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दिल्ली में एक सुल्तान थे सिकंदर लोदी। उनके एक छोटे भाई थे आलम खाँ। उनकी एक बेटी थी, जिसका नाम था गुलनार। गुलनार बेहद खूबसूरत थी। इतनी…जितना – ‘त्योहारों में घर चाहे जितना सजा लो, एक लड़की बिना हमेशा सजावट अधूरी। लड़की से ही घर की सबसे बड़ी सुंदरता है। चाहे झोपड़ी ही क्यों न हो। और महल कांतिहीन’ की कवियित्री लिख सकती है। इतनी… जितना, आपका दिमाग़ सोच सकता है। इतनी… जितना, उसे इस धरती पर सबसे खूबसूरत नारी होने का खिताब दिया जा सकता है। इतनी… जितनी कि, मैं कोई उपमा नहीं दे सकती।

गुलनार जब छोटी थी। तब सिकंदर ने अपने भाई (गुलनार के अब्बू) से ये वादा किया था कि वो गुलनार का निक़ाह अपने बेटे इब्राहिम लोदी के साथ करेंगे। वक़्त गुजरता गया। गुलनार बड़ी हो चुकी थी। फिर एक दिन गुलनार के अब्बू ने; अपने भाई सिकंदर को, वो वादा याद दिलाया। सिकंदर इस बात के लिए तैयार हो गये और ये ख़बर अपने बेटे इब्राहिम के पास पहुँचाई। सुनते ही इब्राहिम लोदी ने इंकार कर दिया। इसके दो कारण थे। पहला – इब्राहिम ने कभी भी गुलनारको देखा नहीं था। क्योंकि, गुलनार बहुत छोटी उम्र से ही परदे में रहती थी। इसलिए, इब्राहिम को पता ही नहीं था कि क़ुदरत का नायाब तोहफ़ा उसे इतनी आसानी से मिल रहा था। उसने गुलनार को ठुकरा दिया। दूसरी वजह – इब्राहिम एक नाचने वाली के प्रेम में दीवाने थे।

लेकिन फिर भी… क्योंकि, सिंकदर लोदी ने अपने भाई से वादा किया था। इसलिए; जोर-जबर्दस्ती से उन्होंने गुलनार का निक़ाह, अपने बेटे इब्राहिम से करवा दिया।

ये बात जब उस नाचने वाली को पता चली, तो उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। क्योंकि  उसने महल की खादिमों से सुन रखा था, कि गुलनार हक़ीकत का चाँद है। उसने सोचा… ‘अगर इब्राहिम ने एक बार भी गुलनार को देख लिया, तो फिर जिंदगी में वो कभी मेरी शक्ल नहीं देखेगा। फिर… मेरा क्या होगा?’ क्योंकि, उस रक्कासा को इब्राहिम की प्रेमिका बनकर, सारी शाही सुविधाओं का लाभ प्राप्त हो रहा था। और यकायक इस तरह फुटपाथ पर आना उसे गँवारा नहीं था। वो सोच रही थी ‘मैं ऐसा क्या करूँ कि इब्राहिम सदा के लिए सिर्फ मेरे हो जायें, गुलनार के नहीं।’

     निक़ाह की पहली वाली शाम थी। रक्कासा ने खादिमा के द्वारा इब्राहिम के पास ये खबर भिजवाई, कि आज शाम…सिर्फ आज शाम को वो (इब्राहिम) हमसे बाग़ीचे में मिल लें। उसी बाग़ीचा में, जहाँ हम अक्सर मिला करते थे। फिर चाहे सारी जिंदगी न मिलना।

सिर्फ, एक बार ही मिलना है। सिर्फ, आखिरी बार ही मिलना है।’ ऐसा सोचकर, दासी से खबर मिलने के बाद इब्राहिम बाग़ीचे में रक्कासा से मिलने पहुँच गए। बाग़ीचे में पहुँचकर इब्राहिम हैरत में पड़ गया।  उसने देखा आज रक्कासा, और दिनों के मुकाबले बहुत ही ज्यादा खूबसूरत लग रही थी। उसने महसूस किया कि जैसे… ज़मीं पर कोई हूर उतर आई हो। वह उसे बस देखता ही रह गया।

रक्कासा आज दुल्हन की तरह सज कर आई थी और साथ ही वो इत्र भी, जो इब्राहिम को खास पसंद था, भी अपने ऊपर छिड़क कर आई थी। इब्राहिम रक्कासा को देखकर, बेसुध सा खड़ा रहा। रक्कासा ने उसके नज़दीक आकर, उसके गले में अपनी दोनों बाहें डाल दी।

शाम का वक़्त था। आसमान में पूनम का चाँद उग आया था। और उस चाँद की परछाई रक्कासा (इब्राहिम की सोच के मुताबिक़) इब्राहिम के आगोश में थी।

हवाओं के नर्म झोकों में फूलों की खुशबू थी।
और रक्कासा के जिस्म से आती इत्र की खुशबू भी। माहौल की इन सारी खूबियों ने मिलकर इब्राहिम को मदहोश सा कर दिया था। इब्राहिम को कोई होश नहीं था, इसलिए रक्कासा अपना काम कर रही थी। उसने इब्राहिम का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामकर, उसके होठों में अपने होंठ रख दिये। अब इब्राहिम पर दुगुना नशा था। कुछ वक़्त के अंतराल के बाद रक्कासा ने जाम का एक पैमाना भी इब्राहिम के होठों से लगा दिया। अब तो इब्राहिम पर तिगुना नशा। अब इब्राहिम निक़ाह की अपनी पहली रात; गुलनार के साथ नहीं, यहीं इसी बाग़ीचे में, रक्कासा के साथ ही मना लेना चाह रहा था। उसने रक्कासा से ग़ुजारिश की। क्योंकि; वह अब पूरी तरह से, रक्कासा के साँचे में ढल चुका था। इसलिए; इश्क़ का खेल खेलने से पहले, रक्कासा ने दहाड़े मार-मारकर रोना शुरु किया।

