साहित्य विमर्श एंड्रॉयड एप


5 2 वोट
पोस्ट को रेट करें

दिसंबर की किसी सर्द रात में दो बजे दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में आईसीयू के बाहर बैठे डॉक्टर साहब मरीजों के बही खाते भर रहे थे। अभी अभी वार्ड से निरीक्षण करके लौटे थे। नर्स जनरल वार्ड की तरफ गई हुई थी।

“डॉक्टर साहब। बचा लीजिये हमको।”, अचानक आईसीयू से आवाज आई।

डॉक्टर साहब अंदर गए तो उन्होंने देखा कि वेंटिलेटर पर रखे गए चार मरीजों में से केवल एक होश में था। तीस साल की आयु का वह मरीज दुबारा हुए ब्लड कैंसर की वजह से भर्ती था। कोई उम्मीद नहीं थी कि वह बच पाता।

डॉक्टर साहब जैसे ही उसके पास गए, उसने इनका हाथ पकड़ लिया और कहा, “डॉक्टर साहब। यहाँ से मत जाईये।” डॉक्टर साहब ने उसकी तरफ देखा तो वह बहुत डरा हुआ लग रहा था।

“कुछ बोलियेगा नहीं।”, उसने आगे कहा।

डॉक्टर साहब ने मशीनों की तरह देखा तो उसकी साँसों और धड़कनों के अलावा बाकी सब लक्षण सही थे। वह मरीज लगातार बड़बड़ा रहा था, “वह सब आ रहा है। चार लोग है। दो  लड़का है। दो लड़की है। सब नंगा है। पी रहा है।”

“कहाँ है?”, डॉक्टर साहब ने पूछा।

“खिड़की के बाहर।”, मरीज ने उसके बिस्तर के लगभग  सामने वाली खिड़की की तरफ इशारा किया। खिड़की का एक पल्ला खुला हुआ था।

“हमको आवाज देकर बुला रहा है। बहुत बुरा है। मरा हुआ है। हमको नहीं जाना है उसके साथ।”, मरीज फिर से बड़बड़ाने लगा।

अचानक से वह मरीज चुप हो गया। डॉक्टर साहब ने देखा कि वह डर से काँप रहा था। तब तक नर्स भी आ गई। डॉक्टर साहब ने मरीज से पूछा, “क्या हुआ? चले गए सब?”

“शSS। हिलिये नहीं। आपके बगल में खड़ा है।”

डॉक्टर साहब ने देखा तो कोई भी उनके बगल में नहीं था। नर्स को कुछ समझ नहीं आया। उसने डॉक्टर से पूछा, “क्या हुआ डॉक्टर साहब?”

“अरे कुछ नहीं। इसकी तबियत बिगड़ी हुई है न। इसलिये इसे यमदूत दिखने का भ्रम हो गया है।”

“क्या करें?”

“सेडेटिव इंजेक्शन दीजिये। कम से कम चैन से सोएगा तो।”

“जी ठीक है।”

“मैं खिड़की ठीक से लगा देता हूँ।” डॉक्टर साहब खिड़की तरफ बढ़ते हुए बोले, “ध्यान रहे कि कोई खिड़की न खोले।”

नर्स ने सहमति जताई और उसने मरीज को बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया। मरीज धीरे धीरे शांत पड़ गया।

डॉक्टर साहब वापस बहीखाते भरने चले गए। नर्स दूसरे मरीजों को देखने लगी।

पाँच बजने वाले थे। डॉक्टर साहब कोई किताब पढ़ रहे थे। अचानक नर्स ने आवाज लगाई कि मरीज के मुँह से खून आ  रहा है। डॉक्टर साहब भाग कर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि मरीज के मुँह से खून की धारा बह रही थी।

डॉक्टर साहब ने सीपीआर शुरू किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

देखते ही देखते मरीज मर गया। डॉक्टर साहब ने सीपीआर बंद किया और उसे दिवंगत घोषित करते हुए एक नजर खिड़की पर डाली।

खिड़की खुली हुई थी।
(लेखक की हालिया प्रकाशित किताब बतजगा से)

5 2 वोट
पोस्ट को रेट करें

सबस्क्राइब करें
सूचित करें
guest
3 टिप्पणियाँ
नवीनतम
प्राचीनतम सबसे ज्यादा वोट
इनलाइन प्रतिक्रिया
सभी टिप्पणियाँ देखें

.

अभिषेक सूर्यवंशी

अभिषेक सूर्यवंशी

लेखक - किस्सागो - प्रोग्रामर - बावर्ची अभिषेक सूर्यवंशी का जन्म बिहार के सहरसा जिले में १५ जून १९९१ को हुआ। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पैतृक गाँव तेघड़ा में हुई और फिर माध्यमिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय से हुई। एन आई टी कालीकट से मास्टर्स करने के बाद अभी सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। अभिषेक अब तक दो किताबें लिख चुके हैं, किस्सों की सड़क और बतजगा। किस्सों की सड़क और बतजगा - अपनी दोनों किताबों में अभिषेक गल्प की उस पुरानी विधा को खींच कर सामने लाते दिखते हैं, जिसे जिंदगी की भागमभाग में हम कहीं किसी तकिये के नीचे, किसी पुरानी फटी जींस की जेब में रख कर भूल गये थे। ये किस्से विधाओं का बार-बार अतिक्रमण करते हैं। कहानियाँ? नाह। लघुकथाएँ? बिल्कुल नहीं। संस्मरण? चुटकी भर। रेखाचित्र? कहीं कहीं। सच कहूँ, तो ये किस्से दोस्तों की उन गप्पबाजियों की याद दिलाते हैं, जिनमें रात कब गुजर जाती थी, खबर ही नहीं होती थी।

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

Powered by सहज तकनीक
© 2020 साहित्य विमर्श
3
0
आपके विचार महत्वपूर्ण हैं। कृपया टिप्पणी करें। x
()
x