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 छोटानागपुर क्षेत्र की अधिकांश जनजातियाँ ईसाई धर्म की ओर उन्मुख हो चुकी हैं। जनजाति युवाओं को बतौर पुरोहिताई कार्य के लिए सेमिनरी यानी गुरुकुल में प्रशिक्षण की व्यवस्था है और इन केंद्रों में अध्ययन का बड़ा आकर्षण है। ईसाई पादरी बनना एक उपलब्धि के साथ सम्मान की बात है। इन्हीं पादरी बनने के प्रशिक्षण केन्द्रों में गैर आदिवासी ईसाई शिष्यों व धर्म गुरुओं के द्वारा आदिवासी गुरुकुल शिष्यों के साथ भेदभाव और इसका विरोध करने पर केंद्र के  पदाधिकारियों द्वारा लेखक के विरुद्ध अन्यायपूर्ण कार्रवाई करते हुए इस केंद्र से निष्कासन की मार्मिक दास्तान और उनकी व्यथा का समावेश है।

वर्ष 1965 के जून महीने की वह अलसाई हुई शाम थी। रातू रोड बस स्टैण्ड रांची पर चौधरी बस सर्विस एक झटके के साथ रुकी। बस से बीस-पच्चीस जशपुरिया युवक उतरे। वे अपोस्तोलिक विद्यार्थी थे तथा लोयोला स्कूल कुनकुरी की मैट्रिक परीक्षा पास कर संत जेवियर्स कॉलेज रांची में प्रथम वर्ष में अध्ययन करने रांची आए थे। उस समय जशपुर को रांची से जोड़ने वाली यही चौधरी गाड़ी एकमात्र बस सर्विस थी जो जशपुर-रांची के बीच लाइफ-लाइन का काम करती थी। आज जशपुर रांची जाने-आने के कई साधन हो गए हैं पर आज भी चौधरी बस सर्विस की सेवाएँ वर्षों से बदस्तूर चलती आ रही हैं।

मैं उन बीस-पच्चीस जशपुरिया जवानों की बात कर रहा था। उन्होंने अपने सामान समेटे और दो-दो करके रिक्शे पर बैठकर अपोस्तोलिक स्कूल चले। दल के कुछ साथी पहले भी रांची आ चुके थे, जबकि कुछ साथी पहली बार रांची आ रहे थे। मैं भी उनमें से एक था। मेरे साथ जो साथी बैठा था वह पहले भी रांची आ चुका था। वह मुझे जगह का नाम आदि बताता जा रहा था। अपर बाजार, फिरायालाल चौक (वर्तमान में अलबर्ट एक्का चौक) होते हुए आगे बढ़े। मेन रोड पर आगे बढ़ते हुए कुछ ही दूर पर पुरुलिया रोड पर बाईं ओर मुड़ते ही दायीं ओर संत जेवियर्स कालेज की बिल्डिंग दिखाई दी। हम विस्फारित नेत्रों से संत जेवियर्स कॉलेज की भव्यता देखते गुजर रहे थे। उसके बाद कैथोलिक मिशन के संस्थानों का सिलसिला शुरू हुआ और मनरेसा हाउस मेन गेट से होते हुए दायीं ओर दाखिल हुए और हम अपोस्तोलिक स्कूल पहुंच गए। शहरी चिल्ल्-पों को पार करते हुए एकाएक शांत सौम्य वातावरण में प्रवेश करते ही एक अपूर्व शांति सुकून की अनुभूति हुई। सामने डायरेक्टर फादर विलियम डेलपुट खड़े थे।

अपोस्तोलिक स्कूल के कम्पाउण्ड में एक के बाद एक दर्जन से भी अधिक रिक्शों का आना देख फादर डायरेक्टर ने घड़ी देखी और कहा-‘‘लगता है जशपुर वाले पहुंच गए।” उन्होंने मुस्कराते हुए हमारा स्वागत किया और हमें जगह दिखाकर संक्षेप में सब दिखा और समझा दिया। हमारे तैयार हो जाने के बाद वे पुनः हमारे पास आए और पूछा-‘‘तुममें से अथनास किसपोट्टा कौन है?” अथनास नाम सुनकर मैं कुछ चौंक गया और बोला-‘‘जी, मेरा नाम अथनास है।” एक क्षण उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे देखा और कहा-‘‘जरा मेरे ऑफिस में आना।” मैं उनके पीछे-पीछे चला। मन में सैकड़ों सवाल कौंध रहे थे कि क्या बात है जो फादर ने पहुंचते ही मुझे अपने ऑफिस में बुलाया। उन्होंने एक खाली कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा-‘‘बैठो अथनास!‘‘ मैं सकुचाते हुए बैठ गया। दिल जोरों से धड़क रहा था। उन्होंने इधर-उधर की बातों के बाद कहा-‘‘अथनास! नोटिस बोर्ड देखा कि नहीं?”

‘‘जी नहीं फादर कोई खास बात है क्या?”

‘‘हां तुम्हें प्रथम छः माह के लिए मॉनीटर चुना गया है?” उन्होंने मुस्कराते हुए कहा।

‘‘पर फादर रांची जैसे शहर में जहां मैं पहली बार आया हूँ, मुझ पर इतना बड़ा बोझ क्यों डाला जा रहा है? मैं तो हाई स्कूल में अपने क्लास का भी मॉनीटर कभी नहीं रहा।‘‘  मैंने कातर स्वर में कहा।

‘‘तुम चिन्ता मत करो, मैं तुम्हें सब कुछ समझा दूँगा। मुझे पूरा विश्वास है तुम पूरी योग्यता से अपना दायित्व संभाल लोगे।‘‘ उन्होंने मुझे उत्साहित करते हुए कहा, मुझे घड़ी पहनाई और उस दिन के मेरे अन्य काम उन्होंने समझा दिए।

मैं किंचित जोश के साथ फादर डायरेक्टर के ऑफिस से निकला। मैंने यह नई चुनौती एक नए जोश के साथ स्वीकार कर ली थी। मेरे साथी मेरा इंतजार कर रहे थे। मेरे पहुंचते ही पूछ बैठे- ‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘कोई विशेष बात नहीं? ‘‘

‘‘कुछ तो बात होगी? ‘‘

‘‘फादर ने यही बात बताने के लिए बुलाया था कि इस सत्र के अगले छः माह तक के लिए मुझे मॉनीटर रखा गया है।” मैंने स्पष्ट करते हुए कहा।

‘‘वाह गुरु, आते साथ मैदान मारना शुरू कर दिया ‘‘-एक ने कटाक्ष किया।

शाम होते-होते प्रायः सभी विद्यार्थी स्कूल पहुंच चुके थे। फादर डायरेक्टर ने मेरा परिचय कराया। कुछ साथियों के व्यक्तित्व के सामने मैं कुछ भी न था, परंतु उन्होंने मुझे स्नेह दिया भरपूर सहयोग दिया और मेरे अच्छे दोस्त भी बन गए जो आगे चलकर दिग्गज हस्ती बन गए जैसे स्व. फादर डाक्टर बेनी अल्फोंस एक्का ये. स. ग्पै के पूर्व डाइरेक्टर तथा सिंहभूमि विश्वविद्यालय के उप कुलपति, डा. विक्टर तिग्गा, सिद्धो कान्हू विश्वविद्यालय के उप कुलपति, डा. फादर डेविड बड़ा प्रोफेसर संत अल्बर्टस कालेज रांची, डा. श्री फ्रैंकलिन बाखला प्रोफेसर विभागाध्यक्ष इतिहास प्रभाग संत जेवियर्स कालेज रांची आदि।

मॉनीटर बनाया जाना मेरे लिए कई मायने में बड़ा फायदेमंद रहा। डाइरेक्टर फादर डेलपुट के मार्गदर्शन में अपने को पहचानने का मौका मिला। थोड़े दिनों में अपनी पहचान बन गई। रांची को खासकर रांची के मिशनरी इलाके को जानने समझने के कई अवसर मिले।

रांची !!! संपूर्ण छोटानागपुर के ईसाई जगत का केन्द्र, रांची। मिशनरी क्रिया-कलापों के केन्द्र रांची स्थित मनरेसा हाउस वाले क्षेत्र में हमारे पुरखे, कैथोलिक धर्मज्ञान की लालसा लिए दल बांधकर आते थे; ना जाने कितने दिनों की पदयात्रा के बाद नदी, नाले, जंगल, पहाड़ पार कर वे रांची पहुंचते थे और आज कुछ ही घंटों की बस यात्रा के बाद हम रांची पहुंच गए। जशपुर की दूरस्थ पल्लियों में इस केन्द्र की धड़कन को महसूस किया जाता था। कोई भी नया पुरोहित या ब्रदर अथवा अयाजक भी कहीं पहुंच गया तो गर्व से उनका परिचय दिया जाता-‘‘रांची से आए हैं।‘‘ कोई धार्मिक वस्तु जैसे मूर्ति, प्रार्थना पुस्तक, रोजरी आदि को बताया जाता ‘‘रांची से मंगाए हैं।‘‘ कोई भी काम से जशपुर से कोई पल्ली पुरोहित रांची आए तो पल्ली का मुंशी या प्रचारक गर्व से कहता-‘‘फादर रांची गए हैं।‘‘ तब तक जिज्ञासा सी बनती थी न जाने वह रांची शहर कैसा होगा। तब भी यह शिक्षा और धर्म का केन्द्र था और आज भी है। तब गिने चुने लोग उच्च शिक्षा हेतु रांची भेजे जाते थे और धर्म समाज के प्रशिक्षु तो अध्ययन हेतु रांची ही भेजे जाते थे। अध्यात्म, ज्ञान दर्शन और अन्य क्षेत्रों के ज्ञानार्जन का अनूठा केन्द्र।

