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(1)

बूढ़ा मनोहरसिंह विनीत भाव से बोला — “सरकार, अभी तो मेरे पास रुपए हैं नहीं, होते, तो दे देता। ऋण का पाप तो देने ही से कटेगा। फिर, आपके रुपए को कोई जोखिम नहीं। मेरा नीम का पेड़ गिरवी धरा हुआ है। वह पेड़ कुछ न होगा, तो पचीस-तीस रुपए का होगा। इतना पुराना पेड़ गाँव भर में दूसरा नहीं।”

ठाकुर शिवपालसिंह बोले – “डेढ़ साल का ब्याज मिलाकर कुल पच्चीस रुपए होते हैं। यह रुपया अदा कर दो, नहीं तो हम तुम्हारा पेड़ कटवा लेंगे |”

मनोहरसिंह कुछ घबराकर बोला – ‘अरे सरकार, ऐसा अंधेर न कीजिएगा, पेड़ न कटवाइएगा। रुपए मैं दे ही दूँगा, यदि न भी दे तो पेड़ आपका हो जाएगा। पर मेरे ऊपर इतनी दया कीजिएगा कि उसे कटवाइएगा नहीं।’ ‘हूँ’, ठाकुर शिवपालसिंह मुस्कराकर बोले – “मनोहर, तुम सठिया गए हो, तभी तो ऐसी ऊल-जलूल बातें करते हो। भला, जो पेड़ कटवाया न जाएगा तो हमारे रुपए कैसे निकलेंगे?”

मनोहरसिंह बोला – “अन्नदाता, आपके रुपए तो जहाँ तक होगा मैं दे ही दूँगा।”

ठाकुर – “अच्छा, अब ठीक-ठीक बताओ कि रुपए कब तक दे दोगे।”

मनोहरसिंह कुछ देर सोचकर बोला –एक सप्ताह में दे दूँगा|

ठाकुर – “अच्छा, स्वीकार है। एक सप्ताह में अवश्य दे देना, नहीं तो पेड़ हमारा हो जाएगा। हमारी जो इच्छा होगी, वह करेंगे। चाहे कटवाएँगे, चाहे रखेंगे। “

मनोहर — “और चाहे जो कीजिएगा, उसे कटवाइएगा नहीं, इतनी आपसे प्रार्थना है।”

ठाकुर – खैर, हमारा जो जी चाहेगा करेंगे, तुम्हें फिर कुछ कहने का अधिकार नहीं रहेगा।”

(2)

मनोहर सिंह की आयु 55 वर्ष के लगभग है। अपनी जवानी उसने फौज में व्यतीत की थी। इस समय वह संसार में अकेला है। उसके परिवार में कोई नहीं। गाँव में दो-एक दूर-दूर के रिश्तेदार रहते हैं, उन्हीं के यहाँ अपना भोजन बनवा लेता है। न कहीं आता है, न कहीं जाता है। दिन-रात अपने टूटे-फूटे मकान में पड़ा ईश्वर भजन किया करता है।

एक वर्ष पूर्व उसे कुछ खेती कराने की सनक सवार हुई थी। उसने ठाकुर शिवपालसिंह की कुछ भूमि लगान पर लेकर खेती कराई भी थी। पर उसके दुर्भाग्य से उस साल अनावृष्टि के कारण कुछ पैदावार न हुई। ठाकुर शिवपालसिंह का लगान न पहुँचा। मनोहरसिंह को जो कुछ पेंशन मिलती थी, वह उसके भोजन, वस्त्र भर ही को होती थी। अंत में जब ठाकुर साहब को लगान न मिला, तो उन्होंने उसका एक नीम का वृक्ष, जो उसकी झोंपडी के द्वार पर लगा था, गिरवी रख लिया। यह नीम का वृक्ष बहुत पुराना और उसके पिता के हाथ का लगाया हुआ था।

