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बयान-6

अब हम अपने किस्से के सिलसिले को मोड़कर दूसरी तरफ झुकते हैं और पाठकों को पुण्यधाम काशी में ले चलकर संध्या के साथ गंगा के किनारे बैठी हुई एक नौजवान औरत की अवस्था पर ध्यान दिलाते हैं।

सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं, चारों तरफ अंधेरी घिरी आती है। गंगाजी शांत भाव से धीरे-धीरे बह रही हैं। आसमान पर छोटे-छोटे बादल के टुकड़े पूरब की तरफ से चले आकर पश्चिम की तरफ इकट्ठे हो रहे हैं। गंगा के किनारे ही पर एक नौजवान औरत जिसकी उम्र पंद्रह वर्ष से ज्यादे न होगी हथेली पर गाल रखे जल की तरफ देखती न मालूम क्या सोच रही है। इसमें कोई शक नहीं कि यह औरत नखशिख से दुरुस्त और खूबसूरत है मगर रंग इसका सांवला है, तो भी इसकी खूबसूरती और नजाकत में किसी तरह का बट्टा नहीं लगता। थोड़ी-थोड़ी देर पर यह औरत सिर उठाकर चारों तरफ देखती और फिर उसी तरह हथेली पर गाल रखकर कुछ सोचने लग जाती है।

इसके सामने ही गंगाजी में एक छोटा-सा बजड़ा खड़ा है जिस पर चार-पांच आदमी दिखाई दे रहे हैं और कुछ सफर का सामान और दो-चार हरबे भी मौजूद हैं।

थोड़ी देर में अंधेरा हो जाने पर वह औरत उठी, साथ ही बजड़े पर से दो सिपाही उतर आए और उसे सहारा देकर बजड़े पर ले गये। वह छत पर जा बैठी और किनारे की तरफ इस तरह देखने लगी जैसे किसी के आने की राह देख रही हो। बेशक ऐसा ही था, क्योंकि उसी समय हाथ में गठरी लटकाये एक आदमी आया जिसे देखते ही दो मल्लाह किनारे पर उतर आये, एक ने उसके हाथ से गठरी लेकर बजड़े की छत पर पहुंचा दिया और दूसरे ने उस आदमी को हाथ का हल्का सहारा देकर बजड़े पर चढ़ा दिया। वह भी छत पर उस औरत के सामने खड़ा हो गया और तब इशारे से पूछा कि ‘अब क्या हुक्म होता है’ जिसके जवाब में इशारे ही से उस औरत ने गंगा के उस पार की तरफ चलने को कहा। उस आदमी ने जो अभी आया था मांझियों को पुकारकर कहा कि बजड़ा उस पार ले चलो, इसके बाद अभी आए हुए आदमी और उस औरत में दो-चार बातें इशारे में हुईं जिसे हम कुछ नहीं समझे, हां इतना मालूम हो गया कि यह औरत गूंगी और बहरी है, मुंह से कुछ नहीं बोल सकती और न कान से कुछ सुन सकती है।

बजड़ा किनारे से खोला गया और पार की तरफ चला, चार मांझी डांड़ें लगाने लगे। वह औरत छत से उतरकर नीचे चली गई और मर्द भी अपनी गठरी जो लाया था लेकर छत से नीचे उतर आया। बजड़े में नीचे दो कोठरियां थीं, एक में सुंदर सफेद फर्श बिछा हुआ था और दूसरी में एक चारपाई बिछी और कुछ असबाब पड़ा हुआ था। यह औरत हाथ से कुछ इशारा करके फर्श पर बैठ गई और मर्द ने एक पटिया लकड़ी की और छोटी-सी टुकड़ी खड़िये की उसके सामने रख दी और आप भी बैठ गया और दोनों में बातचीत होने लगी मगर उसी लकड़ी की पटिया पर खड़िया से लिखकर। अब उन दोनों में जो बातचीत हुई हम नीचे लिखते हैं परंतु पाठक समझ रखें कि कुल बातचीत लिखकर हुई।

पहले उस औरत ने गठरी खोली और देखने लगी कि उसमें क्या है। पीतल का एक कलमदान निकला जिसे उस औरत ने खोला। पांच-सात चीठियां और पुर्जे निकले जिन्हें पढ़कर उसी तरह रख दिया और दूसरी चीजें देखने लगी। दो-चार तरह के रूमाल और कुछ पुराने सिक्के देखने के बाद टीन का एक बड़ा-सा डिब्बा खोला जिसके अंदर कोई ताज्जुब की चीज थी। डिब्बा खोलने के बाद पहले कुछ कपड़ा हटाया जो बेठन की तौर पर लगा हुआ था, इसके बाद झांककर उस चीज को देखा जो उस डिब्बे के अंदर थी।

न मालूम उस डिब्बे में क्या चीज थी कि जिसे देखते ही उस औरत की अवस्था बिल्कुल बदल गई। झांक के देखते ही वह हिचकी और पीछे की तरफ हट गई, पसीने से तर हो गई और बदन कांपने लगा, चेहरे पर हवाई उड़ने लगी और आंखें बंद हो गईं। उस आदमी ने फुर्ती से बेठन का कपड़ा डाल दिया और उस डिब्बे को उसी तरह बंद कर उस औरत के सामने से हटा लिया। उसी समय बजड़े के बाहर से एक आवाज आई, “नानकजी!”

नानकप्रसाद उसी आदमी का नाम था जो गठरी लाया था। उसका कद न लंबा और न बहुत नाटा था। बदन मोटा, रंग गोरा और ऊपर के दांत कुछ खुड़बुड़े से थे। आवाज सुनते ही वह आदमी उठा और बाहर आया, मल्लाहों ने डांड़ लगाना बंद कर दिया था, और तीन सिपाही मुस्तैद दरवाजे पर खड़े थे।

नानक – (एक सिपाही से) क्या है?

सिपाही – (पार की तरफ इशारा करके) मुझे मालूम होता है कि उस पार बहुत से आदमी खड़े हैं। देखिए कभी-कभी बादल हट जाने से जब चंद्रमा की रोशनी पड़ती है तो साफ मालूम होता है कि वे लोग भी बहाव की तरफ हटे ही जाते हैं जिधर हमारा बजड़ा जा रहा है।

नानक – (गौर से देखकर) हां ठीक तो है।

सिपाही – क्या ठिकाना शायद हमारे दुश्मन ही हों।

नानक – कोई ताज्जुब नहीं, अच्छा तुम नाव को बहाव की तरफ जाने दो, पार मत चलो।

इतना कहकर नानकप्रसाद अंदर गया, तब तक औरत के भी हवास ठीक हो गये थे और वह उस टीन के डिब्बे की तरफ जो इस समय बंद था बड़े गौर से देख रही थी। नानक को देखकर उसने इशारे से पूछा, “क्या है?”

इसके जवाब में नानक ने लकड़ी की पटिया पर खड़िया से लिखकर दिखाया कि “पार की तरफ बहुत-से आदमी दिखाई पड़ते हैं, कौन ठिकाना शायद हमारे दुश्मन हों।”

औरत – (लिखकर) बजड़े को बहाव की तरफ जाने दो। सिपाहियों को कहो बंदूक लेकर तैयार रहें, अगर कोई जल में तैरकर यहां आता हुआ दिखाई पड़े तो बेशक गोली मार दें।

नानक – बहुत अच्छा।

नानक फिर बाहर आया और सिपाहियों को हुक्म सुनाकर भीतर चला गया। उस औरत ने अपने आंचल से एक ताली खोलकर नानक के हाथ में दी और इशारे से कहा कि इस टीन के डिब्बे को हमारे संदूक में रख दो।

नानक ने वैसा ही किया, दूसरी कोठरी में जिसमें पलंग बिछा हुआ था और कुछ असबाब और संदूक रखा हुआ था गया और उसी ताली से एक संदूक खोलकर वह टीन का डिब्बा रख दिया और उसी तरह ताला बंद कर ताली उस औरत के हवाले की। उसी समय बाहर से बंदूक की आवाज आई।

नानक ने तुरंत बाहर आकर पूछा, “क्या है?”

सिपाही – देखिये कई आदमी तैरकर इधर आ रहे हैं।

दूसरा – मगर बंदूक की आवाज पाकर अब लौट चले।

नानक फिर अंदर गया और बाहर का हाल पटिया पर लिखकर औरत को समझाया। वह भी उठ खड़ी हुई और बाहर आकर पार की तरफ देखने लगी। घंटा भर यों ही गुजर गया और अब वे आदमी जो पार दिखाई दे रहे थे या तैरकर इस बजड़े की तरफ आ रहे थे कहीं चले गये, दिखाई नहीं देते। नानकप्रसाद को साथ आने का इशारा करके वह औरत फिर बजड़े के अंदर चली गई और पीछे नानक भी गया। उस गठरी में और जो-जो चीजें थीं वह गूंगी औरत देखने लगी। तीन-चार बेशकीमती मर्दाने कपड़ों के सिवाय और उस गठरी में कुछ भी न था। गठरी बांधकर एक किनारे रख दी गई और पटिया पर लिख-लिखकर दोनों में बातचीत होने लगी।

औरत – कलमदान में जो चीठियां हैं वे तुमने कहां से पार्ईं

नानक – उसी कलमदान में थीं।

औरत – और वह कलमदान कहां पर था

नानक – उसकी चारपाई के नीचे पड़ा हुआ था, घर में सन्नाटा था और कोई दिखाई न पड़ा, जो कुछ जल्दी में पाया ले आया।

औरत – खैर कोई हर्ज नहीं, हमें केवल उस टीन के डिब्बे से मतलब था। यह कलमदान मिल गया तो इन चीठी-पुर्जों से भी बहुत काम चलेगा।

इसके अलावे और कई बातें हुईं जिसके लिखने की यहां कोई जरूरत नहीं। पहर रात से ज्यादे जा चुकी थी जब वह औरत वहां से उठी और शमादान जो जल रहा था बुझा अपनी चारपाई पर जाकर लेट रही। नानक भी एक किनारे फर्श पर सो रहा और रात भर नाव बेखटके चली गई, कोई बात ऐसी नहीं हुई जो लिखने योग्य हो।

जब थोड़ी रात बाकी रही वह औरत अपनी चारपाई से उठी और खिड़की से बाहर झांककर देखने लगी। इस समय आसमान बिल्कुल साफ था, चंद्रमा के साथ ही साथ तारे भी समयानुसार अपनी चमक दिखा रहे थे और दो-तीन खिड़कियों की राह इस बजड़े के अंदर भी चांदनी आ रही थी। बल्कि जिस चारपाई पर वह औरत सोई हुई थी चंद्रमा की रोशनी अच्छी तरह पड़ रही थी। वह औरत धीरे से चारपाई के नीचे उतरी और उस संदूक को खोला जिसमें नानक का लाया हुआ टीन का डिब्बा रखवा दिया था। डिब्बा उसमें से निकालकर चारपाई पर रखा और संदूक बंद करने के बाद दूसरा संदूक खोलकर उसमें से एक मोमबत्ती निकाली और चारपाई पर आकर बैठ रही। मोमबत्ती में से मोम लेकर उसने टीन के डिब्बे की दरारों को अच्छी तरह बंद किया और हर एक जोड़ में मोम लगाया जिससे हवा तक भी उसके अंदर न जा सके। इस काम के बाद वह खिड़की के बाहर गर्दन निकालकर बैठी और किनारे की तरफ देखने लगी। दो मांझी धीरे-धीरे डांड़ खे रहे थे, जब वे थक जाते तो दूसरे दो को उठाकर उसी काम पर लगा देते और आप आराम करते।

सबेरा होते-होते वह नाव एक ऐसी जगह पहुंची जहां किनारे पर कुछ आबादी थी, बल्कि गंगा के किनारे ही एक ऊंचा शिवालय भी था और उतरकर गंगाजी में स्नान करने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई थीं। औरत ने उस मुकाम को अच्छी तरह देखा और जब वह बजड़ा उस शिवालय के ठीक सामने पहुंचा तब उसने टीन का डिब्बा जिसमें कोई अद्भुत वस्तु थी और जिसके सुराखों को उसने अच्छी तरह मोम से बंद कर दिया था जल में फेंक दिया और फिर अपनी चारपाई पर लेट रही। यह हाल किसी दूसरे को मालूम न हुआ। थोड़ी ही देर में वह आबादी पीछे रह गई और बजड़ा दूर निकल गया।

जब अच्छी तरह सबेरा हुआ और सूर्य की लालिमा निकल आई तो उस औरत के हुक्म के मुताबिक बजड़ा एक जंगल के किनारे पहुंचा। उस औरत ने किनारे-किनारे चलने का हुक्म दिया। यह किनारा इसी पार का था जिस तरफ काशी पड़ती है या जिस हिस्से से बजड़ा खोलकर सफर शुरू किया गया था।

बजड़ा किनारे-किनारे जाने लगा और वह औरत किनारे के दरख्तों को बड़े गौर से देखने लगी। जंगल गुंजान और रमणीक था, सुबह के सुहावने समय में तरह-तरह के पक्षी बोल रहे थे, हवा के झपेटों के साथ जंगली फूलों की मीठी खुशबू आ रही थी। वह औरत एक खिड़की में सिर रखे जंगल की शोभा देख रही थी। यकायक उसकी निगाह किसी चीज पर पड़ी जिसे देखते ही वह चौंकी और बाहर आकर बजड़ा रोकने और किनारे लगाने का इशारा करने लगी।

बजड़ा किनारे लगाया गया और वह गूंगी औरत अपने सिपाहियों को कुछ इशारा करके नानक को साथ लेकर नीचे उतरी।

घंटे भर तक वह जंगल में घूमती रही, इसी बीच में उसने अपने जरूरी काम और नहाने-धोने से छुट्टी पा ली और तब बजड़े में आकर कुछ भोजन करने के बाद उसने अपनी मर्दानी सूरत बनाई। चुस्त पायजामा, घुटने के ऊपर तक का चपकन, कमरबंद, सिर से बड़ा-सा मुंड़ासा बांधा और ढाल-तलवार-खंजर के अलावे एक छोटी-सी पिस्तौल जिसमें गोली भरी हुई थी कमर में छिपा और थोड़ी-सी गोली-बारूद भी पास रख बजड़े से उतरने के लिए तैयार हुई।

नानक ने उसकी ऐसी अवस्था देखी तो सामने अड़कर खड़ा हो गया और इशारे से पूछा कि अब हम क्या करें इसके जवाब में उस औरत ने पटिया और खड़िया मांगी और लिख-लिखकर दोनों में बातचीत होने लगी।

औरत – तुम इसी बजड़े पर अपने ठिकाने चले जाओ। मैं तुमसे आ मिलूंगी।

नानक – मैं किसी तरह तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता, तुम खूब जानती हो कि तुम्हारे लिए मैंने कितनी तकलीफें उठाई हैं और नीच से नीच काम करने को तैयार रहा हूं।

औरत – तुम्हारा कहना ठीक है मगर मुझ गूंगी के साथ तुम्हारी जिंदगी खुशी से नहीं बीत सकती, हां, तुम्हारी मुहब्बत के बदले मैं तुम्हें अमीर किये देती हूं जिसके जरिये तुम खूबसूरत से खूबसूरत औरत ढूंढ़कर शादी कर सकते हो।

नानक – अफसोस, आज तुम इस तरह की नसीहत करने पर उतारू हुर्ई और मेरी सच्ची मुहब्बत का कुछ खयाल न किया। मुझे धन-दौलत की परवाह नहीं और न मुझे तुम्हारे गूंगी होने का रंज है बस मैं इस बारे में ज्यादे बातचीत नहीं करना चाहता, या तो मुझे कबूल करो या साफ जवाब दो ताकि मैं इसी जगह तुम्हारे सामने अपनी जान देकर हमेशा के लिए छुट्टी पाऊं। मैं लोगों के मुंह से यह नहीं सुना चाहता कि ‘रामभोली के साथ तुम्हारी मुहब्बत सच्ची न थी और तुम कुछ न कर सके।’

रामभोली – (गूंगी औरत) अभी मैं अपने कामों से निश्चिंत नहीं हुई, जब आदमी बेफिक्र होता है तो शादी-ब्याह और हंसी-खुशी की बातें सूझती हैं, मगर इसमें शक नहीं कि तुम्हारी मुहब्बत सच्ची है और मैं तुम्हारी कद्र करती हूं।

नानक – जब तक तुम अपने कामों से छुट्टी नहीं पातीं मुझे अपने साथ रखो, मैं हर काम में तुम्हारी मदद करूंगा और जान तक दे देने को तैयार रहूंगा।

रामभोली – खैर मैं इस बात को मंजूर करती हूं, सिपाहियों को समझा दो कि बजड़े को ले जाएं और इसमें जो कुछ चीजें हैं अपनी हिफाजत में रखें, क्योंकि वह लोहे का डिब्बा भी जो तुम कल लाये थे मैं इसी नाव में छोड़े जाती हूं।

