खंड-1 के लिए यहाँ क्लिक करें यों तो कल्याणसिंह के बहुत-से मेली-मुलाकाती थे मगर सूरजसिंह नामी एक जिमींदार उनका सच्चा और दिली दोस्त था, जिसकी यहाँ के राजा धर्मसिंह के वहाँ भी बड़ी इज्जत और कदर थी। सूरजसिंह का एक नौजवान लड़का भी था, जिसका नाम रामसिंह था और जिसे राजा धर्मसिंह ने बारह मौजों का तहसीलदार बना दिया था। उन दिनों तहसीलदारों को बहुत बड़ा अख्तियार रहता था, यहाँ तक सैकड़ों मुकदमे दीवानी और फौजदारी के खुद तहसीलदार ही फैसला करके उसकी रिपोर्ट राजा के पास भेज दिया करते थे। रामसिंह को राजा धर्मसिंह बहुत मानते थे। अस्तु, कुछ तो इस सबब से मगर ज्यादे अपनी बुद्धिमानी के सबब उसने अपनी इज्जत और धाक बहुत बढ़ा रक्खी थी। जिस तरह कल्याणसिंह और सूरजसिंह में दोस्ती थी, उसी तरह रामसिंह और हरनंदन में (जिसकी शादी होनेवाली थी) सच्ची मित्रता थी और आज की महफिल में वे दोनों ही बाप-बेटा मौजूद […]
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“बीबी जी, आप आवेंगी कि हम चाय बना दें!” किलसिया ने ऊपर की मंज़िल की रसोई से पुकारा। “नहीं, तू पानी तैयार कर- तीनों सेट मेज़ पर लगा दे, मैं आ रही हूँ। बाज़ आए तेरी बनाई चाय से। सुबह तीन-तीन बार पानी डाला तो भी इनकी काली और ज़हर की तरह कड़वी. . .। तुम्हारे हाथ डिब्बा लग जाए तो पत्ती तीन दिन नहीं चलती। सात रुपए में डिब्बा आ रहा है। मरी चाय को भी आग लग गई है।” मालकिन ने किलसिया को उत्तर दिया। आलस्य अभी टूटा नहीं था। ज़रा और लेट लेने के लिए बोलती गईं, “बेटा मंटू, तू ज़रा चली जा ऊपर। तीनों पॉट बनवा दे। बेटा, ज़रा देखकर पत्ती डालना, मैं अभी आ रही हूँ।” “अम्मा जी, ज़रा तुम आ जाओ! हमारी समझ में नहीं आता। बर्तन सब लगा दिए हैं।” सत्रह वर्ष की मंटू ने ऊपर से उत्तर दिया। ठीक ही कह रही […]
(1) ‘‘कल होली है.’’ ‘‘होगी.’’ ‘‘क्या तुम न मनाओगी?’’ ‘‘नहीं.’’ ‘‘नहीं?’’ ‘‘न.’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘क्या बताऊं क्यों?’’ ‘‘आख़िर कुछ सुनूं भी तो.’’ ‘‘सुनकर क्या करोगे?’’ ‘‘जो करते बनेगा.’’ ‘‘तुमसे कुछ भी न बनेगा.’’ ‘‘तो भी.’’ ‘‘तो भी क्या कहूं? क्या तुम नहीं जानते होली या कोई भी त्यौहार वही मनाता है जो सुखी है. जिसके जीवन में किसी प्रकार का सुख ही नहीं, वह त्यौहार भला किस बिरते पर मनावे?’’ ‘‘तो क्या तुमसे होली खेलने न आऊं?’’ ‘‘क्या करोगे आकर?’’ सकरुण दृष्टि से करुणा की ओर देखते हुए नरेश साइकिल उठाकर घर चल दिया. करुणा अपने घर के काम-काज में लग गई. (2) नरेश के जाने के आधे घंटे बाद ही करुणा के पति जगत प्रसाद ने घर में प्रवेश किया. उनकी आंखें लाल थीं. मुंह से तेज़ शराब की बू आ रही थी. जलती हुई सिगरेट को एक ओर फेंकते हुए वे कुर्सी खींचकर बैठ गए. भयभीत हिरनी की तरह […]
डॉ. महेंद्र सिंह राजपुरोहित पशु चिकित्सक हैं। घोड़ों का इलाज करते हैं। लेकिन, इस बार अफीम की पिनक में उन्होंने घोड़ों की खेती कर डाली है। आप भी होली के माहौल में आनंद लीजिए, इस पिनक का और पढ़िए घोड़ों की खेती। मारवाड़ में अफ़ीम का नशा नशा नहीं, एक शान है। अफ़ीम को बहुत बड़ी मान्यता प्राप्त है समाज में। अफ़ीम घोटने के लिए सुंदर नक्काशीदार खरल होती है, छानने के लिए ऊन का बना और स्टैंड पर लगा शानदार फिल्टर होता है। मारवाड़ में कोई भी सभा अफ़ीम की मनुहार के बिना अधूरी है। खुशी के मौके पर तो अफ़ीम ज़रूरी है ही, अगर किसी के बीच मनमुटाव या अनबन है तो अफ़ीम गला के बैर गलाया जाता है। अफ़ीम का सेवन करने वालों को इधर अमलदार कहा जाता है। बड़े शांत और सहज स्वभाव के होते हैं अमलदार। बातें करने में,आदर-मान देने में निपुण होते हैं […]
