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‘रोमांस’ के लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त शब्द नहीं मिलता। हमारे अय्याजी यद्यपि संस्कृतज्ञ थे, किन्तु इस शब्द के साथ उनका संबंध ठीक उसी तरह जुड़ गया था, जैसे मलहम के साथ पट्टी। अंग्रेजी न जानने पर भी वे रोमांस का रहस्य समझते अवश्य थे। हमारी यह धारणा और भी बलवती हो गई, जब उन्होंने एक दिन ‘लव मेरिज’ का जिक्र कर डाला। काम पड़ते रहने पर गाँव के लोग भी ‘टेशन’ और ‘ट्रिक्स’ समझने लगते हैं, परंतु रात-दिन व्याकरण की फक्किकाएँ घोखनेवाले अय्याजी भी जब एक दिन कहने लगे कि ‘लव-मैरिज’ में जो रोमांस रहता है, वह मड़वे के खंभे के साथ चक्कर खाकर चुनरी और दुपट्टे से गांठ जोड़ने में नहीं, तो हमने समझा कि हमारे अय्याजी भी पण्डितराज जगन्नाथ की तरह ‘युवती नवनीत कोमलांगी’ के मधुर मिलन की चाशनी चखने की फिराक में जरूर हैं। अपनी समझ को मजबूत करने के खयाल से ही उस दिन हमने बात-बात में अय्याजी से कहा, “खादी की तरह आपका दिल खुरदरा नहीं है। जेल में रहकर गीता का वेदान्त तो चक्की के साथ पीस गया, परंतु आपका ‘रोमांस’ अवश्य ही वहाँ की साँकलों की तरह ‘पक्का’ बना रहा।“

       “नहीं महाशय, आप तो जानते हैं कि लोग प्रेम जैसे विश्वव्यापी तत्त्व को भी जातीयता और प्रांतीयता के झगड़ों की तरह बनाना चाहते हैं, प्रेम को कसने की कसौटी ‘स्मृतियाँ’ नहीं हैं, वह है ‘दिल’..।“ अय्याजी ने उत्तर दिया।

       “आपका दिल तो राष्ट्रीयता के रंग में रंगा हुआ है। अफसोस इसी बात का है कि घर में अय्यानीजी की उपस्थिति आपको उसी तरह खलती होगी जैसे कांग्रेस के मंच पर डॉ. मुंजे। फिर भी, बताइए तो, आपने अपना प्रेम किसी के दिल की कसौटी पर कसा है कि नहीं?” हमने हँसते हुए पूछा।

       “उल्टी बात न कीजिए। अब तो किसी का प्रेम इस दिल की कसौटी पर कसा जा रहा है।“ अय्याजी ने अद्भुत मुद्रा बनाकर कहा।

       “ओहो! कुर्बान अय्याजी तुम्हारे मुखड़े पर। हमें क्या पता था कि आप हमारे भोजन में से ‘कंदर्प’ छीनकर किसी ‘कंदर्पिनी’ के नाम का भोग लगाने जाते हैं, फिर भी यह बताइए कि आपके इस टूटे पिंजरे में कौन सी बुलबुल चहकने लगी?”

       “यह न पूछिए! अगर हो सके तो एक बार फिर मुझे वहीं ले चलिए।“

       “कहाँ की बात कर रहे हैं, अय्याजी?”

       “वहाँ की और उसकी, जिसकी निगाह की चिंगारी ने मेरे विचारों की फूस में आग लगा दी थी।“

       हम एक क्षण तक अय्याजी की यह पहेली न बूझ सके। हम समझ न सके कि वह वैयाकरणी किस सूत्र में हमें पिरो रहा है! बहुत प्रयत्न करने पर हमें मालूम हो सका कि अय्याजी स्टार टॉकीज की बात कर रहे हैं, जहाँ हम उन्हें सिनेमा दिखाने ले गए थे। उसमें एक स्थान पर नृत्य करते हुए मुश्तरी बीवी ने गले से कमर तक झूलती हुई मोतियों की जाली में से नाजुक कलाइयों को धीरे-धीरे ऐंठते हुए उँगलियों की झाँझरियों के भीतर से तीर फेंका था।  मालूम होता है कि उस क्षण वह अय्याजी के ही दिल में घुसकर टूट गया। हमें स्मरण है—अय्याजी की उस समय की मुद्रा, उनकी अदाओं की रोशनी 500 यूनिट के लट्टू की तरह चमककर सिनेमा के कोरे पर्दे पर पड़ रही थी। सिनेमा हॉल से निकलकर अय्याजी ने हमें उस दिन बहुत-बहुत धन्यवाद दिए थे।

