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नागर थोड़ी दूर पश्चिम जाकर घूमी और फिर उस सड़क पर चलने लगी जो रोहतासगढ़ की तरफ गई थी।

    पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि नागर का दिल कितना मजबूत और कठोर था। उन दिनों जो रास्ता काशी से रोहतासगढ़ को जाता था, वह बहुत ही भयानक और खतरनाक था। कहीं-कहीं तो बिल्कुल ही मैदान में जाना पड़ता था और कहीं गहन वन में होकर दरिन्दे जानवरों की दिल दहलाने वाली आवाजें सुनते हुए सफर करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त उस रास्ते में लुटेरों और डाकुओं का डर तो हरदम बना ही रहता था।

    मगर इन सब बातों पर जरा भी ध्यान न देकर नागर ने अकेले ही सफर करना पसन्द किया,  इसी से कहना पड़ता है कि वह बहुत ही दिलावर, निडर और संगदिल औरत थी। शायद उसे अपनी ऐयारी का भरोसा या घमण्ड हो क्योंकि ऐयार लोग यमराज से भी नहीं डरते और जिस ऐयार का दिल इतना मजबूत न हो, उसे ऐयार कहना भी न चाहिए।

     नागर एक नौजवान मर्द की सूरत बनाकर तेज और मजबूत घोड़े पर सवार तेजी के साथ रोहतासगढ़ की तरफ जा रही थी। उसकी कमर में ऐयारी का बटुआ, खंजर, कटार और एक पथरकला1 भी था। दोपहर होते-होते उसने लगभग पच्चीस कोस का रास्ता तय किया और उसके बाद एक ऐसे गहन वन में पहुँची, जिसके अन्दर सूरज की रोशनी बहुत कम पहुँचती थी, केवल एक पगडंडी सड़क थी, जिस पर बहुत सम्हलकर सवारों को सफर करना पड़ता था, क्योंकि उसके दोनों तरफ कंटीले दरख्त और झाड़ियां थीं।

     इस जंगल के बाहर एक चौड़ी सड़क भी थी, जिस पर गाड़ी और छकड़े वाले जाते थे। मगर घुमाव और चक्कर पड़ने के कारण उस रास्ते को छोड़कर घुड़सवार और पैदल लोग अक्सर इसी जंगल में से होकर जाया करते थे, जिससे इस समय नागर जा रही है, क्योंकि इधर से कई कोस का बचाव पड़ता था।

       यकायक नागर का घोड़ा भड़का और रुककर अपने दोनों कान आगे की तरफ करके देखने लगा। नागर शहसवारी का फन बखूबी जानती और अच्छी तरह समझती थी, इसलिए घोड़े के भड़कने और रुकने से उसे किसी तरह का रंज न हुआ, बल्कि वह चौकन्नी हो गई और बड़े गौर से चारों तरफ देखने लगी। अचानक सामने की तरफ पगडंडी के बीचोबीच में बैठे हुए शेर पर उसकी निगाह पड़ी, जिसका पिछला भाग नागर की तरफ था अर्थात् मुंह उस तरफ जिधर नागर जा रही थी। नागर बड़े गौर से शेर को देखने और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए।

     अभी उसने कोई राय पक्की नहीं की थी कि दाहिनी बगल की झाड़ी में से एक आदमी निकलकर बढ़ा और फुर्ती के साथ घोड़े के पास आ पहुंचा, जिसे देखते ही वह चौंक पड़ी और घबड़ाहट के मारे बोल उठी, “ओफ, मुझे बड़ा भारी धोखा दिया गया!” साथ ही इसके वह अपना हाथ पथरकले पर ले गई, मगर उस आदमी ने इसे कुछ भी करने न दिया। उसने नागर का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा और एक झटका ऐसा दिया कि वह घोड़े के नीचे आ रही। वह आदमी तुरन्त उसकी छाती पर सवार हो गया और उसके दोनों हाथ कब्जे में कर लिए।