प्रथम खंड संध्या होने में अभी दो घंटे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे , क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है। जिधर निगाह दौड़ाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है। ऐसे समय में हम अपने पाठकों को उस सड़क पर ले चलते हैं जो दरभंगे से सीधी बाजितपुर की तरफ गई है। दरभंगे से लगभग दो कोस के आगे बढ़कर एक बैलगाड़ी पर चार नौजवान और हसीन तथा कमसिन रंडियाँ धानी, काफूर, पेयाजी और फालसई साड़ियाँ पहिरे मुख्तसर गहनों से अपने को सजाए आपुस में ठठोलपन करती बाजितपुर की तरफ जा रही हैं। इस गाड़ी के साथ-ही-साथ पीछे-पीछे एक दूसरी गाड़ी भी जा रही है, जो उन रंडियों के सफरदाओं के लिए थी। सफरदा गिनती में दस थे, मगर गाड़ी में पाँच से […]
1 लाला हंसराज से मेरी पहले-पहल जान-पहचान सन् 1924 ई० में हुई थी। उन दिनों विश्वविद्यालय की परीक्षा में पास होकर मैं अभी बाहर निकला ही था। रुपये-पैसे की कुछ कमी तो थी नहीं। पिताजी जो रुपया बैंक में जमा कर गए थे, उसके सूद से हिंदू होटल में शिष्ट शिक्षित मनुष्य की तरह रहकर भरण-पोषण का काम अच्छी तरह चल जाता था। किसी का कुछ देना-पावना नहीं था। इन सब झंझटों से दूर होकर भलेमानस की तरह अच्छी पोशाक, अच्छा खाना-पहनना सदा निर्विघ्न चला जाय, इसका प्रबंध मानो वे मेरे वास्ते अपने संचित धन से कर गए थे। इसी कारण मेरे मन में था कि सदा क्वाँरा रहकर साहित्य-चर्चा में जीवन व्यतीत करूँगा। पहले युवावस्था में यही जोश भर रहा था कि एकाग्रचित्त होकर वाणीदेवी की आराधना करके हिन्दी-साहित्य में युगान्तर उपस्थित कर दूँगा। उस अवस्था में हमारे देश के नवयुवकों को अनेक बड़े-बड़े स्वप्न आया करते हैं, […]
बेचारी किशोरी को चिता पर बैठाकर जिस समय दुष्टा धनपत ने आग लगाई, उसी समय बहुत-से आदमी, जो उसी जंगल में किसी जगह छिपे हुए थे, हाथों में नंगी तलवारें लिये ‘मारो! मारो!’ कहते हुए उन लोगों पर आ टूटे। उन लोगों ने सबसे पहले किशोरी को चिता पर से खींच लिया इसके बाद धनपत के साथियों को पकड़ने लगे। पाठक समझते होंगे कि ऐसे समय में इन लोगों के आ पहुंचने और जान बचने से किशोरी खुश हुई होगी और इन्द्रजीतसिंह से मिलने की कुछ उम्मीद भी उसे हो गई होगी। मगर नहीं, अपने बचाने वालों को देखते ही किशोरी चिल्ला उठी और उसके दिल का दर्द पहले से भी ज्यादा बढ़ गया। किशोरी ने आसमान की तरफ देखकर कहा, “मुझे तो विश्वास हो गया था कि इस चिता में जलकर ठंडे-ठंडे बैकुण्ठ चली जाऊंगी, क्योंकि इसकी आंच कुंअर इन्द्रजीतसिंह की जुदाई की आंच से ज्यादा गर्म न होगी, […]