नानकप्रसाद खुशी के मारे ऐंठ गये। बाहर आकर सिपाहियों को बहुत कुछ समझाने-बुझाने के बाद आप भी हर तरह से लैस हो बदन पर हरबे लगा साथ चलने को तैयार हो गए। रामभोली और नानक बजड़े के नीचे उतरे। इशारा पाकर मांझियों ने बजड़ा खोल दिया और वह फिर बहाव की तरफ जाने लगा।

नानक को साथ लिए हुए रामभोली जंगल में घुसी। थोड़ी ही दूर जाकर वह एक ऐसी जगह पहुंची जहां बहुत-सी पगडंडियां थीं, खड़ी होकर चारों तरफ देखने लगी। उसकी निगाह एक कटे हुए साखू के पेड़ पर पड़ी जिसके पत्ते सूखकर गिर चुके थे। वह उस पेड़ के पास जाकर खड़ी हो गई और इस तरह चारों तरफ देखने लगी जैसे कोई निशान ढूंढ़ती हो। उस जगह की जमीन बहुत पथरीली और ऊंची-नीची थी। लगभग पचास गज की दूरी पर एक पत्थर का ढेर नजर आया जो आदमी के हाथ का बनाया हुआ मालूम होता था। वह उस पत्थर के ढेर के पास गई और दम लेने या सुस्ताने के लिए बैठ गई। नानक ने अपना कमरबंद खोला और एक पत्थर की चट्टान झाड़कर उसे बिछा दिया, रामभोली उसी पर जा बैठी और नानक को अपने पास बैठने का इशारा किया।

ये दोनों आदमी अभी सुस्ताये भी न थे कि सामने से एक सवार सुर्ख पोशाक पहिरे इन्हीं दोनों की तरफ आता हुआ दिखाई पड़ा। पास आने पर मालूम हुआ कि यह एक नौजवान औरत है जो बड़े ठाठ के साथ हरबे लगाये मर्दों की तरह घोड़े पर बैठी बहादुरी का नमूना दिखा रही है। वह रामभोली के पास आकर खड़ी हो गई और उस पर एक भेद वाली नजर डालकर हंसी। रामभोली ने भी उसकी हंसी का जवाब मुस्कराकर दिया और कनखियों से नानक की तरफ इशारा किया। उस औरत ने रामभोली को अपने पास बुलाया और जब वह घोड़े के पास जाकर खड़ी हो गई तो आप घोड़े से नीचे उतर पड़ी। कमर से एक छोटा-सा बटुआ खोलकर एक चीठी और एक अंगूठी निकाली जिस पर एक सुर्ख नगीना जड़ा हुआ था और रामभोली के हाथ में रख दिया।

रामभोली का चेहरा गवाही दे रहा था कि वह इस अंगूठी को पाकर हद से ज्यादे खुश हुई है। रामभोली ने इज्जत देने के ढंग पर उस अंगूठी को सिर से लगाया और इसके बाद अपनी अंगुली में पहन लिया, चीठी कमर में खोंसकर फुर्ती से उस घोड़े पर सवार हो गई और देखते ही देखते जंगल में घुसकर नजरों से गायब हो गई।

नानकप्रसाद यह तमाशा देख भौंचक-सा रह गया, कुछ करते-धरते बन न पड़ा। न मुंह से कोई आवाज निकली और न हाथ के इशारे ही से कुछ पूछ सका, पूछता भी तो किससे रामभोली ने तो नजर उठा के उसकी तरफ देखा तक नहीं। नानक बिल्कुल नहीं जानता था कि यह सुर्ख पोशाक वाली औरत कौन है, जो यकायक यहां आ पहुंची और जिसने इशारेबाजी करके रामभोली को अपने घोड़े पर सवार कर भगा दिया। वह औरत नानक के पास आई और हंस के बोली –

औरत – वह औरत जो तेरे साथ थी मेरे घोड़े पर सवार होकर चली गई, कोई हर्ज नहीं, मगर तू उदास क्यों हो गया क्या तुझसे और उससे कोई रिश्तेदारी थी?

नानक – रिश्तेदारी थी तो नहीं मगर होने वाली थी, तुमने सब चौपट कर दिया।

औरत – (मुस्कराकर) क्या उससे शादी करने की धुन समाई थी?

नानक – बेशक ऐसा ही था। वह मेरी हो चुकी थी, तुम नहीं जानती कि मैंने उसके लिए कैसी-कैसी तकलीफें उठाईं। अपने बाप-दादे की जमींदारी चौपट की और उसकी गुलामी करने पर तैयार हुआ।

औरत – (बैठकर) किसकी गुलामी?

नानक – उसी रामभोली की जो तुम्हारे घोड़े पर सवार होकर चली गई।

औरत – (चौंककर) क्या नाम लिया, जरा फिर तो कहो।

नानक – रामभोली।

औरत – (हंसकर) बहुत ठीक, तू मेरी सखी अर्थात उस औरत को कब से जानता है?

नानक – (कुछ चिढ़कर और मुंह बनाकर) उसे मैं लड़कपन से जानता हूं मगर तुम्हें सिवाय आज के कभी नहीं देखा, वह तुम्हारी सखी क्योंकर हो सकती है?

औरत – तू झूठा, बेवकूफ और उल्लू बल्कि उल्लू का इत्र है! तू मेरी सखी को क्या जाने, जब तू मुझे नहीं जानता तो उसे क्योंकर पहचान सकता है।

उस औरत की बातों ने नानक को आपे से बाहर कर दिया। वह एकदम चिढ़ गया और गुस्से में आकर म्यान से तलवार निकालकर बोला –

नानक – कम्बख्त औरत, मुझे बेवकूफ बताती है! जली-कटी बातें कहती है और मेरी आंखों में धूल डाला चाहती है! अभी तेरा सिर काट के फेंक देता हूं!!

औरत – (हंसकर) शाबाश, क्यों न हो, आप जवांमर्द जो ठहरे! (नानक के मुंह के पास चुटकियां बजाकर) चेत ऐंठासिंह, जरा होश की दवा कर!

अब नानकप्रसाद बर्दाश्त न कर सका और यह कहकर कि ‘ले अपने किये का फल भोग!’ उसने तलवार का वार उस औरत पर किया। औरत ने फुर्ती से अपने को बचा लिया और हाथ बढ़ा नानक की कलाई पकड़ जोर से ऐसा झटका दिया कि तलवार उसके हाथ से निकलकर दूर जा गिरी और नानक आश्चर्य में आकर उसका मुंह देखने लगा। औरत ने हंसकर नानक से कहा, “बस इसी जवांमर्दी पर मेरी सखी से ब्याह करने का इरादा था! बस जा और हिजड़ों में मिलकर नाच कर!”

इतना कहकर औरत हट गई और पश्चिम की तरफ रवाना हुई। नानक का क्रोध अभी शांत नहीं हुआ था। उसने अपनी तलवार जो दूर पड़ी हुई थी उठाकर म्यान में रख ली और कुछ सोचता और दांत पीसता हुआ उस औरत के पीछे चला। वह औरत इस बात से भी होशियार थी कि नानक पीछे से आकर धोखे में तलवार न मारे, वह कनखियों से पीछे की तरफ देखती जाती थी।

थोड़ी दूर जाने के बाद वह औरत एक कुएं पर पहुंची जिसका संगीन चबूतरा एक पुर्से से कम ऊंचा न था। चारों तरफ चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। कुआं बहुत बड़ा और खूबसूरत था। वह औरत कुएं पर चली गई और बैठकर धीरे-धीरे कुछ गाने लगी।

समय दोपहर का था, धूप खूब निकली थी, मगर इस जगह कुएं के चारों तरफ घने पेड़ों की ऐसी छाया थी और ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी कि नानक की तबीयत खुश हो गई, क्रोध, रंज और बदला लेने का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा, तिस पर उस औरत की सुरीली आवाज ने और भी रंग जमाया। वह उस औरत के सामने जाकर बैठ गया और उसका मुंह देखने लगा। दो ही तीन तान लेकर वह औरत चुप हो गई और नानक से बोली –

औरत – अब तू मेरे पीछे-पीछे क्यों घूम रहा है जहां तेरा जी चाहे जा और अपना काम कर, व्यर्थ समय क्यों नष्ट करता है अब तुझे तेरी रामभोली किसी तरह नहीं मिल सकती, उसका ध्यान अपने दिल से दूर कर दे।

नानक – रामभोली झख मारेगी और मेरे पास आवेगी, वह मेरे कब्जे में है। उसकी एक ऐसी चीज मेरे पास है जिसे वह जीते जी कभी नहीं छोड़ सकती।

औरत – (हंसकर) इसमें कोई शक नहीं कि तू पागल है, तेरी बातें सुनने से हंसी आती है, खैर तू जाने, तेरा काम जाने मुझे इससे क्या मतलब!

इतना कहकर उस औरत ने कुएं में झांका और पुकारकर कहा, “कूपदेव, मुझे प्यास लगी है, जरा पानी तो पिलाना।”

औरत की बात सुनकर नानक घबराया और जी में सोचने लगा कि यह अजब औरत है। कुएं पर हुकूमत चलाती है कि मुझे पानी पिला। यह औरत मुझे पागल कहती है मगर मैं इसी को पागल समझता हूं, भला कुआं इसे क्योंकर पानी पिलावेगा जो हो, मगर यह औरत खूबसूरत है और इसका गाना भी बहुत ही उम्दा है।

नानक इन बातों को सोच ही रहा था कि कोई चीज देखकर चौंक पड़ा बल्कि घबड़ाकर उठ खड़ा हुआ और कांपते हुए तथा डरी हुई सूरत से कुएं की तरफ देखने लगा। वह एक हाथ था जो चांदी के कटोरे में साफ और ठंडा जल लिए हुए कुएं के अंदर से निकला और इसी को देखकर नानक घबरा गया था।

वह हाथ किनारे आया, उस औरत ने कटोरा ले लिया और जल पीने के बाद कटोरा उसी हाथ पर रख दिया, हाथ कुएं के अंदर चला गया और वह औरत फिर उसी तरह गाने लगी। नानक ने अपने जी में कहा, “नहीं-नहीं, यह औरत पागल नहीं बल्कि मैं ही पागल हूं, क्योंकि इसे अभी तक न पहचान सका। बेशक यह कोई गंधर्व या अप्सरा है, नहीं-नहीं देवनी है जो रूप बदलकर आई है तभी तो इसके बदन में इतनी ताकत है कि मेरी कलाई पकड़ और झटका देकर इसने तलवार गिरा दी। मगर रामभोली से इसका परिचय कहां हुआ’

गाते-गाते यकायक वह औरत उठ खड़ी हुई और बड़े जोर से चिल्लाकर उसी कुएं में कूद पड़ी।

बयान–7

लाल पोशाक वाली औरत की अद्भुत बातों ने नानक को हैरान कर दिया। वह घबड़ाकर चारों तरफ देखने लगा और डर के मारे उसकी अजब हालत हो गई। वह उस कुएं पर भी ठहर न सका और जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता हुआ इस उम्मीद में गंगाजी की तरफ रवाना हुआ कि अगर हो सके तो किनारे-किनारे चलकर उस बजड़े तक पहुंच जाय मगर यह भी न हो सका क्योंकि उस जंगल में बहुत-सी पगडंडियां थीं जिन पर चलकर वह रास्ता भूल गया और किसी दूसरी ही तरफ जाने लगा।

नानक लगभग आधा कोस के गया होगा कि प्यास के मारे बेचैन हो गया। वह जल खोजने लगा मगर उस जंगल में कोई चश्मा या सोता ऐसा न मिला जिससे प्यास बुझाता। आखिर घूमते-घूमते उसे पत्ते की एक झोंपड़ी नजर पड़ी जिसे वह किसी फकीर की कुटिया समझकर उसी तरफ चल पड़ा मगर पहुंचने पर मालूम हुआ कि उसने धोखा खाया। उस जगह कई पेड़ ऐसे थे जिनकी डालियां झुककर और आपस में मिलकर ऐसी हो रही थीं कि दूर से झोंपड़ी मालूम पड़ती थी, तो भी नानक के लिए वह जगह बहुत उत्तम थी, क्योंकि उन्हीं पेड़ों में से उसे एक चश्मा साफ पानी का बहता हुआ दिखाई पड़ा जिसके दोनों तरफ खुशनुमा सायेदार पेड़ लगे हुए थे जिन्होंने एक तौर पर उस चश्मे को भी अपने साये के नीचे कर रखा था। नानक खुशी-खुशी चश्मे के किनारे पहुंचा और हाथ-मुंह धोने के बाद जल पीकर आराम करने के लिए बैठ गया।

थोड़ी देर चश्मे के किनारे बैठे रहने के बाद दूर से कोई चीज पानी में बहकर इसी तरफ आती हुई नानक ने देखी। पास आने पर मालूम हुआ कि कोई कपड़ा है। वह जल में उतर गया और कपड़े को खींच लाकर गौर से देखने लगा क्योंकि वह वही कपड़ा था जो बजड़े से उतरते समय रामभोली ने अपनी कमर में लपेटा था।

नानक ताज्जुब में आकर देर तक उस कपड़े को देखता और तरह-तरह की बातें सोचता रहा। रामभोली उसके देखते-देखते घोड़े पर सवार हो चली गयी थी, फिर उसे क्योंकर विश्वास हो सकता था कि यह कपड़ा रामभोली का है। तो भी उसने कई दफे अपनी आंखें मलीं और उस कपड़े को देखा, आखिर विश्वास करना ही पड़ा कि यह रामभोली की चादर है। रामभोली से मिलने की उम्मीद में वह चश्मे के किनारे-किनारे रवाना हुआ क्योंकि उसे इस बात का गुमान हुआ कि घोड़े पर सवार होकर चले जाने के बाद रामभोली जरूर कहीं पर इसी चश्मे के किनारे पहुंची होगी और किसी सबब से यह कपड़ा जल में गिर पड़ा होगा।

नानक चश्मे के किनारे-किनारे कोस भर के लगभग चला गया और चश्मे के दोनों तरफ उसी तरह सायेदार पेड़ मिलते गये, यहां तक कि दूर से उसे एक छोटे से मकान की सफेदी नजर आई। वह यह सोचकर खुश हुआ कि शायद इसी मकान में रामभोली से मुलाकात होगी, कदम बढ़ाता हुआ तेजी के साथ जाने लगा और थोड़ी देर में उस मकान के पास जा पहुंचा।

वह मकान चश्मे के बीचोंबीच में पुल के तौर पर बना हुआ था। चश्मा बहुत चौड़ा न था, उसकी चौड़ाई बीस-पचीस हाथ से ज्यादे न होगी। चश्मे के दोनों पार की जमीन इस मकान के नीचे आ गई थी और बीच में पानी बह जाने के लिए नहर की चौड़ाई के बराबर पुल की तरह का एक दर बना हुआ था जिसके ऊपर छोटा-सा एक मंजिला मकान निहायत खूबसूरत बना हुआ था। नानक इस मकान को देखकर बहुत ही खुश हुआ और सोचने लगा कि यह जरूर किसी मनचले शौकीन का बनवाया हुआ होगा। यहां से इस चश्मे और चारों तरफ के जंगल की बहार खूब ही नजर आती है। इस मकान के अंदर चलकर देखना चाहिए, खाली है या कोई रहता है। नानक उस मकान के सामने की तरफ गया। उसकी कुर्सी बहुत ऊंची थी, पंद्रह सीढ़ियां चढ़ने के बाद दरवाजे पर पहुंचा। दरवाजा खुला हुआ था, बेधड़क अंदर घुस गया।

इस मकान के चारों कोनों में चार कोठरियां और चारों तरफ चार दालान बरामदे की तौर पर थे जिसके आगे कमर बराबर ऊंचा जंगला लगा हुआ था अर्थात हर एक दालान के दोनों बगल कोठरियां पड़ती थीं और बीचोंबीच में एक भारी कमरा था। इस मकान में किसी तरह की सजावट न थी मगर साफ था।

दरवाजे के अंदर पैर रखते ही बीच वाले कमरे में बैठे हुए एक साधू पर नानक की निगाह पड़ी। वह मृगछाला पर बैठा हुआ था। उसकी उम्र अस्सी वर्ष से भी ज्यादे होगी, उसके बाल रुई की तरह सफेद हो रहे थे, लंबे-लंबे सिर के बाल सूखे और खुले रहने के सबब खूब फैले हुए थे, और दाढ़ी नाभि तक लटक रही थी। कमर में मूंज की रस्सी के सहारे कोपीन थी, और कोई कपड़ा उसके बदन पर न था, गले में जनेऊ पड़ा हुआ था और उसके दमकते हुए चेहरे पर बुजुर्गी और तपोबल की निशानी पाई जाती थी। जिस समय नानक की निगाह उस साधू पर पड़ी वह पद्मासन में बैठा हुआ ध्यान में था, आंखें बंद थीं और हाथ जंघे पर पड़े हुए थे। नानक उसके सामने जाकर देर तक खड़ा रहा मगर उसे कुछ खबर न हुई। नानक ने सर उठाकर चारों तरफ अच्छी तरह देखा मगर सिवाय बड़ी-बड़ी दो तस्वीरों के जिन पर पर्दा पड़ा हुआ था और साधू के पीछे की तरफ दीवार के साथ लगी हुई थीं और कुछ कहीं दिखाई न पड़ा।

