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बयान – 6 

इश्क भी क्या बुरी बला है! हाय, इस दुष्ट ने जिसका पीछा किया उसे खराब करके छोड़ दिया और उसके लिए दुनिया भर के अच्छे पदार्थ बेकाम और बुरे बना दिये। छिटकी हुई चांदनी उसके बदन में चिनगारियां पैदा करती है, शाम की ठंडी हवा उसे लू-सी लगती है, खुशनुमा फूलों को देखने से उसके कलेजे में कांटे चुभते हैं, बाग की रविशों पर टहलने से पैरों में छाले पड़ते हैं, नरम बिछावन पर पड़े रहने से हड्डियां टूटती हैं, और वह करवटें बदलकर भी किसी तरह आराम नहीं ले सकता!

खाना-पीना हराम हो जाता है, मिसरी की डली जहर मालूम होती है, गम खाते-खाते पेट भर जाता है, प्यास बुझाने के लिए आंसू की बूंदें बहुत हो जाती हैं, हजार दुख भोगने पर भी किसी की जुल्फ में उलझी हुई जान को निकल भागने का मौका हाथ नहीं लगता! दोस्तों की नसीहतें जिगर के टुकड़े-टुकड़े करती हैं, जुदाई की आग में कलेजा भुजा जाता है, बदन का खून पानी हो जाता है और इसी से उसकी भूख-प्यास दोनों ही जाती रहती हैं। जिसकी सूरत उसकी आंखों में छुपी रहती है, दरोदीवार में वही दिखाई देता है, स्वप्न में भी इठलाता हुआ वही नजर आता है। उसकी सुनी हुई बातें रात-दिन कान में गूंजा काती हैं, हंसी के समय दिखाई दिये हुए मोतियों-से दांत गले का हार बन बैठते हैं, भुलाए नहीं भूलते, जादू भरी चितवनों की याद दिल को उचाट कर देती है, गले में हाथ डालकर ली हुई अंगड़ाई बदन को दबाए देती है, उसकी याद में एक तरफ झुके हुए कभी सीधे भी नहीं होने पाते।

वे दिन-रात आंखें बंद कर हुस्न के बाग में टहला करते हैं। ठंडी सांसें आंधी का काम देती हैं। सूखे पत्ते उड़ाया करते हैं और धीरे-धीरे आप भी ऐसे सूख जाते हैं कि सांस के साथ उड़ जाने की हिम्मत बांधते हैं, मुहब्बत का गुरु चाबुक लिए हरदम पीछे मौजूद रहता है, बुदबुदाते हुए अपने चेले को कहीं ठहरने नहीं देता और न माशूक के नाम के सिवाय कोई दूसरा शब्द मुंह से निकालने देता है।

आदमी का क्या हवा तक ऐसों से दिल्लगी करती है, किवाड़ खटखटा माशूक के आने की याद दिला-दिला चुटकियां लेती है, और कभी कान में झुककर कहती है कि मैं उस गली से आई हूं जिसमें तेरा प्यारा रहता है!

बाग में टहलने के समय हवा के चपेटों में पड़ी हुई पेड़ों की टहनियां हिल-हिलकर अपने पास बुलाती हैं और जब वह पास जाता है हंसी के दो फूल गिराकर चुप हो जाती हैं जिससे उसका दिल और भी बेचैन हो जाता है और वह दोनों हाथों से कलेजा थामकर बैठ जाता है। उसके प्यारे रिश्तेदार यह हालत देख अफसोस करते हैं और उसकी नर्म अंगुलियों को हाथ में लेकर पूछते हैं कि क्या अपनी जुल्फें संवारने के लिए ये नाखून बढ़ा रखे हैं

बेचैनी इतनी बढ़ जाती है कि आधे घंटे तक के लिए भी ध्यान एक तरफ नहीं जमता और न एक जगह थोड़ी देर तक आराम के साथ बैठने की मोहलत मिलती है। आंखों में छिपी रहने वाली नींद भी न मालूम कहां चली जाती है और अपनी जगह टकटकी को जो दम-दम में तरह-तरह की तस्वीरें बनाने और बिगाड़ने वाली है, छोड़ जाती है।

यही हमारे कुंअर इंद्रजीतसिंह और उनकी प्यारी किशोरी की हालत है, इस समय दोनों एक-दूसरे से दूर पड़े हैं मगर मुहब्बत का भूत रंग-बिरंगी सूरत बना दोनों की आंखों में नाचा करता है और बढ़ती हुई उदासी और बेचैनी को किसी तरह कम नहीं होने देता।

रोहतासगढ़ महल में रहने वाली जितनी औरतें हैं सभी के किशोरी की खातिरदारी का ध्यान रहने पर भी किशोरी की उदासी किसी तरह कम नहीं होती। यद्यपि उसे यहां किसी तरह की भी तकलीफ नहीं थी मगर कलेजे को टुकड़े-टुकड़े करने वाली बात एक सायत के लिए भी उसके दिल से नहीं भूलती थी जो उसने यहां आने के साथ ही पीठ पर हाथ फेरते हुए महाराज के मुंह से सुनी थी, अर्थात – “यह तो मेरी पतोहू होने लायक है!”

यों तो ऊंचे दर्जे की औरतों के जिद करने से लाचार होकर जनाने नजरबाग में किशोरी को टहलना ही पड़ता था मगर वहां की कोई चीज उस बेचारी के जी को ढाढ़स नहीं दे सकती थी। खिले हुए गुलाब के फूल पर नजर पड़ते ही वह मुर्झा जाती, नर्गिस की तरफ देखते ही उसकी शर्मीली आंखें पलकों की चिलमन में छिप जातीं, सरों के पास पहुंचते ही वह गम के बोझ से झुक जाती और खुशनुमा फूलों से लदी हुई पेचीली लतायें उसके सामने पड़कर कुंअर इंद्रजीतसिंह की सुंबली जुल्फों की याद दिलातीं जिसमें उलझी हुई उसकी जान को जीते जी छूटने की उम्मीद न थी।

रविशों को वह यार की जुदाई का मैदान समझती, छोटे-छोटे रंगीन फूलों से भरे हुए पेड़ों की क्यारियों को वह घना जंगल जानती और गूंजते हुए भौंरों की आवाज उसके कानों में झिल्ली की झनकार मालूम होती जो जंगल में बिना मौसम पर ध्यान दिये बारहों महीने बोला और इत्तिफाक से आ पड़े हुए नाजुक-बदनों के कलेजों को दहलाया करती है।

नर्म हवा के झोंकों से हिलती हुई रंग-बिरंगी खूबसूरत पत्तियों को देखते ही वह कांप जाती, सुंदर और साफ मोती-सरीखे जल से भरे और बहते हुए बनावटी झरने के पास पहुंचते ही उसका दिल डूब जाता, छूटते हुए फव्वारे पर नजर पड़ते ही कलेजा मुंह को आता और आंखों से टपाटप आंसू की बूंदें गिरने लगतीं जिन्हें देख तरह-तरह की बोलियों से दिल खुश करने वाली बाग की नाजुक चिड़ियों से चुप न रहा जाता और वे बोल उठतीं – “हाय-हाय! इस बेचारी का दिल किसी की जुदाई में खून हो गया और वह खून पानी होकर आंखों की राह निकला जाता है।”

उन कुछ जवान, नाजुक और चंचल औरतों को जो किशोरी के साथ रहने पर मुस्तैद की गई थीं उसकी हालत पर अफसोस आता मगर लाचार थीं क्योंकि उन्हें अपनी जान बहुत प्यारी थी।

रात के समय जब किशोरी अपने को अकेली पाती, तरह-तरह की बातें सोचा करती। कभी तो वह निकल भागने की तरकीब सोचती मगर अनहोनी जान उधर से खयाल को लौटाकर अपने प्यारे इंद्रजीतसिंह की तरफ ध्यान लगाती और कहती कि क्या वे मेरी मदद न करेंगे और मुझे यहां से न छुड़ावेंगे नहीं, जरूर छुड़ावेंगे, मगर कब जब उन्हें यह खबर होगी कि किशोरी फलानी जगह कैद है। हाय-हाय! कहीं ऐसा न हो कि खबर होते-होते तक मुझे यह दुनिया छोड़ देनी पड़े और दिल के अरमान दिल ही में ले जाने पड़ें। नहीं, अगर मेरे साथ जबर्दस्ती की जायगी तो जरूर ऐसा करूंगी और सिवाय उसके जिसके ऊपर न्योछावर हो चुकी हूं, दूसरे की न कहलाऊंगी, ऐसी नौबत आने के पहले ही शरीर छोड़ उनसे जा मिलूंगी, कोई ताकत ऐसी नहीं जो ऐसा करने से मुझे रोक सके। हे ईश्वर! क्या तू उन आफत के परकाले ऐयारों को यहां का रास्ता न बतावेगा जो कुमार के लिए जान तक दे देने को हरदम मुस्तैद रहते हैं

एक रात वह इसी सोच-विचार में पड़ी थी कि सबेरा हो गया और कमरे के बाहर से एक ऐसी आवाज उसके कान में आई कि वह चौंक पड़ी। उसके फैले हुए खयाल इकट्ठे हो गये, साथ ही कुछ-कुछ खुशी उसके चेहरे पर झलकने लगी। वह आवाज यह थी –

