मैं ‘संगमहाल’ का कर्मचारी था। उन दिनों मुझे विन्ध्य शैल-माला के एक उजाड़ स्थान में सरकारी काम से जाना पड़ा। भयानक वन-खण्ड के बीच, पहाड़ी से हटकर एक छोटी-सी डाक बँगलिया थी। मैं उसी में ठहरा था। वहीं की एक पहाड़ी में एक प्रकार का रंगीन पत्थर निकला था। मैं उनकी जाँच करने और तब तक पत्थर की कटाई बन्द करने के लिए वहाँ गया था। उस झाड़-खण्ड में छोटी-सी सन्दूक की तरह मनुष्य-जीवन की रक्षा के लिए बनी हुई बँगलिया मुझे विलक्षण मालूम हुई; क्योंकि वहाँ पर प्रकृति की निर्जन शून्यता, पथरीली चट्टानों से टकराती हुई हवा के झोंके के दीर्घ-नि:श्वास, उस रात्रि में मुझे सोने न देते थे। मैं छोटी-सी खिडक़ी से सिर निकालकर जब कभी उस सृष्टि के खँडहर को देखने लगता, तो भय और उद्वेग मेरे मन पर इतना बोझ डालते कि मैं कहानियों में पढ़ी हुई अतिरञ्जित घटनाओं की सम्भावना से ठीक संकुचित होकर भीतर […]
No Posts Found
फिर क्या होगा उसके बाद? उत्सुक होकर शिशु ने पूछा, “माँ, क्या होगा उसके बाद?” रवि से उज्जवल, शशि से सुंदर, नव-किसलय दल से कोमलतर। वधू तुम्हारी घर आएगी उस विवाह-उत्सव के बाद।’ पलभर मुख पर स्मित-रेखा, खेल गई, फिर माँ ने देखा । उत्सुक हो कह उठा, किन्तु वह फिर क्या होगा उसके बाद?’ फिर नभ के नक्षत्र मनोहर स्वर्ग-लोक से उतर-उतर कर। तेरे शिशु बनने को मेरे घर लाएँगे उसके बाद।’ मेरे नए खिलौने लेकर, चले न जाएँ वे अपने घर । चिन्तित होकर उठा, किन्तु फिर, पूछा शिशु ने उसके बाद।’ अब माँ का जी उब चुका था, हर्ष-श्रान्ति में डुब चुका था । बोली, “फ़िर मैं बूढ़ी होकर, मर जाऊँगी उसके बाद।” यह सुनकर भर आए लोचन किन्तु पोछकर उन्हें उसी क्षण सहज कुतूहल से फिर शिशु ने पूछा, “माँ, क्या होगा उसके बाद? कवि को बालक ने सिखलाया सुख-दुख है पलभर की माया है अनन्त […]
किसान प्रारंभ से ही प्रेमचंद की साहित्य सर्जना के केंद्र में रहा है. अपने पहले उपन्यास सेवासदन के ‘चैतू प्रसंग’ से ही प्रेमचंद यह आभास दे देते हैं कि उनके साहित्य की दशा और दिशा क्या होने वाली है. तिलिस्मी-अय्यारी और जासूसी के सस्ते मनोरंजन में गोते खा रहे हिंदी उपन्यास को प्रेमचंद जन समस्याओं से जोड़ते हैं. निश्चय ही उस ‘जन’ के सबसे बड़े हिस्से यानी किसान की उनके साहित्य में केन्द्रीय भूमिका होनी थी. प्रेमाश्रम, कर्मभूमि और गोदान को किसान जीवन पर लिखे गए प्रेमचंद के उपन्यासों की वृहत्त् त्रयी कहा जा सकता है. इन तीनों उपन्यासों को जोड़कर देखें तो सरलता के साथ यह कहा जा सकता है कि किसान-जीवन का कोई भी पक्ष प्रेमचंद से अछूता नहीं रहा है. प्रेमचंद और उनका युग में रामविलास शर्मा लिखते हैं- ‘‘उन्होंने उस धड़कन को सुना जो करोड़ों किसानों के दिल में हो रही थी। उन्होंने उस अछूते […]
