दो महीने हो गये। शांति देवी की हालत में कुछ भी सुधार ना हुआ। पुरुषोत्तम बाबू को उनके मित्रों और रिश्तेदारों ने सुझाव दिया कि एक बार अपनी पत्नी को मनोचिकित्सक से दिखवा लें। पुरुषोत्तम बाबू को सुझाव सही लगा। अगले ही दिन अपने बड़े पुत्र सौरभ एवं पुत्रवधू संध्या के साथ अपनी पत्नी को लेकर शहर के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक के पास पहुँच गये। डॉक्टर साहब ने मरीज़ की समस्या पूछी तो पुरुषोत्तम बाबू ने बताया – “क़रीब दो महीने से मेरी पत्नी ने मौन व्रत धारण कर रखा है। चुपचाप बैठी रहती है। ऐसा लगता है जैसे किसी बड़ी समस्या पर गहन चिंतन कर रही हो। किसी के भी पूछने पर ना ही मौन व्रत धारण करने का कारण बताती है और ना ही कुछ बोलती है। बाक़ी दिनचर्या पूर्व की भाँति यथावत है।” मरीज़ की समस्या जानने के बाद कुछ सोचकर डॉक्टर साहब ने पुरुषोत्तम बाबू को अपने […]
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रामानंद बाबू को अस्पताल में भर्ती हुए आज दो महीने हो गये। वे कर्क रोग से ग्रसित हैं। उनकी सेवा-सुश्रुषा करने के लिए उनका सबसे छोटा बेटा बंसी भी उनके साथ अस्पताल में ही रहता है। बंसी की माँ को गुज़रे हुए क़रीब पाँच वर्ष हो चुके हैं। अपनी माँ के देहावसान के समय बंसी तक़रीबन बीस वर्ष का था। सुबह के आठ बज रहे हैं। बंसी अपने पिता के लिए फल लाने बाज़ार गया है। तभी नियमित जाँच करने हेतु डॉक्टर रामाश्रय का आगमन हुआ। रामानंद बाबू और डॉक्टर रामाश्रय लगभग एक ही उम्र के हैं। रामानंद बाबू की शारीरिक जाँच करने के उपरांत डॉक्टर साहब ने उनसे पूछा, “आपकी केवल एक ही संतान है क्या?” “नहीं डॉक्टर साहब, बंसी के अलावा भी मेरे दो पुत्र एवं दो पुत्रियाँ हैं,” रामानंद बाबू ने जवाब दिया। “फिर दो महीनों तक आपसे कोई मिलने क्यों नहीं आया?” डॉक्टर साहब ने विस्मित […]
नागर थोड़ी दूर पश्चिम जाकर घूमी और फिर उस सड़क पर चलने लगी जो रोहतासगढ़ की तरफ गई थी। पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि नागर का दिल कितना मजबूत और कठोर था। उन दिनों जो रास्ता काशी से रोहतासगढ़ को जाता था, वह बहुत ही भयानक और खतरनाक था। कहीं-कहीं तो बिल्कुल ही मैदान में जाना पड़ता था और कहीं गहन वन में होकर दरिन्दे जानवरों की दिल दहलाने वाली आवाजें सुनते हुए सफर करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त उस रास्ते में लुटेरों और डाकुओं का डर तो हरदम बना ही रहता था। मगर इन सब बातों पर जरा भी ध्यान न देकर नागर ने अकेले ही सफर करना पसन्द किया, इसी से कहना पड़ता है कि वह बहुत ही दिलावर, निडर और संगदिल औरत थी। शायद उसे अपनी ऐयारी का भरोसा या घमण्ड हो क्योंकि ऐयार लोग यमराज से भी नहीं डरते और जिस ऐयार […]
ओमप्रकाश भारतीय उर्फ़ पलटू जी शहर के सबसे बड़े उद्योगपति होने के साथ ही फ़ेमस डॉग लवर अर्थात् प्रसिद्ध कुत्ता प्रेमी भी थे। पलटू जी ने लगभग सभी नस्ल के कुत्ते पाल रखे थे। उन्हें कुत्तों से इतना प्रेम था कि कुत्तों के मल-मूत्र भी वे स्वयं साफ़ किया करते थे। उनके श्वान प्रेम पर अख़बार एवं पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख प्रकाशित हो चुके थे। क़रीब एक दर्जन नौकर पलटू जी के यहाँ काम करते थे। लेकिन मोहन मुख्य नौकर था। तबीयत ठीक ना होने की वज़ह से आज मोहन ने अपनी जगह अपनी पत्नी मालती को काम पर भेजा था। मालती अपने साथ अपने ढाई वर्षीय बेटे को साथ लेकर पलटू जी के यहाँ काम करने आ गयी। भोजन कक्ष के फर्श पर अपने बेटे को बिठाकर मालती अपना काम करने लगी। दो घंटे बीत गये। उधर मालती अपने काम में मशग़ूल थी और इधर उसका बेटा खेलते-खेलते पलटू […]