“यह काम बेशक वीरेंद्रसिंह के ऐयारों का है।”

किशोरी उठ खड़ी हुई और कमरे के बाहर निकलने पर घंटे ही भर में उसे मालूम हो गया कि कुंअर कल्याणसिंह को वीरेंद्रसिंह के ऐयार लोग ले भागे।

अब किशोरी को अपने छूटने की कुछ-कुछ उम्मीद हुई और वह दिन भर इसी खयाल में डूबी रहने लगी कि देखें इसके आगे क्या होता है।

बयान – 7 

आधी रात से ज्यादे जा चुकी है, किशोरी अपने कमरे में मसहरी पर लेटी हुई न मालूम क्या-क्या सोच रही है, हां उसकी डबडबाई हुई आंखें जरूर इस बात की खबर देती हैं कि उसके दिल में किसी तरह का द्वंद्व मचा हुआ है। उसकी आंखों में नींद बिल्कुल नहीं है, घड़ी-घड़ी करवटें बदलती और लंबी सांसें लेकर रह जाती है।

यकायक कमरे के बाहर से कोई तड़पा देने वाली आवाज उसके कान में आई जिसके सुनते ही यह बेचैन हो गई, किसी तरह लेटी रह न सकी, पलंग से नीचे उतर पड़ी और दरवाजा खोल बाहर इधर-उधर देखने लगी। वह आवाज किसी के सिसककर रोने की थी।

कमरे के बाहर आठ दर का दालान था जहां एक खंभे के सहारे खड़ी बिलख-बिलखकर रोती हुई एक कमसिन औरत को किशोरी ने देखा। खंभे और उस औरत पर चांदनी अच्छी तरह पड़ रही थी। पास जाने से मालूम हुआ कि सर्दी से कांप रही है क्योंकि कोई भारी कपड़ा उसके बदन पर न था जिससे सर्दी का बचाव होता।

किशोरी का दिल तो पहले ही से जख्मी हो रहा था, वह इस तरह से बिलख-बिलख किसी को रोते कब देख सकती थी! जाते ही उस औरत का हाथ थाम लिया और पूछा –

“तुम पर क्या आफत आई है जो इस तरह बिलख-बिलखकर रो रही हो”

औरत – हाय, मेरे ऊपर वह आफत आई है जो किसी तरह टल नहीं सकती!

किशोरी उसे अपने कमरे में ले आई और अपने पास फर्श पर बैठाकर बातचीत करने लगी। इस औरत की उम्र अठारह वर्ष से ज्यादे न होगी। यह हर तरह से खूबसूरत और नाजुक थी, इसके बदन में जो कुछ जेवर था उसके देखने से साफ मालूम होता था कि यह जरूर किसी बड़े खानदान की लड़की है।

किशोरी – मैं उम्मीद करती हूं कि अपने दिल का हाल साफ-साफ मुझसे कहोगी और मुझे बहिन समझकर कुछ न छिपाओगी।

औरत – बहिन, मैं जरूर अपना हाल तुमसे कहूंगी क्योंकि तुम भी उसी बला में फंसी हो जिसमें मैं।

किशोरी – (चौंककर) क्या मेरी ही तरह से तुम पर भी जुल्म किया गया है

औरत – बेशक।

किशोरी – (लंबी सांस लेकर) हे ईश्वर! मैंने तो किसी के साथ बुराई नहीं की थी, फिर क्यों यह दुख भोग रही हूं!!

औरत – मगर मैं अब इस जगह ठहर नहीं सकती!

किशोरी – सो क्यों क्या किसी तरह का खौफ मालूम होता है

औरत – नहीं – नहीं, डर किसी बात का नहीं है, पर इस समय मुझे किसी की मदद से निकल भागने की उम्मीद है, इसीलिए अपने कमरे से निकल यहां तक आई थी।

किशोरी – क्या कोई तरकीब निकाली गई है

औरत – हां, और अगर चाहो तो तुम भी मेरे साथ यहां से भाग सकती हो। इसी राज्य का एक जबर्दस्त आदमी आज हमारी मदद करेगा।

यह सुनकर किशोरी बहुत ही खुश हुई। वह औरत कौन है, उसका नाम क्या है, उस पर क्या दुख पड़ा है यह सब पूछना तो बिल्कुल भूल गई और निकल भागने की खुशी में उस औरत का हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर प्रेम से उसकी तरफ देख पूछने लगी, “क्या तुम्हारी मदद से मेरा भी छुटकारा यहां से हो सकता है”

औरत – जरूर हो सकता है मगर अब देर न करनी चाहिए।

इसके जवाब में किशोरी कुछ कहा ही चाहती थी कि सामने का दरवाजा खुला और एक हसीन औरत अंदर आती हुई दिखाई पड़ी। इसकी अवस्था लगभग बीस वर्ष के होगी, सफेद गेहूं का-सा रंग, कद न लंबा न नाटा, बदन साफ और सुडौल, नमकीन चेहरा, रस भरी आंखें, नाक में एक हीरे की कील के अलावे दो-चार मामूली गहने पहिरे हुए थी, तो भी वह इस लायक थी कि ऊंचे दर्जे के खूबसूरती की पंक्ति में बैठ सके। इसे देखते ही वह औरत जो किशोरी के पास बैठी थी चौंकी और उसकी तरफ देखकर बोली, “लाली, इस समय तुम्हारा यहां आना मुझे ताज्जुब में डालता है!”

लाली – लेकिन यह सुनकर तुम्हें और भी ताज्जुब होगा कि मैं तुम्हारे पंजे से बेचारी किशोरी की जान बचाने के लिए आई हूं।

इतना सुनते ही उस औरत का रंग-ढंग बिल्कुल बदल गया। उसके चेहरे पर जो अभी तक उदासी छाई हुई थी बिल्कुल जाती रही ओैर तमतमाहट आ मौजूद हुई, उसकी आंखें भी जो डबडबाती हुई थीं खुश्क हो गईं और उनमें गुस्से की सुर्खी दिखाई देने लगी, वह इस निगाह से लाली को देखने लगी जैसे उस पर किसी तरह की हुकूमत रखती हो।

लाली को किशोरी भी पहचानती थी, क्योंकि यह उन हसीनों में से थी जो किशोरी का दिल बहलाने और उसकी हिफाजत करने के लिए तैनात की गई थीं।

हुकूमत भरी निगाहों से कई सायत तक लाली की तरफ देखने के बाद वह औरत फिर बोली –

“लाली, क्या तू आज पागल हो गई है जो मेरे सामने इस तरह से बेअदब होकर बोलती है”

लाली – तू कौन है जो तेरे साथ अदब का बर्ताव करूं

औरत – (खड़ी होकर) तू नहीं जानती कि मैं कौन हूं

लाली – कुंदन, मैं तुझे खूब जानती हूं, मगर तू यह नहीं जानती कि तेरी नकेल मेरे हाथ में है जिससे तू मेरा कुछ नहीं कर सकती और न अपनी बेईमानी का जाल ही बेचारी किशोरी पर फैला सकती है!

इतना सुनते ही वह औरत जिसका नाम कुंदन था लाल हो गई और अपने जोश को किसी तरह सम्हाल न सकी, छुरा जो कमर में छिपाये हुए थी हाथ में ले लिया और मारने के लिए लाली की तरफ झपटी। मगर लाली ने झट अपने बगल से एक नारंगी निकालकर उसे दिखाई और पूछा, “क्या तू भूल गई कि इसमें कै फांकें हैं”

नारंगी देखने के साथ ही और लाली के मुंह से निकले हुए शब्दों को सुनते ही उसका जोश जाता रहा और घबराहट से उसका रंग बिल्कुल उड़ गया और वह एक चीख मारकर जमीन पर गिर पड़ी।

बयान- 8 

रोहतासगढ़ किले के सामने पहाड़ी से कुछ दूर हटकर वीरेंद्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। चारों तरफ फौजी आदमी अपने-अपने काम में लगे हुए दिखाई देते हैं। कुछ फौज आ चुकी और बराबर चली ही आती है। बीच में राजा वीरेंद्रसिंह का कारचोबी खेमा शान-शौकत के साथ खड़ा है, उसके दोनों बगल कुंअर इंद्रजीतसिंह और आनंदसिंह का खेमा है, सामने और पीछे की तरफ दुपट्टी बड़े-बड़े सरदारों और बहादुरों का डेरा पड़ा है। बाजार लगने की तैयारियां हो रही हैं, लड़ाई का सामान इतना इकट्ठा हो रहा है कि देखने से दुश्मनों का कलेजा दहल जाय।

डेरा खड़ा होने के दूसरे दिन कुंअर इंद्रजीतसिंह, आनंदसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह, तारासिंह, जगन्नाथ ज्योतिषीजी, फतहसिंह (पुराने सेनापति जो नौगढ़ में थे) और नाहरसिंह इत्यादि को साथ लिये राजा वीरेंद्रसिंह भी आ पहुंचे और सब लोग अपने-अपने खेमे में उतरे। पन्नालाल गयाजी में ओैर रामनारायण तथा चुन्नीलाल चुनारगढ़ में रखे गये। इस लड़ाई के लिए सेनापति की पदवी नाहरसिंह को दी गई। तीसरे दिन और भी फौज आ जाने पर पांच झंडे, पचास हजार फौज का निशान खड़ा किया गया। बहादुरों के चेहरों पर खुशी मालूम होती थी, सब इसी फिक्र में थे कि जहां तक हो लड़ाई जल्दी छिड़ जाये और बेशक एक ही दो दिन में लड़ाई छिड़ जाने की उम्मीद थी मगर वीरेंद्रसिंह के लश्कर पर यकायक ऐसी आफत आ पड़ी कि कुछ दिनों तक लड़ाई रुकी रही। इस आफत के आने का किसी को स्वप्न में भी गुमान न था जिसका हाल हम आगे चलकर लिखेंगे।

