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प्रथम खंड 

संध्या होने में अभी दो घंटे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे , क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है।  जिधर निगाह दौड़ाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है।

       ऐसे समय में हम अपने पाठकों को उस सड़क  पर ले चलते हैं जो दरभंगे से सीधी बाजितपुर की तरफ गई है।

              दरभंगे से लगभग दो कोस के आगे बढ़कर एक बैलगाड़ी पर चार नौजवान और हसीन तथा कमसिन रंडियाँ धानी, काफूर, पेयाजी और फालसई साड़ियाँ पहिरे मुख्तसर गहनों से अपने को सजाए आपुस में ठठोलपन करती बाजितपुर की तरफ जा रही हैं। इस गाड़ी के साथ-ही-साथ पीछे-पीछे एक दूसरी गाड़ी भी जा रही है, जो उन रंडियों के सफरदाओं के लिए थी। सफरदा गिनती में दस थे, मगर गाड़ी में पाँच से ज्यादे के बैठने की जगह न थी, इसलिए पाँच सफरदा गाड़ी के साथ-ही-साथ पैदल जा रहे थे। कोई तंबाकू पी रहा था, कोई गाँजा मल रहा था, कोई इस  बात की शेखी बघार रहा था, कि ‘फलाने मुजरे में हमने वह बजाया कि बड़े-बड़े सफरदाओं को मिर्गी आ गई!’ इत्यादि। कभी-कभी पैदल चलनेवाले सफरदा गाड़ी पर चढ़ जाते और गाड़ीवाले नीचे उतर आते, इसी तरह अदल-बदल के साथ सफर तै कर रहे थे। मालूम होता है कि थोड़ी ही दूर पर किसी जिमींदार के यहाँ महफिल में इन लोगों को जाना है, क्योंकि सन्नाटे मैदान में सफर करते समय संध्या हो जाने से इन्हें कुछ भी भय नहीं है और न इस बात का डर है कि रात हो जाने से चोर-चुहाड़ अथवा डाकुओं से कहीं मुठभेड़ न हो जाए।

             बैल की किराची गाड़ी चर्खा तो होती ही है, जब तक पैदल चलनेवाला सौ कदम जाए तब तक वह बत्तीस कदम से ज्यादे न जाएगी।  बरसात का मौसिम, मजेदार बदली छाई हुई, सड़क के दोनों तरफ दूर-दूर तक हरे-हरे धान के खेत दिखाई दे रहे हैं, पेड़ों पर से पपीहे की आवाज आ रही है, ऐसे समय में एक नहीं बल्कि चार-चार नौजवान, हसीन और मदमाती रंडियों का शांत रहना असंभव है, इसी से इस समय इन सभों को चीं-पों करती हुई जानेवाली गाड़ी पर बैठे रहना बुरा मालूम हुआ और वे सब उतरकर पैदल चलने लगीं और बात-की-बात में गाड़ी से कुछ दूर आगे बढ़ गईं। गाड़ी चाहे छूट जाए, मगर सफरदा कब उनका पीछा छोड़ने लगे थे? पैदलवाले सफरदा उनके साथ हुए और हँसते -बोलते जाने लगे।

              थोड़ी ही दूर जाने के बाद इन्होंने देखा कि सामने एक सवार सरपट घोड़ा फेंके इसी तरफ आ रहा है। जब वह थोड़ी दूर रह गया तो इन रंडियों को देखकर उसने अपने घोड़े की चाल कम कर दी और जब उन चारों छबीलियों के पास पहुँचा तो घोड़ा रोककर खड़ा हो गया। मालूम होता है कि ये चारों रंडियाँ उस आदमी को बखूबी जानती और पहिचानती थीं, क्योंकि उसे देखते ही वे चारों हँस पड़ी और छबीली जो सबसे कमसिन और हसीन थी, ढिठाई के साथ उसके घोड़े की बाग पकड़कर खड़ी हो गई और बोली, ”वाह वाह! तुम भागे कहाँ जा रहे हो? बिना तुम्हारे मोती !”

