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अभी-अभी बस पानी थमा ही है और अभी-अभी कानन उसके होटल के कमरे से अस्वीकृता लौटी है. कानन ने इसे तिरस्कार समझा, लेकिन स्वयं उसने क्या समझा, यह वह भी नहीं जानता. अभी तो कुर्सी की गीली गद्दी की सलवटें तक यथावत हैं.

       साँझ बहुत पूर्व ही हो चुकी थी, बल्कि कहना चाहिए कि कानन आई ही थी मुँहधेरे में. उस समय वह बुखार में तपता चुपचाप लेटा हुआ था. नौकर बहुत पहले दूध रख गया था और तब से वह उदास नीली छत ताकता सोचता रहा था. सभी तरह की बातें थीं. घर से सैकड़ों मील दूर तबादले पर फेंक दिया गया था. प्रायः शाम को होटल की छत पर खड़े होकर सामने की टेकरी, किला, मैदान, मैदान में खेलते बच्चे, पड़ोस के मराठी वकील की लड़की….और, और भी बहुत कुछ देखता रहता था.

       आज भी बुखार में वह लखनऊ-प्रयाग के बारे में सोचता रहा. कल्याणी घिरती और एक आह जैसे खिंच उठती. जाने कितने मुख घिरते, लेकिन एक ऐसा सहसा आ जाता कि जिसे वह बरबस हटा देना चाहता, और वह था कानन का मुख. कभी-कभी किसी के बारे में सोचना निरापद नहीं होता. ऐसा ही उसके भी साथ हुआ था. कानन में कोई दोष था, यह भी नहीं. वह सुंदरी ही कही जा सकती थी. अच्छा गा लेती थी. लेकिन कैसे दोनों में प्रगाढ़ आया, यह वह नहीं जानता, क्योंकि अपनी और से तो वह सतर्क था. कानन के चले जाने के बाद तपते सर में उसे लिए वह यही सोचता रहा कि जब कभी कानन से वह मिला, सदा संयत और संश्लिष्ट ही रहा है. कारण कि कल्याणी के प्रति दुबारा धोखा करना होता. एक बार कल्याणी उसके बारे में विषम सोच चुकी थी. अब और की वह कल्पना भी नहीं कर सकता था. तभी तो उस दिन कानन के जन्मदिन की पार्टी में पूरे समय वह दूसरों की भाँति सहज एवं साधारण बनने के प्रयास में भीड़ में खो जाता रहा. लेकिन जब कानन का भाई उसे बुलाने आया, तो उसे उलझन ही हुई थी.

       कानन उसके सामने लाल कनेर बनी मौन आ खड़ी हुई. तो…उसे क्या कहना है? वह तो पार्टी में आमंत्रित था और सब गवाह हैं कि वह पार्टी में था. कानन ऐसे लाल कनेर बनी, मौन सी खड़ी उस पर क्या अभिव्यक्त करना चाहती रही, यह वह नहीं समझ सका. वह क्या कहे? बुलाया कानन ने है, न कि उसने. तब वही कहे.

      –बैठिएगा नहीं?

      –हाँ, बैठें.

      और बिना कानन की प्रतीक्षा किए वह बैठ गया. वह वैसे ही खड़ी रही. उसने देखा कि कानन जूड़े में सोने का फूल लगाए है. उसने पहले कभी सोचा ही नहीं था कि वह इतनी बड़ी है. बस, सिर ढँकने की देरी ही रह गई थी उसके नारी होने में. कहीं वह सिहर उठा. अपने पर नहीं, परिस्थिति पर. ऐसे एकांत में इस तरह मौन खड़े या बैठे रहना—अनजाने ही रहस्य लगने लगता है. स्वयं को भी.

  – क्या आप मुझे बधाई भी नहीं दे सकते आज के दिन?…..

 और सच, कितनी आत्मग्लानि हुई कि इतनी मोटी बात भी उसकी समझ में पहले नहीं आई.

      –तुम बधाई से ऊपर हो.

      –क्यों?

      वह समझा था कि कानन ‘बधाई से ऊपर’ सुनकर प्रसन्न हो जाएगी और बात शेष हो रहेगी. लेकिन अब इस ‘क्यों’ का वह क्या उत्तर दे? क्योंकि उत्तर देना, सामनेवाले को प्रश्नों को प्रश्नों के लिए आमंत्रण देना है. और वह ऐसे किसी झंझट में ज्यादा देर या दूर तक नहीं जाना चाहता था.

      – इसलिए कि सभी ने बधाई तो दी ही होगी और अब तक वह तुम्हारे निकट साधारण हो गई होगी.

      – तब क्या असाधारण देने को है?

