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चुभती हुई गरमियों के दिन ..। नयन के माथे का घूँघट…उसके ललाट पर विषधर के फन सरीखा फैला हुआ था। पसीने से नहायी… हाथ का पंखा झलती ,वह घूँघट की ओट से आंगन की झकमक करती भीड़ को ताक रही थी। वहां शोरगुल के घने बादलों के बीच….रंगीन साड़ियों और दमकते गहनों से सजी गुजी औरतें, हलवाईयों की निगरानी करने में उलझे पुरुष,बिन माँगे सलाहों की पुष्पवृष्टि करतीं गांव घर की बुजुर्ग सुलझी हुई महिलाएं,शरारतों में रमी बालकों की टोली, टटके कस्बाई फैशन को कृतार्थ करती नवयुवतियाँ  ….मानों एक इंद्रधनुष सा फैला था।

मगर नयन को प्रतीत हो रहा था कि इस इंद्रधनुष से आग की लपटें निकल रही हैं और वह फुंकी जा रही है…इन लपटों में। उसका सारा शरीर तप रहा है। अचानक उसे लगने लगा कि उसके इर्द गिर्द… एक बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई है।  उसे बहुत शिद्दत से एकांत की आवश्यकता महसूस होने लगी..चिर-काम्य,शीतल एकांत!

पर क्यों ऐसा हुआ ! कल दोपहर तक तो नयन…इस कदर तपिश से झुलसी न जा रही थी। वह अच्छी भली… मेहमानों के लिए भगौने भर भर कर चाय बना रही थी ,तरकारियाँ काटने में महराजिन की मदद कर रही थी ,समारोह की विशिष्ट अतिथिद्वय बूढ़ी फुआ सासों के पांव दबा कर आशीषें बटोर रही थी। और तो और…विवाह के पूर्व की कई रस्मों पर गाए जाने वाले चुटीले , “ए” प्रमाणपत्र वाले गीतों पर भी उदार मन से मुस्कुरा पड़ी थी।

तो फिर…रंग में भंग कहां हुआ!

स्वभाव! और क्या…!!!बचपन से ही ऐसी है वह। कोई बात कलेजे में बैठ गई तो फिर निकलने का नाम ही नहीं लेती। फिर दिनों तक…उलझी- उलझी, सख्त चेहरा लिए फिरती रहेगी। पर बात भी कैसी…! मन की जलन जाने का नाम ही नहीं ले रही। आँखें मूंदे… उंगलियों के पोरों से फटती कनपटियाँ दाबे…वह चुपचाप लेटी थी पर एक दिन पहले की दोपहर…जैसे सांकल बजा-बजा कर उसे उद्विग्न करती रही।

कल दोपहर से औरतों का  गाना बजाना शुरू हुआ और फिर जैसी महफिल सजी कि बस ! मंझली ननद और उसकी सहेलियां जब ” कल रात हमरे घर में चोरी भयी…” पर थिरकीं तो नयन मोहाविष्ट सी देखती ही रह गई।

” कहाँ से सीखा! शहरों में तो कोरियोग्राफर सिखाते सिखाते अपना सिर पीट लेते हैं मगर पृथुल कटि…बल खाने से इंकार कर देती है। ” यहाँ तो डर लग रहा था कि सौ सौ बल खाती कमर कहीं मोच न खा जाए।  दो-दो बहुएँ उतार चुकी…घूँघट काढ़े, सुंदरी अनरसा भाभी ने जब ” सैंया थानेदार हमारे नथुनिए पे गोली मारे…” गाते हुए ..नाचना शुरू किया तो इतने जोरों का कहकहा लगा कि नयन भौंचक्की रह गई। गांव की ही एक ननद ने कान में बताया  कि इनके पति सचमुच में थानेदार हैं। मुस्काती नयन ने सामने दृष्टि गड़ा दी। किसी नौटंकी की बाई सी मंजी अदा से …वह क्षीण कटि..जानलेवा ठुमके लगा रही थी। कमरा…सस्ते मजाकों और ठहाकों से गूँज रहा था।तभी शोर सा उठा” कानपुर से आ गईं…”। और किसी सुवासित हवा के झोंके सी…वह सलोनी स्त्री..औरतों से भरे उस कमरे में जब आकर खड़ी हुई तो लगा कि…कमरा अचानक दूधिया बल्ब की रौशनी में नहा उठा। काली तांत की साड़ी पर कढ़े बेलबूटे…फिरोजी रंग का पूरी आस्तीनों वाला ब्लाउज, कानों में सोने के मोरों से जटित झुमके और वैसे ही कंगन। विराट कत्थई बिंदिया से सजा…उन्नत माथा।

नयन की तो जैसे सांस रुकने लगी। सोचा…”समय कैसे इन्हें यूँ बिना छुए गुजर गया!”

