साहित्य विमर्श एंड्रॉयड एप

0 0 वोट
पोस्ट को रेट करें

चंद्रकांता संतति के पिछले भाग

बयान 5

रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, कभी-कभी कुत्तों के भौंकने की आवाज के सिवाय और किसी तरह की आवाज सुनाई नहीं देती। ऐसे समय में काशी की तंग गलियों में दो आदमी, जिनमें एक औरत और दूसरा मर्द है, घूमते हुए दिखाई देते हैं। ये दोनों कमलिनी और भूतनाथ हैं, जो त्रिलोचनेश्वर महादेव के पास मनोरमा के मकान पर पहुँचने की धुन में कदम बढ़ाये हुए तेजी के साथ जा रहे हैं। जब ये दोनों एक चौमुहानी के पास पहुँचे तो देखा कि दाहिनी तरफ से एक आदमी पीठ पर गट्ठर लादे आया और उसी तरफ को घूमा, जिधर ये दोनों जाने वाले थे। कमलिनी ने धीरे से भूतनाथ के कान में कहा, “इस गठरी में जरूर कोई आदमी है।”

भूतनाथ – बेशक ऐसा ही है। इस आदमी की चाल पर भी मुझे कुछ शक पड़ता है। ताज्जुब नहीं कि यह मनोरमा का नौकर श्यामलाल हो।

कमलिनी – तुम्हारा शक ठीक हो सकता है क्योंकि तुम बहुत दिनों तक मनोरमा के मकान पर रह चुके हो और वहाँ के हर एक आदमी को बखूबी जानते हो।

भूतनाथ – कहो तो इसे रोकूं?

कमलिनी – हाँ-हाँ रोको, जाने न पावे।

भूतनाथ लपककर उस आदमी के सामने आया और कमर से खंजर निकालकर उसके सामने चमकाया। उसकी चमक में भूतनाथ और कमलिनी ने उस आदमी को पहचान लिया, मगर वह इन दोनों को अच्छी तरह न देख सका, क्योंकि बिजली की तरह चमकने वाली रोशनी ने उसकी आँखें बन्द कर दीं और वह घबराकर बैठ गया। भूतनाथ ने खंजर उसके बदन से लगाया, जिसकी तासीर से वह एक दफे कांपा और बेहोश होकर जमीन पर लम्बा हो गया। भूतनाथ ने उसे उसी तरह छोड़ दिया और गठरी का कोना खोलकर देखा तो उसमें एक कमसिन औरत बंधी पाई। कमलिनी के हुक्म से भूतनाथ ने वह गठरी अपनी पीठ पर लाद ली और मनोरमा के घर का रास्ता छोड़ दोनों आदमी गंगा-किनारे की तरफ रवाना हुए।

बात-की-बात में दोनों गंगा-किनारे जा पहुँचे। इस समय चन्द्रमा की रोशनी अच्छी तरह फैली हुई थी। एक मढ़ी के ऊपर बैठने के बाद भूतनाथ ने वह गठरी खोली। उस बेहोश औरत के चेहरे पर चन्द्रमा की रोशनी पड़ते ही भूतनाथ चौंककर बोला, “ओफ, यह तो कमला है!”

कमला होश में लाई गई। जब उसकी निगाह भूतनाथ के ऊपर पड़ी तो वह एकदम काँप उठी। कमला को उस दिन की बात याद आ गई जिस दिन खंडहर के तहखाने में अपने चाचा शेरसिंह के पास भूतनाथ को देखा था। कमला को शक हो गया कि इस समय वह जिसके हुक्म से बेहोश करके लाई गई, वह भूतनाथ ही है। कमला की दूसरी निगाह कमलिनी पर पड़ी मगर वह कमलिनी को पहचान न सकी। यद्यपि कमला कमलिनी को रोहतासगढ़ पहाड़ी पर देख चुकी थी, परन्तु इस समय कमलिनी उस भयानक राक्षसी के भेष में न थी, रंग काला जरूर था, परन्तु लम्बे-लम्बे दांत उसके मुँह में न थे, इसी से वह कमलिनी को नहीं पहचान सकी।

कमलिनी ने जब देखा कि कमला बहुत ही डरी हुई और हैरान मालूम पड़ती है, तो उसने कमला का हाथ पकड़ लिया और धीरे से दबाकर कहा, “कमला, तू डर मत। हम लोगों ने इस समय तुझे एक दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है।”

कमला – अब मेरा जी ठिकाने हुआ। मुझे उम्मीद है कि आप लोगों की तरफ से मुझे तकलीफ न पहुँचेगी। परन्तु आप लोगों को जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा है।

कमलिनी – ठीक है, जरूर तेरा जी चाहता होगा कि हम लोगों का हाल जाने और इसी तरह मैं भी तुझसे बहुत-कुछ पूछना चाहती हूँ, मगर इस समय केवल चार-पांच घण्टे के लिए तुझसे जुदा होती हूँ, तब तक तू (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनके साथ रह। किसी तरह से डर मत, सबेरा होने के पहले ही मैं तुझसे आकर मिलूँगी और बातचीत के बाद कुंअर इन्द्रजीतसिंह के छुड़ाने का उद्योग करूँगी।

कमला – मैं आपके हुक्म के खिलाफ कुछ न करूँगी। मैं आपसे हर तरह पर भलाई की आशा रखती हूँ, क्योंकि आपने मुझे एक ऐसे दुश्मन के हाथ से छुड़ाया है जिसका हाल मैं ही जानती हूँ।

कमलिनी – अच्छा, तो अब बातों में समय नष्ट करना ठीक नहीं है। (भूतनाथ की तरफ देखकर) भूतनाथ, यहाँ छोटी-छोटी बहुत-सी डोंगियाँ बंधी हुई हैं, सन्नाटा और मौका देखकर कोई एक डोंगी खोल लो और कमला को साथ लेकर गंगा-पार चले जाओ। मैं अब मनोरमा के घर जाती हूँ, वहाँ से अपना मतलब साधकर सबेरा होने के पहले ही तुमसे आ मिलूँगी।

कमला – (चौंककर) क्या नाम लिया, मनोरमा! हाय-हाय, वह तो बड़ी शैतान है। हम लोगों को तो उसने तबाह कर डाला। क्या तुम उसके…

कमलिनी – डर मत कमला! मनोरमा को मैंने कैद कर लिया है और अब एक जरूरी काम के लिए उसके घर पर जा रही हूँ। (आसमान की तरफ देखकर) ओफ, बहुत विलम्ब हुआ, खैर, अब विदा होती हूँ, पुनः मिलने पर सब हाल कहूँगी।

कमलिनी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी ही देर में उस बाग के फाटक पर जा पहुँची, जिसमें मनोरमा का मकान था। फाटक के साथ लोहे की एक जंजीर लगी हुई थी, जिसे हिलाने से दरबान ने एक छोटे-से सूराख में से बाहर की तरफ देखा जो इसी काम के लिए बना हुआ था। केवल एक औरत को दरवाजे पर मौजूद पाकर दरबान ने फाटक खोल दिया और जब कमलिनी अन्दर चली आई तो फाटक उसी तरह बन्द कर दिया और तब कमलिनी से पूछा, “तुम कौन हो और यहाँ किसलिए आई हो?”

कमलिनी – मुझे मनोरमाजी ने पत्र देकर अपनी सखी नागर के पास भेजा है, तुम मुझे नागर के पास बहुत जल्द ले चलो।

दरबान – वह तो यहाँ नहीं हैं, किसी दूसरी जगह गई हैं।

कमलिनी – कब आवेंगी?

दरबान – सो मैं ठीक नहीं कह सकता।

कमलिनी – क्या तुम यह भी नहीं कह सकते कि वे आज या कल तक लौट आवेंगी या नहीं?

दरबान – हाँ, यह तो मैं कह सकता हूँ कि चार-पांच दिन तक वे न आवेंगी; इसके बाद चाहे जब आवें।

कमलिनी – अफसोस, अब बेचारी मनोरमा नहीं बच सकती।

दरबान – (चौंककर) क्यों-क्यों उन पर क्या आफत आई?

कमलिनी – यह एक गुप्त बात है जो मैं तुमसे नहीं कह सकती, हाँ, इतना कहने में कोई हर्ज नहीं कि यदि तीन दिन के अन्दर उन्हें बचाने का उद्योग न किया जायेगा तो चौथे दिन कुछ नहीं हो सकता, वे अवश्य मार डाली जायेंगी।

दरबान – अफसोस, यदि आप एक दिन तक यहाँ अटकना मंजूर करें तो मैं नागरजी के पास जाकर उन्हें बुला लाऊँ। आपको यहाँ किसी तरह की तकलीफ न होगी!