      उसे अपनी वाक्-चतुराई पर संदेह होने लगा. कहाँ वह साधारण शिष्टाचार के लिए तैयार ही नहीं था, तब भला कानन कौन-सा असाधारण चाहती है? लेकिन कानन चाहती है—यह कहना उसके प्रति ज्यादती होगी, कारण कि स्वयं उसके वाक्य में कानन की माँग की ध्वनि थी कि जैसे अभी वह जेब से कोई असाधारण निकाल कर कानन को देने ही वाला है. तब भला, कानन का ऐसे माँगना क्या सहज नहीं है?

       – मैं किसी दिन कानन को कुछ दे सकूँ, तो वह मेरा सौभाग्य होगा.

       – आपका जिसमें सौभाग्य हो, उसकी प्रतीक्षा तो करनी ही होगी.

       छोटी सी बात के प्रति भी अगर कोई गंभीर हो जाता है, तो ठण्डा पसीना आने लगता है न? कानन कितनी गंभीर है. उस एकांत में वह और उभर आई थी, जैसे अकेली गंध हो. साड़ी उसे संपूर्ण किए थी. अपनी ही बात को वह आँखों में पुतलियाँ चलाते संतुष्ट दुहरा रही थी. आँखों से अधिक बोलते हुए बोली—मेरी प्रतीक्षा याद रहेगी?

       – इतना बड़ा दाय न सौंपो, कानन!

       – दाय तो मैं लिये ले रही हूँ, आपको तो मैं समय सौंप रही हूँ.

       और बिना किसी अन्य बात या स्थिति की प्रतीक्षा किए ऐसे चली गई, जैसे अग्नि छू ली हो.

       रास्ते भर वह विचारों में कानन को समझाता रहा कि यह सब नादानी है. सस्ते उपन्यास और फिल्मों का प्रभाव अनायास हो जाता है और हम सामनेवाले की पात्रता देखे बिना ही ‘दाय’ और ‘प्रतीक्षा’ जैसे भारी-भारी शब्द बोलकर अपने को छलते हैं. लेकिन होटल पहुँचने तक उसे लगा कि वह नहीं समझ सका है. उस रात वह सो नहीं सका—यह कहना तो भूल होगी, लेकिन बीच-बीच में जागता रहा था—का प्रमाण यह था कि कागज़ पर उसने विभिन्न शक्लें बनाई थीं.

       उसके बाद वह भले ही कम गया हो, लेकिन कानन अमालिन्य भाव से प्रायः मिली है. एक दिन पोस्ट-ऑफिस में वह एक रजिस्ट्री कर रहा था, तो ‘क्यू’ में आकर पीछे खड़ी हँसती रही. पोस्ट-ऑफिस के बाद वह उसे लेकर नहर वाली सड़क पर मात्र सौजन्यवश ही गया था. वहाँ किनारे की एक बेंच पर बड़े थकन के भाव से बैठते हुए बोली

       –आपको तो इतनी भी सौजन्यता नहीं आती कि जब इतनी बार चलाकर इसे लाये हैं, तो कहीं बैठने के लिए कह दिया जाय.

       –हाँ, जगह तो अच्छी है.

       और वह भी बैठ गया. नहर में पानी नहीं था. खाली हथेली-सी नहर खिंची थी. बिल्लौरी साँझ थी. नहर आगे जाकर बाँसों के एक झुरमुट में विलीन हो जाती थी. साँझ जैसे अनचक्के ही हो गई थी, इसलिए ऐसे मौन से वधिर थे कि दूर के क्षीण शब्द तक उन तक आ रहे थे.

       –आपको यहाँ बैठना नहीं सुहाया न?

       –नहीं तो ! कितना अच्छा है?

       –क्या? खाली नहर?

       और कानन हँस पड़ी. वह निरुत्तर किए दे रही थी. इस हँसी के बाद तो कोई भी उत्तर मिथ्या ही होता.

       –एक बात पूछूँ?

       –पूछना चाहो तो ज़रूर पूछो.

       –और न पूछना चाहूँ, तो आप आग्रह भी नहीं करेंगे, है न?

       –क्या तुम ऐसा मानती हो?

       –मानती होती, तो पूछती क्यों?

       –लेकिन इस समय तो तुम कुछ दूसरी बात पूछना चाह रही थी.

       –इतनी अवमानना के बाद भी क्या पूछना हो सकता है?

       –मैंने तो अभी कोई अवमानना नहीं की.

       –अच्छा, जाने दें. मान लो पूछूँ कि इस समय यदि मेरा सिर दुख रहा हो, तो क्या आप दाबेंगे?

       –मैं जानता हूँ कि तुम्हारा सिर नहीं दुख रहा है.

       –इसीलिए तो मान लो कहा.

       –भला, ऐसी बात क्यों सोचूँगा?

