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कभी अंबाला आना तो माल रोड आइयेगा । यहाँ खड़ा है एक बहुत पुराना, हवेलीनुमा, अभिशप्त सा मकान। राह पर जाते वक्त की झोली से जैसे गिरा हो और पड़ा रह गया हो सड़क किनारे।
इस मकान में एक किराएदार होता था, जो यहाँ इस शान और ठसक से रहता था साहब कि क्या कोई मकान मालिक रहेगा। ये आदमी हिन्दी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से एक था । लेकिन समय के मसखरेपन की क्या कहिये ! पहले यह शख्स साहित्य के परिदृश्य से गायब हुआ और फिर एक मनहूस दिन सुबह जो टहलने निकला तो लौट कर नहीं आया।।
कहाँ गये स्वदेश ? जमीन खा गयी या आसमान निगल गया । ऐसे कैसे कोई एक सुबह उठकर अपने आज की ओर पीठ कर एक अनिश्चित कल के कोहरे में गुम होने के लिये जा सकता है । क्या उसके घर गृहस्थी ने उसको आवाज न दी होगी ?
दी होगी, लेकिन उस सुबह छोटे छोटे सफरों से उकताये स्वदेश ने फैसला किया होगा कि एक ऐसे सफर पर चलें, जिसकी मंजिल ही न हो।
स्वदेश का पी जी आई, चंडीगढ़ में लंबा इलाज चला था। वहां के मानसिक रोग विशेषज्ञ ने कहा भी था कि उसकी कहानियों में साफ संकेत हैं कि इनका रचयिता एक न एक दिन भारी अवसाद का शिकार होने वाला है ।
सच भी है, ध्यान से स्वदेश की कहानियों को पढें तो आप पायेंगे कि हिन्दी का यह सनकी बेटा न जाने कब से सामान्य और असामान्य को अलग करने वाली बारीक सी रेखा पर बैठा लिख रहा था।
स्वदेश असामान्य का चितेरा थे , उनकी कहानियाँ मन के मायावी गलियारों में घटती थीं । वे अँधेरे अवचेतन के कोने खुदरों की कथा कहते थे। ऐसी अँधेरी राहों पर चलते, गुम हो जाने का खतरा तो रहता ही है ।
वही हुआ।
मगर उसकी कहानी कभी और सही । मेरे सर्वाधिक प्रिय तीन लेखक हैं, स्वदेश दीपक, भुवनेश्वर और राजकमल चौधरी । स्वदेश की कहानी ” पापी पेट ” लिटल मैगजीन में ” हंगर ” के नाम से उपलब्ध थी, जो मैंने न जाने कितने लोगों को पढवाई । स्वदेश की कलम की ताकत देखें कि अंग्रेजी में अनुवादित होने के बावजूद यह कहानी अपना असर खोती नहीं थी । भाषा का अतिक्रमण करने वाली इस कथा को आचार्य ( राजीव जी ) न जाने कहाँ से खोज लाये हैं ।
यह कथा नहीं, एक दु:स्वप्न है। अपने रिस्क पर प्रवेश करें – गजानन रैना

वह एक भूखे कुत्ते की तरह शिस्त बाँधकर, टकटकी लगाकर, पिछले कई मिनटों से उस छोले-कुलचे खा रहे आदमी को देख रहा है. उस आदमी का हाथ छोटी थाली जितना बड़ा है, जिस पर उसने छोलों का पत्ता टिका रखा है. वह गाड़ी के डिब्बे की खिड़की के पास ही किसी स्प्रिंग की तरह जिस्म को तानकर खड़ा है. सात साल की आयु में ही लगातार भूख ने उसे चौकस, चौकन्ना और मौका शिनास बना दिया है. लड़के ने पहले से ही उस कोण का अंदाजा लगा लिया, उस दूरी को आँखों-आँखों में माप लिया, जहाँ वह आदमी पत्ता गिराएगा.