एक साल के रांची अपोस्तोलिक स्कूली जीवन काल और इसी दरम्यान संत जेवियर्स कालेज के प्रथम वर्ष के सत्र काल में मैंने रांची के मिशनरी इलाके को अलग अंदाज में देखा। एक ओर गुदड़ी बाजार का शोर-गुल वाला इलाका दूसरी ओर पुरूलिया रोड की रेल-पेल और चिल्ल-पों। मेन रोड से पुरूलिया रोड की ओर आगे बढ़े, तो आपको दोनों ओर मिशनरियों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं, प्रशिक्षण केन्द्रों, प्रार्थनालयों के विशाल एवं भव्य भवन मिशनरियों के त्याग, तपस्या व सेवा का मूक भाषा में बखान करते मिलेंगे। दायीं ओर संत जेवियर्स कॉलेज मेन गेट से प्रवेश कर दाएं-बाएं नजर दौड़ाते हुए आगे बढ़ें और संत जोन्स स्कूल हाल और कॉलेज प्रोफेसर निवास के बीच बायीं ओर मुड़ते हुए आगे बढ़ें तो बाईं ओर संत जोंस स्कूल, मनरेसा हाउस, दायीं ओर विशाल बागान और एक छोटा तालाब, आगे बाईं ओर बढ़ें तो मनरेसा हाउस का आंगन और कथेड्रल; कथेड्रल और अपोस्तोलिक स्कूल, तथा पुराना डी.एस.एस. के बीच एक छोटा रास्ता आपको चोर फाटक तक ले जाएगा जिसे पार करने और कर्बला रोड पार करने के बाद विशाल लौह द्वार पार करने पर आपको विशाल दरख्तों और बांस के झूमते झुरमुटों के बीच संत अल्बर्टस कॉलेज का विशाल क्षेत्र, विशाल भवन; आर्क विशप भवन, लोयोला होस्टल एवं फ्रांसिस्कन फ्रायरी तक का पवित्र एवं सौम्य वातावरण वाला क्षेत्र आपको एक देवलोक का ही आभास दिलाएगा। इसके अतिरिक्त काथलिक प्रेस एवं संत अलोईस हाई स्कूल भी आप देखेंगे।

यह संपूर्ण इलाका मिशनरियों की तपोभूमि एवं संपूर्ण छोटानागपुर का हृदय स्थल रहा है। यह मिशनरियों एवं मिशन की ऊर्जा का अजस्त्र स्रोत रहा है और अब भी बना है। इस पूरे इलाके में स्थित प्रार्थनालयों में सुबह शाम प्रातः वंदना और संध्या भक्ति लहरी गूंजती रहती है जिससे वह संपूर्ण इलाका देवलोक से कम नहीं लगता है। संत जेवियर्स कॉलेज से फ्रांसिस्कन फ्रायरी तक के रास्ते में देशी-विदेशी मिशनरी रोजरी प्रार्थना करते, अहिनका पढ़ते अथवा अन्य कार्यों से आते जाते दिखाई पड़ते थे जिससे देवलोक में देवदूतों (देवपुरूषों) के आने जाने, चहलकदमी करने का अहसास होता था।

पर्व त्योहारों के अवसर पर संत मरीया कथेड्रल, समस्त संस्थानों के प्रशिक्षुओं, भ्राताओं एवं भगनियों, पुरोहितों, धर्मसमाजियों से खचाखच भरा होता था। आर्गन पर जब भक्तिमय संगीत बजता था और गायक दल के साथ सब एक स्वर से मुक्त कंठ से गाते थे तब लगता था जैसे देवदूतों के दल ईश महिमा गान हेतु देवलोक से नीचे उतर आए हों। वेदी स्थल (गर्भगृह) में देशी-विदेशी मिशनरियों का समूह पूजा परिधानों में लिपटा भक्ति भाव की वृद्धि करता था। श्वेत परिधान पहने धर्मसमाजियों, याजकों की उपस्थिति वातावरण को भक्तिमय एवं गरिमामय बनाती थी। उक्त नजारे सन् 70 के मध्य देखने को मिलते थे। अब तो जमाना बदल गया है। देवदूतों का हुलिया ही बदल गया है। अब तो पतलून, कमीज, टी-शर्ट, जीन्स, टाई-वाई सूट-बूट का जमाना है। अब तो आम और खास की पहचान ही जटिल हो गई है। श्वेत पुरोहित परिधान विशेष अवसरों पर थोड़े ही समय के लिए उपयोग में लाए जाते हैं।

हां! तो मैं डी.एस.एस. के पास के चोर फाटक के आगे कर्बला रोड के पार आपको ले आया था। कर्बला रोड के पास संत अल्बर्टस कॉलेज (सेमनरी) के विशाल लौह गेट से प्रवेश करते ही आपको सेमनरी का विशाल कम्पाउण्ड मिलेगा। यही वह केन्द्र है जहां देश के विभिन्न धर्मप्रांतों से पुरोहिती के उम्मीदवार दर्शन शास्त्र एवं पुरोहिती के लिए उपयोगी ज्ञानोपार्जन करते हैं। सेमनरी प्रबंधन ने भावी मिशनरियों के प्रशिक्षण की पूरी व्यवस्था की है ताकि मिशन को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से सुशिक्षित एवं स्वस्थ मिशनरी प्राप्त हो सकें।

सामान्य दिनों में लेक्चर हाल में विद्वान प्रोफेसरों द्वारा ईश शास्त्र एवं दर्शन शास्त्र के जटिल बिन्दुओं की व्याख्या, कभी बाहर से बुलाए गए विद्वान विचारकों का व्याख्यान, कभी ग्रेगोरियन संगीत, कहीं शास्त्रीय संगीत अभ्यास, कहीं तबले की थाप, कहीं नाटकों का रिहर्सल, खेल के मैदानों में ब्रदरों के दौड़ने, उछलने कूदने की आवाज, शाम सबेरे भक्तिमय स्वर लहरी का गूंजना। उज्जवल, धवल, श्वेत, सूटान (पुरोहिती पोशाक) में ईश शास्त्र विभाग के ब्रदरों का, प्रोफेसरों का आना-जाना, सीढ़ियां चढ़ना-उतरना याकूब के स्वप्न में देवदूतों के सीढ़ियां चढ़ने-उतरने का अहसास कराता था। जैसा कि मैंने पहले ही बताया है, संत जेवियर्स कॉलेज से संत अल्बर्टस कॉलेज एवं फ्रांसिस्कन फ्रायरी तक का शांत, सौम्य एवं पावन वातावरण देवलोक का एहसास कराता था। रांची शहर के शोर गुल, भीड़-भड़ाका एवं गहमा-गहमी के मध्य यह शांत इलाका देवलोक से कम नहीं था और मेरे लिए वहां के उम्मीदवार देवपुरूष ही लगते थे।

सत्र 65-66 के अवसान के बाद मैंने इसी संत अल्बर्टस कॉलेज में प्रवेश करने का विकल्प लिया। सेमनरी में प्रवेश के दिन ही मुझे अवगत कराया गया था कि मुझे दर्शन शास्त्र प्रथम वर्ष के उम्मीद्वारों का मॉनीटर नियुक्त किया गया है। अपोस्तोलिक स्कूल की बात और थी क्योंकि वहां शहरी साथी तो थे पर वे सब मूलतः आदिवासी थे। उनका मॉनीटर बनना उतना कठिन नहीं था, जितना संत अल्बर्टस कॉलेज के प्रथम वर्ष का। यहां देश के कोने-कोने से उम्मीदवार थे। कोई केरल से, कोई मंगलोर से, तमिलनाडू, दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल, गोवा, बिहार, म.प्र. आदि विभिन्न प्रांतों से थे। यहां आते साथ संवाद का माध्यम बदल गया अर्थात् पूर्ण अंग्रेजी। प्रारंभ में कुछ कठिनाई अवश्य हुई क्योंकि अपनी पृष्ठभूमि हिन्दी आधारित थी। प्रारंभ में ऐसा लगता था कि सिर्फ अपने ही भाषा संबंधी असुविधा से पीड़ित हैं पर यह पता चला कि अधिकांश उम्मीद्वारों की स्थिति वही थी जो हमारी थी। अपने आदिवासी भाईयों की तुलना में अन्य ब्रदर ऐसे प्रदर्शित जरूर करते थे कि वे अंग्रेजीदां हैं परन्तु थोड़े दिनों में ही सबकी पोल ज्ञात हो गई। मुट्ठी भर उम्मीदवार ही ऐसे थे जिनकी अंग्रेजी औरों की तुलना में ठीक थी। इसका पता कुछ इस प्रकार चला। अंग्रेजी के प्रोफेसर फादर रोण्डो ये.स. एक विद्वान और बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उनके गले (ध्वनि नलिका) में कुछ समस्या होने से वे अधिक तेज नहीं बोल पाते थे पर कुछ जोर लगाकर इतना बोल पाते थे कि कक्षा में उपस्थित सभी उन्हें सुन सकते थे। बताया यह गया कि उन्हें कैंसर की शिकायत थी लेकिन उनके पढ़ाने का अंदाज अनोखा था। हम उनके क्लास में उनके पढ़ाने का भरपूर आनंद लेते थे। उन्होंने पूरे क्लास की परीक्षा ली और केवल एक सवाल दिया अर्थात् ‘‘अपने छोटे भाई को पत्र लिखो।‘‘

