डर गईं अमराइयां भी आम बौराए नहीं, ख़ूब सींचा बाग हमने फूल मुस्काए नहीं। यार को है प्यार केवल जंग से, हथियार से, मुहब्बत के रंग मेरे यार को भाए नहीं। मंज़िलों के वास्ते खुदगर्जियाँ हैं इस कदर , हमसफ़र को गिराने में दोस्त शर्माए नहीं । रोज सिमटी जा रही हैं उल्फतों की चादरें , हसरतों ने आज अपने पांव फैलाए नहीं। वह फकीरों की अदा में रहजनी करता रहा, अदाकारी की हकीकत हम समझ पाए नहीं। कुछ दीए उम्मीद के ‘प्रवीण’अब भी जल रहे, सामने तूफान के ये कभी घबराए नहीं।
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सूरज की आंखों में ढीठ बनकर देखते मुद्राओं की गर्मी पर बाजरे की रोटी सेकते हम चाह लेते तो दोनों पलड़े बराबर कर तुम्हारी अनंत चाहतों से अपने सारे हक तौलते सिले हुए होंठ और कटी ज़ुबान से बोलते हम चाह लेते तो पोखरे के गंदले पानी में आसमानी सितारे घोलते!
यूं तो नमक एक खाद्य पदार्थ है या खाद्य पदार्थों को स्वाद बख्शने वाली चीज है, लेकिन इसकी महत्ता सर्वविदित है । नमक का महत्व इंसान की जिंदगी में इतना ज्यादा है कि इसे लेकर ‘‘नमकहलाल’’, ‘‘नमकहराम’’ और ‘‘नमकख्वार’’ जैसी उपमाएं बनीं । महात्मा गांधी जी को भी ‘‘गांधी’’, उनके नमक कानून तोड़ने को लेकर किए गये ‘‘दांडी मार्च’’ ने बनाया। बेशक, इस तीन अक्षरों वाले नाम की चीज के बिना जिन्दगी बेस्वाद हो जाती है। कालांतर में नमक पर अधिकार के लिए युद्ध भी हुए । राजा हो या रंक, अमीर हो या गरीब, उच्च वर्ग हो या दलित, शासक हो या शासित, हर वर्ग के भोजन का यह अभिन्न अंग होता है। नमक बिना कोई भी व्यंजन स्वादिष्ट नहीं बनता। इसलिए खाद्य सामग्रियों और अनाज की व्यवस्था के साथ साथ नमक की व्यवस्था करना भी आवश्यक होता है। हमारे आदिवासी पुरखों के लिए नमक की व्यवस्था करना एक […]
सभ्यता के दूसरे छोर पर अपने पैरों से एक गोरा दबाए बैठा है एक काले की गर्दन और काला चिल्ला रहा है- ‘आई कांट ब्रीद-आई कांट ब्रीद’ सभ्यता के इस छोर पर जन्मना स्वघोषित श्रेष्ठ कुछ इस तरह से बुने बैठे हैं मायाजाल जिसमें फंसा है अधिकतर का गला बोला भी नहीं जाता उनसे बोलें तो सुना नहीं जाते किसी से बस गूंज रहा है गान- ‘अहम् ब्रह्मास्मि-अहं ब्रह्मास्मि’ सभ्यता के ऊपरी सिरे पर पूँजीपति करता है अट्टहास नीचे सिर्फ़ गूंज रहा है मजदूरों का मौन पदचाप पिसता है उनका शरीर निचुड़ती है आत्मा उससे टपकता है अमृत पर नीचे को नहीं सीधे ऊपर को पहुँचता है पूँजीपति के कंठ में पूँजीपति डकारता है और दुहराता है- ‘कर्मफल-कर्मफल’ सभ्यता के भीतरी हिस्सों में पुरुष सिर्फ पुरुष हैं पर स्त्री है ‘सेकेंड सेक्स’ और बाकी हैं ‘थर्ड जेंडर’ यह क्रम ही इस भीतर का बाहर भी है यहाँ एक चौथा भी […]
जमाने की प्रेम – पाठशाला जब गुलाबों के बगीचे में लगा करती थी, मेरी कविता तब बूढ़ी नदी पर बने टूटे हुए पुल पर बैठ झरबेरी के फल खाया करती थी, और अब तुम्हारे घिसे – पुराने प्रेम की महापुरानी लालटेन इसकी नई गुलेल के निशाने पर है!