राजा दिग्विजयसिंह का पत्र लेकर उनका एक ऐयार वीरेन्द्रिसिंह के पास आया। वीरेंद्रसिंह ने पत्र लेकर मुंशी को पढ़ने के लिये दिया, उसमें जो कुछ लिखा था उसका संक्षेप यह है –

“हमारे – आपके बीच कभी की दुश्मनी नहीं, तो भी न मालूम आपस में लड़ने या बिगाड़ पैदा करने का इरादा आपने क्यों किया खैर इसका सबब जो कुछ हो हम नहीं कह सकते मगर इतना याद रखना चाहिए कि पचास वर्ष लड़कर भी यह किला आप हमसे नहीं ले सकते। अगर हम चुपचाप बैठे रहें तो भी आप हमारा कुछ नहीं कर सकते, फिर भी हम आपसे लड़ेंगे और मैदान में निकलकर बहादुरी दिखायेंगे। अगर आपको अपनी बहादुरी या जवांमर्दी का घमंड है तो फौज की जान क्यों लेते हैं, एक पर एक लड़ के फैसला कर लीजिये। बहादुरों की कार्रवाई देखने के बाद हमसे और आपसे द्वंद्व-युद्ध हो जाये, आप हम पर फतह पाइये तो यह राज्य आपका हो जाय, नहीं तो आप हमारे मातहत समझे जायें। अफसोस, इस समय हमारा लड़का मौजूद नहीं है, अगर होता तो आपके दोनों लड़कों से वह अकेला ही भिड़ जाता।”

इस पत्र के जवाब में जो कुछ राजा वीरेंद्रसिंह ने लिखा हम उसका भी संक्षेप नीचे लिख देते हें –

“आप हमारे राज्य में घुसकर किशोरी को ले गये क्या यह आपकी जबर्दस्ती नहीं है क्या इसे लड़ाई की बुनियाद कायम करना नहीं कह सकते हां, अगर आप किशोरी को इज्जत के साथ हमारे पास भेज दें तो हम बेशक अपने घर लौट जायेंगे। नहीं तो याद रहे हम इस किले की एक-एक ईंट उखाड़कर फेंक देंगे जिसकी मजबूती पर घमंड करते हैं। हम लोग आपसे द्वंद्व-युद्ध करने के लिए भी तैयार हैं, जिसका जी चाहे एक पर एक लड़के हौसला निकाल ले। आपका लड़का मेरे यहां कैद है, यदि आप किशोरी को हमारे पास भेज दें तो हम उसे छोड़ने के लिए तैयार हैं।”

इस पत्र के जवाब में रोहतासगढ़ के किले से तोप की एक आवाज आई। अब लड़ाई में किसी तरह का शक न रहा। दोनों तरफ के ऐयार अपनी-अपनी कार्रवाई दिखाने पर मुस्तैद हो गये और उन लोगों ने जो कुछ किया उसका हाल आगे चलकर मालूम होगा।

रोहतासगढ़ किले के अंदर राजमहल की अटारियों पर चढ़ी हुई बहुत-सी औरतें उस तरफ देख रही हैं जिधर वीरेंद्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। कुंअर कल्याणसिंह के गिरफ्तार हो जाने से किशोरी को एक तरह निश्चिंत-सी हो गई थी क्योंकि ज्यादे डर उसे अपनी शादी उसके साथ हो जाने का था, अपने मरने की उसे जरा भी परवाह न थी। हां, कुंअर इंद्रजीतसिंह की याद वह एक सायत के लिए भी नहीं भुला सकती थी जिनकी तस्वीर उसके कलेजे में खिंची हुई थी। वीरेंद्रसिंह की चढ़ाई का हाल सुन, उसे बड़ी खुशी हुई और वह भी अपनी अटारी पर चढ़कर हसरत भरी निगाहों से उस तरफ देखने लगी जिधर वीरेंद्रसिंह की फौज पड़ी हुई थी। चाहे यहां से बहुत दूर हो तो भी किशोरी की निगाहें वहां तक पहुंच और भीड़ में घुस-घुसकर किसी को ढूंढ़ निकालने की कोशिश कर रही थीं। इस समय किशोरी के साथ ही लाली थी जिसने आज कई दिन हुए किशोरी के कमरे में कुंदन को नारंगी दिखाकर डरा दिया था।

लाली किशोरी की निगहबानी पर रखी गई थी तो भी वह किशोरी पर मेहरबानी रखती थी। किशोरी ने नारंगी वाले भेद को जानने की कई दफे कोशिश की मगर पता न लगा। उस दिन के बाद कई दफे कुंदन से भी मुलाकात हुई मगर पूछने पर उसने ऐसी कोई बात न कही जिससे किशोरी का शक दूर हो जाय। नित्य एक घर में रहने पर भी लाली और कुंदन में फिर किसी तरह की दुश्मनी न दिखाई पड़ी। इस बात ने किशोरी के ताज्जुब को और भी बढ़ा रखा था।

इस समय किशोरी के साथ सिवाय लाली के दूसरी कोई और औरत न थी। ये दोनों वीरेंद्रसिंह के लश्कर की तरफ बड़े गौर से देख रही थीं कि यकायक किशोरी को फिर वही नारंगी वाली बात याद आई और थोड़ी देर तक सोचने के बाद वह लाली से पूछने लगी।

किशोरी – लाली, उस दिन की बात जब मैं याद करती हूं, उस पर विचार करती हूं तो कुंदन की दगाबाजी साफ झलक जाती है। कुंदन अगर सच्ची होती तो तुम्हें मारने के लिए न झपटती या हकीकत में अगर वह उस समय यहां से भाग जाने वाली होती तो उसके काम में विघ्न पड़ जाने से उसे रंज होता, सो उसके बदले में वह खुश दिखाई देती है।

लाली – नहीं, वह एकदम से झूठी भी नहीं है।

किशोरी – क्या उसकी बातों का कोई हिस्सा सच भी था?

लाली – जरूर था।

किशोरी – वह क्या?

लाली – यही कि वह भी इस किले में उसी काम के लिए लाई गई है जिस काम के लिए आप लाई गई हैं।

किशोरी – यानी तुम्हारे राजकुमार से ब्याहने के लिए!

लाली – हां।

किशोरी – अच्छा उसकी और कौन-सी बात सच थी

लाली – इन सब बातों को पूछकर क्या करोगी, इस भेद के खुलने से बहुत बड़ी बुराई पैदा होगी।

किशोरी – नहीं-नहीं, मेरी प्यारी लाली, मेरी जुबान से वह बात कोई दूसरा कभी नहीं सुन सकता और मैं उम्मीद करती हूं कि तुम मुझसे उसका हाल साफ-साफ कह दोगी। उस दिन से मुझे विश्वास हो गया है कि तुम मेरी दर्दशरीक हो, अस्तु अगर मेरा खयाल ठीक है तो तुम उसका हाल मुझे जरूर बता दो जिससे मैं हरदम होशियार रहूं।

लाली – अब वह तुम्हारे साथ बुराई कभी न करेगी।

किशोरी – तो भी मेहरबानी करके…

लाली – खैर बता देती हूं, मगर खबरदार, इसका जिक्र किसी दूसरे के सामने कभी मत करना!

किशोरी – ऐसा मैं कदापि नहीं कर सकती और तुम खुद ही जानती हो कि इस महल में सिवाय तुम्हारे कोई भी ऐसा नहीं है कि जिससे में दो बातें करती होऊं।

लाली – अच्छा तो सिवाय उस बात के जो मैं ऊपर कह चुकी हूं बाकी कुल बातें उसकी झूठ थीं। वह इस मकान से भागना नहीं चाहती थी, वह तो हमारे कुमार के साथ ब्याह होने की उम्मीद में खुश है, मगर जिस दिन से तुम आई हो, उस दिन से वह फिक्र में पड़ गई है क्योंकि वह खूबसूरती और इज्जत में तुमको अपने से बहुत बढ़ के समझती है और हकीकत में ऐसा ही है। उसे यह खयाल सता रहा है कि राजकुमार से पहले किशोरी की शादी हो लेगी तब मेरी होगी और ऐसी अवस्था में किशोरी बड़ी रानी कहलावेगी और उसी के लड़के गद्दी के मालिक समझे जायेंगे, इसी से वह इस फिक्र में थी कि तुम्हें मार डाले मगर किसी ऐसे ठिकाने पर ले जाकर जिससे उस पर कोई शक न कर सके।

किशोरी – छिः-छिः!