कुछ देर तक तो…मिलना-मिलाना चलता रहा। फिर तभी…साड़ी का पल्लू कमर में खोंसती …वह बोलीं ” रे लड़कियों! ढोलकी जरा मन से बजाना। आज …सच में…नाचने का बड़ा मन हो रहा है। देखना…ताल न कटे।”

फिर… वह नाचीं। देर तक …नाचती रहीं। ढोलकी की ताल …कई कई बार कट गई। लड़कियाँ ऊब गईं। पर वह नाचती रहीं।

नयन को लगा…यह तो नाचना नहीं था। कुछ और था। मन आतंकित सा हुआ। सास की तरफ देखा। उनके घूँघट से ढंके ललाट पर अदृश्य त्यौरियाँ सी खिंचीं थीं।

दो औरतें… आमने-सामने थीं। उनके दरमियान …गुजरे अनगिनत बरसों का हिसाब-किताब अनसुलझा पड़ा था। इसका तनाव …नयन साफ महसूस कर पा रही थी। सो सहसा चिंतित हो उठी।

खैर …उस दिन ,काफी शाम ढले …वह सभा भंग हुई थी और दुनिया के कारोबार शुरू हुए थे।

शाम के भोजन की तैयारी चल रही थी। खाना बनाने वाली औरत जिसे सभी झनक बुलाते थे …वाकई झनक रही थी “अब इतने से मसाले बचे हैं। कल से बता रखा है फिर भी किसी को सुधि नहीं है। खाने में स्वाद न हो तो मुझे दोष न देना”। नयन स्वाद की फिक्र से अधिक… उसकी झांय झांय बंद करने के इरादे से उठी। सोचा “पति को बता दूँ…वो किसी से मंगा देंगे”।

शाम का धुंधलका गहरा चुका था। उसकी आड़ लेकर वह लज्जालु वधू… धीमे कदमों से दालान की ओर बढ़ी। उस समय..प्रायः पति वहीं खाट पर लेटे गपशप करते होते हैं।

पर वहां तो घुप अंधेरा छाया था। तभी याद आया कि आज तो गांव में क्रिकेट का मैच था। शायद सभी लोग मैच देखने गए हैं…अभी तक लौटे नहीं।

वह पलट ही रही थी कि कुछ आहट सी हुई। वह चौंक पड़ी। पत्थर के एक पाये की ओट होकर देखा।

अंधेरे दालान में…बिल्कुल समीप खड़े दो शरीर। गाढ़ा, फुसफुसाता पुरुष स्वर…”अब लगा कि ब्याह का घर है। कब से आस देख रहे थे! आज भी वैसी ही हो।शरीर जरा सा भी नहीं ढला!”

इठलाता स्त्री शरीर और पास आ कर परिहास कर उठा किंचित ऊँचे स्वर में ” सो तो है बबुआ जी।  इसी से दीठ लगा कर देखते रहते हो…भरे आंगन में भी!”

कुछ और भी अप्रत्याशित घटा था …नयन के सामने ,हाहाकार करते समय के उस छोटे से टुकड़े में।

उस दालान के घुप अंधेरे भरे दरवाजे के पार खड़ी नयन सहसा हिम हो उठी थी। दोनों आकृतियाँ… समीप आती गईं। बदन उलझते गए। दोनों शरीर… अब सिर्फ़ शरीर होने की प्रक्रिया में रत थे। समय का वह टुकड़ा…न जाने कैसे  सिर्फ आग की एक नदी बन कर रह गया जिसमें  से गुजर कर…नयन अपने सारे होशोहवास जला बैठी थी।