नानक को ताज्जुब हुआ और वह सोचने लगा कि इस मकान में किसी तरह का सामान नहीं है फिर महात्मा का गुजर क्योंकर चलता होगा और वे दोनों तस्वीरें कैसी हैं जिनका रहना इस मकान में जरूरी समझा गया! इसी फिक्र में वह चारों तरफ घूमने और देखने लगा। उसने हर एक दालान और कोठरी की सैर की मगर कहीं एक तिनका भी नजर न आया, हां, एक कोठरी में वह न जा सका जिसका दरवाजा बंद था मगर जाहिर में कोई ताला या जंजीर उस दरवाजे में दिखाई न दिया, मालूम नहीं वह क्योंकर बंद था। घूमता-फिरता नानक बगल के दालान में आया और बरामदे में झांककर नीचे की बहार देखने लगा और इसी में उसने घंटा भर बिता दिया।

घूम-फिरकर पुनः बाबाजी के पास गया मगर उन्हें उसी तरह आंखें बंद किए बैठा पाया। लाचार इस उम्मीद में एक किनारे बैठ गया कि आखिर कभी तो आंख खुलेगी। शाम होते-होते बगल की कोठरी में से जिसका दरवाजा बंद था और जिसके अंदर नानक न जा सका था शंख बजने की आवाज आई। नानक को बड़ा ही ताज्जुब हुआ मगर उस आवाज ने साधू का ध्यान तोड़ दिया। आंखें खुलते ही नानक पर उसकी नजर पड़ी।

साधू – तू कौन है और यहां क्योंकर आया है

नानक – मैं मुसाफिर हूं, आफत का मारा भटकता हुआ इधर आ निकला। यहां आपके दर्शन हुए, दिल में बहुत कुछ उम्मीदें पैदा हुर्ईं।

साधू – मनुष्य से किसी तरह की उम्मीद न रखनी चाहिए, खैर यह बता, तेरा मकान कहां है और इस जंगल में, जहां आकर वापस जाना मुश्किल है, कैसे आया?

नानक – मैं काशी का रहने वाला हूं, कार्यवश एक औरत के साथ जो मेरे मकान के बगल ही में रहा करती थी यहां आना हुआ, इस जंगल में उस औरत का साथ छूट गया और ऐसी विचित्र बातें देखने में आईं जिनके डर से अभी तक मेरा कलेजा कांप रहा है।

साधू – ठीक है, तेरा किस्सा बहुत बड़ा मालूम होता है जिसके सुनने की अभी मुझे फुरसत नहीं है, जरा ठहर मैं एक काम से छुट्टी पा लूं तो तुझसे बातें करूं। घबराइयो नहीं मैं ठीक एक घंटे में आऊंगा।

इतना कहकर साधू वहां से चला गया। दरवाजे की आवाज और अंदाज से नानक को मालूम हुआ कि साधू उसी कोठरी में गया जिसका दरवाजा बंद था और जिसके अंदर नानक न जा सका था। लाचार नानक बैठा रहा मगर इस बात से कि साधू को आने में घंटे भर की देर लगेगी वह घबराया और सोचने लगा कि तब तक क्या करना चाहिए। यकायक उसका ध्यान उन दोनों तस्वीरों पर गया जो दीवार के साथ लगी हुई थीं। जी में आया कि इस समय यहां सन्नाटा है, साधू महाशय भी नहीं हैं, जरा पर्दा उठाकर देखें तो यह तस्वीर किसकी हैं। नहीं-नहीं, कहीं ऐसा न हो कि साधू आ जायं, अगर देख लेंगे तो रंज होंगे, जिस तस्वीर पर पर्दा पड़ा हो उसे बिना आज्ञा कभी न देखना चाहिए। लेकिन अगर देख ही लेंगे तो क्या होगा साधू तो आप ही कह गए हैं कि हम घंटे भर में आवेंगे, फिर डर किसका है

नानक एक तस्वीर के पास गया और डरते-डरते पर्दा उठाया। तस्वीर पर निगाह पड़ते ही वह खौफ से चिल्ला उठा, हाथ से पर्दा गिर पड़ा, हांफता हुआ पीछे हटा और अपनी जगह पर आकर बैठ गया, यह हिम्मत न पड़ी कि दूसरी तस्वीर देखे।

वह तस्वीर दो औरत और एक मर्द की थी, नानक उन तीनों को पहचानता था। एक औरत थी रामभोली और दूसरी वह थी जिसके घोड़े पर सवार होकर रामभोली चली गई थी और जो नानक के देखते-देखते कुएं में कूद पड़ी थी, तीसरी तस्वीर नानक के पिता की थी। उस तस्वीर का भाव यह था कि नानक का पिता जमीन पर पड़ा हुआ था, दूसरी औरत उसके सिर के बाल पकड़े हुए थी, रामभोली उसकी छाती पर सवार, गले पर छुरी फेर रही थी।

इस तस्वीर को देखकर नानक की अजब हालत हो गई। वह एकदम घबरा उठा और बीती हुई बातें उसकी आंखों के सामने इस तरह मालूम होने लगीं जैसे आज हुई हैं। अपने बाप की हालत याद कर उसकी आंखें डबडबा आईं और कुछ देर तक सिर नीचा किए कुछ सोचता रहा। आखिर में उसने एक लंबी सांस ली और सिर उठाकर कहा, “ओफ! क्या मेरा बाप इन औरतों के हाथ से मारा गया नहीं, कभी नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, मगर इस तस्वीर में ऐसी अवस्था क्यों दिखाई गई है बेशक दूसरी तरफ वाली तस्वीर भी कुछ ऐसे ही ढंग की होगी और उसका भी संबंध कुछ मुझ ही से होगा! जी घबड़ाता है, यहां बैठना मुश्किल है!” इतना कहकर नानक उठ खड़ा हुआ और बाहर बरामदे में जाकर टहलने लगा। सूर्य बिल्कुल अस्त हो गये, शाम के पहले अंधेरी चारों तरफ फैल गई और धीरे-धीरे अंधकार का नमूना दिखाने लगी, इस मकान में भी अंधेरा हो गया और नानक सोचने लगा कि यहां रोशनी का कोई सामान दिखाई नहीं पड़ता, क्या बाबाजी अंधेरे में ही रहते हैं। ऐसा सुंदर साफ मकान मगर बालने के लिए दीया तक नहीं और सिवाय एक मृगछाला के जिस पर बाबाजी बैठते हैं एक चटाई तक नजर नहीं आती। शायद इसका सबब यह हो कि यहां की जमीन बहुत साफ, चिकनी और धोई हुई है।

इस तरह के सोच-विचार में नानक को दो घंटे बीत गए। यकायक उसे याद आया कि बाबाजी एक घंटा का वादा करके गये थे, अब वह अपने ठिकाने आ गये होंगे और वहां मुझे न देख न मालूम क्या सोचते होंगे। बिना उनसे मिले और बातचीत किए यहां का कुछ हाल न मालूम होगा, चलें देखें तो सही वे आ गये या नहीं।

नानक उठकर उस कमरे में गया जिसमें बाबाजी से मुलाकात हुई थी, मगर वहां सिवाय अंधकार के और कुछ दिखाई न पड़ा, थोड़ी देर तक उसने आंखें फाड़-फाड़कर अच्छी तरह देखा मगर कुछ मालूम न हुआ, लाचार उसने पुकारा – “बाबाजी!” मगर कुछ जवाब न मिला, उसने और दो दफे पुकारा मगर कुछ फल न हुआ। आखिर टटोलता हुआ बाबाजी के मृगछाले तक गया मगर उसे खाली पाकर लौट आया और बाहर बरामदे में जिसके नीचे चश्मा बह रहा था आकर बैठ रहा।

घंटे भर तक चुपचाप सोच-विचार में बैठे रहने के बाद बाबाजी से मिलने की उम्मीद में वह फिर उठा और उस कमरे की तरफ चला। अबकी उसने कमरे का दरवाजा भीतर से बंद पाया, ताज्जुब और खौफ से कांपता हुआ फिर लौटा और बरामदे में अपने ठिकाने आकर बैठ रहा। इसी फेर में पहर भर से ज्यादे रात गुजर गई और चारों तरफ से जंगल में बोलते हुए दरिन्दे जानवरों की आवाजें आने लगीं जिनके खौफ से वह इस लायक न रहा कि मकान के नीचे उतरे बल्कि बरामदे में रहना भी उसने नापसंद किया और बगल वाली कोठरी में घुसकर किवाड़ बंद करके सो रहा। नानक आज दिन भर भूखा रहा और इस समय भी उसे खाने को कुछ न मिला, फिर नींद क्यों आने लगी थी, इसके अतिरिक्त उसने दिन भर में ताज्जुब पैदा करने वाली कई तरह की बातें देखी और सुनी थीं, जो अभी तक उसकी आंखों के सामने घूम रही थीं और नींद की बाधक हो रही थीं। आधी रात बीतने पर उसने और भी ताज्जुब की बातें देखीं।

रात आधी से कुछ ज्यादे जा चुकी थी जब नानक के कानों में दो आदमियों के बातचीत की आवाज आई। वह गौर से सुनने लगा क्योंकि जो कुछ बातचीत हो रही थी उसे वह अच्छी तरह सुन और समझ सकता था। नीचे लिखी बातें उसने सुनीं। आवाज बारीक होने से नानक ने समझा कि वे दोनों औरतें हैं –

एक – नानक ने इश्क को दिल्लगी समझ लिया।

एक – इस कम्बख्त को सूझी क्या जो अपना घर-बार छोड़कर इस तरह एक औरत के पीछे निकल पड़ा।

दूसरा – यह तो उसी से पूछना चाहिए।

एक – बाबाजी ने उससे मिलना मुनासिब न समझा, मालूम नहीं इसका क्या सबब है।

दूसरा – जो हो मगर नानक आदमी बहुत ही होशियार और चालाक है, ताज्जुब नहीं कि उसने जो कुछ इरादा कर रखा है उसे पूरा करे!

एक – यह जरा मुश्किल है, मुझे उम्मीद नहीं कि रानी इसे छोड़ दें क्योंकि वह इसके खून की प्यासी हो रही हैं, हां अगर यह उस बजड़े पर पहुंचकर वह डिब्बा अपने कब्जे में कर लेगा तो फिर इसका कोई कुछ न कर सकेगा।

दूसरा – (हंसकर जिसकी आवाज नानक ने अच्छी तरह सुनी) यह तो हो नहीं सकता।

एक – खैर इन बातों से अपने को क्या मतलब हम लौंडियों को इतनी अक्ल कहां कि इन बातों पर बहस करें।

दूसरा – क्या लौंडी होने से अक्ल में बट्टा लग जाता है

एक – नहीं, मगर असली बातों की लौंडियों को खबर ही कब होती है!

दूसरा – मुझे तो खबर है।

एक – सो क्या

दूसरा – यही कि दम-भर में नानक गिरफ्तार कर लिया जायगा। बस अब बातचीत करना मुनासिब नहीं, हरिहर आता ही होगा।

इसके बाद फिर नानक ने कुछ न सुना मगर इन बातों ने उसे परेशान कर दिया, डर के मारे कांपता हुआ उठ बैठा और चुपचाप यहां से भाग चलने पर मुस्तैद हुआ। धीरे से किवाड़ खोलकर कोठरी के बाहर आया, चारों तरफ सन्नाटा था। इस मकान से बाहर निकलकर जंगल में भालू-चीते या शेर के मिलने का डर जरूर था मगर इस मकान में रहकर उसने बचाव की कोई सूरत न समझी क्योंकि उन दोनों औरतों की बातों ने उसे हर तरह से निराश कर दिया था। हां, बजड़े पर पहुंच उस डिब्बे पर कब्जा कर लेने के खयाल ने उसे बेबस कर दिया था और जहां तक जल्द हो सके बजड़े तक पहुंचना उसने अपने लिए उत्तम समझा।

नानक बरामदे से होता हुआ सदर दरवाजे पर आया और सीढ़ी के नीचे उतरना ही चाहता था कि दूसरे दालान में से झपटते हुए कई आदमियों ने आकर उसे गिरफ्तार कर लिया। उन आदमियों ने जबर्दस्ती नानक की आंखें चादर से बांध दीं और कहा, “जिधर हम ले चलें चुपचाप चला चल नहीं तो तेरे लिए अच्छा न होगा।” लाचार नानक को ऐसा ही करना पड़ा।

नानक की आंखें बंद थीं और हर तरह से लाचार था तो भी वह रास्ते की चलाई पर खूब ध्यान दिये हुए था। आधे घंटे तक वह बराबर चला, पत्तों की खड़खड़ाहट और जमीन की नमी से उसने जाना कि वह जंगल ही जंगल जा रहा है। इसके बाद एक ड्योढ़ी लांघने की नौबत आई और उसे मालूम हुआ कि वह किसी फाटक के अंदर जाकर पत्थर पर या किसी पक्की जमीन पर चल रहा है। वहां से कई दफे बाईं और दाहिनी तरफ घूमना पड़ा। बहुत देर बाद फिर एक फाटक लांघने की नौबत आई और फिर उसने अपने को कच्ची जमीन पर चलते पाया। कोस भर जाने के बाद फिर एक चौखट लांघकर पक्की जमीन पर चलने लगा। यहां पर नानक को विश्वास हो गया कि रास्ते का भुलावा देने के लिए हम बेफायदे घुमाये जा रहे हैं, ताज्जुब नहीं कि यह वही जगह हो जहां पहले आ चुके हैं।

थोड़ी दूर जाने के बाद नानक सीढ़ी पर चढ़ाया गया, बीस-पचीस सीढ़ियां चढ़ने के बाद फिर नीचे उतरने की नौबत आई और सीढ़ियां खतम होने के बाद उसकी आंखें खोल दी गईं।

नानक ने अपने को एक विचित्र स्थान में पाया। उसकी पीठ की तरफ एक ऊंची दीवार और सीढ़ियां थीं, सामने की तरफ खुशनुमा बाग था जिसके चारों तरफ ऊंची दीवारें थीं और उसमें रोशनी बखूबी हो रही थी। फलों के कलमी पेड़ों में लगी शीशे की छोटी-छोटी कंदीलों में मोमबत्तियां जल रही थीं और बहुत-से आदमी भी घूमते-फिरते दिखाई दे रहे थे। बाग के बीचोंबीच में एक आलीशान बंगला था, नानक वहां पहुंचाया गया और उसने आसमान की तरफ देखकर मालूम किया कि अब रात बहुत थोड़ी रह गई है।

यद्यपि नानक बहुत होशियार, चालाक, बहादुर और ढीठ था मगर इस समय बहुत ही घबड़ाया हुआ था। उसके ज्यादे घबड़ाने का सबब यह था कि उसके हरबे छीन लिये गए थे और वह इस लायक न रह गया कि दुश्मनों के हमला करने पर उनका मुकाबला करे या किसी तरह अपने को बचा सके। हां हाथ-पैर खुले रहने के सबब नानक इस खयाल से भी बेफिक्र न था कि अगर किसी तरह भागने का मौका मिले तो भाग जाय।

बाहर ही से मालूम हुआ कि इस मकान में रोशनी बखूबी हो रही है, बाहर के सहन में कई दीवारगीरें जल रही थीं और चोबदार हाथ में सोने का आसा लिये नौकरी अदा कर रहे थे। उन्हीं के पास नानक खड़ा कर दिया गया और वे आदमी जो उसे गिरफ्तार कर लाए थे और गिनती में आठ थे मकान के अंदर चले गये मगर चोबदारों से यह कहते गए कि इस आदमी से होशियार रहना, हम सरकार में खबर करने जाते हैं। नानक को आधे घंटे तक वहां खड़ा रहना पड़ा।

जब वे लोग जो इसे गिरफ्तार कर लाये थे और खबर करने के लिए अंदर गये थे लौटे तो नानक की तरफ देखकर बोले, “इत्तिला कर दी गई, अब तू अंदर चला जा।”

नानक – मुझे क्या मालूम है कि कहां जाना होगा और रास्ता कौन है

एक – यह मकान तुझे आप ही रास्ता बतावेगा, पूछने की जरूरत नहीं!