पारसनाथ अपने चाचा के हाल-चाल बराबर लिया करता था। उसने अपने ढंग पर कई ऐसे आदमी मुकर्रर कर रखे थे जो कि लालसिंह का रत्ती-रत्ती हाल उसके कानों तक पहुँचाया करते और जैसा कि प्रायः कुपात्रों के संगी-साथी किया करते हैं उसी तरह उन खबरों में बनिस्बत सच के झूठ का हिस्सा बहुत ज्यादे रहा करता था। रात को लालसिंह के पास सूरजसिंह के आने की इत्तिला भी पारसनाथ को हो गई, मगर उसमें दो बातों का फर्क पड़ गया। एक तो उसका जासूस इस बात का पता न बता सका कि आने वाला कौन था, क्योंकि सूरजसिंह अपने को छिपाए हुए लालसिंह तक पहुँचे थे और इस बात का गुमान भी किसी को नहीं हो सकता था कि सूरजसिंह लालसिंह के पास आवेंगे, दूसरे जब सूरजसिंह के साथ लालसिंह बाहर चले गए, तब पारसनाथ को इस बात की खबर लगी। शैतानी का जाल फैलानेवाला हरदम चौकन्ना ही […]
उसने अपनी छोटी- छोटी आंखें खोलीं । सामने मम्मी-पापा खड़े थे । उनको देखकर उसके चेहरे के भावों में कोई परिवर्तन नहीं आया । मानो कुछ ना हुआ हो । कुछ ना देखा हो । अगर कुछ देखा भी तो महत्वहीन । तभी बेड के किनारे खड़ी दादी पर उसकी नजर पड़ी। उनको देखते ही वह चिल्लाई, “दिद्दा दिद्दा, चुट्टू लग गयी । मम्मी ने मारा ।” अचानक मनीष और रंजना की नजरें मिलीं । दरवाजे की तरफ गईं और फिर नीचे झुक गईं । यह दृश्य आज के समाज की परिभाषा गढ़ता है । परिस्थितियों की भी, समय की भी और व्यक्ति की स्वयं से बड़ी हो चुकी महत्वकांक्षाओं की भी । दो मिनट के वक्फ़े ने ही मनीष और रंजना को झकझोर कर रख दिया । मानो उस दिन रिती घायल हुई थी । आज मनीष और रंजना दोनों द्रवित हो गए, रिती की एक निगाह से ही […]
“असतो माँ सद्गमय , तमसो माँ ज्योतिर्गमय मृत्योर माँ अमृतगमय…..!!” धुनकी अपने पोपले मुँह से कुछ भूले -बिसरे , आधे-पूरे मंत्रों और भजनों को गाये जा रही थी। आज वो बहुत खुश थी। हो भी क्यों न? आज उसके सभी अपने उससे मिलने जो आ रहे थे। बरसो से मन में ठान रखा था । “एकादशी निस्तार (त्याग) जब भी करूँगी , धूम-धाम से करूँगी।…सभी सगे-सम्बन्धियों को बुलवाऊंगी!!” बेटों ने तो कहा था:- ” पंडित जी से पूजा करा के ले-दे के निपटा लो।….खर्चा कम बैठेगा !” पर वो न मानी। तब से अब जाकर वो दिन आया है। उसमें भी जब शारीरिक क्षमता जवाब दे गई तब। अभी तो 8 रोज पहले अच्छी-खासी चल-फिर रही थी। अचानक क्या हो गया उसे उठा-बैठा भी न जा रहा। सबको लगा उनकी यह इच्छा अधूरी न रह जाये। तब जाकर सभी बेटों ने हामी भरी। सभी को उसने कहलवाया था अपने यह […]