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क्योंकि इब्राहिम पर अब कई गुना नशा चढ़ा हुआ था। ऐसे में उस नशे का इलाज, उस वक़्त सिर्फ रक्कासा ही थी।

क्योंकि; इस वक़्त की अपनी सबसे बड़ी जरूरत की वजह से, इब्राहिम रक्कासा का ग़ुलाम बना हुआ था। तो इब्राहिम ने जोश में या नशे में, प्यार में या मजबूरी में कह दिया “मल्लिका-ए-हुस्न क्या तक़लीफ़ है? मुझसे कहो। मैं अभी फौरन उसे पूरा करुँगा।”

रक्कासा – “अब तो आपका निक़ाह हो गया। आप तो आज मुझसे आखिरी बार मिलने आये हैं न? अब तो आपको एक बहुत खूबसूरत शरीक-ए-हयात मिल गई है। अब तो आप मेरे पास कभी नहीं आयेंगे? अब मैं कहाँ जाऊंगी? क्या होगा मेरा?”  वह ज़ारों-कतार से रोने लगी।

इब्राहिम – “नहीं, ऐसा कभी नहीं होगा। मैं तुम्हारा हूँ और तुम्हारा ही रहुँगा। तुम जैसा चाहोगी बस वैसा ही होगा। तुम जो कहोगी, मैं वही करुँगा। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए? मैं अभी, इसी वक़्त दुँगा।
रक्कासा – “सच?”
इब्राहिम – “सच!”
रक्कासा – “तो फिर मुझसे वादा कीजिये कि आप हमेशा-हमेशा के लिए मेरे ही रहेंगे? अपनी बेगम के नहीं?”
इब्राहिम – “हाँ, मैं वादा करता हूँ कि मैं हमेशा-हमेशा के लिए सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही रहूँगा, अपनी बेगम का नहीं।”
रक्कासा – “सच?”
इब्राहिम – “सच!”
रक्कासा – “ओह! शहजादे, आप कितने अच्छे हैं।” और इब्राहिम का माथा चूम लिया।

उधर गुलनार दुल्हन बनी सारी रात इंतज़ार करती रही। लेकिन, गुलनार के कमरे में न इब्राहिम आया और न ही गुलनार की आँखों में नींद। जब सुबह हुई, इब्राहिम गुलनार के कमरे में आया।

इब्राहिम – “तुम रात भर मेरे इंतज़ार में जागती रही होगी? मैं मुआफ़ी चाहता हूँ कि मैंने तुम्हें इंतज़ार करवाया। लेकिन, आज के बाद से फिर कभी मेरा इंतज़ार मत करना। क्योंकि इंतज़ार बेज़ा जायेगा। क्योंकि मैं तुम्हारे पास कभी नहीं आऊँगा। क्योंकि; मैं तुमसे नहीं, किसी और से मुहब्बत करता हूँ। तुम्हें तो तुम्हारे अब्बू ने जबर्दस्ती मेरे गले बाँध दिया है। लेकिन हाँ, क्योंकि दुनिया की नज़र में तुम ही मेरी बेग़म हो और मैं तुम्हारा शौहर। इसलिए… तुम इस महल में पूरे अधिकार के साथ रह सकती हो। तुम ही इस सल्तनत की, मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान रहोगी। ये महल, ये नौकर-चाकर, ये सारी शान-ओ-शौकत, ये हीरे-मोती के जेवर, ये सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े। ये सब तुम्हारा; सिवाय एक चीज के, और वो है….मैं। तुम मुझसे कभी भी शौहर के अधिकार मत माँगना। क्योंकि, मैं तुम्हारा नहीं हूँ। तुम चाहो तो अपनी… शौहर की ज़रूरत के लिए किसी और का इस्तेमाल कर सकती हो। मैं कभी भी तुम्हें टोकूँगा नहीं।”

इब्राहिम चला गया और गुलनार देर तक खड़ी, बस अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन ही कुरेदती रही। उसकी आँखों के बाँध में दर्द का सैलाब था। लेकिन, एक क़तरा भी बाहर नहीं। आँचल के अंदर छिपे चेहरे के क्या भाव थे? ये तो बस गुलनारही जाने।

यूँ ही दिन बीतते रहे। गुलनार अपने कमरे में चुपचाप, खामोश एक छिछली जिंदगी जीती रही।  वो जब बात करती, तो उसे नहीं पता होता कि वो किससे बात कर रही है। वो हँसती; उसे नहीं पता होता, क्यों हँसी। उसने बाहर की दुनिया से बिल्कुल नाता तोड़ लिया था।
‘ये मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान, ये सारी शान-ओ-शौक़त क्या है? कुछ भी तो नहीं। ये हमारे साथ हँस-रो नहीं सकते। हमारी जज़्बात नहीं समझ सकते। ये हमदर्द, हमराज़, हमसफ़र नहीं बन सकते।’ वो इसी सोच में दिन-ब-दिन कपूर की तरह कम होती जा रही थी।

उधर, इब्राहिम अब पूरी तरह से सिर्फ रक्कासा के प्यार में ही डूबा हुआ था। उसे अब अपनी सल्तनत, अपनी रियाया और अपने पिता की इज्ज़त किसी का ख्याल न रहा। किसी की फिक्र न रही। वो बस दिन-ओ-रात उस रक्कासा के साथ इश्क़ करता। कभी नाच देखता, कभी शराबनोशी करता। और फिर थक कर सो जाता। उसे जरा भी इल्म नहीं कि उसकी सल्तनत को लूटने के लिए उसके आसपास कितने दुश्मन पैदा हो रहे हैं। वो सारी दुनिया को भूल चुका था। अब उसके लिए इस दुनिया में सिर्फ दो लोग थे। एक वो, एक उसकी माशूका (रक्कासा)।