सवाल देखकर सभी हंसने लगे कि यह भी कोई परीक्षा का सवाल है। बाकी सब धड़ाधड़ लिखने लगे और देखते ही देखते उन्होंने एकाध पेज तो रंग डाले। मैं असमंजस में था कि मैं लिखूं तो क्या लिंखू पर लिखना तो था। मैंने अपना जवाब पेपर छुपाकर लगभग 10-15 पंक्तियों वाला एक छोटा सा पत्र लिखा और सकुचाते हुए जमा जवाब पेपर के बीच में रख दिया ताकि दूसरे मेरे पत्र की लंबाई-चौड़ाई देख मेरी हंसी न उड़ाएं। दूसरे तो अपने लंबे-चौड़े लिखे पत्र को गर्व से दिखाने में भी नहीं चूके। प्रोफेसर ने कहा कि रिजल्ट व्यालू (रात्रि भोजन) के बाद हॉल में घोषित किया जायेगा। परीक्षा के बाद औरों की बात सुनने लायक थी-‘‘मैंने तो ऐसा लिखा-वैसा लिखा, तीन पेज लिखा, मेरा पत्र पढ़कर प्रोफेसर को समझ में आ जाएगा कि हम कितना अंग्रेजी जानते हैं आदि-आदि।‘‘ वे सब आत्म प्रशंसा में लीन थे और अपन इस चिन्ता में थे कि कहीं हमारी हंसी न उड़ाई जाए। इस प्रकार पूरा दिन तनाव में बीत गया।

शाम को व्यालू के बाद सभी ब्रदर हाल में एकत्रित हुए एक छोटा सा प्रोग्राम था और उस कार्यक्रम के बीच में ही फादर रोण्डो ने परीक्षा का नतीजा सुनाया। उन्होंने जब मेरा नाम लिया तब मुझे भी ताज्जुब हुआ और उन्होंने मेरे पत्र को पढ़कर भी सुनाया। उन्होंने यह भी कहा कि कई ब्रदरों ने लंबा खत जरूर लिखा परंतु उनमें व्याकरण की कई त्रुटियां थीं साथ ही भावनात्मक भाव का अभाव भी था। अपने लोगों को इससे अच्छा तो लगा परंतु अन्यों के बीच ईर्ष्या की पतली लकीर भी खिंच गई। मुझे संत जेवियर्स कॉलेज के प्रथम वर्ष के प्रारंभिक दिनों की घटना याद आई। वहां भी अंग्रेजी ज्ञान की परीक्षा ली गई। देहात के हाई स्कूलों से आए हम लोगों के अंग्रेजी ज्ञान की परख आवश्यक थी। हमारे साथ डुराण्डा केम्ब्रिज स्कूल के छात्र भी थे। मैं इतना बता दूं कि नतीजे की सूची में केम्ब्रिज वाले विद्यार्थियों के नाम हमारे नाम से बहुत पीछे थे। वे अंग्रेजी बोलते तो ऐसे फर्राटेदार थे कि अंग्रेजी के प्रोफेसर भी क्या अंग्रेजी बोलें। मैंने हाईस्कूल के अंग्रेजी शिक्षकों को याद किया जिनकी बदौलत हम सिर ऊंचा उठा सके थे। मेरा मंतव्य अपने को अंग्रेजी पंडित या काबिल साबित करने का हरगिज नहीं हैं। मैं सिर्फ हकीकत बयान कर रहा हूं।

वह प्रथम वर्ष सेमनरी का जुबिली वर्ष भी था। पढ़ाई के साथ साथ इसकी तैयारी भी चल रही थी। हम बेफिक्र थे कि प्रथम वर्ष के छात्र होने से हमें इसमें बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी परंतु ऐसा नहीं था। एक दिन फादर रेक्टर पी. मथीजिस ने मुझे अपने कक्ष में बुलाया। मैं डरते-सकुचाते उनके सामने पहुंचा। उन्होंने कहा-‘‘अथनास जी! (वे हमेशा मुझे यही कहते थे) तुम्हें मालूम है कि जुबिली मनाई जानी है और कार्यक्रम में एक लोक-नृत्य का भी समावेश है। इस लोक नृत्य की तैयारी का जिम्मा मैं तुम्हें सौंप रहा हूं, ठीक है ?

मैंने कहा-‘‘फादर जी! हमसे भी सीनियर लोग और भी पड़े हैं उनसे कहना उचित होता।‘‘-उन्होंने कहा-‘‘कला जूनियर सीनियर में भेद नहीं रखती, मुझे इतना विश्वास है तुम यह कर सकोगे।‘‘ मैं निरुत्तर हो गया और मैंने यह जिम्मेदारी स्वीकार कर ली और उसी दिन से तैयारी प्रारंभ कर दी जिसमें मेरे साथियों का भरपूर सहयोग मिला। मुझे वह घटना याद आ गई जब वार्षिक ‘‘सरहुल‘‘ कार्यक्रम के लिए अपोस्तोलिक स्कूल को भी एक नृत्य प्रस्तुत करना था तब भी फादर डाइरेक्टर ने मुझ पर यह भार सौंपा था। हमने कार्यक्रम तैयार किया और हमारा कार्यक्रम सफल रहा। इसे ही याद करके मैंने दूने उत्साह से तैयारी प्रारंभ कर दी। यदा-कदा फादर रेक्टर तैयारी की प्रगति बाबत खोज-खबर लेते रहते थे।

सेमनरी की जुबिली के लिए मेहमानों का आना शुरू हो गया था। सेमनरी से पढ़कर निकले फादर लोग भारी संख्या में आ रहे थे। देश के विभिन्न धर्मप्रांतों के धर्माध्यक्ष पधार रहे थे; सचमुच पूरा संत अल्बर्टस कॉलेज स्वर्ग का एक कोना बन गया था और श्वेत पुरोहिती परिधान धारण किए हुए फादर हजारों देवदूतों के समान लग रहे थे। जुबिली का त्रिदिवसीय कार्यक्रम बड़े समारोह के साथ प्रारंभ हुआ जिस दिन हमारा प्रोग्राम था उस दिन के मुख्य अतिथि बिहार के मुख्यमंत्री माननीय सुशील कुमार बागे जी थे। हमारे दल ने उनके समक्ष कार्यक्रम प्रस्तुत किया। प्रस्तुति बेहद सफल रही, मुख्य अतिथि ने और सबने उसे खूब सराहा। लोयोला स्कूल कुनकुरी के पूर्व प्रिंसिपल माननीय लियो तिग्गा ये.स.जो दुम्का धर्म प्रांत के धर्माध्यक्ष थे उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हमारी पीठ थपथपाई और कहा-‘‘क्लास में गुमसुम रहते थे तुम तो छुपे रूस्तम निकले।‘‘ फादर रेक्टर ने कार्यक्रम समाप्ति के बाद विशेष रूप से कहा-‘‘इसी प्रकार हर जिम्मेदारी को ईमानदारी से निर्वाह करते चलो, मेरी शुभकामनाएं हैं।‘‘

कुछ ऐसे ही कार्यक्रम थोड़े-थोड़े अंतराल में संपन्न हुए जिनका उल्लेख किया जाना उचित समझता हूं। वर्ष 1968 में छोटानागपूर के प्रथम मिशनरी फादर अगुस्तुस स्टॉकमैन के आगमन का महा समारोह संत जेवियर्स कॉलेज ग्राउण्ड में बड़े धूमधाम के साथ मनाया गया। इस समारोह में भाग लेने छोटानागपुर के कोने-कोने में कार्यरत मिशनरी रांची पधारे थे और संत जेवियर्स कॉलेज से फ्रांसिस्कन फ्रायरी तक का इलाका मिशनरियों से भर गया था। जिधर देखो उधर श्वेत पुरोहिती परिधान में मिशनरियों की आवा-जाही देखते ही बनती थी। संपूर्ण मिशन इलाका देवलोक का आभास दिलाता था।

