यह उन कुछ दु:स्वप्नों में एक था जो हमें हमेशा डर था कि किसी दिन सच हो जायेंगे । इरफान नहीं हैं, यह एक सच है जो दिमाग जान चुका है लेकिन दिल बदमाशी पर आमादा है। कहता है, “हट, इरफान भी कभी मरा करते हैं। रात रात भर जागेगा तो ऊँघेगा और जब ऊँघेगा तो यही ऊलजलूल देखेगा। पागल, आँखें खोल। देख, बाहर पानी बरस रहा है। यू ट्यूब पर लगाओ अपना सबसे पसंदीदा गाना और देखो इरफान भाई को, जीता जागता। अब तो आज कल में वे वापस आने वाले हैं।” और मैं फिर से देखता, सुनता “मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी, नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही।” समय था बीसवीं सदी के अंत का। हमारे सारे यार दोस्त गर्लफ्रेंड-गर्लफ्रेंड खेल रहे थे, लल्लू जगधर से ले कर सिंहानिया, राजपाल तक, तब हम दो शौक यूँ पूरे कर रहे थे कि इक्कीसवीं सदी तो […]
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आँखें..ऐसा लगता था मानों उबल कर बाहर आ जायेंगी..भूरी आभा लिए वही आँखें कभी क्रूरता की मिसाल तो कभी करुणा और याचना का उदाहरण पेश करती थीं। मामूली शक्लो-सूरत और हाथों में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की डिग्री लिए बेहद साधारण परिवार से निकल कर सफलता की चोटियों को छूने वाले इरफान खान महज एक मंजे हुए शानदार कलाकार नहीं थे। वह एक सोच रखते थे। भीड़ से हट कर, अंजाम की परवाह किये बगैर, अपनी बात को सामने रखने की ताकत रखने वाले इरफान खान समानांतर सिनेमा और मुख्य धारा की सिनेमा की बीच खिंची तथाकथित रेखा को धूमिल करने में सफल रहे। अपने 1988 में सलाम बांबे से फिल्मी कैरियर की शुरूआत करने वाले इरफान के सशक्त अभिनय ने फिल्मकारों को इतना प्रभावित किया कि भीड़ में खो जाने वाले चेहरे को फिल्म के नायक के तौर पर पेश किया गया। फिल्मी गाने और धूम-धड़ाका नहीं केवल खालिस, […]
इरफान खान नहीं रहे !! क्या यह संभव है कि इरफान न रहे? हम जैसे सिनेमा प्रेमियों के लिये असंभव बात है। इसका सीधा कारण यह है कि जो कलाकार आपको अपने बीच का लगता है अपने जैसा लगता है वो कभी आपके साथ न रहे ऐसा असंभव लगता है। सबसे पहले मैंने व्यक्तिगत तौर पर इरफान की प्रतिभा के दर्शन किये थे सन 2000 में आयी अभिनेत्री शीबा के पति आकाशदीप द्वारा निर्देशित फिल्म “घात” में। बहुत से लोगों को मनोज बाजपेयी और तब्बू की हीरो-हीरोइन के रुप में आयी यह फिल्म शायद याद भी नहीं होगी पर मुझे यह फिल्म याद रहने का सबसे बडा कारण है इसका विलेन मामू जिसका रोल इरफान खान ने किया था। इसके बाद 2003 वो साल है जिसमें इरफान ने 2 बेहद अविस्मरणीय फिल्में दी-हासिल और मकबूल। आप इन फिल्मों को देखकर इरफान को ताजिंदगी नहीं भूल सकते है। हासिल के हीरो […]
