और एक दिन वह सब काम-धन्धे छोड़ कर घर से निकल पड़ी। कोई निश्चित प्रोग्राम नहीं था, कोई सम्बन्धी बीमार नहीं था, किसी का लड़का पास नहीं हुआ था, किसी परिचित का देहान्त नहीं हुआ था, किसी की लड़की की सगाई नहीं हुई थी, कहीं कोई सन्त-महात्मा नहीं आया था, कोई त्योहार नहीं था — कोई बहाना नहीं था। वास्तव में हुआ यह कि बरतन माँजते-माँजते अचानक जाने कहाँ से और कैसे शीला के मन में एक अनजानी तरंग-सी उठी और हाथ में पकड़े हुए बरतन को पटक कर हाथ धोये बिना वह जैसी की तैसी कमरे से बाहर आयी और पुकारने लगी — “रानी ओ रानी ।” रानी का कमरा अहाते की दूसरी छत पर था। आवाज़ देते-देते शीला की दृष्टि शून्य को चीर कर आकाश पर छाये हुए बादलों से टकरायी और पानी का एक कतरा उसकी दायीं आँख में आन गिरा। शीला ने एकदम आँख मींच ली […]
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श्यामा पात्र अमरनाथ पुरी : आयु 30 वर्ष श्यामा : मिसेज पुरी अप्पी : मिस्टर पुरी का सहायक मनोज : 19 वर्ष का लड़का हीरा : अधेड़ बेयरा ( जॉर्ज टाउन में मिस्टर पुरी के भव्य बँगले का एक सुसज्जित कमरा। कमरे के दाहिनी ओर दीवार में एक द्वार है, जिस पर लाल साटिन का परदा पड़ा है, औरों में चिकें। सलीब पर चढ़ा हुआ ईसा का भव्य चित्र। बाईं ओर, उसके नीचे ही उमर खय्याम की रुबाइयों के दो चित्र। दाहिनी ओर द्वार के इधर एक अर्द्ध अश्लील बेडरूम चित्र और कई इटालियन लैंडस्केप शोभित हैं। समय नवंबर का एक मेघाच्छादित प्रातः और सूरज की कोई आवश्यकता नहीं। बीसवीं सदी का कोई दिन अंधकार में नहीं रह सकता। मिस्टर अमरनाथ पुरी, आयु लगभग तीस वर्ष, गोरे-चिट्टे, आँखों पर चश्मा, हाथों में चमड़े के ग्लब्स, आकृति में वैमनस्य, वाणी में रुचि वैचित्र्य। काला सर्ज का सूट पहने एक सोफे पर […]
पात्र परिचय उमा : लड़की रामस्वरूप : लड़की का पिता प्रेमा : लड़की की माँ शंकर : लड़का गोपालप्रसाद : लड़के का बाप रतन : नौकर [ मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं , एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है। ] बाबू : अबे, धीरे-धीरे चल!… अब तख्त को उधर मोड़ दे… उधर…बस, बस! नौकर : बिछा दूँ, साहब? बाबू : (जरा तेज आवाज में) और क्या करेगा? परमात्मा के यहाँ अक्ल बँट रही थी तो तू देर से पहुँचा था क्या?… बिछा दूँ साब…! और यह पसीना किसलिए बहाया है? नौकर : (तख्त बिछाता है) ही-ही-ही। बाबू : […]