फिंगरप्रिंट्स के ऊपर काफी कुछ लिखा जा चूका है और काफी जानकारियां पाठकों के पास भी हैं। इन्टरनेट के इस दौर में किसी भी जानकारी को पा लेना बहुत आसान हो गया है लेकिन एक जगह इकट्ठी जानकारी मिल पाना मुश्किल होता है। फिंगरप्रिंट का इतिहास, वह कैसे काम करता है, किस तरह से फिंगरप्रिंट मौकायेवारदात से लिए जाते हैं, किस तरह से उन्हें एग्जामिन किया जाते हैं, किस तरह से उन्हें स्टोर किया जाता है, ये बाते आसानी से हमें पता चल जाती है और इस सम्बन्ध में इस फोरम पर भी लेख मौजूद है। जीवित इंसान का फिंगरप्रिंट लेने का सामान्य तरीका आपने देखा होगा – ब्लू या ब्लैक स्टाम्प पेड पर उँगलियों को चिपाकते जाना है – फिर उन्हीं उँगलियों को पेपर पर छापते जाना है। हालाँकि फॉरेंसिक तौर पर यह तरीका उतना सही नहीं है लेकिन फिर भी आज भी भारत के कई पुलिस स्टेशन में […]
चचा छक्कन कभी-कभार कोई काम अपने ज़िम्मे क्या ले लेते हैं, घर भर को तिगनी का नाच नचा देते हैं . ‘आ बे लौंडे, जा बे लौंडे, ये कीजो, वो दीजो’, घर बाज़ार एक हो जाता है. दूर क्यों जाओ, परसों की ही बात है, दुकान से तस्वीर का चौखटा लग कर आया. उस वक़्त तो दीवानख़ाने में रख दी गई. कल शाम चची की नज़र उस पर पड़ी, बोलीं, ‘छुट्टन के अब्बा तस्वीर कब से रखी हुई है, ख़ैर से बच्चों का घर ठहरा, कहीं टूट-फूट गई तो बैठे बिठाए रुपये दो रुपये का धक्का लग जाएगा. कौन टांगेगा इस को?’ ‘और कौन टांगेगा? मैं ख़ुद टांगूंगा. कौन सी ऐसी दूध की नदी निकालनी है? रहने दो, मैं अभी सब कुछ ख़ुद ही किए लेता हूँ.’ कहने के साथ ही चचा शेरवानी उतार कर तस्वीर टांगने के लिए तैयार हो गए. इमामी से कहा, ‘बीवी से दो आने लेकर […]
आपने सुना होगा कि कुछ लोग भाड़ झोंकने दिल्ली जाते हैं, कोयला ढोने कलकत्ता जाते हैं और बीड़ी बेचने बम्बई जाते हैं. मैं अपनी हजामत बनवाने लखनऊ गया था. लखनऊ पहले सिर्फ अवध की राजधानी थी, अब महात्मा बटलर की कृपा से सारे संयुक्त प्रान्त की राजधानी है. कई सुविधाओं का खयाल करते हुए यह मानना पड़ता है कि राजधानी होने के योग्य यह है भी. पहले तो रेवड़ियां अच्छी मिलती हैं, जो आसानी से जेब में भरकर कौंसिल चेम्बर में खायी जा सकती हैं; दूसरे नवाबजादियों का भाव सस्ता है जो बाहर से आये हुए कौंसिल के मेम्बरों का गृहस्थाश्रम बनाये रखने में मदद पहुंचाती हैं; तीसरे पार्कों की बहुतायत है जिनमें कौंसिल की ताती-ताती स्पीचों के बाद माथा ठंडा करने की जगह मिल जाती है. तब भला बताइये कि इन सुभीतों के आगे इलाहाबाद को कौन पूछेगा? वहां सिवाय अक्षयवट के धरा ही क्या है? गवर्नमेंट की यह […]
