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रस-बूँद अमीरी और गरीबी के भेद के कारण टूटते पारिवारिक संबंधों की कहानी है। अमीरी प्राय: मनुष्य को अमानवीय एवं स्वार्थी बना देती है। इस बात को लेखक ने रामचरन के प्रति उसके चाचा और भाई लल्ला के हृदयहीन और निष्ठुर व्यवहार के माध्यम से व्यक्त किया है। एक ओर लल्ला खेल में रामचरन के साथ धोखाधडी करता है तो दूसरी ओर लल्ला का पिता रामचरन की बालकोचित इच्छा के साथ क्रूर मजाक करते हुए उसका हाथ जला देता है।  जो व्यक्ति रामचरन के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने में नहीं हिचका वही अपने बेटे लल्ला के तलवों पर मेहँदी लगा रही अपनी पत्नी से कहता है “सँभालकर लगाना कहीं उसकी नींद न टूट जाए।”

पछाहीं गाँव था। आबादी काफी थी और शहर से सीधा संबंध था। मोटर, लारी, इक्का, ताँगा बीच से होकर गुजरते थे, पक्की सड़क लगी थी। सब चीजें मिलती थीं। आटा-दालें, मसाले, मेवे, कपड़े, बिसात वाले सभी की दुकानें थीं, मिठाई भी बनती थी।

मिठाई की दुकान गंगासहाय की थी। पहले बाप बैठते थे। बहुत पैसा पैदा किया उन्होंने। पक्का मकान बनवा लिया। बाप मर गए, तब से गंगासहाय दुकान चला रहा है।

वह बाप का अकेला है, उसका बेटा भी अकेला है। बेटा मदरसे में पढ़ता है। उसे सब ‘लल्ला’ कहते हैं, बहुत लाड़ -प्यार है।

लेकिन कुनबा बहुत बड़ा है। कुनबा – यानी चाचा-ताऊ, चचेरे-तयेरे, चाची-ताई, बुआ-जीजी, भतीजे-भतीजी।

उनमें कुछ अमीर हैं, कुछ गरीब हैं। यह अमीरी-गरीबी पास-पास रहने से और भी स्पष्ट हो उठती है। दिन-रात, चौबीसों घंटे सब कोई महसूस करते हैं, अमीर अपनी अमीरी और गरीब अपनी गरीबी। यह अमीरी-गरीबी शाश्वत नहीं है। पहले तो सब एक ही घर के थे, एक-सा ही खाते-पीते, पहनते थे। एक दिन जो चतुर थे, उन्होंने अपना कर्तव्य पहचान लिया। वे अमीर हो गए। मूर्ख लोग एकता और समानता को पकड़े रहे। वे अब गरीब हैं। गंगासहाय के दादा मूर्ख न थे, गंगासहाय अमीर है — गंगासहाय का लल्ला भी अमीर है।

मूर्खों में एक थे लेखराज। उनका बेटा फल भुगत रहा है, उनका नाती अभी से गरीब है। उमर उसकी मुश्किल से आठ नौ साल की होगी, लेकिन इससे क्या? वह गरीब बन गया है।

वह भी अपने बाप का अकेला है, उसकी माँ भी उसको लाइ-प्यार करती है। रामचरन नाम है — ‘रामचन्ना’ कहकर सब पुकारते है। केवल माँ लल्ला कहती है। उसका मकान पुराने खंडहर के बीच बूढ़े भिखारी की तरह खड़ा है। उसके बाप की दुकान नहीं है। बाप नौकर है, शहर में किसी की दुकान पर।

जाड़ा उतर रहा था।  उस दिन मदरसे की छुट्टी थी। लड़के मजे में इधर-उधर घूम रहे थे। लल्ला के अनेक संगी-साथी हैं। रामचन्ना भी दर्जे में साथ पढ़ता है, भाई लगता है।  भाई है तो क्या हुआ – उसका पक्का मकान है, उसके बाप की दुकान है, उसके पास अच्छे कपड़े है?  लल्ला उससे दोस्ती नहीं रखता। उसकी अम्मा ने मना कर दिया है, अलग रहा करो इससे। उसे दोस्तों की क्या कमी है। उसकी मीठे की दुकान है।  बाप से माँगकर चाहे किसी दिन सबको मीठा बाँट देता है। सब साथी कृतज्ञ हैं।