उस आदमी की निगाह एक क्षण के लिए लड़के की भूखी और प्रतीक्षारत आँखों से मिल गयी. शायद उसे पाप अथवा घृणा का अहसास हुआ. उसने और तेजी के साथ छोले-कुलचे खाने शुरु कर दिये. कुलचे की एक टूटती गिराही जब-जब उस आदमी के मुँह में जाती थी, तब-तब लड़के के दिल में जैसे चाकू का एक-एक घाव हो जाता. उस आदमी ने कुलचे खत्म कर दिये, लंबी सी उँगली को पत्ते पर फेरकर सारे छोले एक किनारे पर ले आया और पत्ते के दोनों किनारों को मोड़कर उसने हाथ ऊपर उठाकर सारे छोले मुँह में डाल लिये. लड़के का दिल बिल्कुल बैठ गया. हाथ लंबा करके उस आदमी ने पत्ता प्लेटफॉर्म पर फेंका. एक झटके के साथ वह पीठ मोड़कर बैठ गया. शायद लड़के की भूखी आँखों की ताब लाना उसके लिये कठिन हो गया था.

लड़के के जिस्म का स्प्रिंग और कस गया. उसने छोटी-सी छलाँग लगाकर पत्ता उठा लिया. थनों का थोड़ा-सा पानी पत्ते पर लगा हुआ था. किसी छिपकली की तरह बड़ी तेजी से जबान बाहर अंदर करते हुए उसने पत्ता चाट डाला. एक लंबी सीटी की आवाज हुई. स्टेशन की छत के अंदर बैठे सैकड़ों पक्षी कांय-कांय की आवाजों के साथ छोटे-छोटे दायरों में उड़े और गाड़ी मरियल गति से प्लेटफॉर्म पर से सरक गयी.

रोज की तरह लड़का छोले-कुलचों वालों की रेहड़ी के पास जा ठहरा. वह जूठी प्लेटें और गिलास धोएगा,बाल्टी में साफ पानी भर लाएगा और रेहड़ीवाला उसे एक कुलचा देगा. अब लड़का अपने एक पाँव से दूसरी टाँग खुजलाता हुआ छोलेवाले को देखे जा रहा है. वह कुछ बोलता नहीं. दुकानदार को पता है कि लड़का पास खड़ा है, लेकिन वह चाहता है कि लड़का अपने आप वहाँ से चला जाए. आखिर खीझकर बोला – ‘भाग जा कुछ नहीं मिलने का.’

लड़का सिर झुकाए अपने स्थान पर खड़ा है।

‘सुना नहीं! कानों में रुई डाल रखी है क्या? सारी गाड़ी में सिर्फ दो सवारियों ने कुलचे-छोले लिए, बरतन कौन से तू धोएगा।

लड़के का सिर कुछ और झुक गया है।

‘ओए माँ दे यार! भागता है कि दूँ एक हाथ!’ लड़के ने सिर उठाकर उसे देखा। उसे पता है किस सीमा पर आकार लोगों का सब्र टूट जाया करता है। और फिर वे उसे पीट दिया करते हैं। वह बड़े थके हुए कदमों से आगे बढ़ गया।

स्टेशन पर लगी हुई बत्तियाँ जल उठीं। लड़के को पता चल गया अब रात हो गई है, घर लौटना चाहिए। लेकिन अभी उसने दो जगह और जाना है। अब वह चाय वाले की रेहड़ी के पास खड़ा है। चाय वाला पत्ती एक डिब्बे में फेंका करता है। रोज शाम को लड़का यह इस्तेमाल की हुई पत्ती घर ले जाता है। इसे फिर से उबालकर वे लोग चाय बना लिया करते हैं। उसके हाथ डिब्बे की ओर बढ़ते हैं, तभी चाय वाला डाँट कर कहता है—‘पर हट! बाप का माल समझ रखा है! साले सारे भूखे-नंगे इसी स्टेशन पर जमा हो गए हैं।’

लड़का फिर डिब्बे की ओर हाथ बढ़ाता है। इन गालियों का वह आदि हो चुका है। उसे पता है देने वाला पहले गालियाँ जरूर दिया करता है। चाय वाला गरज पड़ा—

‘क्यों, सुणदा नहीं क्या? भाग। पत्ती कल ले जाना। मैं अब दो बार चाय बनाकर पत्ती फेंका करूँगा।’

लड़का वहाँ से भी सरक गया। गरमी की हवा का एक भूला-भटका झोंका आया। एक छोटा सा सफेद लिफाफा प्लेटफॉर्म पर लड़खड़ाकर भागने लगा। लड़के के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने दौड़कर वह खाली लिफाफा उठा लिया। उसे मुँह के साथ लगाकर हवा भरी, लिफाफा छोटा-सा गुब्बारा बन गया। फिर उसने एक मुक्का फूले हुए लिफ़ाफ़े पर मारा। ठाँय की आवाज के साथ लिफाफा फट गया। वह खुश हो गया। सारी गालियाँ भूलकर गोदाम की ओर चल पड़ा।