             ‘मोती’ का नाम लिया ही था कि सवार ने हाथ के इशारे से उसे रोका और कहा, ”बाँदी! तुम्हें हम बेवकूफ कहें या भोली?” इसके बाद उस सवार ने सफरदाओं पर निगाह डाली और हुकूमत के तौर पर कहा, ‘तुम लोग आगे बढ़ो।’

      अब तो पाठक लोग समझ ही गए होंगे कि उस छबीली रंडी का नाम बाँदी था, जिसने ढिठाई के साथ सवार के घोड़े की लगाम थाम ली थी और चारों रंडियों में हसीन और खूबसूरत थी। इसकी कोई आवश्यकता नहीं कि बाकी तीन रंडियों का नाम भी इसी समय बता दिया जाए, हाँ उस सवार की सूरत-शक्ल का हाल लिख देना बहुत जरूरी है।

             सवार की अवस्था लगभग चालीस वर्ष की होगी। रंग काला, हाथ-पैर मजबूत और कसरती जान पड़ते थे। बाल स्याह छोटे-छोटे मगर घूँघरवाले थे, सर बहुत बड़ा और बनिस्बत आगे के पीछे की तरफ से बहुत चौड़ा था। भौवें घनी और दोनों मिली हुईं, आँखें छोटी-छोटी और भीतर की तरफ कुछ घुसी हुई थीं। होंठ मोटे और दाँतों की पंक्ति बराबर न थी, मूंछ के बाल घने और ऊपर की तरफ चढ़े हुए थे। आँखों में ऐसी बुरी चमक थी, जिसे देखने से डर मालूम होता था और बुद्धिमान देखनेवाला समझ सकता था कि यह आदमी बड़ा ही बदमाश और खोटा है, मगर साथ ही इसके दिलावर और खूंखार भी है।

              जब सफरदा आगे की तरफ बढ़ गए तो सवार ने बाँदी से हँस के कहा, “तुम्हारी होशियारी जैसी इस समय देखी गई, अगर ऐसी ही बनी रही तो सब काम चौपट करोगी!”

             बाँदी: (शर्माकर) नहीं, नहीं, मैं कोई ऐसा शब्द मुँह से न निकालती, जिससे सफरदा लोग कुछ समझ जाते।

             सवार: वाह! ‘मोती’ का शब्द मुँह से निकल ही चुका था!

             बाँदी: ठीक है मगर.. .. ।

             सवार: खैर जो हुआ सो हुआ, अब बहुत सम्हाल के काम करना। अब वह जगह बहुत दूर नहीं है, जहाँ तुम्हें जाना है। (सड़क के बाईं तरफ उँगली का इशारा करके) देखो वह बड़ा मकान दिखाई दे रहा है।

            बाँदी : ठीक है मगर यह कहो कि तुम भागे कहाँ जा रहे हो?

            सवार : मुझे अभी बहुत काम करना हैं, मौके पर तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा, हाँ एक बात कान में सुन लो।

      सवार ने झुककर बाँदी के कान में कुछ कहा, साथ ही इसके दिल खुश करनेवाली एक आवाज भी आई। बाँदी ने नर्म चपत सवार के गाल पर भाई, सवार ने फुर्ती से घोड़े को किनारे कर लिया तथा फिर दौड़ाता हुआ जिधर जा रहा था, उधर ही को चला गया।