         परंतु हमने यह कल्पना न की थी कि अय्याजी का घाव भीतर-ही-भीतर यूँ पक उठेगा। कहाँ सिनेमा की एक अभिनेत्री नर्तकी और कहाँ यह सीधा-सादा दिखाई पड़नेवाला, खादीपोश, राष्ट्रीयता का उपासक, तेलंग ब्राह्मण!

         हमने अय्याजी से  कहा, “ वहाँ रखा ही क्या है! यदि हो सके तो राष्ट्रीयता की देवी के प्रत्यक्ष दर्शन करा देने का अवसर कभी प्राप्त हो सकेगा।“

         इसी समय हमारा लड़का भोजन ले आया और बात वहीं टल गई।

         अय्याजी के चरित्र के विषय में हमें कुछ कहने का अधिकार नहीं, किन्तु उसके सिद्धांतों को भी ठीक-ठीक समझ सकने का अधिकार अय्याजी की बुद्धि ने हमसे छीन लिया था। हाँ, हम यह कह सकते हैं कि चरित्र और सिद्धांत अय्याजी में मिक्स्चर की तरह मिलकर उनके दिल के बुखार का इलाज किया करते थे।

         हमने उन्हीं के मुख से सुना है कि वे एक बार जेलखाने चले गए थे। परंतु यह धोखा वह कैसे कहा गए, उसका उन्हें अभी तक दुख है। इस दुख में उन्हें एक नफ़ा जरूर था, लौटते ही उन्हें देशभक्त का लाइसेन्स मिल गया था। भला हो इस अहिंसा-सिद्धांत का, जिसकी बदौलत एक साधु ने अय्याजी को अपने यहाँ व्याकरण पढ़ाने के लिए नौकर रख लिया। एक देशभक्त अहिंसा के साथ इस तरह मिल गए जैसे अँधेरे में काला रंग। अय्याजी ने व्याकरण पढ़ाना स्वीकार किया था, परंतु साधु के यहाँ उन्हें प्रतिदिन इंसानियत का सबक सीखना पड़ता था। उनकी आदतें जेल की कोठरी में रहकर जेल की कोठरी कि तरह सिकुड़ गईं थीं, कि साधुजी के तनिक-तनिक से आक्षेपों का उत्तर देने के समय अय्याजी अपनी तनख्वाह के रुपये गिनने लगते थे। साथ ही स्वदेशी की खाल ओढ़कर उनमें उद्दंडता इतनी आ गई थी कि पेट के दर्द को बंद करने के लिए जब तक दो रसगुल्ले और आधा पाव नमकीन सेव के साथ कच्चे प्याज का टुकड़ा जबरदस्ती माँगकर न कहा लेते, तब तक उनका दर्द मिटता न था।

         हमारे यहाँ बगीचे में वे नित्य पधारा करते थे, संध्योपासना के लिए नहीं, ट्यूशन से उठकर उन्हें इसी तरह खाने-पीने की हाजत मालूम होती थी। वह खादी पहनते थे, इसलिए खादी की धुली धोती उनके लिए सुरक्षित रखनी पड़ती थी, गर्मी के दिनों में वहीं स्नान करते और फिर फव्वारे की तरह फूला हुआ पेट और पराँठे की तरह त्रिकोण मुखाकृति लेकर दीवाल से टिककर ‘अर्जुन’ पढ़ने का अभिनय वे नियमित ही करते थे।

         इसी तरह वे एक दिन ‘अर्जुन’ पढ़ रहे थे। उनके मुँह से वाह का नाला फूट पड़ा। दिल्ली के रॉक्सी थिएटर में आगामी सप्ताह ‘मुश्तरी जान’ का नृत्य-गायन होगा। ‘अर्जुन’ में इसी समाचार को पढ़कर उनका दिल दूध में भीगी हुई किसमिस की तरह फूल उठा।