आज जैसे सारा भारत इरफान के लिए आंसू बहाने एक हो गया है। एक ऐसा सर्वस्वीकार्य व्यक्ति कोई अभिनेता ही हो सकता है। मन में सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? आखिर कोरोना संकट के इस दौर में जब हर इंसान को खुद की पड़ी है, हर कोई दूसरे को शक की नज़र से देख रहा है कि कहीं ये कोरोना वाहक तो नहीं, जैसे कुरान जैसे ग्रन्थों में क़यामत के दिन का उल्लेख हमारी ज़िन्दगियों में उतर गया हो कि नफ़्सा नफ़्सी का आलम होगा, हर किसी को अपनी निज़ात की पड़ी होगी, बाप अपने बेटे को ना पहचानेगा और बेटा अपने बाप को। शौहर बीवी को ना पहचानेगा और बीवी अपने शौहर को ना पहचानेगी। लगभग ऐसा ही वक़्त है, लोगबाग अपने प्रियजनों की अंत्येष्टि करने तक से परहेज कर रहे हैं। सोशल मीडिया में जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं। ऐसे वक्त में इरफान खान जैसा एक […]
संसार के जितने भी देश हैं उनमें इजराएल सबसे रहस्यमयी देश प्रतीत होता है, न जाने यह देश सदियों से आज तक इतने भीषण युद्धों और विषमताओं का बड़ा गवाह बना हुआ है कि कहना मुश्किल है और यही एक बड़ा कारण है कि इस देश की ओर बरबस आकर्षित होना और उस ओर खींचा चला आना एक नियति से कम नहीं। इस देश की संस्कृति, उनकी सामाजिक सोच, राजनीतिक स्थितियों, उनकी परम्पराओं और अंत में उनके पीछे की वजह को जानने की प्रबल इच्छा के आगे मैं लगभग विवश ही हूँ। जिज्ञासा मानव मन का एक स्थायी भाव है, जो अक्सर मनुष्य को एक नई जानकारी प्राप्त करने की दिशा में प्रेरित करती रहती है। मेरा मन भी इस जिज्ञासा के भाव से अछूता नहीं है। इस देश की सांस्कृतिक संरचना और इतिहास जानने की जिज्ञासा से वहाँ तीसरी बार बरबस खींचा चला आया था। […]
इस जम्बक की डिबिया से मैंने एक आदमी का खून जो कर डाला है, इसलिए मैं इससे डरता हूँ। मैं जानता हूँ कि यही जम्बक की डिबिया मेरी मौत का कारण होगी-प्रोफेसर साहब ने कहा और कुर्सी पर टिक गए। उसके बाद हम सभी लोगों ने उनसे पूछा-जम्बक की डिबिया से मनुष्य की हत्या आखिर हो ही कैसे सकती है? सिगरेट बुझाकर ऐश-ट्रे पर फेंकते हुए प्रोफेसर साहब ने कहा-बात उन दिनों की है जब मैं बी.ए. फाइनल में पढ़ता था। केठानी हमारे घर का पुराना नौकर था, बड़ा मेहनती, बड़ा ईमानदार। महीनों हमारी माँ जब घर के बाहर रहती थी, वह सारे घर की देखभाल करता था। एक चीज भी कभी इधर से उधर न हुआ था। एक बार यही बरसात के दिन थे। मेरी छोटी बहिन के शरीर पर लाल-लाल दाने से उठ आए थे और उसके लिए मैं एक जम्बक की डिबिया खरीद लाया। मेरी माँ मशीन […]