सिमरौली गाँव के लिए उस दिन दुनिया की सबसे बड़ी खबर यह थी कि संझा बेला जंडैल साब आएँगे। सिमरौली में जंडैल साहब की ससुराल है। वहाँ के हर जोड़ीदार ब्राह्मण किसान को सुखराम मिसिर के सिर चढ़ती चौगुनी माया देख-देखकर अपनी छाती में साँप लोटता नजर आता था। बेटी के बाप तो कई धनी-धोरी किसान थे, मगर जंडैल के ससुर एक सुखराम ही हो सके। लड़ाई की चढ़ती में जो किसान चेत गए थे, उनमें एक सुखराम भी थे। कच्चेर घर पर नया फँसूफी चेहरा बनवा लिया गया था, सो अब तारा का ब्याह होते ही आठ महीने में दो पक्की मंजिलें भी चुन गई। ‘लखनऊ’ से ठेकेदार आया, मकान में अँग्रेजी फैसन बना गया। गुसलखाना और डरैसरूम – जाने कैसे-कैसे डिजैन ऊपर की मंजिल में निकाले गए हैं। सुखराम के घर तो मानो कलजुग से सतजुग आ गया। तारा के लिए कहा ही क्या। जाए? उसे तो भाग […]
पात्र: महिला अनाउंसर, रिक्शेवाला, थका अफसर, एक परेशान रमणी, एक मसरूफ पति, कुछ लड़के, पागल आया (यह नाटक ड्राइंगरूम के लिए ही है।) एक दीवार से जरा हटाकर काला स्क्रीन खड़ा किया गया है। जिसके बराबर अनाउंसर (जिसे स्त्री ही होना चाहिए) खड़ी है। अनाउंसर के कपड़े रंग-बिरंगे होते हैं। एक फूलदार ड्रेसिंग गाऊन, रेशमी साफा और एक शोख चौड़े कमरबंद से काम चल सकता है। उसके हाथ में एक बड़ा-सा तिब्बती लामाओं का-सा झुनझुना है। अना. : (हाथ के झुनझुने को हिलाकर) अकेले और बेसरोसामान हम इस संसार में आए। स्क्रीन के पीछे से कुछ गंभीर मर्दानी आवाजें : कौन-कौन यहाँ सदा अकेला नहीं रहा? किस किस ने अपने पड़ासी का चेहरा पहचाना? स्त्री : किसने-किसने अपनी आत्मा में जीवन के आदि मुहूर्त को सिसकते-सुबकते नहीं सुना? अकेले और बेसरो-सामान हम भूले हुए रास्ते खोजते हैं। हम अपना खोया हुआ भाई तलाश करते हैं, जो बचपन में घर छोड़कर […]
मैं लपका चला जा रहा था। इसी समय एक ओर से आवाज आयी, “पण्डितजी !” मैंने घूमकर देखा- एक परिचित नवयुवक मेरी ओर आता दिखाई पड़ा। उसका नाम श्यामनारायण था और बी. ए. का विद्यार्थी था। मुझे उसने प्रणाम किया। मैंने मुस्कराते हुए प्रणाम का उत्तर देकर पूछा, “कहो, क्या हालचाल है; परीक्षा हो गई?” “जी हाँ !” “परचे कैसे किए?” “अपनी समझ में तो मैंने ठीक ही किए हैं। पास होने की पूरी उम्मीद है।“ “तो बस ठीक है। कहाँ जा रहे हो?” “ऐसे ही घूमने निकला हूँ। आप कहाँ जाएँगे?” “पार्क की तरफ जा रहा हूँ।“ “तो चलिए, मैं भी उधर ही चल रहा हूँ।“ हम दोनों चले। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रही। सहसा वह बोल उठा, “पण्डितजी बंदर तो न पालिएगा?” यह विचित्र प्रश्न सुनकर मैं चौंक पड़ा। मैंने उसकी ओर देखकर मुस्कराते हुए कहा, […]