अभी खप्पर में एक-चौथाई से भी अधिक गेहूं शेष था। खप्पर में हाथ डालकर उसने व्यर्थ ही उलटा-पलटा और चक्की के पाटों के वृत्त में फैले हुए आटे को झाडक़र एक ढेर बना दिया। बाहर आते-आते उसने फिर एक बार और खप्पर में झांककर देखा, जैसे यह जानने के लिए कि इतनी देर में कितनी पिसाई हो चुकी हैं, परंतु अंदर की मिकदार में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। खस्स-खस्स की ध्वनि के साथ अत्यंत धीमी गति से ऊपर का पाट चल रहा था। घट का प्रवेशद्वार बहुत कम ऊंचा था, खूब नीचे तक झुककर वह बाहर निकला। सर के बालों और बांहों पर आटे की एक हलकी सफेद परत बैठ गई थी। खंभे का सहारा लेकर वह बुदबुदाया, ”जा, स्साला! सुबह से अब तक दस पंसेरी भी नहीं हुआ। सूरज कहाँ का कहाँ चला गया है। कैसी अनहोनी बात!” बात अनहोनी तो है ही। जेठ बीत रहा है। […]
बयान-6 अब हम अपने किस्से के सिलसिले को मोड़कर दूसरी तरफ झुकते हैं और पाठकों को पुण्यधाम काशी में ले चलकर संध्या के साथ गंगा के किनारे बैठी हुई एक नौजवान औरत की अवस्था पर ध्यान दिलाते हैं। सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं, चारों तरफ अंधेरी घिरी आती है। गंगाजी शांत भाव से धीरे-धीरे बह रही हैं। आसमान पर छोटे-छोटे बादल के टुकड़े पूरब की तरफ से चले आकर पश्चिम की तरफ इकट्ठे हो रहे हैं। गंगा के किनारे ही पर एक नौजवान औरत जिसकी उम्र पंद्रह वर्ष से ज्यादे न होगी हथेली पर गाल रखे जल की तरफ देखती न मालूम क्या सोच रही है। इसमें कोई शक नहीं कि यह औरत नखशिख से दुरुस्त और खूबसूरत है मगर रंग इसका सांवला है, तो भी इसकी खूबसूरती और नजाकत में किसी तरह का बट्टा नहीं लगता। थोड़ी-थोड़ी देर पर यह औरत सिर उठाकर चारों तरफ देखती और फिर […]
बयान – 1 अब हम अपने किस्से को फिर उसी जगह से शुरू करते हैं जब रोहतासगढ़ किले के अंदर लाली को साथ लेकर किशोरी सेंध की राह उस अजायबघर में घुसी जिसका ताला हमेशा बंद रहता था और दरवाजे पर बराबर पहरा पड़ा रहता था। हम पहले लिख आए हैं कि जब लाली और किशोरी उस मकान के अंदर घुसीं उसी समय कई आदमी उस छत पर चढ़ गये और “धरो, पकड़ो, न जाने पावे!” की आवाज लगाने लगे। लाली और किशोरी ने भी यह आवाज सुनी। किशोरी तो डरी मगर लाली ने उसी समय उसे धीरज दिया और कहा, “तुम डरो मत, ये लोग हमारा कुछ भी नहीं कर सकते।” लाली और किशोरी छत की राह जब नीचे उतरीं तो एक छोटी-सी कोठरी में पहुंचीं जो बिल्कुल खाली थी। उसके तीन तरफ दीवार में तीन दरवाजे थे, एक दरवाजा तो सदर था जिसके आगे बाहर की तरफ पहरा […]
रंगमंच का परदा गिर गया। तारा देवी ने शकुंतला का पार्ट खेलकर दर्शकों को मुग्ध कर दिया था। जिस वक्त वह शकुंतला के रुप में राजा दुष्यन्त के सम्मुख खड़ी ग्लानि, वेदना, और तिरस्कार से उत्तेजित भावों को आग्नेय शब्दों में प्रकट कर रही थी, दर्शक-वृन्द शिष्टता के नियमों की उपेक्षा करके मंच की ओर उन्मत्तों की भाँति दौड़ पड़े थे और तारादेवी का यशोगान करने लगे थे। कितने ही तो स्टेज पर चढ़ गये और तारादेवी के चरणों पर गिर पड़े। सारा स्टेज फूलों से पट गया, आभूषणों की वर्षा होने लगी। यदि उसी क्षण मेनका का विमान नीचे आ कर उसे उड़ा न ले जाता, तो कदाचित उस धक्कम-धक्के में दस-पाँच आदमियों की जान पर बन जाती। मैनेजर ने तुरन्त आकर दर्शकों को गुण-ग्राहकता का धन्यवाद दिया और वादा भी किया कि दूसरे दिन फिर वही तमाशा होगा। तब लोगों का मोहोन्माद शांत हुआ। मगर एक युवक उस […]