मगर यह कैसे संभव हो सका कि उसी हिम से हो आये शरीर और धधकती चेतना के साथ…उस रात उसने सब ब्यौहार निपटाये। पंगत में परोसा, औरतों की चुहलबाजी पर मुस्कुरायी भी,घर की स्त्रियों के साथ पाँत में खाने बैठी, सास की दी चाबियां संभालीं, सोने जाने से पहले गृहस्थी समेटी…सब कुछ शांत भाव से करती रही।

पर रात को जब बिस्तर में लेटी तो मन जैसे अंगारों पर लोटने लगा ” इतनी निकृष्ट बात! छिः ! इस मिट्टी में मिल जाने वाले शरीर के लिए ऐसी निर्लज्जता !”

उसका बेचैन मन…बरसों पुरानी स्मृतियों के कपाट… खटखटाने लगा।अपने ब्याह के समय की एक घटना स्मरण हो आई।

ससुराल में उसकी प्रथम रात्रि थी। दिल यूँ धड़क रहा था जैसे अभी बाहर आ जाएगा। रिश्तेदारी और घर की औरतें… उसे घेर कर बैठी,उससे हँसी मजाक कर रही थीं। तभी एक चंचल सी आवाज ने उसे चौंका दिया। अंग्रेजी में जिसे हस्की वॉयस कहते हैं न! …वैसा ही कुछ बैठा बैठा सा गला!

” दुल्हनिया किस चिंता में डूबी है!”

सामने एक लंबी, निहायत ही गठे बदन की स्त्री…खड़ी मुस्कुरा रही थी। दूध सा गोरा रंग,घने काले बालों का जूड़ा… रसीले विलासी अधर! टकटक लाल साड़ी पर लाल फूलों वाला गाढ़े पीले रंग का ब्लाउज।तकरीबन.. तीस-पैंतीस बरस की।

वह कुछ कुछ मुग्ध भाव से निहारती …पांव छूने बढ़ी। स्नेह से चिबुक थाम…वह स्त्री बोल उठी ” हमेशा सुखी रहो। पाला पोसा…कलेजे का टुकड़ा थमा दिया। अब सब संभालो…राज करो। बहुत पुण्य किए होंगे… इसी से इतना अच्छा पति पाया है। मन का पति मिला…इससे बड़ा भाग्य और क्या!”

नयन हठात् चौंक उठी। उस सुंदर आनंदी चेहरे के गले में सहसा यह कौन सा सुर बज उठा था!

तभी रिश्ते की वह भतीजी… उसके कान में फुसफुसा गई ” बड़की दादी हैं…. कानपुर वाली। आपके पतिदेव की बड़की माँ।आंचल से पोंछ कर,बढ़िया से पैर छुईये।”

वह सकपकाई सी…दुबारा पांव छूने बढ़ी और उसकी उस चिरयौवना बड़ी सास ने…अधबीच में ही उसे अंक में भर लिया “जुग जुग जियो मेरी रानी! राज करने ही आई हो…इसीलिए रानी कहा। बुरा तो न मानोगी न!”

स्नेह में डूबा…वह चुहल भरा निहोरा उसके कपोल रंग गया था। तभी…चौंकने का अभिनय करती…उसकी वह रूपसी सास… गालों पर हाथ रख कर सहसा उदास सी हो उठीं ” अब बेटा कहाँ अपना रह पाएगा! बहू के गालों के गड्ढे देखे…इतने गहरे! जितने गहरे बीवी के गालों के गड्ढे… पति उतना ही उसके प्रेम की गहराई में डूबेगा।”

  उन गड्ढों की गहराई इंगित करती उनकी तर्जनी पकड़…नयन शर्म से दोहरी हो आई थी। वह जोरों से खिलखिला पड़ीं।

तभी अचानक…शायद उनके आनंदी स्वभाव का प्रश्रय पाकर..नयन एक दुसाहस कर बैठी थी। यद्यपि नरम आवाज में शालीनता से ही कहा था ” आप कहीं से भी नहीं दिखतीं कि आप हम लोगों की बड़ी माँ हैं। इतनी सुंदर हैं। ऊपर से…आपकी उमर का तो पता ही नहीं चलता।”

