पहली झाँकी जासूसी जान पहचान भी एक निराले ही ढंग की होती है। हैदर चिराग अली नाम के एक धनी मुसलमान सौदागर का बेटा था। उससे जासूस की गहरी मिताई थी। उमर में जासूस से हैदर चार पाँच बरस कम ही होगा, लेकिन शरीर से दोनों एक ही उमर के दीखते थे। मुसलमान होने पर भी हैदर जैसे और मुसलमान हिंदुओं से छिटके फिरते हैं, वैसे नहीं रहता था। काम पड़ने पर हैदर जासूस के साथ अठवाड़ों दिन रात रह जाता और जासूस भी कभी-कभी हैदर के घर जाकर उसके बाप चिराग से मिलता, उसके पास बैठकर बात करता था। चिराग अली भी इस ढंग से रहता था कि उसको जासूस अपने बड़ों की तरह मानता जानता था। उन दिनों चिराग अली सत्तर से टप गया था। उज्ज्वल गौर बदन पर सफेद दाढ़ी मूँछ, सब शरीर भरा हुआ कांतरूप देखकर चिराग अली में सबकी भक्ति हो सकती है। इस बूढ़ेपन […]
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गाँव के बाहर, एक छोटे-से बंजर में कंजरों का दल पड़ा था। उस परिवार में टट्टू, भैंसे और कुत्तों को मिलाकर इक्कीस प्राणी थे। उसका सरदार मैकू, लम्बी-चौड़ी हड्डियोंवाला एक अधेड़ पुरुष था। दया-माया उसके पास फटकने नहीं पाती थी। उसकी घनी दाढ़ी और मूँछों के भीतर प्रसन्नता की हँसी छिपी ही रह जाती। गाँव में भीख माँगने के लिए जब कंजरों की स्त्रियाँ जातीं, तो उनके लिए मैकू की आज्ञा थी कि कुछ न मिलने पर अपने बच्चों को निर्दयता से गृहस्थ के द्वार पर जो स्त्री न पटक देगी, उसको भयानक दण्ड मिलेगा। उस निर्दय झुण्ड में गानेवाली एक लडक़ी थी। और एक बाँसुरी बजानेवाला युवक। ये दोनों भी गा-बजाकर जो पाते, वह मैकू के चरणों में लाकर रख देते। फिर भी गोली और बेला की प्रसन्नता की सीमा न थी। उन दोनों का नित्य सम्पर्क ही उनके लिए स्वर्गीय सुख था। इन घुमक्कड़ों के दल में ये […]
कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था। उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लडक़ा चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुँह पर गम्भीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी सम्पूर्णता थी। मैंने पूछा-”क्यों जी, तुमने इसमें क्या देखा?” ”मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नम्बर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।”-उसने बड़ी प्रगल्भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रुकावट न थी। मैंने पूछा-”और उस परदे में क्या है? […]
लफ़्टंट पिगसन की डायरी का एक अंश इतने दिनों तक भारतवर्ष में रहने के पश्चात् मुझे यह ज्ञात हो गया कि सेना विभाग में काम बहुत ही कम है। खूब भोजन करना, घुड़सवारी करना, चाँदमारी करना, परेड करा देना, यही हम लोगों का काम था और सप्ताह में तीन-चार दिन सिनेमा देखना। मैंने अपने ऊपर और कुछ काम ले लिये थे। जैसे उर्दू पढ़ना, इस देश का इतिहास, यहाँ की पुरानी बातों का अध्ययन, पुरातत्त्व, रीति इत्यादि! उर्दू में इधर पाँच-छः महीनों में मैंने बहुत उन्नति कर ली थी। मौलवी साहब पहले की भाँति सप्ताह में तीन दिन आते थे और उन्होंने अब मुझे कविता पढ़ानी आरम्भ कर दी थी। मौलवी साहब जब कविता पढ़ाते थे तब वह कवि के भावों का चित्र खड़ा कर देते थे। मेरा निश्चित मत है कि ब्रिटिश सेना के लिये उर्दू कविता का पठन-पाठन बहुत आवश्यक है क्योंकि उसमें उदात्त सैनिक भावनायें शब्दों में […]