         “कैसा होगा उनका नृत्य! मैं तो कल्पना करके ही खुश हो जाता हूँ।“ यह कहकर अय्याजी ने गहरी साँस ली।

         उनके दिल के तापमान को समझने के लिए हमने धीरे से कहा, “आप नहीं जानते कि मिस मुश्तरी सुसंस्कृत युवती है। मुस्लिम होकर भी उसने संस्कृत का अध्ययन किया है। उसका हृदय सब तरह से ‘हिन्दू’ है, परंतु दुख इसी बात का है कि कोई हिन्दू खुल्लमखुल्ला उससे विवाह संबंध करने को तैयार नहीं होता।“

        —यही तो हिंदुओं की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसी से तो हिन्दू एक राष्ट्र होने की अभिलाषा पूरी नहीं कर सकते। मगर मेरे वश की बात हो तो मैं निश्चय ही समाज के सामने, वही आदर्श पेश करता, जो एक बैरिस्टर आसफ अली और अरुणाजी ने किया है। मगर अफसोस, मैं विवाहित हूँ। यह कहकर अय्याजी ने भेद भरी दृष्टि से मेरी ओर देखा।

          हम पहले से ही तैयार थे। हमने कह, “हम तो आपके इस साहस की निंदा कभी नहीं कर सकते। आप समाज के सम्मुख ग्रहण और त्याग का भद्दा उदाहरण पेश नहीं कर सकते। किन्तु मुश्तरी से विवाह करने की कल्पना जितनी सुंदर है, उसका फल भी उतना ही कटु है। आपका हृदय फिर भी हिन्दू ही है और राष्ट्रीयता के नाम पर आप यह भी सहन नहीं करेंगे कि विवाह कर लेने पर भी वह नर्तकी अपनी आजादी में कोई फर्क आने दे। आपके साथ उसका व्यवहार विशेषतासूचक न होगा। आप उसके मित्रों की मित्रता तक पहुँचने में बाधक बन सकेंगे।“

          अय्याजी का दिल तो मुश्तरी के नाम पर बिक चुका था, वे पहले तो कुछ ढीले और फिर तीव्र स्वर में बोले, “आप मुझे कोरा पंडित न समझें। मैं मुश्तरी की प्रतिभा का उपासक हूँ, उसकी प्रेम भावना का पुजारी हूँ, अपने और मुश्तरी के बीच में बंधन की कोई गाँठ नहीं रखना चाहता, समझे!”

          “तो फिर ठीक है। आप अपनी प्रथम पत्नी और पंडित पिता की परिस्थितियों को समझ लीजिए। हमारी राय में ..।“ इसी समय डाकिए ने लाकर हमें एक पत्र दिखाया। पत्र दिल्ली से ही आया था। उस पत्र की कुछ बातें ऐसी थीं, जो हमारे वार्तालाप के विषय को अधिक अनुकूल बनाने वाली थीं। पत्र इस प्रकार था—

          प्रिय …. जी

          मैंने आपके संबंध में आखिरी बार … मूवीटोन के मैनेजर से मिलकर सब बातें तय कर ली हैं। वे आपको सिनेरियो-संपादक की हैसियत से अपने यहाँ रखने को तैयार हैं। शीघ्र ही उनकी ओर से आपको निश्चित सूचना प्राप्त होगी।

         हमने अय्याजी के सामने वह पत्र रखते हुए कहा, “हितेच्छु, आप तो अभी बहुत दूर हैं, किन्तु मैं आपकी मुश्तरी से मनमाना नाच नचाने का प्रोग्राम तय कर रहा हूँ। मेरा एक-एक शब्द उनके होंठों पर झूम-झूम कर नृत्य करेगा, समझे!”

         अय्याजी को तो मानो स्वर्ण-संयोग प्राप्त हो गया था। वे बोले, “यह आप ही की सुलगाई आग है। खैर, मैं आप ही का आश्रय लेना चाहता हूँ। क्या आप स्टूडियो में मुझे मुश्तरी का अभिनय एक बार दिखा सकेंगे? मैं इसी क्षण दिल्ली चलने को तैयार हूँ।“

         मालूम नहीं उस दिन का पाठ पढ़कर उनके साधु शिष्य उस रात सूत्रों का मनन करते हुए अय्याजी का कौन सा रूप देख रहे थे?

