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किसान प्रारंभ से ही प्रेमचंद की साहित्य सर्जना के केंद्र में रहा है. अपने पहले उपन्यास सेवासदन के ‘चैतू प्रसंग’ से ही प्रेमचंद यह आभास दे देते हैं कि उनके साहित्य की दशा और दिशा क्या होने वाली है. तिलिस्मी-अय्यारी और जासूसी के सस्ते मनोरंजन में गोते खा रहे हिंदी उपन्यास को प्रेमचंद जन समस्याओं से जोड़ते हैं. निश्चय ही उस ‘जन’ के सबसे बड़े हिस्से यानी किसान की उनके साहित्य में केन्द्रीय भूमिका होनी थी. प्रेमाश्रम, कर्मभूमि और गोदान को किसान जीवन पर लिखे गए प्रेमचंद के उपन्यासों की वृहत्त् त्रयी कहा जा सकता है. इन तीनों उपन्यासों को जोड़कर देखें तो सरलता के साथ यह कहा जा सकता है कि किसान-जीवन का कोई भी पक्ष प्रेमचंद से अछूता नहीं रहा है.

            प्रेमचंद और उनका युग में रामविलास शर्मा लिखते हैं- ‘‘उन्होंने उस धड़कन को सुना जो करोड़ों किसानों के दिल में हो रही थी। उन्होंने उस अछूते यथार्थ को अपना कथा-विषय बनाया, जिसे भरपूर निगाह देखने का हियाव ही बड़ों-बड़ों को न हुआ था।’’  इस अछूते यथार्थ में किसान हैं, उनके सुख-दुःख हैं, उनके शोषण के विविध रूप हैं, उनके शोषकों के गंठजोड़ हैं और साथ में है इस शोषण के विरोध में किसान की क्रांति चेतना.

           प्रेमचंद ने अपने साहित्य में किसानों का शोषण करने वाले सभी वर्गों की पहचान की है और उनके गंठजोड़ का पर्दाफ़ाश किया है. सिर्फ सामंत ही किसानों के शोषण के लिए उत्तरदायी नहीं है, बल्कि वह तो इस शोषण के तंत्र का छोटा पुर्जा मात्र है. सामंत के अतिरिक्त महाजन, धार्मिक मठाधीश, पुलिस और प्रशासन- सभी किसानों के शोषण में शामिल हैं. इनका नापाक गंठजोड़ इस शोषण को इस कदर घातक बना देता है कि किसानों के पास इससे मुक्ति का कोई रास्ता नहीं बचता. प्रेमचंद साहित्य के अधिकांश किसान सीमांत किसान हैं- चार या पांच बीघे की जोत वाले. फिर भी किसानी को मरजाद समझने वाले. किसानी उनके लिए सिर्फ जीविका ही नहीं जीवन भी है. किसानी के मरजाद की रक्षा उनके लिए सबसे बड़ा प्रश्न है. इसी की रक्षा के लिए वे ऋणग्रस्तता के जाल में फँसते हैं. प्रेमचंद ने किसानों के शोषण में पूंजीवादी महाजनों की भूमिका को बखूबी रेखांकित किया है. गोदान के झिंगुरी सिंह, नोखेराम और दुलारी सहुआइन जैसे महाजन होरी जैसे किसानों के साथ जोंक की तरह छिपते हुए हैं. किसानों के पास उनसे छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं है. वह जितना इनसे छुटकारा पाने की कोशिश करता है, उतना ही उलझता जाता है. उसके हल-बैल, खेत सब कुछ कर्ज की भेंट चढ़ जाते हैं और आखिर में वह किसानी भी नहीं रहती, जिसे बचाने के लिए वह अपना सबकुछ लुटा देता है.

          सामंतों और महाजनों से ज्यादा घातक है, धर्म के साथ इनका गंठजोड़. धर्म न सिर्फ इनके शोषण को वैधता प्रदान करता है, बल्कि दबाव के एक उपकरण के रूप में सामने आता है. सवा सेर गेहूँ का शंकर अपने धार्मिक कर्तव्य के निर्वहन के लिए ही कर्ज के जाल में फँसता है. उसे कर्ज देने वाले महाजन भी विप्रजी ही हैं, जिन्हें भगवान का भी कोई डर नहीं है- “वहाँ का डर तुम्हें होगा, मुझे क्यों होने लगा। वहाँ तो सब अपने ही भाई-बन्धु हैं। ऋषि-मुनि, सब तो ब्राह्मण ही हैं; देवता ब्राह्मण हैं, जो कुछ बने-बिगड़ेगी, सँभाल लेंगे।“ गोदान के होरी के लिए भी धर्म एक शोषक की भूमिका में आता है. दातादीन एक महाजन है, लेकिन महाजन होने के साथ-साथ वह ब्राह्मण भी है. होरी उसका पैसा नहीं रख सकता. ब्राह्मण का कर्ज हड्डियाँ फोड़ कर निकलेगा. यह धर्मभीरूता किसान के शोषण के सबसे ज्यादा जिम्मेदार है.

           ऐसा नहीं है कि किसान इस शोषण का विरोध नहीं करता. प्रेमाश्रम और कर्मभूमि में प्रेमचंद ने किसान आंदोलन की उपस्थिति दिखाई है. प्रेमाश्रम में किसान अपने अधिकार के लिए न्यायालय की शरण लेते हैं, जबकि कर्मभूमि में हिंसक आंदोलन पर उतर आते हैं और अंततः सफल भी होते हैं. गोदान तक आते-आते प्रेमचंद के समक्ष इन किसान आंदोलनों की वास्तविकता पूरी तरह उजागर हो चुकी है. ये तथाकथित किसान आंदोलन दरअसल जमींदारों के हित-पोषण के लिए हैं, यह बात अब प्रेमचंद भलीभांति समझ चुके हैं. इसीलिए, गोदान में कोई किसान आंदोलन नहीं है. यहाँ चतुर्दिक शोषण के बीच उनका सामना करता हुआ होरी अकेला खड़ा है, निपट अकेला. पुलिस, प्रशासन, कायदे-कानून सभी शोसकों के साथ हैं. किसानी की मरजाद न गोदान का होरी बचा पाता है और न ही पूस की रात का हल्कू. दोनों कर्ज के जाल में फंसकर मजदूर बनने को विवश हैं. मजदूर बनना जैसे प्रेमचंद के सीमांत किसान की नियति ही हो.

           प्रेमचंद साहित्य में किसानों के शोषण की ही तस्वीरें नहीं है, बल्कि उनकी छोटी-छोटी खुशियों के भी बहुविध चित्र हैं. शोषण के दुश्चक्र में उलझे होने के बाद भी किसान अपने उल्लास के क्षणों को भरपूर जीता है. होरी और धनिया की आपसी चुहल हो या प्रेमाश्रम के किसानों का गाना-बजाना- प्रेमचंद ऐसे पलों के उल्लास को पूरी जीवंतता के साथ चित्रित करते हैं. होली के अवसर पर गोबर का अपने दोस्तों के साथ किया गया स्वांग सिर्फ हास्य के सृजन के लिए नहीं है, बल्कि यह किसानों की उत्सवधर्मिता का प्रमाण है.

           निष्कर्षतः, प्रेमचंद साहित्य में किसान जीवन का चित्रण बहुआयामी है. उसके सुख, उसके दुःख, उसकी अच्छाइयाँ, उसकी बुराइयाँ, उसकी हार, उसकी जीत…किसान के जीवन का शायद ही कोई पहलू हो, जो प्रेमचंद की निगाहों से बचा हो.

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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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