       यद्यपि नागर को विश्वास हो गया कि अब उसकी जान किसी तरह नहीं बच सकती तो भी उसने बड़ी दिलेरी से अपने दुश्मन की तरफ देखा और कहा –

नागर – बेशक, उस हरामजादी ने मुझे पूरा धोखा दिया, मगर भूतनाथ, तुम मुझे मारकर जरूर पछताओगे। वह कागज जिसके मिलने की उम्मीद में तुम मुझे मार रहे हो, तुम्हारे हाथ कभी न लगेगा क्योंकि मैं उसे अपने साथ नहीं लाई हूँ। यदि तुम्हें विश्वास न हो तो मेरी तलाशी ले लो, और बिना वह कागज पाए मेरे या मनोरमा के साथ बुराई करना तुम्हारे हक में ठीक नहीं है, इसे तुम अच्छी तरह जानते हो।

भूतनाथ – अब मैं तुझे किसी तरह नहीं छोड़ सकता। मुझे विश्वास है कि वे कागजात, जिनके सबब से मैं तुझ जैसी कमीनों की ताबेदारी करने पर मजबूर हो रहा हूँ, इस समय जरूर तेरे पास हैं तथा इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि कमलिनी ने अपना वादा पूरा किया और कागजों के सहित तुझे मेरे हाथ फँसाया। अब तू मुझे धोखा नहीं दे सकती और न तलाशी लेने की नीयत से मैं तुझे कब्जे से छोड़ ही सकता हूँ। तेरा जमीन से उठना मेरे लिए काल हो जायेगा क्योंकि फिर तू हाथ नहीं आवेगी।

नागर – (चौंककर और ताज्जुब से) हैं, तो क्या वह कमबख़्त कमलिनी थी, जिसने मुझे धोखा दिया! अफसोस, शिकार घर में आकर निकल गया। खैर, जो तेरे जी में आवे कर, यदि मेरे मारने में ही तेरी भलाई हो तो मार, मगर मेरी एक बात सुन ले।

भूतनाथ – अच्छा कह, क्या कहती है थोड़ी देर तक ठहर जाने में मेरा कोई हर्ज भी नहीं।

नागर – इसमें तो कोई शक नहीं कि अपने कागजात, जिन्हें तेरा जीवन-चरित्र कहना चाहिए, उन्हें लेने के लिए ही तू मुझे मारना चाहता है।

भूतनाथ – बेशक ऐसा ही है। यदि वह मुट्ठा मेरे हाथ का लिखा हुआ न होता तो मुझे उसकी परवाह न होती।

नागर – हाँ, ठीक है, परन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि मुझे मारकर तू वे कागजात न पावेगा। खैर, जब मैं इस दुनिया से जाती ही हूँ तो क्या जरूरत है कि तुझे भी बर्बाद करती जाऊँ? मैं तेरी लिखी चीजें खुशी से तेरे हवाले करती हूँ, मेरा दाहिना हाथ छोड़ दे, मैं तुझे बता दूँ कि मुझे मारने के बाद वे कागजात तुझे कहाँ से मिलेंगे।

     भूतनाथ इतना डरपोक और कमजोर भी न था कि नागर का केवल दाहिना हाथ जिसमें हर्बे की किस्म से एक कांटा भी न था, छोड़ने से डर जाय। दूसरे, उसने यह भी सोचा कि जब यह स्वयं ही कागजात देने को तैयार है तो क्यों न ले लिये जायें, कौन ठिकाना इसे मारने के बाद कागजात हाथ न लगें। थोड़ी देर तक कुछ सोच-विचारकर भूतनाथ ने नागर का दाहिना हाथ छोड़ दिया, जिसके साथ ही उसने फुर्ती से वह हाथ भूतनाथ के गाल पर दबाकर फेरा।

