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आचार्य शुक्ल ने शृंगार को रसराज कहा है। कारण यह है कि  शृंगार रस के सहारे मनुष्य के सभी भावों को व्यंजित किया जा सकता है। यद्यपि सूरदास के यहाँ शृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का चित्रण मिलता है, तथापि सूरदास का मन ज्यादातर वियोग वर्णन में ही रमा है। सूरदास का भ्रमरगीत गोपियों के विरह की मार्मिक व्यंजना का काव्य है। आचार्य शुक्ल के अनुसार ‘वियोग की जितनी दशायें हो सकती हैं, जितने ढंगों से उन दशाओं का साहित्य में वर्णन हुआ है और सामान्यतः हो सकता है, वे सब सूरदास के यहाँ मौजूद हैं। सूरदास का कवि हृदय मन के भीतरी तहों तक जाकर वियोग की गहराई नापकर आता है।’

भ्रमरगीत में घटनाओं की विविधता नहीं है। कथा बस इतनी सी है कि कृष्ण के विरह में आकुल गोपियों और राधा को उद्धव निर्गुण ब्रह्म और योग का संदेश देने आते हैं और गोपियाँ भ्रमर के बहाने अपनी विरह व्यथा की सारी झुंझलाहट उद्धव पर निकाल देती हैं।

सूरदास गोपियों की इसी विरह व्यथा को कई-कई ढंगों से विभिन्न उपमानों द्वारा सामने रखते हैं। सूरदास की श्रेष्ठता इस बात में है कि घटनात्मक वैविध्य न होते हुये भी सिर्फ उदाहरणों और उपमानों की विभिन्नता के द्वारा गोपियों की विरह व्यथा को हृदयस्पर्शी बनाते हैं।

भ्रमरगीत में उद्धव प्रतीक हैं ज्ञान और योग के, जबकि गोपियाँ प्रतीक हैं भक्ति और प्रेम की। अन्ततः गोपियों के एकनिष्ठ प्रेम के समक्ष उद्धव का योग पराजित हो जाता है। गोपियों को निर्गुण की शिक्षा देने आने उद्धव ‘सगुण के चेरो’ होकर वापस लौटते हैं। निस्सन्देह भ्रमरगीत का एक आध्यात्मिक – दार्शनिक पक्ष भी है, जहाँ कृष्ण प्रतीक हैं ब्रह्म के, राधा आत्मा हैं और गोपियाँ शरीर-

सोलह सहस्त्र पीर तनु एके

राधा जीव सब देह

       उद्धव प्रतीक हैं ज्ञानाभिमान के, जिससे छुटकारा पाये बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है।

सूरदास के समय सगुण और निर्गुण विवाद अपने चरम पर था। भ्रमरगीत में सूरदास ने गोपियों के बहाने निर्गुण पर सगुण की जीत दिखाई है लेकिन, भ्रमरगीत को निर्गुण पर सगुण की श्रेष्ठता स्थापित करने वाला काव्य कहना उसका सरलीकरण करना होगा। वस्तुतः कोई भी काव्य सिर्फ विचारधारा को आधार बनाकर नहीं लिखा जा सकता। अगर सूरदास का भ्रमरगीत सार महज दार्शनिक विचार-विमर्श ही होता तो नन्ददास के भ्रमरगीत और इसमें कोई अन्तर नहीं होता और न ही यह श्रेष्ठ काव्य कहलाने का अधिकारी ही होता। सूरदास के भ्रमरगीत की श्रेष्ठता उसके दार्शनिक खण्डन-मण्डन में नहीं, बल्कि गोपियों के विरह की हृदयस्पर्शी व्यंजना में है।

गोपियों का प्रेम एकनिष्ठ प्रेम है। उनके लिए कृष्ण के सिवा कोई आश्रय नहीं है। कृष्ण का नाम उनके लिए हारिल की उस लकड़ी के समान है, जिसे पकड़कर वे लोकापवादों को सहती हुई भी यह जीवन रूपी सागर पार कर जाने की आकांक्षा रखती हैं।

गोपियाँ कृष्ण से अनन्य प्रेम करती हैं, फिर भी वे कृष्ण से मिलने कुछ ही कोस दूर मथुरा तक नहीं जाती। इसी कारण शुक्ल जी ने इसे ‘बैठे ठाले का प्रेम’ कहा है। वस्तुतः सामंती जकड़न से भरे एक समाज में भ्रमरगीत के सहारे सूरदास वर्जना मुक्त स्वाभिमानी नारी का एक गत्वर चित्र खड़ा कर रहे थे। सूरदास की गोपियाँ कृष्ण से मिलने उस मथुरा तक नहीं जा सकती जहाँ कृष्ण ने उनकी 1600 सौतों को रख छोड़ा है। अगर कृष्ण को उनसे मिलना होगा तो वे स्वयं आयेंगे। यह गोपियों का स्वाभिमान है, जो विरह की चरम अवस्था में पहुँचने पर भी उन्हें मथुरा जाने नहीं देता। शुक्लजी द्वारा इसे बैठे ठाले का प्रेम कहना निश्चय ही सूरदास के प्रति अन्याय है।

गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य समर्पण है। भले ही कृष्ण ने उनसे छल किया हो, मिलने का कहकर भी वापस नहीं आये होंµ गोपियों के हृदय में कृष्ण के अतिरिक्त और कोई नहीं आ सकता:-