कमलिनी – (कुछ सोचकर) मुझे एक जरूरी काम है, इसलिए अटक तो नहीं सकती, परन्तु कल शाम तक अपना काम करके लौट आ सकती हूँ।

दरबान – यदि आप ऐसा करें तो भी काम चल सकता है, परन्तु आप अटक न जायें। यदि आपका काम ऐसा हो जिसे हम लोग कर सकते हों तो आप कहें, उसका बन्दोबस्त कर दिया जायेगा।

कमलिनी – नहीं, बिना मेरे गये वह काम नहीं हो सकता। मगर कोई चिन्ता नहीं, मैं कल शाम तक अवश्य आ जाऊँगी।

दरबान – जैसी मर्जी, आपकी मेहरबानी से यदि हमारे मालिक की जान बच जायेगी तो हम लोग जन्म भर के लिए गुलाम रहेंगे।

कमलिनी – मैं अवश्य आऊँगी और उनके लिए हर तरह का उद्योग करूँगी, तुम जाते समय इसका बन्दोबस्त कर जाना कि यदि तुम्हारे लौट आने के पहले ही मैं यहाँ पहुँच जाऊँ तो मुझे यहाँ रहने में किसी तरह का तरद्दुद न हो।

दरबान – इससे आप बेफिक्र रहें, मैं पूरा-पूरा इन्तजाम करके जाऊँगा और नागरजी को लेकर बहुत जल्दी लौटूंगा।

फाटक खोल दिया गया और कमलिनी बाग के बाहर हो गई। वह अभी बीस कदम भी आगे न गई होगी कि एक आदमी बदहवास और दौड़ता हुआ उसी बाग के फाटक पर पहुँचा और दरवाजा खुलवाने का उद्योग करने लगा। कमलिनी जान गई कि यह वही आदमी है, जिसके हाथ से अभी थोड़ी ही देर पहले मैंने कमला को छुड़ाया है। कमलिनी उसी जगह आड़ में खड़ी होकर उसे देखने और कुछ सोचने लगी। जब बाग का फाटक खुल गया और वह आदमी अन्दर चला गया तो न मालूम क्या सोचती-विचारती कमलिनी भी वहाँ से रवाना हुई और थोड़ी रात बाकी थी, जब कमला और भूतनाथ के पास पहुँची जो गंगा-पार उसके आने की राह देख रहे थे। कमलिनी को बहुत जल्दी लौट आते देख भूतनाथ को ताज्जुब हुआ और उसने कहा –

भूतनाथ – मालूम होता है कि कुछ काम न हुआ और आपको खाली ही लौट आना पड़ा!

कमलिनी – हाँ, इस समय तो खाली ही लौटना पड़ा, मगर काम हो जायेगा। नागर घर पर मौजूद न थी, उसका आदमी उसे बुलाने के लिए गया है। मैं कल शाम तक फिर वहाँ पहुँचने का वादा कर आई हूँ। इच्छा तो यही थी कि वहाँ अटक जाऊँ, क्योंकि ऐसा करने से और भी कुछ काम निकलने की उम्मीद थी, परन्तु कमला के खयाल से लौट आना पड़ा। मैं चाहती हूँ कि कमला को रोहतासगढ़ रवाना कर दूँ क्योंकि उसकी जुबानी कुछ हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को ढाढ़स होगी और लड़कों के सोच में बहुत व्याकुल न रहेंगे। (कमला की तरफ देखकर) तेरी क्या राय है?

कमला – जो कुछ आप हुक्म दें मैं करने को तैयार हूँ, परन्तु इस समय मैं बहुत-सी बातों का असल भेद जानने के लिए बेचैन हो रही हूँ और सिवाय आपके कोई दूसरा मेरी दिलजमई नहीं कर सकता!

कमलिनी – कोई हर्ज नहीं, मैं हर तरह से तेरी दिलजमई कर दूँगी।

इतना सुनकर कमला भूतनाथ की तरफ देखने लगी। कमलिनी समझ गई कि यह निराले में मुझसे कुछ पूछना चाहती है। अस्तु, उसने भूतनाथ को वहाँ से हट जाने के लिए कहा और जब वह कुछ दूर चला गया तो कमला से बोली, “अब निराला हो गया, जो कुछ पूछना हो पूछो।”

कमला – मुझे आपका कुछ हाल भूतनाथ की जुबानी मालूम हुआ है, परन्तु उससे पूरी दिलजमई नहीं होती। मुझे पूरा-पूरा पता लग चुका था कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह आपके यहाँ कैद हैं, फिर न मालूम, उन पर क्या आफत आई और उनके साथ आपने क्या सलूक किया। यद्यपि उस समय हम लोग आपके नाम से डरते थे, परन्तु जब आपने कई दफे हम लोगों के साथ नेकी की, जिसका हाल आज मालूम हुआ है तो वह बात अब मेरे दिल से जाती रही, फिर भी कुंअर इन्द्रजीतसिंह के बारे में शक बना ही रहा है।

कमलिनी – सुन, मैं तुझसे पूरा-पूरा हाल कहती हूँ। यह तो तुझे मालूम ही हो चुका कि मैं कमलिनी हूँ।

कमला – जी हाँ, यह तो (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) इनकी कृपा से मालूम हो गया और इन्हीं के जुबानी यह भी जान गई कि रोहतासगढ़ में उस कब्रिस्तान के अन्दर हाथ में चमकता हुआ नेजा लेकर आप ही ने हम लोगों की मदद की थी और बेहोश करके रोहतासगढ़ किले के अन्दर पहुँचा दिया था। दूसरी दफे राजा वीरेन्द्रसिंह वगैरह को रोहतासगढ़ के कैदखाने से आप ही ने छुड़ाया था और तीसरी दफे उस खंडहर में यकायक विचित्र रीति से आप ही को पहुँचते हम लोगों ने देखा था।

कमलिनी – यद्यपि कुछ लोगों ने मुझे बदनाम कर रखा है, परन्तु वास्तव में मैं वैसी नहीं हूँ। मैं नेकी करने के लिए हरदम तैयार रहती हूँ, इसी तरह दुष्टों को मजा चखाने की भी नीयत रहती है। मैंने कुंअर इन्द्रजीतसिंह के साथ किसी तरह की बुराई नहीं की, बल्कि उनके साथ नेकी की और उन्हें एक बहुत बड़े दुश्मन के हाथ से छुड़ाया। जब वे तुम लोगों से मिलेंगे और हाल कहेंगे, तब मालूम होगा कि कमलिनी ने सच कहा था!

इसके बाद कमलिनी ने इन्द्रजीतसिंह का अपने लश्कर से गायब होना और उन्हें दुश्मन के हाथ से छुड़ाना, कई दिनों तक अपने मकान में रखना, माधवी को गिरफ्तार करना, किशोरी का रोहतासगढ़ के तहखाने से निकलना और धनपत के कब्जे में पड़ना, तारा के खबर पहुँचाने पर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर किशोरी को छुड़ाने के लिए जाना, रास्ते में शेरसिंह और देवीसिंह से मिलना, अग्निदत्त का हाल और अन्त में उस तिलिस्मी मकान के अन्दर सभी लोगों का कूद जाना आदि कमला से पूरा-पूरा बयान किया। कमला ताज्जुब से सब बातें सुनती रही और अब कमलिनी पर उसे पूरा-पूरा विश्वास हो गया।

कमला – फिर किशोरी और कुंअर इन्द्रजीतसिंह उस खंडहर वाले तहखाने में क्योंकर पहुँचे?

कमलिनी – वह खंडहर एक छोटे से तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है। एक औरत जो मायारानी के नाम से पुकारी जाती है और जिसका हाल कुछ दिन बाद तुम लोगों को मालूम होगा, उस तिलिस्म पर राज्य करती है। मैं उसकी सगी बहिन हूँ। हमारी तिलिस्मी किताब से साबित होता है कि कुंअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह उस तिलिस्म को तोड़ेंगे, क्योंकि तिलिस्म तोड़ने वालों के जो-जो लक्षण उस किताब में लिखे हैं, वे सब इन दोनों भाइयों में पाये जाते हैं, परन्तु मायारानी चाहती है कि तिलिस्म टूटने न पावे और इसीलिए वह दोनों कुमारों को अपनी कैद में रखने अथवा मार डालने का उद्योग कर रही है। मैंने उसे बहुत-कुछ समझाया और कहा कि तिलिस्म बनाने वालों के खिलाफ चलने और इन दोनों भाइयों से दुश्मनी रखने का नतीजा अच्छा न होगा परन्तु उसने न माना, बल्कि वह मेरी भी दुश्मन बन बैठी। अन्त में लाचार मुझे उसका साथ छोड़ देना पड़ा। मैंने उस तालाब वाले मकान पर अपना कब्जा कर लिया और उसी में रहने लगी। उस मकान में मैं बेफिक्र रहती हूँ। मायारानी के कई आदमियों ने, जो नेक और ईमानदार थे, मेरा साथ दिया। तिलिस्म का जितना हाल उसे मालूम है, उतना ही मुझे भी मालूम है। यही सबब है कि वह अर्थात् तिलिस्मी महारानी (मायारानी) वीरेन्द्रसिंह और उनके खानदान के साथ दुश्मनी कर रही है और मैं हर तरह से उनकी मदद कर रही हूँ। उस तिलिस्मी मकान के अन्दर इन्द्रजीसिंह और उनके साथियों तथा मेरे नौकरों का हँसते-हँसते कूद जाना उसी तिलिस्मी महारानी की कार्रवाई थी और उस खंडहर वाले तहखाने में जो कुछ तुम लोगों ने देखा, वह सब भी उसी की बदौलत थी। अफसोस, गुप्त राह से महारानी के बहुत से आदमियों के पहुँच जाने के कारण मैं कुछ कर न सकी। खैर, कोई हर्ज नहीं। कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी तथा कामिनी वगैरह का मायारानी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, क्योंकि उसकी असल जमा-पूंजी जो थी, वह मेरे हाथ लग चुकी है, जिसका खुलासा हाल इस समय मैं नहीं कह सकती। हाँ, इतना प्रतिज्ञा पूर्वक कहती हूँ कि उन लोगों को मैं बहुत जल्द कैद से छुड़ाऊँगी।

कमला – मैं समझती हूँ कि वह मकान भी तिलिस्मी होगा जिसके अन्दर कुंअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद पड़े थे।

कमलिनी – नहीं; उस मकान का तिलिस्म से कोई सम्बन्ध नहीं, वह नया बनाया गया है। मुझे उसकी खबर न थी, इसी से मैं धोखे में आ गई, पीछे पता लगाने से मालूम हुआ कि वह भी मायारानी की कार्रवाई थी।

कमला – अब मेरा जी ठिकाने हुआ और आपकी बदौलत अपनी प्यारी सखी किशोरी और कुंअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह के छूटने की उम्मीद हुई। अब आशा है कि आपकी कृपा से एक दफे मायारानी को भी देखूँगी।

कमलिनी – इसके लिए जल्दी करना मुनासिब नहीं, मैं आज ही कल में तुझे अपने साथ मायारानी के घर ले चलती, क्योंकि मुझे वहाँ जाने की बहुत जल्दी है परन्तु इस समय तेरा रोहतासगढ़ लौट जाना ही ठीक है, क्योंकि राजा वीरेन्द्रसिंह लड़कों की जुदाई में हद से ज्यादे दुःखी होंगे, तेरे लौट जाने से उन्हें ढाढ़स होगा और मेरी जुबानी जो कुछ तूने सुना है, जब उनसे बयान करेगी तो उन्हें एक प्रकार की आशा हो जायेगी। हाँ, एक बात तुझसे पूछना मैं भूल गई।

कमला – वह क्या?

