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अपनी पूरी ज़िंदगी …

निस्वार्थ किसी के लिए गुज़ार देती है।

बिना अपनी फिक्र किए ममता का चादर हमें ओढ़ा देती है।

बिना जताए कोई एहसान,

देती है हमें एक नया मुक़ाम

माँ की इस ममता को मेरा सलाम।

त्याग का प्याला पीकर

संस्कारों की लहरों से सींचती है

दिल की नगरी में बसाकर

अपना रात-दिन हमारे नाम करती है।

ममता और त्याग का संगम है,

है वह एक ईश्वरीय वरदान।

जिसके जीवन में होता यह अनोखा इंसान

चमकती है उसकी दुनिया इंद्रधनुष समान।

माँ की इस ममता को मेरा सलाम।

नन्हे हाथों को थामकर

देती है हमें एक खुला आसमान।

सिखाती है खोलना अपने पंखों को

हमारे सपनों को देती है एक नई उड़ान।

माँ की इस ममता को मेरा सलाम।

 

 

 

 

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Sourabh Kumar

बहुत ही सुंदर कविता है जिसने भी लिखी है उसको मेरा दिल से सलाम धन्यवाद आपको