लाली – मगर अब वह तुम्हारे साथ बुराई नहीं कर सकती।

किशोरी – और वह नारंगी वाला भेद क्या है

लाली – वह मैं नहीं कह सकती। मगर तुम उसी से क्यों नहीं पूछतीं, अब तो वह हरदम तुम्हारी खुशामद किया करती है।

किशोरी – मैं उससे पूछ चुकी हूं।

लाली – उसने क्या कहा

किशोरी – उसने कहा कि लाली ने नारंगी दिखाकर यह नसीहत की कि देखो इसमें कई फांकें हैं, मगर एक साथ रहने और छिलके से ढंके रहने के कारण एक ही गिनी जाती है, कोई कह नहीं सकता कि इसमें कै फांकें हैं, इसी तरह हम लोगों को भी रहना चाहिए।

लाली – ठीक तो कहा।

किशोरी – वाह-वाह! तुमने तो उसी का साथ दिया, एकदम छोकरी बनाकर भुलावा देने लगीं!

लाली – (हंसकर) खैर घबराओ मत सब मालूम हो जायगा।

इतने में सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आहट मालूम हुई और दोनों उस तरफ देखने लगीं। कुंदन ने पहुंचकर दोनों को सलाम किया और हंसी-हंसी में लाली की तरफ देखकर बोली, “एक आदमी तुम्हें खोजता हुआ आया है, वह कहता है कि लाली ने मेरी किताब चुराई है, वह किताब जो किसी के खून से लिखी गई है।”

कुंदन के इन शब्दों में न मालूम क्या भेद भरा हुआ था कि सुनने ही से लाली का रंग उड़ गया। खौफ के मारे उसके तमाम बदन में कंपकंपी पैदा हो गई और मालूम होता था कि किसी ने उसके बदन का खून खींच लिया है। थोड़ी देर तक वह अपने हवास में न रही अंत में हाथ जोड़ के उसने कुंदन से कहा –

लाली – कुंदन, मुझसे बड़ी भूल हुई, मुझ पर रहम खा, मैं तमाम उम्र तेरी लौंडी बनकर रहूंगी!

कुंदन – क्या गुलामी की दस्तावेज मेरे आंचल पर लिख देगी

कुंदन के इस दूसरे जुमले ने लाली को एकदम ही बदहवास कर दिया। अबकी दफे वह अपने को किसी तरह न सम्हाल सकी, उसका सिर घूमने लगा और वह चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ी।

लाली का यह हाल देख कुंदन चुपचाप वहां से चली गई, मगर उसकी सूरत से मालूम होता था कि वह अपनी कार्रवाई पर खुश है या उसने लाली के ऊपर अपनी हुकूमत पैदा कर ली है। उसका मुंह सिकोड़कर सिर हिलाना कहे देता था कि वह लाली पर कुछ और भी जुल्म किया चाहती है।

बेचारी किशोरी का अजब हाल था। नारंगी वाला भेद जानने के लिये वह पहले ही परेशान थी, अब इस दूसरे भेद ने और भी कलेजा ऐंठ दिया। उसने बड़ी मुश्किल से अपने को सम्हाला और लाली को उसी तरह छोड़ छत के नीचे उतर आई तथा अपने कमरे से एक गिलास जल लाकर लाली के मुंह पर छींटा दिया। थोड़ी देर में लाली होश में आई और बिना कुछ बात किये रोती हुई अपने रहने की जगह में चली गई और किशोरी भी अपने कमरे की तरफ रवाना हुई।

जिस कमरे में किशोरी रहती थी वह एक खुशनुमा बाग के बीचोंबीच में था। इस बाग के चारों कोनों में छोटी-छोटी चार इमारतें और भी थीं, एक में वे कुल औरतें रहती थीं जो किशोरी की हिफाजत के लिए मुकर्रर की गई थीं। उन औरतों की अफसर लाली थी। दूसरे मकान में दो-तीन लौंडियों के साथ लाली रहती थी। तीसरा मकान अमीराना ठाठ से रहने के लिए कुंदन को मिला हुआ था, चौथे मकान में जो सबसे छोटा था ताला बंद था मगर बारी-बारी से कई औरतें नंगी तलवार लिये उसके दरवाजे पर पहरा दिया करती थीं। यह बाग जनाने महल में था और किसी गैर का यहां आना या यहां से किसी का निकल भागना मुश्किल था।

बयान- 9 

आधी रात का समय है, चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, राजा वीरेंद्रसिंह के लश्कर में पहरा देने वालों के सिवाय सभी आराम की नींद सोये हुए हें, हां थोड़े से फौजी आदमियों का सोना कुछ विचित्र ढंग का है जिन्हें न तो जागा ही कह सकते हैं और न सोने वालों में ही गिन सकते हैं, क्योंकि ये लोग जो गिनती में एक हजार से ज्यादा न होंगे लड़ाई की पोशाक पहिरे और उम्दे हरबे बदन पर लगाये लेटे हुए हें। जाड़े का मौसम है मगर कोई ऐसा कपड़ा जो बखूबी सर्दी को दूर कर सके ओढ़े हुए नहीं हैं, इसलिए तेज हवा के साथ मिली हुई सर्दी उन्हें नीद में मस्त होने नहीं देती।

राजा वीरेंद्रसिंह के खेमे की चौकसी फतहसिंह कर रहे हैं, खुद तो दरवाजे के आगे एक चौकी पर बैठे हुए हैं मगर मातहत के सिपाही खेमे के चारों तरफ नंगी तलवारें लिए घूम रहे हैं। कुंअर इंद्रजीतसिंह के खेमे की चौकसी कंचनसिंह और आनंदसिंह के खेमे की हिफाजत नाहरसिंह सिपाहियों के साथ कर रहे हैं।

जब आधी रात से ज्यादे जा चुकी, एक आदमी कुंअर इंद्रजीतसिंह के खेमे के दरवाजे पर आया और कंचनसिंह को सलाम करके पास आ खड़ा हो गया। यह आदमी लंबे कद का और मजबूत मालूम होता था, सिर पर मुंड़ासा बांधे और ऊपर से एक काश्मीरी स्याह चौगा डाले हुए था।

कंचन – तुम कौन हो और क्यों आये हो

आदमी – मैं रोहतासगढ़ किले का रहने वाला हूं और किशोरीजी का संदेशा लेकर आया हूं।

कंचन – क्या संदेशा है

आदमी – हुक्म है कि कुमार के सिवाय और किसी से न कहूं।

कंचन – कुमार तो इस समय सोये हुए हैं!

आदमी – अगर आप मेरा आना जरूरी समझते हो तो मुझे खेमे के अंदर ले चलिए या कुमार को उठाकर खबर कर दीजिये।

कंचन – (कुछ सोचकर) बेशक ऐसी हालत में कुमार को जगाना ही पड़ेगा, कहो, तुम्हारा नाम क्या है

आदमी – मैं अपना नाम नहीं बता सकता मगर कुमार मुझे अच्छी तरह जानते हैं, आप अपने साथ मुझे खेमे के अंदर ले चलिए, आंख खुलते ही मुझे पहचान लेंगे, आपको कुछ कहने की जरूरत न पड़ेगी!

कंचनसिंह उस आदमी को लेकर खेमे के अंदर घुसा, आगे-आगे कंचनसिंह और पीछे-पीछे वह आदमी। जब दोनों खेमे के मध्य में पहुंचे तो उस आदमी ने अपने कपड़े के अंदर से एक भुजाली निकालकर धोखे में पड़े हुए बेचारे कंचनसिंह की गरदन पर पीछे से इस जोर से मारी कि खट से सिर कटकर दूर जा गिरा, बेचारे के मुंह से कोई आवाज तक न निकल पाई। इसके बाद वह भुजाली पोंछ अपनी कमर में रखी और नींद में मस्त सोए हुए कुंअर इंद्रजीतसिंह के पास आकर खड़ा हो गया, कमर से एक शीशी निकाली और बहुत सम्हलकर कुमार की नाक से लगाई। इस शीशी में तेज बेहोशी की दवा थी। कुमार के बेहोश हो जाने के बाद उसने अपनी कमर से एक लोई खोली और उसमें उनकी गठरी बांध दरवाजे पर परदे के पास आकर देखने लगा कि आगे की तरफ सन्नाटा है या नहीं।

इस समय पहरे वाले गश्त लगाते हुए खेमे के पीछे की तरफ निकल गये थे। आगे सन्नाटा पाकर उसने कुमार की गठरी उठाई और खेमे के बाहर हो अपने को बचाता हुआ लश्कर से निकल गया। लश्कर से कुछ दूर पर एक रथ खड़ा था जिसमें दो मजबूत मुश्की रंग के घोड़े जुते हुए थे, कोचवान तैयार बैठा था, गठरी खोलकर कुमार को उसी पर लेटा दिया और खुद भी सवार हो रथ हांकने का हुक्म दिया।
रथ थोड़ी ही दूर गया था कि सारथी को मालूम हो गया कि पीछे कोई सवार आ रहा है। उसने घबड़ाकर अंदर बैठे हुए आदमी से कहा कि कोई सवार बराबर रथ के साथ चला आ रहा है।

रथ और तेज किया गया मगर सवार ने पीछा न छोड़ा। सुबह होते-होते रथ बहुत दूर निकल गया और ऐसी जगह पहुंचा जहां सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था। तब वह सवार घोड़ा बढ़ाकर रथ के बराबर आया और बोला, “बस अब रथ रोक लो!”
सारथी – तुम कौन हो जो तुम्हारे कहने से रथ रोका जाय!

