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कायँ! कायँ !! कायँ !!!

       शाम का समय था। चचा छक्कन शेख साहब के साथ हमेशा की तरह शतरंज खेल रहे थे। मिर्जा साहब हुक्का पीते जाते थे और कभी-कभी किसी अच्छी चाल पर खुश होकर दोनों की तारीफ भी करते जाते थे, कि इतने में शेख साहब बोले-“देखिए, जरा सँभल कर चलिए, उठा लूँ वजीर?”

       चचा छक्कन ने कहा-“भई, माफ करना, गलती हुई, यह चाल वापस लेता हूँ!”- यह कहते हुए चचा छक्कन ने अपना बढ़ा हुआ मोहरा वापस कर लिया और दूसरी चाल चली।

       बाजी अच्छी-खासी खेल रहे थे, कि दोबारा बेपरवाही से गलत चाल चल दिए। शेख साहब ने कहा- देखिए, आप फिर बहके, मार लूँ घोड़ा?”

       चचा छक्कन ने ‘लाहौल-विला-कूव्वत’ कह कर अपनी चाल वापस कर ली और अब अधिक ध्यान से चाल चलने लगे।

       मिर्जा साहब ने कहा-“न जाने क्या बात है, आज चचा छक्कन ध्यान से नहीं खेल रहे हैं, अगर वे हारे, तो शेख साहब, आप आज पहली ही बार जीतेंगे।“

      चचा छक्कन बोले-“क्या मजाल, ऐसों को तो बरसों शतरंज खेलना सिखाऊँ, हजरत मोहरे तक तो पहिचानते नहीं, ये मुझे क्या मात देंगे?”

      इतने में फिर कायँ ! कायँ !! कायँ !!! हुई। चचा छक्कन का ध्यान जरा ही-सा बिसात पर से हटा था, कि शेख साहब जोर से बोले-“लीजिए, यह किश्त और मात ! बड़ा दावा था पाने खिलाड़ी होने का ! ये हमें शतरंज खेलना सिखाएँगे?”

      चचा छक्कन  ने खिसिया कर बिसात उलट दी और बोले-“मिर्ज़ा साहब, सुना आपने? शेख साहब क्या कह रहे हैं! इनको भी अपनी शतरंज पर नाज़ होने लगा।“ इतने में फिर कायँ ! कायँ !! कायँ !!!

      “लाहौल विला कूव्वत !’- चचा छक्कन बोले—“मैं भी सोच रहा था, कि मुझे आज क्या हो गया है, जो चाल चलता हूँ, गलत हो जाती है, सुना मिर्जा साहब आपने? यह सब करामात इस कायँ-कायँ की है।“

      मिर्जा साहब- “कैसी कायँ-कायँ ?”

      चचा छक्कन-“मिर्ज़ा साहब, आप भी कमाल करते हैं; ये क्या आसमान पर काजें उड़ी जाती हैं।“

      फिर कायँ ! कायँ !! कायँ !!!

      मिर्ज़ा साहब-“ठीक कहते हो, काजें बोल रही हैं; आ गया शिकार का मौसम। है शेख साहब इरादा?”

      शेख साहब-“चचा छक्कन से कहिए, ये चलें, तो हम भी चलें।“

      चचा छक्कन-“कोई काम तो नहीं है, हाँ कारतूस भरने होंगे।“

      शेख साहब-“क्यों, क्या कारतूसों की बाजार में कमी है, जो यह दर्दे-सर मोल लिया जाए?”