कमलिनी – तू कहती है कि मैं मायारानी को देखा चाहती हूँ, तो क्या तूने उसे नहीं देखा? उसी के आदमी तो तुझे गिरफ्तार करके ले गए थे, जहाँ तक मैं समझती हूँ, तू उसके पास जरूर पहुँचाई गई होगी।

कमला – हाँ-हाँ, मैं एक जनाने दरबार में पहुँचाई गई थी, मगर यह नहीं कह सकती कि वह मायारानी का ही दरबार था या कोई दूसरा, और यदि मायारानी का ही दरबार था तो…

कमलिनी – पहले तू अपना हाल कह जा कि जब खंडहर के अन्दर तहखाने में घुसी तो क्या हुआ और क्योंकर गिरफ्तार होकर कहाँ गई?

कमला – जब हम लोग राजा वीरेन्द्रसिंह के साथ कुमार को निकालने के लिए उस खंडहर वाले तहखाने में गये तो वहाँ किसी को न पाया। सीढ़ी के नीचे एक छोटी कोठरी थी, मैं उसमें घुस गई। देखा कि पत्थर की एक सिल्ली दीवार से अलग होकर जमीन पर पड़ी हुई और उस जगह एक आदमी के जाने लायक रास्ता है। उस दरवाजे के दूसरी तरफ एक और कोठरी नजर आई जिसमें चिराग जल रहा था। मैंने आनन्दसिंह और तारासिंह को पुकारा, जब वे आ गए तो तीनों आदमी उस कोठरी के अन्दर घुसे। जब दो-तीन कदम आगे गये तो यकायक पीछे से खटके की आवाज आई, घूमकर देखा तो वह रास्ता बन्द पाया जिधर से आये थे। ताज्जुब में आकर हम लोग सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए। यकायक कई आदमी एक तरफ से निकलकर आये और उन लोगों ने फुर्ती के साथ एक-एक चादर हम लोगों के ऊपर डाल दी। मुझे उस चादर की तेज महक कभी न भूलेगी। सिर पर पड़ते ही अजब हालत हो गई, एक प्रकार की तेज महक नाक के अन्दर घुसी और उसने तन-बदन की सुध भुला दी। न मालूम उसी दिन या दूसरे या कई दिन के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को रात के समय एक जनाने दरबार में पाया।

कमलिनी – वह दरबार कैसा था?

कमला – वह दरबार एक बारहदरी में था। जड़ाऊ सिंहासन पर एक नौजवान औरत दक्षिणी ढंग की पोशाक पहने बैठी थी। मैं कह सकती हूँ कि सिवाय किशोरी के उसके मुकाबले की खूबसूरत औरत आज तक किसी ने न देखी होगी।

कमलिनी – बस-बस, मैं समझ गई, वही मायारानी थी। हाँ, और क्या देखा?

कमला – उसके दाहिनी तरफ सोने की एक चौकी पर मृगछाला बिछा हुआ था मगर उस पर कोई बैठा न था।

कमलिनी – वह तिलिस्म के दारोगा की जगह थी जो वृद्ध साधु के वेश में रहता है, मगर आजकल उसे राजा वीरेन्द्रसिंह ने कैद कर लिया है।

कमला – (ताज्जुब से) राजा वीरेन्द्रसिंह ने कब और किस दारोगा को कैद किया है?

कमलिनी – उस तिलिस्मी खंडहर में जब तुम लोग गये तो किसी साधु को बेहोश पाया था या नहीं?

कमला – (कुछ सोचकर) हाँ-हाँ, एक कोठरी के अन्दर जिसमें एक मूरत थी। क्या वही तिलिस्मी दारोगा है?

कमलिनी – हाँ, वही दारोगा है, वही बहुत से आदमियों को साथ लेकर तहखाने में से कुमार को उठा लाने के लिए उस खंडहर में गया था, मगर तारासिंह की चालाकी से अपने साथियों के सहित बेहोश हो गया। उस समय वेश बदले मेरा भी एक आदमी वहाँ मौजूद था, मगर दूर ही से सब-कुछ देख रहा था। हाँ तो उस दरबार में और क्या देखा?

कमला – उस मृगछाला बिछी हुई चौकी के पास अर्ध गोलाकार बीस जड़ाऊ कुर्सियाँ और थीं और उसी तरह सिंहासन के बाईं तरफ छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर एक खूबसूरत औरत बैठी हुई थी, जिसके बाद फिर बीस या इक्कीस जड़ाऊ कुर्सियाँ थीं, और दोनों तरफ वाली जड़ाऊ कुर्सियों पर नौजवान और खूबसूरत औरतें बड़े ठाठ से बैठी थीं। मैं उस दरबार को कभी न भूलूँगी।1

कमलिनी – ठीक है, तो अब तुझे मायारानी को देखने की कोई आवश्यकता नहीं, खैर, मुख्तसर में कह, फिर क्या हुआ?

कमला – पहले यह बता दीजिये कि मायारानी के बगल में छोटे जड़ाऊ सिंहासन पर कौन औरत थी, क्योंकि वह भी बड़ी ही खूबसूरत थी।

कमलिनी – वह मेरी छोटी बहिन थी। सबसे बड़ी मायारानी, उससे छोटी मैं और मुझसे छोटी वही औरत है, उसका नाम लाड़िली है।

कमला – आपकी और भी कोई बहिन है?

कमलिनी – नहीं, हम तीनों के सिवाय और कोई बहिन या भाई नहीं है। अब तू अपना हाल कह, फिर क्या हुआ?

कमला – मायारानी के सिंहासन के पीछे मनोरमा खड़ी थी। उन सभी की बातचीत से मुझे मालूम हुआ कि उसका नाम मनोरमा है। वह बड़ी दुष्ट थी!

कमलिनी – थी नहीं, बल्कि है। हाँ, तब क्या हुआ?

कमला – ऐसे दरबार को देख मैं घबरा गई। जिधर निगाह पड़ती थी उधर ही एक से एक बढ़ के जड़ाऊ चीजें नजर आती थीं। मैं हैरान थी कि इतनी दौलत इन लोगों के पास कहाँ से आई और ये लोग कौन हैं। मैं ताज्जुब में आकर चारों तरफ देखने लगी। यकायक मेरी निगाह कुंअर आनन्दसिंह और तारासिंह पर पड़ी। कुंअर आनन्दसिंह हथकड़ी और बेड़ी से लाचार मेरे पीछे की तरफ बैठे थे। उनके पास उन्हीं की तरह हथकड़ी-बेड़ी से बेबस तारासिंह भी बैठे थे। फर्क इतना था कि कुंअर आनन्दसिंह जख्मी न थे, मगर तारासिंह बहुत ही जख्मी और खून से तरबतर हो रहे थे। उनकी पोशाक खून से रंगी हुई मालूम पड़ती थी। यद्यपि उनके जख्मों पर पट्टी बंधी हुई थी मगर सूरत देखने से साफ मालूम पड़ता था कि उनके बदन से खून बहुत निकल गया है और इसी से वे सुस्त और कमजोर हो रहे हैं। कुमार की अवस्था देखकर मुझे क्रोध चढ़ आया, मगर क्या कर सकती थी, क्योंकि हथकड़ी और बेड़ी ने मुझे भी लाचार कर रखा था। हाथ में नंगी तलवारें लिए कई औरतें कुंअर आनन्दसिंह, तारासिंह और मुझको घेरे हुए थीं। यह जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा था कि जब हम लोग बेहोश करके यहाँ लाए गये तो तारासिंह को जख्मी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। मायारानी ने मनोरमा की तरफ देखा और कुछ इशारा किया, मनोरमा तुरत मेरे पास आई। उसके एक हाथ में कोई चीठी (चिट्ठी) थी और दूसरे हाथ में कलम और दवात। मनोरमा ने वह चीठी मेरे आगे रख दी और उस पर हस्ताक्षर कर देने के लिए मुझे कहा, मैंने चीठी पढ़ी और क्रोध के साथ हस्ताक्षर करने से इनकार किया।

  1. इसी दरबार में रामभोली का आशिक नानक गया था।

कमलिनी – उस चिट्ठी में क्या लिखा हुआ था?

कमला – वह चिट्ठी मेरी तरफ से राजा वीरेन्द्रसिंह के नाम लिखी गई थी और उसमें यह लिखा था –

“आप चिट्ठी देखते ही केवल एक ऐयार को लेकर इस आदमी के साथ बेखौफ चले आइए। कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह और किशोरी वगैरह इसी जगह कैद हैं। उनको छुड़ाने का पूरा-पूरा उद्योग मैं कर चुकी हूँ, केवल आपके आने की देर है। यदि आप तीन दिन के अन्दर यहाँ न पहुँचेंगे तो उन लोगों में से एक की भी जान न बचेगी।”

कमलिनी – अच्छा फिर क्या हुआ?