वह उदास सी मुस्काईं ” सब कहते हैं। माना..सुंदर हूँ परंतु अपने भाग्य का क्या करूँ! यह मरा कड़वा तीता भाग्य …सदैव मेरे जीवन को जहर ही किए रहा।”

फिर सहसा संभलीं। बात बदलते हुए बोलीं, “तुम्हारी हँसी बड़ी प्यारी है। हमेशा ऐसे ही हंसती मुस्कुराती रहना। तभी…ऐसी ही नई नवेली दिखती रहोगी और तुम्हारा पति… तुम पर रीझा रहेगा।”

नयन शर्म से लाल हो आई… इस खुले परिहास से! फिर उसका जी चाहा… कहे ” पर आपके होंठ किस दुख से मुर्झाये हुए हैं! प्रकृति ने जैसे चिरयौवन का वर दे कर भी…आपके प्राण हर लिए हों!”

बाद में …ननदों से जाना कि सच ही उनके प्राण हर लिए गए थे…अपने ही पिता और भाईयों के हाथों। उनकी दस बरस की वयस और पचास बरस के बड़के बाऊजी …जिनकी चौथी ब्याहता बनकर वह आईं थीं। पहले की तीन पत्नियाँ… बिना संतान का मुंह दिखाए चल बसी थीं।

गंभीर, सरल हृदय के बड़के बाऊजी… फिर से विवाह नहीं करना चाहते थे। विवाह के नाम से ही विचलित होकर रोने लगते। पर उनके छोटे भाई,नयन के ससुर अमरनाथ ने… अपने बड़े भाई के ब्याह में खासी रुचि दिखाई।बोले ” बड़े भाई का वंश न चले…ऐसी अनुचित बात मेरे रहते न होगी। इनका ब्याह मैं कराऊँगा।” एक तरह से..उन्हें विवश करके…कसमें दे देकर…विवाह के लिए तैयार कराया।

अंततः एक रिश्तेदारी में ही…फ्रॉक पहने उछलती कूदती मंदा को…अमरनाथ ने देखा और रीझ गए कि बड़े भाई का विवाह यहीं तय किया जाए।

वह अविकसित कली…जिसका सौंदर्य अभी बंद पंखुड़ियों तले ही दबा था… पुरूष रुपी भ्रमर उसी अनदेखे सौंदर्य के मकरन्द की लालसा से लुब्ध हो उठा था।

फिर तो न अनीति का विचार किया न लोगों के बोल-कुबोलों का। वह बेमेल विवाह सबके कलेजे में कांटे सा चुभा।लोगों ने निंदा की, सस्ते परिहास किए,नई ब्याही वधू के प्रति करूणा प्रकट की…फिर अपनी अपनी दुनियादारी में लग गए।

लेकिन उस बालिका का क्या बना!

असीमित क्षोभ और लज्जा से उसकी छाती फटती रही।इस जीवन में अब अपने पिता और भाईयों का मुंह न देखेगी… ऐसा प्रण भी किया। अपने दादा की आयु वाले पति का वह तिरस्कार करे या आदर !  वह बालिका…अंततः यह तय न कर सकी। वह अस्वाभाविक दांपत्य…उसके कोमल शरीर और आत्मा पर निरंतर कोड़े बरसाता रहा।फिर एक दिन… विद्रोह की आंच में सुलगती वह चिड़िया,बहेलिए के बिछाए जाल में स्वयं जा गिरी।

अमरनाथ तब तक अपने परिवार को गांव में छोड़कर… बड़े भाई के पास कानपुर आ गए थे।

पिता समान बड़े भाई शिवनाथ का छोटे भाई के लिए अगाध स्नेह था। इस स्नेह ने अमरनाथ को पहले ही अकर्मण्य और निकम्मा बना रखा था।अब उनके चारित्रिक पतन ने …उनके भीतर के मनुष्य को पूरी तरह से रौंद डाला।

अमरनाथ की पत्नी ,निहायत ही आम स्त्री थीं…साधारण शक्ल-सूरत,घरनी सी,कर्मठ । अमरनाथ ठहरे रसिया! अपनी सारी जवानी कानपुर में बिता दी।

