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डॉ. महेंद्र सिंह राजपुरोहित पशु चिकित्सक हैं। घोड़ों का इलाज करते हैं। लेकिन, इस बार अफीम की पिनक में उन्होंने घोड़ों की खेती कर डाली है। आप भी होली के माहौल में आनंद लीजिए, इस पिनक का और पढ़िए घोड़ों की खेती।  

मारवाड़ में अफ़ीम का नशा नशा नहीं, एक शान है। अफ़ीम को बहुत बड़ी मान्यता प्राप्त है समाज में। अफ़ीम घोटने के लिए सुंदर नक्काशीदार खरल होती है, छानने के लिए ऊन का बना और स्टैंड पर लगा शानदार फिल्टर होता है। मारवाड़ में कोई भी सभा अफ़ीम की मनुहार के बिना अधूरी है। खुशी के मौके पर तो अफ़ीम ज़रूरी है ही, अगर किसी के बीच मनमुटाव या अनबन है तो अफ़ीम गला के बैर गलाया जाता है।

         अफ़ीम का सेवन करने वालों को इधर अमलदार कहा जाता है। बड़े शांत और सहज स्वभाव के होते हैं अमलदार। बातें करने में,आदर-मान देने में निपुण होते हैं अमलदार। साथ ही, लंबी-लंबी छोड़ने के भी उस्ताद होते हैं अमलदार! अमलदार सामान्यतः आलसी प्रवृत्ति के होते हैं।

         जब तक अफ़ीम नहीं ले लेते तब तक तो और कुछ सूझता नहीं सिवाय अफ़ीम के और अफ़ीम का कोटा पूरा होने के बाद सूझती है बातें और आराम।

         तो बात यह हुई कि एक बार 10-15 अमलदार अफ़ीम घोट के ले चुके और फुल मस्ती में गप्पों का दौर हुआ चालू। तब एक जने ने सुझाव दिया कि हम सारा दिन बैठे रहते हैं कुछ काम करना चाहिए। फिर क्या था, चर्चा चल पड़ी काम के बारे में। क्या काम किया जाए तो हमारा साथ भी बना रहे और काम भी होता रहे और अफ़ीम भी चलती रहे। तो सभी अमलदार मिलकर काम-धंधे पर चर्चा करने लगे।

         तो संग्राम, जो एकदम चूंच हो चुका था नशे में, बोला, “भाई धंधा करना ना अपने बस का सौदा है और ना ही अच्छा। बुज़ुर्गों ने कहा है- ‘नीच नौकरी,मध्यम बान और उत्तम खेती’ तो हम नीच और मध्यम काम करें ही क्यों जब उत्तम खेती अच्छे से कर सकते हैं।”

        संग्राम की बात का खैराज ने समर्थन किया और बोला, “बहुत ठीक कहते हो संग्राम भाई! खेती तो अपाहिज को भी पालती है। हमें खेती करनी चाहिए।”

         बाकी सभी का समर्थन भी खेती को मिल गया। अब फ़सल क्या बोई जाए, इसपे मशवरा चला। माँगू बोला, “फ़सल तो बाजरा ही ठीक है। अनाज भी हो जाएगा और उतने ही मौल का चारा भी हो जाएगा।”

         सत्तार ने इसका तुरंत विरोध किया, वैसे तो सभी अमलदार लीचड़ और आलसी होते हैं और बकरी और अमलदार का पानी से साँप-नेवले का बैर होता है, लेकिन सत्तार इस टोली में सबसे ज्यादा लीचड़ था। सर्दियों की तो छोड़ो, वो गर्मियों में भी बिना स्नान के 10 दिन निकाल लिया करता था।

        तो सत्तार बोला, “ना भाई ना बाजरा,ज्वार और ग्वार हमारे बस का नहीं। उसकी कंपि चिपकती है शरीर से और नहाए बिना खुजली पीछा नहीं छोड़ती। अब शाम को काम के बाद नहाने की हिम्मत किसकी होगी बताओ?”

        और सत्तार की बात सभी की समझ में आ गई। नहाने का और वो भी शाम को नहाने का आतंक सभी के दिमाग पर छाया हुआ था।

       तभी भूरा बोला, “मूंग कैसे रहेंगे?” हाथों हाथ मूले ने प्रस्ताव खारिज किया। एक तो मूंग की रखवाली बहुत कठिन। फूल और फली लगने के बाद नील गायें टूटकर पड़ेंगी। कौन करेगा रात भर पहरेदारी? और अगर नील गायों से बच भी गये तो पकने पर अगर बारिश हो गई तो दाना-दाना खेत में बिखरा पड़ा होगा। तो मूंग भी रद्द।

        तभी सबसे वरिष्ठ अमलदार बालू बोला, “अगर मेरी सलाह मानो तो हमें घोड़े बो देने चाहिए। एक-एक घोड़ा हज़ारों रुपये का। सवारी के भी काम आ जायेंगे वो अलग।”

        तभी सबसे छोटा अमलदार तुलसा बोला, “बालू दादा, घोड़ों की भी खेती होती है?”

       बालू ने उसकी तरफ़ उपेक्षा देखा और बोला, “खेती तो होती ही है, वरना घोड़े क्या आसमान से बरसते हैं?” और बालू की बात सबके दिमाग में बैठ गई।

        घोड़ों की खेती करेंगे।

       संग्राम का जो गाँव के पास वाला बीस बीघे का खेत है और उसके चारों तरफ़ दीवार भी है, उसमें घोड़े बोने का फैसला सर्वसम्मति से हो गया।

      तो संग्राम के खेत में घोड़े बोना तय हो गया। खेत में एक देशी बबूल का बहुत ही घना पेड़ था, उसके नीचे जाजम जमेगी अफ़ीम की केवल दिन में। रात को दीवार की सुरक्षा का ही भरोसा किया गया।

      पूरी मंडली आ गई बबूल के नीचे और खेत का मुआयना किया गया, अफ़ीम लेने के बाद। खेत अच्छा था। समतल था। उपजाऊ था। गाँव के नजदीक था। और सबसे बड़ी बात, बबूल की छाया थी और क्या चाहिये!

       तब माँगू बोला, “बालू दादा, खेत तो ठीक है। नमी भी अच्छी है अभी। लेकिन, हमें घोड़ों का बीज कहाँ मिलेगा?”

      अब बालू गम्भीर हो गया बोला, “भाई, बीज बाजार में तो मिलेगा नहीं, कोई मामूली चीज़ तो है नहीं। आखिर घोड़े का बीज है। यह तो जहाँ घोड़े होंगे, वहीं मिलेगा।

       तब तुलसा बोला, “दादा पाँच-सात घोड़े तो अपने ठाकुर साहब के पास हैं।”

       बालू ने कहा, “चार-पाँच घोड़ों वालों के पास बीज कहाँ धरा होगा? जहाँ हज़ारों घोड़े हो वहाँ मिलेगा।”

       “फिर इतने घोड़े तो जोधपुर महाराजा के पास ही है और कहाँ होंगे?”, सत्तार ने ज्ञान बघारा।

      “हाँ, वहीं चलते हैं,” बालू उत्साह से बोला, “हमारे राजा हैं वो और हम उनकी प्रजा। तो हम दूसरी जगह क्यों भटके? महाराजा के पास बीज ज़रूर मिलेगा और नहीं हुआ तो उनको क्या भार है? वो गुजरात, काठियावाड़ से मँगवा लेंगे आखिर महाराजा है।”

      तो सभी ने यह तय किया कि कल सवेरे जल्दी निकल जाओ घर से मुँह अँधेरे, बगल में दो-दो रोट दबा लो। अमल लेने समय पीपाड़ पहुँच जायेंगे। वहाँ ब्राह्मणों की बगेची में अफ़ीम लेकर आगे चल पड़ेंगे। सुबह सवेरे जोधपुर जाने का फैसला करके अमलदार मंडली अपने-अपने घर गई।

      बालू आज जल्दी सोना चाहता था, लेकिन हादसा ऐसा हुआ कि आधी रात को सो पाया। हुआ यूँ कि शाम को घर पहुँचा तो घरवाली आंगन में बैठी रो रही थी। उसकी सास बीमार थी, तो सोचा, चल बसी होगी आखिर बूढ़ी भी थी और बीमार भी। पक्के पत्ते को एक दिन तो झड़ना ही था। आखिर इस दुनिया सदा का कौन रहा है?

        उसने घरवाली को चुप कराने की गरज से खँखारकर कहा, “चुप हो जा बुधिया की माँ। जाने वाली को कोई नहीं रोक सकता था और उम्र भी जाने की थी। बुधिया की माँ ने सुना तो सनाका खा गयी और और जोर से रोते हुए बोली, “आपको किसने बताया मर गई? क्या आपने देखी मरी हुई? और जोर से दहाड़ मारकर रोई, “हाय मेरी कबरी!”

       अब बालू को लगा, मामला वो नहीं है। कबरी का नाम बीच में क्यों आया? कबरी तो उसकी प्यारी बकरी थी। डेढ़ सेर दूध होता था एक टाइम का और हर साल दो बच्चे देती थी। एक बार तो कबरी ने दोनों बकरे दिए थे, जो ईद के मौके पर बहुत अच्छे दामों बिके थे। और आज उसकी घरवाली उसी कबरी का नाम लेकर रो रही है।

         “क्या हुआ उसकी कबरी को?” उसने कांपते हृदय से बुधिया से पूछा।

         “बेटा बात क्या है? क्या हुआ कबरी को?

         बुधिया ने बताया कि शाम को सभी बकरियाँ घर आ गई लेकिन कबरी घर नहीं पहुँची। ‘माँ के साथ मैं पूरे चौक और बाड़े में खोज आया, लेकिन वो कहीं मिली नहीं।’

         यह सुनकर थोड़ी शांति हुई। बोला, “चुप हो जा बुधिया की माँ! मैं खोजकर लाता हूँ अभी।

         बात ऐसी थी कि रामेसर कुम्हार सब्जी बेचता था,तो बची हुई और सड़ी गली सब्जियाँ अपने घर के पिछवाड़े एक सँकरी सी गली में फेंक देता था। एक दिन बालू बकरियाँ लेकर जंगल में जा रहा था तो एक कुत्ते से डरकर कबरी उस गली में घुस गई और वहाँ पड़ी सब्जियाँ देख कर खाने लगी। बालू बड़ी मुश्किल से उसको बाहर निकाल पाया था। शाम को वापिस आते समय वो फिर उस गली में घुस गई थी। बालू को पूरा यकीन था कि कबरी वहीं है और उसका यकीन झूठ नहीं था। वो सचमुच वहीं थी। खैर, कबरी को घर लाया गया एक बड़ा संकट परिवार पर से टल गया। लेकिन एक दूसरी समस्या पैदा हो गई। इस चिन्ता और भागदौड़ से बालू की अफ़ीम उतर गई। अब वो लम्बी-लम्बी उबासी लेने लगा और आँखों से पानी झरने लगा। निश्चिंत होकर फिर से अफ़ीम लिया, कड़क चाय पी और दो चिलम खींचने के बाद कुछ हालत सुधरी। फिर खाना और इस तरह आधी रात से ऊपर समय हो गया। और ऊपर से सुबह जल्दी उठकर जोधपुर जाना घोड़ों के बीज लेने. कैसे हो पायेगा?

