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श्रीयुत गोलमिर्चफोरनदास भट्टाचार्य आजकल बड़े आदमी गिने जाते हैं. पहले कॉलेज में हमलोग नित्य इनका नवीन नामकरण संस्कार करते थे; लेकिन अब उन्होंने खुद अपना एक विकटाकार नाम रख लिया है. तब से हम लोग भी अपने-अपने काम-धंधों में लग गए और उनका नामकरण बंद हो गया. अब वे भीमभंटा सिंह राव कुलकर्णी के नाम से अपना परिचय देते हैं, और हम लोग भी उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं. बाकी नामों को दिमाग के किसी अंडमान टापू में भेज दिया गया या बंगाल की खाड़ी में डुबा डाला गया.

        इससे यह न समझा जाय कि इनके माता-पिता इनको जन्म देने के बाद इनका नाम रखना ही भूल गए. उन्होंने बहुत सोच-विचार और तर्क-वितर्क करके इनका नाम रखा था- भामिनी-भूषण भट्टाचार्य. मेरे ही मुहल्ले में रहते थे और मेरे सहपाठी थे. पढ़ने-लिखने और तिलंगी उड़ाने में उन्हें कमाल हासिल था; लेकिन एक बात ज़रूर थी, पढ़ने की और ज्यादा झुकाव होने के कारण दोस्तों की चकल्लसबाजी की और इनका ध्यान कम जाता था. फलतः मिडिल क्लास में इनका नाम बुद्धू भट्टाचार्य रखा गया. मैट्रिक तक पहुँचते-पहुँचते इनके कई नाम और भी रखे गए, जिनमें चापड़चन्द्रम एक मुख्य और प्रसिद्ध नाम था. मैट्रिक पास करके हम लोग कलकत्ता गए. प्रेसीडेंसी कॉलेज में जगह न मिली, तो विद्यासागर कॉलेज में भर्ती हुए. वहाँ हॉस्टल में बंगालियों की ज़बरदस्त जमात थी, जो रोज—रोज इनके नवीन नाम रखते. इन नामों को याद करके ये भी उतना ही हँसते, जितना इनके मित्र और सहपाठी लोग हँसा करते थे.

            हम लोग साथी थे. पढ़ाई-लिखाई की नौका किसी-किसी तरह बी. ए. के पास-घाट तक लगी, और मैंने मोटी-मोटी साइकोलॉजी और संस्कृत की पोथियों को प्रणाम करके सीधे घर का रास्ता लिया. फिर उसके बाद, जैसा कि दस्तूर है, डिप्टी मैजिस्ट्रेटी, आई.पी., रजिस्ट्रारी आदि की उम्मीदवारी करते-करते अंत में 35) मासिक की किरानीगिरी की कुर्सी पर विश्राम ले लिया. भट्टाचार्य डिप्टी मजिस्ट्रेटी से लेकर सब-रजिस्ट्रारी और बी.ई.डी. की उम्मीदवारी तक तो साथ था, लेकिन बाद में किधर ‘फिरंट’ हो गया, यह मुझे नहीं मालूम. एक दिन गर्मी के दिनों में अकस्मात आपके दर्शन हुए; कुछ दुबले-पतले नजर आते थे. नाक जरा कुछ संगीन की तरह निकल आयी थी, और आँख पर चश्मा चढ़ गया था. मैंने पूछा- कोथाय भट्टाचार्य?

          भट्टाचार्य ने जवाब दिया- अब तो भाई, ‘लॉ’ ज्वाइन किया है. वकील होकर आऊँगा. केस-टेस होने से दिया करना, उसमें से फीस का आधा दस्तूर के मुताबिक़ ज़रूर दे दिया करूँगा.

          मैंने आश्वासन दिया कि पहले तुम वकील तो हो जाओ, पीछे केस-टेस देखा जायगा. गुड़ के निकट जिस तरह चींटें बिना किसी निमंत्रण या आह्वान के आप-से-आप जमा हो जाते हैं, उसी तरह वकील के निकट मुअक्किल मक्खियों की भांति भिनभिनाने लगते हैं.