                  अब हम अपने पाठकों को एक गाँव में ले चलते हैं। यद्यपि यहाँ की आबादी बहुत घनी और लंबी-चौड़ी नहीं है, तथापि जितने आदमी इस मौजे में रहते हैं, सब प्रसन्न हैं, विशेष करके आज तो सभी खुश मालूम पड़ते हैं, क्योंकि  इस मौजे के जिमींदार कल्याणसिंह के लड़के हरनंदनसिंह की शादी होनेवाली है? जिमींदार के दरवाजे पर बाजे बज रहे हैं और महफिल का सामान हो रहा है। जिमींदार का मकान बहुत बड़ा और पक्का है, जनाना खंड अलग और मर्दाना मकान, जिसमें सुंदर-सुंदर कई कमरे और कोठरियाँ हैं, अलग है। मर्दाने मकान के आगे मैदान है, जिसमें शामियाना खड़ा है और महफिल का सामान दुरुस्त हो रहा है। मकान के दाहिनी तरफ एक लंबी लाइन खपड़ैल की है, जिसमें कई दालान और कोठरियाँ हैं। एक दालान और तीन कोठरियों में भंडार (खाने की चीजों का सामान) है और एक दालान तथा तीन कोठरियों में इन रंडियों का डेरा पड़ा हुआ है, जो इस महफिल में नाचने के लिए आई हैं और नाचने का समय निकट आ जाने के कारण अपने को हर तरह से सज-धज के दुरुस्त कर रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये रंडियाँ बहुत ही हसीन और खूबसूरत हैं और जिस समय अपना शृंगार करके धीरे-धीरे चलकर महफिल में आ खड़ी होंगी, उस समय नखरे के साथ अधखुली आँखों से जिधर देखेंगी उधर ही चौपट करेंगी, पर फिर भी यह चाहे जो हो,  मगर इनका जादू उन्हीं लोगों पर चलेगा, जो दिल के कच्चे और भोले-भाले हैं। जो लोग दिल के मजबूत और इनकी करतूतों तथा नकली मुहब्बत को जाननेवाले और बनावटी, नखरों का हाल अच्छी तरह जानते हैं, उन बुद्धिमानों के दिल पर इनका असर होनेवाला नहीं है, क्योंकि ऐसे आदमी जितनी ज्यादे खूबसूरत रंडी को देखेंगे उसे उतनी ही बड़ी चुड़ैल समझ के हर तरह से बच रहने का भी उद्योग करेंगे।

                  रात लगभग पहर-भर के जा चकी है। महफिल बरातियों और तमाशबीनों से खचाखच भरी हई है। जिमींदार का लड़का हरनंदनसिंह, जिसकी शादी होनेवाली है, कारचोबी काम की मखमली गद्दी के ऊपर गावतकिये के सहारे बैठा हुआ है। उसके दोनों बगल जिमींदार लोग जो  न्योते में आए हैं, कत्तीदार पगड़ी जमाए बैठे उस रंडी से आँखें मिलाने का  उद्योग कर रहे हैं, जो महफिल में नाच रही है और जिसका ध्यान बनिस्बत गाने के भाव बताने पर ज्यादे है।

                  इस समय महफिल में यद्यपि भीड़-भाड़ बहुत है मगर जिमींदार साहब का पता नहीं है, जिनके लड़के  की शादी होनेवाली है। दो घंटे तक तो लोग चुपचाप बैठे गाना सुनते रहे, मगर इसके बाद जिमींदार कल्याणसिंह के उपस्थित न होने का कारण जानने के लिए लोगों में कानाफूसी होने लगी और लोग उन्हें बुलाने की नीयत से एकाएकी मकान की तरफ जाने लगे।

                 आधी रात जाते-जाते महफिल में खलबली पड़ गई। कल्याणसिंह के न आने का कारण जब लोगों को मालूम हुआ, तो सभी घबड़ा गए और एकाएकी करके उस मकान की तरफ जाने लगे जिसमें कल्याणसिंह रहते थे।

                 अब हम कल्याणसिंह का हाल बयान करते हैं और यह भी लिखते हैं कि वह अपने मेहमानों से अलग रहने पर क्यों मजबूर हुए। संध्या के समय जिमींदार कल्याणसिंह भंडार का इंतजाम देखते हुए उस दालान में पहुँचे, जिसमें रंडियों का डेरा था। वे यद्यपि बिगड़ैल ऐयाश तो न थे, मगर जरा मनचले और हँसमुख आदमी जरूर थे,  इसलिए इन रंडियों से भी हँसी-दिल्लगी की दो बातें करने लगे। इसी बीच में नाजुक-अदा बाँदी ने उनके पास आकर अपने हाथ का लगाया हुआ दो बीड़ा पान का खाने के लिए दिया। यह वही बाँदी रंडी थी, जिसका हाल हम पहिले लिख आए हैं।