अनाज की बोरियाँ इस गोदाम में रखी जाती हैं। फिर मालगाड़ी पर चढ़ाकर जाने कहाँ भेज दी जाती हैं। इस उतारने-चढ़ाने में गेहूँ के दाने बोरियों से निकलकर गोदाम के फर्श पर गिर जाते हैं। लड़का दोनों हाथों से ये दाने बुहारकर कमीज के अगले हिस्से को थैला बनाकर उसमें डाल लिया करता है। उसे आज तक पता नहीं चला कि माँ कैसे इन दानों को पहले आटे में और फिर रोटी में बदल देती है। गोदाम में हमेशा पुलिस के दो सिपाही पहरे पर। एक लंबा-पतला, बाँस की तरह। उसकी लंबी-लंबी मूँछें। लड़के ने उसका नाम मुच्छल रखा हुआ है। जब वह फर्श पर बैठकर दाने बुहार रहा होता है तो मुच्छल हमेशा उसकी पीठ पर लात जमाया करता है। उसका दूसरा सिपाही साथी बिलकुल गोलमटोल। लड़के ने उसका नाम मटका रखा हुआ है। मटका हमेशा मुच्छल को उसे लात मारने से रोका करता है। लड़के को इसलिए मटका अच्छा लगता है। सिपाहियों के हाथों में हमेशा लंबी-लंबी लाठियाँ, जिनके सिरों पर लोहा जड़ा रहता है। वे गोदाम के दरवाजे के पास पड़ी चारपाई पर बैठे बीड़ी पीते रहते हैं।

लेकिन बरामदे में पहुँचते ही लड़का ठिठक जाता है। आज दोनों पुलिसिये दरवाजे पर खड़े थे और उनके हाथों में बंदूकें थीं। बंदूकों के सिरे पर चाकू की तरह लंबा टेज लोहा लपलपा रहा था। लड़का आगे बढ़ा। मुच्छल ने उसे देख लिया है। लड़का ठहर गया। मुच्छल ने हाथ के इशारे से उसे आगे बुला लिया। लड़का दरवाजे के पास, उन दोनों के करीब आकर ठहर गया। मुच्छल ने बंदूक सीधी, लंबी कर दी। चमकता लोहा उसके गले के एक इंच दूर है।

‘पता है इसे क्या कहते हैं?’

लड़के ने नहीं में सिर हिलाया।

‘संगीन। साले, यह संगीन है। जरा सा दबा दूँ तो तेरे गले के आर-पार हो जाए।’

लड़के की टाँगे काँप रही हैं। उसे लगा कि उसका पेशाब निकला कि निकला।

‘परे कर ओए। क्यों छोटे बच्चे की जान निकाल रहा है।‘

और मटके ने हाथ बढ़ाकर मुच्छल की संगीन लगी बंदूक परे कर दी।

लड़का मुँह उठाकर दोनों की तरफ देख रहा है।

कौन अंदर जाने के लिए कहेगा।

‘गेहूँ लेना है?’

‘हाँ!’ लड़के ने सिर हिलाया।

‘फिर जा अंदर, बहन के यार। मुँह क्या देखता है!’

लड़के का पहला कदम अंदर पड़ते ही मुच्छल ने उसको पीछे से बालों से पकड़ लिया। उसने लड़के की गर्दन पर पंजा फँसाकर झटके से उसका चेहरा अपनी ओर कर लिया। फिर उसने मोटी-मोटी दो उँगलियों में लड़के की नाक का सिरा पकड़कर जोर से मसल दिया, दबा दिया। लड़का चीख रहा है, मुच्छल और जोरों से उसकी नाक दबाए जा रहा है। उसने झटका देकर लड़के को जमीन पर गिरा दिया। लड़का अब पिटे हुए कुत्ते की तरह ‘कीं-कीं’ आवाज किए जा रहा है। मुच्छल ने गरज कर कहा—

‘कुत्ते के बीज! तुझे पता नहीं आजकल स्टेशन पर आना मना है। मादर… गोदाम में आता है। गोदाम में चोरी करेगा। तेरे पेट में संगीन गड़ा दूँगा, संगीन।’ लड़का गठरी बना हुआ जमीन पर लेटा है। अब उसने रोना बंद कर दिया। वह और मुच्छल दोनों हैरान हैं कि आज मटका बीच-बचाव क्यों नहीं कर रहा।

