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इरफान खान नहीं रहे !!

क्या यह संभव है कि इरफान न रहे? हम जैसे सिनेमा प्रेमियों के लिये असंभव बात है। इसका सीधा कारण यह है कि जो कलाकार आपको अपने बीच का लगता है अपने जैसा लगता है वो कभी आपके साथ न रहे ऐसा असंभव लगता है।

सबसे पहले मैंने व्यक्तिगत तौर पर इरफान की प्रतिभा के दर्शन किये थे सन 2000 में आयी अभिनेत्री शीबा के पति आकाशदीप द्वारा निर्देशित फिल्म “घात” में। बहुत से लोगों को मनोज बाजपेयी और तब्बू की हीरो-हीरोइन के रुप में आयी यह फिल्म शायद याद भी नहीं होगी पर मुझे यह फिल्म याद रहने का सबसे बडा कारण है इसका विलेन मामू जिसका रोल इरफान खान ने किया था।

इसके बाद 2003 वो साल है जिसमें इरफान ने 2 बेहद अविस्मरणीय फिल्में दी-हासिल और मकबूल। आप इन फिल्मों को देखकर इरफान को ताजिंदगी नहीं भूल सकते है। हासिल के हीरो जिमी शेरगिल है और साथ में आशुतोष राणा बेहतरीन कलाकार है पर आप हासिल को याद करेंगे रणविजय सिंह उर्फ इरफान के लिये। डायलाग डिलीवरी का खास अंदाज जिस पर- “और जान से मार देना बेटा,हम रह गये ना,मारने में देर ना लगायेंगे भगवान कसम !” और “तुमसे गोली वोली न चल्लई..मंतर फूंक के मार देओ साले” जैसे डायलाग क्या जबर्दस्त लगते है !!

मकबूल को शायद इरफान की सबसे फेमस फिल्म कहा जा सकता है। डान अब्बा जी के खास हिटमैन पर अब्बा जी की ही बीवी के आशिक के तौर इरफान का अभिनय क्या गजब है। एक से एक शानदार कलाकार फिल्म में है पर चेहरे और आंखों से अभिनय क्या होता है इसके लिये इस फिल्म मे इरफान को देखिये।

अपनी कई फिल्मों में आम से आदमी का किरदार निभाने वाले इरफान जब फिल्म मदारी में कहते है कि- “बाज चूजे पर झपटा,उठा ले गया,कहानी सच्ची है पर अच्छी नहीं लगती…बाज पर पलटवार हुआ,कहानी सच्ची नहीं पर अच्छी लगती है”-तो आप इस किरदार से इस कलाकार से दिल से जुड जाते है।

मेरे लिये इरफान की एक बेहद खास फिल्म है-पान सिंह तोमर। एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के एथलीट के हालात के आगे मजबूर होकर एक बागी..एक डाकू..और हत्यारा बन जाने की कहानी। पर यह एक्शन फिल्म नहीं है न इरफान कोई घोडे पर सवार होकर काली मां की पूजा कर के डाका डालने निकले डाकू बल्कि यह किरदार इरफान ने ऐसे निभाया है कि आप सिहर उठते है। क्या दर्द ..क्या बेबसी और क्या अदायगी है इसमें इरफान की। आपको लगता ही नहीं है कि पर्दे पर इरफान है बल्कि आपको साक्षात् पान सिंह तोमर ही दिखाई देता है। बेशक पान सिंह तोमर का सबसे प्रसिद्ध डायलाग- “बीहड़ में बागी होते है,डकैत मिलते है पार्लियामेंट मां”-है पर अगर आपने फिल्म देखी है तो शायद मेरी तरह वो दृश्य और डायलाग कभी नहीं भूल पायेंगे जब डाकू बन चुके लेकिन दिल से वही पुराने एथलीट और सामान्य सैनिक इरफान फौज के अपने एक पूर्व सीनियर से मिलते है। थोडी देर की बातचीत के बात सीनियर बने विपिन शर्मा कहते है कि अब हम कभी नहीं मिल पायेंगे तो पान सिंह तोमर कहता है कि- “लेकिन हमारी खबर मिलती रहेगी साहब।”  इस सामान्य से डायलाग के साथ जो अभिनय जो आवाज में दर्द और बेबसी है वो शायद इरफान के ही बस की बात थी।

पिछले कुछ समय से बीमारी की खबरें लगातार आ रही थी पर ऐसा हो जायेगी इसकी आशा न थी। न ही 54 साल कोई जाने की उम्र है। ऊपर वाला शायद अच्छे लोगों को अपने पास जल्दी चाहता है वरना अभी तो आपने बहुत काम करना था इरफान !

दुखद मन से आपको श्रद्धांजलि। ऊपर वाला निश्चित रुप से आपको जन्नत में पाकर खुश हो रहा होगा लेकिन आपके द्वारा “हासिल” में बोला यह डायलाग सदा याद रखना दोस्त कि- “तुमको याद रखेंगे गुरु हम,आई लाइक आर्टिस्ट।”

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