यह नगर के बाहर का इलाका था। शाम का धुंधलका अभी फैलना शुरू ही हुआ था, अंधेरा नहीं हुआ था। जगह-जगह कचरे और गन्दगी के ढेर पड़े थे, सड़ांध मारती बदबू और बदबू के एक ढेर के पास बैठी हुई एक अधेड़ स्त्री। भिखारिन थी वह लेकिन मनमौजी। कभी भीख मांगती तो कभी किसी के द्वारा दी हुई वस्तु को देने वाले के मुँह पर मार देती। उस औरत का शरीर और कपड़े, जो जाहिर है कि फटे हुए चीथड़े थे, उस कूड़े के बीच कूड़े जैसे ही लग रहे थे। वह उस दुर्गंध के बीच उससे निर्लिप्त ऐसे बैठी थी, मानो इंद्रियों पर विजय हासिल कर ली हो। उसकी आंखें पत्थर की तरह किसी भी प्रकार के भावों से रहित थी, बस कभी कभार उठती-गिरती पलकों से ही जीवित होने का प्रमाण मिलता था। तभी एक खटारा-सी कार आई उधर। उसने बेहिस आंखों से कार की तरफ […]
कई वर्ष पश्चात दूरदर्शन पर धारावाहिक ‘रामायण’ के पुनः प्रसारण से कौशल्या देवी बहुत खुश थीं। सुबह के नौ बजते ही टेलीविजन के सामने हाथ जोड़ कर बैठ जाती थीं। आज रामायण देखते हुए वह अत्यंत भावविभोर हो रही थीं। सीता एवं लक्ष्मण को राम के संग वन जाते हुए देखकर कौशल्या देवी की आंखों से अश्रु प्रवाहित होने लगे। धारावाहिक रामायण के आज का एपिसोड समाप्त होने के पश्चात कौशल्या देवी अपने सूखे गले को तर करने के लिए अश्रुओं को आंचल से पोछते हुए रसोई घर में प्रवेश करती हैं। वहां की स्थिति देखकर वह आग बबूला हो उठती हैं और अपनी बहू को पुकारते हुए बहू के कमरे में घुस जाती हैं। जहां उनकी बहू जानकी एकाग्रचित्त होकर पढ़ रही होती है। अपनी बहू को पढ़ता हुआ देखकर कौशल्या देवी का क्रोध और बढ़ जाता है। “अच्छा, तो महारानी दूध उबलता हुआ छोड़कर यहां कलेक्टर बनने की […]
बहुत दिनों से नौवीं की छात्रा कलिका, स्टाफ- रूम में चर्चा का विषय बनी हुई है. शिक्षिकाएं एकमत हैं कि उसे कोई मानसिक समस्या जरूर है. सबको श्रीमती मीरा वर्मा का इंतजार है, जो अपने ढीली सेहत के चलते, लम्बी छुट्टी पर थीं और वापस स्कूल ज्वाइन करने वाली हैं. आठवीं में वे ही कलिका की कक्षाध्यापिका रहीं और अपनी इस हंसमुख, मेधावी शिष्या की तारीफ़ करते, थकती नहीं थीं. आठवीं में कलिका अव्वल आयी थी; किन्तु इधर कुछ महीनों से वह, विचित्र व्यवहार करने लगी है. बात बात में रो पड़ती है. पढ़ाई से भी, उसका जी उचाट हो गया है. उसके पिता किसी दूसरे शहर में नौकरी करने लगे हैं अतएव उनसे बातचीत संभव नहीं. माँ थोड़ी जाहिल हैं, ऐसा कलिका की सहपाठियों ने बताया. वापस आने पर मीरा को, तत्काल ही, समस्या का पता चला. वे हैरान रह गयीं. चंचल स्वभाव वाली कलिका हर जरूरी और गैरजरूरी […]