                  कल्याणसिंह पान का बीड़ा हाथ में लिए हुए लौटे, तो उस जगह पहुँचे जहाँ महफिल का सामान हो रहा था और उनके नौकर-चाकर दिलोजान से मेहनत कर रहे थे। थोड़ी देर तक वहाँ भी खड़े रहे। यकायक उनके सिर में  दर्द होने लगा। उन्होंने समझा कि मेहनत की हरारत से ऐसा हो रहा है और यह भी सोचा कि महफिल में रात-भर जागना पड़ेगा, इसलिए यदि इसी समय दो घंटे सोकर हरारत मिटा लें तो अच्छा होगा। यह विचार करते ही कल्याणसिंह अपने कमरे में चले गए जो, मर्दाने मकान में दुमंजले पर था। चिराग जल चुका था, कमरे के अंदर एक शमादान जल रहा था। कल्याणसिंह दरवाजा बंद करके एक खिड़की के सामने चारपाई पर जा लेटे, जिसमें से ठंडी -ठंडी बरसाती हवा आ रही थी और महफिल का शामियाना तथा उसमें काम-काज करते हुए आदमी दिखाई दे रहे थे। यह कमरा बहुत बड़ा न था तो भी तीस-चालीस आदमियों के बैठने लायक था। दीवारें रंगीन और उन पर फूल-बूटे का काम होशियार मुसोवर के हाथ का किया हुआ था। कई दीवारगीरें भी लगी हुई थीं। छत में एक झाड़ के चारों तरफ कई कंदीलें लटक रही थीं, जमीन पर साफ-सुफेद फर्श बिछा हुआ था, एक तरफ संगमरमर की चौकी पर लिखने-पढ़ने का सामान भी मौजूद था। बाहरवाली तरफ छोटी-छोटी तीन खिड़कियाँ थीं, जिनमें से मकान के सामनेवाला रमना अच्छी तरह दिखाई देता था। उन्हीं खिड़कियों में से एक खिड़की के आगे चारपाई बिछी हुई थी, जिस पर कल्याणसिंह सो रहे और थोड़ी ही देर में उन्हें नींद आ गई।

                        कल्याणसिंह तीन घंटे तक बराबर सोते रहे, इसके बाद खड़खड़ाहट की आवाज आने के कारण उनकी नींद खुल गई। देखा कि कमरे के एक कोने में छत से कुछ कंकड़ियाँ गिर रही हैं। कल्याणसिंह ने सोचा कि शायद चूहों ने छत में बिल किया होगा और इसी सबब से कंकडियाँ गिर रही हैं, परंतु कोई चिता नहीं, कल-परसों में इसकी मरम्मत करा दी जावेगी, इस समय घंटे-भर और आराम कर लेना चाहिए, यह सोच मुँह पर चादर का पल्ला रख सो रहे और उन्हें नींद फिर आ गई। दो घंटे बाद कमरे के उसी कोने में से जहाँ से कंकडियाँ गिर रही थीं धमाके की आवाज आई जिससे कल्याणसिंह की आँख खुल गई। वह घबड़ाकर उठ बैठे और चारों तरफ देखने लगे, परंतु रोशनी गुल हो जाने के सबब इस समय कमरे में अंधेरा हो रहा था। उन्हें इस बात का ताज्जुब हुआ कि शमादान किसने गुल कर दिया! वह घबड़ाकर उठ खड़े हुए और किसी तरह दरवाजे तक पहुँचे और दरवाजा खोल कमरे के बाहर आए। उस समय एक पहरेदार सिपाही के सिवाय वहाँ और कोई भी न था, सब महफिल में चले गए थे और नौकर-चाकर भी काम-काज में लगे हुए थे। कल्याणसिंह ने सिपाही से लालटेन लाने के लिए कहा। सिपाही तुरंत लालटेन बालकर ले आया और कल्याणसिंह के साथ कमरे के अंदर गया। कल्याणसिंह ने अबकी दफे उस कोने में बेंत का पिटारा पड़ा हुआ देखा, जहाँ से पहिली दफे नींद खुलने की अवस्था में कंकडियाँ गिरने की आवाज आई थी। कल्याणसिंह को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और वह डरते -डरते उस पिटारे के पास गए। पिटारे के चारों तरफ रस्सी लपेटी हुई थी और एक बहुत बड़ा रस्सा भी उसी जगह पड़ा हुआ था, जिसका एक सिरा पिटारे के साथ बँधा हुआ था। जिमींदार ने छत की तरफ देखा तो टूटी हुई दिखाई दी, जिससे यह विश्वास हो गया कि यह पिटारा रस्सी के सहारे इसी राह से लटकाया गया है और ताज्जुब नहीं कि कोई आदमी भी इसी राह से कमरे में आया हो क्योंकि शमादान का बुझना बेसबब न था। कल्याणसिंह ताज्जुब भरी निगाहों से उस पिटारे को देर तक देखते रहे,  इसके बाद सिपाही के हाथ से लालटेन ले ली और उससे पिटारा खोलने के लिए कहा। सिपाही ने जो ताकतवर होने के साथ-ही-साथ दिलेर भी था, झटपट पिटारा खोला और ढकना अलग करके देखा तो उसमें बहुत-से कपड़े भरे हुए दिखाई पड़े। मगर उन कपड़ों पर हाथ रखने के साथ ही वह चौंक पड़ा और हटकर अलग खड़ा हो गया। जब कल्याणसिंह ने पूछा कि ‘क्यों क्या हुआ?’ तब उसने दोनों हाथ लालटेन के सामने किए और दिखाया कि उसके दोनों हाथ खून से तर हैं!