आज स्कूल का वार्षिक फंक्शन है, सुबह सात बजे से मैं यहीं हूं… सारी तैयारियां अपने चरम पर हैं। रिहर्सल जितनी होती थी, हो चुकी। पिछले महीने तो मैंने पांच-पांच, छ:-छ: घंटे रिहर्सल करवायी है, जब तक बच्चे थककर चूर नहीं हो जाते। सुबह सात से शाम छ: बजे तक…। आज तो बस बारी-बारी तैयार कर इन्हें स्टेज पर भेजना है। मैं नहीं चाहती, मेरी क्लास के बच्चे किसी से भी पीछे रहें। पीछे रहने की सजा मैं अभी तक भुगत रही हूं…। हम मेकअप रूम में हैं… चारों तरफ बच्चों का शोर, नये कपड़ों की जगमगाहट और ढेर सारी खुशबुएं हैं…। कुछ कत्थक की रिहर्सल कर रहे हैं, कुछ क्लासिकल सिंगिंग की…। क्लास सिक्स की बच्ची अजीत कौर गा रही है… `मधाणियां, हाय… ओ मेरे डाडेया रब्बा कीनां जम्मियां किनां ने ले जाणीयां, हाय। `मेंहदी लगदी सुहागणं नु नहींयो मरदे दमां तक लहंदी।’ मैं उसकी तरफ प्यार से देखती […]
अभी-अभी लाउडस्पीकर पर बताया गया है कि गाड़ी लगभग दो घंटे लेट हो जाएगी। पास ही खड़े एक सैनिक अफसर ने बताया कि रास्ते में बड़े-बड़े स्टेशनों पर जनता इन लोगों के स्वागत के लिए इकट्ठा हो गई है। इसलिए यहाँ पहुँचते-पहुँचते इतनी देर हो जाना तो नेचुरल है। उसे इस बात से कोई परेशानी नहीं हुई। गाड़ी चाहे जितनी लेट हो जाए, उसे क्या? जिसने आना है वह इस गाड़ी में तो है ही नहीं। उसने स्वेटर बुनना बंद कर दिया, फिर उसे प्लास्टिक के लिफाफे में डाल दिया। जनवरी की निर्दय, क्रूर हवा बेरोक-टोक चल रही है। इतनी सारी भीड़ ने कई कागज, खाली लिफाफे, प्लेटफार्म पर फेंक दिए हैं। हवा इन्हें बड़े नियमित तरीके से एक से दूसरी ओर उड़ाए लिए जा रही है। आगे-आगे दौड़ते हुए कागज और सिर धुनते लिफाफे और उनके पीछे लगी जनवरी की निर्दय क्रूर हवा। सेनावालों ने प्लेटफार्म के सिरे पर […]
1 विद्यालयों में विनोद की जितनी लीलाएँ होती रहती हैं, वे यदि एकत्र की जा सकें, तो मनोरंजन की बड़ी उत्तम सामग्री हाथ आये। वहाँ अधिकांश छात्र- जीवन की चिंताओं से मुक्त रहते हैं। कितने ही तो परीक्षाओं की चिंता से भी बरी रहते हैं। वहाँ मटरगश्त करने, गप्पें उड़ाने और हँसी-मजाक करने के सिवा उन्हें कोई और काम नहीं रहता ! उनका क्रियाशील उत्साह कभी विद्यालय के नाट्य-मंच पर प्रकट होता है, कभी विशेष उत्सवों के अवसर पर। उनका शेष समय अपने मित्रों के मनोरंजन में व्यतीत होता है। वहाँ जहाँ किसी महाशय ने किसी विभाग में विशेष उत्साह दिखाया (क्रिकेट, हाकी, फुटबाल को छोड़कर) और वह विनोद का लक्ष्य बना। अगर कोई महाशय बड़े धर्मनिष्ठ हैं, संध्या और हवन में तत्पर रहते हैं, बिना नागा नमाजें अदा करते हैं, तो उन्हें हास्य का लक्ष्य बनने में देर नहीं लगती। अगर किसी को पुस्तकों से प्रेम है, कोई परीक्षा […]
