऐसी मुई औरत भी किस काम की, जो अपने मरद को यों तकलीफ दे। मुँह नोच ले ऐसी मुई का तो।”

बड़ी खुरशीद ने आगे बढ़कर काँपती हुई आवाज के साथ कादिर की बीबी से कहा- “ऐ बेटा, तुम्हें अपनी जबान जरी काबू में रखनी चाहिये। ऐसी भी क्या मुई लल्लो कि जो जी में आया निकाल दिया। और हम तो कहते हैं कि भाई, बड़ा गमखोर है हमारा कादिर। जो और कोई होता तो जुबान खींच कर रख लेता। ऐ, अब तुम भी बच्ची नहीं हो, अल्ला के फजल से बाल बच्चेवाली हो, समझदार हो, और कादिर हमारा कोई निठल्ला नहीं है। तुमको ……”

खुरशीद की बात काट, नाक पर उँगली रखते हुए शाहजादी बोल उठी—“ऐ नौज बीबी, वो निठल्ला क्यों? सैकड़ों लाखों से अच्छा कमाता है। और यह भी नहीं कि उसे कोई बुरी लत ही हो। मैं तुझसे सच कहती हूँ बहन, ऐसा समझदार लड़का हमारे मुहल्ले भर में क्या, शहर भर में कोई नहीं।”

फातिमा ने आगे बढ़कर हाथ नचाते हुए कहा–“ऐ है, कोई लाख समझदार क्यों न हो, मगर यह रोज-रोज  की किच-किच हाय-हाय कोई कब तक सहे? मरद आदमी, ताव में आकर फकीरी ले ली।”

मियाँ कादिर की बीवी इन तमाम बातों को सुनकर एकदम हक्का-बक्का सी हो गईं। उसे खाक भी समझ में न आया कि माजरा क्या है। वह बेचारी खड़ी-खड़ी इन औरतों के मुँह की तरफ देख रही थी, और वे थीं कि सवाल पर सवाल कर इसके छक्के छुड़ा रही थीं। इस लानत-मलामत से घबरा कर आखिरकार कादिर की बीबी सर पर हाथ रख रोने को बैठ गईं।

फातिमा ने आगे बढ़कर हाथ हिलाते हुए कहा—‘और जो पहले ही से इतनी समझ आ जाती तो काहे को ये सब भुगतना पड़ता? मगर नहीं, उस वक्त तो जोम सवार था। उँह, आग लग जाए मुए ऐसे जोम में। ऐसा भी क्या मुआ झगड़ा, जो आदमी को फकीर बना के ही छोड़ा।’

मियाँ कादिर की बीवी यह सब सुनते-सुनते तंग आ चुकी थी। रोकर बोली—“ऐ बहन, जरा मेरी भी तो सुन लो। मैं कहती हूँ, मैं अपने इतने बड़े लड़के की कसम खाती हूँ. … ..”

खुरशीद ने आगे बढ़कर काँपती हुई पर तेज आवाज में कहा—“ऐ हं, जरी देखो तो, मालिक को उधर साईं  बना के भेजा, अब लड़के को खाये जाती है। वाह री औरत! इतनी उमिर तो मेरी भी होने को आई, कोई सत्तर और छै बरस तो मुझे भी जमाना देखते हो गए,  मगर वाह, तुझे क्या कहूँ? अहा-हा बलिहारी हे तेरी!”

फातिमा ने शाहजादी को टहोका मारते हुए कहा—“ऐ बहन, तुम मेरी क्या उमर समझती हो? कोई साठ और पाँच बरस की उमर होगी मेरी भी। मगर नहीं,  ऐसी मुई बदजात औरत मैंने भी अपनी उमर भर में नहीं देखी। हम तो कहेंगे कि भाई,  हमें कोई सूली पर चढ़ाए,  मगर अपने लड़के—अपने कलेजे के टुकड़े—की कसम भई हमसे तो कभी भी न खाई जाए।”