         भट्टाचार्य ने चश्मे को पोंछकर कहा- सो भाई, यह गलत बात है. इस पर मैं तुमसे बहुत बहुत ‘डिफर’ करके अलग चला जाता हूँ. अब वकीलों के सत्ययुग के दिन नहीं रहे. दिन-भर बहस करने के बाद भी चार आना खैरात की तरह मिलता है, सो भी अगर उधार में चला गया, तो और मुश्किल !

         ‘ठीक है’- मैंने कहा- ‘बचपन से ही तुम एक से एक चुस्त बात कह दिया करते हो, तुम्हारी बात को आरा भी नहीं काट सकता. तो क्या विचार है? मैं अभी से तुम्हारे लिए ‘केस’ पकड़ने की कोशिश करता रहूँ?’

         भट्टाचार्य की बाँछें खिल गयीं. कुर्सी पर अकड़ कर बोले- हम लोग जीवनपर्यन्त एक ही साथ रहे. एक ही साथ पढ़ा-लिखा, सब कुछ किया. घर भी हम लोगों का पड़ोस में ही है. यह तुम्हारा घर है, तो, वह देखो—मेरा घर है. खयाल करो, मैं यहीं से बैठा-बैठा अपना घर देख सकता हूँ. हमारे समय पर तुम काम आओगे , तुम्हारे समय पर मैं भी यथाशक्ति काम आऊँगा. हाँ, तो तुम ऐसा करो, तुम्हारे पास जितने दिहाती-शहरी मुक़दमेबाज आया करें, सब से तुम यही कहा करना कि एक मेरा मित्र भट्टाचार्य क़ानून पढ़ रहा है. एक साल के बाद वकील होकर आवेगा, तो हाकिमों के छक्के छुड़ा देगा. कैसा भी सड़ा हुआ ‘केस’ हो, वह उसे ज़रूर जीत लेगा—ज़रूर जीत लेगा—तुम खयाल रखो, वह उसे जीते बिना हरगिज नहीं छोड़ेगा, कभी नहीं छोड़ेगा !

          कहते समय भट्टाचार्य के दांत आपस में किटकिटाने लगे. आँखें चढ़ गयीं, ललाट सिकुड़ गया और आवेश के साथ अपनी बात की समाप्ति के विराम-स्वरूप जो उसने टेबुल पर घूँसा मारा, तो मेरा ‘पेपरवेट’ साफ़ बित्ता-भर ऊपर उछल गया.

        मैंने कहा- बेशक ! तुम ज़रूर मुकद्दमा जीतोगे.

        भट्टाचार्य प्रसन्न होकर बोला–इससे हमारा….. नहीं-नहीं, तुम्हारा भी क्या लाभ होगा, इसे भी समझ  लो. बार-बार एक ही बात को कहने से आदमी का विचार कुछ दूसरा हो जाता है. मनुष्य सोचता है कि जिस आदमी की इतनी प्रशंसा हो रही है, उसमें कुछ वास्तविक तथ्य भी है या नहीं. तब आदमी मुकद्दमा लेकर मेरे  पास आवेगा, और फिर जो आदमी इस मकड़ी के जाले में फँसा, सो फँसा !

           यह कह कर उसने अपने भाव प्रदर्शन के द्वारा मकड़ी के जाले का एक मानसिक चित्र अंकित करके बतला दिया. बोला — इसमें जो घुस गया, वह घुस गया, फिर तुम्हीं बोलो, किधर से निकल सकता है?

          मैंने उसके विचित्र भाव-प्रदर्शन को लक्ष्य करके कहा— यार, अगर, तुम सिनेमा में चले जाओ, तो नाम कमा लो. सहगल की तरह नाम निकाल लोगे.

          भट्टाचार्य ने नाक-भौं सिकोड़ कर कहा— सहगल तो वैसा नामी नहीं है; हाँ, अलबत्ता कानन और पहाड़ी सान्याल का नाम सिनेमा लाइन में बहुत ज्यादा है. लेकिन तुम से मैं अंतिम बार कहे जाता हूँ कि मेरे लिए ‘केस-टेस’ ज़रूर ठीक रखना.

          मैंने यथाशक्ति तथाभक्ति का आश्वासन देकर उन्हें विदा कर दिया. जाते समय भी वे कहते गए—- उसमें आधा तुम्हारा और आधा मेरा !

          बस, यही हमारे भट्टाचार्य का अंतिम संक्षिप्त परिचय है; बाकी अगर उनमें कोई खास बात थी, तो यही कि वे नस बहुत सूँघते थे और जरा भी नहीं छींकते थे.