काट (दस-बीस सिरकियों के खैमों का छोटा-सा गाँव) ‘पी सिकंदर’ के मुसलमान जाट बाकर को अपने माल की ओर लालचभरी निगाहों से तकते देख कर चौधरी नंदू वृक्ष की छाँह में बैठे-बैठे अपनी ऊँची घरघराती आवाज में ललकार उठा, ‘रे-रे अठे के करे है (अरे तू यहाँ क्या कर रहा है?)?’ – और उस की छह फुट लंबी सुगठित देह, जो वृक्ष के तने के साथ आराम कर रही थी, तन गई और बटन टूटे होने के कारण, मोटी खादी के कुर्ते से उसका विशाल वक्षस्थल और उसकी बलिष्ठ भुजाएँ दृष्टिगोचर हो उठीं। बाकर तनिक समीप आ गया। गर्द से भरी हुई छोटी-नुकीली दाढ़ी और शरअई मूँछों के ऊपर गढ़ों में धँसी हुई दो आँखों में निमिष मात्र के लिए चमक पैदा हुई और जरा मुस्करा कर उसने कहा, ‘डाची (साँड़नी) देख रहा था चौधरी, कैसी खूबसूरत और जवान है, देख कर आँखों की भूख मिटती है।’ अपने माल की […]
रामदयाल पूरा बहुरूपिया था। भेस और आवाज बदलने में उसे कमाल हासिल था। कॉलेज मे पढ़ता था तो वहाँ उसके अभिनय की धूम मची रहती थी; अब सिनेमा की दुनिया में आ गया था तो यहाँ उसकी चर्चा थी। कॉलेज से डिग्री लेते ही उसे बम्बई की एक फ़िल्म-कम्पनी में अच्छी जगह मिल गयी थी और अल्प-काल ही में उसकी गणना भारत के श्रेष्ठ अभिनेताओं में होने लगी थी। लोग उसके अभिनय को देख कर आश्चर्यचकित रह जाते थे। उसके पास प्रतिभा थी, कला थी और ख्याति के उच्च शिखर पर पहुँचने की महत्त्वाकांक्षा! इसीलिए जिस पात्र की भूमिका में काम करता बहुरूप और अभिनय मे वह बात पैदा कर देता था कि दर्शक अनायास ही ‘वाह-वाह’ कर उठते और फिर हफ्तों उसकी कला की चर्चा लोगों में चला करती। दो महीने हुए, उस की शादी हुई थी। बम्बई की एक निकटवर्ती बस्ती में छोटी-सी एक कोठी किराये पर ले […]
मनुष्य की चिता जल जाती है, और बुझ भी जाती है परन्तु उसकी छाती की जलन, द्वेष की ज्वाला, सम्भव है, उसके बाद भी धक्-धक करती हुई जला करे। तारा जिस दिन विधवा हुई, जिस समय सब लोग रो-पीट रहे थे, उसकी ननद ने, भाई के मरने पर भी, रोदन के साथ, व्यंग स्वर में कहा-‘‘अरे मैया रे, किसका पाप किसे खा गया रे!’’- तभी आसन्न वैधव्य ठेलकर, अपने कानों को ऊँचा करके, तारा ने वह तीक्ष्ण व्यंग रोदन के कोलाहल में भी सुन लिया था। तारा सम्पन्न थी, इसलिए वैधव्य उसे दूर ही से डराकर चला जाता। उसका पूर्ण अनुभव वह कभी न कर सकी। हाँ, ननद रामा अपनी दरिद्रता के दिन अपनी कन्या श्यामा के साथ किसी तरह काटने लगी। दहेज मिलने की निराशा से कोई ब्याह करने के लिए प्रस्तुत न होता। श्यामा चौदह बरस की हो चली। बहुत चेष्टा करके भी रामा उसका ब्याह न कर […]