        कहने वाले कहते हैं, ऊंट चढ़े को भी कुत्ता काटता है, लेकिन विश्वास संग्राम को आज हुआ। साला पूरे साल भर कोई धेले का काम नहीं। किसी को उसकी ज़रूरत नहीं। लेकिन आज जब घर पहुँचा तो एक नया ही कांड उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके बापू जी, माँ और छोटा भाई गाय को चारे की कोठरी में डालने की कोशिश कर रहे थे और गाय थी कि बिदक कर दूसरी तरफ भाग जाती।

        संग्राम के बापू जी जब तक जेब पर जोर ना पड़े तब तक बहुत दयालु थे और यह दयालुता अब परिवार पर बहुत भारी गुज़र रही थी। वो गायों को खिलाने के नाम पर सींग पर लट्ठ के अलावा कुछ नहीं जानते थे लेकिन आज़ादी के बड़े हिमायती थे। जब छोटी बछड़ी होती थी, तो संग्राम की माँ कहती इसको बाँधने की आदत डालो। बाद में बड़ी होकर यह काबू में नहीं आयेगी। लेकिन नहीं, आज़ादी पसंद बापू जी ऐसा नहीं करते। बेचारा जानवर खुला आराम से रहता है। तो ऐसे ही आराम से रही गाय अब ब्यानी थी और रस्सी कभी गले में बाँधी नहीं तो वो नील गाय जैसी चंचल हो गई। अब पकड़ में आए बिना बच्चे को बाहर कैसे खींचे? तो इसका उपाय यह खोजा गया कि उसको चारे की कोठरी में डाला जाए और फिर सँकरी जगह में बाँधा जाए । संग्राम की दादी जो 70 साल की थी वो अपने अलावा पूरे घर को उल्लू के पट्ठे समझती थी। उन्हें लगता था कि यह घर मेरी सूझबूझ और होशियारी के दम पर चल रहा है। अगर आज मैं आँख मींच लूँ, तो सभी भीख माँगें।

       तो हुआ यूँ कि शाम का धुंधलका अँधेरे में बदल गया था और गाय अभी कोठरी में नहीं पहुँच पाई थी, तो राम-राम की माला जपती दादी से रहा नहीं गया और माला एक तरफ़ रखकर वो गाय को अंदर डालने का नियम बताने बाहर आई। आंगन चार फुट उंचा था, क्योंकि उससे नीचे बैल गाड़ी डालने का गैरेज था। दादी अँधेरे में और अति उत्साह में लाठी के सहारे एक कदम ज़्यादा चल गई और चार फुट ऊंचे आंगन से धड़ाम और साथ ही अच्छी खासी चीख। गाय वाला पूरा दल दादी की तरह दौड़ पड़ा और पास आकर देखा तो दादी एक बाज़ू के नीचे गिरी पड़ी चीख रही है।

       खैर, दादी को उठाकर अंदर ले जाया गया और ठीक से मुआयना किया गया, तो दाहिना हाथ कलाई में से टूटा हुआ पाया गया। अब सब लोग गाय को भूल चुके थे और दादी पर लग गये। संग्राम को भेजा गया कान जी को बुलाकर लाने के लिए। कान जी हरफ़नमौला वैद्य थे। हड्डी टूटे के तो विशेषज्ञ। बाँस की खपच्चियाँ बाँधकर वो टूटी हड्डी सेट करते थे। उनकी ढ़ानी गाँव से दो किलो मीटर दूर थी। तो संग्राम गया कान जी को लेने और वापिस पहुँचा 10 बजे। फिर दादी की हड्डी सेट हुई। कान जी को वापिस पहुँचाया गया।

       इस दौरान एक अच्छी बात यह हुई कि गाय अपने आप ब्या गई और आराम से अपने बच्चे को चाटने लगी। और आखिर एक बजे संग्राम हंगामे से फ्री हुआ तो उसको याद आया कि अफ़ीम उतर गया। माँ बापू से छुपकर अंटा चढ़ाया। फिर खाना, और दो बजे सोना नसीब हुआ और सुबह जल्दी उठकर जोधपुर जाना है। हे भगवान कैसे हो पायेगा!

      वो कहते हैं ना भंवरा कैलाश में पहुँच गया। वो हुआ तुलसा के साथ। तुलसा अपना सबसे जूनियर अमलदार। अफ़ीम से फुल चून्च होकर पहुँचा शाम को घर तो पता चला कि माँ खीच और कढ़ी बनाई है। और अपने इस अमलदार को यह व्यंजन बहुत पसंद। पहले देशी घी के साथ खीच और फिर कढ़ी के साथ खीच खाकर वो घर के बाहर वाले झोंपड़े में सो गया। सावन के शुरुआती दिन थे। दो अच्छी बरसाते हो गई थी और पुरवाई चल रही थी। झोंपड़े की छान में से छनकर आती नशीली हवा ने उसे तत्काल नींद के आगोश में धकेल दिया। मनपसंद नशा और मनपसंद भोजन का ऐसा मिला जुला असर हुआ कि उसके खर्राटे गूंजने लगे। जब दिमाग ने गहरी नींद में गोता लगाया तो सपनों का रंगीन संसार प्रकट हुआ। तुलसा को सपना आ रहा है, वो अपने साथियों के साथ जोधपुर पहुंच गया है। उन सभी की महाराजा से भेंट हो गई है। महाराज उनके स्वागत में बहुत बड़ी सभा का आयोजन करते हैं। शानदार गद्दे बिछे हुए। वातावरण सुवासित। मटकों अफ़ीम गला है। महाराज खुद अपनी हथेली से सबको मनुहार करके अफ़ीम दे रहे हैं। तुलसा को महाराजा ने अपनी कसम दे कर पाँच हथेली अफ़ीम दिया। उन्हें घोड़ों के बीज भी मिल गये। खेत में बीज बो दिया गया है बहुत अच्छे पौधे उगे है। तुलसा खुशी से पौधों को निहार रहा है, तभी उसे एक कमर की ऊँचाई जितना पौधा दिखाई दिया, जिस पर एक घोड़ा लगा हुआ है। लेकिन, घोड़ा भारी है और पौधा हलका नाज़ुक तो वो घोड़े के बोझ से टूट कर ज़मीन पर गिर जाता है। थोड़ी देर बाद दृश्य बदलता है। घोड़े का पौधा बहुत बड़ा आकाश को छूता पेड़ बन जाता है और ऊपर की एक डाल पर एक बहुत बड़ा घोड़ा लटक रहा है। तुलसा खुश होता है लेकिन उसे समझ नहीं आता कि इस घोड़े को तोड़े कैसे? वो उस घोड़े को ठीक से देखने पेड़ के नीचे जाता है तो उसी समय घोड़ा पक कर डाल से टूट जाता है और उसके ऊपर गिरने लगता है। आतंकित तुलसा वहाँ से भागना चाहता है लेकिन पैर ज़मीन पे चिपक जाते हैं। ना उसकी ज़बान साथ देती है चीखने में। घोड़ा उसके ऊपर गिर जाता है और वो हड़बड़ाकर उठ बैठता है। पसीने से तरबतर! और उसकी जान में जान आती है कि वो एक सपना था। तभी हज़ारी काका के घर से मुर्गे के बोलने की आवाज़ आती है और वो उठ बैठता है। तुलसा झटपट उठा, मुँह धोया।  उसकी माँ जल्दी उठती थी तो चाय भी जल्दी मिल गई और आधे घंटे में नित्य कर्म से फारिग होकर नहा भी चुका था। उसकी माँ उसे अचंभे से देखती जा रही थी। सुबह आठ बजे उठने वाला छोकरा आज तड़के ही स्नान भी कर चुका। मामला है क्या?

          माँ से आखिर रहा नहीं गया तो बोली “तुल्सीया, राख उड़िया, आज क्या है रे, मुकलावा (गौना) लेने जाएगा क्या?”

          “क्यों बेबात की करती हो माँ? मेरे साथ वालों के दो-दो तीन-तीन बच्चे हो गये और मेरी अभी शादी भी नहीं की तुम लोगों ने और ऊपर से मुकलावे का ताना मार रही हो?”

           “मुँह धो रख, खुटल्ल कहीं का, तुझ अमलदार को कौन अपनी बेटी देगा? इससे अच्छा तो कुएँ में नहीं डाल देगा। 25 साल का होने को आया। एक पैसा भी कमा कर लाया है घर में? जो तेरी शादी करें और एक पेट और ले आयें हमारी छाती पर!”

          “कमाने की बात तो अब छोड़ दे, माँ! अब देखना तेरा यह खोटा सिक्का,अमलदार कैसे कमाई करता है और फिर तू राज़ करेगी माँ! राज़!”

          “ऐसी कौन सी सोने की खान में साझेदारी मिल गई तुझे? जरा मैं भी तो सुनूँ!”

          “माँ हम सब अमलदार मिलकर घोड़ों की खेती करेंगे।” यह सुनकर माँ का गुस्सा चला गया और बरबस ही हंसी आ गई। माँ ने मजाक समझा और हँसती हुई अपने काम में लग गई।

          और अपना तुलसा नए कपड़े पहनकर चला सत्तार के घर। साला बहुत देर से उठता है तो उसको जा कर जगाना होगा। लेकिन यह देखकर तुलसा चक्कर खा गया कि सत्तार तो नहाया धोया बाबू साहब बना सामने से चला आ रहा है। जोधपुर जाने के उत्साह ने हमारे अमलदारों के पंख लगा दिए थे। और तो और, बालू और संग्राम भी जो पूरी रात जागरण में थे, चौक में आ गये तैयार होकर।

          भोर का समय था। सभी अमलदार आपस में मिले और चल पड़े भिखा भाई के घर की तरफ़। भिखा भाई के पास बैल और बैल गाड़ी थे तो वो उधार माँगने थे जोधपुर जाने के लिए। वहाँ जाकर देखा तो पता चला गाड़ी तो तैयार है। एक बैल भी तैयार है, लेकिन दूसरा बैल खेत में पड़ा है। भीलीया हो गया उसको।

(भीलीया सच में तो एक वायरल बीमारी हे फीवर होती है, लेकिन आम धारणा यही थी कि घास पर चिपका रहने वाले मक्खी के आकार के जीव के पशु के नाक में घुस जाने से होता है। पशु चार पाँच दिन खड़ा नहीं हो पाता उसके बाद अपने आप ठीक हो जाता है।)

        बालू बोला “यह कब हुआ भिखा भाई?”