‘तेरी बहन क्या करती है?’ मटके ने बारीक आवाज में पूछा।

‘कोयले चुनती है।‘

‘ओ कंजर के बीज! वह रेलवे लाइन पर गई तो टाँगे चीरकर रख देंगे। तुझे पता नहीं इन दिनों लाइन पर घूमना मना है।’

लड़का और मुच्छल उसकी अगली बात सुनने की प्रतीक्षा में हैं।

‘जा। घर भाग जा। बहन को साथ ले आ। थैला भी लेते आना। वह गन्दम भरकर ले जाएगी। तुझसे तो थैला भी नहीं उठेगा।’

मुच्छल हैरानी से उसकी ओर देखता है। मटका जवाब में आँखें दबाकर मुस्करा देता है। मुच्छल की बाँछें खिल जाती हैं।

लड़का गेहूँ मिलने की उम्मीद में तेजी से घर की ओर भागा जा रहा है। स्टेशन से बाहर बड़े पल से नीचे बनी झोंपड़ियों में वह पहुँच गया। अँधेरा घिर आया है। वह छलांग लगाकर बड़ा नाला पार करता है और झोंपड़ी के अंदर पहुँच गया।

माँ जमीन पर लेटी है। उसकी कटी टाँग पर कीचड़ जैसी मैली पट्टी बंधी है। आसपास मक्खियाँ भिन-भिना रही। बहन तीन ईंटों के चूल्हे के मुँह के बराबर सिर जमीन पर रखे जोर-जोर से फूँकें मारकर आग जला रही है।

‘गेहूँ लाया?’ माँ ने कड़क कर पूछा—‘नहीं?….. तो हरामी सारा दिन क्या करता रहा? लड़कों के साथ खेलता रहा। तुझे पता नहीं, दो दिन से कुछ खाया नहीं।’

माँ एक टाँग के सहारे मेंढक की तरह उछलकर बैठ गई। उसने अपनी चिमटे जैसी उँगलियों में लड़के की कलाई पकड़कर उसे अपनी ओर घसीट लिया। अब वह उसे एक लात से, दोनों हाथों से ताबड़तोड़ मारे जा रही है।

लड़की ने चूल्हा फूँकना छोड़ दिया। वह झपटकर माँ के हाथों से भाई को छुड़ा लेती है। माँ अब उसकी ओर मुँह मोड़कर कहती है—

‘हरामजादी, तू बीच में मत आ। तुम दोनों एक जैसे हो। सारा दिन बाहर भटकती रही और एक कोयला चुन कर भी नहीं लाई।’

पहले माँ कोयले चुना करती थी। रेल के पहिये के नीचे आकर टाँग कट गई तो लड़की ने यह काम संभाल लिया। कोयले बेचकर थोड़ा-बहुत नमक-मिर्च का खर्चा चलता है।

‘तुझे सौ बार बताया है, पुलिसवाले आजकल लाइन पर जाने नहीं देते।’ लड़की ने तमककर जवाब दिया।

पुलिस का नाम सुनकर लड़के को कुछ याद आ गया है।

‘माँ !’

‘क्या है?’

‘इसे मेरे साथ गोदाम भेज दो।‘

‘क्यों?’

‘पुलिसवाला कहता था बहन को साथ ला। थैला भरकर कंणक दूँगा।’

माँ चुप। लड़का-लड़की दोनों उसकी ओर देख रहे हैं। वह लड़की के शरीर के प्रत्येक अंग को खोज भरी आँखों से देख रही है। अभी बारह साल की। औरत होने के निशान भी नहीं दिख रहे। पहले वह सोचती है, न कर दे। लड़की छोटी है। फिर सोचती है, आज नहीं तो कल यह होना ही है। उसकी अपनी सारी उमर ऐसे ही बीती।

‘हाथ-मुँह धो ले। थैला लेकर भाई के साथ जा।’

लड़की बाहर जाकर नलके से मुँह धो आई है।

लड़का थैला उठाकर पहले से तैयार खड़ा है। माँ लड़की को कहती है—

‘देख। वहाँ शोर मत मचाना।’

‘शोर क्यों मचाऊँगी!’

‘अच्छा, जा। दफा हो!’ और माँ करवट बदलकर लेट गई।

दोनों भागते हुए, बाहर के रास्ते से गोदाम के दरवाजे पर पहुँच गए हैं। मटका लड़के को पास बुलाकर पूछता है—

‘कुलचे-छोले खाएगा?’