मंदा अब रस से भरी गगरी थी।अपने रुपरंग और ठाठें मारते यौवन के अभिमान से वह वहशी सी हो उठी थी। अमरनाथ कभी-कभार…गांव जाते। परिवार की खोज-पूछ करते,बीवी-बच्चों पर धौंस जमाते और खीजते-झींकते …रस्म-अदायगी से कुछ दिन बिताते। फिर वापस कानपुर।

और मंदा! …अमरनाथ की अनुपस्थिति के ये दिन वह अंगारों पर लोटती रहती। एक हिंस्त्र भाव सदैव उसे विकल किए रहता। अमरनाथ को वह अपना अपराधी मानती थी।काश! अमरनाथ की दृष्टि उस पर न पड़ी होती। शायद आज…वह भी एक सहज स्वाभाविक जीवन जी रही होती। पर अब जब उसने सामने परोसी भोजन की थाली में से कड़वा ग्रास उठा ही लिया है तो  भूखी क्यों रहे? वह तो छक कर खायेगी.. दूसरे के हिस्से का भी! समाज ने उसे भले ही…एक लिजलिजाते,घिनावने रिश्ते से बांध दिया है परन्तु वह कभी नहीं स्वीकारेगी इस त्रास से भरे बंधन को।

वह उसी की है जो उसके रूप के माधुर्य पर रीझ कर..उसे इस घर में लाया था। अब इससे किसी का बिगड़ता है तो बिगड़े… उसे परवाह नहीं। मंदा की रातें जब बिलखते बीततीं थीं तब किसी ने उसकी परवाह की थी!

जिन्दगी का हिसाब-किताब भी…यूँ कहाँ ठीक-ठीक बैठता है! सालों साल… दो जिस्म ,अपने सवालों के जवाब तलाशते रहे। वहीं… एक अनुतप्त एकाकी हृदय ने जीवन के दुरूह प्रश्न के सामने…खामोशी से पराजय स्वीकार कर ली।

कई बरस बीत गए। यौवन और लालसा की आंच मद्धम पड़ चुकी थी। कम से कम अमरनाथ के लिए।

वह वापस लौटे… अपने जीवन में। पुत्र-पुत्रियाँ सयाने हो चुके थे। अब उनके विवाह की चिंता सामने थी।

जीवन का संघर्ष, चांदी के तारों की शक्ल में …पत्नी के बालों में चमक रहा था। चेहरे पर असमय उग आईं झुर्रियों में..भोगे हुए अकेलेपन और तिरस्कार की कहानी लिखी थी। अमरनाथ की दृष्टि वहां तक न जा सकी। मंदा की सुंदर मूर्ति की याद ने इसमे बाधा दे दी। उनका हृदय पत्नी के लिए आज भी…वितृष्णा से भर उठा।

पुत्र मेधावी निकला था। प्रतियोगी परीक्षा में उच्च अंक ला कर बड़ा अफसर बना।

अमरनाथ ने बड़े चाव से उसका ब्याह कराया…नयन के साथ।

वही नयन आज …अपने ब्याह की उस प्रथम  रात्रि की याद से ले कर…कल का अघटित घटने तक..सब कुछ मथे डाल रही है।

उसे बड़की माँ से सदैव सहानुभूति रही है। उनकी जगह स्वयं को रख कर भी कई बार देखा है। और हर बार…उन्हें क्षमा करती आई है। पर बीच में …इतने बरसों का व्यवधान ! उम्र की ढलान पर सरकती जिन्दगी! फिर भी… शरीर के लिए यह अदम्य लालसा!

ना…यहाँ उसका संस्कारी चित्त विद्रोह कर बैठा। सहसा वह अनमनी सी हो उठी। वह प्रायः अपने कमरे में घुसी रहती। कम बोलती। पर उसके नेत्रों में सदा एक आग सी जला करती।

उसके व्यवहार में आया परिवर्तन… सभी ने लक्ष्य किया। संभवतः बड़की माँ ने भी। थोड़ी चौंकीं जरूर परन्तु प्रकट में …उनका शांत,स्निग्ध भाव ही दिखता रहा।