       चचा छक्कन-“कमी तो नहीं है, मगर उन पर भरोसा नहीं।“

       बात यह थी, कि गत वर्ष एक शिकार से ये लोग बिलकुल खाली हाथ लौटे थे; और क्यों खाली हाथ न लौटते, जब चार नंबर का छर्रा दो सौ गज से चलाया गया था। चचा छक्कन बहुत झेंपे हुए थे, क्योंकि दोस्तों ने उन्हें खूब बनाया था! चचा छक्कन को बहुत तंग करके, यारों ने कहा कि इसमें आपकी कोई खता नहीं, यह तो कारतूसों की खराबी से हुआ है। विलायत वाले भी अब ईमानदारी नहीं बरतते, न जाने कारतूसों में क्या-क्या भर देते हैं, तभी तो बंदूक खाली जाती है, नहीं तो क्या मजाल, जो आपका निशाना खाली जाता ! यह बात चचा छक्कन के जी में घर कर गई थी और उन्होंने सोच लिया था, कि अब अपने हाथ ही के भरे हुए कारतूस चलाएँगे। शिकार से वापस आते ही चचा छक्कन ने पहला काम यह किया कि, कारतूस भरने की मशीन और अन्य आवश्यक सामान खरीदा, मगर तब से कारतूस भरने और शिकार पर जाने की नौबत ही न आई थी।

       मिर्ज़ा साहब बोले-“ठीक है, उस बार शिकार में कैसी परेशानी हुई थी।“

       शेख साहब-“इन्हीं कारतूसों के कारण न, नहीं तो भला यों खाली हाथ लौटते!”

       चचा छक्कन—“तो फिर कल रात ही को चलेंगे, शेख साहब आप भी, और मिर्ज़ा साहब आप भी तैयार होकर आ जाइएगा।“

       यह निश्चय हुआ, कि अगली रात को मिर्ज़ा साहब और शेख साहब ताँगा लेकर बारह बजे के लगभग चचा छक्कन के घर आ जाएँगे और वहीं से शिकार को चला जाएगा।

       दूसरे दिन रात को बारह बजे के लगभग दोनों महाशय चचा छक्कन के मकान पर पहुँचे, दरवाजा खटखटाया, तो चचा छक्कन की आँखें खुलीं और बोले –“कौन?”

       मिर्ज़ा साहब-“मैं हूँ, शेख साहब हैं और ताँगा भी।“

       चचा छक्कन-“अभी हाजिर होता हूँ।“

       थोड़ी देर में चचा छक्कन लालटेन लिए मरदाने में आए और दरवाजा खोलकर अपने दोस्तों को अंदर बुला लिया। फिर यह कह कर, कि ‘मशीन ले आऊँ’ अंदर चले गए। इस खयाल से कि चची की नींद खराब न हो, बिना रोशनी के कोठरी में जाकर मशीन तलाश करने लगे। खड़खड़ से चची की आँख खुली, तो वे घबरा कर’बिल्ली-बिल्ली’ कहती हुई उठ बैठीं।

       चचा छक्कन-“हूँ, हूँ, मैं हूँ, मैं।“

       चची-“यह आधी रात को आप बावर्चीखाने में क्या कर रहे हैं? कहीं बच्ची का दूध न गिरा देना, क्या चाहिए, बतलाओ मैं ला दूँ।“

       चचा छक्कन- “लाहौल विला कूव्वत ! रात को कुछ सूझता ही नहीं। कोठरी के धोखे में बावर्चीखाने में चला आया। कारतूस भरने की मशीन ढूँढ रहा हूँ।“

       चची—“आओ मैं बतलाऊँ, इस सन्दूक में रखी है।“- यह कह कर वे अपने कमरे में चली गईं।

      चचा छक्कन ने सन्दूक खोला ही था, कि मिर्ज़ा साहब की आवाज़ आई-“अरे भाई, आओगे भी ! कारतूस भी भरने हैं और तालाब पर भी पहुँचना है, सुबह हो गई, तो शिकार क्या खाक मिलेगा?”

      चचा छक्कन जल्दी से बाहर निकले, तो चची चौंककर बोलीं- यह तुम कारतूसों की मशीन लिए जा रहे हो या नन्हें की टोपी? क्या यही पहन कर शिकार में जाओगे?”