उधर, काबुल का तैमूरी शासक ज़हीर-उद्-दीन-बाबर हिन्दुस्तान पर कब्जा करना चाह रहा था। इधर, हिन्दोस्तान की रियाया इब्राहिम से खुश नहीं थी। और साथ ही गुलनार के अब्बू आलम खाँ भी। वो इब्राहिम की बेपरवाह हुकूमत और अपनी मुरझाई बेटी को देखकर इब्राहिम से नफ़रत करने लगे थे।

कुछ दिनों बाद बाबर ने आलम खाँ को काबुल आने का न्योता दिया। आलम खाँ ने सोचा ‘जब मैं जा रहा हूँ काबुल, तो क्यों न साथ में गुलनार को भी लेता चलूं। क्या पता? काबुल की आबो-हवा से उसकी तबियत बहल जाये। क्या पता? हवा-पानी बदलने से उसका मन बहल जाये।’
यही सोचकर आलम खाँ ने गुलनार को भी काबुल साथ चलने के लिए कहा। पहले तो गुलनार ने इंकार किया। लेकिन फिर वालिद के बहुत जिद करने पर साथ चलने को तैयार हुई।
उधर, बाबर और उनके शहजादे हुमायुँ ने आलम और गुलनार के खैरमक़दम के लिए खासा तैयारी कर रखी थी। आलम और गुलनार हाथी पर बैठकर काबुल रवाना हुए। जब आलम और गुलनार का हाथी काबुल में बाबर के द्वार पहुँचा। …तो वहाँ आलम और गुलनार के स्वागत के लिए वाद्ययंत्र बजाये जाने लगे। जिससे हाथी भड़क गया और गुस्से से दोनों पैर उठाकर जोर से चिंघाड़ा। इस चिंघाड़ की आवाज सुनकर बाबर और हुमायुँ महल से दौड़ते हुए आये। इधर, हाथी के चिंघाड़ से डरकर गुलनार ऊपर से कूद पड़ीं। इस कूदने-भागने के चक्कर में जाने कैसे गुलनार का नक़ाब थोड़ा सरक गया। जिसे, महल से भागकर आते हुए हुमायुँ ने देख लिया। और हुमायुँ पर नज़र पड़ते ही गुलनार ने झट से अपना नक़ाब ठीक किया।

लेकिन, अब जो होना था वो हो चुका था। दावानल के लिये भी सिर्फ एक ही चिंगारी काफी होती है। गुलनार इस धरती की सबसे खूबसूरत हसीना हैं, ये बात हुमायुँ ने अभी तक दूसरों से सुना था। उस वक़्त अपनी भी आँखों से देख लिया था। लेकिन; ये देखना बिल्कुल वैसा ही था, जैसे तपते रेगिस्तान में बारिश की दो-चार बूँद। अभी तक तो वो गुलनार को सिर्फ देखना चाह रहा था। लेकिन देखने के बाद तो देखने की तड़प पहले से कई गुना बढ़ गई थी। अभी तक तो उसे सिर्फ ये पता था कि गुलनार बहुत खूबसूरत है, लेकिन आज उस खूबसूरती को देखकर पता चला कि खूबसूरती क्या बला होती है?

आलम को मेहमानख़ाने में और गुलनार को जनानख़ाने में बैठा दिया गया। उधर बाबर, आलम से यात्रा-वृत्तांत सुनते रहे। इधर, हुमायुँ के सीने से दिल निकल कर जैसे कहीं भागा जा रहा था। उसे बहुत बेचैनी हो रही थी। वो सोच रहा था ‘मैं सीधे जनानख़ाने चला जाऊं, और गुलनार के सामने बैठकर उसके चेहरे से नक़ाब हटा दूँ। और जी भर कर देख लूं।’ लेकिन…..ये सब इतनी आसानी से मुमकिन नहीं था। पहली बात – गुलनार उस घर की मेहमान थी। और दूसरी बात – वो मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान थी। आखिर हुमायूँ को किसी तरह खुद पर नियंत्रण रखना पड़ा।

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शाम होने को आई थी। बाबर ने गुलनार और आलम खाँ को एक अन्य महल (मेहमानख़ाने) में भिजवा दिया था, जिससे कि वह दोनों आराम से रह सकें। रात हो गई थी। गुलनार की आँखों से नींद मीलों दूर थी। दो बातें थीं, जो उसे सोने नहीं दे रही थीं। पहली बात – आने के साथ ही हाथी से कूदने वाली घटना कि कैसे उसे सबके सामने शर्मिंदा होना पड़ा था। और दूसरी – इस अजनबी शहर में, ये अजनबी लोग। न जाने कैसे रहेगी वो? इस अजनबी माहौल में। उधर, हुमायुँ भी सारी रात यही सोचता रहा ‘क्या मेरी जिंदगी में कभी वो दिन आयेगा? जब मैं गुलनार को तसल्ली से देख सकुंगा।’

सुबह हुई। हुमायुँ ने अपनी व्यक्तिगत दासी को आवाज दी, और कहा – “देखो, तुम जरा जल्दी से मेरे सभी काम निबटा कर गुलनार के पास भी चली जाना। वो यहाँ की मेहमान हैं और यहाँ के माहौल और लोगों से अनजान। तुम साथ रहोगी तो उन्हें अच्छा लगेगा। और हाँ, क्यूँकि गुलनार तकल्लुफ़ भरे एख़लाक की दिखती हैं। वो अपनी जरूरतें किसी से कह नहीं पायेंगी। इसलिए, उनके साथ जरा बहनापा रखना।”

दासी – “क्या बात है शहजादे????? आप कुछ ज्यादा ही फिक्र कर रहे हैं गुलनार की। जैसे वो आपके अब्बू की नहीं, आप ही की मेहमान हों?” दासी ने हुमायुँ को छेड़ा।