पात्र- परिचय पुरुष-पात्र स्कंदगुप्त–युवराज (विक्रमादित्य) कुमारगुप्त– मगध का सम्राट गोविन्दगुप्त– कुमारगुप्त का भाई पर्णदत्त– मगध का महानायक चक्रपालित– पर्णदत्त का पुत्र बन्धुवर्मा– मालव का राजा भीमवर्मा– उसका भाई मातृगुप्त– काव्यकर्ता (कालिदास) प्रपंचबुद्धि– बौद्ध कापालिक शर्वनाग– अन्तर्वेद का विषयपति कुमारदास (धातुसेन)– सिंहल का राजकुमार पुरगुप्त– कुमारगुप्त का छोटा पुत्र भटार्क– नवीन महाबलाधिकृत पृथ्वीसेन– मंत्री कुमारामात्य खिगिल– हूण आक्रमणकारी मुद्गल– विदूषक प्रख्यातकीर्ति– लंकाराज-कुल का श्रमण, महबोधि बिहार-स्थविर महाप्रतिहार, महादंडनायक, नन्दी-ग्राम का दंडनायक, प्रहरी, सैनिक इत्यादि स्त्री पात्र देवकी– कुमारगुप्त की बड़ी रानी,–स्कंद की माता अनन्तदेवी– कुमारगुप्त की छोटी रानी,पुरगुप्त की माता जयमाला– बंधुवर्मा की स्त्री, मालव की रानी देवसेना– बंधुवर्मा की बहिन विजया– मालव के धनकुबेर की कन्या कमला– भटार्क की जननी रामा– शर्वनाग की स्त्री मालिनी– मातृगुप्त की प्रणयिनी सखी, दासी इत्यादि दृश्य-1 [उज्जयिनी में गुप्त-साम्राज्य का स्कंधावार] स्कंदगुप्त—(टहलते हुए) अधिकार-सुख कितना मादक और सारहीन है! अपने को नियामक और कर्ता समझने को बलवती स्पृहा उससे बेगार कराती है! उत्सव […]
मि. कानूनी कुमार, एम.एल.ए. अपने ऑफिस में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और रिपोर्टों का एक ढेर लिए बैठे हैं। देश की चिन्ताओं से उनकी देह स्थूल हो गयी है; सदैव देशोद्धार की फिक्र में पड़े रहते हैं। सामने पार्क है। उसमें कई लड़के खेल रहे हैं। कुछ परदे वाली स्त्रियाँ भी हैं, फेंसिंग के सामने बहुत-से भिखमंगे बैठे हैं, एक चाय वाला एक वृक्ष के नीचे चाय बेच रहा है। कानूनी कुमार: (आप-ही-आप) देश की दशा कितनी खराब होती चली जाती है। गवर्नमेंट कुछ नहीं करती। बस दावतें खाना और मौज उड़ाना उसका काम है। (पार्क की ओर देखकर) ‘आह! यह कोमल कुमार सिगरेट पी रहे हैं। शोक! महाशोक! कोई कुछ नहीं कहता, कोई इसको रोकने की कोशिश भी नहीं करता। तम्बाकू कितनी जहरीली चीज है, बालकों को इससे कितनी हानि होती है, यह कोई नहीं जानता। (तम्बाकू की रिपोर्ट देखकर) ओफ! रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जितने बालक अपराधी होते हैं, […]
1 कानपुर जिले में पंडित भृगुदत्त नामक एक बड़े जमींदार थे। मुंशी सत्यनारायण उनके कारिंदा थे। वह बड़े स्वामीभक्त और सच्चरित्र मनुष्य थे। लाखों रुपये की तहसील और हजारों मन अनाज का लेन-देन उनके हाथ में था; पर कभी उनकी नियत डाँवाडोल न होती। उनके सुप्रबंध से रियासत दिनोंदिन उन्नति करती जाती थी। ऐसे कत्तर्व्यपरायण सेवक का जितना सम्मान होना चाहिए, उससे अधिक ही होता था। दु:ख-सुख के प्रत्येक अवसर पर पंडित जी उनके साथ बड़ी उदारता से पेश आते। धीरे-धीरे मुंशी जी का विश्वास इतना बढ़ा कि पंडित जी ने हिसाब-किताब का समझना भी छोड़ दिया। सम्भव है, उनसे आजीवन इसी तरह निभ जाती, पर भावी प्रबल है। प्रयाग में कुम्भ लगा, तो पंडित जी भी स्नान करने गये। वहाँ से लौटकर फिर वे घर न आये। मालूम नहीं, किसी गढ़े में फिसल पड़े या कोई जल-जंतु उन्हें खींच ले गया, उनका फिर कुछ पता ही न चला। अब […]