लाचार नानक ने चौखट के अंदर पैर रखा और अपने को तीन दर के एक दालान में पाया, फिरकर पीछे की तरफ देखा तो वह दरवाजा बंद हो गया था जिस राह से दालान में आया था। उसने सोचा कि वह इसी जगह में कैद हो गया और अब नहीं निकल सकता, यह सब कार्रवाई केवल इसी के लिए थी। मगर नहीं, उसका विचार ठीक न था, क्योंकि तुरंत ही उसके सामने का दरवाजा खुला और उधर रोशनी मालूम होने लगी। डरता हुआ नानक आगे बढ़ा और चौखट के अंदर पैर रखा ही था कि दो नौजवान औरतों पर नजर पड़ी जो साफ और सुथरी पोशाक पहिरे हुए थीं, दोनों ने नानक के दोनों हाथ पकड़ लिये और ले चलीं।

नानक डरा हुआ था मगर उसने अपने दिल को काबू में रखा, तो भी उसका कलेजा उछल रहा था और दिल में तरह-तरह की बातें पैदा हो रही थीं। कभी तो वह अपनी जिंदगी से नाउम्मीद हो जाता, कभी यह सोचकर कि मैंने कोई कसूर नहीं किया ढाढ़स होती, और कभी सोचता जो कुछ होना है वह तो होवेगा ही मगर किसी तरह उन बातों का पता तो लगे जिनके जाने बिना जी बेचैन हो रहा है। कल से जो-जो बातें ताज्जुब की देखने में आई हैं जब तक उसका असल भेद नहीं खुलता मेरे हवास दुरुस्त नहीं होते।

वे दोनों औरतें उसे कई दालानों और कोठरियों में घुमाती-फिराती एक बारहदरी में ले गईं जिसमें नानक ने कुछ अजब ही तरह का समां देखा। यह बारहदरी अच्छी तरह से सजी हुई थी और यहां रोशनी भी बखूबी हो रही थी। दरबार का बिल्कुल सामान यहां मौजूद था। बीच में जड़ाऊ सिंहासन पर एक नौजवान औरत दक्षिणी ढंग की बेशकीमती पोशाक पहिरे सिर से पैर तक जड़ाऊ जेवरों से लदी हुई बैठी थी। उसकी खूबसूरती के बारे में इतना ही कहना बहुत है कि अपनी जिंदगी में नानक ने ऐसी खूबसूरत औरत कभी नहीं देखी थी। उसे इस बात का विश्वास होना मुश्किल हो गया कि यह औरत इस लोक की रहने वाली है। उसके दाहिने तरफ सोने की चौकी पर मृगछाला बिछाए हुए वही साधू बैठा था जिसे नानक ने शाम को नहर वाले कमरे में देखा था। साधू के बाद गोलाकार बीस जड़ाऊ कुर्सियां और थीं जिन पर एक से एक बढ़कर खूबसूरत औरतें दक्षिणी ढंग की पोशाक पहरे ढाल-तलवार लगाये बैठी थीं। सिंहासन के बाईं तरफ जड़ाऊ छोटे सिंहासन पर रामभोली को उन्हीं लोगों की-सी पोशाक पहिरे ढाल-तलवार लगाये बैठे देख नानक के ताज्जुब की कोई हद्द न रही, मगर साथ ही इसके यह विश्वास भी हो गया कि अब उसकी जान किसी तरह नहीं जाती। रामभोली के बगल में जड़ाऊ कुर्सी पर वह औरत बैठी थी जिसने नानक के सामने से रामभोली को भगा दिया था, उसके बाद बीस जड़ाऊ कुर्सियों पर बीस नौजवान औरतें उसी ठाठ से बैठी हुई थीं जैसी सिंहासन के दाहिने तरफ थीं।

सामने की तरफ बीस औरतें ढाल-तलवार लगाये जड़ाऊ आसा हाथ में लिये अदब से सिर झुकाये इशारे पर हुक्म बजाने के लिए तैयार दुपट्टी खड़ी थीं जिनके बीच में नानक को ले जाकर खड़ा कर दिया गया।

इस दरबार को देखकर नानक की आंखों में चकाचौंध-सी आ गई। वह एकदम घबड़ा उठा और अपने चारों तरफ देखने लगा। इस बारहदरी की जिस चीज पर भी उसकी नजर पड़ती उसे लासानी1 पाता। नानक एक बड़े अमीर बाप का लड़का था और बड़े-बड़े राजदरबारों को देख चुका था मगर उसकी आंखों ने यहां जैसी चीजें देखीं वैसी स्वप्न में भी न देखी थीं। आलों (ताकों) पर जो गुलदस्ते सजाए हुए थे वे बिल्कुल बनावटी थे और उनमें फूल-पत्तियों की जगह बेशकीमती जवाहिरात काम में लाये गये थे। केवल इन गुलदस्तों ही को देखकर नानक ताज्जुब करता था कि इतनी दौलत इन लोगों के पास कहां से आई! इसके अतिरिक्त और जितनी चीजें सजावट की मौजूद थीं सभी इस योग्य थीं कि जिनका मिलना मनुष्यों को बहुत ही कठिन समझना चाहिए। उन औरतों की पोशाक और जेवरों का अंदाज करना तो ताकत से बाहर था।

सब तरफ से घूम-फिरकर नानक की आंखें रामभोली की तरफ जाकर अटक गईं और एकदम उसकी सूरत देखने लगा।

उस औरत ने जो बड़े रोब के साथ जड़ाऊ सिंहासन पर बैठी हुई थी एक नजर सिर से पैर तक नानक को देखा और फिर रामभोली की तरफ आंखें फेरीं। रामभोली तुरंत अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और सामने की तरफ हटकर सिंहासन के बगल में खड़ी हो हाथ जोड़कर बोली, “यदि आज्ञा हो तो हुक्म के मुताबिक कार्रवाई की जाय’ इसके जवाब में उस औरत ने जिसे महारानी कहना उचित है बड़े गरूर के साथ सिर हिलाया अर्थात मना किया और उस दूसरी की तरफ देखा जो रामभोली के बगल में थी।

यह बात नानक के लिए बड़े ताज्जुब की थी। आज उसके कानों ने एक ऐसी आवाज सुनी जो कभी सुनी न थी और न सुनने की उम्मीद थी। एक तो यही ताज्जुब की बात थी कि जो रामभोली उसके पड़ोस में रहती थी, जिसे नानक लड़कपन से जानता था और सिवाय उस दिन के जिस दिन बजड़े पर सवार हो सफर में निकली जिसे कभी अपना घर छोड़ते नहीं देखा था और न कभी जिसके मां-बाप ने उसे अपनी आंखों से दूर किया था, आज इस जगह ऐसी अवस्था और ऊंचे दर्जे पर दिखाई दी। दूसरे जो रामभोली जन्म से गूंगी थी, जिसके बाप-मां ने कभी उसे बोलते नहीं सुना, आज इस तरह उसके मुंह से मीठी आवाज निकल रही है! इस आवाज ने नानक के दिल के साथ क्या काम किया इसे वही जानता होगा। इस बात को नानक क्योंकर समझ सकता था कि जिस रामभोली ने कभी घर से बाहर पैर नहीं निकाला वह इन लोगों में आपस के तौर पर क्यों पाई जाती है और ये सब औरतें कौन हैं!

नानक को इन सब बातों को अच्छी तरह सोचने का मौका न मिला। वह दूसरी औरत जो रामभोली के बगल में कुर्सी पर बैठी हुई थी और जिसको नानक ने पहले भी देखा था, इशारा पाते ही उठ खड़ी हुई और कुछ आगे बढ़ नानक से बातचीत करने लगी।

औरत – नानकप्रसाद, इसके कहने की तो जरूरत नहीं कि तुम मुजरिम बनाकर यहां लाये गये हो और तुम्हें किसी तरह की सजा दी जायगी।

नानक – हां, बेशक मैं मुजरिम बनाकर लाया गया हूं मगर असल में मुजरिम नहीं हूं और न मैंने कोई कसूर ही किया है।

औरत – तुम्हारा कसूर यही है कि तुमने वह बड़ी तस्वीर जो बाबाजी के कमरे में थी और जिस पर पर्दा पड़ा हुआ था बिना आज्ञा के देखी। क्या तुम यह नहीं जानते कि जिस तस्वीर पर पर्दा पड़ा हो उसे बिना आज्ञा के देखना न चाहि।

नानक – (कुछ सोचकर) बेशक यह कसूर तो हुआ।

औरत – हमारे यहां का कानून यही है कि जो ऐसा कसूर करे उसका सिर काट लिया जाय।

नानक – अगर ऐसा कानून है तो इसे जुल्म कहना चाहिए!

औरत – जो हो मगर अब तुम किसी तरह बच नहीं सकते।

नानक – खैर, मैं मरने से नहीं डरता और खुशी से मरना कबूल करता हूं यदि आप मुझे कुछ सवालों का जवाब दे दें!

औरत – तुम मरने से तो किसी तरह इनकार कर नहीं सकते मगर मेहरबानी करके तुम्हारे एक सवाल का जवाब मिल सकता है, एक से ज्यादे सवाल तुम नहीं कर सकते, पूछो क्या पूछते हो।

नानक – (कुछ देर सोचकर) खैर जब एक ही सवाल का जवाब मिल सकता है तो मैं यह पूछता हूं कि (रामभोली की तरफ इशारा करके) यह यहां क्योंकर आईं और यहां इन्हें इतनी बड़ी इज्जत क्योंकर मिली

औरत – ये तो दो सवाल हुए! अच्छा इनमें से एक सवाल का जवाब यह दिया जाता है कि जिसके बारे में तुम पूछते हो वह हमारी महारानी की छोटी बहन हैं और यही सबब है कि उनके बगल में सिंहासन के ऊपर बैठी हैं।

नानक – मुझे क्योंकर विश्वास हो कि तुम सच कहती हो?

औरत – मैं धर्म की कसम खाकर कहती हूं कि यह बात झूठी नहीं है, मानने-न-मानने का तुम्हें अख्तियार है!

नानक – खैर अगर ऐसा है तो मैं किसी प्रकार मरना पसंद नहीं करता।

औरत – (हंसकर) मरना न पसंद करने से क्या तुम्हारी जान छोड़ दी जायगी।

नानक – बेशक ऐसा ही है, जब तक मैं मरना मंजूर न करूंगा तुम लोग मुझे मार नहीं सकतीं।

औरत – यह तो हम लोग जानते हैं कि तुम एक भारी कुदरत रखते हो और उसके सबब से बड़े-बड़े काम कर सकते हो मगर इस जगह तुम्हारे किये कुछ नहीं हो सकता, हां एक बात अगर तुम कबूल करो तो तुम्हारी जान छोड़ दी जायगी बल्कि इनाम के तौर पर जो मांगोगे सो दिया जायगा।

नानक – वह क्या।

औरत – कुंअर इंद्रजीतसिंह और आनंदसिंह की जान तुम्हारे कब्जे में है, वह महारानी के कब्जे में दे दो।

नानक – (क्रोध के मारे लाल आंखें निकाल के) कम्बख्त, खबरदार! फिर ऐसी बात जुबान पर न लाइयो! मैं नहीं जानता था कि ऐसी खूबसूरत मंडली कुंअर इंद्रजीतसिंह और आनंदसिंह की दुश्मन निकलेगी। तुझ जैसी हजारों को मैं उन पर न्यौछावर करता हूं! बस मालूम हो गया कि तुम लोग खेल की कठपुतलियां हो। किसकी ताकत है जो मुझे मारे या मेरे साथ किसी तरह की जबर्दस्ती करे!

उस औरत का चेहरा नानक की यह बात सुनकर क्रोध के मारे लाल हो गया बल्कि और औरतें भी जो वहां मौजूद थीं नानक की दबंगता देख क्रोध के मारे कांपने लगीं, मगर महारानी के चेहरे पर क्रोध की निशानी न थी।

औरत – (तलवार खींचकर) बेशक अब तुम मारे जाओगे। बीस-बीस मर्दों की ताकत (कुर्सियों की तरफ इशारा करके) इन एक-एक औरतों में और मुझमें है। यह न समझना कि तुम्हारे हाथ-पैर खुले हैं तो कुछ कर सकोगे। क्या भूल गये कि मैंने तुम्हारे हाथ से तलवार गिरा दी थी

नानक – इतनी ही ताकत अगर तुम लोगों में है तो दोनों कुमारों की जान मुझसे क्यों मांगती हो, खुद जाकर उन दोनों का सिर क्यों नहीं काट लातीं

औरत – कोई खास सबब है कि हम लोग अपने हाथ से इस काम को नहीं करते, कर भी सकते हैं मगर देर होगी, इसलिए तुमसे कहते हैं। अब भी मंजूर करो नहीं तो मैं जान लिए बिना न छोड़ूंगी।

नानक – (रामभोली की तरफ इशारा करके) उस औरत की जान जिसे तुम महारानी की बहिन बताती हो मेरे कब्जे में है जरा इसका भी खयाल करना।

इतना सुनते ही रामभोली अपनी जगह से उठी और बोली, “यह कभी न समझना कि वह डिब्बा जिसे तुम लाये थे मैं बजड़े में छोड़ आई और वह तुम्हारे या तुम्हारे सिपाहियों के कब्जे में है, मैंने उसे गंगाजी में फेंक दिया था और अब मंगा लिया, (हाथ का इशारा करके) देखो, उस कोने में छत से लटक रहा है।”

नानक ने घूमकर देखा और छत से उस डिब्बे को लटकता पाया। यह देख वह एकदम घबड़ा गया, उसके होश-हवास जाते रहे, उसके मुंह से एक चीख की आवाज निकली और वह बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ा।

आधी घड़ी तक नानक बेहोश पड़ा रहा, इसके बाद होश में आया मगर उसमें खड़े होने की ताकत न थी। वह बैठा-बैठा इस तरह सोचने लगा जैसे कि अब वह जिंदगी से बिल्कुल ही नाउम्मीद हो चुका हो। वह औरत नंगी तलवार लिए अभी तक उसके पास खड़ी थी। एकाएक नानक को कोई बात याद आई जिससे उसकी हालत बिल्कुल ही बदल गई, गई हुई ताकत बदन में फिर लौट आई और वह यह कहता हुआ कि ‘मैं व्यर्थ सोच में पड़ा हूं’ उठ खड़ा हुआ तथा उस औरत से फिर बातचीत करने लगा।

नानक – नहीं, नहीं, मैं कभी नहीं मर सकता।

औरत – अब तुम्हें बचाने वाला कौन है

नानक – (रामभोली की तरफ देख के) उस कोठरी की ताली जिसमें किसी के खून से लिखी हुई पुस्तक रखी है।

इतना सुनते ही रामभोली चौंकी, उसका चेहरा उतर गया, सिर घूमने लगा, और वह यह कहती हुई सिंहासन की बगली पर झुक गई, “आह, गजब हो गया! भूल हुई, वह ताली तो उसी जगह छूट गई! कम्बख्त तेरा बुरा हो, मुझे जबर्दस्ती अ…प…ने…हा…थ!”

केवल रामभोली ही की ऐसी दशा नहीं हुई बल्कि वहां जितनी औरतें थीं सभों का चेहरा पीला पड़ गया, खून की लाली जाती रही और सब-की-सब एकटक नानक की तरफ देखने लगीं। अब नानक को भी विश्वास हो गया कि उसकी जान बच गई और जो कुछ उसने सोचा था ठीक निकला, कुछ देर ठहरकर नानक फिर बोला –

नानक – उस किताब को मैं पढ़ भी चुका हूं बल्कि एक दोस्त को भी इस काम में अपना साथी बना चुका हूं। यदि तीन दिन के अंदर मैं उससे न मिलूंगा तो वह जरूर कोई काम शुरू कर देगा।

नानक की इस बात ने सभों की बेचैनी और बढ़ा दी। महारानी ने आंखों में आंसू भरकर अपने बगल में बैठे बाबाजी की तरफ इस ढंग से देखा जैसे वह अपनी जिंदगी से निराश हो चुकी हो। बाबाजी ने इशारे से उसे ढाढ़स दिया और नानक की तरफ देखकर कहा –

बाबा – शाबाश बेटे, तुमने खूब काम किया! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं, चेला बनाने के लिए मैं भी किसी ऐसे चतुर को ढूंढ़ रहा था!