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2

 उसके ठीक दो-तीन महीने बाद मैंने भट्टाचार्य को उसके घर में घुसते हुए देखा. तबीयत हुई—पुकारें, फिर कहा, चलो जरा चलकर मिल ही लें. पुनः विचार आया कि अब नाश्ता-पानी करके चलना ठीक होगा.

         थोड़ी देर बाद जलपान करके भट्टाचार्य के घर के समीप पहुँचा, तो देख रहा हूँ कि भट्टाचार्य का चेहरा कभी खिड़की से दिखलाई देता है, और फिर गायब हो जाता है. क्षण भर में ही खिड़की पर दिखाई दिया, और गायब हो गया ! पुनः दिखलाई दिया, पुनः अंतर्धान हो गया ! आखिर बात क्या है?

          देखा, चेहरा तमतमाया हुआ, आंखें लाल-लाल सुर्ख ! और दिखलाई देता है, फिर गायब हो जाता है, कैसा जादू है? मैंने घबड़ा कर किवाड़ खटखटाये. भीतर से उसने पुछा—कौन? क्या मांगता है?

           मैंने लक्ष्य किया, आवाज भारी है और हाँफती हुई निकल रही है. क्या बात है? घपले में पड़े हुए मैंने एक कुर्सी खींच ली और बाहर ही बैठ गया. सहसा कुछ ही क्षणों में कमरे के अंदर से धमाधम-धमाधम की आवाज आने लगी. ऐसा मालूम हुआ, जैसे कमरे के अंदर किसी के साथ उसकी उठा-पटक हो रही है. मैंने घबरा कर कई बार पुकारा; लेकिन भीतर से ‘हूँ हूँ’ की आवाज के सिवा कोई उत्तर नहीं मिला. उसके बाद कमरे की आपा-धापी और उठापटक की आवाज विलुप्त हो गयी. मैंने सोचा, अब दरवाजा खुलेगा; लेकिन दूसरे ही क्षण मालूम हुआ कि कमरे के अंदर कोई उछल रहा है. कभी इस कोने में उछलता है, कभी उस कोने में, कभी अरर्रधम्म, अरर्रधम्म किसी के गिरने की आवाज भी आती है.

         आखिर बात क्या है? भट्टाचार्य को हो क्या गया? अंदर वह नाच रहा है या दस-पाँच आदमियों से कुश्ती लड़ रहा है, कुछ पता नहीं लगता. इसी समय कमरे का दरवाजा खुला और दुबले-पतले शरीर पर लंगोट कसे भट्टाचार्य महोदय के दिव्य दर्शन हुए. नमस्कार करके कहा—मैंने तो समझा था कि कोई तुम्हें उठा-उठा कर पटक रहा है !

        भट्टाचार्य ने कहा—-मुझे कोई भला क्या पटकेगा; बल्कि मैं ही अभी पचास काल्पनिक पहलवानों को कुश्ती में पछाड़ कर आया हूँ. ……आओ, अंदर आओ, बैठें.

        अंदर पहुँचकर मैंने देखा, कमरे का हुलिया ही बिल्कुल बदल गया है. जहाँ एक वृहदाकार टेबुल था, वहाँ अब सिर्फ उसकी दो टांगें ही पृथक-पृथक विद्यमान थीं, जिनसे संभवतः मुगदर का काम लिया जाता था. चेस्ट-एक्सपैंडर, डंबल आदि कई ऐसी अनोखी चीजें मैंने उस कमरे में देखीं. मुझे कभी स्वप्न में भी अनुमान नहीं था कि भट्टाचार्य को कभी भी व्यायाम से इस प्रकार रूचि होगी. मैंने कहा— मेरा खयाल है, अभी तुम व्यायाम कर रहे थे.

          भट्टाचार्य कुर्सी पर बैठ कर बोला— हाँ, बस, व्यायाम ही इन दिनों मेरा जीवन-सर्वस्व हो गया है. मेरी स्पष्ट धारणा है कि व्यायाम से ही भारतवर्ष का उद्धार हो सकता है !

         मैं आखिर क्या कहता ! उसी की हाँ-में-हाँ मिलाई.

         बोला—विचार तो बहुत ही उज्ज्वल है.