…न …करमा को नींद नहीं आएगी। नए पक्के मकान में उसे कभी नींद नहीं आती। चूना और वार्निश की गंध के मारे उसकी कनपटी के पास हमेशा चौअन्नी-भर दर्द चिनचिनाता रहता है। पुरानी लाइन के पुराने ‘इस्टिसन’ सब हजार पुराने हों, वहाँ नींद तो आती है।…ले, नाक के अंदर फिर सुड़सुड़ी जगी ससुरी…! करमा छींकने लगा। नए मकान में उसकी छींक गूँज उठी। ‘करमा, नींद नहीं आती?’ ‘बाबू’ ने कैंप-खाट पर करवट लेते हुए पूछा। गमछे से नथुने को साफ करते हुए करमा ने कहा – ‘यहाँ नींद कभी नहीं आएगी, मैं जानता था, बाबू!’ ‘मुझे भी नींद नहीं आएगी,’ बाबू ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा – ‘नई जगह में पहली रात मुझे नींद नहीं आती।’ करमा पूछना चाहता था कि नए ‘पोख्ता’ मकान में बाबू को भी चूने की गंध लगती है क्या? कनपटी के पास दर्द रहता है हमेशा क्या?…बाबू कोई गीत गुनगुनाने लगे। एक कुत्ता गश्त लगाता […]
हरगोबिन को अचरज हुआ – तो, आज भी किसी को संवदिया की जरूरत पड़ सकती है! इस जमाने में, जबकि गांव गांव में डाकघर खुल गए हैं, संवदिया के मार्फत संवाद क्यों भेजेगा कोई? आज तो आदमी घर बैठे ही लंका तक खबर भेज सकता है और वहां का कुशल संवाद मंगा सकता है। फिर उसकी बुलाहट क्यों हुई है? हरगोबिन बड़ी हवेली की टूटी ड्योढ़ी पार कर अंदर गया। सदा की भांति उसने वातावरण को सूंघकर संवाद का अंदाज लगया। …निश्चय ही कोई गुप्त संवाद ले जाना है। चांद-सूरज को भी नहीं मालूम हो! परेवा-पंछी तक न जाने! ‘‘पांवलागी बड़ी बहुरिया!’’ बड़ी हवेली की बड़ी बहुरिया ने हरगोबिन को पीढ़ी दी और आंख के इशारे से कुछ देर चुपचाप बैठने को कहा… बड़ी हवेली अब नाम-मात्र को ही बड़ी हवेली है! जहां दिन-रात नौकर-नौकरानियों और जन-मजदूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहां आज हवेली की बड़ी बहुरिया अपने हाथ […]
मुलिया हरी-हरी घास का गट्ठा लेकर आयी, तो उसका गेहुआँ रंग कुछ तमतमाया हुआ था और बड़ी-बड़ी मद-भरी आँखो में शंका समाई हुई थी। महावीर ने उसका तमतमाया हुआ चेहरा देखकर पूछा – क्या है मुलिया, आज कैसा जी है? मुलिया ने कुछ जवाब न दिया उसकी आँखें डबडबा गयीं! महावीर ने समीप आकर पूछा – क्या हुआ है, बताती क्यों नहीं ? किसी ने कुछ कहा है? अम्माँ ने डाँटा है? क्यों इतनी उदास है ? मुलिया ने सिसककर कहा – क़ुछ नहीं, हुआ क्या है, अच्छी तो हूँ? महावीर ने मुलिया को सिर से पाँव तक देखकर कहा – चुपचाप रोयेगी, बतायेगी नहीं ? मुलिया ने बात टालकर कहा – कोई बात भी हो, क्या बताऊँ? मुलिया इस ऊसर में गुलाब का फूल थी। गेहुआँ रंग था, हिरन की-सी आँखें, नीचे खिंचा हुआ चिबुक, कपोलों पर हलकी लालिमा, बड़ी-बड़ी नुकीली पलकें, आँखो में एक विचित्र आर्द्रता, जिसमें एक […]
