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छोटे मन की कच्ची धूप कहानी में उमा के संघर्षपूर्ण एवं साहसी जीवन की घटनाओं को उभारने का प्रयास कहानी लेखिका ने किया है। उमा का पति एक दिन हवाई जहाज की दुर्घटना में मर जाता है। तब उमा अपने बच्चों को लेकर किस प्रकार जीवन निर्वाह करती है, यही इस कहानी का मुख्य विषय है। साथ ही अबोध बच्चों का मनोवैज्ञानिक चित्रण भी सशक्त रूप से कहानी में किया गया है।

सामने सड़क पार कर भूरी बिल्ली पीली कोठी की दीवार पर चढ गई। जाती हुई बिल्ली की परछाई धरती पर पड़ रही थी, जहाँ एक कुत्ता बैठा ध्यान से उस परछाई को देख रहा था।
निस्तब्धता खुद बौराई-सी लग रही थी। उमा ने अपने शरीर को शाल से अलग किया। दोनों बच्चे अब भी सो रहे थे। वह रास्ता देख रही थी मेरी का, जो अक्सर सात बजकर पैंतीस मिनट तक आ जाती है। कहीं आज फिर उसका शराबी पति घर तो नहीं आया? उसका पति जब घर आता है, तो मेरी काम पर नहीं आती। खाना खाकर दोनों मैटिनी शो देखने जाते हैं।
उमा ने पैर नीचे कर स्लीपर पहन लिए। खिड़की से बाहर देखते हुए उसने सोचा – कहीं आज वह नहीं आई तो आज फिर उसे सारे काम निपटाने होंगे।
फार्म का आदमी अब तक अंडे देने नहीं आया। हो सकता है दूसरों के घर बाँटते-बाँटते आज वह लेट हो गया हो।
उसने जाली का पिंजरा खोलकर अन्दर झाँका। अंडे का पैकेट खाली पड़ा था। बस, एक तरफ बासी डबलरोटी का आधा टुकड़ा और मक्खन की एक टिकिया ही पड़ी थी।
ओह! तो उसे बेकरी भी जाना होगा? सोचते ही उसे मेरी पर गुस्सा आया। क्या वह उसकी मजबूरियों को नहीं समझती। टिंकू को आठ पैंतालीस पर स्कूल जाने को तैयार करना होगा। गाड़ी आती ही होगी।
उसने घड़ी देखी। समय आगे खिसक रहा था। जीवन की यह अनियमितता उसे खलने लगी। पति के जीवन में तो ऐसा नहीं होता था। उस समय हर काम कितना समय पर हो जाता था। उसे इतना भटकना भी नहीं पड़ता था।
पति की याद आते ही उसकी सूनी आँखों में चुभन होने लगी। कैसे पल भर में सब कुछ समेट कर मौत पीछे के रास्ते से चुपचाप निकल गई और वह कुछ भी न कर पाई। केवल ठगी-सी खड़ी रह गई। करती भी क्या? वह खुद पति को हवाई जहाज में बैठा कर आई थी। शायद मौत के पीछे दौड़ती-रोती-चिल्लाती। सावित्री कैसे सत्यवान को मौत के हाथ से निकाल लाई थी? पर वह तो पति के मरने के दिन को जानती थी, उसने दीवार पर निशान लगा रखे थे। पर उमा को तो कुछ मालूम नहीं था। वह तो खुद पति को मौत के हाथों सौंप कर हाथ झाड़कर छटपटा रही थी। अभी वह वापस घर आने की सोच रही थी कि एक भारी हलचल ने उसे कँपा दिया। जोर-जोर से ऐलान हो रहा था, कि अभी जो जहाज उड़ा है, वह मुश्किल से पंद्रह-बीस मील दूर जाकर ही टकरा गया था और वह बहुत ही टूटे मन से आगे के समाचार जानने के लिए कुछ भयभीत-सी कुछ उत्सुक-सी घर लौट आई थी।
सब कैसे कितनी जल्दी हो गया! और उस पर आ पड़ी थी दो बच्चों की जिम्मेदारी। बड़े शहरों का अपना जीवन और उस भीड़ को अकेली नापती वह खुद!