         वह धोती पहनने लगा. धोती बाँध कर कहा— आज मैं महात्मा गाँधी, आचार्य कृपलानी और राजेन्द्र बाबू के पास एक पत्र लिखने वाला हूँ. मेरा ख्याल है कि सत्याग्रह-संग्राम में भी व्यायाम की सख्त ज़रुरत है. सत्याग्रह-संग्राम वस्तुतः क्या है? उसमें यही है कि हमें मारो, लेकिन बदले में हम तुम्हें न मारेंगे. इसके लिए शरीर में ताकत होनी चाहिए. इसके लिए व्यायाम की कितनी सख्त ज़रुरत है, यह तुम अच्छी तरह समझ सकते हो.

        मैंने कहा— यह तो ठीक है; लेकिन मेरा ख्याल है कि आजकल तुम कानून के लेक्चरों को व्यर्थ ही छोड़ रहे हो.

        उसने कहा—-कानून तो मैंने कतई छोड़ ही दिया. अब मैंने व्यायाम को अपनाया है. तुम देखते हो, आज-कल मैं दुगुना हो गया हूँ. बहुत संभव है, दो-चार दिनों के अंदर ही मोटरें रोकने लगूँगा. तो तुम समझ गए होगे कि क़ानून पढ़ने से व्यायाम करना कहीं ज्यादा हितकर है. इसमें फायदा होगा ही. कानून पढ़ने से झख मारना पड़ता है. महीने में तीस रूपये निकल आयें तो बहुत समझ लो. आज मैं दुगुना दिखलाई देता हूँ, कल तिगुना दिखलाई दूँगा, परसों चौगुना हो जाउँगा.

          मैंने गौर से उसे देखा; लेकिन कोई तबदीली नहीं मालूम होती है—बिलकुल वही का वही ! मैंने अविश्वासपूर्वक कहा— भाई, जो कहो, लेकिन दुगुना तो नहीं मालूम होते !

           भट्टाचार्य चौंक कर बोला— नहीं कैसे मालूम होता; अवश्य् मालूम होता हूँ. मेरी ‘मस्ल’ देखते हो? लो, देख लो !

                     यह कहते हुए वह विचित्र रूप से अकड़ गया, साँस फुला ली और भुजदंड मरोड़ कर पीठ की ‘मस्ल’ दिखलाने लगा. अगर शरीर में कहीं मांस-वांस हो, तो मस्ल दिखलाई भी दे जाय; लेकिन हड्डी की ‘मस्ल’ न आज तक किसी ने देखी है, और न मैं ही देख सका. मन ही मन सोचा, शायद यह माइक्रोस्कोप से अपनी ‘मस्ल’ देखा करता होगा ! पीठ-पेट, छाती, भुजा आदि सभी प्रकार की ‘मस्लों’ का दर्शन कराने के बाद भट्टाचार्य ने पूछा— देख लिया?

          मैंने धीरे से कहा—खूब देख लिया ! क्या शरीर है ! गामा से भी आगे निकल जाओगे.

          भट्टाचार्य पुनः कुर्सी पर बैठ गया और निश्चिंत होकर बोला—- अभी गामा की क्या बात, थोड़े दिनों में देखना, मैं बंगाल के सुप्रसिद्ध पहलवान ‘गोबर’ से भी हेल्थ में आगे बढ़ जाऊँगा.

          विचित्र विश्वास था ! यदि मैं इसके विरूद्ध कुछ कहूँ तो डर था, कहीं बिगड़ न जाय; लेकिन बचपन की दोस्ती तकाजा कर रही थी कि मैं कुछ ज़रूर कहूं. पूछा— भाई, तुम्हें अपने दिमाग में कहीं गड़बड़ तो नहीं मालूम होती?

          भट्टाचार्य तेज होकर बोला—तुम समझते होगे, मैं गलत रास्ते पर हूँ; लेकिन वस्तुतः मैं ठीक हूँ. तुम्हारी तरह मैं किरानी होकर झख नहीं मारना चाहता. मैंने तुमसे पहले ही कह दिया है कि मैं जिस दिन अपने को समतल भूमि पर खड़ा पाऊंगा, उसी दिन मैं समझूँगा कि मैं मर गया. तुम जानते हो, तीस-बत्तीस की वकालत से मेरा पेट नहीं भर सकता. मुझे हमेशा सौ से ऊपर चाहिए, नहीं तो मैं समतल भूमि पर खड़ा हो जाऊँगा.