वर्ष 1969 में बेल्जियम के राजा-रानी का रांची आगमन हुआ। बेल्जियम मिशनरियों ने छोटानागपूर के लिए जो किया वह जग जाहिर है। अपने देश के उत्साही मिशनरियों की उपलब्धियों के आकलन और एक झलक पाने के लिए देश के राजा-रानी के साथ एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडल भी आया हुआ था। अबकी बार खास कार्यक्रमों का केन्द्र संत अल्बर्टस कॉलेज चुना गया था। अपने प्रिय राजा-रानी से मिलने के लिए पूरे छोटानागपुर में कार्यरत विदेशी मिशनरी रांची पधारे थे। संत जेवियर्स कॉलेज से फ्रांसिस्कन फ्रायरी तक का वह क्षेत्र पुनः देवलोक में तब्दील हो गया और समस्त मिशनरी देवदूतों का आभास दिला रहे थे। राजा-रानी ने अपने उत्साही मिशनरियों की मानवता की सेवा, त्याग, तपस्या का परिणाम अपनी आंखों से देखा। मिशन इलाका एक तपोभूमि था जिसमें तपकर ये मिशनरी विभिन्न कठिन परिस्थितियों में अपने जीवन को समर्पित करते हुए मानव सेवा में जुटे हुए थे। हर आयु के, हर परिस्थिति में काम करने वाले, मानव सेवा में निःस्वार्थ सेवा भाव से समर्पित मिशनरियों का अनूठा समागम था वह। चेहरे पर ब्रह्मचर्य का तेज, ललाट पर छाई लालिमा उनके अदम्य उत्साह, जोश, कर्मठता, साहस, आनन्द, चिर प्रेरणा की कहानी बखान कर रहे थे। माथे पर उभरे स्वेद कणों से प्रेरिताई की खुशबू फूट रही थी। मनरेसा हाउस मिशनरियों की तपोभूमि छोटानागपुर का चप्पा-चप्पा उनकी कर्मभूमि बना हुआ था। छोटानागपूर का कोना-कोना उनकी तपस्या की ऊर्जा से संचालित था। अपने राज-दम्पत्ति से चंद वाक्यों में कुशलक्षेम के आदान-प्रदान के साथ वे उनके प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे कि उन्होंने उन्हें इस पुनीत धरा के हिस्से में सेवाएं देने का मौका देकर इस जीवन को सफल बनाया। राज दम्पत्ति भी अपने वतन के इन साहसी उत्साही तपस्वी, त्यागी, सपूतों की उपलब्धियों से भरपूर संतुष्ट थे। बेल्जियम राज दम्पत्ति के छोटानागपुर दर्शन का वह अल्प काल एक अमिट निशानी छोड़ गया और उत्साही हृदयों में उत्साह और प्रेरणा का संचार कर गया।

मैं सत्र 66-67 की सेमनरी जुबिली की बात कर रहा था पर छोटे अंतरालों में जुबिली सदृश्य, समान संपन्न समारोहों के बखान के लोभ का संवरण न कर सका अतः मैं उन समारोहों का भी बखान करने बैठ गया। पूरा सत्र उपलब्धियों का रहा। मैंने पाया कि व्यक्ति यदि सजग रहे तो सेमनरी का वातावरण ज्ञानार्जन के लिए उत्तम वातावरण उपलब्ध कराता है। समय-समय पर विद्वानों के लेक्चर्स होते रहते थे। कई बार ये लेक्चर्स ऐच्छिक हुआ करते थे परंतु मेरी कोशिश रहती थी कि मैं हर लेक्चर को सुनूं। येसु समाज ने कई विभूतियां समाज को दी है, उन विभूतियों में से एक थे फादर टक्कर ये.स.। रंग रूप में वे काले जरूर थे पर पूरे समाज में नगीने से कम न थे। उनके ज्ञान की विशालता को आंकने के लिए कोई पैमाना नहीं था। सेमनरी प्रबंधन उन्हें सप्ताह में एक बार अच्छे भाषण एवं अच्छे लेखन कला पर लेक्चर देने आमंत्रित करता। मैं जिज्ञासा वश उनके लेक्चर नियमित रूप से सुनता था। मैंने यह पाया कि उनके टक्कर का ज्ञानी व्यक्ति शायद आसपास कोई नहीं था। उन्हें अगर चलता फिरता ‘‘एन्साइक्लोपीडिया‘‘ कहा जाए तो उत्तम होगा। उन्होंने थोड़े दिनों के लिए ही अपने कीमती भाषण दिए। मैंने देखा कि बहुत कम ब्रदर लोग इस कार्यक्रम में रूचि दिखाते थे। उन्होंने भाषणों में जो सिद्धांत बताये वे आज भी मेरे मानस-पटल पर अंकित हैं। कभी मेरे सहपाठी पुरोहितों के उपदेश सुनने में आ जाते हैं तब लगता है कि उन्होंने कितना खोया; वे ऐसे अवसरों से बचते थे और दबी जुबान कहते थे, ‘‘अरे! यह सब बेकार है, उपदेश देना कौन सा मुश्किल काम है?‘‘ सार्थक और सफल उपदेश देना उतना आसान नहीं है जितना वे समझते थे। इसके लिए ज्ञान के साथ कला आवश्यक है। हां औपचारिकता की पूर्णता तक ही बात करनी हो तो इस पर अधिक बात करना निरर्थक है।

वर्ष 66-67 समाप्त होने के पूर्व सेमनरी के रेक्टर का तबादला हो गया। उन्हें रायगढ़ अम्बिकापुर धर्मप्रांत का सोशल वर्क डाइरेक्टर का पदभार सौंपा गया था। जाते-जाते उन्होंने कहा था-‘‘अब तो बार-बार मिलते रहेंगे।‘‘ उनके जाने से मुझे एक अवर्णनीय मायूसी का अहसास हुआ। नए रेक्टर से भी परिचय था। जब मेरी पल्ली जशपुर में धर्म फैलाव का केन्द्र बनी थी तब उन्होंने वहां अपनी सेवाएं दी थीं। तब मैं बहुत छोटा था परन्तु वे मेरे पिताजी को जानते थे। समय अपनी रफ्तार से बढ़ता जा रहा था। समय की धार के साथ अपनी प्रतिभा और व्यक्तित्व में आशानुरूप निखार का आभास होता था।

उस साल 1967 में पलामू में भीषण सूखा पड़ा था और गर्मियों की छुट्टियों में वहां सोशल वर्क कैम्प लगा था। सेमनरी के अधिकांश ब्रदर उस सोशल वर्क कैम्प में भाग ल्ेने गए। यह मेरा दुर्भाग्य था कि प्रथम वर्ष की वार्षिक परीक्षा के नतीजे में एक विषय (राजनीति विज्ञान) में पूरक आया था। यह मेरी जिन्दगी का सबसे बकवास परीक्षाफल था। राजनीति के मामले में मेरा पक्ष सदा से कमजोर रहा है। राजनीति शास्त्र के सिद्धांतों और व्यवहारिक राजनीति की दांवपेंच अपनी समझ के दायरे के बाहर की बातें हो जाती हैं जिसका खामियाजा जीवन में अक्सर झेलना पड़ा है। चूँकि हमें आगामी कुछ महीनों के बाद पूरक परीक्षा में शामिल होना था अतः हमें सोशल वर्क कैम्प नहीं भेजा गया। हम पूरक परिक्षार्थियों की संख्या करीब दस-बारह थी। हमारे साथ अन्य ब्रदर जो शारीरिक कमजोरी से ग्रसित थे, आलसी या बहानेबाज थे जो रेक्टर के मुहलगे अथवा ‘‘खास‘‘ श्रेणी के थे वे भी इस सोशल वर्क कैम्पस से बच गए। पूरक परीक्षार्थियों और सोशल वर्क कैम्प से बचे ब्रदरों (दर्शन शास्त्र प्रखण्ड) का मॉनीटर भी मुझे ही रखा गया। इस पर मैने निवेदन भी किया कि इस बार किसी अन्य ब्रदर को मॉनीटर नियुक्त किया जाए ताकि सबको इसके लिए कुछ अवसर मिले। मेरे निवेदन को खारिज किया गया अतः मुझे वह दायित्व निर्वाह करना पड़ा।

पूरा सेमनरी लगभग खाली हो गया था। दर्शन शास्त्र खण्ड में 15-20 एवं ईश शास्त्र खण्ड से 8-10 ब्रदर लोग ही बच गए थे। हम पूरक परीक्षार्थी जशपुरिया ब्रदरों के अतिरिक्त अन्य वे ब्रदर थे जो किन्हीं विशेष कारणों से सोशल वर्क कैम्प में शामिल नहीं हुए थे। इस प्रकार जो सेमनरी में रह गए थे उनका काम साफ-सफाई करना, बगीचों में पेड़-पौधों को पानी देना अथवा मेन्टेनेन्स का रह गया था। भारी काम हम जशपुरिया ब्रदरों के जिम्मे हुआ करता था। गैर छोटानागपुरी ब्रदरों को उनकी नाजुकता के आधार पर छोटे-मोटे काम सौंपे जाते थे। हम जशपुरिया ब्रदर अपने काम निपटाकर परीक्षा की तैयारी में लग जाते थे और अन्य अपनी रूचि अनुसार अपने काम करते थे। उन्हें इतना ज्ञात था कि हम परीक्षा की तैयारी के नाम पर ही छुट्टियों में सेमनरी में थे।

सब कुछ सामान्य तौर पर चल रहा था। एक दिन सभी ब्रदर अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। हम जशपुरिया ब्रदर तालाब से पानी ढोकर पौधे को पानी देने लगे थे। एक गैर छोटानागपूरी ब्रदर जो डीकन बन चुके थे और अगले चार-पांच माह बाद उनका पुरोहिताभिषेक होना था तेज कदम हमारी ओर आए। हम पौधों को पानी दे ही रहे थे। उन्होंने कुछ दूर खड़े होकर हमसे कहा-‘‘ऐ! तुम, हां तुम दो-चार ब्रदरों को मेरे कक्ष में भेजो, कुछ फर्नीचर और अन्य सामान जमाना है।

मैंने कहा-‘‘हमारा काम बस समाप्त हो गया है, हम पानी देकर फौरन आपकी सेवा में उपस्थित होते हैं।‘‘

‘‘अरे तुम समझते नहीं मैं जो कह रहा हूं वह कितना जरूरी काम है, तुम्हारा काम तो कभी भी किया जा सकता है”-उसने रूक्षतापूर्वक कहा-