        “आज चार दिन हो गये बालू! हमारा तो खाना पीना छूटा हुआ है चार दिन से। पता नहीं, हमारा बैल बचेगा भी या नहीं! चार दिन से एक तिनका नहीं खाया बेचारे ने!” और भिखा की आँखों में आंसू आ गये।

        “भिखा भाई, रहे तुम भी गावदी के गावदी! अरे, भले आदमी हमें तो बताना था। पिछले साल जूनागढ़ से नाथ जी आए थे, तो उनसे भीलीया का मंत्र सीखा था अपने संग्राम ने|” बालू बोला। संग्राम, चल बैल के झाड़ा दे कर आयें पहले। और भिखा भाई के साथ पूरी अमलदार मंडली पहुँची बैल के पास। संग्राम बैल के मुँह के पास बैठ गया और कान में मन्त्र फूँकने लगा।

“सावन मास हरिया घास

बैठा उसमें भीलीया दास

भीलीया मरो,भीलनी मरो

गौ की रक्षा गोरख नाथ करो”

         यह मन्त्र सात बार बैल के कान में फूँककर संग्राम खड़ा हो गया और बोला “भिखा भाई, देखना गुरु गोरख नाथ जी की कृपा से शाम तक आपका बैल एकदम ठीक हो जाएगा।” और भिखा की आँखों में कृतज्ञता के आंसू आ गये।

         उसने सबका बहुत बहुत धन्यवाद किया। पूरी अमलदार मंडली को अपना सगा भाई घोषित किया और अपनी बहन के यहाँ से जिसकी ससुराल उसी गाँव में थी, बैलों की जोड़ी लाकर उन्हें जोधपुर जाने का साधन मुहैया करवा कर सगा भाई होने की बात को साबित कियाl

         और इस तरह बैलगाड़ी रूपी पुष्पक विमान पर सवार होकर अमलदार मंडली जोधपुर के लिए कूच कर गई।

बैलगाड़ी की धीमी चाल, हलके-हलके हिचकोले मानो माँ गोद में लेकर प्यार से झूला झुला रही हो। जब थोड़ा सूरज ऊपर चढ़ा तो गाड़ी के फ़र्श पर घेरा बनाकर अफ़ीम गलाया गया। एक दूसरे की मनुहार करके सभी ने जी भर अफ़ीम लिया। यात्रा तो जारी थी ही। जब भोजन का समय हुआ तो बैलों को खोलकर एक हरे भरे खेत में चरने के लिए छोड़ दिया गया और पत्थरों का चूल्हा बनाकर खाना पकाया। खाने का सामान साथ ही लेकर चले थे। खा पीकर लेट गये तालाब के किनारे एक घने पीपल की छाँव में। दोपहर की धूप ढलने के बाद यात्रा फिर से जारी की गई।  सूर्यास्त से थोड़ा पहले विमान जोधपुर के नजदीक पहुँच गया। तब सब ने रात का भोजन और रात्रि विश्राम वहीं करने का निर्णय किया और सुबह-सुबह महाराजा से मुलाकात करने का निश्चय करके, ब्यालु करके सो गये वहीं जंगल में।

            सवेरे अमलदार मंडली ने फिर यात्रा प्रारंभ की। जोधपुर के द्वार पर ही रात्रि विश्राम किया था तो सुबह सवेरे ही शहर में प्रवेश कर गये। देहाती लोगों के लिए शहर वैसे ही आकर्षण का केन्द्र रहता है और इस समय तो शहर दुल्हन की तरह सजा हुआ दिखाई दिया। अभी हाल ही दो खुशियां एक साथ आई थीं, उसका उत्सव चल रहा था शहर भर में। एक तो जोधपुर ने अहमदाबाद पर विजय हासिल की थी युद्ध में और दूसरे राजा साहब को सालों बाद वारिस मिला था। तो शहर में जगह-जगह शामियाने लगे हुए थे और स्वादिष्ट पकवानों की मनभावन खुशबू व्याप्त थी हर तरफ़।

          अमलदार यह कौतुक देख कर चमत्कृत हो गये। एक शामियाने के पास जाकर पूछा तो कारण भी पता चला उत्सव का और उनका भव्य स्वागत भी किया गया। उन्हें आदर से अंदर बुलाया गया और जब तक भोजन तैयार ना हो, तब तक अफ़ीम की मनुहार की गई। और वो मनुहार तुलसा के सपने से मिलती जुलती थी। सच में मटकों अफ़ीम घुला हुआ और दर्जनों मनुहार करने वाले। मज़े ही मज़े। शगुन तो अच्छे हुए। अब तो बस कार्य सिद्धि हो जाए। घोड़ों के बीज मिल जाए।

          आखिर अफ़ीम और भोजन से तृप्त होकर महाराज से मुलाकात करने चल पड़े। महाराज खुद पुत्ररत्न प्राप्ति और शानदार विजय के नशे में थे। जिसने भी जो भी माँगा उससे सवाया पाया। सैकड़ों जागीरें बाँटी गई। खुशमिजाज महाराज दरबार में विराजमान थे तो उन्हें सूचना मिली कि मारवाड़ के कुछ अमलदार महाराज से मुलाकात के लिए आए हैं। दूसरा समय होता तो क्या पता वो मिलना ज़रूरी भी समझते या नहीं, लेकिन अभी मानसिकता दूसरी थी।  तुरंत हाज़िर होने का फ़रमान जारी हुआ।

          अमलदार दरबार में हाज़िर हुए। उचित अभिवादन के बाद उन्होंने अपना स्थान ग्रहण किया। महाराज ने आने का प्रयोजन पूछा, तो बालू खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, “हुज़ूर हम खेती करना चाहते हैं तो आपके पास बीज के लिए हाज़िर हुए है।”

          महाराज बोले “बीज के लिए यहाँ आने की क्या ज़रूरत थी? बाजार जाते या पास में रुपये नहीं है? कोई बात नहीं दीवान साहब से रुपये ले जाओ जितने चाहिये और खरीद लो बीज।”

         बालू, “अन्नदाता जिस फ़सल की हम खेती करना चाहते हैं, उसके बीज बाजार में नहीं मिलेंगे। अगर मिलते तो हम हुज़ूर को तकलीफ देने हरगिज नहीं आते।”

         “ऐसी कौन सी फ़सल है, जिसके बीज बाजार में नहीं मिलते?”

         “हुज़ूर हम घोड़ों की खेती करेंगे।” और महाराज बितर-बितर मुँह देखते रह गये बालू अमलदार का।

          आखिर बोले, “अरे भोले आदमी, घोड़ों के भी कहीं बीज होते हैं? खेती होती है?”

          बालू का वही तर्क, “फिर घोड़े क्या आसमान से टपकते है?” और अड़ गया जिद्द पर। जायेंगे तो बीज लेकर ही। अब हुआ यूँ कि महाराज खुद अमलदार थे और अमलदारों की सनक से भली भाँति परिचित थे। तो उन्होंने कहा, “ठीक है भाई, आज तुम सब यहीं रुको। कल तक करेंगे व्यवस्था तुम्हारे लिए बीज की।”

         और अमलदारों को अतिथिगृह में पहुँचाया गया। पीछे महाराज ने अपने मुख्य सलाहकारों से मशवरा किया कि इन्हें कैसे संतुष्ट किया जाए। एक सलाहकार बोला, “महाराज इन्हें सनक चढ़ी है, जो अपने आप उतर जायेगी। लेकिन अभी इन्हें कुछ दे कर भेजना होगा। खाली तो ये नहीं जाने वाले।”

         “तो फिर क्या दे कर भेजा जाए?”

         “हुज़ूर घोड़ों का बीज नहीं होता। हमने नहीं देखा तो इन्होंने भी नहीं देखा होगा। तो हम इन्हें हड्डियों का बुरादा दे कर भेज देंगे। यह बीज को बोयेंगे और फिर खेत और खेती को भूल जायेंगे। फिर कौन उलाहना देगा कि बीज घोड़ों के नहीं थे?”

         और कोई रास्ता ना देख कर महाराज ने वो प्रस्ताव मंजूर किया और दूसरे दिन उन्हें हड्डियों का बुरादा पकड़ा दिया। लेकिन बालू इतना भोला नहीं था। उसने जिद्द की कि “हुज़ूर अगर बीज खराब निकला और उगा ही नहीं या फ़सल अच्छी नहीं हुई तो हमारा तो पूरा साल बेकार हो जाएगा। तो हुज़ूर हमें लिखित में दे दे कि इन बीजों से घोड़ों की अच्छी फ़सल होगी तो कुछ तसल्ली हो जाती।“

          महाराज ने सलाहकार की तरफ़ देखा। सलाहकार नजदीक आया और कान में बोला, “लिख दीजिये हुज़ूर! हम लिखेंगे कि हमारे द्वारा बतायी विधि से इन्हें बोया गया तो अच्छी फ़सल ज़रूर होगी। बाद में कह देंगे कि तुम लोगों ने सही विधि से नहीं बोए।” यह बात महाराज को जँच गई और उन्होंने लिखित में शाही मोहर लगा के दे दिया।

          अमलदार खुशी-खुशी वापिस अपने गाँव को चले। सत्तार कहने को सबसे लीचड़ कहलाता है, लेकिन एक गुण उसमें ऐसा है कि उसकी कई बार जोरदार माँग होती है। एकाध बार वो माँग उसने पूरी भी की है तो उसकी कहानी सुना रहा है अपने साथियों को। घोड़ों के बीज लेकर और अपनी हैसियत से ज्यादा आदर पाकर मंडली वापिस लौट रही है तो सभी बहुत खुश हैं और सत्तार के पच्चीसों बार सुनाए किस्से को भी इस तरह रस लेकर सुन रहे हैं, मानो पहली बार कोई किस्सागोई  का शौकीन अलिफलैला की कहानी सुनता है।