हुमायुँ – “क्या आपी; आप भी न! मैंने तो बस, यूँ ही। आप तो बस बात का बतंगड़ बनाती हैं।” हुमायुँ ने सफाई दी।

दासी – “शहजादे…. मैं बतंगड़ नहीं बनाती। मैं तो सिर्फ इसलिए पूछ रही हूं कि, मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान आपके लिए गुलनार कब से हो गईं? और हाँ, आप ये भी भूल गए कि मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान के साथ उनके अब्बू भी हैं। जिनका ख्याल रखने के लिए आपने हमसे नहीं कहा।” दासी ने हुमायुँ के मन के चोर को पकड़ा।

हुमायुँ – “ओह! हाँ; मैं उनके बाबत में भी बोलने ही वाला था, लेकिन उससे पहले ही आप बीच में टपक पड़ीं।” हुमायुँ ने दुबारा अपना बचाव किया।

“झूठे।” दासी ने सिर झटकते हुए कहा, तो हुमायुँ मुँह घुमा कर मुस्कुराने लगा।

दासी हुमायुँ के सारे काम निबटा कर, गुलनार के पास आ चुकी थी।

दासी – “अस्सलाम अलैकुम… मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान।”

गुलनार – “वअलैकुम अस्सलाम। आप ….! यहां? आप तो….??”

दासी – “हाँ, मैं शहजादे के महल में थी। अभी शहजादे ने मुझे यहाँ भेजा है, आपकी ख़ातिरदारी के लिए।”

गुलनार – “मेरी ख़ातिरदारी? अब मेरी कौन सी ख़ातिरदारी? यहाँ तो खुद ही इतने नौकर-चाकर हैं।”
दासी – “वो तो मुझे भी पता है। लेकिन; शहजादे ने मुझे भेजा, तो मैं चली आई। अब; जब शहजादे आपका खास ख्याल रखना चाहते हों, तो मैं क्या कर सकती हूं?” दासी ने गुरूर में मटकते हुए कहा।

गुलनार – “जी??”

दासी – “जी…मेरा मतलब…. आप ये लीजिये।” दासी ने गुलनार के सामने अपनी मोगरे वाली मुठ्ठी खोलते हुए कहा।

गुलनार – “मोगरे!!!! अरे वाह! कहाँ से लाई? उफ्फ, क्या खूबसूरत…।” गुलनार ने सवाल छोड़ते हुए, बिना जवाब मिले ही दासी के हाथों से फूल झपट लिए। और अपनी हथेलियों में भरे फूलों को आँखें बन्द करके चूमने लगी। उसे अपना बचपन याद आ गया; जब उसके अब्बू उसके लिए, ढेर सारे मोगरे लाया करते थे। और वो उन मोगरों के जेवर बना कर पहनती थी, और अपनी गुड़िया को भी पहनाती थी। ‘सच, अब्बू मेरा कितना ख्याल रखते थे। और मेरी खुशी के लिए क्या-क्या किया करते थे।’ गुलनार ने मन में सोचा। “तुम कितने साल बाद मिले।” गुलनार ने धीरे से आँख खोलकर उदास होते हुए कहा।

दासी – “कौन? मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान।”

गुलनार – “मोगरे।”

दासी – “हिन्दुस्तान में मोगरे नहीं होते क्या?”

गुलनार – “होते हैं।”

दासी – “फिर आपने क्यों कहा कि सालों बाद…?”

गुलनार – “….क्योंकि…’अब तुम्हें कैसे बतायें? कि हम सिर्फ नाम की मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान हैं। हमने तो दुनिया देखनी छोड़ दी। जिंदगी जीनी छोड़ दी।’ गुलनार ने सोचते हुए आगे कहा – हम तो मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान हैं न? तो हम इतनी व्यस्त रहती हैं कि, इस सब के लिए समय ही कहाँ मिलता है?” गुलनार ने वो बात बनाई, जो दासी को हज़म नहीं हुई।

दासी – “अच्छा! मैं तो इधर आ रही थी; तो ये मोगरे मुझे रास्ते में मिल गए थे, तो मैं तोड़ते लाई। अगर मुझे पता होता कि; ये आपको खूब पसंद हैं, तो मैं और तोड़ते लाती।”

गुलनार – “क्या? ये मोगरे रास्ते में मिले? लेकिन, कल जब… मैं आई, तो मुझे तो कहीं नहीं दिखाई दिये थे।”

दासी – “अरे, मल्लिका जी रास्ते से मेरा मतलब… मैं शाही बाग़ीचे से आ रही हूं।”

गुलनार – “शाही बाग़ीचा????”

दासी – हाँ, शहजादे हुमायुँ का एक निजी शाही बाग़ीचा है न। ये फूल वहीं से ला रही हूं। उन्हें भी मोगरे बहुत पसंद हैं।”

गुलनार – “अच्छा???” और उन फूलों को देखते हुए कुछ सोचने लगी।

दासी – “अच्छा तो…..जब आपको मुझसे कोई काम ही नहीं है, तो फिर मैं चलती हूँ। कल फिर आऊँगी। खुदा हाफिज़।”

गुलनार – “खुदा हाफिज़। लेकिन कल आना जरूर।” की इस बात पर दासी ने मुड़कर हैरत से गुलनार को देखा। “बड़ा अच्छा लगा तुमसे मिलकर।” गुलनार ने आगे कहा।

दासी – “जी जरूर, शुक्रिया।” मुस्कुराकर कहा और चली गई।

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हुमायुँ – “आप आ गईं आपी?? कैसी हैं गुल….आलम मियाँ??”

दासी – “क्या? कैसी हैं…आलम मियाँ???”