साधु-संतों के सत्संग से बुरे भी अच्छे हो जाते हैं, किन्तु पयाग का दुर्भाग्य था, कि उस पर सत्संग का उल्टा ही असर हुआ। उसे गाँजे, चरस और भंग का चस्का पड़ गया, जिसका फल यह हुआ कि एक मेहनती, उद्यमशील युवक आलस्य का उपासक बन बैठा। जीवन-संग्राम में यह आनन्द कहाँ ! किसी वट-वृक्ष के नीचे धूनी जल रही है, एक जटाधारी महात्मा विराज रहे हैं, भक्तजन उन्हें घेरे बैठे हुए हैं, और तिल-तिल पर चरस के दम लग रहे हैं। बीच-बीच में भजन भी हो जाते हैं। मजूरी-धातूरी में यह स्वर्ग-सुख कहाँ ! चिलम भरना पयाग का काम था। भक्तों को परलोक में पुण्य-फल की आशा थी, पयाग को तत्काल फल मिलता था , चिलमों पर पहला हक उसी का होता था। महात्माओं के श्रीमुख से भगवत् चर्चा सुनते हुए वह आनंद से विह्वल हो उठता था, उस पर आत्मविस्मृति-सी छा जाती थी। वह सौरभ, संगीत और प्रकाश […]
1 दफ्तर का बाबू एक बेजबान जीव है। मजदूरों को आंखें दिखाओ, तो वह त्योरियाँ बदल कर खड़ा हो जायेगा। कुली को एक डाँट बताओ, तो सिर से बोझ फेंक कर अपनी राह लेगा। किसी भिखारी को दुत्कारो, तो वह तुम्हारी ओर गुस्से की निगाह से देख कर चला जायेगा। यहाँ तक कि गधा भी कभी-कभी तकलीफ पाकर दोलत्तियाँ झाड़ने लगता है; मगर बेचारे दफ्तर के बाबू को आप चाहे आंखें दिखायें, डाँट बतायें, दुत्कारें या ठोकरें मारें, उसके माथे पर बल न आयेगा। उसे अपने विकारों पर जो आधिपत्य होता हे, वह शायद किसी संयमी साधु में भी न हो। संतोष का पुतला, सब्र की मूर्ति, सच्चा आज्ञाकारी, गरज उसमें तमाम मानवी अच्छाइयाँ मौजूद होती हैं। खंडहर के भी एक दिन भाग्य जगते हैं। दीवाली के दिन उस पर भी रोशनी होती है, बरसात में उस पर हरियाली छाती है, प्रकृति की दिलचस्पियों में उसका भी हिस्सा है। मगर […]
मैं हतप्रभ हूँ. उन आँखों की सदाबहार चमक, आंसुओं से धुंधला गयी है. वे जुझारू तेवर, वे हौसले, पहली बार पस्त पड़ गये हैं. मेरी परिचिता, प्रबुद्ध, जीनियस स्त्री कही जा सकती है. उसने कई बार, खुद को साबित किया है. जीवन – दर्शन को लेकर, वह संजीदा हो उठती है; वक्ता बनकर, श्रोता पर, हावी हो जाना चाहती है. उपदेश देना उसका प्रिय शगल है. नित नये जुमले उछालती है…बतरस उसकी वाणी से, छलक-छलक जाता है. किन्तु आज, उन्हीं शब्दों का कसैलापन, बेसुरे राग सा कचोट रहा है, “इस आदमी के साथ जीवन काटना, तलवार की धार पर चलने जैसा है…सुबह सुबह उठकर इसका मुंह देखना पड़ता है. बातचीत आमतौर पर बंद रहती है…अब तक तो किसी तरह निभ रही थी; लेकिन और नहीं!” मेरी आँखों का प्रश्न पढ़कर, वह पुनः बोलना शुरू करती है, “जिस परिवार में मेरा विवाह हुआ, वह हद दर्जे का रूढ़िवादी था. औरतों को […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…