        बात यह है कि अपना सत्तार गोफन संचालन और उससे सटीक निशाना लगाने में माहिर है। गोफन चमड़े का एक तीन-चार इंच चौड़ा और दस बारह इंच लम्बा टुकड़ा होता है, जिसके दोनों सिरों पर चमड़े की ही बनी तीन फूट के करीब लम्बी डोरियाँ लगी होती है। बीच वाले टुकड़े में 100-150 ग्राम वज़नी पत्थर रखकर डोरियों को तीन चार बार तेज़ी से घुमा के एक डोरी छोड़ी जाती है, तो पत्थर गोली की रफ्तार से चलता है और अगर ठीक निशाने पर लगे तो भैंसें को मार डाले। प्राचीन समय में इसके प्रयोग का वर्णन मिलता है। अच्छे निशानेबाज़ के हाथ में आने से यह एक घातक हथियार है। और जो निशानेबाज़ नहीं होते, वो अपने खेतों से पक्षी उड़ाने के लिए इसका प्रयोग करते हैं। ऐसे ही बिना लक्ष्य फेंके पत्थरों से पक्षी उड़ जाते हैं।

        तो अपना सत्तार इसके संचालन में माहिर है। जब होली निकल जाती है, तो मारवाड़ की धरती पर पशुओं के चरने के लिए एक तिनका भी नहीं बचता। तब भेड़ पालक अपने जानवरों को लेकर कोटा, मध्य प्रदेश की तरफ़ चंबल के बीहड़ों में ले जाते हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं। एक सबसे बड़ा खतरा तो बीहड़ में डाकुओं का होता है। उससे तो ये पशु पालक एक निश्चित रकम उन्हें दे कर अपना बचाव कर लेते हैं। दूसरा खतरा वन्य हिंसक जानवरों का और तीसरा खतरा होता है अनजान चोरों द्वारा पशुओं के चुरा कर ले जाने का। रात भर पहरेदारी करने के उपरांत भी चोर पशु चुरा कर भाग जाते हैं। तो इस दो नंबर और तीन नंबर के खतरों से बचने के लिए इन भेड़ पालकों को ज़रूरत पड़ती है गोफन के मास्टर की, जो सत्तार है।

        जब यह पशु पालक बाहर जाते हैं, तो सत्तार की चिरौरी करते हैं साथ चलने के लिए। “सत्तार भाई जितनी मर्जी अमल लेना, जो इच्छा हो वो भोजन करना और अपनी पसंद का मेहनताना ले लेना, लेकिन हमारे साथ चलो।”

        प्रस्ताव तो बहुत आकर्षक होता है, लेकिन सत्तार से तीन चार महीनों की लम्बी अवधि के लिए अपना गाँव और अपने अमलदार दोस्त छोड़े नहीं जाते। कुल दो बार सत्तार उनके साथ गया है। दोनों बार उसकी अम्मी ने उसे जबरन भेजा था। क्योंकि अम्मी का मुँह बोला भाई था हापु गुर्जर। तो अब अपनी अम्मी को और मुँह बोला ही सही मामा को एकदम से इनकार कैसे कर दे?

        तो वही किस्सा सत्तार सुना रहा है। “हम कोटा से थोड़ा आगे पड़ाव डाले थे।” सत्तार बोला, “चंबल का किनारा, चांदनी रात थी। सभी लोग खाना खा के सो गये। आधी रात से कुछ पहले का समय था। मैं और शीम्बु रेवड़ पहरेदारी कर रहे थे। हम दोनों विपरीत दिशा में घूमते हुए एक निश्चित समय बाद रेवड़ का चक्कर लगा रहे थे। जब मैंने आधा घेरा पूरा किया तो करीब सौ डेढ़ सौ मीटर दूर एक छन्गी हुई तुर्रेदार खेजड़ी के पेड़ के पीछे कोई छुपा हुआ नज़र आया। मैंने आवाज़ दी, “कौन है उस पेड़ के पीछे? अगर ज़िंदा रहना चाहता है तो मेरे अगले चक्कर से पहले भाग जाना। ऐसा कहकर मैंने अपना चक्कर पूरा किया और शीम्बु के पास आ गया।”

       “बालू दादा!” सत्तार बोला, “वो चोर इतने खतरनाक होते थे कि एक भेड़ दोनों हाथों में और एक को दाँतों में पकड़ कर भाग जाते थे। तो मैं अपने अगले चक्कर में गया फिर उस पेड़ की सीध में तो वो मुझे तब भी वहीं खड़ा मिला। मैं बोला भाई तू गया नहीं। लेकिन अब एक बात और सुन ले। तू जिस पेड़ के नीचे खड़ा है, वो यहाँ से दो सौ मीटर दूर है और इसके ऊपर एक चार इंच मोटा तुर्रा है। मैं यहाँ से गोफन से पत्थर चलाता हूँ इस तुर्रे पर। अगर तुर्रा टूटकर नीचे गिर जाए, तो यहाँ रुकना मत। नहीं टूटे तो जो तेरी मर्जी वो करना। ऐसा कहकर दादा जो मैंने एक पाव भर का पत्थर उस तुर्रे पर मारा तो लगा जैसे पेड़ पर बिजली गिरी हो और तुर्रा टूटकर नीचे चोर के पास। चोर सरपट भागा।”

       तो यह थी अपने सत्तार के कौशल और वीरता की कहानी।

       जोधपुर महाराजा ने अहमदाबाद से युद्ध तो जीत लिया, लेकिन इस की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। हज़ारों सैनिक शहीद हो गये,हज़ारों अपाहिज हो गये और हज़ारों गम्भीर घायल हो गये। इसी तरह अश्वों और हाथियों का भी बहुत संहार हुआ। हज़ारों घोड़े युद्ध में मारे गये और बहुत सारे नाकारे हो गये। हाथियों की सेना का भी यही हाल हुआ।

       तो अब नए सैनिकों की जोर शोर से भरती चल रही थी और गुणी और जानकार व्यक्तियों को हाथी और घोड़े खरीदने के लिए दूर-दूर तक भेजा गया। लेकिन अच्छे पशु आसानी से नहीं मिलते तो वापिस अश्व संग्रह में बहुत कठिनाई आ रही थी। जब यह समाचार चारों तरफ़ फैला तो कई व्यापारी अपने अच्छी नस्ल के घोड़ों को लेकर जोधपुर आने लगे। घोड़ों की माँग है, तो अच्छे दाम, मुँहमाँगे मिलने की उम्मीद में।

       उदयपुर का एक बंजारा ऐसा ही एक घोड़ा व्यापारी था, जो चेतक की नस्ल के कीमती और ताकतवर घोड़ों के लिए प्रसिद्ध था। उस बंजारे के घोड़ों के खरीददार केवल राज़ परिवार ही होते थे। दूसरे का किसका हौसला, जो इतने कीमती घोड़े खरीद सके। तो वो बंजारा भी अपने चार सौ घोड़े लेकर जोधपुर रवाना हुआ। उसके सभी घोड़े कोहिनूर जैसे नायाब थे। अब चार सौ घोड़ों की लश्कर थी, तो साथ में सैकड़ों आदमी थे। दर्जनों खानसामा थे। कोई छोटी यात्रा तो थी नहीं उदयपुर से जोधपुर की। लश्कर पूरे दिन यात्रा करती और जहाँ भी शाम होती वहाँ पड़ाव डाले जाते। खाना-पीना, नाचना-गाना होता आधी रात तक और सवेरे फिर प्रयाण.

        अपने अमलदार मंडली का गाँव उदयपुर और जोधपुर के रास्ते में पड़ता है। तो उदयपुरी बंजारे को एक दिन तो इस गाँव से होकर गुज़रना ही था। कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन होनहार से बड़ी बात यह हुई कि जब लश्कर इस गाँव में पहुँचा तो सांझ हो गई। अब जब सांझ हो गई तो पड़ाव भी यहीं डाला गया। चार आदमियों को भेजा गया कोई हरा भरा घास वाला मैदान देखने, जहाँ पर रात भर के लिए घोड़ों को चरने के लिए छोड़ा जाए।

        इधर अपने अमलदार जोधपुर से घोड़ों का बीज लेकर गाँव पहुँचे और बिना देर किये बीज को संग्राम के चारदीवारी वाले खेत में बो दिया गया। ज़मीन में अच्छी नमी थी और हल चलने से भूमि कोमल,नर्म हो गई थी। तो घोड़े तो हड्डियों के चूरे से क्या उगते लेकिन अच्छी घास ज़रूर उग आई थी।

        अपने अमलदार भाइयों को खेती का यह पहला ही अनुभव था। वो घास उगी देखकर बहुत खुश हुए। वाह! वाह! घोड़े उगे तो जोरदार हैं! अब तो भगवान की दया से इतने ही अच्छे फल जाए तो गंगा नहा ले! और सभी सुबह-सुबह आकर बबूल की छाया में आकर अमल लेते और अपनी फ़सल को बढ़ती देखकर हर्षाते। ऐसा करते-करते एक महीना निकल गया और घास जो चारदीवारी और अमलदारों की सुरक्षा से सुरक्षित थी, कमर की ऊँचाई तक बढ़ गयी। मजाल है कोई कुत्ता भी खेत में घुस जाए। जहाँ दूसरे खेतों में घास को आवारा और पालतू पशु चर जाते तो वहाँ मैदान ही दिखता, वहीं संग्राम के खेत में मानो हरित क्रान्ति मूर्त रूप लेकर विराज गई थी। तो यह हाल था हमारे अमलदारों के खेत और खेती का और ऐसे माहौल में बंजारे की लश्कर का प्रवेश हुआ उस गाँव में।

        सांझ समय अमलदार तो चारदीवारी के एक मात्र दरवाज़े के सामने काँटों की रोक बनाकर अपने-अपने घर गये और बंजारे के चार पट्ठे घास वाले खेत की तलाश में निकले। चारों और घूम गये बंजारे के आदमी लेकिन उपयुक्त मैदान नहीं मिला। किसी खेत में फ़सल खड़ी थी और जहाँ फ़सल नहीं थी वहाँ घास पर्याप्त नहीं थी। और कोहिनूर जैसे कीमती घोड़ों को ऐसी वैसी जगह चरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।

