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साहित्य विमर्श पर कुंदन यादव की कई कहानियाँ आप पढ़ और सराह चुके हैं। पिछले दिनों कुंदन दक्षिण भारत की यात्रा पर थे। पढ़िये इस दक्षिण यात्रा का वृतांत कुंदन की विशिष्ट बनारसी शैली में  

            बनारस में एक प्रचलित कहावत है, “बड़ा तेज बनत रहलन, ससुर दक्खिन लग गईलन”! यहां दक्खिन लगने का मतलब पीछे हो जाना, लक्ष्य की प्राप्ति न होना, समाप्त हो जाना या प्रतिष्ठा की हानि। विमर्श के दौरान अपने बनारसी मित्रो ने भारत के कुछ दक्षिणी हिस्से को देखने की इच्छा जतायी। कुछ दिल्ली के मित्रो ने भी साथ चलने का मन बनाया इसलिए तय हुआ कि यात्रा दिल्ली से शुरू की जाए। रेल का किराया जहाज से अधिक होने के बावजूद ट्रैन से चलना तय हुआ, तर्क था “बिना गलचौर के यात्रा कईसन”, बिना बकलोली के मजा न आयी। दक्षिण भारत पांच भारतीय राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के साथ-साथ तीन केंद्र शासित प्रदेशों लक्षद्वीप, अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह और पुडुचेरी का क्षेत्रफल है, जो भारत के 19% क्षेत्र है। भारत के दक्षिणी भाग को दक्षिण भारत भी कहते हैं।

            यात्रा प्रारंभ हुई और हम लोग यानि आनंद मोहन उर्फ गुड्डू , श्रुति प्रकाश द्विवेदी  , कमलेश उर्फ डब्लू और संतोष शुक्ल 20 जुलाई की शाम जहाज से दिल्ली पहुच गए। वहाँ रात्रि विश्राम कर सुबह 10.55 पर नई दिल्ली-त्रिवेंद्रम राजधानी पर सवार हुए। दिल्ली से हमारे साथ कुन्दन यादव भी शामिल हुए  तिरुवनंतपुरम राजधानी नई दिल्ली को केरल राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम से जोड़ती है। यह हजरत निजामुद्दीन से तिरुवनंतपुरम सेंट्रल तक चलती है। यह सबसे लंबी चलने वाली राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन है, जो लगभग 3,149 किलोमीटर की दूरी तय करती है। ट्रैन में बैठते ही सामानों की जांच हुई ताकि कही कुछ छूटने न पाए। बनारस से चलते वक़्त तय हुआ था कि राममेश्वरं दर्शन भी करना है इसलिए मित्र श्रुति (पुरुष) पंडित ने गंगाजल साथ ले रखा था। शेष बाबा का प्रसाद जैसे पान, गुठखा, पान मसाला, तरल पदार्थ और चखना की जिम्मेदारी मित्र डब्लू ने उठा रखी थी। सब कुछ व्यवस्थित हो चुका था। टिकट की जांच और फिर दिव्य दोपहर का भोजन। लगभग 46 घंटो का सफ़र! सर्राटा मारती भागती हुई ट्रेन! उनींदी आंखे!

             कुछ देर के लिए आंख लग गई।जब आंख खुली तो देखा कि ट्रेन दिल्ली से आगे बढ़ राजस्थान की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी। थोड़ी नींद के बाद थकान कुछ कम हो चुकी थी। तभी एक सामूहिक प्रस्ताव आया, “चला यार मूड मिजाज बनावल जाय”।  इतना सुनते ही सभी मित्र सावधान की मुद्रा में आ गए। शाम के 6:00 बज चुके थे। कोटा स्टेशन कब का बीत चुका था। कोई पैंट्री कार की ओर प्लेट लेने गया तो किसी ने बैग में से कुछ बनारसी नमकीन और चिप्स निकाला। अब सोमरस की बारी थी। दिल्ली के मित्र कुंदन जी ने दो ब्लैक लेबल की बोतलें पहले ही मंगवा लिया था। इसी बीच किसी मित्र ने चेताया कि गुजरात में शराब प्रतिबंधित है दूसरे ने तपाक से उत्तर दिया की मोदी के बनरसय से लड़े के हव, चिंता मत करा जल्दी से बनावा। सबके मुखार बिंदु से एक आवाज निकली, “चियर्स”! फिर कब राजस्थान और गुजरात बीत गया पता ही नहीं चला।

कोंकण रेलवे

            सारी रात तान कर सोने के बाद हल्के हल्के झटकों से जब सुबह 6.30 बजे नींद खुली तो टपटप करती हुई पानी की बूँदे खिड़की के शीशे पर अपनी आमद दर्ज करा रही थीं। सुबह होने तक हम लोग राजस्थान और गुजरात की सीमा को पार कर महाराष्ट्र में प्रवेश कर चुके थे। पनवेल स्टेशन बीत चुका था।यात्रा की अगली सुबह हल्के हल्के झटको मानगाँव नामक स्टेशन दिखाई पड़ा और अचानक हरियाली चादर का फैलाव दिखने लगा । तभी एक बड़ी नदी जिसमें की तेज धार से भरा हुआ पानी साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था दिखाई दी । जब तक कि हम उसका नाम देख पाते श्रुति ने आवाज़ लगायी- देखा ई गोदावरी हव तभी किसी ने टोका की गोदावरी अरब सागर में नाहीं बंगाल की खाड़ी में गिरअला ।  ढेर ज्ञान बघारा मत एकरे बहे क दिशा पश्चिम के तरफ हव। श्रुति कुछ देर मौन रहे फिर केबिन से बाहर निकाल कर दरवाजे पर खड़े हो गए।

            तभी गाड़ी कुछ देर में ही खेड नामक स्टेशन पर खड़ी हो गई। लूप लाइन पर खड़ी होने से ही यह तय था कि गाड़ी कम से कम 10 मिनट रुकेगी क्योंकि कोंकण रेलवे में डबल ट्रैक नहीं है और ज़रूर कोई क्रॉसिंग है। श्रुति के साथ डब्लू भी बाहर निकले । कुछ देर बाद कुंदन और संतोष भी बाहर आ गए तभी श्रुति ने एक सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा किया।

मालूम हव तू लोग के,  हम लोग समुद्र तल से 24,630 मीटर की ऊँचाई पर हैं। पहले जो किसी ने ध्यान नहीं दिया है लेकिन अचानक सभी को लगा कि उँचाई ज़्यादा हो गई है

कुंदन ने टोका कि हैं 24630 मीटर???

बड़े भरोसे से उन्होने जवाब दिया- और का फुट कहत हई। अभी स्टेशन के बोर्ड पर देख लिहा कि का लिखले हव?

चूंकि पहला बोर्ड बीत चुका था और दूसरी तरफ़ का बोर्ड आने में समय था, तब तक लोग एवरेस्ट की ऊँचाई और श्रुति के कहे की समीक्षा करने लगे। किसी ने कहा कि पहाड़ों की रानी मसूरी दो हज़ार मीटर पर है तब इतनी ठंडक और यह 24000 मीटर पर बरमूडा पहन कर खड़े हो।

श्रुति ने सीधे सीधे कहा जो लिखा है उसको पढ़ो हमसे बहस मत करो

कुछ देर तक हर आदमी अपनी अपने वायुमंडलीय ज्ञान भौगोलिक ऊँचाई पर तापमान के घटने की प्रक्रिया और टोपो स्पीयर तथा स्ट्रेटो स्फियर के बारे में बहस  करता रहा

जब ट्रेन चली तो अगले बोर्ड को देखकर पता चला समुद्र तल से उचाई246.30 मीटर थी। श्रुति दशमलव नहीं पढ़ सके थे।

