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आज जैसे सारा भारत इरफान के लिए आंसू बहाने एक हो गया है। एक ऐसा सर्वस्वीकार्य व्यक्ति कोई अभिनेता ही हो सकता है। मन में सवाल उठता है कि ऐसा क्यों?

आखिर कोरोना संकट के इस दौर में जब हर इंसान को खुद की पड़ी है, हर कोई दूसरे को शक की नज़र से देख रहा है कि कहीं ये कोरोना वाहक तो नहीं, जैसे कुरान जैसे ग्रन्थों में क़यामत के दिन का उल्लेख हमारी ज़िन्दगियों में उतर गया हो कि नफ़्सा नफ़्सी का आलम होगा, हर किसी को अपनी निज़ात की पड़ी होगी, बाप अपने बेटे को ना पहचानेगा और बेटा अपने बाप को। शौहर बीवी को ना पहचानेगा और बीवी अपने शौहर को ना पहचानेगी।

लगभग ऐसा ही वक़्त है, लोगबाग अपने प्रियजनों की अंत्येष्टि करने तक से परहेज कर रहे हैं। सोशल मीडिया में जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं। ऐसे वक्त में इरफान खान जैसा एक मंजा हुआ अभिनेता दुनिया से चला जाता है और सारा देश शोक में डूब जाता है। शोक संदेशों की बाढ़ सी आ जाती है, कुछ देर को हम कोरोना को भूल जाते हैं।

ऐसा क्यों? मन में सवाल उठता है।

मन में सवाल उठता है और मन ही जवाब भी देता है कि इरफान का जाना इसलिए शोक में डुबो गया, क्योंकि इरफान हम में से एक लगा करते थे। साधारण शक्ल-सूरत के, सांवली रंगत और दरमियाने कदों के हम भारतीयों को लगता था कि जैसे इरफान हमारा ही अक्स है जो पर्दे पर हमारी ही भूमिका निभा रहा है। रुक-रुक के, ठहर-ठहर के संवादों की अदायगी, जैसे हमें समझने का मौका दे रहे हों।

इरफान अपने संवादों के अंत के शब्दों को थोड़ा खींच कर बोलते थे, उनका ये अंदाज भी हमें अपना सा ही लगता था।  देश के कई हिस्सों में इसी तरह शब्दों को खींच कर बोला जाता है, हर जगह की ये खींच अलग होती है और इस खींच से हम सहज ही जान जाते हैं कि सामने वाला हैदराबाद का है या खानदेश का है या फिर बुन्देलखण्ड का है। लेकिन इरफान की ये खींच पहचान में नहीं आती थी। उससे हर क्षेत्र खुद को जोड़ सकता था, समझ सकता था कि ये उसकी ही बोली है जो इरफान पर्दे पर बोल रहे हैं।

इरफान ऐसे बिरले ठेठ देसी कलाकार थे जो बॉलीवुड में काम करने के लिए हॉलीवुड की फिल्में भी ठुकरा दिया करते थे। ऐसा एक उदाहरण फ़िल्म लंच बॉक्स है, जिसके लिए इरफान ने हॉलीवुड की मशहूर फिल्म इंटरस्टेलर ठुकरा दी थी। इरफान ही वो थे जिन्होंने हॉलीवुड में ठीक-ठाक काम किया। ऐसे तो बहुत से भारतीय कलाकारों ने हॉलीवुड में काम किया है, पर वहां कोई मुकाम सिर्फ इरफान ही बना पाए।

जिस समय इरफान को बीमारी का पता चला और वो इलाज के लिए लंदन गए तो उन्होंने वहां पाया कि हॉस्पिटल के ठीक सामने ही लॉर्ड्स क्रिकेट स्टेडियम है, इरफान ने इसका उल्लेख बड़े दार्शनिक शब्दों में किया है “जब मैं दर्द में, थका हुआ अस्पताल में घुस रहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा अस्पताल लॉर्ड्स स्टेडियम के ठीक सामने है। यह मेरे बचपन के सपनों के ‘मक्का’ जैसा था। अपने दर्द के बीच, मैंने मुस्कराते हुए विवियन रिचर्ड्स का पोस्टर देखा। इस हॉस्पिटल में मेरे वॉर्ड के ठीक ऊपर कोमा वॉर्ड है।