“मैं उसके बिना जिन्दा नहीं रह सकती!” उन्होंने फैसला किया। “तो मर जाओ!” जी चाहा कह दूँ। पर नहीं कह सकती। बहुत से रिश्ते हैं, जिनका लिहाज करना ही पड़ता है। एक तो दुर्भाग्य से हम दोनों औरत जात हैं। न जाने क्यों लोगों ने मुझे नारी जाति की समर्थक और सहायक समझ लिया है। शायद इसलिए कि मैं अपने भतीजों को भतीजियों से ज्यादा ठोका करती हूँ। खुदा कसम, मैं किसी विशेष जाति की तरफदार नहीं। मेरी भतीजियाँ अपेक्षाकृत सीधी और भतीजे बड़े ही बदमाश हैं। ऐसी हालत में हर समझदार उन्हें सुधारने के लिए डाँटते-फटकारते रहना इन्सानी फर्ज समझता है। पर उन्हें यह कैसे समझाऊँ। वे मुझे अपनी शुभचिन्तक मान चुकी हैं। और वह लड़की, जो किसी के बिना जिन्दा न रह सकने की स्थिति को पहुँच चुकी हो, कुछ हठीली होती है, इसलिए मैं कुछ भी करूँ, उसके प्रति अपनी सहानुभूति से इनकार नहीं कर सकती। अनचाहे […]
अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति की खूबियाँ कहाँ तक गिनवायी जायें। उसने हम असभ्य हिन्दुस्तानियों को क्या कुछ नहीं दिया? हमारी गँवार औरतों को अपने शरीर की रेखाओं की नुमाइश के नित नये तरीके बताये। शारीरिक सुन्दरता का प्रदर्शन करने के लिए बिना आस्तीनों के ब्लाऊज पहनने सिखाये। मिस्सी-काजल छीन कर उनके सिंगारदानों में लिपिस्टिक, रूज, पौडर और सिंगार की दूसरी चीजें भर दीं। पहले हमारे यहाँ मोचने सिर्फ नाक या मूँछों के बाल चुनने के काम आते थे, पर अंग्रेजी सभ्यता ने हमारी औरतों को उनसे अपनी भवों के बाल चुनना सिखाया। यह सभ्यता की ही देन है कि अब जो औरत चाहे, लायसेन्स ले कर खुल्लम-खुल्ला अपने शरीर का व्यापार कर सकती है। प्रगतिशील मर्दों-औरतों के लिए सिविल मैरेज का कानून मौजूद है। जब चाहिए शादी कर लीजिए और जब चाहिए तलाक ले लीजिए। हींग लगती है न फिटकरी, मगर रंग चोखा अता है। नाच घर मौजूद हैं, जहाँ […]
चंद्रकांता संतति के पिछले भाग बयान 5 रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, कभी-कभी कुत्तों के भौंकने की आवाज के सिवाय और किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे समय में काशी की तंग गलियों में दो आदमी, जिनमें एक औरत और दूसरा मर्द है, घूमते हुए दिखाई देते हैं। ये दोनों कमलिनी और भूतनाथ हैं, जो त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास मनोरमा के मकान पर पहुँचने की धुन में कदम बढ़ाये हुए तेजी के साथ जा रहे हैं। जब ये दोनों एक चौमुहानी के पास पहुँचे तो देखा कि दाहिनी तरफ से एक आदमी पीठ पर गट्ठर लादे आया और उसी तरफ को घूमा, जिधर ये दोनों जाने वाले थे। कमलिनी ने धीरे से भूतनाथ के कान में कहा, “इस गठरी में जरूर कोई आदमी है।” भूतनाथ – बेशक ऐसा ही है। इस आदमी की चाल पर भी मुझे कुछ शक […]
अहमद दादा, 65 की उम्र, 5 फुट से कुछ कम कद, ठिगना कह लीजिए, भरी हुई देह, हमेशा एक कुर्ता और एक तहमद बांधे नज़र आते। कभी-कभी मुझे लगता कि इस तहमद की वजह से ही इनका नाम अहमद पड़ा होगा। मैं बहुत बड़ा होते तक अहमद के बाद लगने वाले इस दादा को रिश्ते वाला दादा समझता रहा। काफी बड़ा होने पर मुझे पता लगा कि ये दादा रिश्ते वाला दादा ना होकर, पदवी वाला दादा है। पर दादा तो फिर गुंडों को कहा जाता है। गुंडा? ये बूढ़ा सा, स्नेहशील व्यक्ति किसी ज़माने में गुंडा रहा होगा? मुझे यकीन नहीं आता था। ये वो दौर था जब हिन्दू-मुस्लिम अपने त्योहार मिल कर मनाया करते थे। हम होली-दीवाली भी उसी उत्साह से मनाते, जिस उत्साह से ईद-बकरीद मानते थे। ऐसा ही मेरे दोस्त टेकलाल, टेकेश, राकेश, रजनीश वगैरह भी करते। हर बार जब नागपंचमी का दिन आता, अहमद […]