            हमारी ट्रेन एक-दो घंटे बाद रत्नागिरी पहुंचने वाली थी। तभी पैंट्री के कर्मचारी ने दरवाजा खटखटाया, साहब सुबह की चाय तैयार है। सावन का प्रथम सोमवार होने के कारण दो लोगो का व्रत था। यात्रा का सुख विखंडित ना हो इसलिए हमने महादेव से व्रत के लिए क्षमा मांग लिया। मित्र श्रुति गुरु परेशान थे, बाथरूम का शावर खराब था उनको नहा-धो कर पूजा करना था इसी खुन्नस में वो सुबह सुबह अटेंडेंट को बिगड़ रहे थे इस बीच संतोष गुरु ने उनको सुझाव दिया, “गुरु तनी सा गंगाजल लेकर कपारे पर छिडक ला, काम हो जाई” पर गुरु भला क्यों माने उनके पण्डितव का सवाल जो ठहरा। संतोष ने बहस को बीच में रोकते हुए कहा, “अरे मर्दवा रुकबा, पहिले ई पता करा की एकरे पास कुछ ब्रत वाला आइटम हौ कि नाही , नही त भूखे पेट दिनभर रहे के पड़ी, अभी अमवा भी नही पकल हव”। हम लोग ट्रेन में चढ़ते वक्त एक पेटी बगीचे का चौसा आम भी साथ लेकर चले थे परंतु वह एसी की ठंडक के कारण पूरी तरह से पका नहीं था। अटेंडेंट ने बताया कि रत्नागिरि स्टेशन आने वाला है वहां आपको बढ़िया अंगूर मिल जाएगा। केला, दही और उबले हुए आलू ट्रेन में उपलब्ध है। आप लोग चिंता ना करें व्रत के नाश्ते का इंतजाम हो जाएगा। फिर सभी ने सुबह की चाय पी और नित्य कर्म की तैयारी में लग गए।

            कोंकण रेलवे देश की सबसे बेतरीन रेल सेवाओं के लिए जानी जाती है। कोंकण रेल पहाड़ और समंदर के बीच से गुजरती है। ‘तू किसी रेल सी गुजरती है… मैं किसी पुल सा थरथराता हूं…’ दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को अगर आपको देश में किसी रेल यात्रा के दौरान महसूस करना हो तो आप कोंकण रेलवे की यात्रा पर निकल सकते हैं। महाराष्ट्र के रोहा से शुरू होकर कर्नाटक के ठोकुर तक जाने वाली ये लाइन भारतीय रेलवे के इतिहास में मील का पत्थर है।

ट्रेन अपने निश्चित समय से करीब 1 घंटा विलंब से चल रही थी। सभी मित्र स्नान ध्यान कर तैयार थे थोड़ी देर में रत्नागिरी स्टेशन आने वाला था। रत्नागिरि महाराष्ट्र राज्य के रत्नागिरि ज़िले में स्थित एक नगर है। बाल गंगाधर तिलक की यह जन्‍मस्‍थली महाराष्ट् के दक्षिण-पश्चिम भाग में अरब सागर के तट पर स्थित है। यह कोंकण क्षेत्र का ही एक भाग है। यहां बहुत लंबा समुद्र तट हैं। यहां कई बंदरगाह भी हैं। यह क्षेत्र पश्चिम में सहयाद्रि पर्वतमाला से घिरा हुआ है। रत्नागिरि अल्‍फांसो आम के लिए भी प्रसिद्ध है।

सुबह लगभग 10.30 बजे ट्रैन थोड़ी धीमी हुई तो बीच मे से श्रुति ने आवाज लगाया “देखा शायद रत्नागिरि स्टेशन आ गयल कुछ खाये के ली आवा,अब पेट जवाब देत हौ।”  हम और कुंदन जी स्टेशन पर नीचे उतरे यहां हमारे बनारस के स्टेशन की तरह चहल-पहल नहीं थी। शायद इसलिए भी ना रही हो क्योंकि राजधानी में सभी के लिए भोजन उपलब्ध रहता है कुछ एक दो मराठी मानुष वड़ापाव बेच रहे थे। हम लोग उतर कर फल की दुकान ढूंढने लगे पास में ही कुछ अंगूर और केले मिल गए। इससे पहले कि ट्रेन चले हम वापस अपनी बोगी में आकर बैठ गए। थोड़ी देर में ट्रेन अपने अगले गंतव्य के लिए चल दी। ट्रेन के चलते पैंट्री के कर्मचारी ने नाश्ते का प्रबंध कर दिया। हम लोगों ने जहां सैंडविच, कटलेट और चाय का आनंद लिया वही व्रत वाले मित्रों ने अपने व्रत अनुसार नाश्ता किया। नाश्ते का हर आइटम तो औसत दर्जे के थे परंतु अंगूर कुछ खट्टे लग रहे थे। डब्लू चौबे ने बताया की अंगूर त नागपुर का बढ़िया होला एके रत्नागिरी में खरीदबा त खट्टे निकली। अंगूर पर बहस चल ही रही थी एक बेहद रोचक और मजेदार किस्सा मित्र कुंदन यादव जी ने सुनाया-

            एक बार उनके एक मामा ने मिर्जापुर के मकान में अंगूर की लता लगायी लेकिन अंगूर खट्टे निकल गए । उसके बाद जड़ में मछली और बकरी का खून डाला गया लेकिन फल में मिठास नही आ सकी फिर उन्होंने अपने गुरु बृजनंदन मिसिर की सलाह पर घर में सोमरस निर्माण शुरू किया। एक बहुत बड़े घड़े में अंगूरों को कुचल कर 20 दिन तक ज़मीन में गाड़ दिया गया उसके बाद किसी होटल से 22 लीटर वाला कुकर किराये पर लेकर सीटी की जगह पाइप लगाकर उसे भैंस के नाद के पानी में से घुमाते हुए आसवन प्रक्रिया शुरू हुई। उच्च कोटि की व्हाइट वाइन बनी। दोस्तों ने भी बहुत वाहवाही की और गुरु ने भी अपनी मदिरा ज्ञान का बढ़ चढ़कर प्रदर्शन किया लेकिन दूसरे साल सोमरस निर्माण के समय एक पड़ोसी ने पुलिस को ख़बर कर दी जिससे कुछ महीने पहले ही नाली विवाद हुआ था। मामाजी तथा उनके गुरु मिसिर जी को पुलिस उठा ले गई। बड़ी मेहनत के बाद कुंदन जी ने किसी तरह उन्हें मुक्त कराया।इस चेतावनी के साथ कि आगे से ऐसा नहीं करेंगे।

लेकिन हरिवंश राय बच्चन ने  जब लिख दिया :-किंतु न भूला मर करके भी पीने वाला मधुशाला है तो फिर उनके मामा कहा मानते?

तीसरे साल किसी कच्ची शराब उतारने वाले बंदे से साठगांठ कर इलाके के चौकी इंचार्ज को एक बोतल पेश किया और दरोगाजी स्वाद के मुरीद हो गए और सोमरस निर्माण प्रक्रिया आरंभ हो गई।

पड़ोसी ने दोबारा फ़ोन किया और पुलिस का जवाब आया:-

कबे …..ड़ी के यादव जी दवा बना रहे हैं तो तुमको का दिक्कत है? तुम्हारी बहन बेटी तो नहीं भगा रहे हैं न तो चुप चाप बैठो अपने से मतलब रखो।

और छठे साल भी सोमरस निर्माण जारी है।

जोर का ठहाका लगा और डब्लू चौबे जी ने हसते हुए कहा कि “जब अहीर अउर बाभन मिलकर कउनो काम करीहन त इहे होइ। बभने क बात अगर अहीर मान ले त वाइन का कुच्छौ हो सकेला”। दिव्य नाश्ता करने के बाद सब अपने अपने फोन पर लग गए। मैं बगल के दूसरे खाली पड़े कूपे में जाकर अकेले बैठ गया और खिड़की से बाहर मनोहरी दृश्य का आनंद लेने लगा।

कोंकण रेल के सफर के दौरान रेल की खिड़की से नदियां, पहाड़ और हरियाली देखते देखते आपकी आंखे थक जाएंगी लेकिन नजारे खत्म होने का नाम नहीं लेंगे।

रेल एक सुरंग में घुसती है, निकलने के बाद दूसरे सुरंग में घुस जाती है। पहाड़ों को काटकर कोंकण रेल के लिए रास्ते बनाए गए हैं। एक तरफ ऊंचे पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई।