शाहजादी भी कुछ कहने ही वाली थी कि कादिर की बीबी एकाएक तड़पकर बोल उठी—“ऐ तुम लोग अपनी ही कहे जाओगी कि किसी की सुनोगी भी? मैं कहती हूँ कि चाहे मुझसे कसम ले लो, जो मैंने किसी से कुछ भी कहा हो और जो मुझे कुछ भी मालूम हो तो मेरे तन-मन में कीड़े पड़ें।”

अख्तरी ने बड़े लहजे के साथ कहा- “ओहरी मेरी बन्नो, ऐसी बड़ी भोली तो हो ही।”

और भी अभी न जाने क्या-क्या कहती, मगर उस वक्त तक लोग मियाँ कादिर को पकड़े हुए घर ले आए। शाहजादी ने जीभ को दाँतों के नीचे दबाते हुए दयनीय मुद्रा बनाकर कहा—“ऐ है, जरी हमारे कादिर की तरफ देखो तो।  बिचारे का मुँह कैसा उतर गया।”

खुरशीद बोली- “ऐ मैं कुरबान जाऊँ। इस मरी-पीटी चुड़ैल ने अल्लाह जाने कैसा-क्या कर दिया कि बेचारा एक रात में ही आधा रह गया।”

बहरहाल, यही हंगामा मचता रहा। इत्तफाक से मियाँ शुबराती को एक काम से चौक की तरफ जाते वक्त अकबरी दरवाजे के पास पीरू पहलवान दिखाई पड़े। शुबराती ने लपककर पहलवान के कन्धे पर हाथ रक्खा और बोले- “ये लीजिए, तुम तो यहाँ मजा कर रहे हो, और वहाँ तुम्हारे दोस्त कादिर पर कैसी बीत रही है कि बस अल्लाह ही जानता है।”

पहलवान ने घबराकर पूछा—“क्यों-क्यों, खैरियत तो है न?”

“सब खैरियत ही है। बह बेचारा तो घरबार छोड़ फकीरी ले के चला जा रहा है, और आप खैरियत की दुम पकड़कर चले हैं।”

“अमाँ, हैं? अमाँ तुम ये क्या कह रहे हो, शुबराती मियाँ! आखिर यह बात क्या हुई?”

मियाँ शुबराती ने एक बार चारों तरफ सतर्कता के साथ देखा और फिर पीरू के नजदीक आते हुए बोले-“क्या हुआ क्या, अमाँ भाई, सच-झूठ की तो अल्लाह ही जाने,  मगर हमने सुना है कि उसकी जोरू के साथ लद्दन की निगाहें कुछ खराब-सी थीं। कादिर ने ये सब देख लिया, बस इसी से उसने फकीरी ले ली। और इतना तो भई, हम भी कहेंगे पहलवान, कि हजारों बार खुद हम ने अपनी आँखों से देखा कि कादिर की बीबी और लद्दन हँस-हँस के बातें कर रहे हैं। मगर हम को क्या,  हमने सोचा कि किसी के मामले मैं हम टाँग क्यों अड़ावे? अरे हाँ भई, जो जैसा करेगा वैसा ही पावेगा।”

पहलवान ने पूरी बात भी न सुनी, और लपककर कादिर के घर की तरफ चले। जाकर देखा तो चारों तरफ बड़ी भीड़ जमा है,  और चबूतरे पर पीला कुर्ता और पीली लुंगी पहने मियाँ कादिर घुटनों में मुँह छिपाये बैठे हैं। घर के अन्दर अलग हंगामा मचा हुआ है। भीड़ चीरते-चीरते पहलवान कादिर के पास तक आए और उसकी पीठ पर हाथ फेरकर बोले—“अमाँ कादिर!”

कादिर मियां उछल पड़े, और पहलवान को गले से लगाते हुए रोकर बोले—“सबेरे से हमें सब ने तंग कर रक्खा है। इनके हाथों से हमें नजात दिलाओ, भाईजान।”

पीरू पहलवान ने कादिर को सीने से लगाकर भर्राये हुए गले के साथ पूछा- “आखिर तुम्हें ये फकीरी लेने की क्या सूझी थी?”