कमला – जब मैंने दस्तखत करने से इनकार किया तो मनोरमा बहुत बिगड़ी और बोली कि “यदि तू हस्ताक्षर न करेगी, तो तेरे सामने ही कुंअर आनन्दसिंह और तारासिंह का सिर काट लिया जायेगा और उसके बाद तुझे भी सूली दे दी जायेगी।”

यह सुनकर मैं घबरा गई और सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। इतने में ही तारासिंह ने मुझे पुकारकर कहा, “कमला, उस चिट्ठी में जो कुछ लिखा है, मैं अन्दाज से कुछ-कुछ समझ गया। खबरदार, इन लोगों की धमकी में न आना, और चाहे जो हो, उस चिट्ठी पर दस्तखत भी न करना।” तारासिंह की बात सुनकर मायारानी की तो केवल भौंहें ही चढ़कर रह गयीं, परन्तु मनोरमा बहुत ही उछली-कूदी और बकझक करने लगी। उसने मायारानी की तरफ देखकर कहा, “कमबख़्त तारासिंह को अवश्य सूली देनी चाहिए, उसने अब यहाँ का रास्ता भी देख लिया है इसलिए उसको मारना आवश्यक हो गया है, और इस नालायक कमला को सरकार मेरे हवाले करें, मैं इसे अपने घर ले जाऊँगी।” मायारानी ने इशारे से मनोरमा की बात मंजूर की। मनोरमा ने एक चोबदार औरत की तरफ देखकर कहा, “कमला को ले जाकर कैद में रखो। चार-पांच दिन बाद काशीजी में हमारे घर पर भिजवा देना, क्योंकि इस समय मुझे एक जरूरी काम के लिए जाना है जहाँ से तीन-चार दिन के अन्दर शायद न लौट सकूँगी।” हुक्म के साथ ही मुझ पर पुनः चादर डाल दी गई, जिसकी तेज महक ने मुझको बेहोश कर दिया और फिर जब मैं होश में आई, तो अपने को एक अंधेरी कोठरी में कैद पाया। कई दिन तक मैं उसी कोठरी में कैद रही और इस बीच में जो कुछ रंज और तकलीफ उठानी पड़ी, उसका कहना व्यर्थ है। आखिर एक दिन भोजन में मुझे बेहोशी की दवा दी गई और बेहोश होने के बाद जब मैं होश में आई तो अपने को आपके कब्जे में पाया। अब न मालूम कुंअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, किशोरी और उनके ऐयार लोगों पर क्या मुसीबत आई और वे लोग किस अवस्था में पड़े हुए हैं!

यहाँ तक कहकर कमला चुप हो गई मगर उसकी आँखों से आँसू की बूंदें बराबर जारी थीं। कमलिनी भी बड़े गौर और अफसोस के साथ उसकी बातें सुनती जाती थी और जब वह चुप हो गई तो बोली –

कमलिनी – कमला, सब्र कर, घबरा मत। देख, मैं उन लोगों को कैसा छकाती हूँ। उन लोगों की क्या मजाल जो मेरे हाथ से बचकर निकल जायें। तिलिस्मी मकान के अन्दर जब कुंअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह हँसते-हँसते कूद गये थे तो उन लोगों के पहले मैंने अपने कई आदमी उस मकान के अन्दर कुदाये थे जिसका हाल थोड़ी देर पहले मैं तुझसे कह चुकी हूँ। उन आदमियों को बेसबब दुश्मनों के हाथ में नहीं फँसाया, कुछ समझ-बूझ के ही ऐसा किया था। वे लोग साधारण मनुष्य न थे, आशा है कि थोड़े दिन में तू सुन लेगी कि उन लोगों ने क्या-क्या कार्रवाई की।

कमला – आज आपके मिलने से और बहुत-सी बातें सुनकर मेरा जी ठिकाने हुआ। आप सरीखा मददगार पाकर मैं भी अपने जी का हौसला निकालना चाहती हूँ और…

कमलिनी – नहीं-नहीं, इस समय तू और कुछ मत सोच और सीधे रोहतासगढ़ चली जा। तेरे वहाँ जाने से दो काम निकलेंगे, एक तो तेरी जुबानी सब हाल सुनकर राजा वीरेन्द्रसिंह को बहुत-कुछ ढाढ़स होगी, दूसरे, तू इस बात से भी होशियार रहना और सबको भी होशियार कर देना कि वह तिलिस्मी दारोगा अर्थात् बूढ़ा साधु कहीं धोखा देकर निकल न जाये। इसमें कोई शक नहीं कि मायारानी ने उसे छुड़ाने के लिए कई आदमी रोहतासगढ़ भेजे होंगे।

कमला – बहुत अच्छा! मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ और उस बुड्ढे कमबख़्त से होशियार रहूँगी। मगर एक भेद बहुत दिनों से मेरे दिल में खटक रहा है, यदि आप चाहें तो मेरे दिल से वह खुटका निकाल सकती हैं।

कमलिनी – वह क्या है?

कमला – (भूतनाथ की तरफ इशारा करके) यह कौन हैं इनका असल भेद मुझको बता दीजिये।

कमलिनी – (हँस कर ) इसमें सन्देह नहीं कि भूतनाथ के बारे में तरह-तरह की बातें तू सोचती होगी, परन्तु लाचार हूँ कि इस समय इनका असल भेद तुझसे नहीं कह सकती। थोड़े ही दिनों में इनका हाल तुझे ही नहीं, सभी को मालूम हो जायेगा। हाँ, इतना अवश्य कहूँगी कि तुझे अपने चाचा शेरसिंह की तरह इनसे डरने की कोई जरूरत नहीं। ये तुझे किसी तरह की तकलीफ न देंगे, बल्कि जहाँ तक हो सकेगा, तेरी मदद करेंगे।

कमलिनी से अपने सवाल का पूरा-पूरा जवाब न पाकर कमला चुप हो रही और कमलिनी की आज्ञानुसार उसको उसी समय रोहतासगढ़ चले जाना पड़ा।

बयान 6

दूसरे दिन कुछ रात बीते कमलिनी फिर मनोरमा के मकान पर पहुँची। बाग के फाटक पर उसी दरबान को टहलते पाया जिससे कल बातचीत कर चुकी थी। इस समय बाग का फाटक खुला हुआ था और उस दरबान के अतिरिक्त और भी कई सिपाही वहाँ मौजूद थे। दरबान कमलिनी को देखते ही खुशी से आगे बढ़ा और बोला, “आइये-आइये, मैं कब से आपकी राह देख रहा हूँ। नागरजी को आये दो घण्टे से ज्यादा हो गये और वे आपसे मिलने के लिए बेताब हो रही हैं।”

दरबान के साथ ही साथ कमलिनी बाग के अन्दर गई और उस आलीशान मकान के सहन में पहुँची, जो इस बाग के बीचोबीच बना हुआ था। इस मकान के कमरों, दालानों, कोठरियों, तहखानों और पेचीले रास्तों का यदि यहाँ पूरा-पूरा बयान किया जाये तो पाठकों का बहुत समय नष्ट होगा, क्योंकि इस हिकमती मकान के हर एक दर्जे और हर एक हिस्से बड़ी कारीगरी और मतलब के साथ बनाये गये हैं। यदि हमारे पाठकों को तीन-चार बार इस मकान के अन्दर जाने और रात भर रहने का मौका मिल जायेगा तो उन्हें यहाँ का बहुत भेद मालूम हो जायेगा।

कमलिनी ने नागर को सहन में टहलते हुए पाया। वह सिर नीचा किये किसी सोच में डूबी हुई टहल रही थी, कमलिनी के पैर की आहट पाकर चौंकी और बोली –

नागर – क्या मेरी सखी मनोरमा का सन्देश लेकर तुम ही आई हो?

कमलिनी – हाँ।

नागर – तुम कौन और कहाँ की रहने वाली हो, मैंने तुम्हें सिवाय आज के पहले कभी नहीं देखा।

कमलिनी – हाँ, ठीक है, परन्तु मैं अपना परिचय किसी तरह नहीं दे सकती।

नागर – यदि ऐसा है तो मैं तुम्हारी बातों पर क्योंकर विश्वास करूँगी?

कमलिनी – यदि मेरी बातों पर विश्वास न करोगी तो मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा, अगर कुछ बिगड़ेगा तो तुम्हारा या तुम्हारी सखी मनोरमा का। जब मनोरमा ने मुझे तुम्हारे पास भेजा तो मुझे इस बात का तरद्दुद हुआ और मैंने उनसे कहा कि तुम मुझे भेजती तो हो, मगर जाने से कोई काम न निकलेगा क्योंकि मैं किसी तरह अपना परिचय किसी को नहीं दे सकती और बिना मुझे अच्छी तरह जाँचे नागर मेरी बात पर विश्वास न करेंगी। इसके जवाब में मनोरमा ने कहा कि मैं लाचार हूँ, सिवाय तेरे यहाँ पर मेरा हितू कोई नहीं जिसे नागर के पास भेजूँ। यदि तू न जायेगी तो मेरी जान किसी तरह नहीं बच सकती। खैर, तुम्हें मैं एक शब्द बताती हूँ, मगर खबरदार, वह शब्द सिवाय नागर के किसी दूसरे के सामने जबान से न निकालना। जिस समय नागर तेरी जबान से वह शब्द सुनेगी, उसी समय उसका शक जाता रहेगा और जो कुछ तू उसे कहेगी वह अवश्य करेगी। आखिर मनोरमा ने वह शब्द मुझे बताया और उसी के भरोसे मैं यहाँ तक आई हूँ।

नागर – (कुछ सोचकर) वह शब्द क्या है?

