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यह नगर के बाहर का इलाका था। शाम का धुंधलका अभी फैलना शुरू ही हुआ था, अंधेरा नहीं हुआ था। जगह-जगह कचरे और गन्दगी के ढेर पड़े थे, सड़ांध मारती बदबू और बदबू के एक ढेर के पास बैठी हुई एक अधेड़ स्त्री। भिखारिन थी वह लेकिन मनमौजी। कभी भीख मांगती तो कभी किसी के द्वारा दी हुई वस्तु को देने वाले के मुँह पर मार देती।

      उस औरत का शरीर और कपड़े, जो जाहिर है कि फटे हुए चीथड़े थे, उस कूड़े के बीच कूड़े जैसे ही लग रहे  थे। वह उस दुर्गंध के बीच  उससे निर्लिप्त ऐसे बैठी थी, मानो इंद्रियों पर विजय हासिल कर ली हो। उसकी आंखें पत्थर की तरह किसी भी प्रकार के भावों से रहित थी, बस कभी कभार उठती-गिरती पलकों से ही जीवित होने का प्रमाण मिलता था।

      तभी एक खटारा-सी कार आई उधर। उसने बेहिस आंखों से कार की तरफ देखा और तुरंत ही उधर से नजरें हटा ली और मानो फिर से किसी की अंतहीन प्रतीक्षा में खो गई।

      कार कुछ दूरी पर रुकी। उसमें से तीन लड़के बाहर निकले। उनके पीछे चौथा एक बारह-तेरह वर्षीय किशोरी का मुँह दबोचे हुए बाहर निकला। किशोरी भयभीत जानवर की तरह तड़प रही थी, उसकी शैतानी पकड़ से आजाद होने को छटपटा रही थी लेकिन सफल नहीं हो पा रही थी।

      तभी तीनों लड़के एक साथ उसपर झपटे और उसे एकदम कसकर जकड़ लिया। फिर वे उसे थोड़ी दूर बबूल की घनी झाड़ियों के पीछे लेकर जाने लगे। पता नहीं कैसे, मुँह पर से थोड़ा सा हाथ हटा और उस लड़की की एक दर्दनाक चीत्कार वातावरण में गूंज गई। लेकिन उन लड़कों को इसकी जरा सी भी चिंता नहीं थी। कौन था वहां पर चीखें सुनने वाला?

      केवल वो मरियल सी पगली भिखारिन बैठी थी कुछ दूर। लेकिन, उसे तो मानो इस दुनिया के कारोबार से कोई लेना देना ही नहीं था।

      लेकिन नहीं! ऐसा नहीं हुआ इस बार।

      उस लड़की की चीख उस पगली की चेतना पर पत्थर की तरह टकराई। उसने तमककर नए सिरे से उधर देखा। स्कूल यूनिफॉर्म में तड़पती, चार जोड़ी हाथों में फंसी उस लड़की को देखकर उस पगली के पेट के निचले हिस्से में मानो एक दर्द की हिलोर उठी और वह दर्द से कराह उठी। उसके अंतर्मन में उथल-पुथल होने लगी। उसकी चेतना ने उस लड़की की जगह खुद को स्थापित कर दिया।

      यूनिफॉर्म का रंग बदल गया, बलात्कारियों की शक्लें बदल गई और वह उनकी पकड़ में झाड़ियों के पीछे घिसटने लगी। झाड़ियां भी थोड़ी बदल-सी गई लेकिन रही झाड़ियां ही। फिर उसकी यूनिफॉर्म की उड़ती धज्जियाँ  दिखाई देने लगीं। स्कर्ट फटकर जिस्म से दूर एक कचरे के ढेर पर जा गिरा। एकदम वस्त्रहीन चार लड़कों के बदबूदार हाथों में मचलने लगी। और तभी उसे अपने नाजुक गुप्तांग में एक दहकती हुई सलाख घुसती महसूस हुई जो उसके शरीर के कवच को भेदकर आत्मा को जख्मी कर गई।

      उसके बाद वह अचेत हो गई थी। लेकिन वे चारों लड़के तो अचेत नहीं हुए होंगे। फिर उसे कुछ भी याद नहीं। बाद में उसे अस्पताल में बिस्तर पर पड़े-पड़े ही पता चला कि लहूलुहान, नंगी हालत में वह एक कचरा गाड़ी के ड्राइवर को झाड़ियों में बेहोश पड़ी दिखी थी। उसने ही पुलिस को सूचना दी थी और इस तरह वह अस्पताल पहुँची थी।

      अस्पताल में अचला को 15 दिन रखा गया। हाँ, यही नाम था उस पगली भिखारिन का-अचला। लेकिन उसे तो समझ ही नहीं आया उस समय कि वह अब अचला नहीं रही, अहिल्या बन चुकी थी। कलियुग के खर-दूषण उसे बंजर बना चुके थे। अब उस ममता की भूमि में कभी अंकुर नहीं फूटेगा। उससे वो उर्वरक क्षमता ही चुरा ली गई थी।

      ज्यादा क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण उसकी कोख, बच्चेदानी को बाहर निकालना पड़ा। गरीब था उसका पिता और ऊपर से बेटी का पिता। क्या करेगा इसका? अच्छी खासी बेटी को घर से निकालना मुश्किल। इस बेटी को कौन ले जाएगा?