         अय्याजी दिल्ली से लौटकर आ रहे थे। अपनी दिल्ली-यात्रा का वर्णन करते हुए उन्होंने अपने मित्र को पत्र लिखा था। योगायोग से वह हमारे हाथ लग गया था, उसका अंश इस प्रकार है—

         ‘मैं न हिंदू हूँ, न मुसलमान। मैं तो राष्ट्रीयता का पुजारी हूँ। दिल्ली-यात्रा ने मेरी आँखें खोल दी हैं। मैं अब तक न जाने किस चारदीवारी के अंदर बंद था। स्वामी सत्यदेवजी से उपदेश प्राप्त करके भी मैं हिंदू-संगठन का हामी नहीं बन सका हूँ, क्योंकि मेरी धारणा है कि स्वामीजी स्वयं अंतर्राष्ट्रीय भावनाओं के पूजक हैं। उनके चित्त में संकुचित इच्छाएँ टिक नहीं सकतीं। दिल्ली में सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन मेरे जीवन में हुआ है, वह है मेरी राष्ट्रीय भावना का प्रेम-भावना के साथ समन्वय। अपने मित्र की कृपा से उस दिन मैंने मूवीटोन ‘सटूडियो’ में (अय्याजी स्टूडियो का उच्चारण इसी तरह करते हैं) पहुँचकर उस सौन्दर्य की मूर्ति, कला की साकार प्रतिमा के दर्शन किए। उसी क्षण मैं हिन्दुत्व की संकुचित भावना को लात मार चुका था। मुश्तरी ने मुझे इतना उत्साहित किया कि अब मैं हिंदू और मुसलमानों पर सिवा हँसने के और कोई टीका नहीं कर सकता। उस समय तो नहीं, परंतु मेरे मित्र ने मुझसे बाद में कहा था कि वह मेरे संस्कृत-ज्ञान पर मुग्ध थी और उससे अधिक मुग्ध थी मेरी राष्ट्रीय भावनाओं पर। संस्कृत के पंडित निरे पोंगे ही समझे जाते हैं, किन्तु मैंने अपना अपवाद पेश कर दिया है। लक्षण कह रहे हैं कि अपने जीवन का स्वप्न मैं एक दिन अवश्य ही सत्य रूप में देखूँगा।‘

           दिल्ली से लौट आने पर अय्याजी को साधु को व्याकरण रटाने में आनंद नहीं आता था। एक दिन एकाएक व्याकरण की पुस्तक में से एक स्त्री की तस्वीर साधु के सामने टपक पड़ी। पुस्तक अय्याजी की थी और फोटो था मुश्तरी का, जो शायद दिल्ली से लौटते हुए अय्याजी बाजार से खरीद लाए थे। साधुजी ने सशंक दृष्टि से चित्र उठाते हुए पूछा, ‘किसका चित्र है?’ अय्याजी ने उत्तर दिया, ‘यह? यह तो … मेरी राष्ट्र-भगिनी है।‘ अंतःकरण की आवाज अय्याजी से कह रही थी कि राष्ट्रीयता का अर्थ यह नहीं है।

           साधुजी ने चित्र देखकर अय्याजी की शक्ल का मुआयना किया। फिर यह सोचकर कि एक ही जगह कुमुदिनी और मेढक राष्ट्रबंधु हो सकते हैं, अय्याजी की उपेक्षा की। किन्तु संदेह ने पीछा न छोड़ा। उन्होंने अय्याजी पर कठोर दृष्टि डाली। परंतु वे उसी क्षण मुश्तरी के मोहिनी रूप का आनंद उठा रहे थे, उन्होंने वह चित्र धीरे से उठाकर दिल के ठीक ऊपर जेब में रखकर व्याकरण की चर्चा में सिर मारना शुरू किया। परंतु उस दिन न तो अय्याजी को पढ़ाने में कुछ मजा मिला और न साधुजी को पढ़ने में।

          आज 8 महीने हो चुके, अय्याजी ने अपने घर पर कोई खबर नहीं भेजी। जब तक वे जेलखाने में थे, उनके पिता और पत्नी को यह भरोसा रहता था कि चिड़िया घोंसले में दबी है, लेकिन अब तक बरसात के कौए की तरह अय्याजी न जाने कहाँ उड़े-उड़े फिरते थे। कुछ दिनों तक तो हमें ही यह मालूम न हो सका कि अय्याजी किस खेत की मूली बने हुए हैं। जब एक दिन हमें उनका पत्र मिला तो हमारे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। पत्र इस प्रकार था—