हुमायुँ – “मैंने ये कब कहा? मैंने कहा.. कैसे हैं आलम मियाँ? आपको ही कम सुनाई पड़ता है।”

दासी – “अच्छा??? तो मैं आपको बावली समझ आती हूँ क्या? शहजादे मियाँ… आपको बचपन से संभालती आई हूँ। आपकी माँ नहीं हूँ, तो माँ से कम भी नहीं हूँ। आपकी रग-रग से वाकिफ़ हूँ। आपकी पसंद-नापसंद, शौक, जरूरत इतना तक कि बीमारी भी आपसे पहले मैं जान जाती हूँ। मैंने गौर किया है कि जब से मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान काबुल आई हैं, आप बहुत परेशान से दिख रहे हैं। आपने कल खाना भी ठीक से नहीं खाया। और कल सारी रात आपको नींद भी नहीं आई। क्या मैं जान सकती हूं कि इन सारी बातों की क्या वजह हो सकती है?”

हुमायुँ – “ऐसी कोई बात नहीं। आपको यूँ ही लगा।”

दासी – “अगर कोई बात नहीं, तो फिर ठीक है। लेकिन अगर कोई बात हो तो, मेरे ख्याल से उसे, मेरे साथ बाँट लेने में ही भलाई है आपकी। क्या मालूम?? शायद.. मैं आपकी कोई मदद ही कर सकूँ।”

हुमायुँ – “…जी…ऐसी कोई…..”

दासी – “….देखो शहजादे आलम….कुछ बातें ऐसी होती हैं; जिन्हें जितना छुपाओ, वो उतनी ज़ाहिर होती हैं। इसलिए… छुपाने से अच्छा होगा कि, आप खुलकर कहें। छुपाने से कहीं ऐसा न हो कि; फिर आपके हाथ सिर्फ, पछतावा ही लगे। बाकी आपकी मर्जी, कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं।”

हुमायुँ – “अ..आपी…मैं…वो…मेरा मतलब.. कि..”

दासी – देखो शहजादे आलम….. आप अगर इसी तरह से हकलाते रहे तो, मैं चलती बनीं। क्योंकि; मुझे  इतनी फुर्सत नहीं, मेरे पास और भी बहुत से काम हैं।” और  मटक के चलती बनी।

हुमायुँ – “आपी…आपी…आपी…मैं कह तो रहा हूँ।” दासी ने फतह के अंदाज़ से हुमायुँ को देखा। “मैं…मेरा मतलब.. मुझे गुलनार से मुहब्बत हो गई है, और मुझे उनसे मिलना है। अगर आप किसी जतन से मिला देतीं तो…….”

दासी – “बस, इतनी सी बात? ये काम तो मैं चुटकियों में कर लुंगी। लेकिन… आप ये भूल रहे हैं कि वो मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान हैं।”

हुमायुँ – “मुझे याद है। आप तो मुझे बस उनसे एक बार मिलवा दीजिये। बड़ी मेहरबानी होगी।”

दासी – “इसमें मेहरबानी की क्या बात? मैं तो हूँ ही आपकी खादिमा। और आपकी खिदमत के लिए ही तो रखी गई हूँ मैं, इस महल में। मैं आपको कोई खुशी दे पाऊँ, ये मेरी खुशकिस्मती होगी।”

हुमायुँ – “तो फिर बताइए, आप हमें कब मिलवायेंगी? अपनी मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान से।” हुमायुँ ने भौहें उठाते हुए; मुस्कुराकर कहा, तो दासी हुमायुँ को घूरने लगी।

दासी – “कल; दोपहर ढलने के बाद, शाही बागीचे में।”
कल मिलने की खुशी में हुमायुँ का दिन जैसे-तैसे गुजरा। और नींद? आज रात फिर…आँखों से दूर ही रही।

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दासी – “अस्सलाम अलैकुम, मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान।” दूसरे दिन दोपहर को, दासी ने गुलनार से जाकर कहा।

गुलनार – “वअलैकुम अस्सलाम। मुझे खुशी हुई, आपने वादा जो निभाया।”

दासी – “कैसा वादा??”

गुलनार – “अरे! भूल गईं? आज मिलने का वादा जो किया था आपने?”

दासी – “…’आदा-वादा कुछ नहीं; मैं तो बस अपने दासी होने का फर्ज निभा रही हूँ, न कि आपसे मिलने आई हूँ। खैर….अब आपको क्या समझाऊँ?’ दासी ने मन में सोचा। “हाँ; वही तो, भूलुँगी क्यों? जब वादा किया है, तो निभाऊँगी ही। मैंने सोचा; आप ऊब रही होंगी तो, आपसे मिल लूँ चलके। वैसे; आपका दिल बहलाने के लिए, मेरे पास एक बहुत अच्छा तरीक़ा है। आप कहें तो बताऊँ?”

गुलनार – “क्या?”

दासी – “क्यूँ न हम…महल से बाहर, कहीं घूमने चलें?”

गुलनार – “बाहर???? न बाबा न। इस अजनबी शहर में, बाहर घूमने में मुझे बहुत अजीब लगेगा। लोग क्या कहेंगे? और, वैसे भी…. मुझे डर लगता है।”

दासी – “अजीब????? अब इसमें अजीब क्या है? क्या हम औरतों को बाहर नहीं निकलना चाहिए? और लोग? वो कुछ भी क्यूँ कहने लगे? किसकी मजाल? जो मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान को कुछ भी कहे। और रही बात डर की? तो आपको बता दूँ कि; मैं अकेले ही, चार सैनिकों के बराबर हूँ।”

गुलनार – “लेकिन… अब्बूजान……??”