सवार – हम तुम्हारे बाप हैं! बस खबरदार, अब रथ आगे न बढ़ने पावे!!

इस सवार के हाथ में एक बरछी थी। जब सारथी ने उसकी बात न सुनी तो लाचार हो उसने बरछी मारी। चोट खाकर सारथी जमीन पर गिर पड़ा। रथ के घोड़े भड़ककर और तेजी के साथ भागे और पहिया सारथी के ऊपर से होकर निकल गया।
सवार ने घोड़े को बरछी मारी, एक घोड़ा जख्मी होकर गिर पड़ा, दूसरा घोड़ा भी रुक गया। वह आदमी जो रथ के अंदर बैठा था कूदकर तलवार खींचकर सवार के सामने आ खड़ा हुआ। बात की बात में सवार ने उसे भी बेजान कर दिया और घोड़े के नीचे उतर पड़ा। यह सवार नकाबपोश था।

बरछी गाड़कर सवार ने घोड़े को उसके साथ बांध दिया और बड़ी होशियारी से कुंअर इंद्रजीतसिंह को रथ से नीचे उतारा। सड़क के दोनों तरफ घना जंगल था। कुमार को उठाकर जंगल में ले गया और एक सलाई के पेड़ के नीचे रख लौट आया और अपने घोड़े पर सवार हो फिर उसी जगह पहुंचने के बाद कुमार के पास बैठ उनको होश में लाने की फिक्र करने लगा।
सुबह की ठंडी हवा लगने पर कुमार होश में आये और घबड़ाकर उठ बैठे। सवार तलवार खींच सामने खड़ा हो गया। कुमार भी संभलकर खड़े हो गये और बोले –

कुमार – क्या तुम हमें यहां लाये हो?

सवार – नहीं, कोई दूसरा ही आपको लिये जाता था, मैंने छुड़ाया है।

कुमार – (चारों तरफ देखकर) जब तुमने मुझे दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है तो स्वयं तलवार लेकर सामने क्यों खड़े हो गये?

सवार – आपकी बहादुरी और दिलावरी की बहुत कुछ तारीफ सुनी है, लड़ने का हौसला रखता हूं।

कुमार – मेरे पास कोई हरबा न होने पर भी लड़ने को तैयार हूं, वार करो!

सवार – जो आदमी रथ पर सवार करके आपको लिए जाता था उसकी ढाल-तलवार मैं ले आया हूं, (हाथ का इशारा करके) वह देखिए, आपके बगल में मौजूद है, उठा लीजिए और मुकाबला कीजिए। मैं खाली हाथ आपसे लड़ना नहीं चाहता।

कुंअर इंद्रजीतसिंह ढाल-तलवार उठा पैंतरे के साथ उस नकाबपोश सवार के मुकाबिले में खड़े हो गए। थोड़ी देर तक लड़ाई होती रही। कुमार को मालूम हो गया कि यह दुश्मनी के तौर पर नहीं लड़ता। ललकार के बोले, “तुम लड़ते हो या खिलवाड़ करते हो’

सवार – कोई दुश्मनी तो आपसे है नहीं!

कुमार – फिर लड़ने को तैयार क्यों हुए?

सवार – इसलिए कि आपके बदन में जरा फुर्ती आये, बहुत देर तक बेहोश पड़े रहने से रगों में सुस्ती आ गई होगी। अगर आपसे दुश्मनी रहती तो आपको दुश्मन के हाथ से ही क्यों बचाते

कुमार – तो क्या तुम हमारे दोस्त हो?

सवार – मैं यह भी नहीं कह सकता।

कुमार – जरूर तुम हमारे दोस्त हो अगर दुश्मन के हाथ से हमें बचाया।

सवार – क्या इस बारे में आपको कोई शक है कि मैंने आपकी जान बचाई!

कुमार – जरूर शक है। मैं कैसे विश्वास कर सकता हूं कि तुम मुझे यहां लाए हो या कोई दूसरा।

सवार – इसके लिए मैं तीन सबूत दूंगा। एक तो अगर मैं दुश्मन होता तो बेहोशी में आपको मार डालता।

कुमार – बेशक और दो सबूत कौन से हैं?

सवार – जरा ठहरिए, मैं अभी आता हूं तो ये दोनों सबूत भी देता हूं।

इतना कह वह नकाबपोश सवार झट अपने घोड़े पर सवार हुआ और वहां पहुंचा जहां वह रथ था जिस पर कुमार लाए गए थे। एक घोड़ा मरा हुआ पड़ा था, दूसरा बागडोर से बंधा अलग खड़ा था, उस ऐयार की लाश भी उसी जगह पड़ी हुई थी जो कुमार को बेहोश करके उठा लाया था। पीछे की तरफ थोड़ी दूर पर सारथी की लाश थी।

वह नकाबपोश सवार अपने घोड़े से उतर पड़ा और जोर लगाकर किसी तरह उस रथ को उलट दिया जो अभी तक खड़ा था। फिर सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिए उसकी निगाह सारथी की लाश पर पड़ी, वहां गया और उस लाश को घसीट लाकर रथ के पास रख दिया और फिर कुछ सोचकर धीरे से बोला, “अब कुमार नहीं समझ सकते कि उनका लश्कर किधर है और वे किस तरफ से लाए गए, उन्हें धोखे में डालकर अपनी और उनकी किस्मत का अंदाजा लेना चाहिए।” इसके बाद वह सवार फिर अपने घोड़े पर चढ़ा और वहां पहुंचा जहां कुमार उसकी राह देख रहे थे।

कुमार – तुम कहां गए थे?

सवार – एक आदमी की खोज में गया था मगर वह नहीं मिला।

कुमार – खैर तुम अपनी सचाई के लिए और सबूत देने वाले थे!

सवार घोड़े पर से उतर पड़ा और कुमार से बोला, “आप घोड़े पर सवार हो लीजिए और मेरे साथ चलिए।” मगर कुमार ने मंजूर न किया। सवार ने भी घोड़े की लगाम थामी और पैदल कुमार को लिए हुए उस रथ के पास पहुंचा और सब हाल कहकर बोला, “देखिए इसी रथ पर आप लाए गए, यही बदमाश आपको लाया है, और यह दूसरा सारथी है। मैं इत्तिफाक से आपके पास मिलने के लिए जा रहा था जो आपके काम आया। अब उस रथ का एक घोड़ा जो बचा हुआ है उसी पर आप सवार होकर लश्कर में चले जाइए!”

कुमार – बेशक तुमने मेरी जान बचाई, इसका अहसान कभी न भूलूंगा।

सवार – क्या इसका अहसान आप मानते हैं!

कुमार – जरूर।

सवार – तो आप कुछ देकर इस अहसान का बोझ अपने ऊपर से उतार दीजिए।

कुमार – बड़ी खुशी के साथ मैं ऐसा करने को तैयार हूं, जो कहो दूं।

सवार – इस समय तो मैं आपसे कुछ नहीं ले सकता, मगर आप वादा करें तो जरूरत पड़ने पर आपसे कुछ मांगूं और मदद लूं!

कुमार – मैं वादा करता हूं कि जो कुछ मांगोगे दूंगा, जब चाहे ले लो।

सवार – देखिए फिर बदल न जाइएगा।

कुमार – कभी नहीं, यह क्षत्रियों का धर्म नहीं।

सवार – अच्छा अब एक सबूत और देता हूं कि बिना आपको किसी तरह का कष्ट दिये अपने घर चला जाता हूं।

कुमार – तुम अपने चेहरे पर से नकाब तो हटाओ जिससे तुमको पहचान रखूं।

सवार – यह बात तो जरूरी है।

इतना कहकर सवार ने चेहरे पर से नकाब उलट दी और कुमार को हैरत में डाल दिया क्योंकि वह एक हसीन और नौजवान औरत थी।
बेशक सिवाय किशोरी के ऐसी हसीन औरत कुमार ने कभी नहीं देखी थी। उसने अपनी तिरछी चितवन से कुमार के दिल का शिकार कर लिया और उनकी बंधी हुई टकटकी की तरफ कुछ खयाल न कर उन्हें उसी तरह छोड़ सड़क से नीचे उतर जंगल का रास्ता लिया।

उसके चले जाने के बाद थोड़ी देर तक तो कुमार उसी तरफ देखते रहे जिधर वह घोड़े पर सवार होकर गई थी, इसके बाद रथ और सड़क की तरफ देखा फिर उस घोड़े के पास गये जो रथ के दोनों घोड़ों में से जीता मौजूद था। उसकी पीठ पर जो कुछ असबाब था खोल दिया सिर्फ लगाम रहने दी और नंगी पीठ पर सवार हो उसी तरफ का रास्ता लिया जिधर वह नकाबपोश औरत उनके देखते-देखते चली गई थी।

भूखे-प्यासे दोपहर तक घोड़ा दौड़ाते चले गये मगर उस औरत का पता न लगा कि किधर गई और क्या हुई। भूख और प्यास से परेशान हो गये और इस फिक्र में पड़े कि कहीं ठंडा पानी मिले तो प्यास बुझावें मगर इस जंगल में कहीं किसी सोते या झरने का पता न लगा, लाचार वह आगे बढ़ते ही गये और शाम होते तक एक ऐसे मैदान से पहुंचे जिसके चारों तरफ तो घना जंगल था मगर बीच में सुंदर साफ जल में लहराता हुआ एक अनूठा तालाब था।