मनोहरसिंह को एक सप्ताह का अवकाश दिया गया। उसने बहुत कुछ की, दो-चार आदमियों से कर्ज माँगा, पर किसी ने उसे रुपए न दिए। लोगों ने सोचा, वृद्ध आदमी है। न जाने कब ढुलक जाए, ऐसी दशा में रुपया किससे वसूल होगा? मनोहर चारों ओर से हताश होकर बैठ गया और धड़कते हुए हृदय से सप्ताह व्यतीत होने की राह देखने लगा।

         दोपहर का समय है। मनोहरसिंह एक चारपाई पर नीम के नीचे लेटा हुआ है। नीम की शीतल वायु के झोंकों से उसे बड़ा सुख मिल रहा है। वह पड़ा-पड़ा सोच रहा है कि परसों तक यदि रुपए न पहुँचेंगे तो ठाकुर साहब इस पेड़ को कटवा डालेंगे।यह पेड़ मेरे पिता के हाथ का लगाया हुआ है। मुझे और मेरे परिवार को दातुन और छाया देता रहा है। इसको ठाकुर साहब कटवा डालेंगे।

       यह विचार मनोहरसिंह को ऐसा दुखदाई प्रतीत हुआ कि वह चारपाई से उठकर बैठ गया और वृक्ष की ओर मुँह करके बोला-‘यदि संसार में किसी ने मेरा साथ दिया है तो तूने। यदि संसार में किसी ने नि:स्वार्थ भाव से मेरी सेवा की है तो तूने। अब भी मेरी आँखों के आगे वह दृश्य आ जाता है, जब मेरे पिता तुझे सींचा करते थे। तू उस समय बिलकुल बच्चा था। मैं तेरे लिए तालाब से पानी भरकर लाया करता था। पिता कहा करते थे – बेटा मनोहर, यह मेरे हाथ की निशानी है। इससे जब-जब तुझे और तेरे बाल-बच्चों को सुख पहुँचेगा, तब-तब मेरी याद आएगी। पिता का देहांत हुए चालीस वर्ष व्यतीत हो गए। उनके कहने के अनुसार, तू सदैव उनकी कीर्ति का स्मरण कराता रहा और जब तक रहेगा, उनकी याद दिलाता रहेगा। मुझे वह दिन अच्छी तरह याद है, जब मैं अपने मित्रों सहित तेरी डालियों पर चढ़कर खेला करता था। इस समय संसार में तू ही एक मेरा पुराना मित्र है। तुझे वह दुष्ट काटना चाहता है। हाँ, काटेगा क्यों नहीं। देखूँ, कैसे काटता है”?

         उसी समय उधर से एक पन्द्रह-सोलह वर्ष का लड़का निकला। वृद्ध मनोहर को बड़बड़ाते देख उसने पूछा – चाचा, किससे बातें करते हो। यहाँ तो कोई है भी नहीं।