कल्याणसिंह: हैं! यह तो खून है!!

सिपाही: जी हाँ, उस पिटारे में जो कपड़े हैं, वे खून से तर हैं और कोई काँटेदार चीज भी उसमें मालूम पड़ती है जो कि मेरे हाथ में सूई की तरह चुभी थी।

कल्याणसिंह: ओफ, निःसंदेह कोई भयानक बात है! अच्छा तुम पिटारे को बाहर ले चलो।

सिपाही: बहुत अच्छा।

       सिपाही ने जब उस पिटारे को उठाना चाहा तो बहुत हलका पाया और सहज ही में वह उस पिटारे को कमरे के बाहर ले आया।  उस समय तक और भी एक सिपाही तथा दो-तीन नौकर वहाँ आ पहुँचे थे।

       कल्याणसिंह की आज्ञानुसार रोशनी ज्यादा की गई और तब उस पिटारे की जाँच होने लगी। निःसंदेह उस पिटारे के अंदर कपड़े थे और उन पर सलमे-सितारे का काम किया हुआ था।

सिपाही: (सलमे-सितारे के काम की तरफ इशारा करके) यही मेरे हाथ में गड़ा था और काँटे की तरह मालूम हुआ था! (एक कपड़ा उठाकर) ओफ! यह तो ओढ़नी है!!

दूसरा: और बिलकुल नई!

तीसरा: ब्याह की ओढ़नी है!

सिपाही: मगर सरकार, इसे मैं पहिचानता हूँ और जरूर पहिचानता हूँ!

कल्याणसिंह: (लंबी साँस लेकर) ठीक है, मैं भी इसे पहिचानता हूँ, अच्छा और निकालो।

सिपाही: (और एक कपड़ा निकाल के) लीजिए यह लहँगा भी है! बेशक वही है!!

कल्याणसिंह: ओफ, यह क्या गजब है! यह कपड़े मेरे घर क्यों आ गए और ये खून से तर क्यों हैं?  निःसंदेह ये वही कपड़े हैं जो मैंने अपनी पतोह के वास्ते बनवाए थे और समधियाने भेजे थे। तो क्या खून हुआ? क्या लड़की मारी गई? क्या यह मंगल का दिन अमंगल के साथ बदल गया?

      इतना कहकर कल्याणसिंह जमीन पर बैठ गया। नौकरों ने जल्दी से कुर्सी लाकर रख दी और कल्याणसिंह को उस पर बैठाया। धीरे-धीरे बहुत-से आदमी वहाँ आ जुटे और बात-की-बात में यह खबर अंदर-बाहर सब तरफ अच्छी तरह फैल गई। इस खबर ने महफिल में भी हलचल फैला दी और महफिल में बैठे हुए मेहमानों को कल्याणसिंह को देखने की उत्कंठा पैदा हुई। आखिर धीरे-धीरे बहुत-से नौकर-सिपाही और मेहमान वहाँ जुट गए और उस भयानक दृश्य को आश्चर्य के साथ देखने लगे।

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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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