कायँ! कायँ !! कायँ !!! शाम का समय था। चचा छक्कन शेख साहब के साथ हमेशा की तरह शतरंज खेल रहे थे। मिर्जा साहब हुक्का पीते जाते थे और कभी-कभी किसी अच्छी चाल पर खुश होकर दोनों की तारीफ भी करते जाते थे, कि इतने में शेख साहब बोले-“देखिए, जरा सँभल कर चलिए, उठा लूँ वजीर?” चचा छक्कन ने कहा-“भई, माफ करना, गलती हुई, यह चाल वापस लेता हूँ!”- यह कहते हुए चचा छक्कन ने अपना बढ़ा हुआ मोहरा वापस कर लिया और दूसरी चाल चली। बाजी अच्छी-खासी खेल रहे थे, कि दोबारा बेपरवाही से गलत चाल चल दिए। शेख साहब ने कहा- देखिए, आप फिर बहके, मार लूँ घोड़ा?” चचा छक्कन ने ‘लाहौल-विला-कूव्वत’ कह कर अपनी चाल वापस कर ली और अब अधिक ध्यान से चाल चलने लगे। मिर्जा साहब ने कहा-“न जाने क्या बात है, आज चचा छक्कन ध्यान से नहीं खेल रहे […]
कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से परिचय बहुत बाद में हुआ। परिचय हो जाने पर भी उनकी पहली याद अपनी प्रिय पत्रिका पराग के संपादक के रूप में ही रही। आज उनकी पुण्य तिथि पर प्रस्तुत है, बच्चों के लिए लिखी गई उनकी एक गीत कथा एक लड़की थी। वह हमेशा धूल में खेलती थी। नतीजा यह हुआ कि उसके सिर में जुएं भर गईं। वह हर समय सिर खुजलाती और रोती। एक दिन उसकी माँ ने कहा: ‘आ, तेरी जुएं निकाल दूँ।‘ माँ एक जूँ निकलती जाती और उसकी हथेली पर रखती जाती। लड़की उन्हें एक नाखून पर रख-रख कर मारती जाती। उसका नाखून लाल हो गया। वह दौड़ी-दौड़ी उसे धोने नदी पर गई। नदी ने पूछा: ‘लड़की, लड़की, तेरे नाखून कैसे लाल हो गए? लड़की ने उत्तर दिया: “जूँ चट्ट, पानी लाल !” नदी का पानी लाल हो गया। एक गाय नदी पर पानी पीने आई। उसने नदी से […]
आज डुमराँव स्टेशन से राजप्रासाद तक बड़ी धूम है. ट्राफिक सुपरिटेंडेंट के दफ्तर से तार-पर-तार चल रहा है. दीनापुर से डुमराँव तक सिग्नेलरों का नाकोंदम है. एक खबर (मेसेज) फारवर्ड होते देर नहीं कि दूसरे के लिए तारबाबू टेलीग्राफ-इंस्ट्रूमेंट पर रोल करते हैं. डी.टी.एस. के ऑफिस से एक को मंसूख करनेवाला, दूसरा फिर उसको कैंसल करनेवाला, तीसरा, इसी तरह लगातार आर्डरों का तार लग रहा है. होते-होते कोई बीस घंटे के बाद ट्राफिक सुपरिटेंडेंट के यहाँ से स्टेशन मास्टर को तार आया कि मालगोदाम जैसे का तैसा बंद रखो, जासूस जाता है. बस अब सब लोग अपने मन की घबराहट मन ही में दबाये जासूस की राह देखने लगे. इधर नगर में कोलाहल मचा है. बिसेसर हलवाई अपनी दूकान पर बैठा पंखे के मगदल को मक्खी हाँकता हुआ कहने लगा—“दादा, इसी टेशन में मिठाई बेचते बाल पके, लेकिन ऐसी चोरी किसी बड़े बाबू के बखत में नहीं हुई. ताला-चाभी […]
मिस रस्तोगी थोड़ी देर सोफ़े पर अधलेटी-सी पड़ी टेलीफोन की ओर देखती रही। लग रहा था कि अब भी बोल रहा है-“पहचाना? मैं प्रकाश बोल रहा हूँ—प्रकाश खन्ना—“ “कब आए? किस ट्रेन से? तार कर दिया होता। कहाँ हो? स्टेशन पर?” एक ही साँस में एकाएक मिस रस्तोगी पचासों सवाल पूछ बैठी थी। “आऊँगा, तब सब बताऊँगा। फिलहाल सिर्फ इतना जान लो कि कल शाम तक ठहरूँगा।“ “पर यहाँ कब आओगे? अभी आ रहे हो? गाड़ी भेजूँ?” न जाने क्या हो गया था मिस रस्तोगी को। उन्होंने फिर से दसियों सवाल टेलीफोन में उड़ेल दिए थे। “जहाँ भी होऊँगा, सुबह दस तक तुम्हारे यहाँ जरूर पहुँच जाऊँगा। गाड़ी-बाड़ी की जरूरत नहीं है।“ मिस रस्तोगी भावुकता में शायद और कुछ भी कहती, किन्तु उधर से उन्होंने रिसीवर रख दिया था। उन्होंने फोन से दृष्टि हट ली और भूलने की कोशिश की कि अभी-अभी कोई ऐसा […]