लगभग दो घंटे तक अकेले बैठकर प्रकृति की खूबसूरत वादियों को निहारता रहा। बीच-बीच में परिवार की बहुत याद आ रही थी। इस बार गर्मी की छुट्टियों लोकसभा चुनाव के कारण बेटे को कहीं घुमा नही पाया। बेटा बड़ा हो गया है, एक दो साल में उसकी अपनी दुनिया होगी, अपने मित्र होंगे, वगैरा-वगैरा। यह राजनीति का कीड़ा अजीब है यहां तरक्की हासिल करना समुद्र में मोती ढूंढने के बराबर है। तभी पैंट्री के लड़के ने दरवाजा को नाक किया और बोला सर भोजन तैयार है, सब लोग आपका इंतजार कर रहे हैं। चौबीस घंटे से लगातार कुछ न कुछ खाने की वजह से पेट तो भरा था परंतु सब के सम्मान में खाना जरूरी था। भोजन हो गया और अब महाराष्ट्र की सीमा भी समाप्त होने को थी। सावंतवाड़ी रेलवे स्टेशन महाराष्ट्र का अंतिम छोर है उसके बाद रेल गोवा में प्रवेश कर जाती हैं।

कोंकण रेल गोवा का बड़ा इलाका तय करते हुए आगे बढ़ती है। रास्ते में काफी दूर तक एक तरफ गोवा का समंदर दिखाई देता है।

देश के पश्चिमी तट पर 760 किलोमीटर का सफर कराती है कोंकण रेल। गोवा में कोंकण रेल 105 किलोमीटर का सफर करती है जिसमें जुआरी नदी पर बना पुल अद्भुत है। कोंकण रेल मार्ग पर कारबुडे सुरंग सबसे लंबी है। ये 6.5 किलोमीटर लंबाई की है। ट्रेन को 30 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से इस सुरंग को पार करने में 12 मिनट से ज्यादा वक्त लग जाता है।

शाम 4:00 बजे हम लोग का मडगांव पहुचना हो गया। ट्रेन रुकी और हम लोग नीचे उतर गए। मडगांव स्टेशन को देखते ही पुरानी यादें ताजा हो गई। इससे पहले मैं 2003 में गोवा घूमने आया था और मडगांव के पास एक रिसॉर्ट में ठहरा था।

मडगांव दक्षिण गोवा में एक छोटी सी बस्ती है, जो एक किलोमीटर के दायरे में होते हुए बहुत ही आकर्षक जगह है। इस जगह से दक्षिण गोवा के कई महत्त्वपूर्ण  समुद्र तट निकट हैं जिस वजह से यहाँ पर्यटकों की भारी आमद रहती है। प्रसिद्ध चर्चों और मंदिरों के अलावा एक बात और है जो इस जगह को विशेष दर्जा देती है।

मडगांव,बेनौलिम कोल्वा, वर्का बैतूल और मजोरदा जैसे मनमोहक बीचों से ज्यादा दूर नहीं है इस कारण, इन स्थानों से यहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है। अगर आपको  ताजा और प्रामाणिक  सी फ़ूड खाना है तो आप मडगाव की यात्रा जरूर करें।

अभी मडगांव की यादों में खोया ही था कि पीछे से संतोष गुरु ने आवाज लगाई, “का गुरु गोआ आ गयल पता करा फेंनी कहाँ मिली”। हम ने जवाब दिया ई ट्रैन हौ अस्सी घाट के पप्पू क दुकान नाही, इहा दसये मिनट रुकी, फेंनी अगले दांयी। ट्रेन में चलने का सिग्नल दिया और हम लोग दौड़कर वापस ट्रेन में चढ़ गए।

शाम का वक्त हो चला था हल्का हल्का अंधेरा हो रहा था सूरज ढलने को था हम लोग गोवा की सीमा को पार कर कर्नाटक में प्रवेश करने वाले थे। अब सुंदर वादियों, पहाड़ों,नदियों, झील और झरनों की गहराई को नापने का वक्त हो चला था। तभी डब्लू चौबे ने कॉल बेल बजा कर अटेंडेंट को बुलाया और कहा जरा पैंट्री वाले से बोल दो की सोडा, गिलास और नमकीन की व्यवस्था करें। महफिल जमने के बाद उडुपी और मंगलोर स्टेशन आए और चले गए। कोई नीचे नहीं उतरा क्योंकि लगातार बारिश जारी थी।

केरल: प्रकृति की गोद में

            सुबह अचानक ट्रेन के ब्रेक से आवाज द्वारा नींद खुली तो देखा कि गाड़ी मरारीकुलम स्टेशन पर खड़ी है और धीमी धीमी बरसात हो रही है। लगातार बरसात के चलते प्लेटफार्म और अगल-बगल के घर-बार आदि एक हरीतिमा से ढंक गए हैं। इसके साथ साथ यह देखने में बड़ा मनोहारी लगा कि छोटे से मकान में भी अगल-बगल की जमीन छोड़ दी गई है और यथासंभव ढेर सारे वृक्ष लगाए गए हैं। प्रकृति से ऐसा नाता भारत के अन्य किसी कोने में शायद ही देखने को मिले जो कि केरल में देखने को मिलता है । हर तरफ हरियाली ही हरियाली, उसके बीच से गुजरती नदियां बैक वाटर और किट्टूवलम नावें जिसके साथ साथ सुबह-सुबह लूंगी लपेटे हुए हमारे मलयाली भाई अपने आप में जैसे कि सादगी की प्रतिमूर्ति प्रतीत हो रहे थे।

          यद्यपि राजधानी एक्सप्रेस थी लेकिन एर्नाकुलम बीतने के बाद से लगभग हर मुख्य स्टेशन पर ट्रेन खड़ी हो जाती थी। कोंकण रेलवे के बाद इतना ही अंतर था कि पठारी इलाके से रेलगाड़ी मैदानी इलाके में चलने लगी थी। एक एक करके आ रहे थे स्टेशन आ रहे थे लेकिन हरियाली सब जगह उतनी ही थी जितनी पनवेल के बाद शुरू हुई थी। मिट्टी का कोई टुकड़ा ऐसा नहीं था जिस पर वनस्पति ना हो और जहां वनस्पति नहीं वहां पानी ही पानी। खैर रुकते रुकते और हम सभी की इच्छा पुनः स्नान करने की हुई।

            रेलगाड़ी लगभग 2 घंटे लेट हो चली थी तभी पता चला कि बाथरूम का शावर अभी भी ठीक नही हुआ है। हमने शिकायत पुस्तिका मांगी तो अटेंडेंट ने थोड़ी लापरवाही दिखाई उसके बाद कड़क स्वर में हम में से किसी ने टीटी को बुलाया और दार्शनिक की मुद्रा में बैठे हुए श्रुति प्रकाश द्विवेदी की ओर इशारा करते हुए कहा कि  विधायक जी कंप्लेंट बुक मांग रहे हैं और लापरवाही कर रहे हो तुम लोग, तो जान लो कि दिल्ली पहुंच कर यह जो हंगामा करेंगे तुम लोगो की नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। इसी के साथ कुंदन जी ने अपना परिचय पत्र दिखाते हुए कहा कि मैं विधायक जी का सुरक्षा अधिकारी हूं और मेरे रैंक का अधिकारी जब उनकी सुरक्षा में तैनात है तो समझ लो कि विधायक जी की क्या हस्ती हो सकती है?

        इसके बाद टीटी तो चींटी हो गया और अन्य सभी स्टाफ न सिर्फ कंप्लेंट बुक ले आए बल्कि हाथ जोड़कर सामने खड़े हो गए और त्राहिमाम मुद्रा में विनती करने लगे। श्रुति प्रकाश भी कुछ देर के लिए किसी दबंग विधायक की भूमिका को जीते हुए उन सब पर बरस पड़े। किसी प्रकार डब्लू और संतोष शुक्ल ने बीच बचाव  करते हुए विधायक जी से रहम की अपील की और उन कर्मियों को इशारा किया कि साले माफी मांग लो नहीं तो सस्पेंड हो जाओगे। टीटी के अलावा अन्य श्रुति प्रकाश जी के चरणों पर गिर पड़े। विधायक जी ने भी उदारता दिखाते हुए कड़ी चेतावनी दिया और बोल दिया कि अगली बार बख्शूंगा नहीं। इससे फायदा यह हुआ कि पर्याप्त मात्रा में नाश्ता और जूस के साथ साथ तय सीमा से अधिक पानी की बोतलों को हमारे केबिन में भर दिया गया।