इतना कहकर बाबाजी उठे और नानक का हाथ पकड़कर दूसरी तरफ ले चले। बाबाजी का हाथ इतना कड़ा था कि नानक की कलाई दर्द करने लगी, उसे मालूम हुआ मानो लोहे के हाथ ने उसकी कलाई पकड़ी हो जो किसी तरह नर्म या ढीला नहीं हो सकता। साफ सबेरा हो चुका था बल्कि सूर्य की लालिमा ने बाग के खुशनुमा पेड़ों के ऊपर वाली टहनियों पर अपना दखल जमा लिया था जब बाबाजी नानक को लिए एक कोठरी के दरवाजे पर पहुंचे जिसमें ताला लगा हुआ था। बाबाजी ने दूसरे हाथ से एक ताली निकाली जो उनकी कमर में थी और उस कोठरी का ताला खोलकर उसके अंदर ढकेल दिया और फिर दरवाजा बंद करके ताला लगा दिया।

चाहे दिन निकल चुका हो मगर उस कोठरी के अंदर नानक को रात ही का समां नजर आया। बिल्कुल अंधेरा था, कोई सूराख भी ऐसा नहीं था जिससे किसी तरह की रोशनी पहुंचती। नानक को यह भी नहीं मालूम हो सकता था कि यह कोठरी कितनी बड़ी है, हां उस कोठरी की पत्थर की जमीन इतनी सर्द थी कि घंटे ही भर में नानक के हाथ-पैर बेकार हो गये। घंटे भर बाद नानक को चारों तरफ की दीवार दिखाई देने लगी। मालूम हुआ कि दीवारों में से किसी तरह की चमक निकल रही है और वह चमक धीरे-धीरे बढ़ रही है, यहां तक कि थोड़ी देर में वहां अच्छी तरह उजाला हो गया और उस जगह की हर एक चीज साफ दिखाई देने लगी।

यह कोठरी बहुत बड़ी न थी, इसके चारों कोनों में हड्डियों के ढेर लगे थे, चारों तरफ दीवारों में पुरसे भर ऊंचे चार मोखे (छेद) थे जो बहुत बड़े न थे मगर इस लायक थे कि आदमी का सिर उसके अंदर जा सके। नानक ने देखा कि उसके सामने की तरफ वाले मोखे में कोई चीज चमकती हुई दिखाई दे रही है। बहुत गौर करने पर थोड़ी देर बाद मालूम हुआ कि बड़ी-बड़ी दो आंखें हैं जो उसी की तरफ देख रही हैं।

उस अंधेरी कोठरी में धीरे-धीरे चमक पैदा होने और उजाला हो जाने ही से नानक डरा था, अब उन आंखों ने और भी डरा दिया। धीरे-धीरे नानक का डर बढ़ता ही गया क्योंकि उसने कलेजा दहलाने वाली और भी कई बातें यहां पार्ईं।

हम ऊपर लिख आये हैं कि उस कोठरी की जमीन पत्थर की थी। धीरे-धीरे यह जमीन गर्म होने लगी जिससे नानक के बदन में हरारत पहुंची और वह सर्दी जिसके सबब से वह लाचार हो गया था जाती रही। आखिर वहां की जमीन यहां तक गर्म हुई कि नानक को अपनी जगह से उठना पड़ा मगर कहां जाता! उस कोठरी की तमाम जमीन एक-सी गरम हो रही थी, वह जिधर जाता उधर ही पैर जलता था। नानक का ध्यान फिर मोखे की तरफ गया जिसमें चमकती हुई आंखें दिखाई दी थीं, क्योंकि इस समय उसी मोखे में से एक हाथ निकलकर नानक की तरफ बढ़ रहा था। नानक दुबककर एक कोने में हो रहा जिससे वह हाथ उस तक न पहुंचे मगर हाथ बढ़ता ही गया, यहां तक कि उसने नानक की कलाई पकड़ ली।

न मालूम वह हाथ कैसा था जिसने नानक की कलाई मजबूती से थाम ली। बदन के साथ छूते ही एक तरह की झुनझुनी पैदा हुई और बात-की-बात में इतनी बढ़ी कि नानक अपने को किसी तरह सम्हाल न सका और न उस हाथ से अपने को छुड़ा ही सका, यहां तक कि वह बेहोश होकर अपने आपको बिल्कुल भूल गया।

जब नानक होश में आया उसने अपने आपको गंगा के किनारे उसी जगह पाया जहां रामभोली के साथ बजड़े से उतरा था। बगल में पक्के केले का एक पौधा भी देखा। दिन बहुत कम बाकी था और सूर्य भगवान अस्ताचल की तरफ जा रहे थे।

बयान-8

अब हम फिर उस महारानी के दरबार का हाल लिखते हैं जहां से नानक निकाला जाकर गंगा के किनारे पहुंचाया गया था।

नानक को कोठरी में ढकेलकर बाबाजी लौटे तो महारानी के पास न जाकर दूसरी ही तरफ रवाना हुए और एक बारहदरी में पहुंचे जहां कई आदमी बैठे हुए कुछ काम कर रहे थे। बाबाजी को देखते ही वे लोग उठ खड़े हुए। बाबाजी ने उन लोगों की तरफ देखकर कहा, “नानक को मैं ठिकाने पहुंचा आया हूं, बड़ा भारी ऐयार निकला, हम लोग उसका कुछ न कर सके। खैर उसे गंगा किनारे उसी जगह पहुंचा दो जहां बजड़े से उतरा था, उसके लिये कुछ खाने की चीज भी वहां रख देना।” इतना कहकर बाबाजी वहां से लौटे और महारानी के पास पहुंचे। इस समय महारानी का दरबार उस ढंग का न था और न भीड़भाड़ ही थी। सिंहासन और कुर्सियों का नाम-निशान न था। केवल फर्श बिछा हुआ था जिस पर महारानी, रामभोली और वह औरत जिसके घोड़े पर सवार हो रामभोली नानक से जुदा हुई थी, बैठी आपस में कुछ बातें कर रही थीं। बाबाजी ने पहुंचते ही कहा, “मैं नहीं समझता था कि नानक इतना बड़ा धूर्त और चालाक निकलेगा। धनपति ने कहा था कि वह बहुत सीधा हे, सहज ही में काम निकल जायगा, व्यर्थ इतना आडंबर करना पड़ा!”

पाठक याद रखें, धनपति उसी औरत का नाम था जिसके घोड़े पर सवार होकर रामभोली नानक के सामने से भागी थी। ताज्जुब नहीं कि धनपति के नाम से बारीक खयाल वाले पाठक चौंकें और सोचें कि ऐसी औरत का नाम धनपति क्यों हुआ! यह सोचने की बात है और आगे चलकर यह नाम कुछ रंग लावेगा।

धनपति – खैर जो होना था सो हो चुका, इतना तो मालूम हुआ कि हम लोग नानक के पंजे में फंस गये। अब कोई ऐसी तरकीब करनी चाहिए जिससे जान बचे और नानक के हाथ से छुटकारा मिले।

बाबाजी – मैं तो फिर भी नसीहत करूंगा कि आप लोग इस फेर में न पड़ें। कुंअर इंद्रजीतसिंह और आनंदसिंह बड़े प्रतापी हैं, उन्हें अपने आधीन करना और उनके हिस्से की चीज छीन लेना कठिन है, सहज नहीं। देखा, पहली ही सीढ़ी में आप लोगों ने कैसा धोखा खाया। ईश्वर न करे यदि नानक मर जाय या उसे कोई मार डाले और वह किताब उसी के कब्जे में रह जाय और पता न लगे तो क्या आप लोगों के बचने की कोई सूरत निकल सकती है

रामभोली – बेशक कभी नहीं, हम लोग बुरी मौत मारे जायेंगे!

बाबाजी – मैं बेशक जोर देता और ऐसा कभी होने न देता मगर सिवाय समझाने के और कुछ नहीं कर सकता।

महारानी – (बाबाजी की तरफ देखकर) एक दफे और उद्योग करूंगी। अगर काम न चलेगा तो फिर जो आप कहेंगे वही किया जाएगा।

बाबाजी – मर्जी तुम्हारी, मैं कुछ कह नहीं सकता।

महारानी – (धनपति और रामभोली की तरफ देखकर) सिवाय तुम दोनों के इस काम के लायक और कोई भी नहीं है।

धनपति – मैं जान लड़ाने से कब बाज आने वाली हूं।

रामभोली – जो हुक्म होगा करूंगी ही।

महारानी – तुम दोनों जाओ और जो कुछ करते बने करो!

रामभोली – काम बांट दीजिए।

महारानी – (धनपति की तरफ देख के) नानक के कब्जे से किताब निकाल लेना तुम्हारा काम और (रामभोली की तरफ देख के) किशोरी को गिरफ्तार कर लाना तुम्हारा काम ।

बाबाजी – मगर दो बातों का ध्यान रखना, नहीं तो जीती न बचोगी!

दोनों – वह क्या

बाबाजी – एक तो कुंअर इंद्रजीतसिंह या आनंदसिंह को हाथ न लगाना, दूसरे ऐसे काम करना जिससे नानक को तुम दोनों का पता न लगे, नहीं तो वह बिना जान लिए कभी न छोड़ेगा और तुम लोगों के किए कुछ न होगा। (रामभोली की तरफ देख के) यह न समझना कि अब वह तुम्हारा मुलाहिजा करेगा, अब उसे असल हाल मालूम हो गया, हम लोगों को जड़-बुनियाद से खोदकर फेंक देने का उद्योग करेगा।

महारानी – ठीक है, इसमें कोई शक नहीं। मगर ये दोनों चालाक हैं, अपने को बचावेंगीं। (दोनों की तरफ देखकर) खैर तुम लोग जाओ, देखो ईश्वर क्या करता है। खूब होशियार और अपने को बचाए रहना।

दोनों – कोई हर्ज नहीं!

बयान–9

अब हम रोहतासगढ़ की तरफ चलते हैं और तहखाने में बेबस पड़ी हुई बेचारी किशोरी और कुंअर आनंदसिंह इत्यादि की सुध लेते हैं। जिस समय कुंअर आनंदसिंह, भैरोसिंह और तारासिंह तहखाने के अंदर गिरफ्तार हो गए और राजा दिग्विजयसिंह के सामने लाए गये तो राजा के आदमियों ने उन तीनों का परिचय दिया जिसे सुन राजा हैरान रह गया और सोचने लगा कि ये तीनों यहां क्योंकर आ पहुंचे। किशोरी भी उसी जगह खड़ी थी। उसने सुना कि ये लोग फलाने हैं तो वह घबड़ा गई, उसे विश्वास हो गया कि अब इनकी जान नहीं बचती। इस समय वह मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगी कि जिस तरह हो सके इनकी जान बचाए, इनके बदले में मेरी जान जाय तो कोई हर्ज नहीं परंतु मैं अपनी आंखों से इन्हें मरते नहीं देखना चाहती। इसमें कोई शक नहीं कि ये मुझी को छुड़ाने आये थे नहीं तो इन्हें क्या मतलब था कि इतना कष्ट उठाते।

जितने आदमी तहखाने के अंदर मौजूद थे सभी जानते थे कि इस समय तहखाने के अंदर कुंअर आनंदसिंह का मददगार कोई भी नहीं है परंतु हमारे पाठक महाशय जानते हैं कि पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी जो इस समय दारोगा बने यहां मौजूद हैं कुंअर आनंदसिंह की मदद जरूर करेंगे, मगर एक आदमी के किए होता ही क्या है तो भी ज्योतिषीजी ने हिम्मत न हारी और वह राजा से बातचीत करने लगे। ज्योतिषीजी जानते थे कि मेरे अकेले के किए ऐसे मौके पर कुछ नहीं हो सकता और वहां की किताब पढ़ने से उन्हें यह भी मालूम हो गया था कि इस तहखाने के कायदे के मुताबिक ये जरूर मारे जाएंगे, फिर भी ज्योतिषीजी को इनके बचने की उम्मीद कुछ-कुछ जरूर थी क्योंकि पंडित बद्रीनाथ कह गये थे कि ‘आज इस तहखाने में कुंअर आनंदसिंह आवेंगे’। अब ज्योतिषीजी सिवाए इसके और कुछ नहीं कर सकते कि राजा को बातों में लगाकर देर करें जिससे पंडित बद्रीनाथ वगैरह आ जाएं और आखिर उन्होंने ऐसा ही किया। ज्योतिषीजी अर्थात दारोगा साहब राजा के सामने गये और बोले –

दारोगा – मुझे इस बात की बड़ी खुशी है कि आप से आप कुंवर आनंदसिंह हम लोगों के कब्जे में आ गये।

राजा – (सिर से पैर तक ज्योतिषीजी को अच्छी तरह देखकर) ताज्जुब है कि आप ऐसा कहते हैं मालूम होता है कि आज आपकी अक्ल चरने चली गई है! छी!

दारोगा – (घबड़ाकर और हाथ जोड़कर) सो क्या महाराज!

राजा – (रंज होकर) फिर भी आप पूछते हैं सो क्या आप ही कहिए, आनंदसिंह आप से आप यहां आ फंसे तो क्यों आप खुश हुए?

दारोगा – मैं यह सोचकर खुश हुआ कि जब इनकी गिरफ्तारी का हाल राजा वीरेंद्रसिंह सुनेंगे तो जरूर कहला भेजेंगे कि आनंदसिंह को छोड़ दीजिए, इसके बदले में हम कुंअर कल्याणसिंह को छोड़ देंगे।

राजा – अब मुझे मालूम हो गया कि तुम्हारी अक्ल सचमुच चरने गई है या तुम वह दारोगा नहीं हो, कोई दूसरे हो।

दारोगा – (कांपकर) शायद आप इसलिए कहते हों कि मैंने जो कुछ अर्ज किया इस तहखाने के कायदे के खिलाफ किया।

राजा – हां, अब तुम राह पर आये! बेशक ऐसा ही है। मुझे इनके यहां आ फंसने का रंज है। अब मैं अपनी और अपने लड़के की जिन्दगी से भी नाउम्मीद हो गया। बेशक अब यह रोहतासगढ़ उजाड़ हो गया। मैं किसी तरह कायदे के खिलाफ नहीं कर सकता, चाहे जो हो, आनंदसिंह को अवश्य मारना पड़ेगा और इसका नतीजा बहुत ही बुरा होगा। मुझे इस बात का भी विश्वास है कि कुंअर आनंदसिंह पहले-पहल यहां नहीं आये बल्कि इनके कई ऐयार इसके पहले भी जरूर यहां आकर सब हाल देख गये होंगे। कई दिनों से यहां के मामले में जो विचित्रता दिखाई पड़ती है यह सब उसी का नतीजा है। सच तो यह है कि इस समय की बातें सुनकर मुझे आप पर भी शक हो गया है। यहां का दारोगा इस तरह आनंदसिंह के आ फंसने से कभी न कहता कि मैं खुश हूं। यह जरूर समझता कि कायदे के मुताबिक इन्हें मारना पड़ेगा, इसके बदले में कल्याणसिंह मारा जायेगा, और इसके अतिरिक्त वीरेंद्रसिंह के ऐयार लोग ऐयारी के कायदे को तिलांजलि देकर बेहोशी की दवा के बदले जहर का बर्ताव करेंगे और एक ही सप्ताह में रोहतासगढ़ को चौपट कर डालेंगे। इस तहखाने के दारोगा को जरूर इस बात का रंज होता।

राजा की बातें सुनकर ज्योतिषीजी की आंखें खुल गईं। उन्होंने मन में अपनी भूल कबूल की और गर्दन नीची करके सोचने लगे। उसी समय राजा ने पुकारकर अपने आदमियों से कहा, “इस नकली दारोगा को भी गिरफ्तार कर लो और अच्छी तरह आजमाओ कि यहां का दारोगा हे या वीरेंद्रसिंह का कोई ऐयार!”

बात की बात में दारोगा साहब की मुश्कें बांध ली गईं और राजा ने दो आदमियों को गरम पानी लाने का हुक्म दिया। नौकरों ने यह समझकर कि वहां पानी गरम करने में देर होगी, ऊपर दीवानखाने में हरदम गरम पानी मौजूद रहता है वहां से लाना उत्तम होगा, महाराज से आज्ञा चाही। महाराज ने इसको पसन्द करके ऊपर दीवानखाने से पानी लाने का हुक्म दिया।

दो नौकर गरम पानी लाने के लिए दौड़े मगर तुरन्त लौट आकर बोले, “ऊपर का रास्ता तो बंद हो गया।”

महा – सो क्या! रास्ता कैसे बंद हो सकता है?

नौकर – क्या जाने ऐसा क्यों हुआ?

महा – ऐसा कभी नहीं हो सकता! (ताली दिखाकर) देखो यह ताली मेरे पास मौजूद है, इस ताली के बिना कोई क्योंकर उन दरवाजों को बंद कर सकता है?