बयान 11 इसके बाद लाली ने दबी जुबान से किशोरी को कुछ समझाया और दो घंटे में फिर मिलने का वादा करके वहां से चली गयी। हम ऊपर कई दफे लिख आये हैं कि उस बाग में जिसमें किशोरी रहती थी एक तरफ ऐसी इमारत है जिसके दरवाजे पर बराबर ताला बंद रहता है और नंगी तलवार का पहरा पड़ा करता है। आधी रात का समय है। चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ है। तेज हवा चलने के कारण बड़े-बड़े पेड़ों के पत्ते लड़खड़ाकर सन्नाटे को तोड़ रहे हैं। इसी समय हाथ में कमंद लिए हुए लाली अपने को हर तरफ से बचाती और चारों तरफ गौर से देखती हुई उसी मकान के पिछवाड़े की तरफ जा रही है। जब दीवार के पास पहुंची कमंद लगाकर छत के ऊपर चढ़ गई। छत के ऊपर चारों तरफ तीन-तीन हाथ ऊंची दीवार थी। लाली ने बड़ी होशियारी से छत फोड़कर एक इतना बड़ा […]
प्रयाग-विश्वविद्यालय के अंडरग्रेजुएट के लिये डाक्टरी या वकालत के सदृश समय और धन-सापेक्ष व्यवसायों के सिवा नौकरी में नायब तहसीलदारी वा सब-रजिस्ट्रारी के पद ही अधिक आकर्षण रखते हैं; पर उनकी प्राप्ति के लिये विद्या से बढ़कर सिफारिश की जरूरत है। पिता के मित्र सूबेदार नन्हेसिंह से जब मैं मिला, तब उन्होंने दुःख प्रकाश करते हुए कहा कि मैं इसी वर्ष अपने भतीजे की सिफारिश कर चुका हूँ और परिमाण से अधिक सिफारिश करके मैं अपने हाकिम का दिमाग, अधिक भोजन से मेदे की तरह बिगाड़ना नहीं चाहता। उनकी युक्ति-युक्त बात सुनकर मैंने कहा—ठीक। खाली समय में उपन्यास पढ़ने का चसका कालेज में ही पड़ चुका था। उन्हीं दिनों अमेरिका के एक पत्र में, जो चुभते हुए उपन्यास लिखने में जवाब नहीं रखता था, पढ़ा-कहानी लिखनेवालों का व्यवसाय आजकल खूब चमक रहा है। जिसकी जैसी योग्यता होती है, वह इस पेशे से उतना ही पैदा कर लेता है। योरप में […]
“खाना बन गया??”- दरवाजा खुलते ही वो तेजी से भीतर दाखिल होकर वह गुर्राया। “न….नहीं”- सीमा सहमी सी बोली। “इतनी देर हो गयी? क्या घास छीलती रहती हो दिन भर? या शृंगार करती रहती हो? कोई काम होता है तुमसे? तुम्हे पता है मुझे कितना काम करना होता है?” वह दहाड़ा। “पर…” उसने कुछ कहना चाहा। “पर वर क्या।” वह चिल्लाया। “न जाने किस घड़ी इसे घर में मैं ले आया।” वह बुदबुदाया। “जल्दी करो और हाँ मैं अपने स्टडी में जा रहा हूँ। नौ बजे तक सब तैयार हो जाना चाहिए। तब तक मुझे डिस्टर्ब न करना।” कहकर उसने उसे हिकारत की नजरों से देखा। सीमा जहाँ थी वहीं जड़ खड़ी रह गयी। उसके होंठ थरथरा रहे थे। उसके आँखों से अश्रुधारा बहने लगी थी। तभी उसका फोन बजा। फोन पर उसकी दोस्त कौशल्या थी। “हाँ सीमा क्या हाल हैं।” सीमा ने फोन उठाया तो उसकी सहेली ने चहकते […]
छोटे मन की कच्ची धूप कहानी में उमा के संघर्षपूर्ण एवं साहसी जीवन की घटनाओं को उभारने का प्रयास कहानी लेखिका ने किया है। उमा का पति एक दिन हवाई जहाज की दुर्घटना में मर जाता है। तब उमा अपने बच्चों को लेकर किस प्रकार जीवन निर्वाह करती है, यही इस कहानी का मुख्य विषय है। साथ ही अबोध बच्चों का मनोवैज्ञानिक चित्रण भी सशक्त रूप से कहानी में किया गया है। सामने सड़क पार कर भूरी बिल्ली पीली कोठी की दीवार पर चढ गई। जाती हुई बिल्ली की परछाई धरती पर पड़ रही थी, जहाँ एक कुत्ता बैठा ध्यान से उस परछाई को देख रहा था। निस्तब्धता खुद बौराई-सी लग रही थी। उमा ने अपने शरीर को शाल से अलग किया। दोनों बच्चे अब भी सो रहे थे। वह रास्ता देख रही थी मेरी का, जो अक्सर सात बजकर पैंतीस मिनट तक आ जाती है। कहीं आज फिर उसका […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…