            लगभग 9:25 पर त्रिवेंद्रम राजधानी स्टेशन पर खड़ी हुई हम सभी उतरकर डिब्बे के साथ और प्लेटफॉर्म के बोर्ड के साथ तस्वीरें लेने लगे। तस्वीरें लेते वक्त डब्लू चौबे ने बोर्ड की ओर इशारा करते हुए कहा की, “लगत हव अभी नशा  ठीक से उतरल नाही, बोर्ड पर लिखल टेढ़ मेड़ लउकत हव ” हमने बताया कि नशा नहीं वो मलयालम भाषा है। मलयालम भाषा देखने में बड़ी सुंदर व अजीब कलात्मक  लगती है।  लगता है जैसे मधुर मिलन के झुग्गन साव जलेबी छान कर दीवाल पर चिपका दिए हो।

            हमें लेने के लिए जो वाहन आया था उसका ड्राइवर भी मिल गया। फिर हम होटल लीला कोवलम की तरफ रवाना हुए। कोवलम के लीला कैंपस में पहुंचते ही पहली बार ऐसा लगा कि प्राकृतिक सौंदर्य विलासिता पर भारी पड़ रहा है। दो दिन की रेल यात्रा की थकान के बाद सभी नहा धोकर तरोताजा हो गए और दोपहर के भोजन के लिए रेस्टोरेंट में चले गए जहां से के तीनों तरफ अरब सागर नजर आता था यद्यपि खिड़कियां बंद होने के कारण समुद्र की गर्जना सुनाई नहीं दे रही थी लेकिन चट्टानों से टकराती हुई तेज धाराएं जैसे दूधिया फेन पैदा कर रही थी उनसे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि समुद्र मंथन की प्रक्रिया जारी है और कुछ ही देर में 14 रतन निकलने लगेंगे। भोजन के बाद हम लोग अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए और तय हुआ की शाम को कोवलम बीच पर चलेंगे।

कोवलम तट

            हम केरल के कोवलम तट पर हैं। मॉनसून हमसे लगभग 28 रोज़ पहले यहां पहुंच चुका था। दक्षिण-पूर्व में कोवलम तट देश के सबसे सुंदर समुद्र तटों में से एक है। यह मॉनसून का सिंहद्वार है। यहीं से भारत में मॉनसून का प्रवेश होता है। कालीदास का मेघदूत भी यहीं से चला था। रघुवंश में जिसे ‘नैरुत्य मारुत’ कहा गया है। होटल के जिस कमरे में हम ठहरे हैं, उसकी बाल्कनी से समुद्र टकराता है। ऐसा लगता है हम होटल में नहीं बल्कि जहाज़ में हैं। शाम को समुद्र के किनारे था। इस अद्भुत सौंदर्य को देखकर अहसास हुआ जीवन में हम क्या पा रहे हैं। क्या छोड़ रहे हैं। वो ग़ज़ल याद आयी – ज़रा पाने की चाहत में/ बहुत कुछ छूट जाता है/नदी का साथ देता हूं/समंदर रूठ जाता है…

            आज दोपहर का अनुभव अपने आप में अनूठा रहा। संकट भी था। चले गए केरल का मशहूर मसाज कराने के लिए। यह पैरों से किया जाने वाला अनूठा फ़ुल बॉडी मसाज है। उसके बाद शिरोधारा। दो घंटे की इस मालिश में चार लीटर तेल ख़र्च हुआ। यह तेल आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों में पका था। चार लीटर तेल एक परिवार के भोजन में महीनेभर में ख़र्च होता है। तीन लीटर तेल तो शिरोधारा में सिर के ऊपर टपका दिया गया।

अब ख़ास बात… मसाज के पहले मुझे काग़ज़ का एक अंडरवियर पहनने को दिया गया। लंगोटनुमा इस अंडरवियर को पहनना किसी के लिए मुश्किल हो सकता है। पर बनारस में मेरे मोहल्ले के कल्लू पहलवान सरकारी नल पर लंगोट बांधते हैं , इसलिए ये मेरे लिए आसान हो गया। जैसे-तैसे बांधा लेकिन हर वक़्त इसके फट जाने का डर बना रहा। भाई लोग मेरी मालिश कर रहे थे और मैं लंगोट के फट जाने की आशंका में डूबा रहा। लगा कि जैसे मर्यादा अब गई, तब गई। पर बच गया। पूरा वक़्त इज़्ज़त जाने के डर में बीत गया। ये ख़तरा भी मैंने सहज जिज्ञासावश ले लिया था कि देखूं इस मसाज में आख़िर होता क्या है? हर यथार्थ को जानने के लिए उसे भोगना ठीक नहीं है।

            पिछले दो दिनों से एक साथ छान फूक कर जीने-मरने की कसमें खाने वाले भाई लोग शाम की व्यवस्था के लिए दोपहर में ही निकल पड़े। मसाज खत्म होने तक भी वापस नहीं लौटे तो चिंता हुई। फोन किया तो पता लगा बगल के मधुशाला में बैठे, “जौ के रस” का आनंद ले रहे थे। मैंने पूछा, “का यार कम से कम शाम त हो जाये देता, तो जवाब आया हमने क गलती ना हव , ई सरवा छवे बजे तक हैप्पी ऑवर रखले हव , कहत हई की तनी समइया  आउर बढ़ा दे पर मनते ना रहल ओही  से मजबूरी में दिनही लगावे के पड़ल”।

          पता पूछ कर वहां पहुंचा तो देखा अड़ी के सदस्य कम है। मेरे पहुँचने के बीस मिनट बाद श्रुति प्रकाश जी भी वहां पहुचे। थोड़ा गुस्से में लग रहे थे। मैंने पूछा मित्र कहां थे, उन्होंने घूरती आंखों से मेरी तरफ देखा और कहा, “गयल रहली प्रिया प्रकाश वारियरवा के खोजे, दूसरे मित्र ने तपाक से दूसरा प्रश्न दागा, “का भयल मिलल” तो फिर उधर से जवाब आया “नाही शशि थरूरवा के साथे डेट पर गइल हव। कल भेट करे बदे कहले हौ”। जब नाराजगी की छानबीन हुई तो पता चला कि केरल राज्य में पान मसाला और गुटखा प्रतिबंधित है। समस्या प्रतिबंध से नहीं समस्या गुरु के सुबह निपटने की थी। हाजिर जवाबी में बनारसीओं का कोई मुकाबला नहीं।

            मलयाली अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वॉरियर फिल्मी दुनिया का एक ऐसा नाम है जिसने रातों रात करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना लिया। जिस वीडियो के दम पर प्रिया की सिर्फ एक रात में कई मिलियन फैन बने उसमें उनकी आंखों का जादू है। लोग ऐसा दावा करते हैं कि मलयालियों जैसी नशीली और खूबसूरत आखें और कहीं नहीं।

            केरल का चरित्र अजब है। ये सिर्फ़ मॉनसून के भारत में प्रवेश का सिंहद्वार नहीं है बल्कि यहूदी और मुसलमान भी इसी रास्ते से इस देश में आए थे। अजब राज्य है। कोई आए-जाए, इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता। 573 ईसापूर्व यहीं से यहूदी इस देश में दाखिल हुए। फिर मुसलमान इसी रास्ते से घुसे। 629 ईसवी में बनी देश की सबसे पुरानी मस्जिद की यहीं है। मुसलमानों के लिए सुविधा थी क्योंकि सागर के उस पार अरब है। बस समन्दर ही तो पार करना था। फ़िलहाल ये राज्य सारी दुनिया को पर्सनल असिस्टेंट और नर्स सप्लाई करता है।

आज की रात मनोहारी थी। हल्की भोजन के पश्चात देर रात तक समन्दर के सामने ही बैठा रहा। उसकी विशालता, अनंतता और सब कुछ समा लेने के सामर्थ्य के आगे मैं कुछ ही पलों में स्वयं को क्षुद्र महसूस कर रहा था। प्रकृति और उसकी नम्रता के समक्ष आत्मसमर्पण करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता। मनुष्य का सारा दंभ, घमंड कुछ ही पलों में ध्वस्त हो जाता है। समुद्र की विशालता और अपने अस्तित्व के लिए उसके संघर्ष से सीखने को जो मिलता है-

जीवन दर्शनशास्त्र की कुंजी सागर पास/ एक लहर विश्वास है एक लहर आभास..

