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मान्यवर सम्पादक जी!

       क्षमा चाहता हूँ कि इस बार अपके दीपावली अंक के लिए लेख न भेज सका। बात यह हुई कि जब पहली बार आपका पत्र आया, जिसमें आपने लिखा था कि इस वर्ष आपने अपने कुछ पुराने लिखने वालों को एक ही विषय पर लेख लिखने के लिए राजी किया है और वह विषय है ‘पत्नी अपने पति की दृष्टि में!’ और तस्वीर भी माँगी थी, तब मुझे सहसा हँसी आ गयी थी।

      संयोग से मेरी पत्नी भी उस समय मेरी कुर्सी के पीछे खड़ी मेरे पत्रों की निगरानी कर रही थी। क्योंकि, मुझे डाक से प्रायः लड़कियों के पत्र आते रहते हैं,  इसलिए पत्नी द्वारा पत्रों की देख-भाल से मेरे लिए जान बचानी मुश्किल हो जाती है।

      खैर, वह एक अलग विषय है। उस पर कभी अवकाश मिलने पर बात होगी। इस समय तो मैं आपको यह बता रहा था कि आपका पत्र पढ़ कर मुझे सहसा हँसी आ गयी। तब मेरी पत्नी ने पूछा:

      “क्यों हँसे?”,

      मैंने कहा, “यह एक सम्पादक महाशय हैं जो पत्नी पर पति की दृष्टि से एक लेख माँगते हैं और तस्वीर भी चाहते हैं।“

      “किसकी पत्नी पर किसके पति की दृष्टि से लेख माँगते हैं?” उसने तुरन्त पूछा।

      मैंने कहा, ‘यदि किसी दूसरे की पत्नी पर लेख माँगा होता…”

      “जब तो तुम तुरन्त लिख देते।” वह बीच ही में बात काट कर बोली, “जरा ठहरो। मुन्ना रो रहा है, मैं उसको दो तमाचे लगा कर अभी आ कर तुम से बात करती हूँ।”

      जब वह वापस आयी तो मैंने कुर्सी जरा परे खिसका ली। वह बोली, “हाँ, अब बताओ?”

      मैंने कहा, “वास्तव में मुझे तुम पर एक लेख लिखना है–अपने दृष्टिकोण से! इसीलिए मैं हँस रहा था कि ये भलेमानस सम्पादक इतना भी नहीं जानते कि विवाह के बाद पति का दृष्टिकोण भी वही हो जाता है, जो पत्नी का होता है।

     फिर वह बेचारा जो कुछ भी देखता है, अनुभव करता है, बात करता है, आता है, जाता है, खाता है, पीता है, चलता है, बैठ जाता है, बैठ कर फिर चलने लगता है—वह सब कुछ उसकी पत्नी के दृष्टिकोण से होता है।

      अलबत्ता विवाह के पहले पति का एक दृष्टिकोण होता है, लेकिन विवाह के बाद प्रायः समाप्त हो जाता है। केवल दृष्टिकोण रह जाता है, कुछ समय के बाद दृष्टि भी चली जाती है और केवल कोण-ही-कोण रह जाता है।”

      मेरी पत्नी ने बड़ी गम्भीरता से पूछा, “क्या ये सम्पादक महोदय कुँआरे हैं?”

      मैंने आश्चर्य से पूछा, “तुमने कैसे जाना?”

      उसने मेरे प्रश्न का उत्तर न दिया। बोली, “शक्ल-सूरत कैसी है?”

      “देखने में तो अच्छा है। लेकिन…।”

        “कमाता क्या है?” वह मेरी बात अनसुनी करके बोली।

        “तीन सौ रुपये मिलते हैं।”

        “तो बहुत हुए। तुमने तो किसी महीने मुझे ढाई सौ रुपये भी लाके नहीं दिये। तुम अपनी लड़की के विवाह की बात उससे क्यों नहीं करते?”