‘नवरस’ के संपादक पं. चोखेलाल शर्मा की धर्मपत्नी का जब से देहांत हुआ है, आपको स्त्रियों से विशेष अनुराग हो गया है और रसिकता की मात्रा भी कुछ बढ़ गयी है। पुरुषों के अच्छे-अच्छे लेख रद्दी में डाल दिये जाते हैं; पर देवियों के लेख कैसे भी हों, तुरंत स्वीकार कर लिये जाते हैं और बहुधा लेख की रसीद के साथ लेख की प्रशंसा कुछ इन शब्दों में की जाती है- आपका लेख पढ़कर दिल थामकर रह गया, अतीत जीवन आँखो के सामने मूर्तिमान हो गया, अथवा आपके भाव साहित्य-सागर के उज्जवल रत्न हैं, जिनकी चमक कभी कम न होगी। और कविताएँ तो हृदय की हिलोरें, विश्व-वीणा की अमर तान, अनंत की मधुर वेदना, निशा का नीरव गान होती थीं। प्रशंसा के साथ दर्शन की उत्कट अभिलाषा भी प्रकट की जाती थी। यदि आप कभी इधर से गुजरें तो मुझे न भूलिएगा। जिसने ऐसी कविता की सृष्टि की है, उसके […]
कानून में अच्छी सफलता प्राप्त कर लेने के बाद मिस पद्मा को एक नया अनुभव हुआ, वह था जीवन का सूनापन। विवाह को उन्होंने एक अप्राकृतिक बंधन समझा था और निश्चय कर लिया था कि स्वतंत्र रहकर जीवन का उपभोग करूँगी। एम. ए. की डिग्री ली, फिर कानून पास किया और प्रैक्टिस शुरू कर दी। रूपवती थी, युवती थी, मृदुभाषिणी थी और प्रतिभाशालिनी भी थी। मार्ग में कोई बाधा न थी। देखते-देखते वह अपने साथी नौजवान मर्द वकीलों को पीछे छोड़कर आगे निकल गयी और अब उसकी आमदनी कभी-कभी एक हजार से भी ऊपर बढ़ जाती । अब उतने परिश्रम और सिर-मगजन की आवश्यकता न रही। मुकदमें अधिकतर वही होते थे, जिनका उसे पूरा अनुभव हो चुका था, उसके विषय में किसी तरह की तैयारी की उसे जरूरत न मालूम होती। अपनी शक्तियों पर कुछ विश्वास भी हो गया था। कानून में कैसे विजय मिला करती हैं, इसके कुछ लटके […]
पंडित अयोध्यानाथ का देहांत हुआ तो सबने कहा, ईश्वर आदमी की ऐसी ही मौत दे। चार जवान बेटे थे, एक लड़की। चारों लड़कों के विवाह हो चुके थे, केवल लड़की क्वाँरी थी। संपत्ति भी काफ़ी छोड़ी थी। एक पक्का मकान, दो बग़ीचे, कई हज़ार के गहने और बीस हज़ार नकद। विधवा फूलमती को शोक तो हुआ और कई दिन तक बेहाल पड़ी रही, लेकिन जवान बेटों को सामने देखकर उसे ढाढ़स हुआ। चारों लड़के एक से एक सुशील, चारों बहुएँ एक से एक बढ़कर आज्ञाकारिणी। जब वह रात को लेटती, तो चारों बारी-बारी से उसके पाँव दबातीं; वह स्नान करके उठती, तो उसकी साड़ी छाँटतीं। सारा घर उसके इशारे पर चलता था। बड़ा लड़का कामतानाथ, एक दफ़्तर में 50 रु. पर नौकर था, छोटा उमानाथ, डॉक्टरी पास कर चुका था और कहीं औषधालय खोलने की फ़िक्र में था, तीसरा दयानाथ, बी. ए. में फेल हो गया था और पत्रिकाओं में […]