       आखिर एक आदमी की नज़र पड़ी संग्राम के खेत पर। शाम के धुंधलके में कमर की ऊँचाई तक हरियाली दिखाई दी। लेकिन यह फ़सल क्या है, वो दूर से पहचान नहीं पाया तो काँटों की रोक हटाकर खेत के अंदर घुस गया। अंदर जाकर देखा तो केवल घास। कोई फ़सल नहीं। केवल घास! वो पूरे खेत में घूम गया। लेकिन कहीं कोई फ़सल नहीं। केवल घास! बड़ा अचंभा हुआ उसे। जब केवल घास है तो इतनी सुरक्षा की क्या ज़रूरत है।

            वो वापिस आया डेरे पर। बंजारा डेढ़ बोतल विशेष रूप से खींची गई शराब पी चुका था तब तक और इमरती बाई की पतली कमर में हाथ डाले ठुमके लगा रहा था। उस आदमी ने जब ऐसी स्थिति में बाधा उत्पन्न करते हुए बंजारे को बुलाया तो मानो कोबरा की पूँछ पर पाँव रख दिया किसी ने। आग बबूला बंजारा उस आदमी के पास आया और क्रोध में फुँफकारा, “क्या है? तमीज़ नहीं है बिल्कुल? मेरी मस्ती में खलल डालने की हिम्मत कैसे हुई?” और लाल-लाल आँखों से उसको घूरने लगा।

           आदमी बेचारा नौकर था। डरते-डरते खेत की और केवल घास की बात बतायी। कहा, “सरदार, दूसरी चरने की कोई जगह नहीं, लेकिन एक जो बहुत अच्छी जगह है वो बहुत ही सुरक्षित की गई है। अगर उसमें घोड़े छोड़ दे और खेत का मालिक सुबह कोई समस्या खड़ी कर दे तो?”

           डेढ़ बोतल दारू का नशा एक, इमरती बाई की पतली कमर का नशा दो, बेशुमार दौलत का नशा तीन और अनगिनत राजपरिवारों से घनिष्ठ संबंधों का नशा चार। अब इतने सारे नशों में जकड़ा दिमाग भी कभी विवेक की बात सोच पाया है कभी? नहीं सोच पाया!

           और बंजारे ने भी गर्व से फ़रमान जारी किया कि उसी खेत में हमारे घोड़ों को छोड़ा जाए। मालिक अगर सुबह एतराज़ करेगा तो उसको मुँह माँगी दौलत दे कर उसका मुँह बंद कर दिया जाएगा और जवाब की प्रतीक्षा किए बिना इमरती बाई की कमर की दिशा में लपका।

           इधर सभी अमलदार घर आकर रात का भोजन करके आराम से सो गये थे। तुलसा भी अपने झोंपड़े में आराम की नींद सो रहा था। नींद जब गहराई तो आज फिर उसे अजीब सपना आया। आज उसने सपने में देखा कि उनकी घोड़ों की फ़सल उम्मीद से ज़्यादा फली है। पूरे खेत में रंग-बिरंगे घोड़े ही घोड़े नज़र आ रहे हैं। पूरा खेत घोड़ों से भरा हुआ। सभी अमलदार बहुत खुश हो रहे हैं। आखिर उनकी मेहनत रंग लाई, उन्होंने अनहोनी को होनी करके दिखा दिया। जो काम गाँव में कोई नहीं कर सका, वो अमलदारों ने कर के दिखा दिया। तुलसा एक शानदार घोड़े पर बैठकर सवारी करना चाहता है, लेकिन बालू और संग्राम उसे मना कर देते हैं। अभी घोड़े कच्चे हैं।  बेचारों को थोड़ा पक जाने दो, फिर सवारी तो करनी ही है। और वो सभी खेत से घर आ जाते हैं, लेकिन तुलसा को उस दिन वहीं सोने को कहा जाता है, कीमती कच्चे घोड़ों की रखवाली के लिए। साले गाँव वालों का भरोसा नहीं। आलू, मटर, ककड़ी, तरबूज़ भी नहीं छोड़ते खेतों में, फिर यह तो घोड़ों का मामला है। कोई चुरा ना ले।

          सुबह के समय अभी सूर्य पूरा उदय भी नहीं होता और तीन चार अनजान लोग खेत में आते हैं और घोड़ों को हाँककर ले जाने लगते हैं। तुलसा उन्हें रोकने की कोशिश करता है, लेकिन वो हट्टे-कट्टे व्यक्ति तुलसा की एक नहीं चलने देते और घोड़ों को हाँकने लगते हैं।  अकेले बेबस तुलसा को रोना आता है वो अपनी आँखों के सामने अपनी फ़सल को लुटता हुआ देख कर भी कुछ नहीं कर पाता। वो जोर से चीखकर सहायता बुलाना चाहता है, लेकिन उसके गले से आवाज़ नहीं निकलती। वो भागकर अपने बाकी साथियों को बुलाना चाहता है, लेकिन कदम नहीं उठते। और इसी बेबसी से तड़पकर उसकी नींद खुल जाती है।

           पसीने से भीगा तुलसा झोंपड़े से बाहर निकला। अभी हज़ारी काका का मुर्गा नहीं बोला, लेकिन भोर होने में अब ज्यादा देर भी नहीं थी। अब इस भयानक सपने के बाद उससे वापिस सोया नहीं जाता और वो हाथ में एक मजबूत लाठी लेकर खेत की तरफ़ निकल पड़ा।

           खेत गाँव के एकदम करीब था। जल्दी ही वो खेत में पहुँच गया। हलकी भोर की रोशनी में उसको खेत में कुछ हलचल दिखाई दी। तो क्या काँटों की रोक हटाकर आवारा गायें घुस गई खेत में? अगर ऐसा हुआ है तो गजब हो गया।  उन्होंने तो सारी फ़सल ही बर्बाद कर दी होगी। वो दरवाज़े के पास पहुँचा। दरवाजा अच्छी तरह बंद था। तभी उसे घोड़े के हिनहिनाने की आवाज़ सुनायी दी और जल्दी से खेत के अंदर गया तब तक पीले बादल हो गये थे और काफ़ी हद तक साफ़ नज़र आने लग गया था। और तुलसा ने खेत में अपने सपने को साकार होते देखा। पूरा खेत घोड़ों से भरा हुआ। वो खुशी से कांपने लगा और दरवाजा बंद करके गाँव की तरफ़ भागा।

           बालू के घर जाकर जोर-जोर से पुकारने लगा। बालू बाहर आया।  “क्या है रे तुल्सीया? क्यों सबेरे-सबेरे शोर मचा रहा है?” बालू ने डाँटा।

           “बालू दादा सबको बुलाओ और खेत चलो! हमारे खेत में घोड़े लग गये हैं।

           “क्या बकवास कर रहा है? सपना देखा आज कोई फिर से?”

           “हाँ वो तो देखा!” तुलसा बोला।

           “और सपना सुनाने सुबह सवेरे मुझे जगा दिया?”

         “अरे नहीं बालू दादा सपना भी देखा और उसके बाद खेत में भी जा कर घोड़े भी देख आया। हमारा पूरा खेत घोड़ों से भरा पड़ा है।”

         बालू खीजकर बोला, “अरे क्यों सुबह सवेरे भेजा चाट रहा है? कल शाम तक तो किसी पौधे के फूल भी नहीं लगे थे और रात-रात में घोड़े भी लग गये?”

         तुलसा बोला, “वो सब मुझे नहीं पता! लेकिन मैं अपनी इन दो आँखों से खेत में घोड़े देखकर सीधा तुम्हारे पास आया हूँ और माफ करना बालू दादा, लेकिन आपको या हमें क्या पता कि घोड़ों के पौधों में पहले फूल लगते हैं या घोड़े? हमने तो पहली बार खेती की है।”

        बालू को यकीन तो नहीं हुआ लेकिन उसने संग्राम, मूला, माँगू, खैराज और सत्तार को सोते से उठाकर अपने साथ लिया और खेत की तरफ़ चला। वहाँ जाकर देखा तो सभी अचंभित रह गये। तुलसा प्रलाप नहीं कर रहा था। खेत तो सचमुच घोड़ों से भरा हुआ था।

        सभी खेत अंदर आए। तुलसा को वापिस घर भेजा कि जा और अफ़ीम और चाय बनवाकर यहीं ले आ। अब घोड़ों को बिना निगरानी छोड़ना ठीक नहीं। एक दो दिन में घोड़े पक जायेंगे, तब इन्हें घर ले जायेंगे और तब तक सभी लोग यहीं रहेंगे दिन रात।

        तुलसा गया वापिस घर। बाकी लोग उगते सूरज के सुनहरे प्रकाश में खेत में मौजूद घोड़ों को मुग्ध भाव से निहारने लगे। अभी थोड़ा ही समय बीता था कि हाथों में लट्ठ लिए चार अनजान आदमी आए खेत में। रात जब घोड़ों को यहाँ छोड़ा था तो कोई नहीं था इधर। लेकिन अब बबूल के नीचे पाँच-छः लोग बैठे हुए दिखाई दिए।

         चलो अच्छा है! उन्होंने सोचा, खेत के मालिक होंगे तो इन्हें यहीं पूछ लेते हैं कि घास के कितने पैसे देने है? नहीं तो फिर इन्हें खोजना पड़ता। वो अमलदारों के नजदीक आए

         “राम राम भाइयो!”

         बालू उन्हें असमंजस भरी नज़रों से देखते हुए बोला, “राम राम!”

         उनमें से एक बोला, “हम घोड़े ले जाने आए हैं। अच्छा हुआ, आप लोग यहीं मिल गये। बोलो आपको कितने रुपये देने हैं? कोई एक जना हमारे साथ चलो और अपने रुपये ले लो सरदार से।”

         बालू को अचंभा हुआ, अभी तो हमें पता चला है कि हमारे घोड़े लग गये हैं और इतनी जल्दी यह खरीददार कहाँ से आ गये? फिर बोला, “भाई अभी घोड़े बिकाऊ नहीं है। अभी तो हाल ही लगे हैं तो थोड़े कच्चे भी हैं। और अभी महाराजा को लगान भी देना है। इनमें से छठा हिस्सा महाराजा का लगान बनता है, तो वो उन्हें दिए बिना तो हम अपने घर भी नहीं ले जा सकते, फिर बेचने की बात तो दूर है।”

        वो चारों उल्लू की तरह बितर-बितर मुँह देखते रह गये बालू का। कोई इतनी गंभीरता पूर्वक मजाक भी कर सकता है! फिर हँसते हुए एक बोला, “बहुत मजाक पसंद आदमी हैं आप!”