नौकर – जो हो, मैं कुछ नहीं अर्ज कर सकता, सरकार खुद चलकर देख लें।

राजा ने स्वयं जाकर देखा तो ऊपर जाने का रास्ता बंद पाया। ताज्जुब हुआ और सोचने लगा कि दरवाजा किसने बंद किया, ताली तो मेरे पास थी! आखिर दरवाजा खोलने के लिए ताली लगाई मगर ताला न खुला। आज तक इसी ताली से बराबर इस तहखाने में आने-जाने का दरवाजा खोला जाता था, लेकिन इस समय ताली कुछ काम नहीं करती। यह अनोखी बात जो राजा दिग्विजयसिंह के ध्यान में कभी न आई थी आज यकायक पैदा हो गई। राजा के ताज्जुब का कोई हद्द न रहा। उस तहखाने में और भी बहुत से दरवाजे उसी ताली से खुला करते थे। राजा ने ताली ठोंक-पीटकर एक दूसरे दरवाजे में लगाई, मगर वह भी न खुला। राजा की आंखों में आंसू भर आए और यकायक उसके मुंह से यह आवाज निकली, “अब इस तहखाने की और हम लोगों की उम्र पूरी हो गई।”

राजा दिग्विजयसिंह घबड़ाया हुआ चारों तरफ घूमता और घड़ी-घड़ी दरवाजों में ताली लगाता था – इतने ही में उस काले रंग की भयानक मूर्ति के मुंह में से जिसके सामने एक औरत की बलि दी जा चुकी थी एक तरह की आवाज निकलने लगी। यह भी एक नई बात थी। दिग्विजयसिंह और जितने आदमी वहां थे सब डर गये तथा उसी तरफ देखने लगे। कांपता हुआ राजा उस मूर्ति के पास जाकर खड़ा हो गया ओैर गौर से सुनने लगा कि क्या आवाज आती है। थोड़ी देर तक वह आवाज समझ में न आई, इसके बाद यह सुनाई पड़ा – “तेरी ताली केवल बारह नंबर की कोठरी को खोल सकेगी। जहां तक जल्दी हो सके किशोरी को उसमें बंद कर दे नहीं तो सभों की जान मुफ्त में जाएगी!”

यह नई अद्भुत और अनोखी बात को देख-सुनकर राजा का कलेजा दहलने लगा मगर उसकी समझ में कुछ न आया कि यह मूरत क्योंकर बोली, आज तक कभी ऐसी बात न हुई थी। सैकड़ों आदमी इसके सामने बलि चढ़ गए लेकिन ऐसी नौबत न आई थी। अब राजा को विश्वास हो गया कि इस मूरत में कोई करामात जरूर है तभी तो बड़े लोगों ने बलि का प्रबंध किया है। यद्यपि राजा ऐसी बातों का विश्वास कम रखता था परंतु आज उसे डर ने दबा लिया, उसने सोच-विचार में ज्यादे समय नष्ट न किया और उसी ताली से बारह नंबर वाली कोठरी खोलकर किशोरी को उसके अंदर बंद कर दिया।

राजा दिग्विजयसिंह ने अभी इस काम से छुट्टी न पाई थी कि बहुत से आदमियों को साथ लेकर पंडित बद्रीनाथ उस तहखने में आ पहुंचे। कुंअर आनंदसिंह और तारासिंह को बेबस पाकर झपट पड़े और बहुत जल्दी उनके हाथ-पैर खोल दिए। महाराज के आदमियों ने इनका मुकाबला किया, पंडित बद्रीनाथ के साथ जो आदमी आये थे वे लोग भी भिड़ गये। जब आनंदसिंह, भैरोसिंह और तारासिंह छूटे तो लड़ाई गहरी हो गई, इन लोगों के सामने ठहरने वाला कौन था केवल चार ऐयार ही उतने लोगों के लिए काफी थे। कई मारे गये, कई जख्मी होकर गिर पड़े, राजा दिग्विजयसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया, वीरेंद्रसिंह की तरफ का कोई न मरा। इन सब कामों से छुट्टी पाने के बाद किशोरी की खोज की गई।

इस तहखाने में जो कुछ आश्चर्य की बातें हुई थीं सभों ने देखी-सुनी थीं। लाली और ज्योतिषीजी ने सब हाल आनंदसिंह और ऐयार लोगों को बताया और कहा कि किशोरी बारह नंबर की कोठरी में बंद कर दी गई है।

पंडित बद्रीनाथ ने दिग्विजयसिंह की कमर से ताली निकाल ली और बारह नंबर की कोठरी खोली मगर किशोरी को उसमें न पाया। चिराग लेकर अच्छी तरह ढूंढ़ा परंतु किशोरी न दिखाई पड़ी, न मालूम जमीन में समा गई या दीवार खा गई! इस बात का आश्चर्य सभों को हुआ कि बंद कोठरी में से किशोरी कहां गायब हो गई। हां एक कागज का पुर्जा उस कोठरी में जरूर मिला जिसे भैरोसिंह ने उठा लिया और पढ़कर सभों को सुनाया। यह लिखा था –

“धनपति रन मचायो साध्यो काम।

भोली भलि मुड़ि ऐहैं यदि यहि ठाम।।”

इस बरवै का मतलब किसी की समझ में न आया, लेकिन इतना विश्वास हो गया कि अब इस जगह किशोरी का मिलना कठिन है। उधर लाली इस बरवै को सुनते ही खिलखिलाकर हंस पड़ी लेकिन जब लोगों ने हंसने का सबब पूछा तो कुछ जवाब न दिया बल्कि सिर नीचा करके चुप हो रही, जब ऐयारों ने बहुत जोर दिया तो बोली, “मेरे हंसने का कोई खास सबब नहीं है। बड़ी मेहनत करके किशोरी को मैंने यहां से छुड़ाया था। (किशेरी के छुड़ाने के लिए जो-जो काम उसने किये थे सब कहने के बाद) मैं सोचे हुए थी कि इस काम के बदले में राजा वीरेंद्रसिंह से कुछ इनाम पाऊंगी, लेकिन कुछ न हुआ, मेरी मेहनत चौपट हो गई, मेरे देखते ही देखते किशोरी इस कोठरी में बंद हो गई थी। जब आप लोगों ने कोठरी खोली तो मुझे उम्मीद थी कि उसे देखूंगी और वह अपनी जुबान से मेरे परिश्रम का हाल कहेगी परंतु कुछ नहीं। ईश्वर की भी क्या विचित्र गति है, वह क्या करता है सो कुछ समझ में नहीं आता! यही सोचकर मैं हंसी थी और कोई बात नहीं है।”

लाली की बातों का और सभों को चाहे विश्वास हो गया हो लेकिन हमारे ऐयारों के दिल में उसकी बातें न बैठीं। देखा चाहिए अब वे लोग लाली के साथ क्या सलूक करते हैं।

पंडित बद्रीनाथ की राय हुई कि अब इस तहखाने में ठहरना मुनासिब नहीं, जब यहां की अजब बातों से खुद यहां का राजा परेशान हो गया तो हम लोगों की क्या बात है, यह भी उम्मीद नहीं है कि इस समय किशोरी का पता लगे, अस्तु जहां तक जल्द हो सके यहां से चले चलना ही मुनासिब है।

जितने आदमी मर गये थे उसी तहखाने में गड्ढा खोदकर गाड़ दिये गये, बाकी बचे हुए चार-पांच आदमियों को राजा दिग्विजयसिंह सहित कैदियों को तरह साथ लिया और सभों का मुंह चादर से बांध दिया। ज्योतिषीजी ने भी ताली का झब्बा सम्हाला, रोजनामचा हाथ में लिया, और सभों के साथ तहखाने से बाहर हुए। अबकी दफे तहखाने से बाहर निकलते हुए जितने दरवाजे थे सभों में ज्योतिषीजी ताला लगाते गए जिससे उसके अंदर कोई आने न पावे।

तहखाने से बाहर निकलने पर लाली ने कुंअर आनंदसिंह से कहा, “मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मेरी मेहनत बर्बाद हो गई और किशोरी से मिलने की आशा न रही। अब यदि आप आज्ञा दें तो मैं अपने घर जाऊं क्योंकि किशोरी ही की तरह मैं भी इस किले में कैद की गई थी।”

आनंद – तुम्हारा मकान कहां है?

लाली – मथुराजी।

भैरो – (आनंदसिंह से) इसमें कोई शक नहीं कि लाली का किस्सा भी बहुत बड़ा और दिलचस्प होगा, इन्हें हमारे महाराज के पास अवश्य ले चलना चाहिए।

बद्री – जरूर ऐसा होना चाहिए नहीं तो महाराज रंज होंगे।

ऐयारों का मतलब कुंअर आनंदसिंह समझ गए और इसी जगह से लाली को बिदा होने की आज्ञा उन्होंने न दी। लाचार लाली को कुंअर साहब के साथ जाना ही पड़ा और ये लोग बिना किसी तरह की तकलीफ पाए राजा वीरेंद्रसिंह के लश्कर में पहुंच गये जहां लाली इज्जत के साथ एक खेमे में रखी गई।

बयान–10

दूसरे दिन संध्या के समय राजा वीरेंद्रसिंह अपने खेमे में बैठे रोहतासगढ़ के बारे में बातचीत करने लगे। पंडित बद्रीनाथ, भैरोसिंह, तारासिंह, ज्योतिषीजी, कुंअर आनंदसिंह और तेजसिंह उनके पास बैठे हुए थे। अपने-अपने तौर पर सभों ने रोहतासगढ़ के तहखाने का हाल कह सुनाया और अन्त में वीरेंद्रसिंह से बातचीत होने लगी।

वीरेंद्र – रोहतासगढ़ के बारे में अब क्या करना चाहिए?

तेज – इसमें तो कोई शक नहीं कि रोहतासगढ़ के मालिक आप हो चुके। जब राजा और दीवान दोनों आपके कब्जे में आ गये तो अब किस बात की कसर रह गई हां अब यह सोचना है कि राजा दिग्विजयसिंह के साथ क्या सलूक करना चाहिए?

वीरेंद्र – और किशोरी के लिए क्या बंदोबस्त करना चाहिए?

तेज – जी हां यही दो बातें हैं। किशोरी के बारे में तो मैं अभी कुछ कह नहीं सकता, बाकी राजा दिग्विजयसिंह के बारे में पहले आपकी राय सुनना चाहता हूं।

वीरेंद्र – मेरी राय तो यही हे कि यदि वह सच्चे दिल से ताबेदारी कबूल करे तो रोहतासगढ़ पर खिराज (मालगुजारी) मुकर्रर करके उसे छोड़ देना चाहिए।

तेज – मेरी भी यही राय है।

भैरो – यदि वह इस समय कबूल करने के बाद पीछे बेईमानी पर कमर बांधे तो?

तेज – ऐसी उम्मीद नहीं है। जहां तक मैंने सुना है वह ईमानदार, सच्चा और बहादुर जाना गया है, ईश्वर न करे यदि उसकी नीयत कुछ दिन बाद बदल भी जाए तो हम लोगों को इसकी परवाह न करनी चाहिए।

वीरेंद्र – इसका विचार कहां तक किया जाएगा! (तारासिंह की तरफ देखकर) तुम जाओ दिग्विजयसिंह को ले आओ, मगर मेरे सामने हथकड़ी-बेड़ी के साथ मत लाना।

‘जो हुक्म’ कहकर तारासिंह दिग्विजयसिंह को लाने के लिए चले गये और थोड़ी ही देर में उन्हें अपने साथ लेकर हाजिर हुए, तब तक इधर-उधर की बात होती रहीं। दिग्विजयसिंह ने अदब के साथ राजा वीरेंद्रसिंह को सलाम किया और हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया।

वीरेंद्र – कहिये, अब क्या इरादा है?

दिग्विजय – यही कि जन्म भर आपके साथ रहूं और ताबेदारी करूं।

वीरेंद्र – नीयत में किसी तरह का फर्क तो नहीं है?

दिग्विजय – आप जैसे प्रतापी राजा के साथ खुटाई रखने वाला पूरा कम्बख्त है। वह पूरा बेवकूफ है जो किसी तरह पर आपसे जीतने की उम्मीद रखे। इसमें कोई शक नहीं कि आपके एक ऐयार दस-दस राज्य गारत कर देने की सामर्थ्य रखते हैं। मुझे इस रोहतासगढ़ किले की मजबूती पर बड़ा भरोसा था, मगर अब निश्चय हो गया कि वह मेरी भूल थी। आप जिस राज्य को चाहें बिना लड़े फतह कर सकते हैं। मेरी तो अक्ल नहीं काम करती, कुछ समझ में नहीं आता कि क्या हुआ और आपके ऐयारों ने क्या तमाशा कर दिया। सैकड़ों वर्षों से जिस तहखाने का हाल एक भेद के तौर पर छिपा चला आता था, बल्कि सच तो यह है कि जहां का ठीक-ठीक हाल अभी तक मुझे भी मालूम न हुआ उसी तहखाने पर बात की बात में आपके ऐयारों ने कब्जा कर लिया, यह करामात नहीं तो क्या है! बेशक ईश्वर की आप पर कृपा है और यह सब सच्चे दिल से उपासना का प्रताप है। आपसे दुश्मनी रखना अपने हाथ से अपना सिर काटना है।

दिग्विजयसिंह की बात सुनकर राजा वीरेंद्रसिंह मुस्कराए और उनकी तरफ देखने लगे। दिग्विजयसिंह ने जिस ढंग से ऊपर लिखी बातें कहीं उसमें सचाई की बू आती थी। वीरेंद्रसिंह बहुत खुश हुए और दिग्विजयसिंह को अपने पास बैठाकर बोले –

वीरेंद्र – सुनो दिग्विजयसिंह, हम तुम्हें छोड़ देते हैं और रोहतासगढ़ की गद्दी पर अपनी तरफ से तुम्हें बैठाते हें मगर इस शर्त पर कि तुम हमेशा अपने को हमारा मातहत समझो और खिराज की तौर पर कुछ मालगुजारी दिया करो।

दिग्विजय – मैं तो अपने को आपका ताबेदार समझ चुका अब क्या समझूंगा, बाकी रही रोहतासगढ़ की गद्दी, सो मुझे मन्जूर नहीं। इसके लिए आप कोई दूसरा नायब मुकर्रर कीजिए और मुझे अपने साथ रहने का हुक्म कीजिये।

वीरेंद्र – तुमसे बढ़कर और कोई नायब रोहतासगढ़ के लिए मुझे दिखाई नहीं देता।

दिग्विजय – (हाथ जोड़कर) बस मुझ पर कृपा कीजिये, अब राज्य का जंजाल मैं नहीं उठा सकता।

आधे घंटे तक यही हुज्जत रही। वीरेंद्रसिंह अपने हाथ से रोहतासगढ़ की गद्दी पर दिग्विजयसिंह को बैठाना चाहते थे और दिग्विजयसिंह इन्कार करते थे, लेकिन आखिर लाचार होकर दिग्विजयसिंह को वीरेंद्रसिंह का हुक्म मंजूर करना पड़ा, मगर साथ ही इसके उन्होंने वीरेंद्रसिंह से इस बात का इकरार करा लिया कि महीने भर तक आपको मेरा मेहमान बनना पड़ेगा और इतने दिनों तक रोहतासगढ़ में रहना पड़ेगा।

वीरेंद्रसिंह ने इस बात को खुशी से मंजूर कर लिया, क्योंकि रोहतासगढ़ के तहखाने का हाल उन्हें बहुत कुछ मालूम करना था। वीरेंद्रसिंह और तेजसिंह को विश्वास हो गया था कि वह तहखाना जरूर कोई तिलिस्म है।

राजा दिग्विजयसिंह ने हाथ जोड़कर तेजसिंह की तरफ देखा और कहा, “कृपा कर मुझे समझा दीजिये कि आप और आपके मातहत ऐयार लोगों ने रोहतासगढ़ में क्या किया, अभी तक मेरी अक्ल हैरान है।”

तेजसिंह ने सब बात खुलासे तौर पर कह सुनायी। दीवान रामानंद का हाल सुन दिग्विजयसिंह खूब हंसे बल्कि उन्हें अपनी बेवकूफी पर भी हंसी आई और बोले, “आप लोगों से कोई बात दूर नहीं है।” इसके बाद दीवान रामानंद भी उसी जगह बुलवाये गये और दिग्विजयसिंह के हवाले किये गए और दिग्विजयसिंह के लड़के कुंअर कल्याणसिंह को लाने के लिए भी कई आदमी चुनारगढ़ रवाना किए गए।

इन सब कामों से छुट्टी पाकर लाली के बारे में बातचीत होने लगी। तेजसिंह ने दिग्विजयसिंह से पूछा कि लाली कौन है और आपके यहां कब से है इसके जवाब में दिग्विजयसिंह ने कहा कि लाली को हम बखूबी नहीं जानते। महीने भर से ज्यादा न हुआ होगा कि चार-पांच दिन के आगे-पीछे लाली और कुंदन दो नौजवान औरतें मेरे यहां पहुंचीं। उनकी चालढाल और पोशाक से मुझे मालूम हुआ कि किसी इज्जतदार घराने की लड़कियां हैं। पूछने पर उन दोनों ने अपने को इज्जतदार घराने की लड़की जाहिर भी किया और कहा कि मैं अपनी मुसीबत के दो-तीन महीने आपके यहां काटना चाहती हूं। रहम खाकर मैंने उन दोनों को इज्जत के साथ अपने यहां रखा, बस इसके सिवाय और मैं कुछ नहीं जानता।

तेज – बेशक इसमें कोई भेद है, वे दोनों साधारण औरतें नहीं हैं।

ज्योतिषी – एक ताज्जुब की बात मैं सुनाता हूं।

तेज – वह क्या?