       ‘प्रिय… जी

        यही पत्र मेरे जीवन का पटाक्षेप है। हाय, मेरी मुश्तरी का देहांत हो गया। आज मेरे सभी अरमानों पर पानी फिर गया, जीवन की मधुर कल्पनाएँ मुश्तरी के साथ ही सो गईं। आपने मेरे जीवन की अंधियारी में प्रथम बार मुश्तरी का आलोक फैलाया था। मैंने दिल्ली से लौटकर निश्चय किया था कि चतुर्मास होते ही साधुजी का काम छोड़कर मुश्तरी का फकीर बनूँगा। हाय! वही संसार में न रही, अब कौन मुझे इस शोक में सांत्वना देगा?’

       उसी दिन सायंकाल ‘हजामत’ नामक पत्र में, जो दिल्ली से प्रकाशित होता था, एक टिप्पणी पढ़ने को मिली। वह इस प्रकार थी—

       ‘बी मुश्तरी का जीवन अद्भुत था। वे नृत्यकला में निष्णात तो थी ही, किन्तु उनके विचार भी बड़े उदार थे। मरते समय उन्होंने अपनी संपत्ति का जो ‘वसीयतनामा’ किया है, कहते हैं वह अनोखी चीज है, ‘एक नर्तकी का वसीयतनामा!’ दरअसल, आश्चर्य की चीज होगी। हम बड़ी उत्सुकता से उस वसीयतनामे के रहस्योद्घाटन की बाट जोह रहे हैं।‘

       एक दिन मुश्तरी का वसीयतनामा खुल गया। उसने भारतवर्ष में नृत्यकला के शास्त्रीय प्रसार में अपनी तमाम संपत्ति का विनियोग कर दिया था, परंतु हमारे लिए इसमें विशेष आश्चर्य की कोई बात न थी। उस वसीयतनामे के लिफ़ाफ़े में एक और पत्र निकला, जो हमारे आश्चर्य का कारण बन गया।

       ‘भाई … अय्याजी,

       प्रथम बार जब दिल्ली में हिन्दी सुलेख और मूवीटोन के सिनेरियो संपादक श्री… ने आपसे परिचय कराया था, तभी आपके रंग-ढंग देखकर मैं समझ चुकी थी कि आप दिल्ली आकार किसी का आखेट बन गए हैं। मेरी यह धारणा और भी मजबूत हो गई। थोड़े ही समय में आपके 20-25 प्रेमपत्र मुझे मिले। आप खादी पहनते हैं, राष्ट्रसेवक कहलाते हैं और आप ही ने लिखा है कि जेल भी जा चुके हैं। मुझे संदेह है कि रस्सी बँटने के साथ आपकी अक्ल भी किसी चारे के साथ बँटी जा चुकी है। आपने अपने पत्रों में जिस भाषा का प्रयोग किया है, वह शिष्ट है? क्या आपका हिन्दुत्व और महात्माजी के अनुगामी का राष्ट्रीयत्व यहीं समाप्त हो जाता है? इस समय मेरा उद्धार करना चाहते हैं। मुझे तो अपने उद्धार के लिए आपकी सहायता की अपेक्षा नहीं है। किन्तु मेरी बहिन, जिसके साथ आप प्रतिज्ञापूर्वक विवाह-संबंध जोड़ चुके हैं, आपके इस राष्ट्रीयत्व से कुछ लाभ नहीं उठा सकती। आप मेरा उद्धार करने की झोंक में अपनी परिणीता पत्नी का पतन अपनी आँखों से देखना गवारा कर सकते हैं? मेरे प्रति सहानुभूति विशेष है। मैं आपको उन लाखों आत्माओं का प्रतिनिधि समझती हूँ, जो देश और राष्ट्रधर्म के नाम पर अपने जीवन की दुर्बलता लिए इसी तरह लड़खड़ाती फिरती हैं।