        बालू बोला, “मजाक नहीं कर रहा भाई, मैं मजाक कभी करता भी नहीं और फिर तुम तो अनजान आदमी हो। तुमसे तो मजाक का कोई मतलब ही नहीं है। घोड़े सच में अभी बिकाऊ नहीं हैं। आप अपना पता बता दो। जब बेचेंगे तो तुम्हें भी खबर कर देंगे तब आ जाना।” और बालू वार्तालाप के समाप्ति सूचक शब्द बोला, “जै राम जी की!”

        अब उन्हें समझ आया कि यह मजाक नहीं कर रहा। ये तो सचमुच घोड़ों को दबाने की फिराक में है। और तनिक उच्च स्वर में बोला, “अरे ये घोड़े हमारे हैं। हम खरीदने की बात नहीं कर रहे हैं, इन्हें वापिस ले जाने की बात कर रहे हैं।”

        मूला कद में थोड़ा ठिगना और शरीर से कमज़ोर था, लेकिन ज़बान बिच्छू के डंक जैसी थी। बोला, “भाई तुम्हारा बाप कब साझेदार बन गया हमारा, जो घोड़े तुम्हारे हो गये?”

        उस आदमी ने जब्त किया और बोला, “हम कल शाम को यहाँ घोड़ों को घास चरने के लिए छोड़ के गये थे।”

        मूला बोला, “अबे सालों यहाँ घास क्या तुम्हारे पूर्वज डाल कर गये थे?”

        “अरे घास यहाँ उगी हुई थी।”

        “वो तो घोड़ों के पौधे थे। घास का तो यहाँ तिनका भी नहीं था।”

        वो आदमी चकराए। ये क्या मामला है? कैसे लोग हैं ये? कहीं पागल तो नहीं?

        वो बोला, “अरे घोड़ों के भी कहीं पौधे होते हैं? उनकी भी कहीं खेती होती है?”

        कमान बालू के पास होती तो कहता, ‘घोड़े क्या आसमान से टपकते है?’ लेकिन अभी कमान थी मूला के पास और मूला ने कहा, “नहीं खेती काहे को होती होगी घोड़ों की? ये जो दुनिया में सारे घोड़े है, उन्हें तुम्हारी अम्मा जनती होगी।” और यह कटु शब्द सुनकर उस आदमी को क्रोध आ गया और जो एक थप्पड़ मूला के मुँह पर मारा, तो छोटे शरीर का मूला ज़मीन पर गिर पड़ा।  और संग्राम का खून खोल गया। साले बाहर के आदमी बिना वजह उसके साथी पर  हाथ उठा दे! लाठी उठाकर हमला कर दिया उसने। लाठी का वार पड़ते ही वो आदमी बिलबिला उठा। उसके दूसरे साथी कुछ करते, उसके पहले खैराज के हाथ में भी लाठी आ चुकी थी। बालू का हाथ पास पड़ी कुल्हाड़ी के हत्थे पर कस गया।  खैराज और संग्राम की पीठ जोड़ लाठी बाज़ी के लिए पूरे गाँव में प्रसिद्ध थी। इस में दो लठैत अपनी पीठ आपस में जोड़ लेते हैं और मुँह विपरीत दिशा में रहता है। इससे दो जने घूमते हुए चारों दिशाओं में वार कर सकते हैं, लेकिन उनपर पीठ पीछे से कोई वार नहीं कर सकता। यह लठैतों की रक्षण और आक्रमण एक साथ की विलक्षण कला है, जिसमें दो आदमी बीस पर भारी पड़ते है।

          लेकिन इसकी नौबत नहीं आई अकेले संग्राम ने ही दो जनों को ज़मीन सूँघा दी और बाकी दो ने हथियार डाल दिए। वो चारो यह कहकर वहाँ से भागे कि अभी सरदार को खबर करते हैं और फिर निबटना डेढ़ सौ आदमियों की फ़ौज से।

          बालू बहुत शांत स्वभाव का गम्भीर आदमी था। आमतौर पर लड़ाई झगड़ों से दूर रहने वाला, लेकिन अन्याय सहन नहीं होता था और जीवट भी बहुत था बालू में। कदम आगे बढ़ाने के बाद पीछे हटना बालू को नहीं आता, चाहे कितना भी नुकसान हो जाए।

          एक बार संग्राम के पिताजी ने पड़ोस के गाँव के पांचा बेलदार को एक बैलों की जोड़ी बेची थी। पांचा बैल ले गया और रुपये 10 दिन बाद देने का वादा किया। जब दस दिन की जगह दो महीने बीत गये, तो संग्राम के पिताजी उसके गाँव गये रुपये माँगने। पांचा ने उन्हें रुपये देने की जगह गालियाँ दे कर अपमानित करके वापिस भेजा। तब उन्हें पता चला कि साला पांचा एक नंबर का गुंडा है। तो दूसरी बार वो अपने बड़े भाई को, जो काफ़ी दबंग और रौब वाले थे गाँव में, साथ लेकर गये पांचा के पास। पांचा के घर के बाहर उसका बूढ़ा, अंधा बाप बैठा रहता था। जो कोई भी उससे मिलने आता, उसकी पहली पेशी उस अंधे के पास होती। वो भी पहले अंधे के पास गये। अंधे ने आने का कारण पूछा। अपने रुपये लेने आए हैं, बताया गया। तो अंधा हँसकर बोला, “तुम तो अभी परसो ही यहाँ से माँ बहन की करवा के गये थे? क्या उस दिन मन नहीं भरा या आज जूते खाने आए हो?”

          तो उन्होंने कहा कि आज मैं अपने भाई को साथ लेकर आया हूँ। अंधे ने उनके भाई से कहा, “जरा अपनी कलाई देना मेरे हाथ में।” उन्होंने अपनी कलाई उस अंधे को पकड़ा दी। अंधे ने अच्छी तरह टटोला और बोला, “वापिस चले जाओ भाइयो, क्यों जूते खाते हो? तुम पांचा से रुपये नहीं निकलवा सकते।”

         और ऐसा ही हुआ।

         दोनों भाइयों को पांचा ने धक्के देकर भगाया। अब रुपये आने की उम्मीद खत्म हो गई। यह कहानी एक दिन संग्राम ने बालू को सुना दी और इस साले पांचा बेलदार की दादागिरी पर बालू का खून खौल उठा और वो संग्राम को साथ लेकर बिना किसी को बताए चल पड़ा पांचा के पास। और फिर वही अंधे के सामने पेशी हुई। अंधे ने पूछा इस बार कौन आया है रुपये लेने? तो बालू बोला, “मैं आया हूँ और लेकर जाऊँगा।”

        अंधे ने कहा, “जरा अपनी कलाई पकड़ाना मेरे हाथ में।” और बालू ने अपनी कुल्हाड़ी अंधे के सामने कर दी। अंधे ने कुल्हाड़ी के हत्थे को टटोला और बोला, “तुम ज़रूर रुपये ले जाओगे दम है तुम्हारी कलाई में।” और उसने पांचा को बुलाकर कहा कि “इस आदमी को रुपये दे दो नहीं तो कुत्ते की मौत मारे जाओगे।” और इस तरह संग्राम और बालू रुपये लेकर घर आए। तो ऐसा था अपना बालू अमलदार। सीधे के साथ सीधा दुष्ट के साथ दुष्ट।

        बंजारे के आदमी मार खा के डेरे पर पहुँचे और अपने सरदार को पूरे मामले से अवगत करवाया। सरदार को अचंभा हुआ। आमतौर पर सीधे सादे ग्रामीण ऐसी हरकत करते तो नहीं थे। फिर यह क्या मामला है?

        उदयपुर से यहाँ तक के सफर में दर्जनों जगह पड़ाव डाले। कई जगह किसानों से पूछकर तो कई जगह बिना पूछे। लेकिन ऐसा तो कहीं नहीं हुआ। हाँ, जहाँ बिना पूछे घोड़े छोड़े गये, वहाँ किसानों ने नाजायज़ रकम ली। लेकिन, घोड़ों पर कब्जा करने की कोशिश तो किसी ने नहीं की।

        उसने पूछा, “कितने आदमी थे?”

        “छः आदमी थे, सरदार!”

        “दिखने में कैसे थे?”

        “दिखने में भी सामान्य ग्रामीण थे।”

        “तो फिर तुम चार अच्छे-खासे गबरू जवान उनसे मार खा कर आ गये?”

        “सरदार मार तो हम छः से नहीं केवल एक से ही खा कर आए हैं। एक को हमने मारा था बाकी के तीन खड़े भी नहीं हुए। दो जने ही खड़े हुए और हमें तो एक ने ही मारा।”

        “फिर भी तुम भाग आए?”

        “सरदार डर हमें उस मारने वाले से तो लगा ही नहीं! हम तो उस बैठे हुए आदमी की आँखों से भयभीत हो गये, जिसने कुल्हाड़ी पकड़ रखी थी। हम कुल्हाड़ी से भी नहीं डरे। हम डरे उसकी आँखों से! उन आँखों में हमने ऐसा हिंसक भाव देखा कि हमें लगा यह बैठा-बैठा ही हमें चीर फाड़ देगा।”

        सरदार झुँझला गया। डपट कर बोला, “बंद करो अपनी बकवास और अपनी हार का बखान। जाओ, अपने अच्छे बीस जवानों को बुलाकर लाओ।”

        बीस अच्छे लड़ाके सरदार के पास आए। उनको आदेश दिया गया कि दस जने उन गंवार ग्रामीणों को सम्हाले और दस जने घोड़ों को हाँक लाए। और वो बीस जनों की टोली चली संग्राम के खेत की तरफ़। सबके हाथों में मजबूत लाठियाँ। सभी खेत में घुसे, तो कुल्हाड़ी लेकर बालू खड़ा हुआ।

       संग्राम बोला, “तुम बैठो बालू दादा, मैं और खैराज देखते हैं।”

       सत्तार का लाठी युद्ध में कोई अनुभव नहीं, लेकिन हाथों में पत्थर उठा लिये। मूला केवल ज़बानी युद्ध का महारथी था। और देखते ही देखते योजना बद्ध तरीके से दस जने घोड़ों की तरफ़ और दस जने अमलदारों की तरफ़ लपके।