मैं एक पेड़ होना चाहता हूँ जिसके नीचे मेरी बेटियाँ खेलें घर-घर जिसकी डाल पर वे और सावन दोनों झूलें झूम झूमकर मैं चिड़िया होना चाहता हूँ कि ला सकूँ दूर देश से दाने और डाल सकूँ उनके मुँह में बड़े प्रेम से बड़े जतन से मैं अपनी बेटियों के लिये बनना चाहता हूँ जादूगर कि उन्हें दिखा सकूँ दुनियादारी के ऐसे ऐसे करतब जिससे वे आनंदित ही न हों बल्कि सीख भी सकें मैं अपनी बेटियों का बनना चाहता हूँ खिलौना जिससे उनके सीने से लग सो सकूँ रात भर और महसूस कर सकूँ उनका मासूम स्पर्श मैं एक किताब होना चाहता हूँ जिसमें पढ़ सकें मेरी लाडलियां जिन्दगी के फलसफे कुल मिलाकर मैं होना चाहता हूँ अपनी बेटियों का अच्छा पापा कि जिन्दगी जीते हुए वे महसूस कर पाएँ हमेशा अपने साथ मुझे ।
शाम के सात बज रहे थे। पटना के ईकलॉजिकल पार्क में अविनाश अपनी गर्लफ़्रेंड अनामिका की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था और अनामिका उसके घुंघराले बालों में अपनी उँगलियाँ फेर रही थी। तभी अविनाश के मोबाइल फोन का रिंगटोन बजा। फोन पर बात करने के बाद अविनाश ने अनामिका से कहा – “चलो अब चलते हैं।” “क्या हुआ? किसका फोन था?” अविनाश को थोड़ा परेशान देखकर अनामिका ने पूछा। “पापा का फोन था। कह रहे थे कि दादी की तबीयत बहुत ख़राब है। घर आ जाओ।” अविनाश ने कहा। अनामिका गुप्ता और अविनाश मिश्रा पटना के आर्जव बिजनेस कॉलेज में एमबीए के स्टूडेंट थे। दोनों की पहली मुलाकात छह महीने पहले कॉलेज में ही हुई थी। दोनों के रिश्ते दिल से भी जुड़े थे और जिस्म से भी।अविनाश सुपौल जिले के रामपुर गाँव का रहने वाला था और अनामिका सहरसा जिले के बरियाही गाँव की रहने वाली थी। […]
चित्रकार की सी सुरुचि से, जो गुड़हल के दो फूल मेरे स्याह बालों में टांक देता है, प्रेम की सुबह में ये कोमल से सुंदर मनमोहक भाव जीवन की दोपहरी में जलते तपते सूरज से किस तरह लड़ते हैं.. आश्चर्य !! गुड़हल का शिरीष हो जाना, कलाकार का सिपाही हो जाना, प्रेमी का पिता हो जाना.