रात दो घंटे से कुछ ज्यादे जा चुकी है। लालसिंह अपने कमरे में अकेला बैठा कुछ सोच रहा है। सामने एक मोमी शमादान जल रहा है तथा कलम-दवात और कागज भी रखा हुआ है। कभी-कभी जब कुछ खयाल आ जाता है, तो उस कागज पर दो-तीन पंक्तियाँ लिख देता है और फिर कलम रखकर कुछ सोचने-विचारने लगता है। कमरे के दरवाजे बंद हैं और पंखा चल रहा है, जिसकी डोरी कमरे से बाहर एक खिदमतगार के हाथ में है। यकायक पंखा रुका और लालसिंह ने सर उठाकर सदर दरवाजे की तरफ देखा। कमरे का दरवाजा खुला और उसने अपने पंखा खिदमतगार को हाथ में एक पुर्जा लिए हुए कमरे के अंदर आते देखा। खिदमतगार ने पुर्जा लालसिंह के आगे रख दिया जिसने बड़े गौर से पुर्जा पढ़ने के बाद पहिले तो नाक-भौं चढ़ाया तथा फिर कुछ सोच -विचार कर खिदमतगार से कहा, ” अच्छा, आने दे।” इतना कह उसने […]
मान्यवर सम्पादक जी! क्षमा चाहता हूँ कि इस बार अपके दीपावली अंक के लिए लेख न भेज सका। बात यह हुई कि जब पहली बार आपका पत्र आया, जिसमें आपने लिखा था कि इस वर्ष आपने अपने कुछ पुराने लिखने वालों को एक ही विषय पर लेख लिखने के लिए राजी किया है और वह विषय है ‘पत्नी अपने पति की दृष्टि में!’ और तस्वीर भी माँगी थी, तब मुझे सहसा हँसी आ गयी थी। संयोग से मेरी पत्नी भी उस समय मेरी कुर्सी के पीछे खड़ी मेरे पत्रों की निगरानी कर रही थी। क्योंकि, मुझे डाक से प्रायः लड़कियों के पत्र आते रहते हैं, इसलिए पत्नी द्वारा पत्रों की देख-भाल से मेरे लिए जान बचानी मुश्किल हो जाती है। खैर, वह एक अलग विषय है। उस पर कभी अवकाश मिलने पर बात होगी। इस समय तो मैं आपको यह बता रहा था […]
दिसंबर की किसी सर्द रात में दो बजे दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में आईसीयू के बाहर बैठे डॉक्टर साहब मरीजों के बही खाते भर रहे थे। अभी अभी वार्ड से निरीक्षण करके लौटे थे। नर्स जनरल वार्ड की तरफ गई हुई थी। “डॉक्टर साहब। बचा लीजिये हमको।”, अचानक आईसीयू से आवाज आई। डॉक्टर साहब अंदर गए तो उन्होंने देखा कि वेंटिलेटर पर रखे गए चार मरीजों में से केवल एक होश में था। तीस साल की आयु का वह मरीज दुबारा हुए ब्लड कैंसर की वजह से भर्ती था। कोई उम्मीद नहीं थी कि वह बच पाता। डॉक्टर साहब जैसे ही उसके पास गए, उसने इनका हाथ पकड़ लिया और कहा, “डॉक्टर साहब। यहाँ से मत जाईये।” डॉक्टर साहब ने उसकी तरफ देखा तो वह बहुत डरा हुआ लग रहा था। “कुछ बोलियेगा नहीं।”, उसने आगे कहा। डॉक्टर साहब ने मशीनों की तरह देखा तो उसकी साँसों और धड़कनों […]
इस बार तो गजब ही हो गया। दो दिन पहले अचानक से तुम्हारा ईमेल आया, “किताब अच्छी है। लेकिन मैं अब वापस नहीं लौट सकती।” कोई नो यू टर्न का बोर्ड लगा है क्या? खैर जाने दो। हम कर भी क्या सकते हैं। तुम तो पता नहीं किस रास्ते पर चली गयी हो। लेकिन क्या याद है तुम्हें वो रात? कौन सी रात? मैं बताता हूँ। उस रात करीब दस बजे मैं तुमसे बात कर रहा था। तभी तुमने कहा कि बाद में बात करोगी, और फ़ोन रख दिया। मुझे भी एक सीनियर से कुछ काम था तो मैं उनसे मिलने चला गया। वहाँ पहुँचा तो देखा कि कुछ सीनियर बैठ कर ताश खेल रहे थे। मुझे भी आमंत्रण मिल गया और तभी तुम भी कहीं व्यस्त थी तो खेलने में कोई बुराई नहीं लगी। बैठ कर खेलने लगा। समय का पता ही नहीं चला। तभी अचानक से मेरा फ़ोन […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…