         विचित्र बात थी. मैं सुनता रहा; लेकिन कुछ भी नहीं समझ सका. उसने जोर से कहा—मैंने सिगरेट, चाय और क़ानून, तीनों चीज़ों को छोड़ दिया है. यह मेरी अक्लमंदी की निशानी है, मैं बड़ा आदमी होना चाहता हूँ, किरानी होकर मेरी गुजर नहीं हो सकेगी. आज मेरा नाम है- भीम भंटा राव कुलकर्णी, व्यायाम-विशारद, मुगदराविभूषित, डंबलद्वयी, त्रिदंडकारक !

         मैंने निश्चय किया कि यह अवश्य पागल हो गया है. यदि अभी तक पूरा पागल नहीं हुआ, तो दो-चार दिनों के अंदर पागलखाने ले जाने लायक ज़रूर हो जायगा.

         उसने पुनः कहा—मैंने अपना नाम बदल लिया है, हेल्थ भी बढ़ा ली है; अब मैं संसार में अवश्य ही कुछ कर सकूँगा.

         लेकिन जैसी उसकी हेल्थ थी, उससे मेरी हेल्थ ही कहीं अच्छी थी. उसके उज्ज्वल भविष्य की कल्पना का आनंद लेता हुआ मैं घर लौट आया, उसी दिन मैंने भीमभंटाराव की कहानी क्लब में सुनायी, तो लोगों ने आश्चर्य से सुनी और हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए !

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3

किरानीगिरी के वेतन से पेट भर तो ज़रूर जाता है, लेकिन जिन चीज़ों से पेट भरने की इच्छा रहती है, उन चीज़ों के बदले किन्हीं दूसरी चीज़ों को ही पेट में ठूँसना पड़ता है. बीवी का कहना है—मैंने तुमसे विवाह कर अपना ‘फिउचर प्रास्पेक्ट’ बिलकुल बरबाद कर दिया—-न ईयरिंग, न नेकलेस और न हेलियोट्रैप की साड़ी ही ! ठीक है, बिना अलंकारों के कविता भी जब अच्छी नहीं लगती, तो अलंकार-विहीना नारी कैसी लगेगी ! श्रीमती के मुँह से यह भी सुना है कि पाँच-छः महीने के अंदर ही मेरे घर में निर्घोष वर्मा नामक कोई पुत्र या खद्योत कुमारी नाम की एक पुत्री पैदा होने वाली है. कहीं दोनों जुड़वां अवतीर्ण हो गए तो और भी ग़ज़ब होगा ! फलतः किरानीगिरी से मुझे वितृष्णा होती है. दूर-दूर तक आँखें पसारता हूँ; लेकिन डरबी के दौड़ने वाले घोड़ों के अतिरिक्त कुछ भी नज़र नहीं आता. कई बार लाटरी के टिकट भी लिए; लेकिन मेरे टिकट ऐसे फिसड्डी निकले कि दौड़ कर दौड़ने या न दौड़ने वाले घोड़ों तक भी नहीं पहुँच पाए और रास्ते में ही उनका अस्तित्व विलुप्त हो गया. उन्हीं दिनों सुना, मेरे ऑफिस के नन्दबाबू को, ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ की ‘वर्ग-पहेली’ की खानापूरी करने में तीन सौ रूपये मिले हैं. मजा तो यह कि इन्होंने जो पूर्ति भेजी थी, उसमें तीन गलतियाँ भी मौजूद थीं. मैंने सोचा, मैं ऐसी गलती नहीं करूँगा. मुझसे तीन गलतियाँ तो कभी हो नहीं सकतीं. मैंने अपने जीवन-भर में केवल एक ही गलती की है; और वह गलती यही है कि मैंने इस मृत्युलोक में जन्म ले लिए. यही सब कुछ सोच विचार कर मैंने तय किया कि तीन गलतियाँ तो मुझसे कभी होंगी नहीं, बहुत होगी, तो एक गलती, जो सदा होती आयी है. इसके लिए कम-से-कम 1000) पुरस्कार ! वाकई यह ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ ही है, जो गलतियों के लिए भी पुरस्कार देता है ! और नहीं तो हम सदा से सुनते आये हैं कि गलती करने पर दंड मिलता है. मैंने प्रण किया कि अब से बराबर वर्ग-पहेली में भाग लेकर अपना भाग्य जगाऊँगा. अब भाग्य जगाने के संकल्प के लिए कम-से-कम छः आने सप्ताह बहुत ही ज़रूरी हैं, उसके बाद वर्ग-पूर्ति की दक्षिणा अट्ठारह आने. कुल मिलाकर साढ़े सात रुपयों का मासिक खर्च था. मेरा मासिक बजट था पैंतीस रुपयों का. मैंने उस बजट में कमी करने के विषय में जितनी अक्ल लड़ायी, उतनी अक्ल अगर जगदीश बोस या एडिसन साहब लड़ाते, तो अवश्य ही कोई-न-कोई आविष्कार कर डालते; लेकिन मेरा बजट सुरसा की भांति मुँह बाये ही रहा. अंत में मैंने अपनी अंगूठी और फाउंटेनपेन बेच कर किसी तरह दो महीने का खर्च निकाला और वर्ग-पूर्ति भेजना शुरू किया. मेरी सारी पूर्तियों का नतीजा वही निकलता था, जैसा कि निकलना चाहिए. तस्वीरों से भरे हुए साप्ताहिक के अतिरिक्त मुझे कोई लाभ नहीं होता था. सहसा एक दिन उस पत्र में भीमभंटाराव कुलकर्णी का नाम और तस्वीर देख कर मैं चौंका. तस्वीर तो अवश्य भट्टाचार्य की थी; लेकिन नाक और मुँह छोड़ कर बाकी सब कुछ किसी पहलवान का था. या भगवान् ! फोटोग्राफ में भी जालसाजी होने लगी ! उस फोटो में भीमभंटा जी के एक-एक बाजू भट्टाचार्य की दोनों जांघों के बराबर थे. ‘मस्लें’ इस तरह निकली हुई कि मालूम होता था जैसे मेढ़े के दोनों सींग ! देख कर तो मैं भौंचक हो गया. आज ही सवेरे भट्टाचार्य को देखा था. वही शिखंडी सूरत, वही बदनसीब चेहरा और अभी……….! आधे पृष्ठ में छपा उनका विज्ञापन भी बड़े मजे का था :-