        एक बात निश्चित है कि आपकी सहानुभूति से मैं लाभ उठाना चाहती हूँ। जिस दिन मैंने वेश्या के रूप में अपने जीवन को कलंकित किया था, उस दिन मेरे पास कुछ संपत्ति थी। आज लाखों रुपयों का वसीयतनामा कर देने पर भी मैं उस संपत्ति को अपनी अमूल्य निधि समझती हूँ और इसीलिए मैंने उसे सुरक्षित रख छोड़ है। इसमें मेरे जीवन का असली चित्र है और यदि आपको मेरी जैसी बहनों से सहानुभूति है, तो हमारे जीवन का अध्ययन कीजिए। मेरा विश्वास है कि घरों में रहने वाली लाखों बहनें मेरे इस वैभव का रूप लिए बैठी रहती हैं। आप मेरी इसी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं।

        आपके सभी प्रेमपत्र मैंने अपने मित्र को, जिनके द्वारा आपका मुझसे परिचय हुआ था, भेज दिए है। मेरा ऐसा विश्वास है कि पत्रों को पढ़कर इस बात का यथार्थ दिग्दर्शन हो सकेगा कि संस्कृत साहित्य में कामुकता का वर्णन किस कोटि का है। मुझे इन पत्रों में यह देखकर भी विशेष कौतूहल हुआ कि आपकी रूपरेखा बाहर जैसी है, भीतर से भी वह उतनी ही ऊँची-नीची और ढीली-पोली है। जो कुछ भी हो, मैंने अपने मित्र से कह दिया है कि सभी पत्र किसी सुंदर मासिक पत्र में प्रकाशित करा दिए जावें।

        अंत में यद्यपि आपने मुझे दूसरे रूप में देखा है, परंतु मैंने तो एक भोले राष्ट्रबंधु के रूप में आपको समझने की चेष्टा की है। आपमें सहानुभूति की मात्रा अधिक है और इसी भाईचारे के नाते मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप इस सत्य को समझें कि घर की स्त्रियाँ ही अंत में वेश्याएँ बँटी हैं। आपकी सहानुभूति बाहर की ओर है, घर की ओर नहीं।

                 आपकी बहिन

                  मुश्तरी’

         इसी वसीयतनामे के प्रकाशित होने के आठ दिन बाद दिल्ली की अदालत में अय्याजी को मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर होना पड़ा। बी मुश्तरी के वसीयतनामे के अनुसार उन्हें उनकी व्यक्तिगत संपत्ति प्राप्त करने के लिए अपने हस्ताक्षर मजिस्ट्रेट के सामने करने थे, बेचारे अय्याजी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब भरी अदालत में निम्नलिखित वस्तुएँ वसीयत के रूप में उन्हें प्राप्त हुईं—-

  1. टूटी चारपाई मय फटे गद्दे के।
  2. एक तवा मय चिमटे के।
  3. एक पेशबाज गोटदार (गोटा कच्चा)।
  4. एक ओढ़नी, जिसमें सिरवाली कोर तेल से मैली हो रही थी, तथा
  5. एक कंघी और छह कोनेवाला फूटा शीशा मय टूटी सुरमादानी के।

अय्याजी ने अदालत में खड़े होकर क्या अनुभव किया, यह तो नहीं कह सकते, परंतु लोगों ने उन्हें वहाँ से बड़ी तेजी से भागते हुए देखा। अय्याजी कहाँ चले गए, यह कोई नहीं जान सका। अभी परसों हमारे पास उनका एक पत्र कहीं से आया है। उसमें पता-ठिकाना कुछ नहीं है। दुर्भाग्य कि डाकखाने की मुहर भी ठीक से नहीं छपी है। पत्र इस प्रकार है—

     ‘प्रिय… जी,

     परमात्मा के नाम पर, अब राष्ट्रीयता के नाम पर नहीं, आपसे यह भिक्षा माँगता हूँ कि मेरी सम्मान-रक्षा के लिए आप मेरे वे पत्र कहीं भी प्रकाशित न कराएँ।

                                                           भवदीय

                                                          अय्या’

         अय्याजी हमारे मित्र हैं। अतः वे जहाँ कहीं भी हों, यह विश्वास कर लें कि जब तक बिल्कुल अनिवार्य न हो जाएगा, तब तक वे पत्र हमारे ही पास सुरक्षित रहेंगे।

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