कालबेल बजने लगी। वह दरवाजे की ओर बढ़ी। फार्म का लड़का सफेद ड्रेस में खड़ा था।
“मेम साहब, अंडे।”
अंडे लेते हुए उसका मन काफी हल्का लग रहा था। शायद इसलिए कि अब उसे बेकरी जाना या फोन करना नहीं पड़ेगा।
दरवाजा बिना लगाए ही वह अंडे लिए अंदर आ गई। हीटर का प्लग लगाकर उसने अंडे उबलने रख दिए। वापस दरवाजा बंद करने आई तो भूरी बिल्ली पायरी पर लेटी सुबह की धूप सेंक रही थी।
उमा मुसकराई और उसने बासी बची डबल रोटी का टुकड़ा लाकर उसके सामने डाल दिया। उसने लपक कर टुकड़े को उठाया और अहाते की दीवार फाँद गई। दूर से जाती बिल्ली ऐसी लग रही थी, मानो मुँह में चूहा दबाए जा रही हो।
लाल छत वाले घर में पेपर वाला घंटी बजा रहा था। दोनों बच्चे जाग रहे थे और देगची में उबलते अंडों को इधर से उधर नाचते देख रहे थे।
“मामा, हीटर बंद कर दें?” टिंकू ने पूछा।
हाँ, बेटा, समय तो काफी हो गया है।” उसने दोनों खिड़कियों पर सटी चिक को लपेट कर ऊपर बाँध दिया। कमरे में ढेर सा उजाला फैल गया। खिड़की के सामने से दूध वाले साइकिलों पर तेजी से घंटी बजाते जा रहे थे।
उसने निक्कू को उठाकर जमीन पर खड़ा कर दिया। बच्चों के फ्रेश होने तक वह टेबल पर नाश्ता लगाने लगी। पहले यही सुबह कितनी जल्दी की होती थी। जल्दी से उसे ब्रेकफास्ट तैयार करना होता था। पर अब तो समय उसके पास बचा है। भागती हुई जिंदगी मानो सहसा जड़ हो गई है।
स्कूल की बस सामने सड़क पर खड़ी थी। टिंकू जाते समय उसके पास आया, “मामा, मेरे स्कूल जाते में अगर डैडी आ जाएँ तो फोन कर देना।”
“हाँ बेटा, जल्दी से फोन कर दूँगी।”
रोज का यही सवाल और टिंकू सड़क की ओर दौड़ रहा था। वह खिड़की से खड़ी उसे देखती रही। पायरी पर अब भी निक्कू खड़ा, जाते हुए भाई को देख रहा था।
बस जाने पर भी दोनों वहीं खड़े रहे। उमा को फिर वही सवाल परेशान कर रहे थे। दोनों बच्चों के छोटे-छोटे मन में कैसे डैडी के मरने की बड़ी खबर को भरे? उन्हें कैसे बताए, डैडी कलकत्ता से अब नहीं लौटेंगे। उनके मँगाए उपहार अब डैडी नहीं ला सकेंगे। उसके लिए सबसे बड़ी समस्या आज भी बच्चों को समझाना था और अब तक वह यही नहीं कर पाई थी।
आज भी उमा के लिए समस्या है। उमा ने कभी सोचा भी नहीं था कि इतने छोटे-छोटे मन की समस्या इतनी विकट होगी। उसे याद आया अमरीका के प्रेसीडेण्ट कैनेडी की पत्नी श्रीमती जैकलिन कैनेडी ने अपने पति के मरने का समाचार बच्चों को सबसे पहले समझाया था और इतनी अच्छी तरह से उनके मन को बाँध दिया था कि बच्चे खुद बड़े ढंग से अपनी आया को समझा रहे थे — “तुम्हें मालूम है। मामा ने बताया, डैडी को एक बहुत बुरे आदमी ने गोली से मार दिया।”
कितने छोटे-से वाक्य में बच्चे अपने मन को सँभाल गए थे। पर वह ऐसा साहस नहीं जुटा पाती। जब वह बच्चों को समझाने के लिए पास बैठती है तो पहले वह खुद रोने लगती है। वह अपने मन को जितना बाँधती है, उतना ही वह बिखरता है और इस बिखरने और समेटने में ही उसके हाथ से वह क्षण भी खो जाता है, जिसे वह कई दिनों के प्रयत्नों के बाद तैयार करती है।
निक्कू फर्श पर अकेला बैठा नीचे गिरी माचिस की तीलियों को वापस माचिस में रख रहा था।
टार्च के खाली सैल अलमारी के एक बड़े हिस्से को घेरे हैं। आजकल टार्च का सैल कितनी जल्दी खराब हो जाता है। सड़क का बढ़ता शोर घर की दीवारों से टकराने तगा। उमा ने खिड़की से झाँका, सब्जी वाला ठेले में ढेर सारी सब्जियाँ रखे जा रहा था। उसने उसे पुकारा। निक्कू को उसने गोद में उठा लिया।
“बेटा, मामा खाने में क्या बनाएगी?”