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ इसका सबूत इससे बढ़कर क्या होगा कि अब फूलों को बस निहारता हूँ तोड़ता नहीं मुझे बगिया अब तुम्हारे ही बालों का जूड़ा लगती है मैं प्राची में उगते सूर्य को देख भर जाता हूँ असीम ऊर्जा से और पश्चिम में तुम्हारे घर की ओर अस्त होने की कामना से चल पड़ता हूँ दिन की सड़क पर मुझे दिशाएं इतनी खुली कभी नहीं लगीं कि अब से पहले मतवाला बन इतनी दूर-दूर तक नाच आता आज ये मेरे मन की चौहद्दी बन गईं हैं मैं देख रहा हूँ फूट रहे हर एक अंकुर को और रीझ रहा हूँ इनमें मुझे प्रेम दिख रहा है उगते, बढ़ते और महकते हुए लगता है मेरे प्रेम की हरियाली ढाँप लेगी धरती का सारा खुरदुरापन सुनो, तुम जो नहीं हो अभी मेरे पास तो भी मैं अपनी उदासी जाहिर नहीं कर रहा मुझे पता है प्रेम में जुदाई बरसों […]
अफ्रीकन एशियन रूरल डेवलपमेंट ऑर्गेनाईजेशन नई दिल्ली से जैसे ही मेरा नामांकन पाकिस्तान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के लिए हुआ, सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ। अफ्रीकन एशियन रूरल डेवलपमेंट ऑर्गेनाईजेशन एक गैर राजनीतिक संगठन है, जो अफ्रीका तथा एशिया के 30 सदस्य देशों में कार्य करता है। जैसा कि पाकिस्तान के बारे आम हिन्दुस्तानियों की धारणा है, उससे मैं भी अछूता नहीं हूँ । एक बार तो मैंने सोचा कि सेमिनार में भाग लेने से मना कर दूँ, पर मेरे पुत्र के यह कहने पर कि पापा आपको अमेरिका का वीजा तो आसानी से प्राप्त हो जाएगा परंतु पाकिस्तान का वीजा इतनी आसानी से मिलेगा नहीं, अस्तु पाकिस्तान जाना ही चाहिए। पर मुझे अपने परिजनों और दोस्तों के साथ अपनी सुरक्षा की भी चिंता थी। हमारे रक्षामंत्री ने भी बयान दिया था कि पाकिस्तान जाना नर्क जाने के बराबर है। कश्मीर के हालात बद से बदतर हो रहे थे और […]
छोटानागपुर क्षेत्र की अधिकांश जनजातियाँ ईसाई धर्म की ओर उन्मुख हो चुकी हैं। जनजाति युवाओं को बतौर पुरोहिताई कार्य के लिए सेमिनरी यानी गुरुकुल में प्रशिक्षण की व्यवस्था है और इन केंद्रों में अध्ययन का बड़ा आकर्षण है। ईसाई पादरी बनना एक उपलब्धि के साथ सम्मान की बात है। इन्हीं पादरी बनने के प्रशिक्षण केन्द्रों में गैर आदिवासी ईसाई शिष्यों व धर्म गुरुओं के द्वारा आदिवासी गुरुकुल शिष्यों के साथ भेदभाव और इसका विरोध करने पर केंद्र के पदाधिकारियों द्वारा लेखक के विरुद्ध अन्यायपूर्ण कार्रवाई करते हुए इस केंद्र से निष्कासन की मार्मिक दास्तान और उनकी व्यथा का समावेश है। वर्ष 1965 के जून महीने की वह अलसाई हुई शाम थी। रातू रोड बस स्टैण्ड रांची पर चौधरी बस सर्विस एक झटके के साथ रुकी। बस से बीस-पच्चीस जशपुरिया युवक उतरे। वे अपोस्तोलिक विद्यार्थी थे तथा लोयोला स्कूल कुनकुरी की मैट्रिक परीक्षा पास कर संत जेवियर्स कॉलेज रांची में प्रथम […]