ज्योतिषी – आपको याद होगा कि तहखाने का हाल कहते समय मैंने कहा था कि जब तहखाने में किशोरी और लाली को मैंने देखा तो दोनों का नाम लेकर पुकारा जिससे उन दोनों को आश्चर्य हुआ।

तेज – हां-हां, मुझे याद है, मैं यह पूछने ही वाला था कि लाली को आपने कैसे पहचाना?

ज्योतिषी – बस यही वह ताज्जुब की बात है जो अब मैं आपसे कहता हूं।

तेज – कहिए, जल्द कहिए।

ज्योतिषी – एक दफे रोहतासगढ़ के तहखाने में बैठे-बैठे मेरी तबीयत घबड़ाई तो मैं कोठरियों को खोल-खोलकर देखने लगा। उस ताली के झब्बे में जो मेरे हाथ लगा था एक ताली सबसे बड़ी है जो तहखाने की सब कोठरियों में लगती है मगर बाकी बहुत-सी तालियों का पता मुझे अभी तक नहीं लगा कि कहां की हैं।

तेज – खैर तब क्या हुआ?

ज्योतिषी – सब कोठरियों में अंधेरा था, चिराग ले जाकर मैं कहां तक देखता, मगर एक कोठरी में दीवार के साथ चमकती हुई कोई चीज दिखाई दी। यद्यपि कोठरी में बहुत अंधेरा था तो भी अच्छी तरह मालूम हो गया कि यह कोई तस्वीर है। उस पर ऐसा मसाला लगा हुआ था कि अंधेरे में भी वह तस्वीर साफ मालूम होती थी, आंख, कान, नाक बल्कि बाल तक मालूम होते थे। तस्वीर के नीचे ‘लाली’ ऐसा लिखा हुआ था। मैं बड़ी देर तक ताज्जुब से उस तस्वीर को देखता रहा, आखिर कोठरी बंद करके अपने ठिकाने चला आया, उसके बाद जब किशोरी के साथ मैंने लाली को देखा तो साफ पहचान लिया कि वह तस्वीर इसी की है। मैंने तो सोचा था कि लाली उसी जगह की रहने वाली है। इसीलिए उसकी तस्वीर वहां पाई गई, मगर इस समय महाराज दिग्विजयसिंह की जुबानी उसका हाल सुनकर ताज्जुब होता है, लाली अगर वहां की रहने वाली नहीं तो उसकी तस्वीर वहां कैसे पहुंची।

दिग्विजय – मैंने अभी तक वह तस्वीर नहीं देखी, ताज्जुब है!

वीरेंद्र – अभी क्या जब मैं आपको साथ लेकर अच्छी तरह उस तहखाने की छानबीन करूंगा तो बहुत-सी बातें ताज्जुब की दिखाई पड़ेंगी।

दिग्विजय – ईश्वर करे जल्द ऐसा मौका आये, अब तो आपको बहुत जल्द रोहतासगढ़ चलना चाहिए।

वीरेंद्र – (तेजसिंह की तरफ देखकर) इंद्रजीतसिंह के बारे में क्या बंदोबस्त हो रहा है

तेज – मैं बेफिक्र नहीं हूं, जासूस लोग चारों तरफ भेजे गये हैं इस समय तक रोहतासगढ़ की कार्रवाई में फंसा हुआ था, अब स्वयं उनकी खोज में जाऊंगा, कुछ पता लगा भी है।

वीरेंद्र – हां! क्या पता लगा है?

तेज – इसका हाल कल कहूंगा आज भर और सब्र कीजिये।

राजा वीरेंद्रसिंह अपने दोनों लड़कों को बहुत चाहते थे, इंद्रजीतसिंह के गायब होने का रंज उन्हें बहुत था, मगर वह अपने चित्त के भाव को भी खूब ही छिपाते थे और समय का ध्यान उन्हें बहुत रहता था। तेजसिंह का भरोसा उन्हें बहुत था और उन्हें मानते भी बहुत थे, जिस काम से उन्हें तेजसिंह रोकते थे उसका नाम फिर वह जुबान पर तब तक न लाते थे जब तक तेजसिंह स्वयं उसका जिक्र न छेड़ते, यही सबब था कि इस समय वे तेजसिंह के सामने इंद्रजीतसिंह के बारे में कुछ न बोले।

दूसरे दिन महाराज दिग्विजयसिंह सेना सहित तेजसिंह को रोहतासगढ़ किले में ले गये। कुंअर आनंदसिंह के नाम का डंका बजाया गया। यह मौका ऐसा था कि खुशी के जलसे होते मगर कुंअर इंद्रजीतसिंह के खयाल से किसी तरह की खुशी न की गई।

राजा दिग्विजयसिंह के बर्ताव और खातिरदारी से राजा वीरेंद्रसिंह और उनके साथी लोग बहुत प्रसन्न हुए। दूसरे दिन दीवानखाने में थोड़े आदमियों की कमेटी इसलिए की गई कि अब क्या करना चाहिए। इस कमेटी में केवल नीचे लिखे बहादुर और ऐयार लोग इकट्ठे थे – राजा वीरेंद्रसिंह, कुंअर आनंदसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह, पंडित बद्रीनाथ, ज्योतिषीजी, महाराज दिग्विजयसिंह और रामानंद। इनके अतिरिक्त एक और आदमी मुंह पर नकाब डाले मौजूद था जिसे तेजसिंह अपने साथ लाये थे और उसे अपनी जमानत पर कमेटी में शरीक किया था।

वीरेंद्र – (तेजसिंह की तरफ देखकर) इस नकाबपोश आदमी के सामने जिसे तुम अपने साथ लाये हो हम लोग भेद की बातें कर सकते हैं?

तेज – हां-हां, कोई हर्ज की बात नहीं है।

वीरेंद्र – अच्छा तो अब हम लोगों को एक तो किशोरी का पता लगाने का, दूसरे यहां के तहखाने से जो बहुत-सी बातें जानने और विचारने लायक हैं उनके मालूम करने का, तीसरे इंद्रजीतसिंह के खोजने का बंदोबस्त सबसे पहले करना चाहिए। (तेजसिंह की तरफ देखकर) तुमने कहा था कि इंद्रजीतसिंह का कुछ हाल मालूम हो चुका है।

तेज – जी हां बेशक मैंने कहा था और उसका खुलासा हाल इस समय आपको मालूम हुआ चाहता है, मगर इसके पहले मैं दो-चार बातें राजा साहब से (दिग्विजयसिंह की तरफ इशारा करके) पूछा चाहता हूं जो बहुत जरूरी हैं, इसके बाद अपने मामले में बातचीत करूंगा।

वीरेंद्र – कोई हर्ज नहीं।

दिग्वि – हां-हां पूछिये।

तेज – आपके यहां शेरसिंह2 नाम का कोई ऐयार था?

दिग्वि – हां था, बेचारा बहुत ही नेक, ईमानदार, मेहनती आदमी था और ऐयारी के फन में पूरा ओस्ताद था, रामानंद और गोविंदसिंह उसी के चेले हैं। उसके भाग जाने का मुझे बहुत ही रंज है। आज के दो-तीन दिन पहले दूसरे तरह का रंज था मगर आज और तरह का अफसोस है।

तेज – दो तरह के रंज और अफसोस का मतलब मेरी समझ में नहीं आया, कृपा करके साफ-साफ कहिये।

दिग्वि – पहले उसके भाग जाने का अफसोस क्रोध के साथ था मगर आज इस बात का अफसोस है कि जिन बातों को सोचकर वह भागा वे बहुत ठीक थीं, उसकी तरफ से मेरा रंज होना अनुचित था, यदि इस समय वह होता तो बड़ी खुशी से आपके काम में मदद करता।

तेज – उससे आप क्यों रंज हुए थे और वह क्यों भाग गया था

दिग्वि – इसका सबब यह था कि जब मैंने किशोरी को अपने कब्जे में कर लिया तो उसने मुझे बहुत कुछ समझाया और कहा कि ‘आप ऐसा काम न कीजिए बल्कि किशोरी को राजा वीरेंद्रसिंह के यहां भेज दीजिए।’ यह बात मैंने मंजूर न की बल्कि उससे रंज होकर मैंने इरादा कर लिया कि उसे कैद कर लूं। असल बात यह है कि मुझसे और रणधीरसिंह से दोस्ती थी, शेरसिंह मेरे यहां रहता था और उसका छोटा भाई गदाधरसिंह जिसकी लड़की कमला है, आप उसे जानते होंगे!…

तेज – हां-हां, हम सब कोई उसे अच्छी तरह जानते हैं।

दिग्वि – खैर तो गदाधरसिंह रणधीरसिंह के यहां रहता था। गदाधरसिंह को मरे बहुत दिन हो गये, इसी बीच में मुझसे और रणधीरसिंह से भी कुछ बिगड़ गई, इधर जब मैंने रणधीरसिंह की नतिनी किशोरी को अपने लड़के के साथ ब्याहने का बंदोबस्त किया तो शेरसिंह को बहुत बुरा मालूम हुआ। मेरी तबीयत भी शेरसिंह से फिर गई। मैंने सोचा कि शेरसिंह की भतीजी कमला हमारे यहां से किशोरी को निकाल ले जाने का जरूर उद्योग करेगी और इस काम में अपने चाचा शेरसिंह से मदद लेगी। यह बात मेरे दिल में बैठ गई और मैंने शेरसिंह को कैद करने का विचार किया। उसे मेरा इरादा मालूम हो गया और वह चुपचाप न मालूम कहां भाग गया।

तेज – अब आप क्या सोचते हैं! उसका कोई कसूर था या नहीं

दिग्वि – नहीं, नहीं, वह बिल्कुल बेकसूर था बल्कि मेरी ही भूल थी जिसके लिए आज मैं अफसोस करता हूं, ईश्वर करे उसका पता लग जाय तो मैं उससे अपना कसूर माफ कराऊं।

तेज – आप मुझे कुछ इनाम दें तो मैं शेरसिंह का पता लगा दूं!

दिग्वि – आप जो मांगेंगे मैं दूंगा और इसके अतिरिक्त आपका भारी अहसान मुझ पर होगा।

तेज – बस मैं यही इनाम चाहता हूं कि यदि शेरसिंह को ढूंढ़कर ले आऊं तो उसे आप हमारे राजा वीरेंद्रसिंह के हवाले कर दें! हम उसे अपना साथी बनाना चाहते हैं।

दिग्व – मैं खुशी से इस बात को मंजूर करता हूं, वादा करने की क्या जरूरत है जबकि मैं स्वयं राजा वीरेंद्रसिंह का ताबेदार हूं।

इसके बाद तेजसिंह ने उस नकाबपोश की तरफ देखा जो उनके पास बैठा हुआ था और जिसे वह अपने साथ इस कमेटी में लाये थे। नकाबपोश ने अपने मुंह पर से नकाब उतारकर फेंक दिया और यह कहता हुआ राजा दिग्विजयसिंह के पैरों पर गिर पड़ा कि ‘आप मेरा कसूर माफ करें।’ राजा दिग्विजयसिंह ने शेरसिंह को पहचाना, बड़ी खुशी से उठाकर गले लगा लिया और कहा, “नहीं-नहीं, तुम्हारा कोई कसूर नहीं बल्कि मेरा कसूर है जो मैं तुमसे क्षमा कराया चाहता हूं।”

शेरसिंह तेजसिंह के पास जा बैठे। तेजसिंह ने कहा, “सुनो शेरसिंह, अब तुम हमारे हो चुके हो!”

शेर – बेशक मैं आपका हो चुका हूं, जब आपने महाराज से वचन ले लिया तो अब क्या उज्र हो सकता है?

राजा वीरेंद्रसिंह ताज्जुब से ये बातें सुन रहे थे, अंत में तेजसिंह की तरफ देखकर बोले, “तुम्हारी मुलाकात शेरसिंह से कैसे हुई’

तेज – शेरसिंह ने मुझसे स्वयं मिलकर सब हाल कहा, असल तो यह है कि हम लोगों पर भी शेरसिंह ने भारी अहसान किया है।

वीरेंद्र – वह क्या?

तेज – कुंअर इंद्रजीतसिंह का पता लगाया है और अपने कई आदमी उनकी हिफाजत के लिए तैनात कर चुके हैं, इस बात का भी निश्चय दिला दिया है कि कुंअर इंद्रजीतसिंह को किसी तरह की तकलीफ न होने पावेगी।

वीरेंद्र – (खुश होकर और शेरसिंह की तरफ देखकर) हां! कहां पता लगा और किस हालत में है?

शेर – वह सब हाल जो कुछ मुझे मालूम था मैं दीवान साहब (तेजसिंह) से कह चुका हूं वह आपसे कह देंगे, आप उसके जानने की जल्दी न करें। मैं इस समय यहां जिस काम के लिए आया था मेरा वह काम हो चुका अब मैं यहां ठहरना मुनासिब नहीं समझता। आप लोग अपने मतलब की बातचीत करें क्योंकि मदद के लिए मैं बहुत जल्द कुंअर इंद्रजीतसिंह के पास पहुंचा चाहता हूं। हां यदि आप कृपा करके अपना एक ऐयार मेरे साथ कर दें तो उत्तम हो और काम भी शीघ्र हो जाय।

वीरेंद्र – (खुश होकर) अच्छी बात है, आप जाइये और मेरे जिस ऐयार को चाहें लेते जाइये।

शेर – अगर आप मेरी मर्जी पर छोड़ते हैं तो देवीसिंह को अपने साथ के लिए मांगता हूं।

तेज – हां आप खुशी से उन्हें ले जायं। (देवीसिंह की तरफ देखकर) आप तैयारी कीजिए।

देवी – मैं हरदम तैयार रहता हूं। (शेरसिंह से) चलिए अब इन लोगों का पीछा छोड़िए।

देवीसिंह को साथ लेकर शेरसिंह रवाना हुए और इधर इन लोगों में विचार होने लगा कि अब क्या करना चाहिए। घंटे भर में यह निश्चय हुआ कि लाली से कुछ विशेष पूछने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह अपना हाल ठीक-ठीक कभी न कहेगी, हां उसे हिफाजत में रखना चाहिए और तहखाने को अच्छी तरह देखना और वहां का हाल मालूम करना चाहिए।

बयान-11

अब तो कुंदन का हाल जरूर ही लिखना पड़ा, पाठक महाशय उसका हाल जानने के लिए उत्कंठित हो रहे होंगे। हमने कुंदन को रोहतासगढ़ महल के उसी बाग में छोड़ा है जिसमें किशोरी रहती थी। कुंदन इस फिक्र में लगी रहती थी कि किशोरी किसी तरह लाली के कब्जे में न पड़ जाय।

जिस समय किशोरी को लेकर सेंध की राह लाली उस घर में उतरी जिसमें तहखाने का रास्ता था और यह हाल कुंदन को मालूम हुआ तो वह बहुत घबड़ाई। महल भर में इस बात का गुल मचा दिया और सोच में पड़ी कि, अब क्या करना चाहिए हम पहले लिख आये हैं कि किशोरी और लाली के जाने के बाद ‘धरो पकड़ो’ की आवाज लगाते हुए कई आदमी सेंध की राह उसी मकान में उतर गये जिसमें लाली और किशोरी गई थीं।

उन्हीं लोगों में मिलकर कुंदन भी एक छोटी-सी गठरी कमर के साथ बांध उस मकान के अंदर चली गई और यह हाल घबड़ाहट और गुल-शोर में किसी को मालूम न हुआ। उस मकान के अंदर भी बिल्कुल अंधेरा था। लाली ने दूसरी कोठरी में जाकर दरवाजा बंद कर लिया इसलिये लाचार होकर पीछा करने वालों को लौटना पड़ा और उन लोगों ने इस बात की इत्तिला महाराज से की, मगर कुंदन उस मकान से न लौटी बल्कि किसी कोने में छिप रही।

हम पहले लिख आये हैं और अब भी लिखते हैं कि उस मकान के अंदर तीन दरवाजे थे, एक तो वह सदर दरवाजा था जिसके बाहर पहरा पड़ा करता था, दूसरा खुला पड़ा था, तीसरे दरवाजे को खोलकर किशोरी को साथ लिये लाली गई थी।

जो दरवाजा खुला था उसके अंदर एक दालान था, इसी दालान तक लाली और किशोरी को खोजकर पीछा करने वाले लौट गये थे क्योंकि कहीं आगे जाने का रास्ता उन लोगों को न मिला था। जब वे लोग मकान के बाहर निकल गये तो कुंदन ने अपनी कमर से गठरी खोली और उसमें से सामान निकालकर मोमबत्ती जलाने के बाद चारों तरफ देखने लगी।