बुड्ढे ने चौंककर लड़के की ओर देखा और कहा – क्या करूँ बेटा तेजा, अपने कर्म से बातें कर रहा हूँ। ठाकुर शिवपालसिंह के मुझ पर कुछ रुपए हैं। तुझे तो बेटा मालूम ही है कि परसाल खेती में एक दाना भी नहीं हुआ। होता तो क्या मैं उनका लगान रख लेता। अब वह कहते हैं लगान के रुपए दो, नहीं पेड़ कटवा लेंगे। इस पेड़ को कटवा लेंगे जो मेरे बाप के हाथ का लगाया हुआ है। यह बात तो देखो। समय का फेर है, जो ऐसी-ऐसी बातें सुननी पड़ती हैं। बेटा मैंने सारी उमर फौज में बिताई है। बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ और मैदान देखे हैं। वह बेचारे हैं किस खेत की मूली? आज शरीर में बल होता तो इनकी मजाल थी कि मेरे पेड़ के लिए ऐसा कहते? मुँह नोच लेता। मैंने कभी नाक पर मक्खी नहीं बैठने दी। बड़े-बड़े साहब-बहादुरों से लड़ पड़ता था। यह बेचारे हैं क्या? बड़े ठाकुर की दुम बने घूमते हैं। मैं सच कहता हूँ अभी इस गाँव के पर गोली चलने लगे, तो ठाकुर साहब छिपते दिखलाई पड़ेंगे।  मैंने तो तोप के मुँह पर डटकर बन्दूकें चलाई हैं, पर बेटा समय सब कुछ करा लेता है। जिन्होंने कभी तोप की सूरत नहीं देखी, वह वीर और ठाकुर बने घूमते हैं। हमें आँखें दिखाते हैं कि रुपए दो, नहीं पेड़ कटवा देंगे। देखें, कैसे पेड़ कटवाते हैं। लाख बुडूढा हो गया हूँ, पर अब भी चार-छ: के लिए बहुत हूँ। जब तलवार लेकर डट जाऊँगा तो भागते ही दिखलाई पड़ेंगे। बेटा सौ बात की एक बात तो यह है कि मुझे तो एक दिन मरना ही है। चल-चलाव लग रहा है। मैं बड़ी-बड़ी लडा़इयों से जीता लौट आया। यह भी एक लड़ाई ही है। अब इसी लड़ाई में मेरा अंत है। पर इतना समझ रखना कि मेरे जीते जी इस पेड़ की एक डाल भी कोई काटने नहीं पाएगा। उनका रुपया गले बराबर है। भगवान जाने मेरे पास होता तो मैं दे देता! नहीं है, तो क्या किया जाए ? पर यह भी नहीं हो सकता कि ठाकुर साहब मेरा पेड़ कटवा लें और मैं टुकुर-टुकुर देखता रहूँ।”

      तेजा बोला -” चाचा, जाने भी दो, इन बातों में क्या रखा है। पेड़ कटवाने को कहते हैं, काट लेने देना।इस पेड़ में तुम्हारा रखा ही क्या है? पेड़ तो नित्य ही कटा करते हैं।

मनोहरसिंह बिगड़कर बोला -‘आखिर लड़के ही हो न ! अरे बेटा, यह पेड़ ऐसा-वैसा नहीं है। यह पेड़ मेरे भाई के बराबर है। मैं इसे अपना सगा भाई समझता हूँ। यह मेरे पिता के हाथ का लगाया हुआ है और किसी के हाथ का नहीं। जब मैं तुमसे भी छोटा था, तब से इसका मेरा साथ है। मैं बरसों इस पर खेला हूँ, बरसों इसकी मीठी-मीठी निबोलियाँ खाई हैं। इसकी दातुन आज तक करता हूँ। गाँव में सैकडों पेड़ हैं, पर मुझसे कसम ले लो, जो मैंने कभी उनकी एक पत्ती तक छुई हो। जब मेरे घर में आप ही इतना बड़ा पेड़ खड़ा हुआ हो, तब मुझे दूसरे पेड़ को हाथ लगाने की क्या पड़ी है। दूसरे, मुझे किसी और पेड़ की दातुन अच्छी नहीं लगती।”

       तेजा बोला – “चाचा, बिना रुपए दिए तो यह पेड़ बच नहीं सकता।”

       मनोहरसिंह – “बेटा, ईश्वर जानता है, मेरे पास रुपए होते तो मैं आज ही दे देता। पर क्या करूँ, लाचार हूँ। मेरे घर में ऐसी कोई चीज भी नहीं बची जो बेच कर दे दूँ। मुझे आज इस बात का बड़ा दुख है। गाँव भर में घूम आया, किसी ने उधार न दिए। क्या करूँ, बेटा तेजा, सच जानना जो यह पेड़ कट जाएगा तो मुझे बड़ा दुख होगा। मेरा बुढ़ापा बिगड़ जाएगा। अभी तक मुझे कोई दुख न था। खाता था, ईश्वर भजन करता था। पर अब घोर दुख हो जाएगा”। यह कह कर वृद्ध मनोहरसिंह ने आँखों में आँसू भर लिए।

       तेजा वृद्ध मनोहरसिंह का कष्ट सुनकर बड़ा दुखी हुआ। तेजा गाँव के एक प्रतिष्ठित किसान का बेटा था। उसका पिता डेढ़-दो सौ बीघे भूमि पर खेती करता था। मनोहरसिंह को तेजा चाचा कहा करता था।

      तेजा ने कहा, ‘चाचा, बापू से यह हाल कहा है?’