दासी – “आपके अब्बूजान…..? वो कुछ भी क्यूँ कहेंगे? और …वैसे भी; मैंने उस दिन मेहमानख़ाने में सुना था, आपके अब्बूजान जहाँपनाह से कह रहे थे कि….आप बीमार हैं। इसलिए वो आपको काबुल घुमाने लाये हैं। तो घूमने का ये मतलब तो नहीं होता, कि आप किसी महल के किसी कोने के किसी बिस्तर में पड़ी रहें? घूमने का मतलब होता है क़ुदरती माहौल के करीब जाना।”

गुलनार – “अरे वाह! आप तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती हैं?”

दासी – “हाहाहाहा……दासी हूँ तो क्या हुआ? जिंदगी के कुछ तजुर्बे तो, मेरे भी पास हैं।”

गुलनार – “जी।”

दासी – “तो पूछ कर आऊँ आपके अब्बूजान से?”

गुलनार – “हम्म; लेकिन पहले ये बताइये, हम जायेंगे कहाँ?”

दासी – “आपको मोगरे पसंद हैं न? तो क्यूँ न हम शाही बागीचे चलें? क्योंकि, वहाँ बहुत से मोगरे हैं।”

गुलनार – “शाही बाग़ीचा ??? लेकिन; वहाँ अगर जहाँपनाह या उनके शहजादे ने देख लिया तो?”

दासी – “अब वो भला आपको क्यूँ देखने लगे? वो तो बाग़ीचे में सिर्फ; सुबह की सैर के लिए आते हैं, बस। और दोपहर बाद….. तो बिल्कुल भी नहीं।”

गुलनार – “पक्का न??”

दासी – “पक्का मल्लिका-ए-आलिया।”

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गुलनार और दासी शाही बाग़ीचे में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चल रही थीं। शाही बाग़ीचा सचमुच… अपने नाम को सार्थक कर रहा था।

दासी – “मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान…. आप शाही बाग़ीचे को देखने आई हैं, यूँ नकाब ओढ़कर??”

गुलनार – “तू कहना क्या चाहती है?”

दासी – “यही कि; कम-से-कम यहाँ तो नकाब हटा दीजिये, जिससे कि ये शाही बाग़ीचा मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान के दीदार कर सके और खुद को खुशकिस्मत मान सके।

गुलनार – “हाहाहाहा….हम्म, और अचानक से अगर यहाँ कोई मर्द आ जाये तो??”

दासी – “मल्लिका जी, आप ख़ामखां डर रही हैं। जबकि; मैं तो आपको यहाँ खास ऐसे मौके पर लाई हूँ, जब यहाँ एक भी मर्द नहीं आता है।”

गुलनार – “सच?”

दासी – “सच??? अरे; इंसान तो क्या इस वक़्त यहाँ एक भी नर पशु-पक्षी भी नहीं आता है। बल्कि मैं तो यूँ कहूँगी कि जब यहाँ के नर पेड़-पौधों को भी पता चला, कि मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान आ रही हैं। वो मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान, जो खासा परदे में रहती हैं, तो वो भी ग़ायब हो गए।” दासी ने ठिठोली के साथ कहा।

गुलनार – मुस्कुराते हुए “भक्क, कुछ भी। वैसे ये, मोगरे कौन हैं? जनाना या मर्दाना?” गुलनार ने भी परिहास किया। शायद… काबुल की आबो-हवा सचमुच उसे नई जिंदगी दे रही थी।

दासी – “ये तो मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान और शहजाद-ए-आलम ही जानें, क्योंकि.. वही दोनों तो मोगरों के दीवाने हैं। मुझ पगली को क्या मालूम?”

हाथ पकड़ कर….यूँ ही थोड़ी देर और चलने के बाद…

दासी- भौंहे मटकाते हुए “ये लो, इतनी बहस हो गई और नकाब फिर भी न हटा।”

गुलनार – “या अल्लाह…..ये ले।” और नक़ाब को पीछे पलट दिया। “खुश? अब अगर किसी मर्द ने मुझे देखा तो… तेरी जान की खैर नहीं।” गुलनार ने गर्दन झटक कर झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा।

दासी – “हाँ ठीक है। अगर किसी मर्द ने आपको देखा तो मेरा सिर धड़ से अलग कर दीजियेगा। बस????” और फिर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

गुलनार की आँखें बागीचे के खूबसूरत माहौल को देखकर; यूँ मदहोश हुई जा रही थीं कि जैसे उसने पहली बार जाना हो कि, धरती इतनी खूबसूरत होती है। वो हर एक पल को अपने जे़हन में छुपा लेना चाह रही थी। और उस क़ुदरती खुशबू को आँखें बंद करके अपनी साँसों के जरिये खुद में समो कर रही थी।

हवाओं में संजीवनी थी, उसका रोम-रोम खिल रहा था। आज, जैसे तन और मन सब पाक़ीज़ा हो रहा था। वो मोगरों को सहलाते, नजरें नीची किये, एक प्यारी सी नज़्म गुनगुनाते, धीमी-धीमी चाल से आगे बढ़ी जा रही थी कि तभी अचानक किसी चीज से टकरा गई। देखा तो……उफ्फ…. नामरहम।… वो जैसे ठंढी पड़ गई, उसकी साँस अटक गई। उसका गला सूख गया और शरीर थर-थर काँपने लगा। सामने शहजाद-ए-आलम हुमायुँ खड़े थे। उसने झट अपने दोनों हाथ, अपने चेहरे पर रख लिया और वहीं बैठ गई। तभी उसे अचानक होश आया।

“उफ्फ…मेरा नक़ाब….?? वो जल्दी-जल्दी सामने-पीछे, दायें-बायें देखने लगी। लेकिन नक़ाब कहीं नजर न आया।

‘अरे! मैंने तो उसे सिर्फ पीछे की ओर पलटा था, सिर से तो उतारा न था। फिर कहाँ चला गया? और गया भी तो, मुझे पता क्यूँ न चला? और हाँ…ये खादिमा की बच्ची कहाँ गई? उसने कब मेरा हाथ छोड़ दिया? इसको जिन्दा नहीं छोड़ुँगी।’ गुलनार ने मन ही मन सोचा। और अपने आसपास खादिमा और नक़ाब को न पाकर वो बेतहाशा भागी। लेकिन; उसके भागने से पहले ही, हुमायुँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