लड़का डर के मारे हाँ भी नहीं करता। आज पुलिसवाले को क्या हो गया है?

मटका जेब से बीस पैसे निकालकर उसकी हथेली पर रखता है।

‘जा, पुत्तर। स्टेशन पर जाकर कुलचे-छोले खा। ऐश कर।’

लड़का पैसे लेकर मुँह में रोटी दबाए हुए कुत्ते की तरह वहाँ से भाग खड़ा हुआ। मुच्छल लड़की के पास आ गया।

‘उस्ताद बहुत छोटी है।’ मुच्छल।

‘फिकर न कर, कच्चे आमों का स्वाद देगी।’ मटका।

‘पर मैं यह कहता हूँ यह छोटी है। सह लेगी?’

‘तू यहीं ठहर। मैं दस मिनट में अंदर ले जाकर इसे बड़ी कर देता हूँ।’

मटका उसे हाथ पकड़कर अंदर ले गया। मालगाड़ी का इंजन गोदाम के पास वाली रेल लाइन पर शंटिंग कर रहा है। उसकी आवाज और सीटियों में शोर का गदर-कुहराम मच गया।

लड़का छोले-कुलचे खाकर लौट आया। मटका बाहर चारपाई पर बैठा बीड़ी पी रहा है। लड़का हैरान है, मुच्छल कहाँ गया है।

‘ले, बीड़ी पी।’ मटके ने सुलगती हुई बीड़ी लड़के के हाथ में थमा दी। लड़का बड़ी तृप्ति से कश ले रहा है।

मुच्छल बाहर आ गया है। हमेशा गुस्से से भरा उसका चेहरा अब नरम है, खुश है।

‘उस्ताद। मजा आ गया।’

‘चल, बड़-बड़ न कर। इसका थैला भर दे।’ मटका।

मुच्छल लड़के को लेकर गोदाम के अंदर जाता है। लड़का देखता है, बहन फर्श पर लेटी है। उसे गुस्सा आ जाता है, मजे से लेटी है। यह नहीं कि फर्श पर से गेहूँ चुने। अब सारा काम उसे करना पड़ेगा।

लड़का फर्श पर बैठकर छोटे-छोटे हाथों से गेहूँ चुनने लग पड़ा। मुच्छल उसे रोक देता है। फिर मुच्छल बंदूक ऊपर उठाता है। खच्च की आवाज के संगीन गेहूँ से भरी बोरी के अंदर घुस जाती है। वह संगीन बाहर निकाल लेता है। बोरी में हुए छोटे से सुराख से पानी की पतली धार की तरह गेहूँ बाहर निकल रहा है। मुच्छल उसके हाथ से थैला लेकर धार के नीचे रख देता है। चंद मिनटों में थैला भर जाता है।

बहन बाहर खड़ी है। दोनों घर की तरफ चल देते हैं।

‘तेज चल।’ लड़का।

बहन धीरे-धीरे लड़खड़ाकर चल रही है। एक कदम के बाद जमीन पर दूसरा कदम रखने में उसे तकलीफ हो रही है। लड़का आगे जाकर ठहर गया। बहन पास पहुँच जाती है।

‘तू तेज क्यों नहीं चलती?’

बहन क्षण भर के लिए उसे घूरकर देखती है और फिर पूरे जोर के साथ उसके मुँह पर थप्पड़ दे मारती है। लड़का इतना सहम गया कि रोता तक नहीं।

झोंपड़ी में पहुँचकर लड़की कटे हुए पेड़ की तरह नीचे गिर गई। वह थोड़ी-थोड़ी देर के बाद दोनों टांगों को जोड़कर दबाती है, कराह उठती है। माँ घिसटकर चूल्हे के पास पहुँच गई। उसने लकड़ी से चूल्हे की गर्म ईंट को ठोकर मारकर परे गिरा दिया। फिर उसने ईंट को कपड़े में लपेट लिया। घिसटकर लड़की के पास आ गई। वह कपड़ों में लिपटी गरम ईंट को लड़की की टाँगों के बीच रखती है, उठाती है। फिर रखती है। फिर उठाती है। माँ का हाथ लगते ही लड़की फूट-फूट कर रोना शुरू कर देती है। बहन को रोटी देखकर लड़के को गुस्सा आ गया। माँ पागल हो गई है। इतनी गर्म ईंट लगा रही है, बहन को दर्द तो होगा ही।