        “भलीमानस!” मैंने चकित हो कर कहा, ”वह लेख माँग रहा है। मैं उसे अपनी लड़की दे दूँ! इस तरह से तो वह साल में तीन-तीन बार विशेषांक निकाल लेगा।”

        “मजाक मत करो!” वह गुस्से से बोली, “घर में जवान-जहान लड़की कुँआरी बैठी हे और तुम्हें उसकी सुध नहीं है। जब देखो बेकार कलम चलाया करते हो। मेरे तो भाग्य ही फूट गये हैं।”

        और वह अपने आँसू पोंछते हुए मेरे कमरे से बाहर चली गयी।

        दो-तीन दिन तक मेरा मूड भी बिगड़ा रहा। कई बार आपका लेख लिखने को बैठा पर कलम चली ही नहीं। चौथे दिन आपकी सहायक सम्पादिका मुझसे लेख माँगने आ गयीं। मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि जब आप एक नौजवान और सुन्दर लड़की को सहायक सम्पादिका रखते हैं, तो उसे विवाहित लेखकों के घर क्यों भेजते हैं और लिपस्टिक, पाउडर आदि से सुसज्जित करके क्यों भेजते हैं?

        आपकी असिस्टेंट ने गहरे ऊदे रंग की कंजीवरम की बढ़िया साड़ी पहन रखी थी, हाथ में शान्ति निकेतन का चमड़े का बेग था। कानों में पुखराज के बुन्दे थे। आप उसको वेतन क्या देते हैं?

        मैंने लेख तो लिखा नहीं था, इसलिए वह काफी समय तक मेरे पास बैठी रही और मैं बहुत देर तक उसका हाथ अपने हाथ में ले कर उसके भाग्य की लकीरें देखता रहा। आपको शायद मालूम नहीं, मैं बहुत अच्छा ज्योतिषी हूँ और लड़कियों का हाथ तो बहुत ही अच्छा देखता हूँ।

        काफी देर बैठ कर वह चली गयी। इस बीच में मेरी पत्नी ने पर्दे के पीछे से तीन-चार बार झाँक भी लिया था। जब वह चली गयी तो उसने पूछा, “यह कौन थी? क्या थी? किस लिए आयी थी?”

        मैंने कहा, “लड़की थी, सहायक सम्पादिका थी, वही लेख माँगने आयी थी।”

        “तुमने लिख कर दे दिया?”

         “लिखा ही नहीं था, क्या देता?”

         “हाँ, हाँ! तुम लेख मुझ पर क्यों लिखोगे?” वह झल्ला कर बोली, “मैं तुम्हारी कौन होती हूँ! तुम बाहर की जाने कैसी-कैसी गयी-गुजरी स्त्रियों पर लिखते रहते हो, लेकिन घर की स्त्री पर, अपनी पत्नी पर, तुमसे क्यों लेख लिखा जायेगा? मैं सब समझती हूँ, आने दो उस चुड़ैल को दोबारा। मैं उसकी चुटिया न काट के फेंक दूँ…।”

         वह जोर-जोर से रोने लगी। मैंने अपनी कुर्सी से उठ कर उसे प्यार किया, बहलाया, पुचकारा, सम्हाला। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आँसू रोके। उन्हें पोंछते-पोंछते बोली- “तुम मुझसे प्यार करते हो न?”

          “संसार में सबसे ज्यादा। “

          “मुझ पर लेख लिखोगे न!”

          “अवश्य!”

          “अच्छा-सा लेख?”

          “बहुत बढ़िया लिखूँगा!”

     अब वह आँसुओं के बीच मुस्करा दी । उसको आँखें खुशी से चमकने लगीं। बोली,

           “मेरा एक चित्र भी भिजवा देना।”

           “चित्र?”

           “क्यों?” वह एकदम भड़क कर बोली,  “उन्होंने माँगा है। क्या मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती हूँ?”

           “बहुत अच्छी लगती हो डार्लिंग।”

           “तो फिर?”

           “अच्छा, चित्र भी छप जायेगा।” मैंने धीरे से कहा।

           “तो चित्र खिंचवाने कब चलोगे?”

           “आज ही चलूँगा।”

           वह बहुत प्रसन्न हुई। फिर सहसा उदास-सी हो गयी। बोली, “लेकिन मेरे पास तो कोई नयी साड़ी ही नहीं है।”

           मैंने कहा, “अभी पिछले सप्ताह…!”