गुलनार – “शहजाद-ए-आलम, मुझे माफ कर दीजिये। मुझसे गलती हो गई जो मैंने बिना आपकी इजाज़त के, आपके बाग़ीचे में कदम रखा।”

हुमायुँ- “मैंने कब कहा कि आपने ज़ुर्म किया। बल्कि आपका यहाँ आना, जरूर मेरे सवाब होगा। बल्कि मैं चाहता हूँ कि; आप इसी तरह एक दिन, मेरी जिंदगी में भी कदम रखें।” और हाथ पकड़े-पकड़े ही गुलनार के सामने की तरफ आने लगे तो गुलनार ने फिर से अपना चेहरा घुमा लिया।

गुलनार – “शहजाद-ए-आलम, आप मेरी शक्ल मत देखिये। गुनाह है ये। मैं किसी और की अमानत हूँ, आप बख़्श दीजिये मुझे।”

हुमायुँ – “ग़ुनाह??? अपनी मुहब्बत का इज़हार करना कभी ग़ुनाह नहीं होता। और….आप जिनकी अमानत हैं, उन्हें तो आपकी कद्र भी नहीं।”

गुलनार – “ऐसी कोई बात नहीं। और वैसे भी….जो भी हो, आप मेरा हाथ छोड़िये।”

हुमायुँ – “आप कुछ वक़्त ठहरिये यहाँ, मुझे आपके साथ कुछ लम्हे बिताने हैं। कम से कम अपना दीदार तो करने दीजिये मुझे। क्या ये भी ग़ुनाह है?”

गुलनार – “हाँ, ये भी ग़ुनाह है। अब पता चला; आपने अपनी उस खादिमा को, मेरी ख़ातिरदारी के लिए क्यों भेजा था। मुझे इस शाही बाग़ीचे में लाना, मेरे ख़िलाफ़ एक चाल थी। और वो खादिमा की बच्ची…. वो भी शामिल थी इसमें।” गुलनारने रोते-रोते कहा और हाथ छुड़ाकर जाने लगीं।

हुमायुँ – “मेहरबानी करके आप रोइये मत। आपको दुखी करने का, मेरा कोई इरादा नहीं था। और मैंने आपके ख़िलाफ़ कोई चाल भी नहीं चली। मैं तो बस आपसे, अपनी मुहब्बत का इज़हार करना चाह रहा था। मैं जानता हूँ, आप अपने शौहर से डरती हैं। अगर; आप हाँ कर दें तो, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि आपके शौहर हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे। छीन लूँगा मैं आपको, आपके शौहर से। क्यूँ हैं आप उसके साथ? उसने तो आपकी कोई कद्र नहीं की। मैं तो आपके कदमों में, जमाने की हर खुशी डाल दुँगा। जन्नत आप पर कुर्बान कर दुँगा। यकीन करें आप हमारा।” भागती हुई गुलनार का पीछा करते हुए हुमायुँ ने कहा।

गुलनार – “मुझे जन्नत का शौक नहीं। मुझे जमाने की किसी भी खुशी की जरूरत नहीं। आप भविष्य के शहंशाह हैं। और मुझे शहंशाहों की ख़्वाहिश नहीं। और हाँ, मैं कल ही हिन्दुस्तान लौट जाऊँगी।” गुलनार ने पलट कर, क्रोध में लम्बी-लम्बी साँसें भरते हुए जवाब दिया।

हुमायुँ ने गुलनार को अब जाकर देखा। ‘उफ्फ…. बला की खूबसूरत। ऐसे, जैसे जन्नत की कोई हूर। उसकी आँखें…. जैसे आम की फाँकें। नहीं-नहीं… जैसे मछली, नहीं मछली नहीं जैसे कमल। कमल भी नहीं जैसे दरिया। दरिया??? हाँ दरिया; जिससे दर्द के धारे निकल रहे हैं, वो भी मेरी वज़ह से।’ गुलनार ने जब पलट कर बोलना शुरू किया; हुमायुँ एक घुटने पर बैठकर, ग़ुमहोश सा सिर्फ गुलनार को देखता रहा, और सोचता रहा।

गुलनार – “ऐसे क्या देख रहे हैं? सुना नहीं आपने? मैंने क्या कहा? मैं कल ही हिन्दुस्तान लौट जाऊँगी। और फिर जिंदगी में कभी भी काबुल नहीं आऊँगी। क्योंकि, शहंशाह मेरे सपनों के शहजादे नहीं।” इतना कहकर गुलनार वहाँ से भाग गई।

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गुलनार को काबुल से आये, काफी वक़्त बीत चुका था। और वो फिर अपने महल के, उसी एक कोने में जिंदगी गुज़ारने लगी। हाँ काबुल जाकर वो किसी दिन हँसी-मुस्कुराई भी थी। जिसे वो हक़ीकत नहीं, सिर्फ एक ख़्वाब ही समझ रही थी। आज खादिमा सुबह-सुबह ही उसे एक खबर सुना गई थी। जिसे सुनकर वो हैरतज़दा तो नहीं थी, लेकिन सहज भी नहीं थी।

“हुमायुँ ने अपने अब्बू बाबर के साथ हिन्दुस्तान पर हमला कर दिया।” इस एक खबर ने गुलनार के अंदर एक हलचल पैदा कर दी थी। उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। उसकी साँसें ऊपर-नीचे हो रही थी। लेकिन वो क्या कर सकती थी? हिन्दुस्तान के शहंशाह इब्राहिम लोदी उसकी शक्ल तक नहीं देखना चाहते। उसे शौहर का फर्ज तक तो याद नहीं रहा, तो उसके मशविरे क्या मानेगा? वो खुद भी इतने सालों से महल में कैद रही कि हिंन्दुस्तान की अवाम भी उसे भूल गई, नहीं पहचानती। वो क्या कर सकती है? कुछ भी नहीं।