कुंअर इंद्रजीतसिंह उस विचित्र तालाब को देख बड़े ही विस्मित हुए और एकटक उसकी तरफ देखने लगे। इस तालाब के बीचोंबीच एक खूबसूरत छोटा-सा मकान बना हुआ था जिसके चारों तरफ सहन था और चारों कोनों में चार औरतें तीर-कमान चढ़ाये मुस्तैद थीं, मालूम होता था कि ये अभी तीर छोड़ा ही चाहती हैं। मकान की छत पर एक छोटे-से चबूतरे पर भी एक औरत दिखाई पड़ी जिसका सिर नीचे और पैर आसमान की तरफ थे। बड़ी देर तक देखने के बाद मालूम हुआ कि ये औरतें जानदार नहीं हैं बल्कि बनावटी हैं जिन्हें पुतली कहना मुनासिब है। एक छोटी-सी डोंगी भी उसी चबूतरे के साथ रस्सी के सहारे बंधी हुई थी जिससे मालूम होता था कि इस मकान में जरूर कोई रहता है जिसके आने-जाने के लिए यह डोंगी मौजूद है।

कुमार घोड़े की लगाम एक पत्थर से अटकाकर तालाब के नीचे उतरे, हाथ-मुंह धो जल पिया और कुछ सुस्ताने के बाद फिर उसी मकान की तरफ देखने लगे क्योंकि कुमार का इरादा हुआ कि तैरकर उस मकान तक जायं और देखें कि उसमें क्या है।

सूर्य अस्त होते-होते एक औरत उस मकान के अंदर से निकली और सहन पर खड़ी हो कुमार की तरफ देखने लगी, इसके बाद हाथ के इशारे से कहा कि यहां से चले जाओ। कुमार ने उस औरत को साफ पहचान लिया कि यह वही नकाबपोश सवार है जिसने कुमार को रथ पर ले जाते हुए ऐयार के हाथ से बचाया था।

बयान – 10 

कुछ रात जा चुकी है। रोहतासगढ़ किले के अंदर अपने मकान में बैसठी हुई बेचारी किशोरी न मालूम किस ध्यान में डूबी हुई है और क्या सोच रही है। कोई दूसरी औरत उसके पास नहीं है। आखिर किसी के पैर की आहट पा अपने खयाल में डूबी हुई किशोरी ने सिर उठाया और दरवाजे की तरफ देखने लगी। लाली ने पहुंचकर सलाम किया और कहा, “माफ कीजियेगा, मैं बिना हुक्म के इस कमरे में आई हूं।”
किशोरी – मैंने लौंडियों को हुक्म दे रखा है कि इस कमरे में कोई न आने पावे मगर साथ ही इसके यह भी कह दिया था कि लाली आने का इरादा करे तो उसे मत रोकना।

लाली – बेशक आपने मेरे ऊपर बड़ी मेहरबानी की।

किशोरी – मगर न मालूम तुम मेरे ऊपर दया क्यों नहीं करतीं! आओ बैठो।

लाली – (बैठकर) आप ऐसा न कहें, मैं जी-जान से आपके काम आने को तैयार हूं।

किशोरी – ये सब बनावटी बातें करती हो। अगर ऐसा ही होता तो अपना और कुंदन वाला भेद मुझसे क्यों छिपातीं नारंगी वाले भेद से तो मैं पहले ही हैरान हो रही थी मगर जब से कुंदन ने अपनी बातों का असर तुम पर डाला है तब से मेरी घबराहट और भी बढ़ गई है।
लाली – बेशक आपको बहुत कुछ ताज्जुब हुआ होगा। मैं कसम खाकर कह सकती हूं कि कुंदन ने उस समय जो मुझे कहा था या कुंदन की जिन बातों को सुनकर मैं डर गई थी वह उसे पहले से मालूम न थीं, अगर मालूम होतीं तो जिस समय मैंने नारंगी दिखाकर उसे धमकाया था उसी समय वह मुझसे बदला ले लेती। अब मुझे विश्वास हो गया कि इस मकान में कोई बाहर का आदमी जरूर आया है जिसने हमारे भेद से कुंदन को होशियार कर दिया। अफसोस, अब मेरी जान मुफ्त में जाया चाहती है क्योंकि कुंदन बड़ी ही बेरहम और बदकार औरत है।

किशोरी – तुम्हारी बातें मेरी घबड़ाहट को बढ़ा रही हैं, कृपा करके कुछ कहो तो सही, क्या भेद है

लाली – मैं बिल्कुल हाल आपसे कहूंगी और आपकी चिंता दूर करूंगी मगर आज रात भर आप मुझे और माफ कीजिये और इस समय एक काम में मेरी मदद कीजिए।

किशोरी – वह क्या

लाली – यह तो मुझे विश्वास हो ही गया कि अब मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती, तो भी अपने बचने के लिए मैं कोई-न-कोई उद्योग जरूर करूंगी। मैं चाहती हूं कि अपने मरने के पहले ही कुंदन को इस दुनिया से उठा दूं मगर एक ऐसी अंड़स में पड़ गई हूं कि ऐसा करने का इरादा भी नहीं कर सकती, हां कुंदन का कुछ विशेष हाल जानना चाहती हूं और इसके बाद बाग के उस कोने वाले मकान में घुसा चाहती हूं जिसमें हरदम ताला बंद रहता है और दरवाजे पर नंगी तलवार लिए दो औरतें बारी-बारी से पहरा दिया करती हैं। इन्हीं दोनों कामों में मैं आपसे मदद लिया चाहती हूं।

किशोरी – उस मकान में क्या है, तुम्हें कुछ मालूम है

लाली – हां, कुछ मालूम है और बाकी भेद जानना चाहती हूं। मुझे विश्वास है कि अगर आप भी मेरे साथ उस मकान के अंदर चलेंगी और हम दोनों आदमी किसी तरह बचकर निकल आवेंगे तो फिर आपको भी इस कैद से छुट्टी मिल जायगी, मगर उसके अंदर जाना और बचकर निकल आना यही मुश्किल है।

किशोरी – यह और ताज्जुब की बात तुमने कही, खैर ऐसी जिंदगी से मैं मरना उत्तम समझती हूं। जो कुछ तुम्हें करना हो करो और जिस तरह की मदद मुझसे लिया चाहती हो लो।

लाली – (एक छोटी-सी तस्वीर कमर से निकाल और किशोरी के हाथ में देकर) थोड़ी देर बाद मामूली तौर पर कुंदन जरूर आपके पास आवेगी, उस समय यह तस्वीर ऐसे ढंग से उसे दिखाइए जिससे उसे यह न मालूम हो कि आप जान-बूझकर दिखा रही हैं, फिर उसके चेहरे की जैसी रंगत हो या जो कुछ वह कहे मुझसे कहिए। इस समय तो यही एक काम है।

किशोरी – यह काम मैं बखूबी कर सकूंगी।

किशोरी ने लाली के हाथ से तस्वीर लेकर पहले खुद देखी। इस तस्वीर में एक खोह की हालत दिखाई गई थी जिसमें एक आदमी उलटा लटक रहा था और एक औरत हाथ में छुरा लिए उसके बदन में घाव लगा रही थी, पास में एक कमसिन औरत खड़ी थी और कोने की तरफ कब्र खोदी जा रही थी।

पाठक, यह तस्वीर ठीक उस समय की थी जिसका हाल हम पहले भाग के आठवें बयान में लिख आये हैं, मगर यह हाल किशोरी को अभी तक मालूम नहीं हुआ था। किशोरी उस तस्वीर को देखकर बहुत ही हैरान हुई और उसके बारे में लाली से कुछ पूछना चाहा। मगर लाली तस्वीर देने के बाद वहां न ठहरी, तुरंत बाहर चली गई।

लाली के जाने के थोड़ी ही देर बाद कुंदन आ पहुंची मगर उस समय किशोरी उस तस्वीर को देखने में अपने को यहां तक भूली हुई थी कि कुंदन का आना उसे तब मालूम हुआ जब उसने पास आकर कुछ देर तक खड़े रहकर पूछा, “कहो बहिन, क्या देख रही हो’

किशोरी – (चौंककर) हैं! तुम यहां कब से खड़ी हो?

कुंदन – कुछ देर से। इस तस्वीर में कौन-सी ऐसी बात है जिसे तुम बड़े गौर से देख रही हो।

किशोरी – तुमने इस तस्वीर को देखा है?