कादिर ने रोकर कहा- “अमाँ वही तो बताते हैं। भाईजान, बात यों हुई……”  बीच में ही टोककर मियाँ बकरीदी ने आगे बढ़ते हुए कहा– “ये क्या बतावेंगे ! मैं तुम्हें सब बताये देता हूँ।”

कादिर मियाँ चीखते हुए बोल उठे– ”बस सबेरे से इसी तरह नाकों चना चबवा रहे हैं। पूरी बात सुनते नहीं और बीच में टाँग अड़ा देते हैं।”

पहलवान ने तेवर बदलते हुए कड़ककर कहा—“अब की जो बोला उसकी जबान पकड़कर खींच लूंगा। हमें कोई कादिर न समझ ले कि रो देंगे; मारे चाँटों के मुँह रायता कर दिया जायगा। हां जी कादिर, तुम कहो।”

कादिर ने अपने आँसू पोंछकर सुबकते हुए कहना शुरू किया—“अमाँ कल रात को हमने एक ख्वाब देखा कि जैसे बड़ा चाँदना-सा फैल गया है और सामने खुदावन्द करीम खड़े हुए हमसे कह रहे हैं कि तुम लोगों को यह बतलाओ कि हम कल दुनिया के हाल-चाल देखने आवेंगे और सब का फ़ैसला करेंगे। सो भाई, वही सब कहने मैं आज सूबू पारवाले साहजी के तकिये पर जा रहा था कि इन लोगों ने मुझे रोक लिया था। सूबू पाँच बजे से, अब ये बारह-एक बजे का टेम हो गया, और अब तक इसी तरह रोक रक्खा है।  अब शाम की नमाज के बाद अल्लाह-ताला तशरीफ लावेंगे और यहाँ ये हाल है कि दुनिया भर में किसी को खबर ही नहीं। मगर हम क्या करें! वह रहीमाने रहीम सब के दिल का हाल जानता है। अगर इन लोगों ने रोक न रक्खा होता, तो क्या मैं अब तक ये खबर न सुना देता?”

यह हाल अब जो कोई सुनता है, उसी के छक्के-बक्के छूट रहे हैं। आनन-फानन यह खबर पाटेनाले के कोने-कोने में पहुँच गई। सब लोग मियाँ कादिर की जियारत के लिये आने लगे।

खुदा की मरज़ी, एक घंटे के बाद एकाएक आसमान पर बादल घिर आए, बिजली चमकने लगी, घनघोर काली घटाओं से मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।  तब तक मियाँ कादिर के इस इलहाम की चर्चा तू-मैं की जबान पर होती-होती सारे शहर में फैल गई थी। और उस वक्त भाई बकरीदी के बतला देने की वजह से पूरा-का-पूरा पाटानाला कमबख्त हादी-काने को कोसता हुआ, तस्बीह के दानों को दनादन फेरता, हाथ और आँखें आसमान की उठाकर रोते हुए कलमा पढ़ रहा था।

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अमृत लाल नागर

अमृत लाल नागर

जन्म: 17 अगस्त, 1916, मृत्यु: 23 फरवरी, 1990 उपन्यास : महाकाल (1970 से ‘भूख’ शीर्षक प्रकाशित), बूँद और समुद्र, शतरंज के मोहरे, सुहाग के नुपूर, अमृत और विष, सात घूँघट वाला मुखड़ा, एकदा नैमिषारण्ये, मानस का हंस, नाच्यौ बहुत गोपाल, खंजन नयन, बिखरे तिनके, अग्निगर्भा, करवट, पीढ़ियाँ कहानियाँ: वाटिका, अवशेष, तुलाराम शास्त्री, आदमी, नही! नही!, पाँचवा दस्ता, एक दिल हजार दास्ताँ, एटम बम, पीपल की परी, कालदंड की चोरी, भारत पुत्र नौरंगीलाल, सिकंदर हार गया, एक दिल हजार अफसाने ( लगभग सभी कहानियों का संकलन)।
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