उर में रहियो नाहिंन ठौर

नंदनंदन अछत कैसे आनिये उर और

उद्धव के ज्ञान-योग की बातें गोपियों के कृष्ण प्रेम की भूख को शान्त नहीं कर सकती:-

‘‘अँखिया हरि दर्शन की भूखी’’

कैसे रहे रूपरस राची

ये बतियाँ सुन सूखी’’

कृष्ण के विरह में जलती गोपियाँ उद्धव से निर्गुण बह्म की बातें सुनकर और खीझ जाती हैं और अपनी सारी खीझ, सारी जलन उद्धव के समक्ष उड़ेल देती हैं। गोपियों के तर्कों में आक्रामकता नहीं है, बल्कि है उनकी निरीहता, उनकी विवशता और उनकी व्यथा। सूर की गोपियाँ नन्ददास की गोपियों की तरह दार्शनिक तर्क नहीं देतीं, बल्कि उनके तर्क उनकी भावुकता को ही अधिक अभिव्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उद्धव के एक वाक्य के जवाब में भावनाओं के प्रवाह में बहती गोपियाँ तर्कों की  शृंखला लगा देती हैं। वे शास्त्र को नहीं समझतीं और समझना भी नहीं चाहतीं, परन्तु अपने मासूम तर्कों से स्त्रियों के लिए योग की निरर्थकता, उसकी कठोरता और शुष्कता को सहज ही प्रतिपादित कर जाती हैं।

गोपियों के पास एक ही मन था जो कृष्ण ने चुरा लिया। अब वे किस मन को प्रभु में लगावें और निर्गुण ब्रह्म की उपासना करें:-

उद्धव मन न भये दस-बीस

एक हूतो सो गयो श्याम संग, को अवराधे ईश।

पहली नजर में देखने में हो सकता है गोपियाँ आक्रामक लगे पर भावों की गहराई में उतरते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि ये ऐसी नायिकाऐं है, जिनकी विरह व्यथा का कोई छोर नहीं है। उनके तर्क तर्क नहीं आंसुओं का सतत प्रवाह हैं। कृष्ण का वियोग उनकी आँखों को कभी सूखने नहीं देता। आमतौर पर यह माना जाता है कि मनुष्य प्रकृति पर अपने भावों का आरोपण करता है। प्रकृति मनुष्य  को अपने सुखों और दुखों से संचालित होती हुई प्रतीत होने लगती है। जो वातावरण मिलन के क्षणों को आह्लाद और उन्माद से भर देता था, वही वातावरण उनकी विरह व्यथा को और मर्मभेदी बना रहा है।

जो चाँद मिलन के क्षणों में शीतलता प्रदान करता था, अब उसकी किरणें तन और मन दोनों को जला रही हैं। जिन कुंजों में राधा और गोपियों ने कभी कृष्ण के साथ केलि की थी, वही कुंज अब कांटों की तरह चुभने लगे। हृदय का रोम-रोम एक ही गुहार लगा रहा है:-

बारक वह मुह फेरि दिखायो।

कृष्ण का मुख देखने की उनकी तमन्ना पूरी नहीं होती और साथ ही विरह के दुःख को दुगुना करने के लिए उद्धव अपने ज्ञान और योग की गठरी लेकर चले आते हैं। उद्धव के आने से पहले गोपियों के मन में कृष्ण से मिलने की जो रही सही उम्मीद थी, वह भी टूट जाती है। अब उनकी एक ही उम्मीद है कि कृष्ण उनसे मिले या न मिले, उन्हें याद जरूर करें। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते गोपियों का सारा धैर्य जवाब दे जाता है और उनके भग्न हृदय की पीड़ा उनकी निरीहता के रूप में सामने आती है। गोपियों की नजर में यह पीड़ा उनके प्रेम की परीक्षा भी है। उद्धव के निर्गुण सन्देश से कृष्ण के प्रति गोपियों का प्रेम कम नहीं होता, बल्कि और दृढ़ ही होता है:-

उधो भलि करि तुम आये

विधि कुलाल कीन्हे काँचे घट, जो तुम आनि पकाये।

गोपियों का यह प्रेम प्रतिदान नहीं मिलने के बावजूद अपनी अनन्यता में अप्रतिम है। कृष्ण उनके पास रहें या न रहें, उनसे मिलें या न मिलें_ अन्ततः कृष्ण  उनके ही हैं। गोपियों के हृदय पर कृष्ण का एकछत्र अधिकार है:-

ब्याहो लाख धरौ दस कुबरी, अन्तहि कान्ह हमारे।

इस प्रकार विरह व्यंजना की दृष्टि से सूरदास का भ्रमरगीत हिन्दी साहित्य अन्यतम स्थान रखता है। वियोग  शृंगार की कोई ऐसी गली नहीं, जहाँ सूर न झाँक आये हों। संस्कृत आचार्यों ने विरह की ग्यारह अवस्थायें बताई है:-

अभिलाषा, चिन्ता, स्मरण, गुणकथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता, मूर्च्छा और मरण-गोपियों के विरह में ये सभी अवस्थायें देखी जा सकती हैं। सूरदास ने इसके लिए कोई सायास प्रयत्न नहीं किया, बल्कि उनकी अनुभूति की गहराई ने विरह के किसी पक्ष को ओझल नहीं होने दिया।

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भ्रमरगीत सार का विरह शृंगार

राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन

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