पास की गली में ‘इक्की-दुक्की’ खेली जा रही थी। लल्ला सरदार था। सिरके से बासी रोटी खाकर रामचन्ना भी घूमता हुआ आ पहुँचा। खेल दुबारा शुरू हो रहा था। लल्ला से घिघियाकर कहा, “भैया, हमें भी खिला लो।’

वह लल्ला से ‘भैया’ ही कहता है, अम्मा ने कह दिया है कि नाम कभी मत लेना।

लल्ला ने कहा, “भाग जा कनेटा ! तुझे नहीं खिलाऊँगा।”

खेल शुरू हो गया । रामचन्ना खड्डा देखता रहा।

पर तीन-चार मिनिट पीछे विघ्न पड गया। बेईमानी की थी लल्ला ने, विपक्षी लड़का बिगड़ गया। लल्ला ने कहा, “तो मत खेलो।  वह खेल रुक गया।

एक ने सोचकर कहा, “अच्छा, “घोड़ी-घोड़ी” खेला जाए।”

“लेकिन पहले घोड़ी कौन बनेगा?”

“अरे, रामचन्ना जो है!”

लल्ला ने कहा, “तुम अगर घोड़ी बनो पहले तो तुम्हें खिलाएँगे।”

रामचन्ना ने कहा – “फिर मैं भी चढ़ूँगा।”

लल्ला ने कहा, “हाँ, चढ़ना। “

रामचन्ना घोड़ी बन गया और लड़के बारी-बारी से उसकी पीठ पर बैठकर गेंद उछालने लगे।  किसी से भी गलती न हुई। रामचन्ना उसी तरह झुका रहा। सबको पीठ पर चढ़ाता रहा।  अंत में लल्ला की बारी आई। वह रामचन्ना की पीठ पर कूदकर बैठा, ठीक जिस तरह कि घोड़ी पर बैठते हैं। रामचन्ना की कमर लचक गई। लल्ला ने उसकी खोपड़ी पर एक धौल जमाई और कहा, “बच्चू, ठीक से रहो।” और गेंद उछाली। गेंद छूट गई। लड़के ताली पीटकर चिल्ला उठे, “चोर-चोर, लल्ला चोर !” लल्ला पीठ पर से उतर पड़ा। रामचन्ना खुश होकर अपना लाल मुँह लिए सीधे खड्डा हो गया। लल्ला पर सबसे पहले वही सवारी करेगा। कूद-कर बोला, “भैया, अब चलो, मैं चढ़ूँगा।”

तो लल्ला को खयाल आया। फौरन कहा, “भाग जा कनेटा, मैं चढ़ूँगा! मुँह तो देखो।”

रामचन्ना बड़ा खिन्न हुआ, चेहरा उतर गया। तब से सब को सवारी दे रहा था, उसकी बारी आई तो डपट दिया।

लड़के खूब प्रसन्न हुए, बोले, “खूब सवारी मिली, खूब चढ़े हम तो।’

एक ने कहा, “अच्छा, एक बार और। अच्छा रामचन्ना इस बार बेईमानी नहीं होगी, तू बन तो जा घोड़ी।” ‘

वह रामचन्ना का हाथ पकडकर उसे झुकाने लगा। रामचन्ना, रोआँसा होकर एक किनारे को हट गया।

लल्ला को बड़ा मजा आया। साथियों से. कहा, “चलो, सबको पेड़े खिलाएँगे दुकान पर।”

सब लड़के चल दिए। पीछे-पीछे उदास होकर रामचन्ना भी चला।

लल्ला ने दुकान पर चढ़कर बाप से पेड़े माँगे।  फिर क्रमशः: सब लड़कों को देने लगा। वह खुद मिठाई नहीं खाता। जी भर गया है खाते-खाते।

चुपके से रामचन्ना पीछे जा खड़ा हुआ था। पर उसे पेड़े में हिस्सा नहीं मिला। लल्ला की इच्छा नहीं हुई। रामचन्ना सतृष्ण आँखों से देखता ही रहा। लड़के पेड़ा खाकर चले गए।