     मनोहर – सबसे कह चुका बेटा। तेरा बापू तो अब बड़ा आदमी हो गया है। वह मेरे जैसे गरीबों की बात क्यों सुनने लगा। एक जमाना था, जब वह दिन-दिन भर मेरे द्वार पर पड़ा रहता था। घर में लड़ाई होती थी, तो मेरे ही यहाँ भाग आता था और दो-दो, तीन तीन-दिन तक रहता था। वही तुम्हारा बापू अब सीधे बात नहीं करता। इसी से कहता हूँ समय की बात है।”

तेजा ने पूछा – ‘कितने रुपए देने से पेड़ बच सकता है?’

मनोहर — ‘पच्चीस रुपए देने पड़ेंगे।’

तेजा –“पच्चीस रुपए तो बहुत हैं चाचा।”

मनोहर – “पास नहीं हैं तो बहुत ही हैं. होते तो थोड़े थे।”

तेजा –“दस-पाँच रुपए की बात होती तो मैं ही कहीं से ला देता..”

मनोहर – “बेटा, भगवान तुम्हें चिरंजीव रखे। तूने एक बात तो कही। गाँववालों ने तो इतना भी नहीं कहा। खैर देखा जाएगा। पर इतना तू याद रखना कि मेरे जीते जी इस पेड़ को कोई हाथ नहीं लगाने पाएगा।”

(3)

एक सप्ताह बीत गया। आज आठवाँ दिन है। मनोहरसिंह रुपयों का प्रबंध नहीं कर सका। वह समझ गया कि अब पेड़ का बचना कठिन है। पर साथ ही वह यह भी निश्चय कर चुका था कि उसके जीते जी कोई उसको काट नहीं सकता। उसने अपनी तलवार भी निकाल ली और साफ करके रख ली थी। अब वह हर समय पेड़ के नीचे ही पड़ा रहता था। तलवार सिरहाने रखी रहती थी।

आठवें दिन दोपहर के समय शिवपालसिंह ने मनोहरसिंह को बुलवाया। मनोहरसिंह तलवार बगल में दाबे अकड़ता हुआ ठाकुर साहब के सामने पहुँचा।

शिवपालसिंह और उसके आस-पास बैठे हुए लोग बुड्ढे की इस सज-धज पर मुस्कराए। शिवपालसिंह ने कहा – सुनते हो मनोहरसिंह, एक सप्ताह बीत गया अब पेड़ हमारा हो गया। आज हम उसकी कटाई शुरू कराते हैं।”

मनोहर – “आपको अधिकार है। मुझे रुपया मिलता तो दे ही देता और अब भी यदि मिल जाएगा तो दे दूँगा। मेरी नियत में बेईमानी नहीं है। मैं फौज में रहा हूँ, बेईमानी का नाम नहीं जानता?”

शिवपाल-“अब हम उसे कटवा लें न?”

मनोहर -” यह मैं कैसे कहूँ, आपका जो जी चाहे कीजिए”।

      यह कहकर मनोहरसिंह उसी प्रकार अकड़ता हुआ ठाकुर शिवपालसिंह के सामने से चला आया और अपने पेड़ के नीचे चारपाई पर आकर बैठ गया।

      दोपहर ढलने पर चार-पाँच आदमी कुल्हाडियाँ लेकर आते दिखाई पड़े। मनोहरसिंह झट म्यान से तलवार निकाल डटकर खड़ा हो गया और ललकार कर बोला – ‘सँभलकर आगे बढ़ना! जो किसी ने भी पेड़ में कुल्हाडी लगाई तो उसकी और अपनी जान एक कर दूँगा।’

मजदूर बुड्ढे की ललकार सुन और तलवार देखकर भाग खड़े हुए। जब शिवपालसिंह को यह बात मालूम हुई तब पहले तो वे बहुत हँसे, परन्तु पीछे कुछ सोचकर उनका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। वह बोले — “इस बुड्ढे की शामत आई है। हमारा माल है। हम चाहे काटें, चाहे रखें। वह कौन होता है। चलो तो मेरे साथ, देखूँ, वह क्या करता है।

       शिवपालसिंह मजदूरों तथा दो लट्ठबंद आदमियों को लेकर पहुँचे। उन्हें आते देख बुड्ढा फिर तलवार निकालकर खड़ा हो गया।

       शिवपालसिंह उसके सामने पहुँच कर बोले -“क्यों मनोहर, यह क्या बात है ?”