‘‘ठीक है, बस हम काम पूरा करके आ ही रहे हैं‘‘-इतना कहकर हमने काम समाप्त किया और ब्रदर डीकन के कक्ष की ओर चले। डीकन भुनभुनाते हुए तेज कदम अपने कक्ष की ओर चले। उनके कक्ष में प्रवेश करने और हमारे कक्ष के सामने उपस्थित होने में बमुश्किल पांच-छः मिनट का समय लगा होगा। हमने वहां पहुंचकर सामान्य भाव से ही कहा-‘‘हम आ गए हैं, हमें काम बता दीजिए।‘‘ उन्होंने एक घृणा भरी नजर हम पर डाली और खामोशी से हमें देखते रहे। उनके हाव-भाव से लगता था कि वे हमसे अप्रसन्न हैं। वे अपने समाज के ही दो-तीन अन्य ब्रदरों से अपनी भाषा में बतिया रहे थे। उन्होंने हमारी ओर ध्यान ना देने का नाटक किया।

हमने विनम्रतापूर्वक पुनः कहा-‘‘हमारे आने में थोड़ी देर हो गई, अतः हमें क्षमा करें, कृपया बताएं हमें क्या करना है ?‘‘

डीकन महोदय ने चश्में के अंदर से मुझे घूरते हुए कहा- ‘‘कोई काम नहीं है, जाओ, सब काम हो गया।”

‘‘हमारे लायक यदि कोई काम रह गया हो तो बताएं नहीं तो कोई बात नहीं”- मैंने फिर भी आग्रहपूर्वक काम के लिए पूछा-डीकन ने घुड़कते हुए कहा-‘‘बोला न, कि कोई काम नहीं है, जाओ यहां से।

उनका रूख देखकर और हमारी जरूरत न देखकर हम वहां से उल्टे पांव लौट गए। मेरे ख्याल से हमने उनकी उपेक्षा या अवज्ञा नहीं की थी पर डीकन का व्यवहार समझ में नहीं आया।

रास्ते में साथी ने कहा-‘‘इतनी सी बात में मूड खराब होने का कोई यथोचित कारण ही नहीं बनता है भाई !

दूसरे ने कहा-‘‘वे डीकन है, सोचा था कि उनकी बात सुनते साथ हम उनके काम कर दें।‘‘

तीसरे ने कहा-‘‘देखा जाए तो हम बिना अधिक विलंब किए उनकी सेवा में उपस्थित हो गए, थोड़ा समय तो लगता ही है। इसमें इतना भड़कने का क्या औचित्य था?‘‘

उनकी बातें सुनने के बाद मैंने कहा-इसी से अपने अस्तित्व के महत्व का अंदाजा लगा लो, थोड़े से विलंब से उनका अहम् आहत हो गया।‘‘

एक ने पुनः कहा-‘‘भाई, आपको तो चश्मे के अंदर से ऐसे घूर रहे थे मानो कच्चा चबा जाएंगे। उनकी आंखों में एक नफरत का भाव झलक रहा था। इतनी मामूली सी बात पर उनकी ऐसी प्रतिक्रिया, इतना गुस्सा डीकन की गरिमा के अनुकूल नहीं लगता।‘‘

‘‘फा. रेक्टर के खास हैं तो इतना रौब तो रहेगा ही‘‘-मैंने निष्कर्ष बतौर कहा। हम अपनी जगह आकर रूटीन काम में लग गए। मैं मन ही मन कह रहा था अभी तक का दिन तो बीत गया प्रभु! शेष बचा हुआ दिन भी अच्छा ही गुजर जाए।

उसी दिन शाम की बात है। हम जशपुरिया ब्रदर खेल के पश्चात् स्नानादि कर स्टडी कक्ष में पढ़ाई में लग गए। शाम का समय किंचित ठण्डा रहने से स्टडी करने हेतु उपयुक्त समय वही होता था। अध्ययन कक्ष से लगी सीढ़ी थी जो स्नानागार तक उसके बाजू की छत तक जो मैदान के सामने खुलती थी, तथा ऊपर शयनागार तक जाती थी। गैर छोटानागपुरी ब्रदर भी अपनी सुविधानुसार नहाने हेतु पहुंचे। चूँकि उन्हें कोई परीक्षा नहीं देनी थी अतः वे आराम से नहाने के मूड में थे।

सेमनरी में एक नियम होता था जिसके अनुसार एक विभाग के ब्रदर दूसरे विभाग के ब्रदर से बिना अनुमति नहीं मिल सकते थे अर्थात ईश शास्त्र के ब्रदर दर्शन शास्त्र के ब्रदरों से बिना अनुमति मिल नहीं सकते थे। निर्धारित दिनों में ही निर्धारित समय तक वे एक दूसरे से मिल सकते थे। वैसे यह कोई बहुत बड़ा नियम नहीं था पर नियम तो नियम होता है। अक्सर इस नियम का उल्लंघन देखने में आता था।

सुबह वाले ब्रदर डीकन भी दर्शनशास्त्र के स्नानागार के पास पहुंच गए। वहां दो-चार गैर छोटानागपुरी तो पहले से बातें करने में मशगूल थे ही। उनके साथ ये बातों में लग गए और अपना टाइम पास करने लगे। इनकी विशेषता होती है कि वे धीरे बात नहीं कर सकते हैं; इनके बाते करने का तरीका जोर-जोर का होता है, आजू-बाजू वाले से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता। दर्शन शास्त्र खण्ड की इमारतों की संरचना ही कुछ ऐसी है कि संपूर्ण इमारत एक साउण्ड बाक्स का काम करती है। कोई धीमी आवाज में भी बात क्यों न करें वह सबको सुनाई पड़ती है और यहां तो जोर-जोर से बातें हो रही थी। उन्हीं में से कुछ ने इशारे से बताना चाहा कि ब्रदर लोग स्टडी कर रहे हैं अतः शांत रहें। इस शोर से जशपुरिया ब्रदरों का ध्यान भंग हो गया। स्टडी में एकाग्रता बाधित हो गई। उनका मॉनीटर होने के नाते मैं भी इसे समझ रहा था। मैं यही चाहता था कि वे ब्रदर समझदारी से काम लेंगे और शांति बनाए रखेंगे। काफी समय हो चुका था मेरा भी नैतिक दायित्व बनता था कि उन्हें उनकी त्रुटि का एहसास हो जाए और स्टडी अनुकूल वातावरण बन जाए; ब्रदर पूरे जोर-जोर से हंसते बातें कर रहे थे। डीकन पर उनके ही समाज के भाई-बन्धुओं के इशारे का कुछ भी प्रभाव नहीं था। उनको हम जशपुरिया ब्रदरों की परीक्षा की तैयारी से कोई लेना-देना नहीं था अपने साथी ब्रदरों की भावना का ख्याल रखते हुए मैं हाथ में पुस्तक लिए उनकी ओर बढ़ा। डीकन ब्रदर और उनके साथी छत पर खुलने वाले दरवाजे के चौखट से पीठ टिकाकर बातें कर रहे थे। मुझको अपनी तरफ आते देख क्षण भर के लिए वे नीची आवाज में बातें करने लगे। मैंने उनसे निवेदन किया ‘‘नीचे स्टडी कक्ष में ब्रदर लोग अपनी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। बड़ी कृपा होगी यहां जोर से बातें न करेंगे तो।‘‘

इतना सुनकर बाकी ब्रदर तो वहां से खिसक गए या स्नान करने चले गए परन्तु ब्रदर डीकन को तो जैसे आग लग गई। वे नीले-पीले होने लगे। वे आंखे तरेरते हुए मुट्ठी तानते हुए गुस्से में फुंफकारते हुए मेरे सामने आए और दांत निपोरते हुए अपनी पूरा ताकत लगाकर बोले-‘‘ क्या कहा? तुम! ब्लडी फूल! तुम आदिवासी लोग किसी काम के लायक नहीं हो।‘‘ वे गुस्से में कांप रहे थे और मुझे इस तरह घूर रहे थे मानों मुझे कच्चा ही चबा जाएंगे।

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि अकारण इतना गुस्सा क्यों कर रहे है। पहले यदि कोई कहीं किसी बात पर टकराहट हुई हो तो बात समझ में आती। कोई ऐसा संदर्भ नहीं था कि इस प्रकार गुस्सा करना एक बार समझा जा सकता था। उनकी उग्रता देख हैरानी हो रही थी।

मैंने शांत भाव से कहा-‘‘आप व्यर्थ में नाराज हो रहे हैं; मेरे साथी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं अतः मैंने नम्रतापूर्वक शांति बनाए रखने का निवेदन किया। मैंने आपसे कोई गलत व्यवहार से कहा-‘‘जो आप कह रहे हैं वह आप डीकन के लिए नहीं शोभा देता है और जहां आप खड़े हैं, वहां ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं होता है। आप अपनी जुबान को लगाम दें, अपनी भाषा को नियंत्रित रखें तो उचित होगा। किसी समुदाय विशेष के लिए ऐसी टिप्पणी करना नैतिकता के विपरीत है।‘‘ मैं शांत था परंतु मेरी आवाज में दृढ़ता थी।

ब्रदर डीकन गुस्से में पागल हो गए थे। वे फिर मुझे मारने की मुद्रा में मुट्ठी तानते हुए गुस्से में चिल्लाते हुए बोले-‘‘क्या? मुझको सिखाने चले हो? कल के छोकरे मुझे सिखा रहे हो? ब्लडी फूल! तुम आदिवासी लोग किसी काम के लायक नहीं हो।‘‘