जलेबी बनानी थी । गंगासहाय चीनी की चाशनी पका रहा था । भट्ठी सुलग रही थी और बड़ी-सी लोहे की कड़ाही में दस-बारह सेर चीनी ‘बुद-बुद’ करके फुदक रही थी। जब उफान आता तो गंगासहाय दूध का मार देता और कड़ाही में करछुल घुमाकर लौट-पौट देता ।

रामचन्ना को जाने कब से मीठा खाने को नहीं मिला है। उसी तरह ललचाता खड्डा था और प्यासी आँखों से मिठाइयों की ओर देख रहा था। गंगासहाय किसी काम से भीतर उठकर गया। कड़ाही के आस-पास रस की बूँदें टपकी थीं, टपककर जमीन पर जम गईं थीं। रामचन्ना की नजर जा पड़ी। बढ़ गया और अँगुली से उठाकर उन बूँदों को चाटने लगा। सब चाट लीं।

गंगासहाय लौट आया। उफान आ रहा था। जल्दी से करछुल से टाला, दो-चार बूँदें फिर गिर गईं आस-पास। रामचन्ना खड़ा था।  डरते-डरते गंगासहाय चाचा के सामने ही उसने अंगुली से उठाकर रस की बूँदें चाट लीं। चाचा नहीं बोले। बड़ा खुश हुआ मन में। खड़ा-खड़ा देखता था। कोई बूँद गिरती थी तो फौरन अँगुली से उठाकर चाट लेता था।

अंत में चाशनी तैयार हो गई। गंगासहाय ने दोनों कुंडे कपड़े से पकड़े और कड़ाही उतारकर नीचे धर ली और पीढ़े पर बैठकर उसे घोटने लगा। रामचन्ना भी इधर आ खड़ा हुआ। शायद कोई बूँद गिरे।

गंगासहाय फिर दुकान के भीतर काम से उठ गया। रामचन्ना ललचा रहा था। चाशनी स्थिर थीं, अब बुदबुदे नहीं थे। इस किनारे पर कुछ चीनी लगी थी। वह पककर खस्ता हो गई थी। रामचन्ना ने चुपके से छुटाकर खा ली। फिर उधर से भी छुटाई।

गंगासहाय ने आते-आते देख लिया। कुछ नहीं कहा। रामचन्ना जल्दी से खड्डा हो गया, खड्डा होकर देखने लगा। तीन-चार बूँदें गिरी। चट से चाट लीं।  फिर खड़ा-खड़ा देखने लगा …

एक ग्राहक आ गया। गंगासहाय उसे सौदा देता रहा।  रामचन्ना खड्डा रहा। वह चला गया तो फिर गंगासहाय चाशनी के पास आया। अँगुली से छू-कर देखा, तार बँधता है कि नहीं। तब तक कहीं एक बूँद टपक गई।  रामचन्ना झुका और चाट ली।

कोई पास-पड़ोस में न था। अब गंगासहाय ने रामचन्ना की तरफ देखा और इशारा किया। परे रामचन्ना को विश्वास न हुआ। क्या कड़ाही में से लेने को कह रहे हैं।

गंगासहाय ने फिर आँख से इशारा किया और हाथ उठाकर बताया कि इस तरह कड़ाही की चाशनी में से रस का चुल्लू भर लो !

रामचन्ना डरता-डरता कड़ाही के पास बैठ गया।

गंगासहाय ने उत्साहित किया, “ले।”

इस तरह चुल्लू भरकर !

तब प्रसन्न होकर रामचन्ना ने हाथ बढ़ाया और आग की तरह जलती चाशनी में, जो देखने में शीतल लगती थी, रामचन्ना ने उत्साहित होकर अपना छोटा-सा हाथ जल्दी से डाल दिया। रस के लिए! पर रस नहीं ले सका। उसी क्षण जोर से चीत्कार करके चाशनी में जली अंगुलियाँ छिटकता “अरी अम्मा री-हाय अम्मा!” कहता घर की ओर भाग चला।

गंगासहाय ने धीरे से कहा, “साले!”