       मनोहरसिंह बोला -”बात केवल इतनी है कि मेरे रहते इसे कोई हाथ नहीं लगा सकता। यह मैं जानता हूँ कि अब पेड़ आपका है। मगर यह होने पर भी मैं इसे कटता हुआ नहीं देख सकता।”

       शिवपालसिंह – ‘पर हम तो इसे कटवाए बिना न मानेंगे।’

मनोहरसिंह को भी क्रोध आ गया। वह बोला – ठाकुर साहब, जो आप सच्चे ठाकुर हैं, तो इस पेड़ को कटवा लें. जो मैं असली ठाकुर हूँगा तो इसे न कटने दूँगा।”

 ‘हूँ’, ठाकुर शिवपालसिंह अपने आदमियों से बोले – ‘देखते क्या हो? इस बुड्ढे को पकड़ लो और पेड़ काटना शुरू कर दो।’

      ठीक उसी समय तेजासिंह दौड़ता हुआ आया और मनोहरसिंह को कुछ रुपए देकर बोला — ‘लो चाचा, ये रुपए, अब तुम्हारा पेड़ बच गया।’

     मनोहरसिंह ने रुपए गिनकर ठाकुर शिवपालसिंह से पूछा — कहिये ठाकुर साहब, रुपए लेना हो तो ये हाजिर हैं और जो पेड़ कटवाना हो तो आगे बढिये।’

     ठाकुर –“रुपए अब हम नहीं ले सकते। रुपए देने की मियाद बीत गई। अब तो पेड़ कटेगा।”

     मनोहरसिंह अकड़ कर बोला –“ठीक है, अब मालूम हुआ कि आप केवल मुझे दुख पहुँचाने के लिए पेड़ कटवा रहे हैं, अच्छा कटवाइये। मुझे भी देखना है आप किस तरह पेड़ कटवाते हैं।“

     इतनी ही देर में गाँव भर में यह खबर फैल गई कि शिवपालसिंह मनोहरसिंह का पेड़ कटवा रहे हैं, पर मनोहरसिंह तलवार खींचे खड़ा है। किसी को पेड़ के पास नहीं जाने देता. यह खबर फैलते ही गाँव भर जमा हो गया। गाँव के दो-चार प्रतिष्ठित आदमियों ने मनोहरसिंह से पूछा -“क्या बात है, मनोहरसिंह?”

      मनोहरसिंह सब हाल कहकर बोला – मैं रुपए देता हूँ। ठाकुर नहीं लेते। कहते हैं, कल तक मियाद थी। अब तो पेड़ कटेगा |

       शिवपालसिंह बोले – कल तक यह रुपए दे देता तो पेड़ पर हमारा कोई अधिकार न होता। अब हमारा उस पर पूरा अधिकार है। हम पेड़ अवश्य कटवाएँगे।”

        एक व्यक्ति बोला — ‘जब कल तक इसके पास रुपये नहीं थे तो आज कहाँ से आ गए?’

         शिवपालसिंह का एक आदमी बोला – तेजा ने अभी लाकर दिए हैं |

         गाँववालों के साथ तेजा का पिता भी था। उसने यह सुनकर तेजा को पकड़ा और कहा – ‘क्यों बे, तूने ही रुपए चुराए थे। मैंने दोपहर को पूछा तो तीन-तेरह बकने लगा था।’ इसके बाद तेजा के पिता ने कहा — मनोहर, ये रुपए तेजा मेरी संदूक से चुरा लाया है। ये रुपए मेरे हैं।