        यदि आप या आपकी स्त्री या आपके कोई भी—-

        दुबले हैं तो मोटे हो जाएँगे,

        नाटे हैं तो लंबे हो जाएँगे,

         यदि तोंद निकल आयी है, तो तोंद भसका दी जायगी.

         यदि गाल पिचक गए हैं, तो गाल डबल रोटी-से फुला दिये जायेंगे.

         कायापलट हो गयी !

         चर्बी घट गयी !!

         वजन बढ़ गया !!!

         कमाल हो गया ! कमाल हो गया !!

         “और यह कमाल प्रो. भीमभंटाराव की अपनी व्यायाम-पद्धति से ही संभव है. नियम के लिए पाँच आने का स्टांप भेजिए!”

     वाह रे प्रो. भीमभंटाराव ! तुमने तो ग़ज़ब कर दिया ! सलाई की लकड़ी सरीखे हाथ-पाँव रख कर तुमने अपनी व्यायाम प्रणाली ही निकाल डाली. जो लोग भैंस को बड़ी कहते हैं, वे गलती करते हैं, अक्ल ही सबसे बड़ी चीज़ है. विज्ञापन देखने के बाद मुझसे स्थिर होकर बैठा नहीं गया. तुरंत भीमभंटाराव के पास पहुँचा. आज पाँच-छः महीने के बाद देखा कि कमरे के डंबल-वंबल गायब हो गए हैं और वहाँ बाकायदा ऑफिस बना है. प्रोफेसर भीमभंटाराव मौज से टाइप कर रहे थे. मैंने कहा—यार, तुमने तो ग़ज़ब कर डाला !