विवाह समारोह संपन्न हो जाने की आंधी खत्म हो जाने के बाद…एक बयार उठी अतिथियों की विदाई की। सभी एकबारगी फिर व्यस्त हो उठे। परन्तु नयन अन्यमनस्क बनी रही। ऐसी ही एक भागमभाग के बीच…नयन की सास तारा उसे एक सूने कमरे में ले गईं और किंचित दबी हुई मगर दृढ़ आवाज में कहा ” नयन! भूल जाओ। मरे को न मारो। हम जितना देखते समझते हैं…सच उतना ही नहीं होता।”

नयन अवाक् । फिर सख्त हो कर बोली “जो देखा…जो सुना… वह भूलने की नहीं, लज्जा की वस्तु है माँ! घृणा के मारे…”

उसका चेहरा विद्रूप से टेढ़ा हो गया।

नयन की सास सहसा कठोर हो आईं ” सिर्फ तुमने ही देखा…सुना! “

नयन चौंक पड़ी। तारा शून्य में देखती…कहती जा रही थीं ” मैं तुम्हें ढूँढ़ती हुई वहां आई थी…उस शाम।  लज्जा से हट गई। सच पूछो तो अब ..मुझे  घृणा भी नहीं होती। सब मन की ही तो बात ठहरी। समाज की दृष्टि में मैं उनकी पत्नी हूँ पर उनका मन मुझसे कब जुड़ सका! बच्चों से बंधे वो चले आए हैं पर उनके प्राण तो वहीं अटके हैं।

शुरु में बड़ा औघ लगता था कि अपना आदमी.. किसी और औरत को…! फिर बहुत बाद में..समझी कि वह तो कभी अपना था ही नहीं। जो परायी सुंदर काया पर रीझ कर जन्म-जन्मांतर के संबंध को ठोकर मार दे…वह मरद अपना नहीं। फिर पराये से कैसा रंज…कैसी आशा!”

नयन हक्की-बक्की सी हो आई।धीमे से पूछा ” आपको बड़की माँ से भी शिकायत नहीं! “

तारा उदास सी हंसीं ” जब ब्याह कर आई थीं तो कई बार लगा कि सगी बिटिया हैं।वैसे ही लाड़ किया…खिलाया,सुलाया,कंघी-चोटी की। आज भी उनका दोष नहीं देखती। अपने बेमेल विवाह को स्वीकार नहीं किया…यही न!”

अबकी बार नयन की आँखों में आँसू छलछला आए “पर माँ! आपका तो बहुत कुछ गया। वापस लौट कर आने का नहीं…”

पता नहीं… उसके ये आँसू किसके लिए थे! सास के लिए…हर ऐसी स्त्री के लिए या खुद के लिए!

कल को उसका पति प्रभात भी ऐसा ही अन्याय कर बैठे तो?

नयन ने बार-बार अपने मन को तौल कर देखा है। किसी दिन भाग्य ऐसा विपरीत हो उठे तो अपार घृणा से उसकी तो छाती फट जाएगी।वह प्रभात का मुंह न देखेगी।

फिर…उसकी सास कैसे जीवन की इस मूल पूँजी में ही सेंध को झेल गईं! शिकायत तक नहीं करतीं।

और हद तो यह कि सारी दुनिया जिसे दोषी ठहराती है…उसके लिए उनकी क्षमाशीलता का अंत नहीं।

” क्या मिला है बेचारी को! भाईसाहब देवतापुरुष हैं पर वैसे वृद्ध आदमी को पति रुप में पाकर…देह कैसी गनगनाती होगी! सोच कर देखो! आखिर जिन्दगी काट दी उन्हीं के नाम से न। बाल-बच्चे… जिन्दगी के सारे व्यापार…क्या छूटा! जब देह और मन की भूख न मिटे तब इंसान चोरी करेगा, डाके डालेगा… इसमें ताज्जुब क्या!”

तारा यह सब…इतने तटस्थ भाव से बोलती हैं जैसे इस सब से उनका कोई सरोकार न हो।

तो क्या उन्होंने सच कहा था! पति के साथ सात जन्मों के बंधन में बांधने वाली…मन की गांठ  खोलकर …खुद को बंधनमुक्त कर चुकी थीं वह शायद!