      लेकिन अचला इतना नहीं समझती थी। उसका तन घायल हुआ, जिसकी पीड़ा उसे बहुत दुख देती। लेकिन, आत्मा के जख्म अभी प्रस्फुटित होने बाकी थे। उनके अंकुरण में अभी वक्त था।

      अस्पताल से घर आई।  शरीर का दर्द मिट चुका था। सहमी हुई थी, लेकिन जीवित थी तो जीवन के लिए आवश्यक नित्यकर्म करती रही। घर के काम करना, पढ़ने जाना। नजरें झुकी रहती थी। सब चलता रहा और साथ ही चलता रहा समय का पहिया। सयानी हो गई अचला।

     अब तक उसे भी पता चल चुका था कि उसके पास क्या नहीं है! और वो सोचती कि अहिल्या को तो हल्या बनाने दो वनवासी राजकुमार आ गए थे, लेकिन पता नहीं उसका उद्धार किसी अवतार के वश में भी है या नहीं।

     और आखिर एक अधेड़ विधुर को सौंप दिया गया अचला को। उसकी पत्नी कम, दो बच्चों की माँ ज्यादा बनाकर। कब तक जवान लड़की को घर बिठाते? बच्चों के लिए एक माँ की जरूरत थी। अचला का तो मानो सच में उद्धार ही हो गया। ममता को तरसते हृदय को दो मासूम बच्चों के रूप में मंजिल मिल गई।

     अपने दर्द को भूलकर वो समर्पित हो गई उनके प्रति और सच में उसे अब वो दर्द इतना खलता भी नहीं था। एक महीना ऐसे सुकून से निकला कि उसे लगा जैसे एक क्षण बीता हो। पति अच्छा व्यवहार करता।  सास जरूर उसे उसकी कमतरी का अहसास इशारों-इशारों में कराती, लेकिन वो पति और बच्चों के साथ से खुश थी।

     और फिर आया रक्षाबंधन का दिन!

     पति की बहन अपने पति के साथ आ रही थी। अचला उनके स्वागत की तैयारी में जुट गई। सुबह-सुबह ही मेहमान आ गए। दरवाजा उसने ही खोला और सामने सफेद कुर्ता पहने जिस व्यक्ति को देखा, उसे देखकर उसे करंट का तेज झटका लगा।

    उस चेहरे को वह कभी नहीं भूल सकती। इसी ने तो उठाया था अपने तीन साथियों के साथ उस दिन। उसके एन पीछे बनी ठनी उसकी ननद खड़ी थी। उसके भीतर का ज्वालामुखी फट पड़ा। बलात्कारी है यह!  बलात्कारी है यह! चीखने लगी।

    तभी सास, पति और बच्चे भी आ गए। उसने सबको बताया कि यह है वो बलात्कारी। तब सास ने असली रूप दिखाया। पति ने भी माँ का साथ दिया- “खुद वैश्या है, तो पूरी दुनिया अपने जैसी दिखती है। मेरी बहन का घर उजाड़ना चाहती है रंडी, हिजड़ा कहीं की।”

    उसे अपने खोपड़ी के अंदर घुर्र-घुर्र की आवाज सुनाई दी और फिर तेज चिंगारियां उड़ी। फिर सब कुछ साफ। उसके बाद उसे कुछ याद नहीं। उसे ऐसे ही घर से निकाला या पागलखाने में जमा कराया कुछ नहीं पता।

   और आज फिर से वही चिंगारियां भड़की उसके दिमाग में!

   खुद का वो किशोरावस्था का दर्द फिर से हरा हुआ और वह उठ खड़ी हुई अपने आप को बचाने के लिए। गाड़ी के अंदर झांका तो एक लोहे की छड़ दिखाई दी। मजबूती से उसे अपने हाथों में थामकर झाड़ियों के पीछे पहुँची।

   लड़की की छातियाँ नंगी कर चुके थे वो और अब स्कर्ट पर जोर आजमाइश कर रहे थे। जब तक पगली के आने का किसी को पता चलता, वह छड़ चला भी चुकी थी एक पर। खोपड़ी खुल गई। दूसरे सम्हलते, तब तक एक खोपड़ी और खुल गई। बाकी दो उस पगली के वेश और आक्रोश से ऐसे भयभीत हुए कि मुकाबला करने की जगह भाग खड़े हुए।

   थर-थर कांपती लड़की को जब अचला ने अपनी छाती से लगाया तो उसे लगा जैसे आज उसकी ममता तृप्त हुई है। आज वह अभिशाप मुक्त हो गई और उसकी कोख हरी हो गई।

   उसने अपना मैला-कुचैला फटा हुआ दुपट्टा उसकी छाती पर डाल दिया, मानो अपनी बिटिया को सुहाग का जोड़ा पहनाया हो और उसे सहारा दिए आगे बढ़ चली।

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महेंद्र सिंह राजपुरोहित

महेंद्र सिंह राजपुरोहित

पेशे से पशु चिकित्सक। साहित्य में गहरी रूचि। किस्सागोई की विशिष्ट शैली और भाव वैविध्य उनकी कहानियों की खासियत है।

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