फिर वह जलेबी बनाने बैठा।…

माँ अभी तक चक्की पीस रही थी। रामचन्ना जलन से बेकल था। घुसते ही फौरन पानी के घड़े में हाथ घुसेड़ दिया और जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगा। माँ ने सुना तो चक्की पर से दौड़ी आई “क्या हुआ?”

रामचन्ना ने रोते-रोते कहा, “हाथ जल गया है मेरा!”

“कैसे जल गया?” — माँ ने घबराकर कहा, “देखूँ तो, कहाँ जला लाया अभागे!”

पर रामचन्ना ने नहीं बताया कि किस तरह वह जला।

माँ ने धीरे से बाँह पकडकर जब हाथ घड़े से बाहर खींचा तो देखकर चिल्ला उठी, “मैया री, हाय-हाय रे!” जाने कैसी कातर दृष्टि हो गई।

रामचन्ना के पूरे हाथ पर फफोले उभर आए थे, पूरा हाथ भरा था।

करुण स्वर से पुकारकर कहा, “चाची, ओ चाची!”

सामने के घर में एक औरत आ बसी थी। पुकार सुनकर वह दौड़ी आई। माँ ने रोकर कहा, “देखो तो, जाने कहाँ पूरा हाथ जला लाया है। हाय, क्या करूँ? क्या लगाऊँ? आग पड़ी होगी?”

औरत ने देखकर कहा, “भुन गया है बिलकुल।  भला आग न पड़ी होगी!”

रामचन्ना रो रहा था। माँ ने गोदी में बैठा लिया, चुप कराने लगी और कातर वाणी से पूछने लगी, “क्या लगाऊँ चाची? किसी तरह ठंड पड़ जाए।”

औरत ने कहा, “घबराओ मत, मैं अभी चली जाती हूँ, मुराब की बारी में केला है, केले का पानी लगाओ, ठीक हो जाएगा।”

केले का पानी लगाया, और भी अनेक उपचार किए, पर जलन बन्द न हुई। उस दिन रोटी नहीं बनी।  रामचन्ना को बुखार चढ़ आया। उसे दूध पिला दिया । माँ स्वयं निराहार रही …

रात को जब उसका फूला हाथ देखकर माँ रोने लगी तो रामचन्ना ने रोते-रोते सब घटना सुनाई।

“हाय निरदई।” -.

माँ ने उसे कलेजे से लगा लिया । अरे, कौन उसके बालक को पकड़कर जबरदस्ती हाथ जलाने को लिए जा रहा है? गरीब को इतना मत सताओ! अरे, उसके पास बदला लेने की शक्ति नहीं है, किसी से फरियाद नहीं करेगा। दया करो।  उसके भी जान है, माया-ममता है।

“हाय हत्यारे !”

रात को दुकान बढ़ाकर जब गंगासहाय घर पहुँचा तो पत्नी को ‘लल्ला’ की खाट के पास बैठा पाया। पूछा, “क्या कर रही हो?”

”मेहँदी लगा रही हूँ तलवों पर।”

गंगासहाय ने अपनी खाट पर लेटकर कहा, “सँभालकर लगाना कहीं उसकी नींद न टूट जाए।“

… दूर, दूसरे मुहल्ले में अधटूटी खटिया पर लेटा रामचन्ना कराहकर करवट बदलकर बोला, “अम्मा!”

“बेटा..!”

“नींद नहीं आती। बड़ी आग पड़ी है।”

“हाय पुतुआ, मैं क्या करूँ? कैसे तेरा दुख अपने ऊपर ले लूँ?”

दर्द से रामचन्ना फिर रोने लगा। उसे कलेजे से लगाकर माँ भी रो उठी। बाकी सब गाँव सो रहा था ।

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द्विजेन्द्रनाथ मिश्र निर्गुण

द्विजेन्द्र नाथ मिश्र निर्गुण

जन्म: 1915; मृत्यु: 1993 रचनाएँ : बहूजी, दो किनारे, कच्चा धागा, खोज, प्यार के भूखे, टूटे सपने

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