जीवन अबाध गति से चलता रहा। नयन …तरुणी से प्रौढ़ा बनी। आंचल की ओट से झांकती… लज्जालु वधू से जिम्मेदार गृहिणी बनी। नई भूमिकाओं में जीवन इतना व्यस्त हो उठा कि पीछे का बहुत कुछ छूटता चला गया।

तभी एक सूचना पहूँची “बड़के बाऊजी नहीं रहे”।

प्रभात गए थे कानपुर।

लौटे तो थोड़े गुमसुम से…क्लांत से लगे। नयन के कुरेदने पर बोले” बड़के बाऊजी के दोनों लड़के खासे बिगड़ैल दिखे। ना तमीज ना लिहाज। एरोगेंस अलग। बड़की माँ तक ही यह रिश्ता निभता हुआ जानो।”

प्रभात गलत साबित हुए थे। बड़की माँ के जीवनकाल में ही… दोनों परिवारों के सारे संपर्क-सूत्र शनैः शनैः टूट गए। कारण की विवेचना करने की न किसी की इच्छा हुई न आवश्यकता!

दो-चार बरसों के उपरांत… एक विवाह समारोह में ,अकस्मात्  बड़की माँ से सामना हो गया। नयन स्तंभित रह गई उन्हें देखकर। विवर्ण चेहरा, रुखे सफेद केश,सादी सी साड़ी में उस पुरानी लावण्यमयी बड़की माँ को ढूँढ़ती रह गई नयन!

सुना है,देखा भी है कि वैधव्य औरत की श्री हर लेता है। पर यहां तो वैधव्य का अर्थ मुक्ति था…अनंत क्षोभ और भर्त्सना से पले एक बोझिल रिश्ते से। तो क्यों नहीं दिखता इन आँखों में मुक्ति का वह उत्सव? मुरझाए होंठों पर …उस सदा के अनचाहे रिश्ते की डोर कट जाने पर..छाया सुकून का उजाला… नयन क्यों नहीं देख पा रही?

संकोच से भरी, वह उनके पांव छूने आगे बढ़ी ही थी कि कटे पेड़ सी वह लंबी काया… भहरा कर उसके गले आ लगी। आँसुओं से तर…वह सुबकता चेहरा हठात् दयनीय हो उठा।

“कइसे जियें बिटिया! जिनगी वीरान हो गई।कहाँ जाएं…का करें। जी को तो जैसे भुलावना लग गया है बचवा!”

नयन की आँखें भर आईं। सामने खड़े विक्षुब्ध स्त्री-हृदय ने अपने दरवाजे खोल दिए थे पर नयन ने प्रवेश का मार्ग नहीं ढूँढ़ना चाहा। उसके मन में कुछ अटका सा पड़ा था…जिसकी वह व्याख्या नहीं  कर पा रही थी।

फिर वही …जीवन की आपाधापी ,वही नामालूम सी व्यस्ततायें! कुछ और बरस सरकते चले गए।

इस बार..नयन के ससुर,अमरनाथ  चल बसे। शरीर से स्वस्थ थे। बस…आखिर में स्मृति चली गई थी। कभी कभी घने बादलों में बिजली की कौंध की तरह…किसी अपने को पुकार बैठते थे। कभी बेटे को…कभी बेटियों को। पत्नी के लिए वही विरक्त भाव अंत तक बना रहा।

पर उनके आँखों में …पत्नी के लिए पहचान कभी खत्म नहीं हुई। पल भर के लिए भी सिरहाने से हटतीं तो गरजने लगते “कहाँ गई! बुलाओ उसे। मुझे खिलाएगा कौन? मेरे कपड़े भी आजकल नहीं निकालती…”

तारा तटस्थ भाव से सब कुछ करती जातीं। न अनुराग…न विराग। एक मौन समर्पण का भाव ही सदैव मुखर दिखता।

प्रभात जरूर कभी कभी बड़बड़ा उठते “सारी जिन्दगी जिनके लिए जिये…वो आज सेवा करने क्यों नहीं आते?”