      चचा ने जो देखा, तो सचमुच मशीन की बजाय नन्हें की टोपी हाथ में लिए हुए थे।

     इतने में शेख साहब ने कहा-“भई, एक बज रहा है, बस दो घंटे बाकी हैं।“

     कुछ तो चची के व्यंग्य से और कुछ दोस्तों के तकाज़े से चचा छक्कन कुछ बदहवास से हो गए। खिसिया कर जल्दी से मशीन निकाली और सन्दूक बंद कर दिया।

     अब चचा छक्कन चारों ओर देख रहे हैं, कि मशीन कहाँ गई। देर हुई, तो चची भी आ गईं। उनको देख कर चचा कहने लगे-“अभी सन्दूक से मशीन निकाली थी, न जाने कहाँ रख दी, अभी-अभी तो निकाली है, जरा उधर मेज पर तो देखना।“

     चची को यह सुनकर हँसी आ गई और वे कहने लगीं-“और यह बगल में क्या दबाए हुए हो?”

     चचा छक्कन ने आदत के अनुसार “लाहौल विला कूव्वत” कहा और जल्दी से बाहर चले गए।

     चचा छक्कन –“लो मिर्ज़ा साहब, जरा बंदूक को अच्छी तरह साफ तो कर डालो। वैसलीन सब जगह से निकाल देना। और शेख साहब तुम जरा इधर आकर कारतूस तो..।“

     यह कह कर चचा ने अँगीठी पर से बारूद का डिब्बा उतारा। अलमारी में से छर्रा, टोपियाँ और डाटें निकाल कर जल्दी-जल्दी कारतूस भरने शुरू कर दिए।

     “क्यों मिर्ज़ा साहब, चालीस कारतूस काफ़ी होंगे न?”—चचा छक्कन ने पूछा।

     “काफ़ी हैं।“—मिर्ज़ा साहब ने बंदूक में गज डालते हुए कहा।

     “तो अभी भर देता हूँ।“- यह कह कर चचा छक्कन अपने काम में लग गए। कोई तीन बजे इस काम से छुट्टी पाई। हर चीज पर एक दृष्टि डाली और ताँगे पर सवार होकर तालाब की ओर चल दिए। अभी सुबह होने में देर थी, ज़रा-ज़रा-सा चाँद भी निकल रहा था, कि ये सब लोग तालाब के किनारे पहुँच गए। चचा छक्कन ने इधर-उधर देख कर कहा-“देखिए, वह ईख का खेत सबसे अच्छी जगह जान पड़ती है, पानी के करीब भी है और छिपने का अच्छा मौका है। मेरे साथ-साथ चले आओ, मगर बातें कोई साहब न करें, न सिगरेट सुलगाएँ, नहीं तो शिकार उड़ जाएगा।“

     यह हिदायतें करते हुए आगे-आगे चचा छक्कन और पीछे-पीछे दोनों मित्र उस खेत में घुसे। खेत में टखनों तक पानी था, वह भी बहुत ठंडा। मगर शिकार के शौक में आगे बढ़ते गए। गन्नों की अंतिम पंक्ति में पहुँच कर सब लोग दम साध कर बैठ गए। कायँ-कायँ की आवाज़ पास ही से आ रही थी, मगर चूँ कि चाँद की रोशनी मद्धम थी, इसलिए शिकार दिखाई न पड़ता था। सिर्फ़ सुबह की रोशनी का इंतज़ार था। कोई घंटा-भर इंतज़ार किया होगा, कि काज़ों की एक टुकड़ी कोई बीस गज पर पानी में बैठी दिखाई पड़ी। चचा छक्कन ने धीरे से मिर्ज़ा साहब और शेख साहब को वह टुकड़ी दिखाई और होंठों पर अँगुली रख कर चुप रहने का इशारा किया।

     अब बंदूक चलाने का अच्छा मौका था, और फासला इतना कम था, कि एक फायर में कई काज़ों के मर जाने का विश्वास था। पहिले तो चचा छक्कन ने जरा अपने हाथों को बगलों में दबा कर गर्म किया, फिर ‘बिस्मिल्लाह’ कह कर बंदूक उठाई। टोपी चलने की आवाज़ हुई और साथ ही काज़ों के उड़ने की। कारतूस ने खता की थी। चचा छक्कन ने तुरंत दूसरी नाल उड़ती हुई काज़ों पर चलाई, मगर उसका भी यही अंजाम हुआ। चचा छक्कन को गुस्सा आ गया और उन्होंने जल्दी-जल्दी कारतूस बदल-बदल कर फायर करने शुरू किए, मगर परिणाम वही का वही रहा, यानी सिर्फ टोपी चटख कर रह गई।

     शेख साहब जल कर बोले-“कभी पहिले भी कारतूस भरे थे?”