कमलिनी – (चारों तरह देखकर और किसी को न पाकर) ‘विकट’!

नागर – (कुछ देर तक सोचने के बाद) खैर, मुझे तुम पर भरोसा करना पड़ा। अब कहो, मनोरमा किस अवस्था में है और मुझे क्या करना चाहिए?

कमलिनी – मनोरमा भूतनाथ से मिलने के लिए गई थी। मगर उससे मुलाकात होने पर न मालूम कौन-सा ऐसा सबब आ पड़ा कि उसने भूतनाथ का सिर काट लिया।

नागर – (चौंककर) हैं! भूतनाथ को मार ही डाला।

कमलिनी – हाँ, उस समय मैं मनोरमा के साथ, मगर कुछ दूर पर, खड़ी यह हाल देख रही थी।

नागर – अफसोस, मनोरमा ने बहुत ही बुरा किया! आजकल भूतनाथ से बहुत कुछ काम निकलने का जमाना था। खैर, तब क्या हुआ?

कमलिनी – मनोरमा को मालूम न था कि राजा वीरेन्द्रसिंह का ऐयार तेजसिंह इस समय थोड़ी ही दूर पर एक पेड़ की आड़ में खड़ा भूतनाथ और मनोरमा की तरफ देख रहा है।

नागर – ओफ, तेजसिंह को भूतनाथ के मरने का सख्त रंज हुआ होगा, क्योंकि इन दिनों भूतनाथ दिलोजान से उन लोगों की मदद कर रहा था, अच्छा तब…

कमलिनी – तेजसिंह बड़ी फुर्ती से उस जगह जा पहुँचा, जहाँ मनोरमा खड़ी थी और एक लात मनोरमा की छाती पर ऐसी लगाई कि वह बदहवास हो जमीन पर गिर पड़ी। तेजसिंह ने उसकी मुश्कें बांध लीं और जफील बजाई, जिसकी आवाज सुन कई आदमी वहाँ आ पहुँचे। उन लोगों ने मनोरमा के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर लिया। उसी समय मनोरमा के कई सवार दूर से आते हुए दिखाई पड़े, मगर उन लोगों के पहुँचने के पहले ही तेजसिंह और उसके साथी हम दोनों को लेकर वहाँ से थोड़ी दूर पर पेड़ों की आड़ में जा छिपे। दूसरे दिन हम दोनों ने अपने को रोहतासगढ़ किले के अन्दर पाया। मनोरमा ने अपने छूटने की बहुत-कुछ कोशिश की, मगर कोई काम न चला। आखिर उसने तेजसिंह से कहा कि “भूतनाथ बड़ा ही शैतान, नालायक और खूनी आदमी था; उसका असल हाल आप लोग नहीं जानते, यदि जानते तो आप लोग खुद भूतनाथ का सिर काट डालते।” इसके जवाब में तेजसिंह ने कहा कि “यदि इस बात को तू साबित कर दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा।” मनोरमा ने मेरी तरफ इशारा करके कहा कि “यदि आप इसे छोड़ दें और पांच दिन की मोहलत दें तो इसे मैं अपने घर भेजकर भूतनाथ के लिखे थोड़े कागजात ऐसे मंगा दूँ कि जिन्हें पढ़ते ही आपको मेरी बातों पर विश्वास हो जाये और भूतनाथ का वह विचित्र हाल भी, जिसे आप लोग नहीं जानते, मालूम हो। यदि मैं झूठी निकलूँ तो जो कुछ चाहें, मुझे सजा दीजियेगा।” तेजसिंह ने कुछ देर सोच-विचार कर कहा कि “हो सकता है मुझसे बहाना करके इसे तुम अपने घर भेजो और किसी तरह की मदद मंगाओ, मगर मुझे इसकी कुछ परवाह नहीं, मैं तुम्हारी बात मंजूर करता हूँ और इसे (मेरी तरफ इशारा करके) छोड़ देता हूँ, जो कुछ चाहो, इसे समझा-बुझाकर अपने घर भेजो।” इसके बाद मुझसे निराले में बातचीत करने के लिए आज्ञा मांगी गई और तेजसिंह ने उसे भी मंजूर किया। आखिर मनोरमा ने मुझे बहुत-कुछ समझा-बुझाकर तुम्हारे पास रवाना किया। अब मैं तो रोहतासगढ़ जाने वाली नहीं, क्योंकि बड़ी मुश्किल से जान बची है, मगर तुम्हें मुनासिब है कि जहाँ तक हो सके, भूतनाथ के कागजात लेकर जल्द रोहतासगढ़ जाओ और अपनी सखी के छुड़ाने का बन्दोबस्त करो।

कमलिनी की बातें सुनकर नागर सोच-सागर में डूब गयी। न मालूम उसके दिल में क्या-क्या बातें पैदा हो रही थीं, मगर लगभग आधी घड़ी के वह चुपचाप बैठी रही। इसके बाद उसने सिर उठाया और कमलिनी की तरफ देखकर कहा, “खैर, अब मुझे रोहतासगढ़ जाना जरूरी हुआ। रात-भर में वे सब इन्तजाम करके सबेरे या कुछ दिन चढ़े रवाना हो जाऊँगी।”

कमलिनी – अच्छा, तो मेरे जिम्मे जो कुछ काम था उसे मैं कर चुकी। अब तुम जो मुनासिब समझो करो और मुझे आज्ञा दो कि जाऊँ और अपना काम देखूँ।

नागर – इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुमने मुझ पर और मनोरमा पर भारी अहसान किया। अब मैं चाहती हूँ कि आज की रात यहाँ रह जाओ क्योंकि मनोरमा को छुड़ाने के लिए रात भर में मैं जो कुछ इन्तजाम करूँगी, उसका हाल सबेरे तुमसे कहूँगी और उसके बाद तुमसे कुछ सलाह करके तब रोहतासगढ़ जाऊँगी।

कमलिनी – मैं इस योग्य नहीं हूँ कि तुम्हें राय दूँ, परन्तु रात भर के लिए अटक जाने में मेरा कोई हर्ज नहीं है, यदि इससे आप लोगों की कुछ भी भलाई हो।

नागर ने कमलिनी के लिए एक कमरा खोल दिया और उसके खाने-पीने के लिए बखूबी इन्तजाम कर दिया।

बयान 7

आधी रात जा चुकी है। कमलिनी उस कमरे में, जो उसके सोने के लिए मुकर्रर किया गया था, चारपाई पर लेटी हुई करवटें बदल रही है क्योंकि उसकी आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं है। उसके दिल में तरह-तरह की बातें पैदा होती और मिटती हैं। उसे इस कोठरी की बनावट ने और भी तरद्दुद में डाल रखा है। यद्यपि इस कोठरी में विशेष सामान नहीं और न किसी तरह की सजावट ही है, केवल एक चारपाई जिस पर कमलिनी सोई है और एक चौकी पड़ी है तथा कोने में एक शमादान जल रहा है, परन्तु तीन तरफ की दीवारों पर वह ताज्जुब और तरद्दुद की निगाह डाल रही है। इस कमरे की एक तरफ की दीवार, जिधर से इसमें आने के लिए दरवाजा था, ईंट और चूने से बनी हुई थी, परन्तु बाकी तीन तरफ की दीवारें तख्तेबन्दी की थीं, अर्थात् लकड़ी से बनी हुई थीं। कमलिनी के दिल में शक पैदा हुआ और उसने सोचा कि इस तख्तेबन्दी की दीवारों में कोई भेद जरूर है। इस मकान का कुछ-कुछ भेद कमलिनी को मालूम था, पर यहाँ का पूरा-पूरा हाल वह नहीं जानती थी और जानने की इच्छा रखती थी। आखिर कमलिनी से रहा न गया, और वह चारपाई से उठी। पहले उसने उस दरवाजे को भीतर की तरफ से बन्द किया जो इस कमरे में आने-जाने के लिए था। इसके बाद कमर से खंजर निकाल लिया और उसके कब्जे से तख्तेबन्दी की दीवारों को जगह-जगह से ठोंककर देखने लगी। एक जगह से उसे दीवार पोली मालूम पड़ी और उस पर वह बखूबी गौर करने लगी। जब कुछ मालूम न हुआ तो उसने शमादान उठा लिया और फिर उस जगह को गौर से देखा। थोड़ी ही देर में उसे विश्वास हो गया कि यहाँ पर एक छोटा-सा दरवाजा है, क्योंकि दरवाजे के चारों तरफ की बारीक दरार का निशान बहुत गौर करने पर मालूम होता था। कमलिनी ने दरार में खंजर की नोक चुभोई और उसे अच्छी तरह दो-चार बार हिलाया। दरार बड़ी हो गयी और आधा खंजर उसके अन्दर चला गया। फिर से कोशिश करने पर लकड़ी का एक तख्ता अलग हो गया और दूसरी तरफ जाने लायक रास्ता निकल आया।

हाथ में शमादान लिए हुए कमलिनी अन्दर घुसी और एक बहुत लम्बी-चौड़ी कोठरी में पहुँची। इस कोठरी में चारों तरफ की दीवार भी तख्तेबन्दी की थी। इसमें कई चीजें ऐसी पड़ी हुई थीं जिनके देखने से चाहे कैसा ही संगदिल और दिलावर आदमी क्यों न हो, एक दफे जरूर काँप उठे और उसका कलेजा मामूली से चौगुना और अठगुना धड़कने लग जाये।