      और तब जोड़ी खैराज और संग्राम ने पीठ! वो दोनों चक्रवात की तरह, ऐसे चक्रवात की तरह घूम रहे थे, जिसके चारों तरफ़ असंख्य लाठियाँ लगी हुई हों और दस मिनट में युद्ध का फैसला हो गया। बंजारे के दस पट्ठे ज़मीन पर पड़े थे। एक का सिर फूट गया बुरी तरह। तो वो बेहोश था, बाकी टूटे-फूटे सभी थे और कराह रहे थे।

      घोड़ों को हाँकने वाले घोड़े भूल गये और अपने साथियों को धराशायी होते हुए देखते रहे। जब सारे साथी गिर गये तो वो बिना लड़े ही भागे। वार बंद होने से गिरे हुए भी खड़े होने लगे, कांखते-कराहते। एक सिर फूटा हुआ बेहोश पड़ा था और वो धीरे-धीरे खेत के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगे। बालू ने पीछे से आवाज़ दी, “अपने इस साथी को लेते जाओ और जो भी तुम्हारा सरदार है उससे कह देना फिर प्रयास करे। हम जीते जी अपनी फ़सल नहीं लुटने देंगे।”

        बंजारे के जवान वापिस गये तो बालू गम्भीर होकर बोला, “संग्राम आसार अच्छे नहीं हैं, ये लोग या तो किसी डाकू दल के हैं या कोई बंजारे की लश्कर है। अगर डाकू हैं, तो भी इनके पास बहुत सारे आदमी होंगे जो अब बस आते ही होंगे और हम तुम्हारी लाठी के दम पर इतने लोगों से नहीं लड़ पायेंगे। मुझे ज़्यादा संदेह इनके बंजारे होने का है क्योंकि इनका रहन-सहन और बातचीत का तरीका डाकुओं वाला नहीं है। तो यह और भी बड़ी मुसीबत है क्योंकि बंजारे की लश्कर में तो सैकड़ों आदमी होते हैं। इतनी बड़ी फ़ौज के सामने हम मुट्ठी भर आदमी कितनी देर टिक पायेंगे?”

       हालात की गंभीरता संग्राम भी समझता था, “फिर क्या किया जाए, बालू दादा? घोड़े अभी कच्चे हैं और हमारे साथ हिले मिले नहीं है, तो इन्हें लेकर हम कहीं जा भी नहीं सकते। ऐसे तो हमारी फ़सल ज़रूर लुट जायेगी।”

       बालू बोला, “कुछ नहीं होगा। तू फिक्र मत कर” और मूला से बोला, “मूला, तू दौड़कर गाँव जा और एक तो प्रधान जी को खबर कर दूसरे अपने सभी साथियों को जो हथियार मिले साथ लेकर यहाँ बुला ला। और गाँव में जितने भी आदमी औरत दिखे सबको अपनी सहायता के लिए बुलाकर ला।” और मूला भागा गाँव की तरफ़। इधर सत्तार भाई की हालत खराब थी। आमने-सामने की लड़ाई उसने कभी देखी नहीं थी तो घबराहट में उसकी अफ़ीम उतर गई और वो कांपने लगा। इसी समय दूर सैकड़ों लोग खेत की तरफ़ आते दिखाई दिए। संग्राम ने उधर देखा और बोला, “बालू दादा वो लोग तो आ रहे हैं।”

      बालू ने कहा, “सत्तार, गोफन सम्हाल जल्दी से। जब तक हमें गाँव से सहायता नहीं मिलती तब तक इन्हें रोकना ही होगा।” लेकिन सत्तार की हालत खराब। और उसको देखकर बालू को भी मानना पड़ा कि इस हालत में सत्तार से कुछ नहीं होने वाला।

     तभी खेत में तुलसा आ पहुँचा।

     बालू बोला, “तुलसा चाय को एक तरफ़ डाल और जल्दी से तेरे वाली डिबिया निकाल।”

     बात यह थी कि बाकी सभी पका हुआ अफ़ीम लेते थे, लेकिन तुलसा कच्चे दूध का शौकीन था। वो एक डिबिया में कच्चा दूध रखता था। कच्चा दूध असर बहुत जल्दी करता है लेकिन उतरता भी जल्दी है। जहाँ पके अफ़ीम का नशा बारह घंटे रहता है, वहीं कच्चा चार-पाँच घंटे में उतर जाता है।

     तुलसा ने जल्दी से डिबिया निकालकर बालू को दी और बालू ने तीन उँगलियाँ भर कर सत्तार को चटा दी। मानो मुँह में तेज़ाब डाल दिया हो। लेकिन सत्तार भाई की हालत सुधर गई। इतने समय में बंजारों की सेना बहुत नजदीक आ पहुँची और अब सत्तार एक पत्थरों के ढेर के पास खड़ा हो गया और ताक-ताककर सेना पर पत्थर बरसाने लगा।

      जिसके भी पत्थर लगा, वो तो नाकारा हो गया। लेकिन आदमी बहुत ज़्यादा थे तो उनकी आगे बढ़ने की रफ्तार में कमी नहीं आई।

      तब बालू ने कहा, “सत्तार, दुल्हे को पहचान। दुल्हा नहीं तो बारात नहीं। दुल्हे को पहचान!”

      और तब सत्तार ने गौर से देखा, एक जना जो सबसे अच्छे कपड़े पहने था और कई किलोग्राम सोने के गहने पहने हुआ था, उसको नज़र आया और सत्तार को वही दुल्हा लगा। उसने पाव भर का पत्थर गोफन में डालकर उसका निशाना लिया और छोड़ दिया। पत्थर बंजारे के कंधे पर लगा और तुरंत ज़मीन पर लोट गया। और बंजारे के गिरते ही सेना की गति थम गई। सभी अपने सरदार को देखने में लग गये और इतना मौका बहुत था सत्तार भाई के लिए। वो पहचान पहचानकर दुल्हे के काका, मामा, फूफा को निशाना बनाने लगा। और जीत हो गई अमलदार सेना की। बंजारे अपने सरदार को उठाकर भाग गये और उसी समय खेत में सैकड़ों ग्रामीण अपने प्रधान जी के साथ पहुँच गये।

        प्रधानजी और ग्रामीण जब खेत में पहुंचे तो सैकड़ों घोड़ों को देखकर दंग रह गए। प्रधानजी बालू के पास आये और बोले, “किसके घोड़े हैं ये बालू और ये मूला क्या कह रहा है? किससे लड़ाई हो गई तुम्हारी?”

        बालू ने आहत भाव से प्रधानजी की तरफ देखा और बोला, “चाचाजी आप भी ऐसा बोलोगे? आपको तो सब पता है कि हम दो महीने से खून-पसीना एक कर रहे हैं इस खेती के लिए और आप कह रहे है किसके घोड़े हैं? यह हमारी फसल है। हमारी मेहनत का फल और इसे कोई बाहर आया दल हमसे छीन लेना चाहता है।”

        “कौन बाहर का दल?”

        “हम नहीं जानते, चाचाजी! लेकिन कोई बंजारों का दल लगता है। पहले तो हमसे घोड़े खरीदने और रुपये देने की बात करने लगे और जब हमने मना किया तो छीनने की कोशिश करने लगे। अब तक तो जैसे-तैसे हमने बचाव किया, लेकिन सैकड़ों लोगों से हम आखिर कब तक लड़ पाते तो आपको बुलाया।”

       “अभी कहाँ है वो?”

       “अब तो वापिस भाग गए, लगता है उनका सरदार घायल हो गया सत्तार के पत्थर से तो चले गए। लेकिन वापिस आएंगे जरूर। आप लोग यहीं रहें और हमारी सहायता करें।”

        प्रधानजी बोले, “अरे आदमी ही है वो, कोई राक्षस नहीं! चलो हम खुद चलकर देख कर आते हैं, क्या कहते हैं वो लोग!”

        तभी वहां ठाकुर साहब आ गए घोड़े पर सवार। उन्हें भी पूरी बात बताई गई। ठाकुर साहब ने मामले की बजाय घोड़ों में ज्यादा दिलचस्पी ली और बोले, “इन्हें पानी पिलाया?”

        बालू ने कहा, “नहीं पिलाया! कब को पिलाते? सुबह से जूझ रहे हैं हम तो!”

        “तो सबसे पहले पानी पिलाओ। फिर चलते हैं उनके पास। जो भी वो हैं, डाकू या बंजारे, देख लेंगे सालों को!”

         संग्राम के उस खेत में चार चरखी का मीठे पानी का कुआँ था। चारों ओर पत्थरों की खेल। दस आदमियों को भेजा गया कुएँ पर घोड़ों को पानी पिलाने। बाकी सम्मानित लोग बैठे बबूल की छाया में। ठाकुर साहब ने अफीम निकाली और बिना गलाये सूखे अफीम की मनुहार की। अपनी अमलदार मंडली भी अफीम को भूल चुकी थी। अब देखकर अफीम याद आयी और सब लोग अफीम लेकर ताजा दम हुए। तब तक सारे घोड़े पानी पी चुके थे और वापिस खेत में चरने लगे। फिर बालू को साथ लेकर प्रधानजी और ठाकुर साहब चले बंजारे के डेरे की तरफ।

         बंजारा बहुत नाजुक आदमी निकला। शरीर हाथी जैसा लेकिन कलेजा चिड़िया से जरा ही कम। आज तक आदेश से काम होते थे, खुद को कुछ करना नहीं पड़ता था। लेकिन आज घोड़े लेने खुद चला आया और सत्तार का पत्थर खाया कंधे पर। हड्डी टूट गई थी और असहनीय दर्द हो रहा था। साथ के वैद्य ने कंधे पर कोई लेप लगाया, लेकिन दर्द में कोई राहत नहीं। डेरे में चारपाई पर पड़ा घायल कुत्ते की तरह कभी कराह रहा था तो कभी अपने आदमियों पर भौंक रहा था। और ऐसे में प्रधानजी, ठाकुर साहब और दर्जनों ग्रामीण स्त्री-पुरुष डेरे पर आए।

         इन लोगों को देखकर बंजारा जैसे-तैसे चारपाई पर अधलेटा हुआ और उनका अभिवादन किया। पत्थर खा कर बंजारे का अभिमान विगलित हो चुका था। उन सबके बैठने के लिए फर्श बिछाया गया। सब लोग बैठ गए तो प्रधानजी ने उसका परिचय प्राप्त किया। बंजारे ने पूरी कथा बाँची और अंत में बोला, “साहब इस तरह ये लोग मेरे घोड़ों पर कब्जा करना चाहते हैं।”

        बालू आवेश से बोला, “सरदार झूठ मत बोल! दौलत के लिए आत्मा को शैतान के पास गिरवी मत रख! दौलत यहीं रहनी है, लेकिन एक दिन ऊपर वाले के सामने पेश होना पड़ेगा, तब किस मुँह से जवाब देगा?”