फिर एक दिन खबर मिली……..इब्राहिम और हुमायुँ के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ गया है।

फिर एक दिन खबर…… हुमायुँ ने इब्राहिम को मार डाला।

और फिर….. हिन्दुस्तान हार गया।

और फिर एक दिन….. हुमायुँ ने महल में भी कब्जा कर लिया है।

और फिर एक दिन…….”शहजादे हुमायुँ ने आपके लिए खत भेजा है।” खादिमा ने गुलनार को एक खत पकड़ाते हुए कहा।

गुलनार – “मुझे नहीं पढ़ना कोई खत।”

दासी – “शहजादे हुमायुँ ने कहा है कि; अगर मैं इस खत का जवाब लेकर नहीं जाऊँगी, तो वो मुझे….”
गुलनार ने आगे के शब्द सुने बिना ही खत दासी के हाथों से छीन लिया। और पढ़ने लगी।

“………प्यारी गुलनार
तुम तक मेरी बहुत बहुत बहुत सी मुहब्बत पहुँचे। उम्मीद करता हूँ, इब्राहिम के न रहने से अब तुम बहुत खुश होगी। क्योंकि अब तुम किसी की क़ैद में नहीं बल्कि आज़ाद हो। अब तुम अपने हर शौक पूरे कर सकती हो। एक खुशमिजाज जिंदगी जी सकती हो। मैंने तुमसे कहा था, मैं इब्राहिम से तुम्हें छीन लुँगा। जिसका यही मतलब था कि मैं तुम्हारी किस्मत से उस काँटे को निकाल, हमेशा-हमेशा के लिए बाहर फेंक दुँगा। ये भी उम्मीद करता हूँ कि इब्राहिम की मौत से तुम्हें कोई ग़म ना हुआ होगा? क्योंकि; उसके रहने से भी तो, तुम्हें कोई खुशी नहीं थी। अब इब्राहिम रास्ते से हट चुका है। तुम अपने फैसलों के लिए आजाद हो। मैं भी हिन्दुस्तान का शहंशाह बन गया हूँ। तो क्यूँ न हम निकाह कर लें? मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि; तुम जैसे पहले मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान थी, ऐसे ही आगे भी रहोगी। मैं तुमसे तुम्हारा ये हक़ कभी नहीं छीन सकता। अगर तुम मुझसे निकाह कर लो…तो मैं ताउम्र तुम्हारा एहसानमंद रहूँगा। पूरे यकीन से कहता हूँ कि, मैं तुम्हें दुनिया-जहान की हर खुशी दुँगा। बस..तुम मुझ पर ऐतबार कर लो। मुझसे निकाह कर लो।”
         तुम्हारा दीवाना
                 ‘हुमायुँ’

“हुमायुँ;
हाँ, हुमायुँ ही। होगे तुम सारे जहान के लिए हिन्दुस्तानी सल्तनत के शहंशाह। लेकिन, मेरे लिये नहीं। और हाँ; अगर तुम भूल चुके हो तो, तुम्हें याद दिला दूँ कि, मैंने तुम्हें काबुल में ही कहा था कि, शहंशाह मेरे सपनों के शहजादे नहीं। और मुझे शहंशाहों की कोई ख्वाहिश नहीं। और मैं एक पठानी हूँ। और पठानियाँ अपनी जबान से कभी नहीं फिरती। तुम घबराओ मत, मैं आज ही ये महल छोड़कर चली जाऊँगी। उम्मीद है, मुझ पर कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं की जायेगी।”
         ‘गुलनार

गुलनार ने खत का जवाब लिखा और खत खादिमा को पकड़ा कर रवाना किया।

कुछ समय के पश्चात –

दासी – ” मल्लिका! शहजादे आलम ने फिर से आपके लिए एक खत भेजा है।”

गुलनार – ” मैं तो खुद ही यहाँ से जाने की तैयारी कर रही हूँ। कुछ लम्हों की भी मोहलत न देंगे क्या? तुम्हारे शहजादे आलम।” और गुलनार ने खादिमा को घूरते हुए; खत उसके हाथों से छीन लिया, और पढ़ने लगी।

“प्यारी गुलनार
मैं तुमसे मुहब्बत करता हूँ। और मैं तुम्हारे साथ, निकाह करना चाहता था। लेकिन अगर; तुम्हारी मर्जी नहीं तो, मैं तुम्हारे साथ कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं करूँगा। लेकिन; क्योंकि इस युद्ध के बाद से तो तुम्हारे अब्बूजान भी नहीं रहे, तुम्हारा कोई नहीं रहा तो, तुम्हें ये महल छोड़ने की जरूरत नहीं। ये महल तुम्हारा है, तुम ताउम्र इसमें रह सकती हो। मेरी तरफ से बेफिक्र रहो।”

                   ‘हुमायुँ’

गुलनार की आँखों से दो आँसू टपक पड़े।

गुलनार उस महल में; आजीवन एक कोने में पड़ी रही, किसी सामान की तरह। और फिर एक दिन चुपचाप; उसी कोने से चली गईं, जन्नत के सफ़र पर। ये थी एक बला की खूबसूरत मल्लिका-ए-हिन्दुस्तान की कहानी।

हमारे आसपास; ऐसी बहुत सी जिंदगियाँ होती हैं, जो अपने-आप में एक इतिहास समेटे होती हैं। किंतु, दुनिया (हम) उससे अनजान है।

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डॉली परिहार

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नाम - डॉली परिहार शहर - जमशेदपुर अभी कोई किताब प्रकाशित नहीं लेखन और गायन का शौक
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