ऐसे मौकों पर …तारा के चेहरे पर कुछ कड़वा, कसैला सा व्याप जाया करता। क्या विगत अतीत की कोई स्मृति… उसके चित्त को म्लान कर जा रही थी! या एक संस्कारी नारी हृदय को… मरणासन्न पति के लिए,पुत्र का वह उलाहना सहन नहीं हुआ था।

नयन ,अंत तक समझ न पाई।

कुछ कुछ समझी थी उस दिन… जिस दिन ससुर की मृत देह  ले जाई गई थी। सास को ढूँढ़ती.. वह छत पर चढ़ी तो अवाक् हो उठी। पेट के नीचे तकिया दबाये…सूने आकाश की तरफ देखती.. वह नीचे बिछी दरी पर लेटी थीं। महज कुछ घंटों में वह क्या से क्या हो गईं थीं! आँखों के नीचे के वो स्याह गड्ढे, पपड़ियाये होंठ…।

तभी…नयन की यादों में बसी ,एक और भूली-बिसरी करुण मूरत तैर उठी। उन्हें भी तो खबर दी गई थी। फिर..!!

सदा का लांछित, तिरस्कृत…दो प्रणयी हदयों के बीच का वह अनुराग का रिश्ता… इतना कच्चा था कि आज इस दुख की घड़ी में…दो आँसू भी न गिरे उन नेत्रों से जिनकी मादकता की भेंट एक भरे-पूरे परिवार की खुशियाँ चढ़ गईं थीं।

नयन की आदत है। बहुत सोचती है…मथती रहती है विचारों को। सो मन को टहोका “कौन जाने! चक्षुलज्जा ने रोक लिया हो। आखिर नाती-पोतों वाली हुईं । या असह्य शोक से चूर ..टूटी पड़ी हों!”

नयन कितनी कच्ची साबित हुई… कितनी नासमझ!!!बड़की माँ पहूँची थीं…आखिर तक। स्वस्थ शरीर और सहज स्मित से सजे मुख वाली… अच्छे गहने-कपड़ों में…नयन को विस्मित करते हुए!

उन्होंने अपनी वात की बीमारी का हवाला देते हुए देर से आने की वजह थमाई। फिर…अपने पति के प्रिय छोटे भाई के चले जाने का शोक जताते हुए …देर तक नाक सुड़कती रहीं।  कुछ देर बाद…तौलिया थामे.. नहाने चली गईं। निकलीं तो ताजा,धुले चेहरे से शोक के धब्बे गायब थे। गर्म चाय के घूँट भरती …बड़की माँ को देखकर नयन भूल सी गई कि यह शोक का घर है।

जितने दिन रहीं…अपनी चुस्त-दुरूस्त काया लिए …गांव-घर घूमती रहीं, दुनियादारी की बातें…बाल-बच्चों की परेशानियाँ कहती सुनती रहीं। अपने खेतों का हिसाब-किताब संभाला , बरसों से छूटे पड़े गांव के घर के मरम्मत की चिंता जताती रहीं।

हालांकि दुनियादारी के झमेलों में…नयन का दिमाग प्रायः ठिकाने नहीं रह रहा था उन दिनों… फिर भी ,तेरहवीं के भोज के दिन एक घटना घटी थी जो नयन को सदैव स्मरण रहेगी।

औरतें पंगत में खाने बैठी थीं। बड़की माँ … गांव में किसी के घर से घूम कर लौटी थीं। धूप में तमतमाया हुआ लाल चेहरा लिए आकर  धप् से …सबके साथ जमीन पर खाने बैठ गईं। पत्तल पर परोसी गई पूरियाँ, तरकारी, मिठाई, दही… सब कुछ स्वाद ले लेकर खाती रहीं। अचानक…भोजन की परितृप्ति की छाप से सजे मुख से …जोर से पुकार उठीं “थोड़ा दही और देना…चीनी भी! दो गुलाबजामुन भी…”

उनकी वह पुकार …उस दिन अनसुनी रह गई थी क्योंकि ठीक उसी समय…अमरनाथ की ब्याहता …सन से सफेद बालों और झुकी हुई कमर वाली ,तारा की कलेजा टूक कर देने वाली रूलाई हवा में गूँज उठी थी “कहवाँ गइलअ हो मोर राजा!”

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sunita

सुनीता सिंह

समकालीन कथा लेखन में सुनीता सिंह एक अलग तेवर लेकर आती हैं। हमारे आसपास बिखरी कहानियों को उनका अनूठा शिल्प एक अनदेखे उजास से दमका देता है। पहला संग्रह 'बंधन तोड़ो ना' के नाम से प्रकाशित।  

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