         तभी सुखराम की माँ बोली, “सरदार, यह बात तुम सरासर झूठ कह रहे हो। अगर बालू बीच में नहीं होता, तो एक बार को हम मान भी लेते। लेकिन बालू हराम के माल को गऊ के रक्त बराबर समझता है। एक बार मेरा बारह तोला सोने का तिमनिया तालाब पर गिर गया। वो मिला बालू को। वो चाहता तो उसे अपने पास दबा सकता था। लेकिन नहीं, उसने तुरंत वो मुझे लाकर दे दिया। क्यों प्रधानजी, याद है आपको?”

          प्रधानजी बोले, “याद क्यों नहीं काकी? मैंने खुद बालू को गाँव के चौक में सबके सामने सम्मानित किया था।”

          बंजारा कलप कर बोला, “अरे होगा तुम्हारा बालू धर्मराज का अवतार! लेकिन इससे पूछो इतने घोड़े इसने कहाँ से खरीदे?”

          बालू-“खरीदने क्यों लगे भला हम,? हमने अपने खेत में बोये और उस की फसल है ये।”

          बंजारा-“अरे पागल आदमी घोड़ों की भी कहीं खेती होती है।”

          बालू-“तो क्या घोड़े आसमान से टपकते हैं?”

          और बंजारे ने अपना माथा पीट लिया। तभी भीखा बोला-“बालू और उसके साथियों ने खेती तो की थी घोड़ों की। दो महीने पहले मेरी बैलगाड़ी और मेरी बहन के बैल लेकर ये लोग जोधपुर गए थे घोड़ों का बीज लेने। और फिर संग्राम के झाड़ा लगाने से मेरा बैल ठीक हुआ था भिलिया से, तो मेरे बैलों की जोड़ी से बीज की बुवाई की थी। एक दिन तो मैं भी गया था बीज बीजने, अनोखा बीज था हड्डियों के बुरादे जैसा।”

         अब बालू का पलड़ा भारी हो गया और बंजारा बितर-बितर घुग्घू की तरह मुँह देखता रह गया सबका।

         आखिर ठाकुर साहब ने कमान सम्हाली। न्याय करना, कोई मजाक है? पूरे मामले की तह में जाएंगे ठाकुर साहब। फिर फैसला सुनाएंगे। उन्होंने बालू से पूछा, “तुम जोधपुर से बीज कहाँ से लाये थे? उस दुकानदार का नाम बताओ। हम उससे पूछताछ करेंगे। अगर उसने तुम्हें बीज देने की हामी भरी तो घोड़े तुम्हारे, नहीं तो बंजारे के।”

         बालू ने ठाकुर साहब की तरफ ऐसी नजरों से देखा मानो वो सठिया गए हों। यह महाशय घोड़े रखते हैं और इन्हें यह भी नहीं पता कि घोड़ों के बीज बनिये की दुकानों पर नहीं मिलते। और ऊपर से तुलसा कह रहा था कि ठाकुर साहब से बीज ले लो। ले लो मां का सिर! बोला-“ठाकुर साहब घोड़ों के बीज दुकानों में नहीं मिलते!”

      ठाकुर-“तो क्या जोधपुर महाराजा के पास से लाये थे?”

      बालू व्यंग्य समझ नहीं पाया और बोला-“हाँ, वहीं से तो लाये।”

      और ठाकुर साहब देखते रह गए बालू अमलदार का मुँह। इतनी कुशलता से कोई झूठ कैसे बोल सकता है और वो भी पूरे गांव के सामने? और वो बालू को डराकर सच बुलवाने हेतु बोले-“अभी मैं खुद जाता हूं जोधपुर और करता हूँ महाराजा को खबर। फिर अगर झूठ पाए गए तो हाथी के पाँव तले कुचले जाओगे।”

     बालू बोला-“मैं झूठ क्यों बोलने लगा भला? जाइये आप जोधपुर और यह भी प्रार्थना करना मेरी तरफ से महाराजा को कि जल्दी ही वो खुद यहाँ पधारे और अपना लगान ले जायें, ताकि हम अपने बाकी घोड़ों को घर ले जाएँ।”

     उसने घृणा से बंजारे की तरफ देखा-“ताकि लुटेरों से अपने घोड़ों की रक्षा कर सकें।”

     और बालू का आत्मविश्वास देखकर सभी दंग रह गए। आखिर तय हुआ कि ठाकुर साहब जोधपुर जाएँ और महाराजा को पूरे मामले से अवगत कराएँ। अब वो ही फैसला कर पाएँगे।

     और सभी लोग वापिस गाँव आ गए। बालू अपने साथियों के साथ खेत में आ गया। आज भोजन की किसी को सुध नहीं रही और अमल भी अफरा तफरी में ही लिया था तो सबसे पहले तुलसा को उसकी डिबिया वाला कच्चा दूध चटाकर गाँव भेजा। सब लोगों के लिए भोजन वहीं लेकर आने के लिए। साले बंजारे का कोई भरोसा नहीं, फिर घोड़े छीनने आ जाये तो अब जब तक ठाकुर साहब महाराज का कोई आदेश लेकर नहीं आ जाते, खेत और घोड़ों को एक पल भी अकेले नहीं छोड़ना है।

     और फिर बबूल की ढलती छाया में अमल गलाने का आयोजन हुआ। बालू बोला, “सत्तार, संग्राम, खैराज तुम लोग हर दम चौकन्ने रहना।”

      इधर ठाकुर साहब उसी दिन शाम तक घोड़े पर सवार होकर पहुंचे जोधपुर। सुबह दरबार में महाराज के सामने उपस्थित हुए और पूरा मामला उनके सामने रखा। मामला सुनकर महाराज ने अपना सिर पीट लिया। इतनी सी बात! कुछ अमलदारों की सनक का मान रखना इतना बड़ा मामला बन जायेगा, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।

       ठाकुर साहब बोले, “हुजूर, अब हमारे लिए क्या आदेश है?”

       महाराज, “अब आदेश से काम नहीं चलेगा। हमें खुद वहाँ चलना होगा, तभी इस मामले का निस्तारण होगा।”

और उसी दिन महाराज चल पड़े गाँव!

       बालू के उसी खेत में दूसरे दिन सुबह दरबार सजाया गया।

रात को महाराज ठाकुर साहब के मेहमान बने थे और बंजारे को भी वहीं बुलाया गया। दोनों पक्षों ने अपने पक्ष रखे। बालू ने शाही मोहर लगा फरमान पेश किया। आखिर में महाराज बोले, “इस पूरे मामले में ना तो ये अमलदार दोषी हैं और ना ही पूरी तरह से बंजारा दोषी है। बंजारे का एक ही दोष है कि इसने बिना पूछे खेत में घोड़े छोड़ दिये। इस मामले में अगर कोई सबसे ज्यादा दोषी है, तो वो हैं हम खुद! हमें उसी दिन इन लोगों को प्यार से समझा कर भेजना चाहिए था कि घोड़ों की खेती नहीं होती, लेकिन हमने इनकी बात रखने के लिए इनके साथ छल किया जिसका नतीजा आज सामने है। तो जब दोष हमारा है, तो सजा भी हमें ही मिलेगी और हमारी सजा है इन घोड़ों को दुगुनी कीमत पर खरीदना। बंजारा अपने घोड़ों की कीमत बताये। हम वो मूल्य इसको चुकाएंगे और इतना ही मूल्य हम इन अमलदारों को भी चुकाएंगे और घोड़े हम ले जाएंगे।”

      महाराज के इस फ़ैसले से दोनों पक्षों के चेहरे खिल उठे। वहाँ उपस्थित सैकड़ों ग्रामीणों ने महाराज के न्याय की प्रशंसा की और वातावरण उनके जय जयकार से गूंज उठा और इस तरह यह अनोखा मुकदमा खत्म हुआ। अपने अमलदार एक झटके में मालामाल हो गए। सभी खुश। लेकिन तुलसा का मुँह उतरा हुआ था।

      बात यह थी कि तुलसा बाबू के सिर पर अभी गृहस्थी का बोझ पड़ा नहीं था, तो उसे दौलत की महिमा और ताकत का ठीक से अहसास नहीं था। उस खेती से उसकी मुख्य उम्मीद यही थी कि उसके पास भी ठाकुर साहब की तरह शानदार घोड़ा होगा और वो भी उसपर सवारी किया करेगा। लेकिन अब दौलत तो अथाह मिली, लेकिन घोड़े तो महाराज ले जाएंगे। हाँ वो अब घोड़ा खरीद सकता है लेकिन अपने खेत में उपजे घोड़े की बात ही कुछ और होती। वो इन्हीं विचारों में मग्न था कि महाराज उसके पास आकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

      तुलसा ने देखा तो सकुचा गया। लेकिन महाराज ने बहुत ही स्नेह से उससे पूछा कि “भाई तू क्यों उदास है अब?” तो तुलसा ने झिझकते हुए अपनी इच्छा बता दी। और ये जूता पड़ा बंजारे की खोपड़ी पर।

      महाराज ने बंजारे को आदेश दिया कि “इनसे बिना पूछे खेत में घोड़े छोड़ने के बदले इन सभी को एक-एक घोड़ा दिया जाए और उन पन्द्रह घोड़ों की कीमत बंजारे को नहीं दी जाएगी। अपनी मंडली में हर्ष की एक नई लहर दौड़ गई

      खुश बंजारा भी था। साले ये पागल सारे घोड़े छीन लेते और पत्थरों से मारते वो अलग। अब केवल पंद्रह घोडों से पीछा छूटा। आखिर में जब महाराज वापिस रवाना हुए तो बालू ने पास जाकर सलाम किया,तो महाराज तनिक उच्च स्वर में बोले, “अब आगे से कभी घोड़ों की खेती मत करना।”

      और बालू ने तुरंत जवाब दिया, “फिर घोड़े क्या आसमान से बरसेंगे हुजूर?” और महाराज तथा साथ के राजपुरुषों का एक सम्मिलित ठहाका गूंज उठा, जिसमें बालू का ठहाका भी शामिल था।

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महेंद्र सिंह राजपुरोहित

महेंद्र सिंह राजपुरोहित

पेशे से पशु चिकित्सक। साहित्य में गहरी रूचि। किस्सागोई की विशिष्ट शैली और भाव वैविध्य उनकी कहानियों की खासियत है।

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