बीच की तीन पगडंडियों को पार कर बानो आती थी। आते ही पूछती थी, “कुछ पता चला?” मेरा मन झूठ बोलने के लिए मचल उठता। सोचता, कह दूँ-“हाँ, पता चल गया..हम दिल्ली जा रहे हैं।“ लेकिन बानो झूठ ताड़ जाएगी, इसलिए आँखें मूँदे रहता। बानो मेरे माथे पर हाथ रखती। जब उसका हाथ ठंडा लगता, मैं जान जाता कि अभी बुखार है, जब गरम लगता तो मन उल्लसित हो उठता। आँखें खोलकर पूछता-“कैसा लगता है बानो? और बानो निराश भरे स्वर में कहती, “अभी तो कम है, लेकिन शाम तक जरूर चढ़ जाएगा।” बानो समझती थी कि जब तक बुखार रहेगा, हम उसके संग शिमले में ही रहेंगे- बुखार उतरने लगता, तो उसे निराशा होती। जब कभी बानो की आहट मिल जाती, मैं जान बूझकर पास रखे ठंडे पानी से अपना माथा रगड़ लेता। जब वह आती तो उसका हाथ अपने माथे पर रखकर पूछता, “देखो तो बानो, कितना […]
‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ अब्दुल बिस्मिल्लाह का सर्वाधिक चर्चित एवं प्रशंसित उपन्यास है। 1987 ई. में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित इस उपन्यास का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उपन्यास बनारस के साड़ी बुनकरों की ज़िंदगी पर आधारित है। वर्षों तक इन बुनकरों के जीवन के रेशे-रेशे को देखने के बाद लेखक ने इनके पूरे संघर्ष को उपन्यास के पन्नों पर सजीव कर दिया है। वे बुनकर जिनकी साड़ियाँ विश्व-भर में प्रसिद्ध हैं, अपनी तमाम मेहनत के बावजूद परिवार को दो जून ठीक-ठाक खाना भी नहीं खिला पा रहे हैं, जबकि उनकी ही मेहनत पर फल-फूल रहे हैं ‘गिरस्ता’ और ‘कोठीवाल’। उपन्यास का नायक यही बुनकर समुदाय है, जिसके केंद्र में है ‘मतीन’। मतीन अपनी दुरवस्था को जस का तस स्वीकारने को तैयार नहीं है। ऐसा क्यों है कि ‘करघा अपना, जाँगर अपनी, सिर्फ कतान हाजी साहब का, लेकिन हाजी साहब की कोठियाँ तन गयीं और […]
‘रोमांस’ के लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त शब्द नहीं मिलता। हमारे अय्याजी यद्यपि संस्कृतज्ञ थे, किन्तु इस शब्द के साथ उनका संबंध ठीक उसी तरह जुड़ गया था, जैसे मलहम के साथ पट्टी। अंग्रेजी न जानने पर भी वे रोमांस का रहस्य समझते अवश्य थे। हमारी यह धारणा और भी बलवती हो गई, जब उन्होंने एक दिन ‘लव मेरिज’ का जिक्र कर डाला। काम पड़ते रहने पर गाँव के लोग भी ‘टेशन’ और ‘ट्रिक्स’ समझने लगते हैं, परंतु रात-दिन व्याकरण की फक्किकाएँ घोखनेवाले अय्याजी भी जब एक दिन कहने लगे कि ‘लव-मैरिज’ में जो रोमांस रहता है, वह मड़वे के खंभे के साथ चक्कर खाकर चुनरी और दुपट्टे से गांठ जोड़ने में नहीं, तो हमने समझा कि हमारे अय्याजी भी पण्डितराज जगन्नाथ की तरह ‘युवती नवनीत कोमलांगी’ के मधुर मिलन की चाशनी चखने की फिराक में जरूर हैं। अपनी समझ को मजबूत करने के खयाल से ही उस दिन हमने […]