इस कोठरी में एक घोड़े की लाश थी, मगर वह अजीब ढंग की थी। उसके चारों तरफ चार खूंटियाँ जमीन में गड़ी हुई थीं और उन खूंटियों के सहारे उस घोड़े के चारों पैर बंधे हुए थे। उस घोड़े का पेट चीरा हुआ और आंतें निकालकर बाहर रखी हुई थीं। चारों तरफ खून फैला हुआ था, मालूम होता था कि यह घोड़ा किसी काम के लिए आज ही मारा गया है। उसके पास ही थोड़ी दूर पर फूलों के कई गमले रखे हुए थे और उनके पास ही एक सुन्दर बिछौना था जिस पर सफेद चादर बिछी हुई थी तथा उस पर एक आदमी गर्दन तक सफेद ही चादर ओढ़े सो रहा था। घोड़े के पास से लेकर उस बिछावन तक पैर से लगे हुए खून के दाग जमीन पर दिखाई दे रहे थे और बिछावन की चादर तथा उस चादर में भी, जो वह आदमी ओढ़े हुए था, खून के धब्बे लगे हुए थे।

उस आदमी को देखकर कमलिनी इसलिए हिचकी कि कहीं वह जागकर कमलिनी को देख न ले, मगर थोड़ी देर तक खड़े रहने पर भी उसके हिलने-डुलने अथवा उसकी सांस चलने की आहट न मिली। तब कमलिनी हाथ में शमादान लिए हुए उस बिछावन के पास गई और रोशनी में उस आदमी की सूरत देखने लगी जिसका बिल्कुल चेहरा बखूबी खुला हुआ था। सूरत देखते ही कमलिनी चौंक पड़ी और शमादान जमीन पर रख बेधड़क उस आदमी का बाजू पकड़  के हिलाने और यह कहकर उसको जगाने का उद्योग करने लगी कि “वाह-वाह! तुम यहाँ बेखबर पड़े हुए हो और मुझे इसका हाल जरा भी नहीं मालूम!”

जब बाजू पकड़ के हिलाने से भी वह आदमी न जागा तब कमलिनी को ताज्जुब हुआ और गौर से उसकी सूरत देखने लगी, मगर नब्ज पर हाथ रखा तो मालूम हो गया कि वह जिन्दा नहीं, बल्कि मुर्दा है। यह जानते ही कमलिनी का जी भर आया और वह मुर्दे के सिर पर हाथ रखकर रोने और गरम-गरम आँसू गिराने लगी। थोड़ी देर तक कमलिनी इसी अवस्था में पड़ी रही, आखिर वह चैतन्य हुई और यह कहकर उठ खड़ी हुई कि “बात तो बहुत ही बुरी हुई, मगर इस समय मुझे सब्र करना चाहिए, नहीं तो कुछ भी न कर सकूँगी। हाय, मेरा दिल और मेरे काबू में न रहे! नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मैं पूरा-पूरा सब्र करूँगी और देखूंगी कि क्या कर सकती हूँ। इसमें जरा भी सन्देह नहीं कि इसकी जान निकले चार पहर से ज्यादा अभी नहीं हुए।” कमलिनी फिर शमादान उठाकर उस कोठरी में घूमने और चारों तरफ देखने लगी। पूरब और दक्खिन के कोने में एक लाश छत से लटकती हुई दिखाई पड़ी, जिसके गले में फांसी लगी थी। वह ताज्जुब के साथ शमादान ऊँचा करके उसकी सूरत देखने लगी, जब अच्छी तरह पहचान चुकी तो नफरत के साथ उस लाश पर थूककर अपना मुँह फेर लिया और दूसरी तरफ चली ही थी कि यह आवाज सुनकर ठहर गई और उस तरफ देखने लगी, जिधर से आवाज आई थी। आवाज यह थी – “हाय, मौत को भी मौत आ गई!” उसे ताज्जुब मालूम हुआ कि यह आवाज किधर से आई! वह यह देखने के लिए उस तरफ बढ़ी, जिधर से आवाज आई थी कि शायद कोई सूराख या खिड़की दिखाई दे और आखिर ऐसा ही हुआ। दीवार के पास पहुँचते ही एक सूराख ऐसा दिखा जिसमें आदमी की गर्दन बखूबी जा सकती थी। यह टेढ़ा और नीचे की तरफ झुका हुआ सूराख, जिसे किसी कमरे का रोशनदान कहना चाहिए, दीवार के बिल्कुल नीचे की तरफ था।

कमलिनी ने उस सूराख में से झांककर देखा तो एक छोटे से मगर सजे हुए कमरे में निगाह गई। यह कमरा उस कोठरी से एक खंड नीचे था जिसमें से कमलिनी झांक रही थी। उस कमरे में जो कुछ कमलिनी ने देखा, उससे उसके दिल को बड़ा ही सदमा पहुँचा और जब तक वह देखती रही आँखों से आँसू बराबर जारी रहे।

कमलिनी ने देखा कि एक पलंग पर, जिसके पास ही शमादान जल रहा है, आफत की मारी बेचारी किशोरी पड़ी हुई है। रंज और गम के मारे सूखकर कांटा हो रही है। चेहरे पर मुर्दनी छायी हुई है और कमजोरी की यह अवस्था है कि सांस भी मुश्किल से आती-जाती है। थोड़ी-थोड़ी देर पर उसके होंठ हिलते हैं और धीरे-धीरे कुछ कहती है, मगर जब कहती है तो उसकी आवाज साफ सुनाई देती है। वह कह रही थी –

“हाय, इससे बढ़कर मेरी दुर्दशा और क्या हो सकती है! इन्द्रजीतसिंह, तुम्हारी मुहब्बत में मैं यहाँ तक पहुँच चुकी, कुल में कलंकिनी कहलाई, लज्जा को तिलांजलि दे बैठी, और वह सब दुःख झेलने को तैयार हुई, यह सब तुम्हारी बदौलत…

(थोड़ी देर चुप रहकर) यहाँ तक रोई कि अब आँखों में आँसू भी नहीं रहे। खाना-पीना छोड़ देने पर भी निगोड़ी जान नहीं निकलती। हाय, मौत को भी मौत आ गई! नहीं-नहीं, मौत को मौत नहीं आई, वह देखो, मेरे सामने खड़ा हुआ काल मेरी तरफ देख रहा है। अब कुछ दम की मेहमान हूँ। मैं तो जाती हूँ, मगर अफसोस, अपने प्यारे की जुदाई का रंज और उसकी बेवफाई और बेमुरौवती की शिकायत अपने साथ लिए जाती हूँ। हाय, इस समय ऐसा कोई भी नहीं जो मेरी हालत देखे और मेरा हाल उनसे जाकर…

(थोड़ी देर चुप रहकर) जब उनको मेरी परवाह ही नहीं, तो मेरा हाल कोई उनसे कहकर करेगा ही क्या उन्होंने तो खुद कहला भेजा है कि मुझे कुछ भी परवाह नहीं। हाय, मैं ऐसी बात कैसे सुन सकी! उसी समय मेरी जान क्यों न निकल गई! नहीं-नहीं, यह सब ऐयारी है, उन्होंने ऐसी बात कभी न कही होगी। पर इससे क्या हो सकता है जबकि दम निकलने में कुछ कसर बाकी नहीं है। देखो-देखो वह काल अब मेरी तरफ बढ़ा चला आता है। अच्छा है, किसी तरह वह सायत आए भी तो। हे सर्वशक्तिमान जगदीश्वर, मैं तुम्हीं को गवाह रखती हूँ क्योंकि तुम खूब जानते हो कि मैं निर्दोष इस दुनिया से उठी जाती हूँ और इन्द्रजीतसिंह की मुहब्बत के सिवाय अपने साथ कुछ भी नहीं लिए जाती, हाँ उस प्यारे की…”

इसके बाद बहुत देर तक राह देखने पर भी कुछ सुनाई न दिया। कमलिनी ने समझा कि या तो इसे कमजोरी से गश आ गया और या इस हसरत की मारी बेचारी का दम ही निकल गया। इस समय कमलिनी ने जो कुछ देखा या सुना, वह उसे बेसुध करने के लिए काफी था। कमलिनी जार-जार रो रही थी, यहाँ तक कि हिचकी बंध गई और उसे इस बात का ध्यान बिल्कुल ही जाता रहा कि मैं यहाँ किस काम के लिए आई हूँ, क्या कर रही हूँ और इस समय कैसे खतरे में फंसी हुई हूँ।

कमलिनी के लिए यह समय बड़े ही संकट का था। वह नहीं चाहती थी कि बेचारी किशोरी का पूरा-पूरा हाल जाने या उसे किसी तरह की मदद पहुँचाए बिना यहाँ से चली जाये और साथ ही इसके भूतनाथ के कागजात को भी, जिनके लेने का वह पूरा-पूरा उद्योग कर चुकी थी, किसी तरह छोड़ नहीं सकती थी, क्योंकि यह मौका निकल जाने पर फिर उनका हाथ लगना बहुत ही कठिन था।

किशोरी की हालत पर अफसोस करती हुई कमलिनी अभी नीचे देख ही रही थी कि यकायक उस कमरे का दरवाजा खुला और एक खूबसूरत नौजवान अमीराना पोशाक पहने अन्दर आता हुआ दिखाई पड़ा। उसके पीछे हाथ में पंखा लिए एक लौंडी भी थी जिसने अन्दर पहुँचने पर उस दरवाजे को उसी तरह बन्द कर दिया।

इस नौजवान की उम्र लगभग पच्चीस वर्ष के होगी। दरम्याना कद, गोरा रंग, हाथ-पैर से मजबूत और खूबसूरत था। वह किशोरी के पलंग के पास आकर खड़ा हो गया और गौर से उसकी तरफ देखने लगा। उस पलंग के पास ही एक मोढ़ा कपड़े से मढ़ा हुआ पड़ा था जिसे लौंडी उठा लाई और पलंग के पास रखकर पंखा झलने लगी। नौजवान ने बड़े गौर से किशोरी की नाड़ी देखी और फिर उस लौंडी की तरफ मुँह करके कहा, “गश आ गया है।”

लौंडी – कमजोरी के सबब से।

नौजवान – एक तो बीमार, दूसरे कई दिन से खाना-पीना सब छोड़ दिया, फिर ऐसी नौबत तो हुआ ही चाहे। अफसोस, यह मेरी बात नहीं मानती और मुफ्त में जान दे रही है।

लौंडी – इस जिद का भी कोई ठिकाना है!