डीकन की मानसिकता समझ के परे थी और वे निरंतर अपने आपे से बाहर हुए जा रहे थे और वही जहर उगले जा रहे थे। मुझे मारने की मुद्रा अब भी बनी हुई थी। मैंने संयमित स्वर में कहा-‘‘आपको पुनः कह रहा हूं कि आप अपनी जुबान को लगाम दें, आप गुस्से में अपना विवेक खो चुके हैं और आपको यह ज्ञात नहीं है कि आप क्या कह रहें हैं।‘‘ डीकन के गुस्से में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही थी और मुझे भी अब आक्रोश हो रहा था। मैं अंदर ही अंदर आहत हुआ जा रहा था पर अपने मनोभाव पर काबू पाने का भरसक प्रयत्न कर रहा था।

मैं जितना संयमित था ब्रदर डीकन उतने ही आक्रोशित थे। वे बार-बार ब्लडी फूल तुम आदिवासी लोग किसी काम के लायक नहीं हो कहे जा रहे थे। मेरे संयम का बांध टूटा जा रहा था। मैंने कुछ कड़कते हुए कहा-‘‘यदि मैं नालायक हूं तो मुझे नालायक कहो ना? क्यों पूरे आदिवासी समुदाय को नालायक कह रहे हो? क्या, आपने सारी योग्यता का ठेका ले रखा है? मैं अंतिम चेतावनी दे रहा हूं जबान संभाल कर बोलें? आप हद पार कर चुके हैं; यदि आपने वही बात फिर दुहराई तो मुझसे बुरा कोई न होगा।‘‘ वे भला मेरी चेतावनी पर क्यों ध्यान देने लगे उन पर तो मानो मुझे मारने और पूरे आदिवासी समाज को नालायकी का प्रमाण पत्र देने का भूत सवार था। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर सवार था। उनकी भाव भंगिमा देख मुझे भी अब गुस्सा आ गया था। पूरे आदिवासी समाज के आत्म सम्मान को सरे आम रौंदे जाते देखना मेरी बर्दाश्त के बाहर हो गया। वे मुझे मारने को हुए मैंने उनका वार बचाया, पुस्तक फेंक डाली और ब्रदर डीकन के निकले हुए दांत और जबड़ों को निशाना बनाते हुए तौलकर एक आदिवासी घूंसा जमाते हुए कहा-‘‘ज्यादा दिमाग खराब न करें, हम आदिवासियों को जरूरत से ज्यादा क्लेश देने का अंजाम बहुत बुरा होता है।‘‘ एक जबरदस्त घूंसा देने के बाद घूंसों की, मुष्टि प्रहार की झड़ी लग गई। कनपटी से लेकर कमर तक का कोई भी हिस्सा ऐसा न था जहां घूंसों की मार न पड़ी हो। उनके निकले दांत कुछ अंदर तक हिल गए थे; होंठ फट चुके थे। वे जो ब्लडी फूल आदिवासी कहते नहीं थक रहे थे अभी जमीन सूंघ रहे थे और बिल्कुल ही निस्सहाय स्थिति में देख लेने की धमकी भर दे रहे थे।

यह सब थोड़े समय में ही घट गया। डीकन के समुदाय का एक ब्रदर शोर सुनकर दौड़ा-दौड़ा देखने आया और डीकन की बुरी हालत देख मुझे रोकने, संभालने लगा पर उसे भी प्रसाद स्वरूप कुछ घूंसे यों ही मिल गए। ब्रदर डीकन को उसने संभाला; वे बुरी तरह कांप रहे थे और फादर रेक्टर, फादर रेक्टर की रट लगाए थे।

दरअसल ब्रदर डीकन को मेरे बारे में शायद कुछ गलतफहमी हो गई थी अथवा उनके जीवन के किसी हिस्से में लगी चोट का भड़ास निकालने की कोई कुंठा कहीं दबी रही होगी। उन्होंने सोचा होगा कि प्रथम वर्ष का लड़का है उसे सबक सिखाना आसान होगा। सोचा होगा यह भी ऐसे ही दब्बू होगा, मेरी दहाड़ सुनकर दुबक जाएगा; लेकिन यह उनकी गलतफहमी थी। डीकन में बस जोश था होश नहीं। मेरा उनसे कभी किसी संदर्भ में कोई मेल-मुलाकात नहीं थी। आते जाते यों ही उन्हें देखा था। शरीर से दुबले-पतले थे, उनके पिचके गाल काली दाढ़ी से ढंके रहते थे। मॉनीटर होने के नाते जब भी रेक्टर के पास जाता अक्सर उनको रेक्टर के कक्ष के आस पास या उनके कक्ष से निकलते या घुसते देखा करता था शायद वे डीकन अंग्रेजी टायपिंग जानते थे और साइक्लोस्टाईल करने, स्टेनशिल काटने का काम जानते थे जिनके कारण वे रेक्टर के कुछ अति खास होने का दावा करते थे। उस समय फोटो कापी करने की सुविधा नहीं थी। उनको कभी ईश-शास्त्र अथवा दर्शन शास्त्र खंड में परोसे जाने वाले सामान्य भोजन का सेवन करते नहीं देखा सुना गया था। उनके लिए दोनों सांझ ‘‘स्पेशल डिश‘‘ परोसा जाता था। उनको महीने में कम से कम दो बार मंडार अस्पताल में चेकअप हेतु जाना जरूरी था। शरीर में दम नहीं था बस आवाज में ही बुलंदी थी। मुझे उनकी स्थिति की समझ थी लेकिन उनके आदिवासी विरोधी भूत को ठंडा करना परिस्थिति को देखते हुए आवश्यक था। मैं वहां से नीचे उतरकर स्टडी कक्ष में आया और एक नजर मेरे साथी ब्रदरों पर दौड़ाई। वे दम साधे दुबके पड़े थे। किसी को कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी। मैंने कहा-‘‘पढ़ रहो हो ? चुल्लू भर पानी में डूब मरो, कायरों, तुम्हारे घर में तुम्हारी माटी की, तुम्हारी मां की बेइज्जती हो रही है और तुम अंध मूक बधिर बन बैठे अपनी बुलाहट को सहेज रहे हो? अरे चूड़ियां पहन लो! लानत है तुम पर; समाज का सरेआम चीरहरण हो रहा है और तुम आँख, कान, मुंह बंद करके बैठे हो? पढ़ लिखकर क्या करोगे? पढ़ लिखकर क्या बनोगे? व्ही.जी. बनोगे बिशप बनोगे? जो भी बनोगे बस, एक डरपोक मिशनरी और इससे ज्यादा कुछ नहीं। एक गैर छोटानागपुरी डीकन की हमारे छोटानागपुर की माटी के संबंध में अनुचित और गलत टिप्पणी का विरोध नहीं कर सकते हो तो मिशन के अपने रेवड़ की रक्षा भेड़ियों से क्या खाक करोगे? ईश्वर तुम सबका भला करे।‘‘

वहां से निकलकर मैं सीधे इन्फर्मरी (रूग्णालय) गया। वहां ब्रदर इन्फर्मेरियन से ए.टी.एस. इंजेक्शन लगवा लिया। डीकन के निकले दांतों पर मुट्ठी प्रहार से उंगलियों की चमड़ी छिल गई थी। ब्रदर इन्फर्मेरियन ने इंजेक्शन लगाते हुए कहा-‘‘सेमनरी के इतिहास में आपने एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया है, बस प्रबंधन को इसे समझने की बात है।‘‘

मैं सीधे फादर रेक्टर के कक्ष की ओर गया। उनके कमरे से डीकन के रोने की आवाज स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी। वे रोते हुए बार-बार बच्चों जैसे बोल रहे थे-‘‘उसने मुझे मारा।‘‘ वे रोते हुए अपना दुखड़ा रो रहे थे। उनके साथ के ब्रदर ने आंखो देखा हाल सुनाया। एक काम उसने बहुत अच्छा किया कि उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। फादर रेक्टर उससे जानना चाह रहे थे कि उनका चहेता डीकन मुझे भी कुछ मुक्के मार सका कि नहीं। उस ब्रदर ने स्पष्ट कहा-‘‘उस जूनियर ब्रदर के एक घूंसे से ही इनका तो बुरा हाल हो गया, उसे कुछ भी मार नहीं पड़ी। देखिए न उसने इनका क्या हाल बना दिया है।’’

डीकन महोदय रह रहकर कराह उठते थे। फादर रेक्टर को उनके चहेते के बुरी तरह पिट जाने का बड़ा अफसोस हो रहा था। उन्होंने डीकन को मंडार अस्पताल ले जाने का आदेश दिया। आनन-फानन में टैक्सी की व्यवस्था हुई और डीकन के जात भाई ब्रदरों ने उसे अस्पताल पहुंचाया।