पद्मनाभस्वामी मंदिर

            सुबह समुद्र तट का आनंद लेने के बाद हम पद्मनाभस्वामी मंदिर गए। पांच हज़ार साल पुराने इस मंदिर में विष्णु की लेटी हुई आदमक़द प्रतिमा है। प्रतिमा की बनावट अद्भुत है। आप को एक साथ पूरी प्रतिमा किसी भी हिस्से से दिखाई नहीं देगी। यह दुनिया का सबसे मालदार मंदिर है। मंदिर में प्रवेश हेतु पुरुषों को धोती और महिलाओं को साड़ी में दर्शन की परंपरा है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसका ख़ज़ाना खुला था। सिर्फ़ पांच कमरों से पचास हज़ार करोड़ का माल मिला था। अभी गिनती जारी है। ख़ज़ाने के तीन कमरे खुलने अभी बाक़ी हैं। मौजूदा मंदिर 17वीं शताब्दी में राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया था। इनकी पांचवीं पीढ़ी में मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा थे। श्रीमद्भागवत समेत कई पुराणों में इस मंदिर का ज़िक्र हुआ है। भागवत में कहा गया है कि बलराम यहां आए थे।

            मंदिर में दर्शन की व्यवस्था मित्र कुंदन जी देख रहे थे। कुंदन भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं और बनारस के रहने वाले हैं। मंदिर के व्यवस्थापक द्वारा हमें दिव्य दर्शन कराए गए। हम मंदिर में उनके अतिथि थे। इन्हीं पद्मनाभानन्त के नाम पर इस शहर का नाम तिरुवनन्तपुर है। सब भगवान की माया है। हम सेवक हैं। दर्शन पूजन का कार्य सकुशल संपन्न कर हम वापस होटल पहुचे और वहाँ नाश्ते के पश्चात कन्याकुमारी के लिए निकल पड़े।

कन्याकुमारी

            तिरुवंतपुरम से कन्याकुमारी की दूरी मात्रा 90 किलोमीटर है। आगे की यात्रा सड़क मार्ग से थी इसलिए मदुरई निवासी मित्र राकेश जी का सहयोग लिया। उनसे गाड़ी मंगा ली थी। वैसे त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी जाने के लिए बहुत सारी प्राइवेट और सरकारी बसे भी उपलब्ध रहती है।अब ड्राइवर रेनो समेत हम छ लोग थे। रेनो स्थानीय तमिल था और उसे आसपास की अच्छी जानकारी थी। तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में यात्राओं के दौरान भाषाई दिक्कत रहती है।  मलयाली वास्तुशिल्प के अनुसार बने हुए मकानों को देखते हुए हमने पुअर बीच पर पीले हो चुके नारियल के पानी का स्वाद लिया।  लोगों ने बताया कि इसमें विटामिन ज़्यादा होता है और इसके साथ ही डब्लू जी की नजर सामने दुकान पर लटके हुए विभिन्न प्रकार के केलों पर गई  जिसमें कि लाल वाला केला सभी को बड़ा आकर्षक और नया प्रतीत हुआ।

          कुछ और दक्षिण जाकर पश्चिमी घाट का अंतिम छोर दिखने लगता है जहाँ से अनाइमुडी पहाड़ी की झलक मिलती है जो कि दक्षिण भारत की सबसे ऊँची चोटी और पर्वतशिखर है । बीच में एक जगह चाय पीकर आधे घंटे बाद हमने देखा है कि कन्याकुमारी जनपद की सीमा शुरू हो गई है और अचानक हम तमिलनाडु में प्रवेश कर रहे हैं इस तरह का प्रांतीय विभाजन पहले कभी नहीं देखा था जहाँ पर प्रांतीय विभाजन का बोर्ड लगा रहा था उस सीमा रेखा परऐसा लग रहा था जैसे किसी गाँव के बीचों-बीच विभाजन रेखा खींच दी गई हो तो और अग़ल बग़ल के मकानों के मध्य दो राज्यों की दूरी आ गई हो।

                नागरकोइल पहुंचकर गोपी रेस्टोरेंट में सभी ने केले के पत्ते पर तमिल स्टाइल का मील यानी दोपहर का खाना ऑर्डर किया । हमलोगों ने तमिल भोजन का भरपूर आनंद लिया। यहां के खानपान की संस्कृति कुछ अलग सी है यानी डोसा, इडली, सांभर के अलावा चावल से बने व्यंजन। दही, नारियल, इमली और टमाटर के साथ बनाया गया चावल आमतौर पर यहां के मेन्यू में मिल जाता है। खास बात ये है कि अगर आप यहां के सारे व्‍यंजनों का मजा लेना चाहते हैं तो होटल में बस ‘सप्पाडु’ का ऑर्डर दे दें। ‘सप्पाडु’ केले के पत्ते पर कई व्यंजनों वाली खास दक्षिण भारतीय थाली है, जिसमें व्यंजनों की पूरी श्रंखला मौजूद होती है।दोपहर के भोजन के बाद यात्रा पुनः प्रारम्भ हुई और हम लोग शाम चार बजे कन्याकुमारी पहुँच गए। इसके आधे घंटे बाद हम कन्याकुमारी पहुँचे जहाँ पर सीमा शुल्क निवारक गेस्ट हाउस में इंस्पेक्टर नागराजन ने हमारा स्वागत किया और पहले से बुक दोनों सुइट के ताले खोल दिए।

            शाम की चाय के बाद सूर्यास्त देखने के लिए इंस्पेक्टर नागराजन एस्कॉर्ट करते हुए हमें सनसेट बीच ले गए और फिर घंटे भर बाद हम लोग गांधी दर्शन आ गए।  कन्याकुमारी अपने सनराइज और सनसेट के लिए मशहूर है। अरब सागर में डूबते सूरज को देखना बहुत ही मनोहारी होता है। वैसे मेरी दिलचस्पी सनराइज और सनसेट में बिल्कुल नहीं। जिस तरह किसी टाइगर रिजॉर्ट में बाघ देखने को नहीं मिलते ठीक वैसे ही सूर्यास्त और सूर्योदय के समय बादल अड़ंगा लगा देता है। पहाड़ों पर लवर प्वाइंट और सुसाइडल प्वाइंट देखते देखते बोर हो चुका हूं। इस बार भी सब को मायूसी मिली। सब ने मिलकर तय किया कि अब सनराइज गेस्ट हाउस की छत से ही देख लेंगे।

                महात्मा गांधी को समर्पित इस स्मारक का निर्माण 1956 में हुआ था। महात्मा गांधी की चिता की राख जिस जगह रखी गई थी, उसी जगह पर स्मारक का निर्माण किया गया है। इसके बराबर में ही कामराजर मनिमंडपम है। के कामराज को कौन नहीं जानता? यह कामराजर मनिमंडपम पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष तथा तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री श्री कामराज को समर्पित है। वह लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे और तमिलनाडु के विकास के लिए कई योजनाएं लागू कीं। उनको ‘ब्लैक गांधी’ भी कहा जाता था। इनकी दर्शन के बाद हम त्रिवेणी बीच की ओर बढ़े और वहीं से विवेकानंद शिला की तस्वीरें खींचकर तथा समुद्र में हाथ पैर भिगोकर हम गेस्ट हाउस वापस आ गए।डिनर के बाद विधायक जी को कुछ मीठा खाने का मन हुआ। राम भंडार बनारस की राधा प्रिय कोवलम में समाप्त हो चुकी थी और संतोष जी की पत्नी द्वारा बनाया गया मूँग का लड्डू भी सबने उदरस्थ कर लिया था। स्थानीय रूप से उपलब्ध मिठाइयों में मैसूरपा ही सबसे उत्तम मिठाई है इसलिए स्टेशन के पास जाकर आधा किलो मैसूरपा  ख़रीदा गया और विधायक ज़ी ने भोग लगाया।इसके बाद गेस्ट हाउस लौटकर समुद्र की सरसराती हवा में हमने कुछ देर सैर की और फिर सोने के लिए चले गए।