यह एक छोटा-सा दालान था मगर चारों तरफ से बंद था। इस दालान की दीवारों में तरह-तरह की भयानक तस्वीरें बनी हुई थीं मगर कुंदन ने उन पर कुछ ध्यान न दिया। दालान के बीचोंबीच में बित्ते-बित्ते भर के ग्यारह डिब्बे लोहे के रखे हुए थे और हर एक डिब्बे पर आदमी की खोपड़ी रखी हुई थी। कुंदन उन्हीं डिब्बों को गौर से देखने लगी। ये डिब्बे गोलाकार एक चौकी पर सजाए हुए थे, एक डिब्बे पर आधी खोपड़ी थी और बाकी डिब्बों पर पूरी-पूरी। कुंदन इस बात को देखकर ताज्जुब कर रही थी कि इनमें से एक खोपड़ी जमीन पर क्यों पड़ी हुई है, औरों की तरह उसके नीचे डिब्बा नहीं है कुंदन ने उस डिब्बे से जिस पर आधी खोपड़ी रखी हुई थी गिनना शुरू किया। मालूम हुआ कि सातवें नंबर की खोपड़ी के नीचे डिब्बा नहीं है। यकायक कुंदन के मुंह से निकला, “ओफओह, बेशक इसके नीचे का डिब्बा लाली ले गई क्योंकि ताली वाला डिब्बा नहीं था, मगर यह हाल उसे क्योंकर मालूम हुआ’

कुंदन ने फिर गिनना शुरू किया और टूटी हुई खोपड़ी से पांचवें नंबर पर रुक गई, खोपड़ी उठाकर नीचे रख दी और डिब्बे को उठा लिया, तब अच्छी तरह गौर से देखकर जोर से जमीन पर पटका। डिब्बे के चार टुकड़े हो गए, मानो चार जगहों से जोड़ लगाया हुआ हो। उसके अंदर से एक ताली निकली जिसे देख कुंदन हंसी और खुश होकर आप ही आप बोली, “देखो तो लाली को मैं कैसा छकाती हूं।”

कुंदन ने उस ताली से काम लेना शुरू किया। उसी दालान में दीवार के साथ एक अलमारी थी जिसे कुंदन ने उसी ताली से खोला। नीचे उतरने के लिए सीढ़ियां नजर आईं और वह बेखौफ नीचे उतर गई। एक कोठरी में पहुंच जहां एक छोटे सिंहासन के ऊपर हाथ-भर लंबी और इससे कुछ कम चौड़ी तांबे की एक पट्टी रखी हुई थी। कुंदन ने उसे उठाकर अच्छी तरह देखा, मालूम हुआ कि कुछ लिखा हुआ है, अक्षर खुदे हुए थे और उन पर किसी तरह का चिकना या तेल मला हुआ था जिसके सबब से पटिया अभी तक जंग लगने से बची हुई थी। कुंदन ने उस लेख को बड़े गौर से पढ़ा और हंसकर चारों तरफ देखने लगी। उस कोठरी की दीवार में दो तरफ दो दरवाजे थे और एक पल्ला जमीन में था। उसने एक दरवाजा खोला, ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां मिलीं, वह बेखौफ ऊपर चढ़ गई और एक ऐसी तंग कोठरी में पहुंची जिसमें चार-पांच आदमी से ज्यादे के बैठने की जगह न थी, मगर इस कोठरी के चारों तरफ की दीवार में छोटे-छोटे कई छेद थे, जलती हुई बत्ती बुझाकर उन छेदों में से एक छेद में आंख लगाकर कुंदन ने देखा।

कुंदन ने अपने को ऐसी जगह पाया जहां से वह भयानक मूर्ति जिसके आगे एक औरत बलि दी जा चुकी थी और जिसका हाल पीछे लिख आये हैं साफ दिखाई देती थी। थोड़ी देर में कुंदन ने महाराज दिग्विजयसिंह, तहखाने के दारोगा, लाली, किशोरी और बहुत से आदमियों को वहां देखा। उसके देखते ही देखते एक औरत उस मूरत के सामने बलि दी गई और कुंअर आनंदसिंह ऐयारों सहित पकड़े गये। इस तहखाने में से किशोरी और कुंअर आनंदसिंह का भी कुछ हाल हम ऊपर लिख आये हैं वह सब कुंदन ने देखा था। आखिर में कुंदन नीचे उतर आई और उस पल्ले को जो जमीन में था उसी ताली से खोलकर तहखाने में उतरने के बाद बत्ती बालकर देखने लगी। छत की तरफ निगाह करने से मालूम हुआ कि वह सिंहासन पर बैठी हुई भयानक मूर्ति जो कि भीतर की तरफ से बिल्कुल (सिंहासन सहित) पोली थी, उसके सिर के ऊपर है।

कुंदन फिर ऊपर आई और दीवार में लगे हुए एक दूसरे दरवाजे को खोलकर एक सुरंग में पहुंची। कई कदम जाने के बाद एक छोटी खिड़की मिली, उसी ताली से कुंदन ने उस खिड़की को भी खोला। अब वह उस रास्ते में पहुंच गई जो दीवानखाने और तहखाने में आने-जाने के लिए था और जिस राह से महाराज आते थे, तहखाने से दीवानखाने में जाने तक जितने दरवाजे थे सभी को कुंदन ने अपनी ताली से बंद कर दिया, ताले के अलावे उन दरवाजों में एक-एक खटका और भी था उसे भी कुंदन ने चढ़ा दिया। इस काम से छुट्टी पाने के बाद फिर वहां पहुंची जहां से भयानक मूर्ति और आदमी सब दिखाई दे रहे थे। कुंदन ने अपनी आंखों से राजा दिग्विजयसिंह की घबराहट देखी जो दरवाजा बंद हो जाने से उन्हें हुई थी।

मौका देखकर कुंदन वहां से उतरी और उस तहखाने में जो उस भयानक मूर्ति के नीचे था पहुंची। थोड़ी देर तक कुछ बकने के बाद कुंदन ने ही वे शब्द कहे जो उस भयानक मूर्ति के मुंह से निकले हुए राजा दिग्विजयसिंह या और लोगों ने सुने थे और उनके मुताबिक किशोरी बारह नंबर की कोठरी में बंद कर दी गई थी।

कुंदन वहां से निकलकर यह देखने के लिए कि राजा किशोरी को उस कोठरी में बंद करता है या नहीं। फिर उस छत पर पहुंची जहां से सब लोग दिखाई पड़ते थे। जब कुंदन ने देखा कि किशोरी उस कोठरी में बंद कर दी गई तो वह नीचे तहखाने में उतरी। उसी जगह से एक रास्ता था जो उस कोठरी के ठीक नीचे पहुंचता था जिसमें किशोरी बंद की गई थी। वहां की छत इतनी नीची थी कि कुंदन को बैठ कर जाना पड़ा। छत में एक पेंच लगा हुआ था जिसके घुमाने से एक पत्थर की चट्टान हट गई और आंचल से मुंह ढांपे कुंदन किशोरी के सामने जा खड़ी हुई।

बेचारी किशोरी तरह-तरह की आफतों से आप ही बदहवास हो रही थी, अंधेरे में बत्ती लिए यकायक कुंदन को निकलते हुए देख घबड़ा गई। उसने घबड़ाहट में कुंदन को बिल्कुल नहीं पहचाना बल्कि उसे भूत, प्रेत या कोई आसेब समझकर डर गई और एक चीख मारकर बेहोश हो गई।

कुंदन ने अपनी कमर से कोई दवा निकालकर किशोरी को सुंघाई जिससे वह अच्छी तरह बेहोश हो गई, इसके बाद अपनी छोटी गठरी में से सामान निकालकर वह बरवा अर्थात ‘धनपति रंग मचायो साध्यो काम’…इत्यादि लिखकर कोठरी में एक तरफ रख दिया और अपनी कमर से एक चादर खोली जो महल से लेती आई थी, उसी में किशोरी की गठरी बांधी और नीचे घसीट ले गई। जिस तरह पेंच को घुमाकर पत्थर की चट्टान हटाई थी उसी तरह रास्ता बंद कर दिया।

यह सुरंग कोठरी के नीचे खतम नहीं हुई थी बल्कि दूर तक चली गई थी। आगे से चौड़ी और ऊंची होती गई थी। किशोरी को लिए हुए कुंदन उस सुरंग में चलने लगी। लगभग सौ कदम जाने के बाद एक दरवाजा मिला जिसे कुंदन ने उसी ताली से खोला, आगे फिर उसी सुरंग में चलना पड़ा। आधी घड़ी के बाद सुरंग का अंत हुआ और कुंदन ने अपने को एक खोह के मुंह पर पाया।

इस जगह पहुंचकर कुंदन ने सीटी बजाई। थोड़ी देर में पांच आदमी आ मौजूद हुए और एक ने बढ़कर पूछा, “कौन है धनपतिजी!”

कुंदन – हां रामा, तुम लोगों को यहां बहुत दुख भोगना और कई दिन तक अटकना पड़ा।

रामा – जब हमारे मालिक ही इतने दिनों तक अपने को बला में डाले हुए थे जहां से जान बचाना मुश्किल था तो फिर हम लोगों की क्या बात है, हम लोग तो खुले मैदान में थे।

कुंदन – लो किशोरी तो हाथ लग गई, अब इसे ले चलो और जहां तक जल्द हो सके भागो।

वे लोग किशोरी को लेकर वहां से रवाना हुए। पाठक तो समझ ही गये होंगे कि किशोरी धनपति के काबू में पड़ गई। कौन धनपति वही धनपति जिसे नानक और रामभोली के बयान में आप लोग जान चुके हैं। मेरे इस लिखने से पाठक महाशय चौंकेंगे और उनका ताज्जुब घटेगा नहीं बल्कि बढ़ जायगा, इसके साथ ही साथ पाठकों को नानक की वह बात कि ‘वह किताब भी जो किसी के खून से लिखी गई है…’ भी याद आयेगी जिसके सबब से नानक ने अपनी जान बचाई थी। पाठक इस बात को भी जरूर सोचेंगे कि कुंदन अगर असल में धनपति थी तो लाली जरूर रामभोली होगी, क्योंकि धनपति को किसी के ‘खून से लिखी हुई किताब’ का भेद मालूम था और यह भेद रामभोली को भी मालूम था। जब धनपति ने रोहतासगढ़ महल में लाली के सामने उस किताब का जिक्र किया तो लाली कांप गई जिससे मालूम होता है कि वह रामभोली ही होगी। किसी के खून से लिखी हुई किताब का नाम सुनकर अगर लाली डर गई तो धनपति भी जरूर समझ गई होगी कि यह रामभोली है, फिर धनपति (कुंदन) लाली से मिल क्यों न गई क्योंकि वे दोनों तो एक ही के तुल्य थीं ऐसी अवस्था में तो इस बात का शक होता है कि लाली रामभोली न थी। फिर तहखाने में धनपति के लिखे हुए बरवै को सुनकर लाली क्यों हंसी इत्यादि बातों को सोचकर पाठकों की चिंता अवश्य बढ़ेगी, क्या किया जाय, लाचारी है।

बयान-12

दूसरे दिन दो पहर दिन चढ़े बाद किशोरी की बेहोशी दूर हुई। उसने अपने को एक गहन वन के पेड़ों की झुरमुट में जमीन पर पड़े पाया और अपने पास कुंदन और कई आदमियों को देखा। बेचारी किशोरी इन थोड़े ही दिनों में तरह-तरह की मुसीबतों में पड़ चुकी थी। जिस सायत से वह घर से निकली आज तक एक पल के लिए भी सुखी न हुई, मानो सुख तो उसके हिस्से ही में न था। इस समय भी उसने अपने को बुरी अवस्था में पाया। यद्यपि कुंदन उसके सामने बैठी थी परंतु उसे उसकी तरफ से किसी तरह की भलाई की आशा न थी।

इसके अतिरिक्त वहां और भी कई आदमियों को देख तथा अपने को बेहोशी की अवस्था से चैतन्य होते पा उसे विश्वास हो गया कि कुंदन ने उसके साथ दगा किया। रात की बातें वह स्वप्न की तरह याद करने लगी और इस समय भी वह इस बात का निश्चय न कर सकी कि उसके साथ कैसा बर्ताव किया जायगा। थोड़ी देर तक वह अपनी मुसीबतों को सोचती और ईश्वर से अपनी मौत मांगती रही। आखिर उस समय उसे कुछ होश आया जब धनपति (कुंदन) ने उसे पुकारकर कहा, “किशोरी, तू घबरा मत तेरे साथ कोई बुराई न की जायगी।”

किशोरी – मेरी समझ में नहीं आता कि तुम क्या कह रही हो। जो कुछ तुमने किया उससे बढ़कर और बुराई क्या हो सकती है?

धन – तेरी जान न मारी जायगी बल्कि जहां तू रहेगी हर तरह से आराम मिलेगा।

किशोरी – क्या इंद्रजीतसिंह भी वहां दिखाई देंगे?

धन – हां, अगर तू चाहेगी।

किशोरी – (चौंककर) हैं, क्या कहा अगर मैं चाहूंगी?

धन – हां, यही बात है।

किशोरी – कैसे?

धन – एक चिट्ठी इंद्रजीतसिंह के नाम जो कुछ मैं कहूं लिख दे!

किशोरी – उसमें क्या लिखना पड़ेगा

धन – केवल इतना ही लिखना पड़ेगा, “अगर आप मुझे चाहते हैं तो बिना कुछ विचार किए इस आदमी के साथ मेरे पास चले आइये और जो कुछ यह मांगे दे दीजिए, नहीं तो मुझसे मिलने की आशा छोड़िए!”

किशोरी – (कुछ देर तक सोचने के बाद) मैं समझ गई कि तुम्हारी नीयत क्या है। नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता, मैं ऐसी चिट्ठी लिखकर प्यारे इंद्रजीतसिंह को आफत में नहीं फंसा सकती।

धन – तब तू किसी तरह छूट भी नहीं सकती।

किशोरी – जो हो।

धन – बल्कि तेरी जान भी चली जायगी।

किशोरी – बला से, इंद्रजीतसिंह के नाम पर मैं जान देने को तैयार हूं। इतना सुनते ही धनपति (कुंदन) का चेहरा मारे गुस्से के लाल हो गया, अपने साथियों की तरफ देखकर बोली, “अब मैं इसे नहीं छोड़ सकती, लाचार हूं। इसके हाथ-पैर बांधो और मुझे तलवार दो!”

हुक्म पाते ही उसके साथियों ने बड़ी बेहरमी से किशोरी के हाथ-पैर बांध दिए। धनपति तलवार लेकर किशोरी का सिर काटने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी उसके एक साथी ने कहा, “नहीं, इस तरह मारना मुनासिब न होगा, हम लोग बात की बात में सूखी लकड़ियां बटोरकर ढेर करते हैं, इसे उसी पर रख के फूंक दो, जलकर भस्म हो जायगी और हवा के झोंकों में इसकी राख का भी पता न लगेगा।”

इस राय को धनपति ने पसंद किया और ऐसा ही करने के लिए हुक्म दिया। संगदिल हरामखोरों ने थोड़ी देर में जंगल से चुनकर सूखी लकड़ियों का ढेर लगा दिया। हाथ-पैर बांधकर बेबस की हुई किशोरी उस पर रख दी गई। धनपति के साथियों ने एक छोटा-सा मशाल जलाया और उसे धनपति ने अपने हाथ में लिया। मुंह बंद किए हुए किशोरी यह सब बात देख-सुन और सह रही थी। जिस समय धनपति मशाल लिए चिता के पास पहुंची किशोरी ने ऊंचे स्वर में कहा – “हे अग्निदेव, तुम साक्षी रहना! मैं कुंअर इंद्रजीतसिंह की मुहब्बत में खुशी-खुशी अपनी जान देती हूं। मैं खूब जानती हूं कि तुम्हारी आंच प्यारे की जुदाई की आंच से बढ़कर नहीं है। जान निकलने में मुझे कुछ भी कष्ट न होगा। प्यारे इंद्रजीत! देखना मेरे लिए दुखी न होना, बल्कि मुझे बिल्कुल ही भूल जाना!!”

हाय! प्रेम से भरी बेचारी किशोरी की दिल को टुकड़े-टुकड़े कर देने वाली इन बातों से भी संगदिलों का दिल नरम न हुआ और हरामजादी कुंदन ने, नहीं-नहीं धनपति ने, चिता में मशाल रख ही दी।

  1. अनुपम
  2. शेरसिंह कमला का चाचा, जिसका हाल इस संतति के तीसरे भाग के तेहरवें बयान में लिखा गया है।
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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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