डीकन को टैक्सी में बिठाने के लिए फा. रेक्टर कक्ष के बाहर तक आए। वहां मुझे खड़ा देखकर उन्होंने अजीब सा मुंह बनाया और कक्ष में प्रवेश करते करते मुझे अंदर आने को कहा। उन्होंने उड़ती नजर मुझ पर डाली और गंभीर आवाज में कहा-‘‘क्यों क्या हुआ था?‘‘ मैंने सबेरे से लेकर शाम तक के संपूर्ण घटनाक्रम का सूक्ष्म वर्णन किया और कहा-‘‘मुझे मार-पीट करने का कोई शौक नहीं है और न ही डीकन को मारने-पीटने की मेरी कोई मंशा थी। जब से उनसे संवाद स्थापित हुआ है तब से मैंने उन्हें हम जशपुरिया लोगों को एक हेय दृष्टि से, नफरत भरी निगाहों से देखते हुए पाया है। उनके वचन में हमारे प्रति अजीब सी कड़वाहट का अनुभव किया। हद तो उन्होंने तब कर दी जब उन्होंने संपूर्ण आदिवासी समुदाय को नालायक कहा। मेरे आदिवासी समाज का, मेरे इस छोटानागपुर की माटी का अपमान करने का अधिकार उसे कहां से मिला? मैं अपमान का घूंट पीता रहा और संयमित रहकर अपमान सहता रहा। मैंने उन्हें कई बार ऐसे अपमान जनक शब्द कहने से रोका पर वे मेरी कब मानने वाले थे, उल्टे वे मुझपर हाथ उठाने को तैयार हो गए। मुझसे अधिक सहन नहीं हो सका और आत्मरक्षा में उन पर हाथ उठाया। डीकन ने मेरे समुदाय के आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ाई, हमारा मखौल उड़ाया, यह सब बर्दाश्त भी करूं और उनकी मार भी खाऊँ ? उनकी हेकड़ी और अहंकार के भूत को उतारने के लिए ही मैं उन पर हाथ उठाने को मजबूर हुआ। यदि आप समझते हैं कि मैंने कोई अक्षम्य अपराध किया है तो जो दंड देना चाहें मुझे दे दें।’’

फा. रेक्टर ने अनमने ढंग से मुझे सुना और कहा-‘‘वह सब ठीक है पर मेरा कहना है कि तुमने मारा ही क्यों? तुम्हें मालूम नहीं हैं मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर सकता हूं।‘‘ मैंने कहा-‘‘आप सर्वेसर्वा हैं आप मुझे फांसी पर भी लटका सकते हैं।‘‘ इस घटना के चश्मदीद गवाह ने और मैंने उन तमाम परिस्थितियों का बयान कर दिया है जिनके कारण से उसे मार खानी पड़ी। उन्हीं बातों को बार-बार दुहराने का कोई औचित्य नहीं हैं। उसने मार खाई, थोड़ी सी चोट लगी तो इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार है लेकिन उसने मेरे आदिवासी समुदाय को निकम्मा नालायक कहा उससे मुझे जो चोट पहुंची उसके बारे में आप कुछ नहीं सोचते ? वह तो मंडार अस्पताल से दो दिन इलाज कराकर वापस आ जाएगा लेकिन जो चोट उसने मेरे अंतर्मन में, दिल में दी है उसका कोई इलाज है? ऊपर से आप उन्हीं के प्रति गहरी सहानुभूति जता रहे हैं। यदि इतने वर्षों के प्रशिक्षण के बाद भी आपके चहेते डीकन के मन में दलित वर्ग, पिछड़े एवं शोषित वर्ग या किसी समुदाय विशेष के प्रति घृणा और नफरत का भाव हो तो ऐसे गहन प्रशिक्षण के दिखावे का क्या औचित्य है। इतने प्रयासों के बाद भी दलित शोषित वर्ग के प्रति घृणा की दूषित मानसिकता सड़ांध मार रही हो और आप ऐसी दूषित मानसिकता वाले की तरफदारी कर रहे हैं तो मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि आपके पड़ोसी प्रेम के प्रति दिए जाने वाले उपदेश निरर्थक एवं बकवासपूर्ण है। आप उनसे दबकर व्यवहार रखते और हमसे दोयम दर्जे का व्यवहार रखते हैं। यह भेदभावपूर्ण है तथा अनुचित है।‘‘

फादर रेक्टर के चेहरे से उनकी बौखलाहट साफ झलक रही थी। अपनी बकराकट दाढ़ी पर बार-बार हाथ फेरते हुए वे उपेक्षा भरी निगाह मुझ पर डालते जाते थे। उन्होंने मुझसे फिर कहा-‘‘तुमको यह मालूम नहीं है कि डीकन पर हाथ उठाकर तुमने कितनी बड़ी गलती की है। तुमने उसे मारा ही क्यों?‘‘

फादर रेक्टर के एक ही सवाल को घुमा-फिराकर दुहराने से मेरा मन अंदर ही अंदर झल्ला रहा था, फिर भी मैंने संयत मन से पुनः कहा-‘‘देखिए फादर जब से उस डीकन से संवाद हुआ है तब से उनके बात करने के लहजे में मेरे प्रति या मेरे आदिवासी समुदाय के प्रति घृणा, नफरत उपेक्षा एवं तिरस्कार का भाव साफ झलकता रहा है। उनके संवाद में शालीनता, सौम्यता एवं डीकन के अनुकूल गरिमा एवं मर्यादा का सर्वथा अभाव था। यहां पर सबको मालूम है कि जशपुरिया ब्रदर लोग पूरक परीक्षा की तैयारी में हैं पर उस डीकन को इसकी कोई परवाह नहीं थी। वे अपना क्षेत्र छोड़कर दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में जाकर स्टडी कक्ष के पास जोर-जोर से बातें करते रहे, ऐसा करके भी आपके बनाए नियम का उन्होंने उल्लंघन किया। मॉनीटर होने के नाते उनसे विनम्रता पूर्वक शांत रहने का निवेदन किया गया। इस पर वे व्यर्थ में ही भड़क कर मेरे आदिवासी समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए गुस्से में तमतमाए हुए मुट्ठी तानते हुए मुझे मारने को उद्यत हो गये। यह सब क्या दर्शाता है? मैंने उनसे नम्रतापूर्वक शांत रहने को कहा तो कोई अभद्रता या अशिष्टता नहीं की। इस पर हमारे आदिवासी समाज पर बेहूदगी से नस्लीय टिप्पणी करना कहां की शराफत है? आदिवासी समाज में जो आपत्तिजनक टिप्पणी की गई उसे मैं दुहराना नहीं चाहता। मैं आपसे पूछता हूं क्या हमारे छोटानागपुर की भूमि इतनी बंजर हो गई है? या छोटानागपुरी मां की कोख इतनी बेकार है कि उसकी एक भी संतान लायक नहीं है? कौन ऐसा होगा जो अपने समाज, अपने क्षेत्र के अपमान का घूंट पीकर खामोश रहेगा? सेमनरी के आठ-दस वर्षों के प्रशिक्षण के बाद भी किसी शोषित दलित और पीड़ित समाज के प्रति ऐसी दुर्भावना और मलिनता किसी डीकन के मन में भरी हो तो यह सेमनरी प्रशिक्षण कार्यक्रम पर बड़ा गहरा धब्बा है। इससे बढ़कर दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती हैं, लेकिन इससे भी बढ़कर और बुरी बात यह है कि आप अपने चहेते डीकन की गलतियों पर परदा डालना चाहते हैं। मैंने उसके ऊपर हाथ उठाया उसे आप हवा देना चाहते हैं और अपने लिए मुद्दा बनाना चाहते हैं। आपका चहेता डीकन अपने अहंकार और घमंड के कारण जो मार खाया है उस पर लीपा-पोती करना चाहते हैं। इससे आपका और एक भयानक चेहरा साफ झलकता है और वह है आपका भेदभावपूर्ण रवैया। आप कुछ खास लोगों के लिए ढीला-ढाला व्यवहार रखते हैं और कुछ लोगों के प्रति कठोर रवैया अपनाते हैं। ऐसा रवैया एक संस्था प्रमुख के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।‘‘

फादर रेक्टर ने कहा-‘‘मुझे क्या करना है, क्या नहीं करना है, मुझे मालूम है। मैं तुम्हारे बिशप स्वामी से इस संबंध में चर्चा करूंगा और तुम्हारे लिए एक वर्ष की रीजन्सी का प्रस्ताव रखूंगा-इसके बाद ही तुम सेमनरी वापस आकर आगे का प्रशिक्षण ले सकोगे। अभी तुम बिशप स्वामी के आदेश आने तक सेमनरी में रहोगे। तुम्हारी जगह दूसरे ब्रदर को मॉनीटर नियुक्त कर रहा हूं, अब तुम जा सकते हो। क्या और भी कुछ कहना चाहते हो‘‘ मैंने कहा-‘‘ आप अगर इजाजत दे रहें हैं तो एक बात और कहना चाहता हूं। आपने मेरे बिशप स्वामी को सामने मेरे विषय में प्रस्ताव रखने की बात कही, मेरे धर्मप्रांत के बिशप स्वामी आदिवासी समुदाय से ही हैं। वे आपके प्रस्ताव के विरूद्ध में जा नहीं सकते। यदि आप मुझे इसी वक्त सेमनरी से निकाल कर बाहर करना चाहेंगे तो भी उन्हें कोई विरोध नहीं होगा। आप जैसा बोलेंगे वह वही करेंगे। क्यों? क्योंकि हमारा समाज आप मिशनरियों के एहसान, सेवा आदि तले दबा हुआ है। वे जानते हैं कि आप लोगों ने जहां हाथ खींचा धर्मप्रांत छटपटाने, तड़फड़ाने लगेगा। आप डीकन महोदय के बिशप स्वामी को डीकन की त्रुटि को रिपोर्ट नहीं करेंगे और न उनकी त्रुटि के लिए किसी छोटे-मोटे दंड का प्रस्ताव रखेंगे क्योंकि उनके बिशप स्वामी गैर छोटानागपुरी है अथवा वे भी विदेशी ही हैं। इसके लिए आप में दम नहीं है। यदि आप में साहस होता तो आप कहते कि आपके डीकन ने ऐसा ऐसा काम किया है, एक समुदाय विशेष के विरूद्ध में अभद्र टिप्पणी की है जो कि मिशनरी भावना के मूल मंत्र के विरूध्द है। उसका पुरोहिताभिषेक समयावधि में ही आपकी कृपा से हो जाएगा परंतु मेरी बुलाहट का मार्ग आपके सौजन्य से कांटों से भरा रहेगा यह मुझे ज्ञात है।‘‘ इतना कहकर मैं फादर रेक्टर के कक्ष से बाहर आया। अंधेरा छा रहा था; क्या मेरे जीवन में भी अंधेरा छा गया था? मुझे भूख नहीं थीं! मैं बिना भोजन ग्रहण किए अपने स्थान पर बैठा रहा! मैं कुछ हल्कापन महसूस कर रहा था क्योंकि तमाम घटनाचक्र के बहाने मैं अपने दिल की भड़ास निकाल सका था। अब मुझे किसी भी परिस्थिति से निपटने की शक्ति का अहसास हो रहा था। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। जशपुरिया ब्रदरों को मुझसे बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी; लेकिन वे ही लोग खुशकिस्मत थे, क्योंकि कोई उन्हें कुछ कहे, गाली दे, अपशब्द कहे फिर भी वे खामोश हैं। उनके सिर पर कोई अनावश्यक बोझ नहीं। सबसे बड़ी बात कि वे सुरक्षित थे और मैंने आदिवासी समाज के अपमान का विरोध कर अपने लिया कितना खतरा मोल लिया था। जीवन अनिश्चित! लेकिन सबके सब ऐसे ही ठूंठ के समान रह जाएंगे तो समाज का क्या होगा ? किसी न किसी को तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा।