दो दिन में गेहूँ से भरा हुआ थैला खत्म हो गया। लड़की सारा दिन फर्श पर लेटी रहती है। माँ तीसरे दिन लड़के के हाथ में थैला थमाकर कहती है—

‘जा, गोदाम से कंणक ले आ।’

‘नहीं जाऊँगा। बहन को साथ भेजो।’

‘बकवास मत कर। जा, भागकर कंणक ले आ।’

‘नहीं जाऊँगा। अकेला जाता हूँ तो पुलिसवाले मारते हैं। इसे साथ भेज। यह साथ होती है तो कुलचे-छोले खाने को पैसा देते हैं।’

लड़का भागकर झोंपड़ी के दरवाजे पर जा ठहरा। वह जानता है कि एक टाँग वाली माँ उसे पकड़ नहीं सकती, पीट नहीं सकती।

माँ अब चालाकी से काम लेती है।

‘देख, बहन बीमार है। उठ नहीं सकती। पुलिसवालों से कहना, ठीक हो जाएगी तो तेरे साथ आया करेगी।’

बात लड़के की समझ में आ गई। उसे पता है दो दिन से बहन जमीन पर से उठी तक नहीं।

वह गोदाम में पहुँच गया है। उसे देखते ही मुच्छल पूछता है—

‘बहन कहाँ मर गई तेरी? साथ क्यों नहीं आयी !’

‘बीमार है।’

‘मादर…. झूठ बोलता है।’ मुच्छल पीटने के लिए उसकी ओर लपका। मटके ने बीच में उसे रोक लिया।

‘सच कहता है ओये। साले बीमार तो होगी ही, कैसी अनाड़ियों वाली बातें करता है।’

मटके के बीच-बचाव से लड़के को हौसला हो गया।

‘माँ कहती है ठीक हो जाएगी तो मेरे साथ उसे भेजेगी।

तीनों चुप हैं। मुच्छल की आँखों में आग जल रही है। अपने ही जोर से उसका जिस्म काँप रहा है। लहू चमड़ी की चादर फाड़कर बाहर उछल-उछल आ रहा है।

‘क्यों, बहुत तकलीफ हो रही है?’

‘हाँ।’ थोड़ा शरमिंदा। मुच्छल।

‘तो फिर आज यही हो जाए।’

मुच्छल की आँखों की लाली चेहरे पर फैल गई है।

‘पर साले में बू आ रही है।’ मुच्छल

‘वाह मेरे अंग्रेज! तो निकाल साबुन! आज छोकरे को साबुन से नहाने के मजे ले लेने दे।’

मुच्छल देशी साबुन की चक्की अंदर से ले आया।

‘जा पुत्तर, नलके के नीचे नहा ले। खूब साबुन मल-मलकर स्नान करना।’

लड़का कपड़े उतारकर पम्प के नीचे बैठ गया है। मटका पम्प चला रहा है।

मटका लड़के के कपड़ों की तरफ देखता है, फिर मुच्छल को आँख से इशारा करता है। वह कपड़े उठाकर गोदाम के अंदर ले जाता है।

लड़का नहाना बंद कर चुका। आसपास देखा। चौंककर बोलता है—

‘मेरे कपड़े?’

‘जा। अंदर गोदाम में जाकर पहन ले।’

लड़का गोदाम के अंदर पहुँच गया। दोनों सिपाही अंदर आ गए। उन्होंने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

मटका लड़के की गर्दन पकड़कर उसे नीचे झुकाता है। मुच्छल ने उसके दोनों हाथ बोरी पर टिका दिए।

अब लड़का किसी चौपाये की तरह खड़ा है। गोदाम में गरमी आग की तरह फैली हुई। लड़के की जुबान बाहर निकल आई। वह किसी कुत्ते की तरह जुबान लपलपाकर सांसें ले रहा है—- गरमी से अथवा दहशत से।

और बाहर हमेशा की तरह लंबी-लंबी सीटियों के शोर के साथ मालगाड़ी का इंजन शंटिंग करना शुरू कर देता है।

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स्वदेश दीपक

स्वदेश दीपक

जन्म: 1942 कहानियाँ: अश्वारोही, मातम, तमाशा, अहेरी नाटक: कोर्ट मार्शल, काल कोठरी संस्मरण: मैंने मांडू नहीं देखा

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