नौजवान – खैर चाहे जो हो, मगर दो बात से तीसरी कभी हो ही नहीं सकती, या तो यह मेरी होकर रहेगी या इसी अवस्था में पड़ी-पड़ी यमलोक को सिधार जायेगी। अच्छा, इसे होश में लाना चाहिए।

“जो हुक्म” कहकर लौंडी वहाँ से चली गई और एक अलमारी में से जो पलंग के सिरहाने की तरफ थी, कई बोतलें निकाल लाई, जिन्हें उस नौजवान के पास रखकर वह फिर पंखा झलने लगी।

नौजवान ने अपनी जेब में से रूमाल निकालकर एक बोतल के अर्क से उसे तर किया और दूसरी बोतल में से थोड़ा-सा अर्क हाथ में लेकर किशोरी के मुँह पर छींटा दिया। इसके बाद वही रूमाल नाक के पास ले जाकर कुछ देर तक सुंघाया। थोड़ी देर में किशोरी का गश जाता रहा और उसने आंख खोलकर देखा मगर जैसे ही उस नौजवान पर निगाह पड़ी वह काँप उठी और दोनों हाथों से मुँह ढाँपकर बोली –

“हाय, न मालूम यह चाण्डाल अब क्यों मेरे पास आया है!”

नौजवान – मैं इसी वास्ते आया हूँ कि एक दफे तुमसे और पूछ लूँ।?

किशोरी – एक दफे क्या सौ दफे कह चुकी कि तू मुझसे किसी तरह की उम्मीद न रख। मैं तेरी सूरत देखने की बनिस्बत मौत को हजार दर्जे अच्छा समझती हूँ!

नौजवान – क्या अभी तक तुझे इस बात की उम्मीद है कि इन्द्रजीतसिंह आकर तेरी मदद करेंगे और छुड़ा ले जायेंगे?

किशोरी – मुझे क्या पड़ी है कि इन सब बातों का तुझे जवाब दूँ, मैं तुझ पर बल्कि तेरे सात पुश्त पर थूकती हूँ। चाण्डाल, हट जा मेरे सामने से।

लौंडी – (नौजवान से) हुजूर, इस कमीनी औरत से क्यों बेइज्जती करा रहे हैं इसमें क्या ऐसा हीरा जड़ा है?

नौजवान क्रोध के मारे काँपने लगा, आँखें लाल हो गईं, और दांत पीसता हुआ मोढ़े पर से उठ गया। दाहिने हाथ से वह छुरा निकाल लिया, जो उसकी कमर में छिपा हुआ था और बाएँ हाथ से किशोरी का हाथ पकड़कर यह कहता हुआ उसकी तरफ झुका, “जब ऐसा ही है तो मैं इसी समय क्यों न तुझे यमलोक पहुँचाऊँ!”

उस नौजवान और किशोरी की यह अवस्था देखकर कमलिनी परेशान हो गई और सोचने लगी कि इस जल्दी में कौन-सी तरकीब की जाये कि किशोरी की जान बचे। मगर वह कर ही क्या सकती थी एक तो वह स्वयं चोरों की तरह कोठरियों में घूम रही थी, यदि किसी को जरा भी शक हो जाये तो उसकी जान पर आ बने। दूसरे, कोई ऐसा रास्ता भी नहीं दिखाई देता था जिधर से किशोरी के पास पहुँचकर उसकी सहायता करती, मगर इसमें कोई सन्देह नहीं कि कमलिनी बहुत होशियार, चालाक और बुद्धिमान थी। उसने बहुत जल्द ही दिल में इस बात का फैसला कर लिया कि अब क्या करना चाहिए। एक खयाल बिजली की तरह उसके दिल में दौड़ गया। मगर देखना चाहिए उससे कहाँ तक काम निकलता है।

जिस समय किशोरी को मारने के लिए वह नौजवान झुका और कमलिनी को मालूम हुआ कि अब उस बेचारी का काम तमाम होना चाहता है, उसी समय कमलिनी ने अपनी कमर से तिलिस्मी खंजर निकाल लिया और जिस मोखे में देख रही थी उसके अन्दर डालकर उसका कब्जा दबाया1। यह खंजर बिजली की तरह चमका और उस कोठरी में इतनी ज्यादा चमक या रोशनी पैदा हुई कि तुरत किशोरी और उस नौजवान की आँखें बिल्कुल बन्द हो गईं, जो किशोरी को मारना चाहता था, इसके साथ ही कमलिनी ने भारी स्वर में यह आवाज दी, “खबरदार! किशोरी की जान लेकर अपनी जान का ग्राहक मत बन!”

उस बिजली की चमक ने तो नौजवान को परेशान कर ही दिया था, मगर साथ ही कमलिनी की आवाज ने जो गैब की आवाज मालूम होती थी, उसे बदहवास कर दिया और वह इतना डरा और घबराया कि बिना कुछ सोचे और किशोरी को दुःख दिये उस कोठरी से निकल भागा। कमलिनी ने भी अब उस जगह ठहरना मुनासिब न जाना। जहाँ तक जल्द हो सका अपने कमरे में चली आई। उस तख्ते के दरवाजे को जिसे खोल दूसरी कोठरी में गई थी ज्यों-का-ज्यों बन्द करने के बाद अपने कमरे का दरवाजा भी खोल दिया जो दूसरी कोठरी में जाने के पहले भीतर से बन्द कर लिया था।

इस समय रात बहुत थोड़ी रह गई थी। कमलिनी ने चाहा कि दो घण्टे आराम करे, मगर जो कुछ अद्भुत बातें उसने देखी और सुनी थीं, उनके खयाल और विचार ने आराम लेने न दिया और उसे किसी तरह नींद न आई। अभी आसमान पर सुबह को सफेदी अच्छी तरह फैलने भी नहीं पाई थी कि दरवाजा खुलने की उसे आहट मालूम हुई, कमलिनी ने दरवाजे की तरफ देखा तो नागर पर नजर पड़ी।

कमलिनी पहले ही से सोचे हुए थी कि आज की अद्भुत बातों का असर कुछ न कुछ नागर पर जरूर पड़ेगा और वह सबेरा होने से पहले ही यहाँ पहुँचेगी बल्कि ताज्जुब नहीं कि वह मुझ पर किसी तरह का शक भी करे। आखिर कमलिनी का सोचना ठीक निकला।

इस समय नागर के चेहरे पर परेशानी और उदासी छाई हुई थी। उसने आते ही कमलिनी पर एक तेज निगाह डाली और सवाल करना शुरू किया –

नागर – इस समय तुम्हारी आँखें लाल मालूम होती हैं, क्या नींद नहीं आई?

कमलिनी – हाँ, दो घण्टे के लगभग तो मैं सोई मगर फिर नींद नहीं आई, अभी तक डर के मारे मेरा कलेजा काँप रहा है। यह उम्मीद न थी कि तुम मुझे ऐसी भयानक जगह सोने के लिए दोगी क्योंकि मैंने तुम्हारे साथ किसी तरह की बुराई नहीं की थी।

नागर – (ताज्जुब से) सो क्या तुम्हें किस बात की तकलीफ हुई और यहाँ पर क्या भयानक वस्तु देखने में आई?

कमलिनी – मैं यहाँ पर अब एक सायत भी नहीं ठहर सकती, केवल तुम्हारी राह देख रही थी।

नागर – आखिर मामला क्या है, कुछ कहो भी तो।

कमलिनी – अच्छा, बाहर चलो तो जो कुछ देखा है तुमसे कहूँ।

इसमें कोई शक नहीं कि नागर बहुत तेजी के साथ आई थी और उसे कमलिनी पर शक था मगर कमलिनी ने ऐसे ढंग से बातें कीं कि उसकी हालत बिल्कुल ही बदल गई और वह तरह-तरह के सोच में पड़ गई। नागर और कमलिनी बाहर आईं और सहन में एक संगमरमर की चौकी पर बैठकर बातचीत करने लगीं।

नागर – हाँ कहो, तुमने क्या देखा?

कमलिनी – दो घण्टे तो मैं बड़े आराम से सोई पर यकायक घड़घड़ाहट की आवाज सुन चौंक पड़ी और घबराकर चारों तरफ देखने लगी।

नागर – घड़घड़ाहट की आवाज कैसी?

कमलिनी – मालूम होता था कि इस कमरे के नीचे कई गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। पहले तो मुझे शक हुआ कि शायद भूकम्प आने वाला है, क्योंकि उसके पहले भी प्रायः ऐसी घटना हुआ करती है, मगर सो न हुआ। आखिर थोड़ी देर तक राह देखकर फिर सो रही। आधा घण्टा भी न हुआ होगा कि मेरी चारपाई हिली, मैं घबराकर उठ बैठी और अपने सामने एक कम-उम्र लड़के को देखकर ताज्जुब करने लगी।

नागर – (ताज्जुब से) कम-उम्र लड़का! या कोई औरत थी, शायद तुमने अच्छी तरह खयाल न किया हो।

कमलिनी – जी नहीं, जहाँ तक मैं समझती हूँ, वह लड़का ही था!