कुंदन – सैकड़ों दफे। मैं समझती हूं कि यह तस्वीर तुम्हें लाली ने खास मुझे दिखाने के लिए दी है। आप लाली से कह दीजिएगा कि मैं इस तस्वीर को देखकर नहीं डर सकती। मैं बिना बदला लिए कभी न छोडूंगी क्योंकि जिस दिन पहले-पहल रात को आपसे मुलाकात हुई थी उस दिन यहां से मेरे निकल जाने का सामान बिल्कुल ठीक था, इसी लाली ने मेरे उद्योग को मिट्टी कर दिया और मेरे मददगारों को भी फंसा दिया, खैर देखा जायगा। मैं आपके मिलने से प्रसन्न थी मगर अफसोस, उसने झूठी बात गढ़कर आपका दिल भी मेरी तरफ से फेर दिया। तो भी मैं आपके साथ बुराई न करूंगी और जहां तक हो सकेगा उसकी चालबाजियों से आपको होशियार कर दूंगी, मानने-न-मानने का आपको अख्तियार है।

किशोरी – मेरी समझ में कुछ नहीं आता कि क्या हो रहा है। हे ईश्वर, मैंने क्या अपराध किया था कि चारों तरफ से संकट ने आकर घेर लिया! हाय, मैं बिल्कुल नहीं जान सकती कि कौन मेरा दोस्त हे और कौन दुश्मन!

इतना कह किशोरी रोने लगी, उसने अपने को बहुत संभालना चाहा मगर न हो सका, हिचकियों ने उसका गला दबा दिया। कुंदन किशोरी के पास बैठ गई और उसका हाथ अपने दोनों हाथों में दबाकर बोली –

“प्यारी किशोरी, यह समझना तो बहुत मुश्किल है कि यहां आपका दोस्त कौन है। बात बनाकर दोस्ती साबित करना भूल है तिसमें दुश्मन के घर में, हां, यह मैं जरूर साबित कर दूंगी कि लाली आपसे दुश्मनी रखती है। लाली ने आपसे जरूर कहा होगा कि आपकी तरह मैं भी कुमार के साथ ब्याह करने के लिए लाई गई हूं मगर नहीं, यह बात बिल्कुल झूठ है। असल तो यह है कि लाली मुझको बिल्कुल नहीं जानती और न मैं जानती हूं, कि लाली कौन है मगर आजकल लाली जिस फिक्र में पड़ी है उससे मैं समझती हूं कि वह आपके साथ दुश्मनी कर रही है। ताज्जुब नहीं कि वह आपको एक दिन उस मकान में ले जाय जिसका ताला बराबर बंद रहता है और जिसके दरवाजे पर नंगी तलवार का पहरा पड़ा रहता है क्योंकि आजकल वह वहां पहरा देने वाली औरतों से दोस्ती बढ़ा रही है और ताला खोलने के लिए एक ताली तैयार कर रही है। उसकी दुश्मनी का अंत उसी दिन होगा जिस दिन वह आपको उस मकान के अंदर कर देगी, फिर आपकी जान किसी तरह नहीं बच सकती। उसका ऐसा करना केवल आप ही के साथ दुश्मनी करना नहीं बल्कि यहां के राजा और इस राज्य के साथ भी दुश्मनी करना है। बेशक वह आपको उस मकान के अंदर भेजेगी और आप उस चौखट के अंदर पैर भी न रखेंगी।”

किशोरी – उस मकान के अंदर क्या है?

कुंदन – सो मैं नहीं जानती।

किशोरी – यहां का कोई आदमी जानता है?

कुंदन – कोई नहीं, बल्कि जहां तक मैं खयाल करती हूं, यहां का राजा भी उसके अंदर का हाल नहीं जानता।

किशोरी – क्या मकान कभी खोला नहीं जाता?

कुंदन – मेरे सामने तो कभी खोला नहीं गया।

किशोरी – फिर कैसे कह सकती हो कि उसके अंदरन जाकर कोई बच नहीं सकता?

कुंदन – इसका जानना तो कोई मुश्किल नहीं है। पहले तो यही सोचिए कि वहां हरदम ताला बंद रहता है, अगर कोई चोरी से भीतर गया भी तो निकलने का मौका मुश्किल से मिलेगा, फिर हम लोगों को उसके अंदर जाकर फायदा ही क्या होगा आपने देखा होगा, उस दरवाजे के ऊपर लिखा है कि – ‘इसके अंदर जो जायगा उसका सिर आपसे आप कटकर गिर पड़ेगा’! जो हो मगर यह सब होते हुए भी लाली आपको उस मकान के अंदर जरूर भेजना चाहेगी।

किशोरी – खैर, इस तस्वीर का हाल अगर तुम जानती हो तो कहो।

कुंदन – कहती हूं सुनो-जब कुंअर इंद्रजीतसिंह को धोखा देकर माधवी ले गई तो उनके छोटे भाई आनंदसिंह उनकी खोज में निकले। एक मुसलमानी ने उन्हें धोखा देकर गिरफ्तार कर लिया और उनके साथ शादी करनी चाही मगर उन्होंने मंजूर न किया और तीन दिन भूखे उसके यहां कैद रह गये। आखिर उन्हीं के ऐयार देवीसिंह ने उस कैद से उनको छुड़ाया मगर उन्हें अभी तक मालूम नहीं है कि उन्हें देवीसिंह ने छुड़ाया था।

इसके बाद उस तस्वीर के बारे में जो कुछ आनंदसिंह ने देखा – सुना था कुंदन ने वहां तक कह सुनाया जब आनंदसिंह बेहोश करके उस खोह के बाहर निकाल दिये गये बल्कि घर पहुंचा दिये गये।

किशोरी – यह सब हाल तुम्हें कैसे मालूम हुआ?

कुंदन – मुझसे देवीसिंह ने कहा था।

किशोरी – देवीसिंह से तुमसे क्या संबंध?

कुंदन – जान-पहचान है। आपने इस तस्वीर के बारे में लाली से कुछ सुना है या नहीं?

किशोरी – कुछ नहीं।

कुंदन – पूछिये, देखें क्या कहती है! अच्छा, अब मैं जाती हूं, फिर मिलूंगी।

किशोरी – जरा ठहरो तो।

कुंदन – अब मत रोको, बेमौका हो जायगा। मैं फिर बहुत जल्द मिलूंगी।

कुंदन चली गई मगर किशोरी पहले से भी ज्यादे सोच में पड़ गई। कभी तो उसका दिल लाली की तरफ झुकता और उसको अपने दुख का साथी समझती, कभी सोचते-सोचते लाली की बातों में शक पड़ जाने पर कुदंन ही को सच्ची समझती। उसका दिल दोनों तरफ के खिंचाव में पड़कर बेबस हो रहा था, वह ठीक निश्चय नहीं कर सकती थी कि अपना हमदर्द लाली को बनावे या कुंदन को क्योंकि लाली और कुंदन दोनों अपने असली भेदों को किशोरी से छिपा रही थीं।

उस दिन लाली ने फिर मिलकर किशोरी से पूछा, “उस तस्वीर को देखकर कुंदन की क्या दशा हुई’ जिसके जवाब में किशोरी ने कहा, “कुंदन ने उस तस्वीर की तरफ ध्यान भी न दिया और मेरे खुद पूछने पर कहा, मैं नहीं जानती यह तस्वीर कैसी है और न इसे कभी मैंने पहले देखा ही था।”

यह सुनकर लाली का चेहरा कुछ उदास हो गया और वह किशोरी के पास से उठकर चली गई। किशोरी ने कहा, “भला तुम ही बताती जाओ कि यह तस्वीर कैसी है’ मगर लाली ने इसका कुछ जवाब न दिया और चली गई।

इस बात को कई दिन बीत गये। लश्कर से कुंअर इंद्रजीतसिंह के गायब होने का हाल भी चारों तरफ फैल गया जिसे सुन धीरे-धीरे किशोरी की उदासी और भी ज्यादे बढ़ गई।

एक दिन रात को अपनी पलंगड़ी पर लेटी हुई किशोरी तरह-तरह की बातें सोच रही थी, लाली और कुंदन के बारे में भी गौर कर रही थी। यकायक वह उठ बैठी और धीरे-से आप ही बोली, ‘अब मुझे खुद कुछ करना चाहिए, इस तरह पड़े रहने से काम नहीं चलता। मगर अफसोस, मेरे पास कोई हरबा भी तो नहीं है।’

किशोरी पलंग के नीचे उतरी और कमरे में इधर-उधर टहलने लगी, आखिर कमरे के बाहर निकली। देखा कि पहरेदार लौंडियां गहरी नींद में सो रही हैं। आधी रात से ज्यादे जा चुकी थी, चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था। धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई कुंदन के मकान की तरफ बढ़ी। जब पास पहुंची तो देखा कि एक आदमी काले कपड़े पहने उसी तरफ लपका हुआ जा रहा है बल्कि उस कमरे के दालान में पहुंच गया जिसमें कुंदन रहती है। किशोरी एक पेड़ की आड़ में खड़ी हो गई, शायद इसलिए कि वह आदमी लौटकर चला जाय तो आगे बढ़ूं।

थोड़ी देर बाद कुंदन भी उसी आदमी के साथ बाहर निकली और धीरे-धीरे बाग के उस तरफ रवाना हुई जिधर घने दरख्त लगे हुए थे। जब दोनों उस पेड़ के पास पहुंचे जिसकी आड़ में किशोरी छिपी हुई थी तब वह आदमी रुका और धीरे से बोला –