            जैसा कि कल बता दिया गया था जल्दी उठने की कोशिश करनी है क्योंकि सीमा शुल्क गैस्टहाउस कन्याकुमारी की छत पर से ही साफ़ साफ़ सूर्योदय दिखाई देता है।हम सभी पौने 6 बजे तक ऊपर पहुँच गये अवामी काफ़ी ठंड थी जिससे की कँपकपी हो रही थी क़रीब कुछ देर बाद सूर्यदेव निकले । इंस्पेक्टर नागराजन ने ठीक सात बजे छत पर हमें चाय पिलवाई और फिर हम नीचे आकर कन्याकुमारी माता के दर्शन हेतु तैयार होने लगे। इसे कुमारी अम्मन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। कन्याकुमारी मंदिर देवी कुमारी अम्मन को समर्पित है। मंदिर का बड़ा धार्मिक महत्व है। हजारों लोग देवी का आशीर्वाद लेने और उनको श्रद्धा अर्पित करने के लिए यहां आते हैं। यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत की भांति सुनाई देती है।मंदिर बहुत पुराना है जिसका पूर्वी द्वार अक्सर बंद रहा करता है क्योंकि माता की लौंग में जड़े हीरे की चमक से आने जाने वाले जहाज़ रास्ता भटक जाया करते थे। मंदिर के दर्शन के बाद हम सभी गेस्ट हाउस लौटे और नाश्ता करने के बाद विवेकानंद शिला के लिए कन्याकुमारी जेटी की ओर बढ़ गए।इंस्पेक्टर नागराजन की कारण हमें पर्यटकों की लंबी पंक्ति में नहीं लगाना पड़ा और हर जगह विशेष सुविधा का लाभ मिला।

            कन्याकुमारी अद्भुत जगह है। इसका जो धार्मिक महत्व है वो तो अपनी जगह है। पर यहां एक पाइंट ऐसा है जहां तीन महासागर मिलते हैं। हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी। तीन नदियों का मिलन प्रयाग में तो है जहां सरस्वती लुप्त है लेकिन तीन समुद्र का मिलन ग़ज़ब है। भारतभूमि जहां ख़त्म होती है। उसके बाद सागर और उस सागर में एक शिला है जहां स्वामी विवेकानंद ने 24 से 27 दिसम्बर 1892 तक तपस्या की थी। भारत यात्रा के दौरान  उन्हें यहीं जीवन का मकसद मिला था। विश्व बंधुत्व का। जिसे उन्होंने अगले साल 1893 में शिकागो से फैलाया। उसी शिला पर कुछ देर मैं बैठा था। मुझे कोई जुंबिश नहीं हुई। अपने झंडू होने का अहसास ज़रूर हुआ। मामला शिला का नहीं बल्कि आत्मज्ञान का है। इसी शिला पर शिव से विवाह के लिए पार्वती ने तपस्या की थी। उनके चरणचिन्ह मौजूद हैं। इस रॉक मेमोरियल का निर्माण 1970 में हुआ था। दक्षिण भारत में वास्तुकला का यह एक नायाब नमूना है। रॉक आइलैंड पर स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल को स्वामी विवेकानंद के सम्मान में बनाया गया था। बड़ी संख्या में पर्यटक इसे देखने आते हैं। यहां स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा स्थापित है।प्रतिमा की फ़ोटो लेने की मनाही है और इसकी नीचे एक ध्यान कक्ष है। हम सभी ध्यान के लिए घुसे लेकिन अपानवायु व कार्बन डाइऑक्साइड की प्रचुर मात्रा ने हमें तुरंत बाहर निकलने को विवश कर दिया। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के द्वारा 90, हज़ार गैलन बरसाती पानी सुरक्षित रखने का एक कुंड भी बना हुआ है जो कि हमें जल बचाने की प्रेरणा देता है।विवेकानंद शिला से ही हमें पूरा कन्याकुमारी दिखाई दे रहा था ख़ासकर के पद्मानभपुरम महल।

            वेल्ली हिल्स की तलहटी में स्थित यह एक सुंदर महल है। महल को त्रावणकोर के राजा ने ग्रैनाइट से बनवाया है। महल 4 किलोमीटर में फैला हुआ है। इसके साथ ही अवर लेडी ऑफ रैनसम चर्चका पिछला हिस्सा दिख रहा था।

            अवर लेडी ऑफ रैनसम चर्च को मदर मैरी की याद में बनवाया गया था। इसका निर्माण 15वीं सदी में हुआ था। कन्याकुमारी के शानदार पर्यटन स्थलों में यह भी एक है। चर्च के सेंट्रल टावर पर गोल्ड क्रॉस है।शिला की बायीं तरफ़ एक स्मारक नज़र आ रहा था जिसके बारे में इंस्पेक्टर नागराजन ने बताया कि वह सुनामी स्मारक है। 2004 में सूनामी ने भारत के कई तटीय शहरों में तबाही मचाई। बड़ी संख्या में जान और माल का नुकसान हुआ था। सूनामी स्मारक उन लोगों की याद में बनाया गया है जिनलोगों को विनाशकारी आपदा के दौरान अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा।

रामेश्वरम 

             कन्याकुमारी थोड़ा समय कन्याकुमारी में गुजारने के बाद हम लोग रामेश्वरम के लिए निकल पड़े। कन्याकुमारी से रामेश्वरम की दूरी लगभग 310 किलोमीटर है। हमें रामेश्वरम पहुंचने में कुल 5 घंटे लगेंगे। यात्रा के दौरान हमें खेतों में ढेर सारा नमक देखने को मिला। नमक समुद्र के पानी को सुखाकर बनाया जाता है। रास्ते में दोनों तरफ़ नमक ही नमक बन रहा था। यह एक नया रास्ता था जोकि रामेश्वरम के लिए सीधे जाता था। यात्रा के दौरान हमारे ड्राइवर ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी। उसने बताया कि मशहूर फिल्म अभिनेता कमल हसन इसी जिले रामानथपुरम के मूल निवासी है और उसने दूर मुंबई के माफिया डॉन हाजी मस्तान का गांव किल्लुकडक्कु भी दिखाया। हमारे विधायक जी उर्फ श्रुति प्रकाश द्विवेदी रास्ते में गाड़ी रुकवाकर एक जगह उतरे और दांडी मार्च वाली गांधीजी की मुद्रा में मुट्ठी भर नमक उठाया कुछ देर तक उसे देखा और फिर एक पुड़िया बनाकर जेब में रख लिया ।

         विधायक जी हाजी मस्तान के गाँव की पुण्य मिट्टी का दर्शन करना चाहते थे लेकिन अन्य सभी ने अपनी अनिच्छा ज़ाहिर कर दी इसलिए उन्हें मन मसोस कर रहना पड़ा।उन्होने हाजी मस्तान के उजले पक्षों की व्याख्या भी की। और यह भी बताया कि इंदिरा गाँधी भी हाजी मस्तान से डरती थी।रास्ते में कोई अच्छा रेस्टोरेंट न होने का दर्द विधायक जी के चेहरे पर साफ़ झलक रहा था।चर्चा के दौरान इत्तेफ़ाक़ से वहाँ के कलेक्टर वी राघवराव का भी नाम आया जो कुंदन जी के बैचमेट निकले।  रामेश्वरम जिला रामनाथपुरम की एक तहसील है। कुंदन जी ने कलेक्टर को फोन किया तो उन्होंने  अपने दफ्तर में आमंत्रित कर सभी को दिव्य भोजन कराया और साथ ही अपने तहसीलदार को बुलाकर हमारे वीआईपी दर्शन की जिम्मेदारी सौंपी। विदा करते वक्त कलेक्टर ने कुंदन जी को एक बड़ा शंख उपहार स्वरूप भेंट किया। सब महादेव की कृपा थी अब हम राज्य के अतिथि थे।

            एक घंटे बाद हम रामेश्वरम पहुंच गए। वहां हम लोगों के ठहरने का प्रबंध तहसीलदार महोदय ने सर्किट हाउस में कर दिया। सर्किट हाउस बिल्कुल समुद्र तट पर है। यहाँ समुद्र चंचल नही बल्कि शांत दिखा। सर्किट हाउस में हम लोग तैयार हो कर धनुष्कोडी देखने निकले। धनुषकोडी रामेश्वरम से 26 किलोमीटर की दूरी पर है। धनुष्कोड़ी कभी पर्यटन स्थल एवं व्यापार के केंद्र के लिए जाना जाता था। साठ के दशक में आए भयानक तूफान ने इस शहर को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। इसे घोस्ट सिटी भी कहते हैं। भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण यहीं करवाया था, जिसपर चढ़कर सेना लंका पहुंची व वहां विजय पाई। बाद में राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोडी नामक सेतु तोड़ दिया था। बहत पहले यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि के साथ जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने इस मिलाने वाली कड़ी को काट डाला, जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया। यहां पर स्नान करना पवित्र माना जाता है। भारत की सीमाएं यहां समाप्त हो जाती हैं।सूर्यास्त के बाद हम वहां से वापस सर्किट हाउस चले आए। तहसीलदार ने हमें सुबह 5:30 बजे दर्शन के लिए तैयार रहने को कहा।