नागर – भला उसकी उम्र क्या होगी और सूरत-शक्ल कैसी थी?

कमलिनी – शायद चौदह या पन्द्रह वर्ष होगी, चेहरा खूबसूरत और रंग गोरा, सिर पर मुंड़ासा बांधे और हाथ में एक बड़ा-सा डिब्बा लिए था।

नागर – (कुछ सोचकर) तुमने धोखा खाया, वह जरूर कोई औरत बल्कि कमलिनी… अच्छा, तब क्या हुआ?

कमलिनी – उसने आते ही मुझसे पूछा कि ‘सच बता, किशोरी कहाँ है।

नागर – आते ही किशोरी को पूछा?

कमलिनी – जी हाँ। मैंने जवाब दिया कि ‘मुझे खबर नहीं’। इतना सुनते ही उसकी आँखें लाल हो गईं और गुस्से के मारे थरथर काँपने लगा। उसने वह बड़ा डिब्बा जो हाथ में लिए था जमीन पर दे मारा। उस डिब्बे में से इतनी तेज चमक पैदा हुई कि जिसे मैं अच्छी तरह बयान नहीं कर सकती। मालूम होता था कि आसमान से उतरकर कई बिजलियाँ एक साथ कमरे के अन्दर आ घुसी हैं। मेरी आँखें एकदम बन्द हो गईं और मैं काँपकर चारपाई पर गिर पड़ी। थोड़ी देर बाद मालूम हुआ कि कोई आदमी मेरे बदन पर हाथ फेर रहा है। बस, उस समय मैं बेहोश हो गई और तन-बदन की सुध जाती रही। मैं समझती हूँ कि कोई पहर भर के बाद मुझे होश आई और तब से बराबर जाग रही हूँ। मैंने बहुत चाहा कि कमरे से निकल भागूँ मगर डर के मारे हाथ-पैर ऐसे कमजोर हो गए थे कि चारपाई से उठ न सकी, इस समय जब तुम्हारी सूरत देखी तो जरा जी ठिकाने हुआ।

नागर – (कुछ देर सोचने के बाद धीरे से) बेशक यह काम मंझली रानी का है, दूसरे का नहीं।

कमलिनी – मंझली रानी कौन?

नागर – तुम उसे नहीं जानती हो।

कमलिनी – खैर, जो हो, मैं तो सोचे हुए थी कि कल या परसों जब मैं अपना काम करके लौटूँगी और एक रात इस शहर में काटने की नौबत आवेगी तो बस इसी मकान में रह जाऊँगी, क्योंकि मनोरमा की मोहब्बत के भरोसे इसे भी अपना घर समझती हूँ, मगर रात की बात ने ऐसा डरा दिया कि अब हिम्मत नहीं पड़ती।

नागर – नहीं-नहीं, तुम जब इधर आया-जाया करो तो यहाँ जरूर टिका करो और इस मकान को अपना ही समझो। मैं लौंडियों और नौकरों को इस विषय में पूरा-पूरा हुक्म देती हूँ। यह भयानक घटना जो आज हुई है, रोज नहीं हो सकती, इससे निश्चिंत रहो।

कमलिनी – क्या कहूँ, अभी तक होश हवास दुरुस्त नहीं हुए।

नागर – जरा ठहरो, मैं इस कमरे में जाती हूँ और एक चीज देखकर अभी लौट आती हूँ।

नागर उठी और उस कमरे में चली गई जिसमें कमलिनी सोई थी। मगर थोड़ी देर बाद आकर बोली, “तुम बेखौफ रहो, आज के बाद फिर कभी इस मकान में ऐसी घटना न देखोगी। क्या करूँ लाचार हूँ, क्योंकि इस समय मुझे झख मारकर रोहतासगढ़ मनोरमा को छुड़ाने के लिए जाना ही पड़ेगा नहीं तो आज एक भारी काम निकलने का मौका आ गया था।”

कमलिनी – तुमने क्या कहा, मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया।

नागर – इन बातों को तुम नहीं समझ सकतीं। खैर, अब तुम्हारा क्या इरादा है मैं तो रोहतासगढ़ जाने के लिए तैयार हो चुकी हूँ।

कमलिनी – अच्छी बात है। जहाँ तक हो सके जल्दी जाओ, मैं भी एक जरूरी काम के लिए मिर्जापुर जाती हूँ, कल या परसों तक लौटूँगी। मैं तो कल ही चली जाती, मगर तुमने व्यर्थ मुझे रोक लिया।

नागर – मैंने व्यर्थ नहीं रोका था, मगर हाँ, अब उसे व्यर्थ ही कहना चाहिए, खैर माफ करो और कृपा करके मेरी एक बात स्वीकार करो तो बड़ा अहसान मानूँगी।

कमलिनी – वह क्या?

नागर – इस समय तो मैं रोहतासगढ़ जाती हूँ, क्या जाने कब तक लौटना हो, मगर तुम पन्द्रह दिन के अन्दर मुझसे एक दफे जरूर मिलो।

कमलिनी – पन्द्रह दिन तक तो मैं इस प्रान्त में नहीं रह सकती, हाँ पांच-सात दिन तक में यदि मुझसे मिल सको तो ठीक है।

नागर – शायद पांच-सात दिन तक मेरा लौटना न हो।

कमलिनी – ऐसा नहीं हो सकता, तुम जिस समय पहुंचोगी और भूतनाथ के कागजात तेजसिंह को दिखाओगी, उसी समय मनोरमा की छुट्टी हो जायेगी। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि तेजसिंह बात का बड़ा धनी है।

नागर – यदि ऐसा हो तो मैं अपने तेज घोड़े पर सवार होकर कल बखूबी रोहतासगढ़ पहुँच सकती हूँ।

कमलिनी – ऐसा करो तो तुम चार ही दिन में लौट आओगी। मैं भी कल या परसों मिर्जापुर से आ जाऊँगी और जब तक तुम न लौटोगी इस मकान में टिकी रहूँगी, क्योंकि मनोरमा ने पुनः मिलने के लिए मुझसे कसम खिला ली है। अस्तु, पांच-चार दिन तक अपना हर्ज करके भी मनोरमा के लिए यहाँ अटकना आवश्यक है।

नागर – बहुत अच्छी बात है। जब मनोरमा से वायदा कर चुकी हो तो मुझे विशेष कहने की कोई आवश्यकता नहीं।

कमलिनी – अच्छा तो आप अब मेरा एक काम करें।

नागर – कहिये।

कमलिनी – अपने किसी आदमी को भेजकर एक घोड़ा किराये का मंगवा दीजिए, जिस पर सवार होकर मैं मिर्जापुर जाऊँ, क्योंकि यद्यपि मैं ऐयार हूँ, परन्तु रोहतासगढ़ से यहाँ तक तेजी के साथ आने के कारण बहुत सुस्त हो रही हूँ।

नागर – क्या मनोरमा के घर में घोड़ों की कमी है जो तुम्हारे लिए किराये का घोड़ा मंगवाया जाये।

इतना कहकर नागर चली गई। थोड़ी देर के बाद एक लौंडी आई जिसने कमलिनी को स्नान इत्यादि से छुट्टी पा लेने के लिए कहा। कमलिनी ने दो-एक जरूरी काम से तो छुट्टी पा ली, मगर स्नान करने से इन्कार किया और अपने बटुए से सामान निकालकर चीठी लिखने लगी।

घण्टे भर बाद सफर के सामान से लैस होकर कई लौंडियों को साथ लिए हुए नागर भी उसी जगह आ पहुँची जहाँ कमलिनी बैठाई गई थी। उस समय कमलिनी चीठी लिख चुकी थी।

नागर – मैंने तुम्हारे पास इसलिए एक लौंडी भेजी थी कि तुम्हें नहला-धुला दे मगर तुमने…

कमलिनी – हाँ, मैंने स्नान नहीं किया क्योंकि इस समय अर्थात् सूर्योदय के पहले स्नान करने की मेरी आदत नहीं। कहीं स्नान कर लूँगी, और कामों से छुट्टी पा चुकी हूँ।

नागर – खैर, कुछ मेवा खाकर जल पी लो।

कमलिनी – नहीं, इस समय माफ करो। हाँ, थोड़ा-सा मेवा साथ रख लूँगी जो सफर में काम आवेगा।

थोड़ी देर बाद दो घोड़े कसे-कसाये लाए गये, एक पर नागर और दूसरे पर कमलिनी सवार हुई। उस समय कमलिनी ने वह चीठी जो अभी घण्टा-भर हुआ लिखकर तैयार की थी, नागर के हाथ में दे दी और कहा, “इसे हिफाजत से रखो, मनोरमा को देकर मेरी तरफ से ‘जय माया की’ कहना।” वह चीठी लिफाफे के अन्दर थी और जोड़ पर मोहर लगाई हुई थी।

बाग के बाहर निकलकर कमलिनी ने पूरब का रास्ता लिया नागर पश्चिम की तरफ रवाना हुई।

0 0 वोट
पोस्ट को रेट करें
सबस्क्राइब करें
सूचित करें
guest
0 टिप्पणियाँ
इनलाइन प्रतिक्रिया
सभी टिप्पणियाँ देखें

.

देवकी नंदन खत्री

देवकीनंदन खत्री

जन्म: 29 जून 1861, मृत्यु: 1 अगस्त 1913 रचनाएँ: चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, कुसुम कुमारी, काजर की कोठरी

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

नए पोस्ट की सूचना के लिए 

Powered by सहज तकनीक
© 2020 साहित्य विमर्श
0
आपके विचार महत्वपूर्ण हैं। कृपया टिप्पणी करें। x
()
x