“गोभी-मटर”
वह हँस दी। सहसा उसे इन सुबहों के पीछे वाली सुबह की याद आ गई, जब वह ऐसे ही बच्चों से पूछती तो चट से उसके पति कहते — “गोभी-मटर”। उसने उदासी से भर कर सब्जी वाले को गोभी-मटर दे जाने को कहा। सब्जी वाला तोलकर सब्जियाँ दरवाजे के पास डाली में रख गया। निक्कू डाली उठा लाया – “मामा, सब्जी।”
निक्कू सो गया था। उमा टिंकू का इन्तजार कर रही थी। कुकर उसने खोला नहीं था। खुले हुए बाल पीठ को घेरे हुए थे। उसने डायरी उठा ली। वह रोज इसी समय डायरी लिखती है। उसे याद है डायरी लिखने की आदत उसको एक मिस ने डाली थी। वह अंग्रेज महिला बहुत भावुक थी। हर लड़की को डायरी लिखने को कहती। उसके चले जाने के बहुत बाद उमा को किसी ने बताया था – मिस जिस युवक से प्रेम करती थी, वह लड़ाई में मारा गया था।
डायरी के पन्ने उलटते हुए एक पृष्ठ पर उसकी दृष्टि रुक गई, जिसके एक पूरे पेज पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी -“किसका शाप मुझे खा गया।”
वह देर तक इन शब्दों को सहलाती रही — बहुत उदास-सी और एकटक शेल्फ में रखी किताबों को देखती रही। मनीप्लांट की बेल दीवार के आधे भाग को घेरे थी। उसे किसी पुस्तक में पढ़ा वाक्य याद आया, “लोग बड़प्पन का दिखावा करने के लिए मनीप्लांट लगाते हैं।”
उमा को इस टाइम मेरी के आने की उम्मीद थी, क्योंकि वह अक्सर बारह बजे वाला शो देखकर तीन बजे ड्यूटी पर लौट आती थी। मेरी रोज की तरह आज भी बहुत खुश रहेगी। उसके मना करने पर बच्चों को चॉकलेट का पैकेट देगी। मेरी यह बच्चों के प्रति ममता दिखाने को करती है या पड़ने वाली डाट की सिफारिश में यह होता है, वह आज तक समझ नहीं पाई। मेरी शायद दोनों अलग-अलग समय को एक में जोड़ देती है, या घटा देती है। एक में से एक गया शून्य बचा और एक में एक जुड़ा, दो हुआ। घाटा तो शायद कहीं नहीं आया।
उसने रात की आधी जली मोमबत्ती को उठाकर देखा, अभी और काम दे सकती है। उसने बाद में किन्हीं क्षणों के लिए उठाकर रख दिया।
पति के लिए लाए दोनों फ्रेम अभी भी वैसे ही बँधे उसकी अलमारी में पड़े हैं। बच्चों के जन्म-दिन पर बच्चों के नए फोटो उनमें लगा देगी पर सहसा विचार आता है, पति के लिए लाई वस्तु पर किसी भी हालत में दूसरों की परछाईं नहीं पड़ने देगी चाहे वह उसके बच्चे ही क्यों न हों।
मार्टिन लूथर किंग की हत्या का समाचार उसके घाव को कुरेद गया। क्या अच्छे फूल केवल तोड़ने के लिए खिलते हैं? हर महान आदमी की हत्या होती है। क्या महान बनना या होना अपनी मौत को निमंत्रण देना है? उसे याद आया, उसने कहानी पढ़ी थी। एक बहुत ही सच्चे ईमानदार आदमी का दरवाजा मौत ने खटखटाया। वह आदमी बाहर आया और मौत को देखकर घबराया। उसके मन में घबराहट हुई, क्योंकि अभी तो उसके कुछ भी अरमान पूरे नहीं हुए थे। उसने मौत के आगे हाथ-पैर जोड़े तो मौत ने कहा – “मैं इसलिए आई हूँ, क्योंकि तुम अच्छे पुरुष हो और अच्छे आदमी को दुनिया में जीने का अधिकार नहीं।”
क्या डा. किंग के दोनों बच्चों ने भी अपनी आया से कहा होगा कि डैडी को बहुत बुरे आदमी ने मार दिया ?