“अतीत की रीसती छत से मेरा वर्तमान ठोप- ठोप टपक रहा भविष्य के पेंदाहीन पात्र में” अभियन्यु अनत ( मॉरीशस के कवि ) कुली लाइंस एक साहित्यिक पुस्तक भर नहीं है, बल्कि इतिहास के उस दौर का चलचित्र (मनमोहन देसाई मार्का नहीं, बल्कि आर्ट मूवी की तरह) है, जिससे कि हममें से ज्यादातर लोग परिचित नहीं है, थोड़ा बहुत जानते भी हैं, किंतु उस जानकारी की और गहराई में जाने से बचते हैं- कारण यही पेश किए जाते हैं कि कैसी बातें करते हैं, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा होना है, ये सब ही दोहराकर, दूसरों से ज्यादा खुद को बहला कर सुकून पाने की, अपराध बोध से बचने की कोशिश ही तो करते हैं। हमारे बहुत सारे देश वासी लगभग डेढ़ सौ साल पहले सुनहरे भविष्य के फेर में अपनी मिट्टी को छोड़कर दूसरे देश चले गए। रिश्ते,नाते, गुजरे बचपन सबको खुद से अलहदा करके और कभी […]
साहित्य विमर्श पर कुंदन यादव की कई कहानियाँ आप पढ़ और सराह चुके हैं। पिछले दिनों कुंदन दक्षिण भारत की यात्रा पर थे। पढ़िये इस दक्षिण यात्रा का वृतांत कुंदन की विशिष्ट बनारसी शैली में बनारस में एक प्रचलित कहावत है, “बड़ा तेज बनत रहलन, ससुर दक्खिन लग गईलन”! यहां दक्खिन लगने का मतलब पीछे हो जाना, लक्ष्य की प्राप्ति न होना, समाप्त हो जाना या प्रतिष्ठा की हानि। विमर्श के दौरान अपने बनारसी मित्रो ने भारत के कुछ दक्षिणी हिस्से को देखने की इच्छा जतायी। कुछ दिल्ली के मित्रो ने भी साथ चलने का मन बनाया इसलिए तय हुआ कि यात्रा दिल्ली से शुरू की जाए। रेल का किराया जहाज से अधिक होने के बावजूद ट्रैन से चलना तय हुआ, तर्क था “बिना गलचौर के यात्रा कईसन”, बिना बकलोली के मजा न आयी। दक्षिण भारत पांच भारतीय राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु […]
सत्यवान छात्रावस्था में मैं और मणिराम साथ-ही-साथ पढ़ते थे। उस समय हम एक-दूसरे पर प्राण देते थे। वे बचपन के दिन थे। जब तक एक दूसरे को देख न लेते, शान्ति न मिलती। उस समय हमें बुद्धि न थी। पीछे से प्रेम का स्थान वैर ने ले लिया था, दोनों एक दूसरे के लहू के प्यासे हो गए थे। तब हम शिक्षित हो चुके थे। एफ.ए. की परीक्षा पास करने के पश्चात् हमारे रास्ते अलग-अलग हो गए। मणिराम मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो गए। मैंने साहित्य संसार में पाँव रखा। मुझे रूपये-पैसे की परवाह न थी। पूर्वजों की संपत्ति ने इस और से निश्चिंत कर दिया था। दिन-रात कविता के रस में तल्लीन रहता। कई-कई दिन घर से बाहर न निकलता। उन दिनों मेरे सिर पर यही धुन सवार रहती थी। एक-एक पद पर घंटों खर्च हो जाते थे। अपनी रचना को देखकर मैं गर्व से झूमने लग जाता था। […]
स्मृति-वह मर्म-स्पर्शी स्मृति, जो हृदय-पृष्ठ पर करुणोत्पादक भावों की उस पक्की और गहरी स्याही से अंकित की गई है, जिसका मिटना इस जन्म में कठिन ही नहीं, प्रत्युत असंभव है। आह! वह स्मृति कष्ट-दायिनी होने पर भी कितनी मधुर और प्रिय है! उस स्मृति से हृदय जला जाता है, तन-मन राख हुआ जाता है, फिर भी उसे मिटाने की चेष्टा करने को जी नहीं चाहता है। वह स्मृति वह मीठी छुरी है, जिसकी तेज धार से हृदय लहू-लुहान हो रहा है; परंतु उसमें वह मधुरता है, वह मिठास है कि उसे कलेजे से दूर करने को जी नहीं चाहता। क्यों? इसलिए कि वह उस प्रेम-प्रतिमा की स्मृति है, जिसके प्रेम के मूल्य को, जिसकी कर्तव्यशीलता की गहराई को मैं उस समय समझ, जब वह मुझसे सदैव के लिए बिछुड़कर मृत्यु के परदे में अदृश्य हो रही थी। उस प्रेम की पुतली का असली रूप मैंने उस समय देखा, जब मृत्यु […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…