घर के कलह और निमंत्रणों के अभाव से पंडित चिंतामणिजी के चित्त में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने संन्यास ले लिया तो उनके परम मित्र पंडित मोटेराम शास्त्रीजी ने उपदेश दिया- मित्र, हमारा अच्छे-अच्छे साधु-महात्माओं से सत्संग रहा है। यह जब किसी भलेमानस के द्वार पर जाते हैं, तो गिड़-गिड़ाकर हाथ नहीं फैलाते और झूठ-मूठ आशीर्वाद नहीं देने लगते कि ‘नारायण तुम्हारा चोला मस्त रखे, तुम सदा सुखी रहो।’ यह तो भिखारियों का दस्तूर है। सन्त लोग द्वार पर जाते ही कड़ककर हाँक लगाते हैं, जिससे घर के लोग चौंक पड़ें और उत्सुक होकर द्वार की ओर दौड़ें। मुझे दो-चार वाणियाँ मालूम हैं, जो चाहे ग्रहण कर लो। गुदड़ी बाबा कहा करते थे- ‘मरें तो पाँचों मरें।’ यह ललकार सुनते ही लोग उनके पैरों पर गिर पड़ते थे। सिद्ध बाबा की हाँक बहुत उत्तम थी- ‘खाओ, पीओ, चैन करो, पहनो गहना, पर बाबाजी के सोटे से डरते रहना।’ नंगा बाबा […]
सुकिया के हाथ की पथी कच्ची ईंटें पकने के लिए भट्टे में लगाई जा रही थीं। भट्टे के गलियारे में झरोखेदार कच्ची ईंटों की दीवार देखकर सुकिया आत्मिक सुख से भर गया था। देखते-ही-देखते हजारों ईंटें भट्टे के गलियारे में समा गई थीं। ईंटों के बीच खाली जगह में पत्थर का कोयला, लकड़ी, बुरादा, गन्ने की बाली भर दिए गए थे। असगर ठेकेदार ने अपनी निगरानी में हर चीज तरतीब से लगवाई थी। आग लगाने से पहले भट्टा-मालिक मुखतार सिंह ने एक-एक चीज का मुआयना किया था। चौबीसों घंटे की ड्यूटी पर मजदूरों को लगाया गया था, जो मोरियों से भट्टे में कोयला, बुरादा आदि डाल रहे थे। भट्टे का सबसे खतरेवाला काम था मोरी पर काम करना। थोड़ी-सी असावधानी भी मौत का कारण बन सकती थी। भट्टे की चिमनी धुआँ उगलने लगी थी। यह धुआँ मीलों दूर से दिखाई पड़ जाता था। हरे-भरे खेतों के बीच गहरे मटमैले रंग […]
मौसमे-बहार के फलों से घिरा बेहद नज़रफ़रेब गेस्टहाउस हरे-भरे टीले की चोटी पर दूर से नज़र आ जाता है। टीले के ऐन नीचे पहाड़ी झील है। एक बल खाती सड़क झील के किनारे-किनारे गेस्टहाउस के फाटक तक पहुँचती है। फाटक के नज़दीक वालरस की ऐसी मूँछोंवाला एक फ़ोटोग्राफ़र अपना साज़ो-सामान फैलाए एक टीन की कुर्सी पर चुपचाप बैठा रहता है। यह गुमनाम पहाड़ी क़स्बा टूरिस्ट इलाक़े में नहीं है इस वजह से बहुत कम सय्याह (पर्यटक) इस तरफ़ आते हैं। चुनांचे जब कोई माहे-अस्ल (हनीमून) मनानेवाला जोड़ा या कोई मुसाफ़िर गेस्टहाउस में आ पहुँचता है तो फ़ोटोग्राफ़र बड़ी उम्मीद और सब्र के साथ अपना कैमरा सम्भाले बाग़ की सड़क पर टहलने लगता है। बाग़ के माली से उसका समझौता है । गेस्टहाउस में ठहरी किसी नौजवान ख़ातून के लिए सुबह-सवेरे गुलदस्ता ले जाते वक़्त माली फ़ोटोग्राफ़र को इशारा कर देता है और जब माहे-अस्ल मनानेवाला जोड़ा नाश्ते के बाद नीचे […]

55 साल बाद इस कहानी को पढ़ कर बहुत ही सुखद अनुभूति हुई