आवाज कार या टैक्सी की है। अभी यहाँ से दूर है, लेकिन इसके पहुँचने का पता पहले से चल गया है, क्योंकि पहाड़ियों की गूँज ने इस आवाज को फुटबाल की छोटी-छोटी उछालों में आगे फेंका है। कार या टैक्सी होटल की तरफ ही आई है, क्योंकि सड़क इस होटल पर आ कर खत्म हो जाती है – द डेड एंड। इस बीत गए मौसम में क्या कोई ठहरने आ रहा है? इस बार का सीजन तो बिलकुल बर्बाद रहा। गर्मियों का मौसम शुरू देर से हुआ और खत्म जल्दी हो गया। पहाड़ों के होटलों, दुकानदारों का सीजन तो सिर्फ चार महीने लगता है। इस बार वह भी नहीं लगा। मई तक तो मैदानों में बारिश होती रही, कोई यहाँ क्यों कर आएगा? इस बार की अनहोनी खबर यह भी है कि मई में यहाँ बरफ भी पड़ी। जून में लोग आना शुरू हुए तो दो हफ्ते बाद यहाँ बारिशें […]
कोरोया फूल छोटानागपुर की वादियों में बहुतायत रूप में पाया जाता है, यह एक जंगली फूल है, और यह छोटानागपुर वासियों के लोक गीतों में भी रच बस गया है। कहानी, एक आदिवासी अधिकारी के गैर आदिवासी कन्या से विवाह और उनसे उत्पन्न समस्याओं और सांस्कृतिक जटिलताओं का चित्रण प्रस्तुत करती है । मैं अपने दफ्तर में बैठा कुछ फाइलें निपटाने में लगा था। चपरासी ने अंदर आकर मेरे हाथ में एक चिट थमाई और मेरे आदेश का इंतजार करने लगा। मैंने चिट पर लिखे नाम को पढ़ा, नाम जाना पहचाना था लेकिन मैं सोच में पड़ गया कि आगंतुक को चिट भिजवाने की क्या जरूरत थी, वह सीधे अंदर आ सकते थे, आखिर वे मेरे ही समुदाय के, समकक्ष अधिकारी और विभागीय आदमी थे। मैंने चपरासी को उन्हें अंदर भेजने को कहा, परदा हटा और चिट वाले शख्स अंदर आए। उन्हें देख मैं अवाक रह गया, उनकी हालत देख […]
स्मृति की धुँधली और गम्भीर छाया में आज वह छोटी-सी घटना उतनी प्रखर और उत्तेजित नहीं प्रतीत होती। आज जब इस प्रकाश ह्रास और अच्छाई के संसार से भागकर उस कुरूप अन्धकार में, उस उन्माद, उस उफान के साथ नयन खोलना चाहता हूँ, तब दम घुटने लगता है। आज का अर्थ है – मेरी सफलता, मेरा साहस और असंख्य स्त्री-पुरुषों की जो मेरे साथ जीवन की रेस में दौड़े हैं – विफलता और कायरता। कम-से-कम होशहवास में अपना विश्लेषण करके मैं इसी ताव को पहुँचता हूँ। यह सत्य है या नहीं, इसकी जाँच करना अब मेरी परिधि से बाहर है। समाज मेरा आदर करता है कि मैंने निःसंकोच उसके बन्धनों और तुच्छताओं के सम्मुख सिर झुकाया है; पर एक बार, हाँ अपने उन्नति के उच्च शिखर पर बैठकर कहते हुए हृदय काँपता है। मेरी आत्मा समाज के विरोध में तड़प उठी थी पर अब वह केवल कहानी है। बीस वर्ष […]
जल्दी से मालदार हो जाने की हवस किसे नहीं होती? उन दिनों जब लॉटरी के टिकट आये, तो मेरे दोस्त विक्रम के पिता, चचा, अम्मा और भाई, सभी ने एक-एक टिकट खरीद लिया। कौन जाने, किसकी तकदीर जोर करे? किसी के नाम आये, रुपया रहेगा तो घर में ही। मगर विक्रम को सब्र न हुआ। औरों के नाम रुपये आयेंगे, फिर उसे कौन पूछता है? बहुत होगा, दस-पाँच हजार उसे दे देंगे। इतने रुपयों में उसका क्या होगा? उसकी जिन्दगी में बड़े-बड़े मंसूबे थे। पहले तो उसे सम्पूर्ण जगत की यात्रा करनी थी, एक-एक कोने की। पीरू और ब्राजील और टिम्बकटू और होनोलूलू, ये सब उसके प्रोग्राम में थे। वह आँधी की तरह महीने-दो-महीने उड़कर लौट आनेवालों में न था। वह एक-एक स्थान में कई-कई दिन ठहरकर वहाँ के रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि का अध्ययन करना और संसार-यात्रा का एक वृहद् ग्रंथ लिखना चाहता था। फिर उसे एक बहुत बड़ा पुस्तकालय […]
मैंने ये कहानी अपनी हिंदी की क्लास बुक मैं पढ़ी थी अपने बचपन मैं पर किस क्लास मैं वो याद…