           वह बोली, “वह तो पिछले सप्ताह की है। नयी तो नहीं है।”

           “बेशक, नयी तो नहीं है।” मैंने स्वीकार किया।

            वह बोली, “मैं नयी साड़ी में चित्र खिंचाऊँगी।”

            मैंने उसे टालने के अभिप्राय से कहा, “इतना टन्टा क्यों करती हो? वह अपना पुराना चित्र भेज दो ना, जो बनारसी साड़ी में है!”

            “वाह! वह तो विवाह का चित्र है। बाईस वर्ष हो गये। तुम भी क्या बात करते हो?”

            मैंने कहा, “अच्छा तो बाजार से साढ़े सत्रह रुपये की वायल की साड़ी ले लेंगे। फूलदार वायल की बहुत बढ़िया साड़ियाँ आयी हैं।”

             वह चीख कर बोली, “मैं वायल नहीं लूँगी। मैं तो कंजीवरम की साड़ी लूँगी। वैसी ऊदे रंग की, जैसी उस कलमुँही ने पहन रखी थी।”

             ”कंजीवरम की साड़ी?” -मेरा दिल अन्दर-ही-अन्दर बैठने लगा। घटिया-से-घटिया कंजीवरम की साड़ी भी अस्सी नब्बे से कम में नहीं आती है।

             “हाँ कंजीवरम को साड़ी लूँगी और शान्ति निकेतन वाला वही बेग, जो उस छिनाल ने ले रखा था। और वैसी ही सैंडिल और वैसा ही प्योर मैसूर सिल्क का चमचमाता ब्लाऊज। और कानों के वैसे ही बुन्दे। और मैं टैक्सी में बैठ कर चित्र खिंचवाने जाऊँगी—टैक्सी में! हाँ! अभी से कहे देती हूँ। बस में नहीं जाऊँगी। नहीं तो मेरे सारे कपड़े खराब हो जायेंगे। औरों को टैक्सी में ले जाओ और मुझे……”

         इस घटना के तीन-चार दिन के बाद आपकी सहायक सम्पादिका एक नयी पोशाक पहन कर मेरे घर आयी तो मेरी पत्नी ने कह दिया मैं घर पर नहीं हूँ। उसके तीन-चार दिन बाद जब वह आयी तो मैं पूना गया हुआ था। उसके बाद अहमदाबाद गया था, फिर नासिक गया था। उसके बाद वह नहीं आयी। उसने सोचा होगा—नासिक जाके कौन लौटता है? तीर्थ-धाम जो है।

    लेख तो मैं लिख नहीं सका। पत्नी का चित्र भेज रहा हूँ। विज्ञापनों के किसी पृष्ठ पर छाप दीजिएगा। साथ ही बिल भी भेज रहा हूँ। विवरण यह है :–

                                कंजीवरम की साड़ी : एक सौ पचीस रुपये

                                      पेटीकोट सिल्क : इक्कीस रुपये

                                                    सैंडिल : साढ़े पंद्रह रुपये

                         ब्लाऊज  (बंगलौर-आर्ट) : अठारह रुपये, दस आने

                                                        बुन्दे : एक सौ पैंतिस रुपये

                                                      टैक्सी : नौ रुपये नौ नये पैसे

                                                    सिनेमा : छ: रुपये

                                     दही-बड़े की चाट : डेढ रुपये

                                               कुल टोटल : ३३१ रुपये ११ आने ३ नये पैसे।

        बिल की अदायगी तुरन्त होनी चाहिए। क्योंकि मैंने ये रुपये एक पठान से लिये हैं,  वर्ना मेरी मरहम-पट्टी का खर्च भी देना पड़ेगा। इसलिए बिल तुरन्त भिजवा दीजिए और भविष्य में लेख माँगते समय लेखक की जेब का खयाल रखिए।

                                                                केवल आपका,

                                                                    कृष्ण चन्द्र

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कृष्ण चंदर

कृष्णचंदर

जन्म: 23 नवंबर 1914, मृत्यु: 8 मार्च 1977 कहानियाँ: ज़िंदगी के मोड़ पर, टूटे हुए तारे, अन्नदाता, तीन गुंडे, समुन्दर दूर है उपन्यास: एक गधे की आत्मकथा, एक वाइलिन समुन्दर के किनारे

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