         प्रोफेसर साहब ने मेरी पीठ ठोंक कर कहा— गुड लक ! मैं अभी तुम्हारे पास जाने वाला था. मुझे आज से…….अभी से …..इसी वक्त से…..45) माहवारी पर एक एक ग्रेजुएट किरानी की सख्त ज़रुरत है. काम ज्यादा नहीं है; दो घंटे सुबह और तीन घंटे रात को. मेरा विश्वास है कि तुम इस काम को कर सकोगे. मेरे यहाँ एक किरानी प्रोस्पेक्टस विभाग में काम करता है; लेकिन मैं तुम्हें प्राइवेट काम के लिए रखना चाहता हूँ. रहोगे?

        मैंने प्रसन्नतापूर्वक कहा—-यथास्तु ! सोsहं . भई भीमभंटाराव ! तुम्हारा जादू चल गया !

        ज़रूर चल गया ! —–प्रोफ़ेसर भीम ने कहा—-अगर वकील होता, तो मारा-मारा फिरता. आज व्यायाम-पद्धति के चलते मैं 300) मासिक कमा रहा हूँ. मेरा विश्वास है, विलायत के पत्रों में विज्ञापन देते ही मेरी आमदनी चौगुनी हो जायगी. यहाँ कोई थोड़े ही देखने आता है कि प्रोफ़ेसर भीमराव कैसे आदमी हैं ! जैसे-जैसे मेरा आर्डर बढ़ेगा, वैसे-वैसे तुम्हारे वेतन में भी तरक्की होती जायगी. यह लो, अभी से ही काम करना शुरू कर दो. आओ इधर, टाइपराइटर संभाल लो. यह देखो, यह एक मिनिस्टर साहब की पर्दानशीन बीवी की चिट्ठी है. वे लिखती हैं कि मैं बहुत मोटी हो गयी हूँ, क्या करूँ? इन्हें जवाब में लिखो— माई डिअर सो एंड सो, आप अपने आँगन में एक बीस हाथ का खूँटा गाड़ कर, रोज सुबह और शाम बीस दफे चढ़ा और उतरा कीजिये. खाने के लिए सुबह आध पाव छुहारा और आधा सेर दूध, शाम को पापड़ और बिस्कुट. चलो, हटाओ. अब दूसरा पत्र दो………

        दूसरा पत्र एक मेम साहिबा का था. बेचारी ने कलप कर बड़ी कारुणिक भाषा में लिखा था—मेरे गाल पिचक गए हैं, इसी अपराध के कारण मेरे पतिदेव मुझे तलाक देना चाहते है. यदि आपकी व्यायाम-प्रणाली से मैं कुछ भी लाभ उठा सकी, तो अपना अहोभाग्य समझूँगी, नहीं तो मैंने भी एक दूसरा पति तलाश कर लिया है; लेकिन वह अधिक उपहार नहीं दे सकता.

       प्रोफ़ेसर भीमभंटाराव कुलकर्णी ने जवाब भेजा—- रोज पाँच बार नाक को, जितना मसल सको उतना मसला करो. खूब अधिक मसलने पर सिर्फ एक महीने के अंदर-ही-अंदर तुम्हारे गाल उभर आयेंगे, बल्कि सेब की तरह लाल भी रहा करेंगे.

       एक विद्यार्थी ने लिखा था—- मैं पुलिस की सब-इंस्पेक्टरी के लिए खड़ा होना चाहता हूँ; लेकिन मैं कद में सिर्फ दो इंच कम हूँ. कृपा कर के मेरी ऊंचाई बढ़ा दीजिये.

       उसे जवाब दिया गया— आप किसी पेड़ की डाली पकड़ कर लटक जाइए. रोज कभी चमगादड़ की तरह लटकिये, कभी बन्दर की तरह डाल पकड़ कर झूलिए; शर्तिया लंबे हो जाइएगा. खाने के लिए मुर्गी का अंडा और दूध.

        इसी भांति प्रोफ़ेसर साहब की नौकरी बजा कर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौटा, तो श्रीमतीजी ने जताया— नौवां महीना सिर पर सवार है, निर्घोष वर्मा या खद्योतकुमारी कभी भी आ सकती है.

        मैंने गर्वपूर्वक डट कर कहा – आने दो, कुछ परवाह नहीं है !

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राधाकृष्ण

राधाकृष्ण

जन्म : 18 सितंबर 1910, मृत्यु: मृत्यु: 3 फ़रवरी, 1979 उपन्यास: सनसनाते सपने, बोगस कहानियाँ: रामलीला, सजला, गेंद और गोल, गल्पिका
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