आदमी – अब तुम जाओ, ज्यादे दूर तक पहुंचाने की कोई जरूरत नहीं।

कुंदन – फिर भी मैं कहे देती हूं कि अब पांच-सात दिन ‘नारंगी’ की कोई जरूरत नहीं।

आदमी – खैर, मगर किशोरी पर दया बनाये रखना।

कुंदन – इसके कहने की कोई जरूरत नहीं।

वह आदमी पेड़ों के झुंड की तरफ चला गया और कुंदन लौटकर अपने कमरे में चली गई। किशोरी भी फिर वहां न ठहरी और अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही क्योंकि उन दोनों की बातों ने जिसे किशोरी ने अच्छी तरह सुना था उसे परेशान कर दिया और वह तरह-तरह की बातें सोचने लगी, मगर अपने दिल का हाल किससे कहे इस लायक वहां कोई भी न था।

पहले तो किशोरी बनिस्बत कुंदन के लाली को सच्ची और नेक समझती थी मगर अब वह बात न रही। किशोरी उस आदमी के मुंह से निकली हुई उस बात को फिर याद करने लगी कि ‘किशोरी पर दया बनाये रखना।’

वह आदमी कौन था इस बाग में आना और यहां से निकलकर जाना तो बड़ा ही मुश्किल है, फिर वह क्योंकर आया! उस आदमी की आवाज पहचानी हुई-सी मालूम होती है, बेशक मैं उससे कई दफे बातें कर चुकी हूं, मगर कब और कहां, सो याद नहीं पड़ता और न उसकी सूरत का ध्यान बनता है। कुंदन ने कहा था, ‘पांच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।’ इससे मालूम होता है कि नारंगी वाली बात कुछ उस आदमी से संबंध रखती है और लाली उस भेद को जानती है। इस समय तो यह निश्चय हो गया कि कुंदन मेरी खैरख्वाह है और लाली मुझसे दुश्मनी किया चाहती है मगर इसका भी विश्वास नहीं होता। कुछ भेद खुला मगर इससे तो और भी उलझन हो गई। खैर कोशिश करूंगी तो कुछ और भी पता लगेगा मगर अबकी लाली का हाल मालूम करना चाहिए।

थोड़ी देर तक इन सब बातों को किशोरी सोचती रही, आखिर फिर अपने पलंग से उठी और कमरे के बाहर आई। उसकी हिफाजत करने वाली लौंडियां उसी तरह गहरी नींद में सो रही थीं। जरा रुककर बाग के उस कोने की तरफ बढ़ी जिधर लाली का मकान था। पेड़ों की आड़ में अपने को छिपाती और रुक-रुककर चारों तरफ की आहट लेती हुई चली जाती थी, जब लाली के मकान के पास पहुंची तो धीरे-धीरे किसी की बातचीत की आहट पा एक अंगूर की झाड़ी में रुक रही और कान लगाकर सुनने लगी, केवल इतना ही सुना, “आप बेफिक्र रहिये, जब तक मैं जीती हूं कुंदन किशोरी का कुछ बिगाड़ नहीं सकती ओैर न उसे कोई दूसरा ले जा सकता है। किशोरी इंद्रजीतसिंह की है और बेशक उन तक पहुंचाई जायेगी।”
किशोरी ने पहचान लिया कि यह लाली की आवाज है। लाली ने यह बात बहुत धीरे से कही थी मगर किशोरी बहुत पास पहुंच चुकी थी इसलिए बखूबी सुनकर पहचान सकी कि लाली की आवाज है मगर यह न मालूम हुआ कि दूसरा आदमी कौन है। लाली अपने कमरे के पास ही थी बात कहकर तुरंत दो-चार सीढ़ियां चढ़ अपने कमरे में घुस गई और उसी जगह से एक आदमी निकलकर पेड़ों की आड़ में छिपता हुआ बाग के पिछली तरफ जिधर दरवाजे में बराबर ताला बंद रहने वाला मकान था चला गया, मगर उसी समय जोर-जोर से “चोर-चोर” की आवाज आई। किशोरी ने आवाज को भी पहचानकर मालूम कर लिया कि कुंदन है जो उस आदमी को फंसाया चाहती है। किशोरी फौरन लपकती हुई अपने कमरे में चली आई और चोर-चोर की आवाज बढ़ती ही गई।

किशोरी अपने कमरे में आकर पलंग पर लेट रही और उन बातों पर गौर करने लगी जो अभी दो-तीन घंटे के हेर-फेर में देख-सुन चुकी थी। वह मन ही मन में कहने लगी, ‘कुंदन की तरफ भी गई और लाली की तरफ भी गई जिससे मालूम हो गया कि वे दोनों ही एक-एक आदमी से जान-पहचान रखती हैं जो बहुत छिपकर इस मकान में आता है। कुंदन के साथ जो आदमी मिलने आया था उसकी जुबानी जो कुछ मैंने सुना उससे जाना जाता था कि कुंदन मुझसे दुश्मनी नहीं रखती बल्कि मेहरबानी का बर्ताव किया चाहती है, इसके बाद जब लाली की तरफ गई तो वहां की बातचीत से मालूम हुआ कि लाली सच्चे दिल से मेरी मददगार है और कुंदन शायद दुश्मनी की निगाह से मुझे देखती है। हां ठीक है, अब समझी बेशक ऐसा ही होगा। नहीं-नहीं मुझे कुंदन की बातों पर विश्वास न करना चाहिए! अच्छा देखा जायेगा। कुंदन ने बेमौके चोर-चोर का शोर मचाया, कहीं ऐसा न हो कि बेचारी लाली पर कोई आफत आवे।’

इन्हीं सब बातों को सोचती हुई किशोरी ने बची हुई थोड़ी-सी रात जागकर ही बिता दी और सुबह की सफेदी फैलने के साथ ही अपने कमरे के बाहर निकली क्योंकि रात की बातों का पता लगाने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा था।

किशोरी जैसे ही दालान में पहुंची, सामने से कुंदन को आते हुए देखा। कुंदन ने पास आकर सलाम किया और कहा, “रात का कुछ हाल मालूम है या नहीं’

किशोरी – सब-कुछ मालूम है! तुम्हीं ने तो गुल मचाया था!

कुंदन – (ताज्जुब से) यह कैसी बात कहती हो?

किशोरी – तुम्हारी आवाज साफ मालूम होती थी।

कुंदन – मैं तो चोर-चोर का गुल सुनकर वहां पहुंची थी और उन्हीं की तरह खुद भी चिल्लाने लगी थी।

किशोरी – (हंसकर) शायद ऐसा ही हो।

कुंदन – क्या इसमें आपको कोई शक है?

किशोरी – बेशक। लो यह लाली भी आ रही है।

कुंदन – (कुछ घबड़ाकर) जो कुछ किया उन्होंने किया।

इतने में लाली भी आकर खड़ी हो गई और कुंदन की तरफ देखकर बोली, “आपका वार खाली गया।”

कुंदन – (घबड़ाकर) मैंने क्या…

लाली – बस रहने दीजिये, आपने मेरी कार्रवाई कम देखी होगी मगर दो घंटे पहले मैं आपकी पूरी कार्रवाई मालूम कर चुकी थी।

कुंदन – (बदहवास होकर) आप तो कसम खा…

लाली – हां-हां, मुझे खूब याद है, मैं उसे नहीं भूलती।

किशोरी – जो हो, मुझे अब पांच-सात दिन तक नारंगी की कोई जरूरत नहीं।

किशोरी की इस बात ने लाली और कुंदन दोनों को चौंका दिया। लाली के चेहरे पर कुछ हंसी थी मगर कुंदन के चेहरे का रंग बिल्कुल ही उड़ गया था क्योंकि उसे विश्वास हो गया कि किशोरी ने भी रात की कुल बातें सुन लीं। कुंदन की घबराहट और परेशानी यहां तक बढ़ गई कि किसी तरह अपने को सम्हाल न सकी और बिना कुछ कहे वहां से उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई। अब लाली और किशोरी में बातचीत होने लगी –

लाली – मालूम होता है तुमने भी रात भर ऐयारी की!

किशोरी – हां, मैं कुंदन की तरफ छिपकर गई थी।

लाली – तब तो तुम्हें मालूम हो गया होगा कि कुंदन तुम्हें धोखा दिया चाहती है।

किशोरी – पहले तो यह साफ नहीं जान पड़ता था मगर जब तुम्हारी तरफ गई और तुमको किसी से बातें करते सुना तो विश्वास हो गया कि इस महल में केवल तुम्हीं से मैं कुछ भलाई की उम्मीद कर सकती हूं।

लाली – ठीक है, कुंदन की कुल बातें तुमने नहीं सुनीं, क्या मुझसे भी…(रुककर) खैर जाने दीजिये। हां, अब वह समय आ गया कि तुम और हम दोनों यहां से निकल जायें। क्या तुम मुझ पर विश्वास रखती हो.

किशोरी – बेशक, तुमसे मुझे नेकी की उम्मीद है, मगर कुंदन बहुत बिगड़ी हुई मालूम होती है।

लाली – वह मेरा कुछ नहीं कर सकती।

किशोरी – अगर तुम्हारा हाल किसी से कह दे तो

लाली – अपनी जुबान से वह नहीं कह सकती, क्योंकि वह मेरे पंजे में उतना ही फंसी हुई है जितना मैं उसके पंजे में।

किशोरी – अफसोस! इतनी मेहरबानी रहने पर भी तुम वह भेद मुझसे नहीं कहतीं

लाली – घबड़ाओ मत, धीरे-धीरे सब-कुछ मालूम हो जाएगा।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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