           मनोहरसिंह रुपए फेंककर बोला – तेरे हैं, तो ले जा। मैंने तेरे लड़के से रुपए नहीं माँगे थे।

           फिर मनोहरसिंह ने तेजा से कहा – बेटा, तूने यह बुरा काम किया। चोरी की। राम ! बुढ़ापे में मेरी नाक कटाने का काम किया था। ये लोग समझेंगे मैंने ही चुराने के लिए तुझसे कहा होगा।

           तेजा बोला -”चाचा, मैं गंगा उठाकर कह सकता हूँ कि तुमने मुझसे रुपए माँगे तक नहीं, चुराने के लिए कहना तो बड़ी दूर की बात है।

            शिवपालसिंह ने हँस कर कहा – क्यों मनोहर, अब रुपए कहाँ हैं, लाओ। रुपए ही लाओ। मैं रुपए लेने को तैयार हूँ। अब या तो अभी रुपए दे दो, या सामने से हट जाओ। झगड़ा करने से कोई लाभ नहीं होगा.

             मनोहरसिंह बोला – ठाकुर साहब, इन तानों से क्या फायदा। रुपए मेरे पास नहीं हैं, लेकिन पेड़ मैं कटने नहीं दूँगा।

             शिवपालसिंह उपस्थित लोगों से बोले ”आप लोग इस बात को देखिए और न्याय कीजिए। मियाद कल तक की थी, मैं आज भी रुपए लेने को तैयार हूँ। अब मेरा अपराध नहीं ! यह बुडढा व्यर्थ झगड़ा कर रहा है।

       तेजासिंह यह सुनते ही आगे बढ़ा और अपनी अँगुली से सोने की अँगूठी उतार कर शिवपालसिंह से बोला – ठाकुर साहब, यह अँगूठी एक तोले की है। आप के रुपए इससे निकल आवेंगे। आप यह अँगूठी ले जाइए। इस अँगूठी पर बापू का कोई अधिकार नहीं। यह अँगूठी मुझे मेरी नानी ने दी थी।’

        सब लोग लड़के की बात सुनकर दंग हो गए।

        यह देख तेजासिंह का पिता आगे बढ़ा और बोला – “ठाकुर साहब, लीजिए ये पच्चीस रुपए और अब इस पेड़ को छोड़ दीजिए। आप अभी कह चुके हैं कि रुपए मिल जाएँ तो पेड़ छोड़ देंगे। अतएव अपने वचन का पालन कीजिए”। ठाकुर साहब के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्हें विश्वास हो गया था कि अब मनोहरसिंह को रुपए मिलना असंभव है। इसी से उन्होंने केवल अपनी उदारता दिखाने के लिए रुपए लेना स्वीकार किया था। अब वह कुछ न कह सके। कारण उन्होंने पच्चीस-तीस आदमियों के सामने रुपए लेना स्वीकार कर लिया था। वह रुपए लेकर चुपचाप चले गए।

ठाकुर साहब के चले जाने के बाद मनोहरसिंह ने तेजासिंह को बुलाकर छाती से लगाया और कहा –“बेटा, इस पेड़ को तूने ही बचाया। अतएव मैं तुझी को यह पेड़ देता हूँ। मुझे विश्वास हो गया कि मेरे पीछे तू इस पेड़ की पूरी रक्षा कर सकेगा।

तेजा से यह कह कर उपस्थित लोगों से कहा – भाइयो, मैं तुम सबके सामने यह पेड़ तेजासिंह को देता हूँ। तेजा को छोडकर इस पर किसी का कोई अधिकार न रहेगा।”

फिर तलवार म्यान में रखते हुए आप ही आप कहा – पर मेरे जीते जी कोई पेड़ में हाथ नहीं लगा सकता था, अपनी और उसकी जान एक कर देता। मैंने फौज में नौकरी की है। बडी़-बड़ी लडा़इयाँ जीती हैं। यह बेचारे हैं क्या चीज।”

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विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक

विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक

जन्म : 1891, मृत्यु: 1945 उपन्यास : माँ, भिखारिणी कहानियाँ : चित्रकला, मणिमाला, कल्लोल
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