उद्यान की शैल-माला के नीचे एक हरा-भरा छोटा-सा गाँव है। वसन्त का सुन्दर समीर उसे आलिंगन करके फूलों के सौरभ से उसके झोपड़ों को भर देता है। तलहटी के हिम-शीतल झरने उसको अपने बाहुपाश में जकड़े हुए हैं। उस रमणीय प्रदेश में एक स्निग्ध-संगीत निरन्तर चला करता है, जिसके भीतर बुलबुलों का कलनाद, कम्प और लहर उत्पन्न करता है। दाड़िम के लाल फूलों की रँगीली छाया सन्ध्या की अरुण किरणों से चमकीली हो रही थी। शीरीं उसी के नीचे शिलाखण्ड पर बैठी हुई सामने गुलाबों की झुरमुट देख रही थी, जिसमें बहुत से बुलबुल चहचहा रहे थे, वे समीरण के साथ छूल-छुलैया खेलते हुए आकाश को अपने कलरव से गुञ्जित कर रहे थे। शीरीं ने सहसा अवगुण्ठन उलट दिया। प्रकृति प्रसन्न हो हँस पड़ी। गुलाबों के दल में शीरीं का मुख राजा के समान सुशोभित था। मकरन्द मुँह में भरे दो नील-भ्रमर उस गुलाब से उड़ने में असमर्थ थे, भौंरों […]
अभी-अभी बस पानी थमा ही है और अभी-अभी कानन उसके होटल के कमरे से अस्वीकृता लौटी है. कानन ने इसे तिरस्कार समझा, लेकिन स्वयं उसने क्या समझा, यह वह भी नहीं जानता. अभी तो कुर्सी की गीली गद्दी की सलवटें तक यथावत हैं. साँझ बहुत पूर्व ही हो चुकी थी, बल्कि कहना चाहिए कि कानन आई ही थी मुँहधेरे में. उस समय वह बुखार में तपता चुपचाप लेटा हुआ था. नौकर बहुत पहले दूध रख गया था और तब से वह उदास नीली छत ताकता सोचता रहा था. सभी तरह की बातें थीं. घर से सैकड़ों मील दूर तबादले पर फेंक दिया गया था. प्रायः शाम को होटल की छत पर खड़े होकर सामने की टेकरी, किला, मैदान, मैदान में खेलते बच्चे, पड़ोस के मराठी वकील की लड़की….और, और भी बहुत कुछ देखता रहता था. आज भी बुखार में वह लखनऊ-प्रयाग के बारे में सोचता रहा. कल्याणी घिरती […]
दिल्ली में एक सुल्तान थे सिकंदर लोदी। उनके एक छोटे भाई थे आलम खाँ। उनकी एक बेटी थी, जिसका नाम था गुलनार। गुलनार बेहद खूबसूरत थी। इतनी…जितना – ‘त्योहारों में घर चाहे जितना सजा लो, एक लड़की बिना हमेशा सजावट अधूरी। लड़की से ही घर की सबसे बड़ी सुंदरता है। चाहे झोपड़ी ही क्यों न हो। और महल कांतिहीन’ की कवियित्री लिख सकती है। इतनी… जितना, आपका दिमाग़ सोच सकता है। इतनी… जितना, उसे इस धरती पर सबसे खूबसूरत नारी होने का खिताब दिया जा सकता है। इतनी… जितनी कि, मैं कोई उपमा नहीं दे सकती। गुलनार जब छोटी थी। तब सिकंदर ने अपने भाई (गुलनार के अब्बू) से ये वादा किया था कि वो गुलनार का निक़ाह अपने बेटे इब्राहिम लोदी के साथ करेंगे। वक़्त गुजरता गया। गुलनार बड़ी हो चुकी थी। फिर एक दिन गुलनार के अब्बू ने; अपने भाई सिकंदर को, वो वादा याद दिलाया। सिकंदर इस बात के लिए तैयार हो गये और ये ख़बर अपने बेटे […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…