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ब्रजभाषा और खड़ी बोली का अन्तर

ब्रजभाषा मथुरा, वृंदावन, आगरा, अलीगढ़ में बोली जाती है, खड़ी बोली मेरठ, सहारनपुर एवं हरियाणा के उ.प्र. से सटे इलाको में बोली जाती है.
ब्रजभाषा आकारान्त या औकारान्त है. यह प्रवृति संज्ञा, विशेषण, सर्वनाम, क्रिया सबमें पाई जाती है. जैसे: घोड़ौ, छोरो, गोरो, सावरो, मेरो, तेरो, जाऊँगो; खड़ी बोली में घोड़ा, छोरा, गोरा, साँवला, मेरा, तेरा, जाऊँगा जैसे आकारान्त रूप मिलते हैं.
ब्रजभाषा में पुल्लिंग एकवचन में उ प्रत्यय तथा स्त्रीलिंग एकवचन में इ प्रत्यय का व्यवहार होता है. जैसे: मालु, करमु, दूरि, लहरि; खड़ी बोली में ऐसी प्रवृति नहीं मिलती. वहा माल, कर्म, दूरी, लहर जैसे रूप मिलते है.
खड़ी बोली में दीर्घस्वर के बाद द्वित्व की प्रवृति मिलती है. जैसे: लोट्टा, बेट्टा, राण्णी आदि. ब्रजभाषा में यह प्रवृत्ति नहीं है. वहां लोटा, बेटा, रानी आदि शब्द ही चलते हैं.
खड़ी बोली में ह के पहले अ का उच्चारण ए की तरह सुनाई पडता है. जैसे: केह्या , सेह्या, रेह, केह आदि. ब्रजभाषा में ऐसा नहीं होता .
ब्रजभाषा में स्वर मध्य में न की प्रवृति मिलती है, जैसे- लेन- देन, आना- जाना, दाना-पानी. खड़ी बोली में स्वर मध्य में ण का प्रचलन है: लेण-देण, आणा- जाणा, दाघा – पाणी.
ब्रजभाषा में उतम पुरुष एकवचन में सर्वनाम रूप है- मैं अथवा हौं. इसका तिर्यक रूप हो जाता है- मों जबकि खडी बोली में उतम पुरुष एकवचन में मैं और उसके तिर्यक रूप में मैं/मुझ का प्रयोग होता है.
ब्रजभाषा में इसके संबंधवाची रूप हैं – मेरो, तेरो, हमारो. खड़ी बोली में मेरा, तेरा, हमारा जैसा रूप चलता है.
ब्रजभाषा में खासकर ग्रामीण ब्रजभाषा नपुंसक लिंग मिल जाता है. संज्ञार्थक क्रिया का रूप देखनो  नपुंसक लिंग ही है. अपनो धन में जो अपनो विशेषण है वह भी नपुंसक लिंग का ही उदाहरण है. खडी बोली में नपुंसक लिंग का व्यवहार नहीं मिलता है.
ब्रजभाषा में मूल कारक बहुवचन और तिर्यक एकवचन में ए प्रत्यय व्यवह्त होता है,जैसे: लड़के; लेकिन मथुरा से दक्षिण बढने पर यह ओकारान्त हो जाता है. खडी बोली में मानक हिंदी की तरह ही रूप बनते हैं, अतंर सिर्फ तिर्यक बहुवचन के रूपों को लेकर है. खडी बोली में इनमें ऊँ प्रत्यय लगता है; जैसेः मर्द्यु का, बेट्यु को.
ब्रजभाषा में वर्तमान कालिक कृदन्त प्रत्यय हैं- त/तु -मारत/ मारतु ; भूत कालिक कृदन्त रूप ब्रजभाषा में यौ- कारान्त होते हैं; जैसे: मार्यौ, कह्यौ. जैसे ही हम मथुरा से पूरब बढना शुरू करते हैं, वैसे ही य के लोप की प्रवृति मिलती है. लेकिन मथुरा से दक्षिण बढना शुरू करने पर विशेषण में भी यौ- कारान्तता की प्रवृति मिलने लगती हैः आच्छ्यो. खडी बोली में वर्तमान कालिक कृदन्त प्रत्यय है- ता -मारता ; भूतकालिक कृदंत रूप-या प्रत्यय के योग से बनते हैं; जैसे: मार्या कह्या; लेकिन बहुवचन के रूप मानक हिंदी की तरह ही बनते हैं- कहे, रहे जैसे.
ब्रजभाषा में संज्ञार्थक क्रिया के रूप ने, नौ, इबो प्रत्यय के योग से बनते हैं- देखनो, देखिबो. खडी बोली में इसके लिए ना प्रत्यय का व्यवहार होता है- देखना
ब्रजभाषा में वर्तमानकाल की सहायक क्रियांए हैं- हौं-हैं, है-हौ, है-हैं. यहां हूँ के लिए हौं,हो के लिए हौ का प्रयोग उल्लेखनीय है; भूतकाल में हुतौ, हुती, हुते; भविष्यत काल में- ह अथवा- ग प्रत्यय का व्यवहार होता है; रहिहै, रहैगो. खडी बोली में वर्तमान काल की सहायक क्रियाएं मानक हिन्दी की तरह ही हैं, अंतर सिर्फ यह है कि वहां है का उच्चारण संवृत होकर हे की तरह सुनाई पडता है. विकल्प के साथ यह सै जैसा भी सुना जाता है; जैसेः लाया करे हे/ सै. भूतकाल में- था, थे,थी और भविष्यत् काल में गा का प्रयोग होता है, लेकिन उसका उच्चारण ग्गा की तरह होता है. (द्वित्व):- जाऊंग्गा.

ब्रजभाषा और खड़ी बोली में समानता

दोनों में कर्ता के‘ने‘ चिह्न का प्रयोग होता है.
दोनों में विशेषण लगभग एक जैसे बनाए जाते हैंः अतंर सिर्फ यह है कि पुल्लिंग शब्दों के विशेषण ब्रजभाषा में ओकारान्त हो जाता है जबकि खडी बोली में आकारान्त ही होते हैं (मूल कारकीय रूप मे)
बहुवचन भी दोनों में बहुत हद तक एक ही तरह से बनाए जाते हैं, सिर्फ उच्चारण का फर्क है. जैसे ब्रजभाषा में घर, सखा, किलो लें, लहैं आदि. ब्रजभाषा में इयान प्रत्यय  लबाकर स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन बनाने की प्रवृति है- अखियान, छतियान. यह प्रवृति खडी बोली में नहीं है. खडी बोली की तरह ब्रजभाषा मेंतिर्यक शब्दों के बहुवचन भी ओं प्रत्यय लगाकर बनते हैं लेकिन औं जैसे सुनाई पडते है- घरौं

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राजीव सिन्हा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के बाद दिल्ली में अध्यापन
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