      भूतनाथ को ऐसा मालूम हुआ कि नागर ने एक सूई उसके गाल में चुभो दी, मगर वास्तव में ऐसा न था। नागर की उंगली में एक अंगूठी थी, जिस पर नगीने की जगह स्याह रंग का कोई पत्थर जड़ा हुआ था, वही भूतनाथ के गाल में गड़ा, जिससे एक लकीर-सी पड़ गई और जरा खून भी दिखाई देने लगा। पर मालूम होता है कि वह नोकीला स्याह पत्थर, जो अंगूठी में जड़ा हुआ था, किसी प्रकार का जहर-हलाहल था, जो खून के साथ मिलते ही अपना काम कर गया क्योंकि उसने भूतनाथ को बात करने की मोहलत न दी। वह एकदम चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ा और नागर उसके कब्जे से छूटकर अलग हो गई।

     नागर ने घोड़े की बागडोर, जो चारजामे में बंधी हुई थी खोली और उसी से भूतनाथ के हाथ-पैर बांधने के बाद एक पेड़ के साथ कस दिया, इसके बाद उसने अपने ऐयारी के बटुए में से एक शीशी निकाली, जिसमें किसी प्रकार का तेल था। उसने थोड़ा तेल उसमें से भूतनाथ के गाल पर उसी जगह जहाँ लकीर पड़ी हुई थी, मला। देखते-ही-देखते उस जगह एक बड़ा फफोला पड़ गया। नागर ने खंजर की नोक से उस फफोले में छेद कर दिया, जिससे उसके अन्दर का कुल जहरी पानी निकल गया और भूतनाथ होश में आ गया।

नागर – क्यों बे कमबख़्त, अपने किये की सजा पा चुका या कुछ कसर है तूने देखा, मेरे पास कैसी अद्भुत चीज है। अगर हाथी भी हो तो इस जहर को बर्दाश्त न कर सके और मर जाये, तेरी क्या हकीकत है!

भूतनाथ – बेशक ऐसा ही है और अब मुझे निश्चय हो गया कि मेरी किस्मत में जरा भी सुख भोगना बदा नहीं है।

नागर – साथ ही इसके तुझे यह भी मालूम हो गया कि इस जहर को मैं सहज ही में उतार भी सकती हूँ। इसमें सन्देह नहीं कि तू मर चुका था, मगर मैंने इसलिए तुझे जिला दिया कि अपने लिखे हुए कागजों का हाल दुनिया में फैला हुआ तू स्वयम् देख और सुन ले, क्योंकि उससे बढ़कर कोई दुःख तेरे लिए नहीं है, पर यह भी देख ले कि उस कमबख़्त कमलिनी के साथ मैंने क्या किया, जिसने मुझे धोखे में डाला था।

इस समय वह मेरे कब्जे में है, क्योंकि कल वह मेरे घर में जरूर आकर टिकेगी! अहा, अब मैं समझ गई कि रात वाले अद्भुत मामले की जड़ भी वही है। जरूर ही इस मुर्दे शेर को रास्ते में तूने ही बैठाया होगा।

भूतनाथ – (आँखों में आँसू भरकर) अबकी दफे मुझे माफ करो, जो कुछ हुक्म दो, मैं करने को तैयार हूँ।

नागर – मैं अभी कह चुकी हूँ कि तुझे मारूँगी नहीं, फिर इतना क्यों डरता है?

भूतनाथ – नहीं-नहीं, मैं वैसी जिन्दगी नहीं चाहता, जैसी तुम देती हो, हाँ यदि इस बात का वादा करो कि वे कागजात किसी दूसरे को न दोगी तो मैं वे सब काम करने को तैयार हूँ, जिन्हें पहले इनकार करता था।

नागर – मैं ऐसा कर सकती हूँ, क्योंकि आखिर तुझे जिन्दा छोड़ूँगी ही, और यदि मेरे काम से तू जी न चुरावेगा तो मैं तेरे कागजात भी बड़ी हिफाजत से रखूँगी। हाँ खूब याद आया – उस चीठी को तो जरा पढ़ना चाहिए जो उस कमबख़्त कमलिनी ने यह कहकर दी थी कि मुलाकात होने पर मनोरमा को दे देना।