मैं अपने अस्पताल के कमरे की बालकनी में खड़ा था, और इसने मुझे हिला कर रख दिया। जिंदगी और मौत के खेल के बीच मात्र एक सड़क है। एक तरफ अस्पताल, एक तरफ स्टेडियम। मेरे अस्पताल की इस लोकेशन ने मुझे हिला कर रख दिया। दुनिया में बस एक ही चीज निश्चित है, अनिश्चि‍तता। मैं सिर्फ अपनी ताकत को महसूस कर सकता था और अपना खेल अच्छी  तरह से खेलने की कोशिश कर सकता था”।

बीमारी के विषय में भी इरफान ने जो लिखा वो उनके भीतर के महान कलाकार की कलाकारी ही कही जा सकती है, “कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से जूझ रहा हूं, मेरी शब्दावली के लिए यह बेहद नया शब्द था, इसके बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि यह एक दुर्लभ बीमारी है और इसपर अधिक शोध नहीं हुए हैं. अभी तक मैं एक बेहद अलग खेल का हिस्सा था. मैं एक तेज भागती ट्रेन पर सवार था, मेरे सपने थे, योजनाएं थीं, आकांक्षाएं थीं और मैं पूरी तरह इस सब में बिजी था.

तभी ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए मुझे रोका. वह टीसी था: ‘आपका स्टेशन आने वाला है. कृपया नीचे उतर जाएं.’ मैं परेशान हो गया, ‘नहीं-नहीं मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.’ तो उसने कहा, ‘नहीं, आपका सफर यहीं तक था. कभी-कभी यह सफर ऐसे ही खत्म होता है”।

आगे इरफ़ान लिखते हैं “इस सब ने मुझे अहसास कराया कि मुझे परिणाम के बारे में सोचे बिना ही खुद को समर्पित करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए, यह सोचे बिना कि मैं कहां जा रहा हूं, आज से 8 महीने, या आज से चार महीने, या दो साल. अब चिंताओं ने बैक सीट ले ली है और अब धुंधली से होने लगी हैं.. पहली बार मैंने जीवन में महसूस किया है कि ‘स्वतंत्रता’ के असली मायने क्या हैं”, और आज इरफ़ान स्वतन्त्र हो गए, उस दुनिया में जाने के लिए जहाँ ये दर्द उनके साथ नहीं होगा, होगी तो बस असीम शांति।

आज जब ऐसे लोगों को भी, जो साम्प्रदायिकता की अंधी गली के मुहाने पर खड़े हैं, ऐसे भी जो कट्टरता से फिल्मों में काम करने को धर्म विरुद्ध बताया करते हैं, इरफान के लिए आंसू बहाते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि क्यों इतने जरूरी हैं इरफान जैसे कलाकार। हमें भारतीय बनाए रखने, हममें इंसानियत बचाए रखने, हममें कला का बोध सुरक्षित रखने के लिए जरूरी हैं इरफान जैसे कलाकार।

इरफान तुम बहुत याद आओगे, जब बाकी सब स्टार बनने की दौड़ में थे, आपने एक्टर बनना चुना। मैं नहीं कहूंगा कि खुदा तुम्हें जन्नत बख्शे, क्योंकि हमारे-आपके जैसे लोग उधर नहीं पाए जाते, अकेले वहां रह कर आप खुश नहीं रह पाएंगे। हम भी आएंगे कभी वहां जहां आप रहोगे, फिर मिल बैठेंगे और सुनेंगे आपसे “बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत तो पाल्लायामेंट में होते हैं”

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