            आज का दिन कुछ विशेष था। बाबा की कृपा से ही दक्षिण की यात्रा का संयोग बना। एक और मनोकामना पूर्ण होने वाली थी। रामेश्वरम चार धामों में से एक धाम है। हमें देश के सबसे दक्षिण में स्थित बाबा भोलेनाथ के एक और ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होने वाला था। वो गंगाजल जिसे हम काशी से लेकर चले और लगभग साढे चार हज़ार किलोमीटर सुरक्षित सजों कर लाए थे, बाबा को समर्पित करेंगे। रामेश्वरम को दक्षिण भारत का काशी माना जाता है। ऐसी धारणा है कि जो व्यक्ति गंगाजल से रामेश्वर शिवलिंग का सच्चे दिल से भक्ति पूर्वक अभिषेक और आराधना करेगा वह मोक्ष को प्राप्त होगा।

            रामेश्वरम का शिवलिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है। लंका पर चढ़ाई करने से पहले राम ने यही शिव की पूजा की थी। कहते है यह मंदिर उन्ही के द्वारा स्थापित है।

            शिव भी कितने गुट निरपेक्ष देवता है कि युद्ध से पहले राम और रावण उन्ही की पूजा कर रहे थे।*

सुबह ठीक 5:30 बजे दर्शन कराने हेतु वहां के एक स्थानीय इंस्पेक्टर हमें लेने पहुंचे वह हमें सीधा अग्नितीर्थम ले गए।कहते हैं कि भगवान् श्री राम और वानरी सेना को लंका जाने के लिए कोई मार्ग नहीं मिला तो भगवान राम ने अपने अग्निवाण से समुद्र को ही सूखा डालने के लिए जैसे ही अपना धनुष उठाया तो समुद्र देवता ने लंका पहुंचने का तरीका बताया और उसी दिन से यहाँ समुद्र बिलकुल शांत स्थिति में है और अग्निवाण का प्रयोग करने के कारण इस स्थान का नाम अग्नितीर्थम पड़ा।  यहाँ स्नान करने के पश्चात हम मंदिर के पूर्वी दरवाजे के पास पहुंच गए। काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह यहां भी मोबाइल, कैमरा, पेन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं मंदिर प्रांगण में ले जाना प्रतिबंधित है। इस तरह की सभी उपकरण हम लोगों ने साथ में आए इंस्पेक्टर साहब को सौंप दिया और वहां के पुजारी जी हमें मंदिर प्रांगण के अंदर कुंड स्नान कराने लेकर गए।

            रामेश्वरम और इसके आसपास 64 तीर्थ (कुएं) हैं और कई छोटे-छोटे मंदिर हैं- स्कंद पुराण के अनुसार, इनमे से 24 ही महत्वपूर्ण तीर्थ है। रामेश्वरम के इन तीर्थो में नहाना शुभ माना जाता है। मंदिर के पहले और सबसे मुख्य तीर्थ (कुएं) को अग्नि तीर्थं नाम दिया गया है। 24 में से 2 तीर्थ (कुएं) सूख गए हैं और अब 22 बचे हैं। ऐसी मान्यता है कि इन कुओं के जल से स्नान करने पर व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। यहां का जल मीठा होने से श्रद्धालु इसे पीते भी हैं। मंदिर-परिसर के ये कुएं भगवान श्रीराम ने अपने अमोघ बाणों के द्वारा तैयार किये थे। उन्होंने अनेक तीर्थो का जल मंगाकर उन कुओं में छोड़ा था, जिसके कारण उन कुओं को आज भी तीर्थ कहा जाता है। कुछ कुएं मंदिर के बाहर भी हैं लेकिन उनका जल खारा है।

             सभी कुंडों में स्नान के पश्चात हम लोगो ने पहले गीले वस्र बदले फिर मुख्य मंदिर में प्रवेश किया। भीतर का दृश्य अद्भुत था। यहां बड़े बड़े पत्थर के सैकड़ो स्तंभ और उस पर देवी देवता के  शिल्प बने है। भारतीय वास्तु कला का शानदार नमूना यहाँ देखने को मिलेगा। यहाँ दो शिव लिंग स्थापित है। हनुमानजी द्वारा कैलास पर्वत से लाया शिव लिंग ओर सीता माता द्वारा निर्मित रेत का शिव लिंग। सबसे पहले हनुमानजी द्वारा लाये शिव लिंग का दर्शन करना होता है। श्री राम ने हनुमाजी को वरदान दिया था।हनुमानजी द्वारा लाये शिव लिंग का दर्शन करने के बाद ही सीता माता द्वारा निर्मित शिव लिंग का दर्शन करने से ही रामेश्वरम की यात्रा पूर्ण होगी।

           विधि के अनुसार पहले हम लोगों ने काशी विश्वनाथ के दर्शन किए। अब बारी थी मुख्य मंदिर में दर्शन करने की। जब हम मुख्य मंदिर के पास पहुंचे तो आरती चल रही थी। पुजारी जी ने सारा इंतजाम पहले से कर रखा था उन्होंने हम सभी को गर्भगृह के ठीक सामने वाले दरवाजे पर बैठाया। यहां से शिवलिंग बिल्कुल साफ और स्पष्ट दिखाई दे रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम साक्षात ईश्वर के दर्शन कर रहे हैं। हम लोगों ने मंदिर के पुजारी जी को गंगाजल चढ़ाने हेतु दिया। काशी का नाम सुनकर पुजारी जी प्रसन्न दिखे उन्होंने पूरे गंगाजल को एक बड़े बर्तन में डाला और गर्भ गृह के भीतर जाकर “जैसे ही जलाभिषेक शुरू किया लगा जैसे पूरा ब्रह्मांड उतर कर शिव के चरणों को प्रणाम कर रहा है”। उस अनुभूति को शब्दों में बयां नहीं कर सकते। हम पांचों लोगों के मुख से एक साथ आवाज निकली “हर – हर महादेव !!!!!! उसके बाद यही जयकारा सबने मिलकर लगाया और पूरा मंदिर हर हर महादेव के नारों से गूंज उठा। ऐसा लगा जैसे पूरी काशी रामेश्वरम में उतर आई है। वर्षों की मनोकामना पूर्ण हुई।  एक बारगी तो ऐसा लगा कि महादेव ने हमारा लाया हुआ गंगाजल ग्रहण कर लिया हो। महादेव ने ऐसी अनुभूति पैदा की कि हम सभी रोमांचित हो उठे और भक्ति रस का गहन तम अनुभव इस प्रकार हुआ कि रोम रोम पुलकित हो उठा। भक्ति में ऐसे क्षण कम ही आते हैं जैसा अनुभव हमने किया । इसके बाद यह महसूस हुआ बाहर निकलकर कि यात्रा सफल हो गई है।

            मंदिर के भीतर और भी मंदिर है जैसे पार्वती माता मंदिर ,अम्बिका माता मंदिर , हनुमान मंदिर ,विसालाक्षी मंदिर आदि। सब के दर्शन पुजारी जी ने बारी-बारी से कराए।

            रामेश्वरम दर्शन पूजन के बाद हम वापस पहुँचे सर्किट हाउस और वहाँ पहले से मौजूद तहसीलदार महोदय हम सभी को लेकर दो निर्जन द्वीपों की तरफ़ बोटिंग के लिए चल दिए। रामनाथपुरम के कलेक्टर ने उन्हें बकायदा निर्देशित कर दिया था कि हमें कुछ निर्जन द्वीपों के बग़ल से गुज़रते हुए कोरल आदि के दर्शन कराने हैं। यदि कलेक्टर साहब का हुक्म न होता तो हम सभी उन द्वीपों के अग़ल बग़ल से कभी गुज़र न पाते। तहसीलदार महोदय ने वन विभाग के कर्मचारियों को बकायदा तैनात कर रखा था जिन्होंने हमें विभिन्न प्रकार की समुद्री जीव दूर से दिखाएं। चूंकि सुबह सात बजे तक समुद्र शांत होता है और जल अत्यंत पारदर्शी होने के कारण नाव पर से ही जलचर दर्शन हो जाते हैं अत: विभिन्न प्रकार की मूंगा चट्टानें तथा अन्य को कुंवर दरियाई घोड़े तथा संघ आदि प्रजाति के बहुत सारे जंतु हमने देखे।