शाम को वह बहुत इत्मीनान से अहाते में बच्चों को क्रिकेट का खेल समझा रही थी। मेरी के आ जाने से वह घर के कामों से फुरसत पा गई है। मेरी का रह-रह कर नई देखी फिल्म का गीत गुनगुनाना सुनाई पड रहा है।
‘मामा, मेरी फिर गाना गा रही है, पुडिंग में इलायची की जगह गोल मिर्च डाल देगी।’ टिंकू चीखता है।
उसे हँसी आ जाती है। टिंकू अपने डैडी की तरह खाने-पीने में रुचि रखता है।
मेरी तार पर धुले कपड़ों को डालते हुए उन लोगों की ओर देखती है। भूरी बिल्ली अहाते की दीवार पर बैठी उनका खेल देख रही है। लाल छत वाले घर के लोग जल्दी-जल्दी सिनेमा के लिए घर से जा रहे हैं। पीली कोठी के सामने एक नीले रंग की कार खड़ी है, जिसकी खिड़की से एक कुत्ता लम्बी जीभ निकाले सड़क पर चुगती मुर्गी को देख रहा है।
रसोई की मोरी का पानी टमाटर के झाड़ों में जा रहा है। मेरी बार-बार दरवाजे से निकल कर सड़क की ओर देखती है, फिर लौट आती है। वह शायद दूधवाले को देख रही है। उमा भी सड़क की ओर देखती है। बर्फ देने वाला लड़का अभी तक नहीं आया। कल ही तो फैक्टरी में उसने फोन करके अपना पता नोट करवाया था। कहीं वह भूल तो नहीं गया। पर मैनेजर ने तो कहा था कि उसने बर्फ बाँटने वाले लड़के की डायरी में उनका पता नोट करवा दिया है। वह बच्चों को खेल में लगाए रखती है, क्योंकि खेल बंद होते ही दोनों दूध माँगेंगे और दूधवाला अभी आया नहीं है।
ठंड का मौसम शुरू हो गया था। धूप में सेंक आ गई थी। पेड़ों पर, अहाते की दीवार पर रंग-बिरंगी सुंदर-सुंदर चिट्ठियाँ दिखती हैं। एक बार कहीं उसने पढ़ा था, ठंडे देशों की चिड़ियाँ ठंड के मौसम में दाने-पानी की खोज में भारत आने लगती हैं। टिंकू मेरी के साथ छुट्टियों में अहाते की दीवार के पास गुलाब के झुरमुट के पीछे छुपकर पिंजरे में चिड़ियों को फँसाने में लगा रहता है और निक्कू चारे का डिब्बा पकड़े मेरी के कहने का इंतजार करता रहता है कि कब वह कहे और वह चारा डाले।
उमा को आश्चर्य होता है कि यही बँगला, पति की जिंदगी में कितना छोटा लगता था। हमेशा किसी मेहमान के आने पर बच्चों का कमरा खाली करना पड़ता था। पति मेहमान के जाने के बाद कहा करते थे, “उमा, क्यों न पीछे वाला हिस्सा खरीद लें?” और अब वही घर बड़ा और खाली-खाली लगता है। मेरी भी कई बार कह चुकी है, ‘मेम साहब, अकेले बँगले की सफाई नहीं होती। क्यों न आधा हिस्सा किराए पर दे दें।’
वह कई बार सोचती है, घर को किराए पर उठाकर शिमला चली जाए। भाई के कितने पत्र आ चुके हैं। पर वह बच्चों का ध्यान कर यह विचार छोड़ देती है। कहीं बच्चों के मन में यह बात घर न कर जाए कि वे असहाय से दूसरों के घर जी रहे हैं। वह बच्चों को इसी पुराने वातावरण में रखना चाहती है, ताकि बच्चों के मन में किसी बात का दुख न हो। वे यह न समझने लगें कि उनसे डैडी और उनका घर ईश्वर ने छीन लिया है। वह इन्हें इसी वातावरण में रखेगी। चाहे यह वातावरण खुद उसको कितना ही पीड़ा देने वाला क्यों न हो।
मेरी कपडों पर आयरन कर रही थी। टिंकू पास बैठा मेरी से उपकार फिल्म की कहानी सुन रहा था। उमा ने देखा, मेरी नए जूते पहने थी।
“अच्छा! तो उसके डैडी को मार डालते हैं?
“हाँ।”
“फिर… उसकी मामा खूब रोती।”
“टिंकू, चलो बाहर चलें।” उमा ने बातचीत का सिलसिला बीच में ही तोड़ दिया। वह दोनों बच्चों को लेकर पायरी पर खड़ी हो जाती है। सामने मैदान में लगे मीना बाजार की रोशनी यहाँ से साफ्र दिखती है। वह रोज बच्चों को यहीं खड़े होकर घूमती रोशनी दिखाती है।

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