     कुछ देर के मौन के बाद हठात् हाथ की कंकड़ी नहर में मारते हुए वह बोली और उठी भी—लेकिन आप वास्तविकता का सामना क्यों नहीं करना चाहते?

        –कौन सी वास्तविकता?

        –यही कि मैं हूँ, आप हैं और इसकी परिणति…

       इसके बाद:

       अभी-अभी वह लौटकर गई है. गत दिनों वह बुखार में रहा है. कानन की प्रतीक्षा थी तो, लेकिन वह चाहता नहीं था. वैसे आज के पूर्व वह कभी उसके होटल के कमरे पर नहीं आई थी. सबेरे क्या, तीसरे पहर तक आकाश साफ़ था. लेकिन उसके बाद जाने कहाँ से बादल आये और मूसलाधार बरसे भी. खुले दरवाजे से कमरे में बौछारें भी आती रहीं. कभी कोई बौछार, हवा के झोंके से उसे भी छू जाती. तपती देह सिहर उठती. वह सोचता ही रहा कि दरवाजा उढ़का ही दिया जाए, लेकिन छत पर टपकती बूंदों की आवाज सुनते उस भीगे मुँहधेरे में खोया हुआ था. और तभी छत पर जूतों की खट-खट सुनाई दी. ‘कौन हो सकता है’ का खयाल अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि कानन आकंठ भीगी, गीली साड़ी में द्वार पर खड़ी थी. अविश्वास का कोई कारण भी अब नहीं था.

        –तुम?

       तकिए के सहारे उठने को वह चेष्टित हुआ. उसे उठने से बरजते हुए बोली—हाँ, लेकिन बुखार में बौछार से भींगना दवा है, इसका किस डॉक्टर ने आविष्कार किया है?

        –भीगते हुए मैं तो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था.

        –सच !! तो फिर?

      वह हुलस उठी. लेकिन उसने तो अपनी बात वातावरण को हलका बनाने के लिए कही थी, मगर कानन के निकट वह गंभीर हो जाएगी—यह भी उसे मालूम होना चाहिए था.

      कानन ने निःसंकोच, प्रसन्न-मन उसका सिर तकिए पर टिका, एक कुरसी खींचते हुए कहा—लेकिन प्रतीक्षा करने के लिए तो मैंने कहा था.

       –वो तो है, लेकिन…तुम इस तरह भीगी—

      यह कहकर उसने अपना और कानन-दोनों का ध्यान कानन की भीगी देह की और दिला दिया. चिकन की साड़ी भीगकर लिपट गयी थी. ब्लाउज भी भीगकर वैसा ही हो रहा था. कानन को अब अपने को ढंकना अनिवार्य लग रहा था. अब तक जो निःसंकोच था, वह अपनेपन का था, लेकिन कह देनेवाला व्यक्ति भीगी साड़ी की भाँति निकट आ चुका था. और बिना पूर्ण स्वीकृत हुए उसे देह या देहाभास से दूर तो रखना ही होगा.

      लेकिन एक पुरुष के कमरे में ऐसी विषमता से वह अवश हो रही थी.

        –तो? अब क्या हो?

       स्पष्ट था कि उसे एक साड़ी चाहिए थी.

        –लेकिन तुम्हें ऐसे पानी में नहीं आना चाहिए था. अच्छा, बैठो.

       और वह जड़ बनी, जितना संभव था, उतना सिमटकर बैठ गई. वह बैठना कदापि नहीं कहा जा सकता था. घिरता अँधेरा सब-कुछ अस्पष्ट करने की चेष्टा में था. छत पर बूंदों में बुलबुले भी उठ रहे थे. वह जान रहा था कि उसकी इस बात से कानन के उत्साह पर पानी फिर गया था.

        पानी थमने लगा था. मौन रीतेपन को बूँदें भरती रही.

         –तुम नाराज हो गई न, कानन?

         –नहीं तो. अच्छा, अब चलूँ.

         –क्यों? बैठो.

         –अब यहाँ नहीं. जिस सर्वस्व को लेकर आई थी, उसके लिए अपने घर भीगते हुए प्रतीक्षा करनी होगी.

        उसने जाते हुए सुना था.

        कानन जहाँ छू गई थी, माथे को वहाँ से दाबे वह सोच रहा था, एक वर्षा भीगी पदाहट आई थी, लेकिन लौट क्यों गई पुनः उसी वर्षा में?

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नरेश मेहता

नरेश मेहता

जन्म: 15 फरवरी 1922, मृत्यु: 22 नवंबर 2000 रचनाएँ: अरण्या, उत्तर कथा, एक समर्पित महिला, कितना अकेला आकाश, चैत्या, दो एकान्त, धूमकेतुः एक श्रुति, पुरुष, प्रतिश्रुति, प्रवाद पर्व, बोलने दो चीड़ को, यह पथ बन्धु था, हम अनिकेतन
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