यह सोचते ही नागर ने बटुए में से एक चीठी निकाली और पढ़ने लगी। यह लिखा हुआ था –

“जिस काम के लिए मैं आई थी, ईश्वर की कृपा से वह काम बखूबी हो गया। वे कागजात इसके पास हैं, ले लेना। दुनिया में यह बात मशहूर है कि उस आदमी का जहान से उठ जाना ही अच्छा है, जिससे भलों को कष्ट पहुँचे। मैं तुमसे मिलने के लिए यहाँ बैठी हूँ।”

नागर – देखो नालायक ने चीठी भी लिखी तो ऐसे ढंग से कि यदि मैं चोरी से पढ़ूँ भी तो किसी तरह का शक न हो और इसका पता भी न लगे कि यह भूतनाथ के नाम लिखी गई है या मनोरमा के, स्त्रीलिंग और पुल्लिंग को भी बचा ले गई है। उसने यही सोच के चीठी मुझे दी होगी कि जब यह भूतनाथ के कब्जे में आ जायेगी, और वह इसकी तलाशी लेगा तो यह चीठी उसके हाथ लग जायेगी, और जब वह पढ़ेगा तो नागर को अवश्य मार डालेगा, और फिर तुरत आकर मुझसे मिलेगा, जिससे वह किशोरी को छुड़ा ले। अच्छा कमबख़्त, देख, मैं तेरे साथ क्या सलूक करती हूँ।

भूतनाथ – अच्छा, इतना वादा तो मैं कर ही चुका हूँ कि हर तरह से तुम्हारी ताबेदारी करूंगा और जो कुछ तुम कहोगी, बेउज्र बजा लाऊंगा, अब इस समय मैं तुम्हें एक भेद की बात बताता हूँ, जिसे जानकर तुम बहुत प्रसन्न होओगी।

नागर – कहो, क्या कहते हो शायद तुम्हारी नेकचलनी का सबूत यहीं मिल जाये।

भूतनाथ – मेरे हाथ तो बंधे हैं, खैर, तुम ही आओ मेरी कमर से खंजर निकालो। उसके साथ एक पुर्जा बंधा है, खोलकर पढ़ो और देखो, क्या लिखा है?

    नागर भूतनाथ के पास गई और उसकी कमर से खंजर निकालना चाहा, मगर खंजर पर हाथ पड़ते ही उसके बदन में बिजली दौड़ गई और वह कांपकर जमीन पर गिरते ही बेहोश हो गई। भूतनाथ पुकार उठा – “वह मारा!” उस तिलिस्मी खंजर का हाल जो कमलिनी ने भूतनाथ को दिया था, पाठक बखूबी जानते ही हैं, कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं। इस समय वही खंजर भूतनाथ की कमर में था। उसकी तासीर से नागर बिल्कुल बेखबर थी। वह नहीं जानती थी कि जिसके पास उसके जोड़ की अंगूठी न हो, वह उस खंजर को छू नहीं सकता।

    अब भूतनाथ का जी ठिकाने हुआ, और वह अपने छूटने का उद्योग करने लगा, परन्तु हाथ-पैर बंधे रहने के कारण कुछ न कर सका। आखिर वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, जिससे किसी आते-जाते मुसाफिर के कान में आवाज पड़े तो वह आकर उसको छुड़ावे।

    दो घण्टे बीत गए, मगर किसी मुसाफिर के कान में भूतनाथ की आवाज न पड़ी और तब तक नागर भी होश में आकर उठ बैठी।

  1. पथरकला उस छोटी – सी बन्दूक को कहते हैं जिसके घोड़े में चकमक लगा होता है जो रंजक पर गिरकर आग पैदा करता है।
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देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

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