     चचा छक्कन ने इसका तो कोई उत्तर नहीं दिया, लेकिन हसरत से कहने लगे-“बड़ा अच्छा शिकार हाथ से निकल गया।“

     मिर्ज़ा साहब बोले-“जरूर कारतूस भरने में भूल हुई, नहीं तो, आज क्या खाली हाथ जाते?”

     चचा छक्कन –“भूल की भी एक ही कही, मियाँ दूकानदार से अच्छी तरह पूछकर और उसके सामने नमूने के कारतूस भर कर लाया और चला कर इत्मीनान भी कर लिया था। यह तो भाग्य की बात है।“

     काज़ें सब उड़ चुकी थीं, और इंतज़ार करना बेकार था। अच्छा-खासा दिन निकल आया था। किसान खेतों की ओर आ रहे थे। पैर इतने ठंडे हो गए, कि जान पड़ता था, कि शरीर से उनका कोई संबंध ही नहीं है। अब घर लौटने के सिवा कोई और चारा ही नहीं था, अतः चले और शीघ्र ही घर पहुँच गए। चचा छक्कन को कारतूसों के न चलने का बड़ा दुख था। इससे उनके कमाल में बट्टा लगता था, अतः घर आते ही उन्होंने पहिला काम यह किया, कि चाकू निकाल कर कारतूसों को काटने लगे। पहिला ही कारतूस काटा था, कि मिर्ज़ा साहब और शेख साहब हँसी के मारे लोट गए। चचा छक्कन, जो पहिले ही से जले हुए थे, अब और भी जल गए और गुस्से से बोले-“आप लोगों को भी बेवक्त की हँसी आती है। भला यह हँसने का कौन मौका है?”

     शेख साहब और मिर्ज़ा ने कटे हुए कारतूस की ओर इशारा किया और फिर अधिक जोर से हँसने लगे। चचा छक्कन को और भी गुस्सा आ गया। कहने लगे-“लानत है, जो आज से आप ऐसे लोगों से दोस्ती रक्खे। यह मुझसे हमदर्दी हो रही है या मेरी हँसी उड़ाई जा रही है?”

     यह देख कर, कि चचा छक्कन हाथ से निकले जा रहे हैं, मिर्ज़ा साहब ने हँसी रोककर कहा-“बिगड़ने की क्या बात है? कारतूस चलते कैसे, आपने उनमें भरा क्या है?”

     चचा छक्कन-“आपने भी मुझे अनाड़ी समझ रखा है? भरा क्या है? बारूद है, छर्रा है, डाट है, और भी कुछ भरा जाता है?”

     शेख साहब-“भरा तो यही जाता है, मगर यह आपने बारूद भरी है?”

     चचा छक्कन- “और क्या? (फिर चौंक कर) लाहौल विला कूव्वत, अरे यह बारूद नहीं, तो और क्या है।“

     मिर्ज़ा साहब चुपके से उठ कर अँगीठी के पास गए और दो डिब्बे उतार कर चचा छक्कन के सामने रख दिए।

     चचा छक्कन-“इसका मतलब?”

     मिर्ज़ा साहब-“ज़रा इनको खोल कर देखिए।“

     चचा छक्कन ने जो डिब्बों को खोल कर देखा, तो एक में बारूद थी और दूसरे में लिपटन की चाय। अवाक् रह गए और ‘लाहौल विला कूव्वत’ कहते हुए चचा छक्कन ने चाय का डिब्बा घर से बाहर फेंक दिया और दोनों दोस्तों से खिसिया कर बोले-“मरदूद हो, जो अब तुम्हारे साथ शिकार को जाए।“

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इम्तियाज अली ताज

सय्यद इम्तियाज़ अली ताज

जन्म: 13 अक्तूबर 1900, मृत्यु: 19 अप्रैल 1970 रचनाएँ: अनारकली, चचा छक्कन

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