            इसके बाद नाश्ते के लिए भी हमें एक मठ के भोजनालय में ले गए जहाँ उत्कृष्ट कोटि का दक्षिण भारतीय नाश्ता हमने किया। इसके बाद सर्किट हाउस से सामान आदि लेकर अब मदुरई के लिए चल पड़े। रामेश्वरम के पंबन पुल के बीच रुककर हमने कुछ तस्वीरें खींची। वहाँ कच्चे आम और अनानास की फांकों पर नमक लगाकर बिक रहा था जिसका स्वाद लिया। मदुरई या मदुरै तक की सड़क बहुत ही साफ़ सुथरी है और रास्ते में ताड़ के जंगल भी है। रास्ते में जगह जगह पर गाँव वाले ताड़ के रस से बना गुड़ और मिसरी बेच रहे थे जो कि बहुत पौष्टिक माना जाता है।

            मदुरई पहुँचते ही भौगोलिक संरचना में परिवर्तन नज़र आने लगा दूर उत्तर दिशा में पश्चिमी घाट की पहाड़िया नज़र आ रही थीं जहाँ की कोडईकनाल नाम का हिल स्टेशन है। हम सभी मदुरई के मशहूर कल्याण मंडप द्वारिका पैलेस में पहुँचे जिसके मालिक राकेश जी कुंदन के ख़ास दोस्त हैं। लगभग दो एकड़ में बना हुआ यह कल्याण मंडप चेन्नई कन्याकुमारी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है और इसमें लगभग 10 सर्व सुविधायुक्त कमरे व सुइट हैं। हम सब इन्हीं कमरों में रुके। राकेश जी ने हमें बेहतरीन तमिलनाडू का भोजन कराया और बातों बातों में ही पता चला कि वे उत्तर प्रदेश से सन 84 में मदुरई आए थे। उनके जीवन संघर्ष की गाथा बहुत प्रेरणा देने वाली थी। मदुरई के धनाढ्य व प्रभावी लोगों में उनकी गिनती होती है लेकिन इन सबके बावजूद इतनी विनम्रता बहुत कम व्यक्तियों में देखने को मिलती है।शाम को राकेश जी ने हमें मीनाक्षी अम्मन मंदिर में दर्शन हेतु भेजा जो कि न सिर्फ़ तमिलनाडु बल्कि भारत वर्ष का एक प्रमुख मंदिर है। राकेश जी ने पहले ही मंदिर में सूचना दे दी थी और तमिलनाडु पुलिस के एक उपनिरीक्षक श्री पांडी ने हमें बड़े ही सत्कार के साथ विधिवत दर्शन कराया।

मां पार्वती के मीनाक्षी स्‍वरूप का यह मंदिर तमिलनाडु के मदुरै शहर में स्थित है। मीनाक्षी का अर्थ है जिसकी आंखें मछली यानी मीन के समान हों। माता मीनाक्षी भगवान शिव की पत्‍नी पार्वती का अवतार और भगवान विष्‍णु की बहन मानी जाती हैं।मान्‍यता है कि भगवान शिव सुंदरेश्‍वर रूप में अपने गणों के साथ पांड्य राजा मलध्‍वज की पुत्री राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाने मदुरै आए थे। राजा मलध्‍वज ने कठोर तपस्‍या के बल पर मीनाक्षी को पुत्री के रूप में प्राप्‍त किया था।

मंदिर का मुख्‍य गर्भगृह 3500 वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है। मीनाक्षी मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। यह मंदिर प्राचीन काल की बेहतरीन स्‍थापत्‍य कला और वास्‍तु का विशुद्ध उदाहरण है। तमिल साहित्‍य में अंकित कहानियों में इस मंदिर की काफी चर्चा की गई है।

दर्शन पूजन के बाद हम पुराने बाज़ार की तरफ़कुछ ख़रीदारी के लिए गये और देखा कि हर जगह बहुत भारी डिस्काउंट दिया जा रहा है। हमारे ड्राइवर रेनो ने बताया कि यह महीना एक प्रकार से अशुभ माना जाता है जिसमें कोई मांगलिक काम नहीं होता न ही ख़रीदारी होती है इसलिए बाज़ार थोड़ामंदा रहने के कारण विभिन्न चीज़ों पर भारी छूट दी जाती है।

            वहाँ से लौटकर हमने रात्रि विश्राम किया और अगले दिन सुबह राकेश जी के निवास स्थान पर नाश्ते के लिए गए। नाश्ता तो कहने भर के लिए था वास्तव में हम सभी ने दोपहर का भोजन भी वहीं कर लिया शुद्ध तमिल व्यंजनों की पूरी की पूरी शृंखला पूरे सत्कार के साथ परंपरागत थालियों में राकेश जी स्वयं परोस रहे थे और हमलोगों ने जी भरकर नाश्ता नही बल्कि भोजन किया। भोजन के बाद बहुत ही उम्दा दर्जे की फ़िल्टर कॉफी पिलाई गई और हम लोगों को लगा कि कॉफी के बारे में हमारा ज्ञान वास्तव में बहुत अधूरा है। इसके बाद हम एयरपोर्ट के लिए निकल चलें। राकेश जी हमें विदा करने के लिए द्वारका पैलेस तक आए। उनके लिए एक शेर कहना ज़रूरी है

हम तो बिक जाते हैं उन अहले करम के हाथों

करके एहसान भी ज़ो नीची नज़र रखते हैं

वापसी

            मदुरई एयरपोर्ट आकर पता चला कि हमारी फ़्लाइट लगभग पौने तीन घंटा लेट है और चेन्नई पहुँचने तक हमारी बनारस की फ़्लाइट का छूटना तय है। हम सभी भारी तनाव में थे। एयर इंडिया के एक कर्मचारी से जब यह समस्या बतायी तो उसने कहा की आप इंडिगो का टिकट ले लीजिए और एयर इंडिया से रिफंड मिल जाएगा मतलब 40, हज़ार रुपये का चूना लगवा लीजिए। हम सभी तो सामान्य थे लेकिन कुंदन के चेहरे पर काफी तनाव लग रहा था। उन्होंने तुरंत अपने बैच के कस्टम के ज्वाइंट कमिश्नर श्री नवफल को फ़ोन किया जिनके आदेश पर वहाँ तैनात अधीक्षकों ने तुरंत अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए हम सभी को चेन्नई जा रही फ़्लाइट में शिफ्ट किया।नवफल जी ने भेंटस्वरूप हम सभी के लिए अलग अलग पहले ही मदुरई की प्रसिद्ध नमकीन और मिठाई भेजी थी।यदि ज़रा भी देरी होती तो हम हाथ मलते रह जाते।

इसके बाद हम सही समय पर चेन्नई पहुँचे और बनारस की उड़ान से बाबा विश्वनाथ की नगरी के लिए रवाना हुए।

            सात दिन पहले जो जहाँ से चला था वहीं पहुँच गया इसका मतलब है कि जीवन और पृथ्वी दोनों गोल है। लेकिन मंज़िल दूर अभी राही बस तुमको चलते ही रहना है।चलना ही ज़िंदगी है और ज़िंदगी के रास्ते पर फिर हम अगली बार चलेंगे किसी नई जगह नई दिशा में बनारसी गलचउर के साथ। तब तक के लिए हर हर महादेव। राजा काशी हव…

यात्रा समाप्त।

हर हर महादेव।

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कुंदन यादव

कुंदन यादव

बी एच यू और जे एन यू से हिन्दी साहित्य का अध्ययन। भारतीय राजस्व सेवा में अधिकारी। दिल्ली से अमरीका तक नाप चुकने के बाद भी नसों में बनारस दौड़ता है। पहला कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

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