देवलोक! इस घटना के पूर्व संत जेवियर्स कॉलेज के फ्रांसिस्कन फ्रायरी तक के क्षेत्र को मैं ही देवलोक मानता था और इस क्षेत्र में स्थित प्रशिक्षण संस्थानों के प्राणियों को देवपुरूष मानता था। संत अल्बर्टस कॉलेज भी देवलोक का हिस्सा है-यहां देवपुरूष ‘‘दूसरे ख्रीस्त, तैयार किए जाते हैं जो प्रेम, शांति आनन्द की भाषा बोलते और ऐसी ही शिक्षा भी देते हैं। निश्चय ही डीकन महोदय ने जो भाषा कही वह देवलोक की भाषा नहीं हैं और देवपुरूष ऐसा भाषा नहीं कहते। देवलोक के संरक्षक ऐसी भाषा से परहेज करने की हिदायतें देते हैं, पर यह क्या, संरक्षक तो ऐसी अशिष्ट भाषा कहने वाले को संरक्षण दे रहे हैं और जो ऐसी भाषा के शिकार हो रहे हैं वे दंडित हो रहे हैं। मन बेचैन हो उठा; यह सरासर अन्याय लगा और अन्याय था क्योंकि ऐसी घिनौनी मानसिकता, धार्मिकता और नैतिकता के लिए अनुचित है। फादर रेक्टर का इस संबंध में खामोश रहना, डीकन को संरक्षण देना कुछ अजीब और रहस्य से परिपूर्ण लगा। क्यों? क्यों उन्होंने ऐसा व्यवहार दिखाया? क्या वे डीकन के उस अपमान जनक कथन का समर्थन करते थे? क्या वे भी आदिवासी समाज के प्रति ऐसी ही भावना रखते हैं? यदि ऐसा ही था तो वास्तविकता और व्यवहारिकता में कितना विरोधाभास है। क्या देवलोक में भी न्याय नहीं है। देवलोक का चेहरा मेरी कल्पना के विपरीत था।

मन के कोने से एक पतली सी आवाज आई कि मेरा सवाल अनुत्तरित ही रह जाएगा क्योंकि देवलोक का वह जमाना खिसक चुका है; यह मृत्युलोक है यहां फरेब, अन्याय, चाटुकारी, मक्कारी, धोखाधड़ी, चमचागिरी का बोलबाला है; जो यह कर पाया वह सफलता पाएगा और जो यह सब न कर सका और न्याय की ही बात करता रहेगा और वह हर मोड़ पर दुख पाएगा। मेरे सवाल पर सोचने समझने का समय किसी के पास नहीं है और न रहेगा। इसे अपने दुर्भाग्य का हिस्सा समझना ही ठीक रहेगा। देखें कल का सवेरा क्या पैगाम लेकर आता है। मैंने किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए मानसिक रूप से अपने को तैयार कर लिया था और मन ही मन प्रताप हाई स्कूल घोलेंग में अपनी रीजन्सी पूर्ण करने का मन बना लिया क्योंकि रीजन्सी का प्रस्तावित स्कूल वही था।

आज इस घटना को घटित हुए तिरेपन साल पूरे हो गए हैं। मेरे सहपाठी अधिकांशतः पुरोहित बन गए हैं। इनमें अपने समाज और गैर आदिवासी समाज के सहपाठी दोनों ही शामिल हैं। वे क्या कर रहे हैं और क्या नहीं कर रहे हैं उस पर मैं नहीं जाना चाहता हूं लेकिन इतने वर्षों में मेरा अनुभव यही रहा कि वह प्रदूषित मानसिकता जिसके कारण पंगा हुआ आज भी बरकरार है; कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अप्रत्यक्ष। उस घटना के बाद मेरे समुदाय के सहपाठियों ने क्या चुनौती ली मैं कह नहीं सकता। उनके लिए वह बस एक घटना ही बनकर रह गई और मेरी पहचान एक मुक्कामार के रूप में रह गई। उक्त संपूर्ण घटना देवलोक तुल्य वातावरण में घटित हुई। उस लोक में एक छोर से दूसरे छोर तक विभिन्न शास्त्रों के ज्ञाता देवपुरूषों की भरमार थी, दर्शनिक, ईश-शास्त्री, नीति-शास्त्री, समाज-शास्त्री, मानव-शास्त्री, कानून-विद, सब थे। आप एक ढूंढोगे वहां सैकड़ों की संख्या में ये सब मौजूद थे; और तो और अपने ही समुदाय के धर्मगुरू थे लेकिन उक्त नस्लीय टिप्पणी पर किसी ने मुंह न खोला। बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन? हरियाली से लदे देवपुरूषों का जब यह हाल रहा तो सूखे झाड़ और ठूंठ समान आम आदमी के विषय क्या कहा जाए।

 नस्लीय टिप्पणी में तो किसी आदिवासी माई के लाल ने मुंह न खोला, किसी ने बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं किया, ये तो जन्मजात खूंखार थे। इन पर कौन लगाम लगाए? जो भी हो उन्हें काबू में लाना ही पड़ेगा नहीं तो आादिवासी शब्द केवल इतिहास के पन्ने में ही देखा जा सकेगा, शेष सब समाप्त हो जाएगा और यह मान लिया जाएगा कि वास्तव में आदिवासी लोग किसी काम के लायक नहीं थे।

बहरहाल, जीवन के बाद के वर्षों में मैं शासकीय सेवा के लिए चयनित हुआ, शासकीय सेवा में मैंने खूब झंडे गाड़े । नौकरी के दौरान भी मुझे गाहे-बगाहे आदिवासी होने की कीमत चुकानी पड़ी, कभी कोई अधिकारी इसे लेकर ताना मार देता था तो कभी कोई सवर्ण कनिष्ठ भी आदिवासी होने पर टिप्पणी करने से नहीं चूकता था । लेकिन मैंने अपना तेवर हमेशा वही बनाए रखा, जिस तेवर की वजह से मुझे सेमनरी छोड़नी पड़ी थी, और ऐसी हर टिप्पणी, हर अपमान का हमेशा वैसे ही मुक्कामार अंदाज में मुंहतोड़ प्रतिरोध करता रहा । आखिर हम ही तो इस धरा के सच्चे बेटे हैं, हमारे पुरखे इस मिट्टी में मिट्टी बन कर मिल गये और मिट्टी की उवर्रता में इजाफा किया । उन्होंने ये हमारे लिए, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए किया । हम आदिवासियों ने हमेशा जंगल के बाहर से आने वालों का स्वागत किया, उन्हें अपनी वनोपज से समृद्ध किया । जब मिशनरी आए तो हमारे पुरखों ने उनका भी स्वागत किया, उनकी बातों को और ईसा की महिमा को सुना, उन्हें अपनाया, सिर्फ इसलिए कि वो चाहते थे कि उनकी आने वाली संतानें भी मुख्यधारा में जगह बनाएं, हमें गर्व है कि हमने जगह बनाई । जहां तक हो सका मैंने छोटानागपुर आदिवासी समाज का नाम रोशन किया लेकिन फिर भी मन में एक कसक रह गई कि दरअसल मैं जो बनना चाहता था, वो एक अन्यायपूर्ण, एकतरफा फैसले के कारण न बन सका, एक धर्मगुरू, एक मिशनरी…………….

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तुम आदिवासी किसी काम के नहीं

अथनास किसपोट्टा

श्री अथनास किसपोट्टा छोटानागपुर परिवार से ताल्लुक रखते हैं। वे सेवानिवृत्त वरिष्ठ शासकीय अधिकारी रहे हैं।श्री किसपोट्टा पिछले 40 वर्षों से लेखन कार्य करते आ रहे हैं, लेखन कार्य के साथ साथ उन्होंने कई पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी किया है। उनके लेखन में छोटानागपुर क्षेत्र के इर्दगिर्द जीवंत घटनाओं की झलक दिखलाई पड़ती है।
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